दुल्हिन थ्योरी (Dulahin Theory)

जड़ें ढूँढना कठिन तो है ही। भारत में जड़ें ढूँढना और भी कठिन है, क्योंकि पुराने रिकॉर्ड डिजिटल नहीं हैं। ट्रिनिडाड के भारतीय (बिहार) मूल के शमसुद्दीन अब अस्सी वर्ष से ऊपर हैं। उन्होंने अपने जीवन-काल में तीन सौ बिछड़े परिवारों को मिलाया। उनके पास मात्र एक जहाजी काग़ज होता, जिससे उनके गाँव को ढूँढ कर यह मिलान करना होता कि वह कहाँ से आए? गाँव का भूगोल बदल चुका होता, पीढ़ीयाँ बदल चुकी होती, यहाँ तक कि धर्म भी कई परिवारों के बदल चुके होते। शमसुद्दीन ट्रिनिडाड से भारत आकर गाँव-गाँव घूमते, लोगों को तस्वीरें दिखाते, पूछते कि जहाज पर कोई गया था?

उन्होंने ही अपनी पुस्तक में ‘दुल्हन थ्योरी’ बनायी, जिसके अनुसार गाँव की दुल्हिनों के पास सबसे अधिक जानकारी होती है। पुरुष रिश्ते भूल जाते हैं, लेकिन दुल्हिन दोनों घरों का रिश्ता संभाल कर रखती है।

शमसुद्दीन जी की अब उम्र हुई, लेकिन यह डायस्पोरा के परिवारों का जुड़ना चलता रहे। ‘कुली लाइन्स’ में शमशुद्दीन जी के चिट्ठियों का संदर्भ तो है ही, अगर कोई सूत्र आपके पास हो तो अवश्य शेयर करें। कई लोग अब भी परिवार ढूँढ रहे हैं, और विदेश मंत्रालय की ‘ट्रेसिंग द रूट्स’ योजना ख़ास सफल नहीं।

#CoolieLines पुस्तक लिंक – amzn.to/2Ufb8hw

कोरिया की रानी ‘री’ और मैं

राजा की गद्दी। अनुवाद यही ठीक रहेगा। एक बहुमंजिली इमारत की इक्कीसवीं मंजिल का वो कोना जहाँ खड़े होकर उटोया का द्वीप दिखता है। इसी उटोया द्वीप पर एक श्वेत चरमपंथी ने कभी साठ-सत्तर लोगों को शीतल-रक्त मृत्यु दे दी थी।

शब्दानुवाद की यही समस्या है। ‘हॉर्सेस-माउथ’ को कोई तुरंग-मुख कह गए, ‘कोल्ड-ब्लडेड’ को मुझे शीतल-रक्त कहना पड़ रहा है। और होटल की ‘किंग्स सीट’ को राजा की गद्दी। उस दिन राजा की गद्दी पर कोरिया की रानी बैठी थीं। कितना सुंदर नाम था- री। न तिलोत्तमा, न पद्मावती, बस री। यह जरूर अयोध्या की रानी सुरीरत्ना की वंशज होंगीं। रत्न और सुर खत्म हो गया, बस ‘री’ रह गया, और मध्यमा और तर्जनी के बीच विराजमान सिगरेट।

मैं री के करीब ही खड़ा द्वीप का अवलोकन कर रहा था। जब से विश्व में समाजवाद आया, रानी के समीप अब कोई भी टॉम, डिक या हैरी खड़ा हो सकता है। हालांकि मैं इन तीनों महानुभावों से भिन्न था। मैं उस सामंतवादी मिट्टी का बना हूँ, जहाँ स्त्री का द्विचर रूप है। स्त्री पूज्य है वा त्यज्य। स्त्री का और कोई स्वरूप नहीं। मैनें कई बार चिनार के पतझड़ी शृंगार से ध्यान हटाकर इस युवती को देखा। और युवती से ध्यान हटाकर चिनार को। मुझे इस युवती में कभी रानी नजर आ रही है, कभी बौद्ध देवी थंका। यह त्यज्य तो नहीं, पूज्य ही हैं।

“आप भी इसी होटल में ठहरी हैं?”

