The blue ice: a shit-com

For whatever reasons, birds always found my head as a coveted shitting destination. Even in a crowded environment, if a bird is flying around, I would gear up myself holding a file or book overhead. My transient breath of relief would be annuled as the raven comes back swifter dropping on me accurately like a targeted missile. I was brutally splattered with bird-droppings during my short stint in Indian Institute of Science, which boasted of highest density of nasty crows (kauwa). For the first time in my life, I wore a Govinda-style yellow shirt to camouflage the shitty polka-drops.

The fear of bird-droppings soon extended to any flying object as I would hide even at sight of aeroplane. I always wondered what happens to the shit in the air. Most convenient way would be to disperse it in vastness of atmosphere, and cruise away. The untimely rains and windy splatters. My curiousity ended recently when an elderly woman in Bhopal (city in central India) got hit by a huge chunk of ice fallen from sky. Early investigations suggested it could be ‘blue ice’, human excreta disposed from aeroplanes which gets frozen in stratosphere. My fear wasn’t completely ungrounded and some do throw the shit right up in the air, especially Indian planes devoid of sanitary space on ground.

While the aeroplane mystery took some time, Indian railways were pretty blatant and open-minded from its inception. A hole in the toilet peeps directly down on track. At a usual train velocity of 150 km/hr, a 15 minute shit of yours can make roughly 38 km trail of shit droppings. Considering ever-engaged toilets in trains, the multi-origin shitty trail would extend from origin to destination spanning some 1000 kms. One of the royal heir I heard of, always took a local 30 minute railway stretch every morning at 6 0’clock, only to shit in moving train! His habit seem to have ended at a serious note when he disregarded the statutatory warning displayed in Indian Railways – Please do not use toilets when the train stops at platform. People say, constipated Raja-Saa’b continued his rituals even when train stopped. Sanitation fellows with long brooms began cleaning the toilets, shoving through holes beneath the train, and gave a powerful thrust when they found anything obstructive. This time, it was Raja Saa’b’s ass!

I haven’t utilised public toilets much in life, since I considered them as some sacred love destination. Similar to temple walls, toilet walls too are studded with scribbled names of ‘love-couples’. I wonder how somebody can have an amorous feeling while shitting, and scribble his flame’s name. Extreme love! Isn’t it? As I recently travelled and about to position myself strategically on a shaking commode, I found it written on toilet wall – I love you Priya. I pity the love of poor girl Priya with the shitty boy.

There were days even in my life, when village toilets were reserved for women who seem to have incessant affair with bathrooms. I would be forced to stroll to bamboo-plantations and ease myself with bushy grasses rubbing my body. Umpeen times would I change my position as I would imagine somebody staring at me and breaching my privacy. At a distance, I saw a queue of villagers shitting calmly with one palm on their cheek as if in a great contemplation. Surely, those early days devoid of toilets, gave India great philosophers. Even today, at least my blogging ideas shoot off from long gruelling sessions in toilet. Doesn’t my blog stink?

[a satire on need of sanitation in developing nations; a sequel to earlier blog ‘Love is in the air’]

लविंग लाइसेंस

वो वक्त भी था जब युवतीयों को देख गुदगुदी कम सिहरन ज्यादा होती. ट्यूशन पढ़ने आती खिलखिलाती लड़कियाँ सामने से आती, तो पैर काँप जाते, साइकिल से औंधे-मुँह गिरता, लड़कियाँ मुँह दबा उपहास करती हँसती निकल जाती. कोई कलम भी माँग ले, तो छिज्जी उंगली और अंगूठे के बीच आखिरी कोना पकड़ता; सर झुका कलम ऐसे बढ़ाता जैसे हाथ में साँप की पूँछ आ गयी हो; छोड़ भाग आता. 

ये सिलसिला कब तक चला, याद नहीं. पर हाँ, कई गुलाब कोसते रहे,  “हाथ में ही रखोगे लल्लू, या उसे दोगे भी? मज़े में गुलदस्ते में था. खामख्वाह तेरे भी बीस रूपये गये, और मैं भी इंतजार में मुरझा गया.” 

