कबिरा खड़ा बाज़ार में

तोतली टूटी-फूटी बोली थी, नाक बहती, निकर खिसकती, फिर भी सवाल जरूर पूछा जाता- बड़े होकर क्या बनोगे? इस सवाल के ज़वाब से भी IQ का संबंध है. कोई डॉक्टर, कोई इंजीनियर, कोई पायलट, जो माँ-बाप सिखाते बोल देते. मैंने कहा, “साईंटिस्ट बनूँगा, नोबेल प्राइज जीतूँगा, और मरने से पहले राष्ट्रपति भी.” पूछनेवाले मुँह एँठते-कहते, “झा साब! और कुछ बने ना बने, आपका बेटा लम्बी लम्बी जरूर छोड़ेगा.”

अंकल की बात दिल पे लग गयी. मैंने कहा आविष्कार तो मैं कर के रहूँगा. लेकिन क्या? 

कबीर दास के दोहे से पहला आइडिया आया.

“बोए पेड़ बबूल का, आम कहाँ से होये”.

मैंने कहा अब तो बबूल के पेड़ पे आम लगा के रहूँगा. ऐसी खुराफातों के लिये भाई शुरूआत में जरूर साथ देते हैं ताकि प्लान फेल होने पर उछल उछल कर ठिठोली कर सकें. 

पड़ोसी गाँव के मामाजी ने ग्राफ्टिंग के गुर सिखाए, माँ से जिद कर केमिकल खरीदे, और बबूल के पेड़ पर एक-एक बड़े सलीके से सर्जिकल कटिंग कर जोड़ बनाता गया. एक टहनी भी न लगी, सामने के आम का लहलहाता पेड़ गंजा जरूर हो गया. पिताजी ने इन्क्वायरी बिठाई, भाईयों ने फुलझड़ी लगाई, और एक महान वैज्ञानिक पटाखों की तरह बजा दिया गया.

“निंदक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय”

निंदा और ठिठोली करने वाले तो घर में ही था. कबीर दास के इसी फंडे पे हिम्मत दुगुनी हो गयी. 

इस बार बिजली बनाने की सोची. गाँव के लिये बिजली नयी चीज़ थी. वो तो बस उस बिज़ली से वाकिफ थे जो मवेशी मेले में नाचने आती. भाई-साब ने आईडिया दिया, गाँव के पचास लोग हर रात साईकिल चलायेंगे, डायनमो इफेक्ट से पचास घरों में बल्ब जलेंगे.

“धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय”

प्लान साइकल की स्पीड से फुस्स हो गया.

२००४ ईसवी में पहली बार रिसर्च करने इंडियन इंस्टिच्यूट अॉफ साइंस में किशोर वैज्ञानिक रूपेण चयनित हुआ. रिसर्च का तो पता नहीं, कैंटिन के डोसे लाज़वाब थे. और रात को लैब के बाहर चाय. वाह! मज़ेदार. बाकि रिसर्च तो क्या, इस टेस्ट्यूब से उस टेस्ट्यूब. चार घंटे बाद रीडिंग लो. फिर वही रीपीट करते रहो. इस से कहीं ज्यादा प्रयोग तो मेरी माँ मुरब्बे-अचार में कर ले.

“जिन खोजा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ”

आखिरकार मेडिकल की पढ़ाई खत्म होते ही पहली फुरसत में अमरीका निकल लिया. दो बड़े फैकल्टी के लैब पसंद आये. हमारे आधे फैसले तो हेड-टेल या अक्कर बक्कर बम्बे बो से होते हैं. डॉ लिगेट विजयी रहे, लातेरबूर हार गये. मैं भी जी-जान से रिसर्च में लग गया. डॉ. लातेरबूर को देखता तो मंद मुस्कान देता. बिना फंडिंग के गरीब दयनीय परिस्थिति थी उनके लैब की.

“जाति न पूछो साधू की, पूछ लिजिये ज्ञान”

२००५ दिसंबर: Paul laterbur wins Nobel Prize in medicine.

मतलब यूँ कहिये, सारे गणित धरे के धरे रह गये. थोड़े दिन टेस्ट-ट्यूब में चाय-साय बनाई, और वापस आ गया डाक-साब बनने.

मेक इन इंडिया कोई जुमला भले ही हो, बड़े जुगत का काम है. अजी मुरब्बे नहीं बनाने, रिसर्च और आविष्कार करने हैं.

“कबिरा खड़ा बाज़ार में, माँगे सबकी खैर”