“हाँ! और आप? जरूर ऑफ़ीस के ‘क्रिशमस टेबल’ में आए होंगें? वरना एशियाई क्यों यहाँ आने लगे?”

“एशियाई सुनकर अच्छा लगा। अमरीका में एशियाई अलग और इंडियन अलग कहते हैं।”

“वो तो नाक का फर्क है।” री कुर्सी पर झूलते हुए हँसने लगी।

“मैं समझा नहीं। हिंदुस्तानियों की नाक भला बाकी एशियाई की नाक से कब ऊँची हो गयी?”

“ये मैनें कब कहा कि आपकी नाक ऊँची है?”

“क्षमा कीजिएगा। मेरा मतलब नस्लीय टिप्पणी से नहीं था। हिंदुस्तान में नाक इज्जत से जुड़ी है।”

“नाक से। मूंछों से। पौरूष से। जाति से। धर्म से। धन से। हर चीज से जुड़ी है आप हिंदुस्तानियों की इज्जत। ऐसा सुना है।”

“हम इतने भी बुरे नहीं। पर आपके देश में इज्जत का तराजू क्या है?”

“पता नहीं। मेरी इज्जत तो अब एक नॉर्वेज़ियन के हवाले है।” री फिर से कुर्सी झूलाते बचकानी हँसी हँसने लगी।

री से उन दो दिनों में अच्छी मित्रता हो गयी। संभवत: उस होटल में उस पार के हम दो ही लोग थे। ‘उस पार’ मतलब यूरोप से बाहर की दुनिया के।

उसका पति भी उसी होटल में था, पर कभी मिला नहीं। हालांकि री जब राजा की गद्दी पर नहीं मिलती तो अपने कमरे में पति के साथ ही होती। पर यह बमुश्किल आध-एक घंटे का मामला होता। पुनश्च अपनी राजगद्दी पर वो विराजमान हो जाती, सिगरेट लिए। वो दो दिन गर कार्य-घंटों (वर्किंग हावर) के हिसाब से गिनें, तो मेरे साथ री ने अधिक बिताए। खुली हवा में, उटोया द्वीप किनारे। कोरिया की बातें करते। मैं भाषा के तार जोड़ता कि कैसे तमिल और कोरियन के बीच संबंघ है। और अयोध्या से संबंध। पर री को जैसे ख़ास रूचि न थी। हाँ! वो डॉक्टरी की बातें पूछती। अंतरंग बातें।

“क्या सत्तर वर्ष का पुरूष नपुंसक नहीं होता?”

“अब नपुंसक की उम्र-सीमा बढ़ गयी है। कई दवाएँ आ गयी हैं। पर क्यों पूछ रही हो?”

“क्योंकि मेरा पति सत्तर वर्ष का है!” और री फिर से झूल-झूल कर हंसने लगी।

मैं सन्न रह गया। यह बीस-तीस वर्ष की बाला भला सत्तर वर्षीय व्यक्ति के साथ इस ध्रुवीय देश में क्यों है? री के पति उनके शक्करी-पिता हैं। ओह! पुन: शब्दानुवाद हो गया। सुगर-डैडी। जब युवतियाँ अपनी ख़ास आर्थिक जरूरतों के लिए एक धनी वृद्ध से जुड़ जाती हैं। यह पश्चिम के मधुर संबंध हैं, जो पूरब में शनै:-शनै: आ ही जाएँगें। कुछ ज्ञान-हस्तांतरण उपरांत। हिंदुस्तान में भी शकरपिता-युग आएगा। पूंजीवाद, प्रगतिशीलता और नारी उन्मुक्ति जब चरम पर होगी, तब सुगर-देवों का भी अवतरण होगा। तब स्त्री द्विचर नहीं होगी। पूज्य और त्यज्य के मध्य त्रिशंकु भी होंगी। उन्मुक्त। शकर-पुत्री।