मैं क्या? बड़े बड़े शूरमा हिल जायें. भगवान राम को भी जनक से छुप-छुपा, शानू के गाने गा, सीता को इम्प्रेस करना होता, तो रामायण की कथा कुछ और होती. धनुष तोड़ने से मिल जाए तो भैया! हॉस्टल में हमने भी बहोत तोड़-फोड़ मचाई. 

खैर! त्रेतायुग से कलियुग के ट्रांजीशन में परिवर्तन तो लाज़मी था. मैंने भी आखिर इस क्षेत्र में कई प्रयोग किये, ‘ट्रायल-एरर’ से लेकर ‘व्हाट वूमन वांट्स्’ की तह तक. हाथ में मर्दाना अकड़ और गूफ्तगू का सहज़ अंदाज़. जैसी युवती, वैसी अदाकारी. पढ़ाकू को ज्ञान, फिल्मी-चक्कर वालों को रोमाँस-डोज़, और कन्फ्यूज्ड मंदबुद्धि सुंदरियों को झूठी तारीफ. बस सिक्का जम गया. ज्ञान बाँटने का शौकीन था. लवगुरू बन गया.

गुरू गुड़ रह गया, चेले चीनी खाने लगे. समय बदल रहा था. मेरे फॉर्मूले आउट-डेटेड होने लगे. न वो रिझाना. न वो मनाना. न वो घंटों प्यार की गूफ्तगू. अजी! कौन बैंक जाये, पासबुक-इंट्री करे? ATM स्वाइप का ज़माना आ गया. पहले ऊबड़-खाबड़ रोड पे ऑटोरिक्शा में क्षणिक श्पर्श में ही शरीर तप्त-कंपित हो जाते, अब तो पब्लिक-पार्क में लिपटे पड़े मिलते हैं. क्षुब्ध, मैंने भी सन्यास ले लिया. कोई खास शारिरीक संबंधों से शिकायत नहीं थी, परंतु इस प्रेम में उचाटपन और अस्थिरता दिखी. वो कहते हैं ना, आज पूजा, कल कोई दूजा. फिर मेरे जैसे पुजारी की क्या आवश्यकता?

अरसों बीत गये. कल फ्लाइट की सीट पे अनमना सा था. सफ़र में सोने की पुरानी आदत, और सामने वाली सीट पे कुलबुलाहट. सीट के बीच से पड़ी एक अनचाही नज़र ने ही कह दिया, नवविवाहिता जोड़ा है. चूड़ियों से सुसज्जित आधी से अधिक बाँह, जो बारम्बार पति के हाथ को झटकती. पति भी कहाँ मानने वाला? कभी कमर, कभी वक्ष की ओर, और मैं मुँह छुपाता बैठे-बैठे आधी-तिरछी करवट लेता. तभी कुछ अप्रत्याशित हुआ और मैं काँप गया. पीली साड़ी, माँग में मोटी सिन्दूरी रेखा और स्वर्ण गहनों में लदी युवती ने पति का हाथ मरोड़ा और अंग्रेजी में कहा, “What do you think you fool? You got a license to love me or what? Stay away.” चार दिन की शादी में वस्त्रहरण का लाइसेंस तो नहीं मिल जाता.

नारी-सम्मान और प्रेम के पुजारी को इस वीरांगना में असुर नहीं, साक्षात् दुर्गा दिखी. इस लविंग लाइसेंस के कई इम्तिहान हैं. प्रेम-शास्त्र कल भी था, आज भी है, अज़र-अमर, Evergreen. सिलेबस ही तो बदला है, विषय तो वही है. सोचता हूँ, पाठशाला फिर जैसे-तैसे चालू कर ही दूँ, ईमानदारी से लाइसेंस की. 

कबिरा खड़ा बाज़ार में

तोतली टूटी-फूटी बोली थी, नाक बहती, निकर खिसकती, फिर भी सवाल जरूर पूछा जाता- बड़े होकर क्या बनोगे? इस सवाल के ज़वाब से भी IQ का संबंध है. कोई डॉक्टर, कोई इंजीनियर, कोई पायलट, जो माँ-बाप सिखाते बोल देते. मैंने कहा, “साईंटिस्ट बनूँगा, नोबेल प्राइज जीतूँगा, और मरने से पहले राष्ट्रपति भी.” पूछनेवाले मुँह एँठते-कहते, “झा साब! और कुछ बने ना बने, आपका बेटा लम्बी लम्बी जरूर छोड़ेगा.”

