लविंग लाइसेंस

वो वक्त भी था जब युवतीयों को देख गुदगुदी कम सिहरन ज्यादा होती. ट्यूशन पढ़ने आती खिलखिलाती लड़कियाँ सामने से आती, तो पैर काँप जाते, साइकिल से औंधे-मुँह गिरता, लड़कियाँ मुँह दबा उपहास करती हँसती निकल जाती. कोई कलम भी माँग ले, तो छिज्जी उंगली और अंगूठे के बीच आखिरी कोना पकड़ता; सर झुका कलम ऐसे बढ़ाता जैसे हाथ में साँप की पूँछ आ गयी हो; छोड़ भाग आता. 

ये सिलसिला कब तक चला, याद नहीं. पर हाँ, कई गुलाब कोसते रहे,  “हाथ में ही रखोगे लल्लू, या उसे दोगे भी? मज़े में गुलदस्ते में था. खामख्वाह तेरे भी बीस रूपये गये, और मैं भी इंतजार में मुरझा गया.” 

मैं क्या? बड़े बड़े शूरमा हिल जायें. भगवान राम को भी जनक से छुप-छुपा, शानू के गाने गा, सीता को इम्प्रेस करना होता, तो रामायण की कथा कुछ और होती. धनुष तोड़ने से मिल जाए तो भैया! हॉस्टल में हमने भी बहोत तोड़-फोड़ मचाई. 

खैर! त्रेतायुग से कलियुग के ट्रांजीशन में परिवर्तन तो लाज़मी था. मैंने भी आखिर इस क्षेत्र में कई प्रयोग किये, ‘ट्रायल-एरर’ से लेकर ‘व्हाट वूमन वांट्स्’ की तह तक. हाथ में मर्दाना अकड़ और गूफ्तगू का सहज़ अंदाज़. जैसी युवती, वैसी अदाकारी. पढ़ाकू को ज्ञान, फिल्मी-चक्कर वालों को रोमाँस-डोज़, और कन्फ्यूज्ड मंदबुद्धि सुंदरियों को झूठी तारीफ. बस सिक्का जम गया. ज्ञान बाँटने का शौकीन था. लवगुरू बन गया.

गुरू गुड़ रह गया, चेले चीनी खाने लगे. समय बदल रहा था. मेरे फॉर्मूले आउट-डेटेड होने लगे. न वो रिझाना. न वो मनाना. न वो घंटों प्यार की गूफ्तगू. अजी! कौन बैंक जाये, पासबुक-इंट्री करे? ATM स्वाइप का ज़माना आ गया. पहले ऊबड़-खाबड़ रोड पे ऑटोरिक्शा में क्षणिक श्पर्श में ही शरीर तप्त-कंपित हो जाते, अब तो पब्लिक-पार्क में लिपटे पड़े मिलते हैं. क्षुब्ध, मैंने भी सन्यास ले लिया. कोई खास शारिरीक संबंधों से शिकायत नहीं थी, परंतु इस प्रेम में उचाटपन और अस्थिरता दिखी. वो कहते हैं ना, आज पूजा, कल कोई दूजा. फिर मेरे जैसे पुजारी की क्या आवश्यकता?

अरसों बीत गये. कल फ्लाइट की सीट पे अनमना सा था. सफ़र में सोने की पुरानी आदत, और सामने वाली सीट पे कुलबुलाहट. सीट के बीच से पड़ी एक अनचाही नज़र ने ही कह दिया, नवविवाहिता जोड़ा है. चूड़ियों से सुसज्जित आधी से अधिक बाँह, जो बारम्बार पति के हाथ को झटकती. पति भी कहाँ मानने वाला? कभी कमर, कभी वक्ष की ओर, और मैं मुँह छुपाता बैठे-बैठे आधी-तिरछी करवट लेता. तभी कुछ अप्रत्याशित हुआ और मैं काँप गया. पीली साड़ी, माँग में मोटी सिन्दूरी रेखा और स्वर्ण गहनों में लदी युवती ने पति का हाथ मरोड़ा और अंग्रेजी में कहा, “What do you think you fool? You got a license to love me or what? Stay away.” चार दिन की शादी में वस्त्रहरण का लाइसेंस तो नहीं मिल जाता.

नारी-सम्मान और प्रेम के पुजारी को इस वीरांगना में असुर नहीं, साक्षात् दुर्गा दिखी. इस लविंग लाइसेंस के कई इम्तिहान हैं. प्रेम-शास्त्र कल भी था, आज भी है, अज़र-अमर, Evergreen. सिलेबस ही तो बदला है, विषय तो वही है. सोचता हूँ, पाठशाला फिर जैसे-तैसे चालू कर ही दूँ, ईमानदारी से लाइसेंस की.