री का पति उसे आकाश में मिला। आधुनिक पुष्पक-विमान पर। जब कोरिया से जहाज हिमालय के ऊपर उड़ रहा था, तो उसने पहली बार री के शरीर पर हाथ रखा, और री मुक्त हो गयी। उसकी मुक्ति कब यौन-गुलामी बन गयी, यह री को स्मरण नहीं। री अब भी मुक्त है, किंतु जब ज़नाब अपनी पौरूष-उत्प्रेरक दवा फांक लेते हैं तो री दासी बन जाती है।

“इस दवा के साइड-इफेक्ट भी तो होते होंगें?” री ने सिगरेट की कश लेते प्रश्न किया।

“हाँ! होते हैं।”

“क्या इस से मृत्यु संभव है? हार्ट-अटैक?”

“संभव तो है। पर क्यों पूछ रही हो?”

“सोचती हूँ, ये बुड्ढा कब मरेगा?” अब वह उछल कर कुर्सी पर पद्मासन में बैठ गयी थी, और अनवरत हँस रही थी।

एक वृद्ध पति एक दिन काम-मुद्रा में मृत हो जाए? यह कैसी कामना है? री की हंसी अब अट्टहासी रूप ले रही थी। और इस भय से मेरा पौरूष कांप रहा था। मैं खिड़की से बाहर देखने लगा। कैसे इस उटोया-द्वीप पर घूम-घूम कर गोली मारी होगी? भाव-शून्य होकर हत्या की होगी, या री की तरह उन्मादित ठहाकों के साथ? कोल्ड-ब्लडेड मर्डर क्या सचमुच कोल्ड ही होता होगा?

“तुम्हारी समस्या क्या है री? अगर प्रेम नहीं तो त्याग क्यों नहीं देती?”

“प्रेम है। तभी तो नहीं त्यागती।”

“तो फिर ऐसी कामना?”

“हार्ट-अटैक की कामना भी कोई कामना है? यह तो स्वाभाविक मृत्यु है।”

“पर पति की मृत्यु की कामना तो है ही। यह मेरे लिए विचित्र है।”

“हम एशियाईयों का प्रेम जैसे वेश्या का प्रेम। उसकी बेटियाँ भी यही समझतीं हैं। उसके परिवार में मेरा यही अस्तित्व है।”

“तो बेटियों से मित्रता कर लो। उनको मातृत्व दो।”

“मातृत्व? वो क्या है? मेरी माँ तो मुझे स्मरण नहीं। वो कौन थीं, किस परिवार से थीं, कुछ ज्ञात नहीं। कहीं तुम्हारे देश से तो नहीं, वो महारानी?” और री फिर हँसने लगी।

री की हँसी अब मेरे लिए असहनीयता की सीमा पर थी। मातृत्व-बोध से मुक्त भी नारी का अस्तित्व संभव है? कहाँ मैं द्विचर रूप में अटका पड़ा हूँ, और यहाँ एक मायावी युवती क्षण-क्षण अपने बहिमुखी अस्तित्व का परिचय दे रही है।

री की कोरियन माँ पता नहीं कौन थीं? पर पिता मानसिक विक्षिप्त थे। शायद विस्मरण रोग अलझाइमर था। री उनकी सेवा करती। मृत्यु के समय तक साथ थी, पर पिता ने कभी री को पहचाना ही नहीं। वो अबोध थे। भाव-शून्य। कोल्ड। क्या यह ‘कोल्डत्व’ संक्रामक है? उनसे री को पसर गया, री से उसके पति को, और अब कहीं मुझ तक तो नहीं आ जाएगा? क्या यह रोग चुंबन से पसरता है या बस छूने से? उस शाम कहीं मेरे हाथ भी री तक तो नहीं पहुँचे, या मेरा पौरूष कांप गया था? क्या मेरी भारतीयता इस हिमालय पार की बाला के स्पर्श मात्र से समाप्त हो जाएगी? एक दिन मैं भी भाव-शून्य हो जाऊँगा? और तभी विश्व-नागरिकता मिलेगी? जब मैं ‘कोल्ड’ हो जाऊँगा?