अंकल की बात दिल पे लग गयी. मैंने कहा आविष्कार तो मैं कर के रहूँगा. लेकिन क्या? 

कबीर दास के दोहे से पहला आइडिया आया.

“बोए पेड़ बबूल का, आम कहाँ से होये”.

मैंने कहा अब तो बबूल के पेड़ पे आम लगा के रहूँगा. ऐसी खुराफातों के लिये भाई शुरूआत में जरूर साथ देते हैं ताकि प्लान फेल होने पर उछल उछल कर ठिठोली कर सकें. 

पड़ोसी गाँव के मामाजी ने ग्राफ्टिंग के गुर सिखाए, माँ से जिद कर केमिकल खरीदे, और बबूल के पेड़ पर एक-एक बड़े सलीके से सर्जिकल कटिंग कर जोड़ बनाता गया. एक टहनी भी न लगी, सामने के आम का लहलहाता पेड़ गंजा जरूर हो गया. पिताजी ने इन्क्वायरी बिठाई, भाईयों ने फुलझड़ी लगाई, और एक महान वैज्ञानिक पटाखों की तरह बजा दिया गया.

“निंदक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय”

निंदा और ठिठोली करने वाले तो घर में ही था. कबीर दास के इसी फंडे पे हिम्मत दुगुनी हो गयी. 

इस बार बिजली बनाने की सोची. गाँव के लिये बिजली नयी चीज़ थी. वो तो बस उस बिज़ली से वाकिफ थे जो मवेशी मेले में नाचने आती. भाई-साब ने आईडिया दिया, गाँव के पचास लोग हर रात साईकिल चलायेंगे, डायनमो इफेक्ट से पचास घरों में बल्ब जलेंगे.

“धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय”

प्लान साइकल की स्पीड से फुस्स हो गया.

२००४ ईसवी में पहली बार रिसर्च करने इंडियन इंस्टिच्यूट अॉफ साइंस में किशोर वैज्ञानिक रूपेण चयनित हुआ. रिसर्च का तो पता नहीं, कैंटिन के डोसे लाज़वाब थे. और रात को लैब के बाहर चाय. वाह! मज़ेदार. बाकि रिसर्च तो क्या, इस टेस्ट्यूब से उस टेस्ट्यूब. चार घंटे बाद रीडिंग लो. फिर वही रीपीट करते रहो. इस से कहीं ज्यादा प्रयोग तो मेरी माँ मुरब्बे-अचार में कर ले.

“जिन खोजा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ”

आखिरकार मेडिकल की पढ़ाई खत्म होते ही पहली फुरसत में अमरीका निकल लिया. दो बड़े फैकल्टी के लैब पसंद आये. हमारे आधे फैसले तो हेड-टेल या अक्कर बक्कर बम्बे बो से होते हैं. डॉ लिगेट विजयी रहे, लातेरबूर हार गये. मैं भी जी-जान से रिसर्च में लग गया. डॉ. लातेरबूर को देखता तो मंद मुस्कान देता. बिना फंडिंग के गरीब दयनीय परिस्थिति थी उनके लैब की.

“जाति न पूछो साधू की, पूछ लिजिये ज्ञान”

२००५ दिसंबर: Paul laterbur wins Nobel Prize in medicine.

मतलब यूँ कहिये, सारे गणित धरे के धरे रह गये. थोड़े दिन टेस्ट-ट्यूब में चाय-साय बनाई, और वापस आ गया डाक-साब बनने.

मेक इन इंडिया कोई जुमला भले ही हो, बड़े जुगत का काम है. अजी मुरब्बे नहीं बनाने, रिसर्च और आविष्कार करने हैं.

“कबिरा खड़ा बाज़ार में, माँगे सबकी खैर”

तालीम

कुछ चीजें न याद है और न ख्वाहिस हैं सुनने की. भला उस जमाने में डाइपर रहे होंगें, शोभा डे जैसे हाइ-फाई लोगों ने पहनें होंगे, हम तो नंग-धड़ंग घूमते रहे. दूरदर्शन पे तो डायपर वगैरा के विज्ञापन भी नहीं आते थे, क्या हगीज़ और क्या पैंम्पर्स? इसकी एक वज़ह शायद ये भी रही हो कि कार और फ्लाइट में घूमना फिरना कम था. अब ट्रेन-बसों में तो खिड़की से धार बहाने की बच्चों को आजादी थी. न उम्र रही, और न आज़ादी; ये मलाल रह गया कि डायपर कभी न पहन सके. 

विज्ञापन तो क्या थे? सुनील गावस्कर और वेंगसरकर तो छोड़ो, आलोकनाथ तक साबुन के विज्ञापन में. नहाने से जैसे नफरत सी हो गयी. वो तो धन्यभाग्य पहली दफा प्रीति जिंटा एक ऐड में दीखी और जैसे देश में स्नान-क्रांति आ गयी. 

डायपर तो एक छोटी कड़ी है. तालीम तो जैसे अधूरी सी रह गयी. अजी आधे तो ऐसे जीये, “बी.ए. हुए, नौकर हुए, पेंशन मिली और मर गये”. बच्चों को वन्डरला (एक फन रिसोर्ट) घूमाने गया. जोश में पानी में छलाँग भी मार दी, और ऊँकडू हो दायें-बायें लात मारने लगा. कई जुगत लगाये. बच्चे तैरते हुये ठिठोली करने लगे. हिम्मत तो देखो! भला कोई अपने बाप पे भी हँसता है? मैं एक बारी छुटपन में शतरंज के खेल में पिताजी पे हँसा. अजी वो थप्पर रसीद करा, कि अगली शाम तक शतरंज खेलने की हिम्मत न बनी. अब ये और बात है, लतखोर प्रवृत्ति थी कि अगली शाम फिर बिसात बिठा ली.

किताबों का शौक था या नहीं, ठीक ठीक याद नहीं. पर पढ़ डाली जो सामने दिखी वो. एक बारी तो रोमानिया का इतिहास तक पढ़ डाला. अब माँ-बाप भी शेखी बघारने में कंधे पे बंदूक रख देते. घर में बर्तन कम, कप-शिल्ड ज्यादा दिखने लगे. कोई बड़ी बात नहीं, अगर मिश्रा अंकल को मेरे क्विज-डिबेट वाली ट्रौफी में चाय पिला दी हो. इसी धक्केबाजी में मेडिकल परीक्षा भी दिला दी. अब तक तो वो मशीन बन गया था, कि एक तरफ से सवाल डालो तो, दूसरी तरफ से जवाब निकले. ये सिलसिला चलता रहा, और मैं पढ़ता रहा. मशीन घिसती, खराब होती, पर धड़धकेल चलती रहती.

अमूमन ऐसे लोगों को रट्टू-घिस्सू, पढ़ाकू कहके भी दुत्कारते हैं. जब जब ये महसूस होता, एक गिटार क्लास या जिम ज्वाइन कर लेता. लेडीज़ हौस्टल के चक्कर मार लेता. या होस्टल सुप्रीटेंडेंट के घर दीवाले में बम फोड़नें में शामिल हो लेता. ऐसा लगा जैसे तालीम दुगुनी हो गयी हो. किताबों मे झुका सर जैसे तन गया हो. मशीन में जैसे जान आ गयी हो.

मतलब जी वो कहते हैं, माँ दा लाडला बिगड़ गया. 

हरे-नीले चश्में पहन, कंधे तक बाल बढ़ा जिम मौरीसन सुनने लगा. रॉक शो में जा बाल को आगे-पीछे करने लगा, जैसे वो धोबीघाट की धोबन करती है. परिपक्वता इस मुकाम पे ला देगी, अंदाजा न था. आईना देखा तो जैसे बिहारी टोन में दिल की आवाज आयी, “साला, धोबी बना दिया बे!”.

समाजवाद और साम्यवाद का वकील हूँ. डॉक्टर हो या धोबी, तालीम तो तालीम है. मेरी दकियानूशी तालीम बदली. और देश भी तो कच्छे से डाइपर तक आ गया. 

………

एक शिरकत अंग्रेजी में भी

Another brick in Deewaar

बस यूँ ही, मेरे मन की.

यूँ तो मैं हिंदी में कुछ खास लिखता नहीं, बचपन से वही मिडिल क्लास वाली अंग्रेजी की कवायद. लेकिन आज़ ज़रा देशी मामला है, और ये ब्लोग-स्लोग में तो क्या गोरे और क्या पाकिस्तानी? कोई भी मुँह उठा के लाइक करने आ जाता है. धर्मपत्नी जी भी परेशान, कि ये किन लड़कियों के कमेंट्स पढ़ मुस्कुराते रहते हो? मैने कहा ऐसा नहीं है. आधा वामपंथी, आधा गाँधीवीदी है ये वामगाँधी. निर्मोही. निर्विकार.

तो प्वाइंट पे आता हूँ.

ये किसी छिटपुट बात के बतंगड़ पे किसी गाँव में कोई हादसा हो गया. कुछ खाने पीने का मामला था. छुटपन में हॉस्टल के मेस में मैनें भी काफी तोड़-फोड़ मचाई थी. खानसामें मेघलाल की लुंगी खींच चड्डी में दौड़ाया था. साले ने तूर दाल ऐसी बनाई की चार गोताखोर डाले फिर भी दाल का दाना नहीं. जीभ मत लपलपाओ अब तूर दाल के नाम पे. मेरा ब्लोग तो सस्ते में पढ़ रहे हो ना? और जकरबर्ग मियाँ अमरीका वाले ने चाहा तो बिल्कुल मुफ्त.

हाँ जी तो हम कहाँ थे? वो कुछ वही बजरंग बली के भक्तों ने मोहम्मद साब के चेले को…. फिर कान खड़े हो गये? अबे सिनेमाखोरों, ‘बजरंगी भाईजान’ की कहानी नहीं सुना रहा मैं! ये तो ग्लैमर-स्लैमर से कोसों दूर गाँव-साँव का मामला है.

खैर. तसल्ली है. भुखमरी से न मरा कोई. बढिया माँस-मुँस खा के डकार के मरा. मेरे अस्पताल में तो वो खडूँस डाइटिसीयन है. आधे तो वो गीली खिचड़ी और उबले कद्दू खा के सिधार गये.

सुनते हैं, बड़ी तादाद में लोग बाग आये. मरने से पहले भी. मरने के बाद भी. अजी गाँधीजी को एक गोडसे ने निपटा दिया था. पर ये लॉजिक बेकार है. वो ठहरे गोमूत्र पीने वाले शाकाहारी जब तब भूख हड़ताल वाले कंकालनुमा व्यकतित्व. और इधर तो गोमाँस वाला हट्टा कट्टा. खैर ये गाय वाय से दूर ही रहना ठीक. आदर करो या निरादर. मारे दोनों सूरतों में जाओगे. न गाँधी बचे न वो बचा.

अखबार में ये पुरष्कार वापसी का दौर आया तो मैंनें भी बचपन के क्विज डिबेट वाले अवार्ड ढूँढे. ये चिंदीचोर लेखक. अवार्ड वापस करने गये तब लोगों को पता लगा कि ये है कौन जनाब. इनसे ज्यादा तो मेरे ब्लोग के फौलोवर निकलें. मेरे क्या आपके भी. देशी कोई पढता कहाँ है? हाँ पीते बहोत है.

अब जो हुआ वो तो हो गया. मैं नहीं करता कुछ वापिस. मेरे जैसे बिरले ही मिलेंगे. आज भी स्याही वाली कलम से लिखता हूँ. अजी दवात से वो कलम में स्याही डालने का मज़ा ही कुछ और है. अब स्याही पोतने का तो तजुर्बा नहीं. हा हा हा हा.