चिनार के पत्ते दो दिन में कितने झड़ गए! लगता है रात तूफ़ान आया था।

सुबह अखबार में पढ़ा कि उटोया के उस हत्यारे ने अर्जी दी कि जेल का विडियो-गेम ‘प्ले-स्टेशन’ का नया संस्करण उपलब्ध कराया जाए। नए संस्करण में कुछ और वीभत्स खेल आए हैं। सरकार ने मानवाधिकार की रक्षा के लिए उसकी अर्जी मान ली है।

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(प्रवीण झा की यह कथा पहले जानकीपुल पर प्रकाशित)

बिहार की संगीत परंपरा (Music tradition of Bihar)

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‘बिहार की संगीत परंपरा’ पर मुझे बोलने को जब कहा तो मैंने एक झटके में हाँ कह दिया। एक तो इन्हें मना नहीं करना चाहता था, दूसरा यह कि लगा इसी बहाने कुछ बतकही हो जाएगी। लेकिन मैंने कहा कि मैं हिंदुस्तानी संगीत पर ही बात करूँगा, लोक संगीत पर मैं सुनना चाहूँगा। रुचि मेरी लोकगीतों में खूब है, लेकिन इस पर बात वही करे जो जड़ के सबसे करीब है। हमलोग भी इसी जड़ के हैं, लेकिन बिदेसिया बन कर इसी बिहार के माटी के वृक्ष के किसी छीप, किसी फुनगी पर बैठे हैं। और मैं चूँकि डायस्पोरा शोध से जुड़ा हूँ तो कहूँगा कि वृक्ष के विस्तार के लिए दोनों जरूरी है, बशर्तें कि फुनगी को भान हो कि उसकी जड़ कहाँ है। लोकगीत हमारी मिट्टी में ही फलेगा-फूलेगा। उसे उठा कर अमरीका में रोपने से भी बढ़ेगा लेकिन उसकी सुगंध बदल जाएगी। हिंदुस्तानी संगीत की बात अलग है। उसके हम पोषक रहे हैं, हमने अपनी मिट्टी में जगह दी है, अपना सुगंध दिया है, लेकिन यह नहीं कह सकते कि वह यहीं कि पैदाइश है। वह काल, स्थान और रूप में ‘फ्री-फ्लो’ में रहता है। दूसरी बात कि हिंदुस्तानी संगीत को डब्बा-बंद पैक कर के ग्रामोफ़ोन, कैसेट, सी.डी., यू-ट्यूब पर भेज दिया गया, जैसे हल्दीराम का रसगुल्ला। स्वाद भी ठीक-ठाक रहता है। लोकगीत को डब्बे में बंद करना मुश्किल है। वह तो हमारी परंपरा-संस्कृति में ऐसा बँधा है कि उसको रिकॉर्ड करना कठिन है। वह बंबई आम की तरह है, जो पैक कर के रखने से ज्यादा दिन टिकता नहीं है। गाछ से तोड़ कर ही खाना पड़ेगा।

खैर, मैं हिंदुस्तानी संगीत की बात करता हूँ कि बिहार कहाँ है? या कहाँ था?

संगीत की जो सबसे प्राचीन पुस्तक भरत मुनि की ‘नाट्य शास्त्र’ रही, उसका पहला भाष्य या विश्लेषण जो किया गया, ‘भरत भाष्य’। वह हमारे बिहार के कार्नाट वंश राजा नान्य देव ने किया। आज वह पोथी ‘सरस्वती हृदयालंकार’ नाम से भी जानी जाती है, और संगीत के पाठ्यक्रम में भी है। मूल प्रति का पता नहीं, लेकिन उसकी नकल भंडारकर इंस्टीच्यूट, पुणे में रखी है।

पाकिस्तान के सलामत अली ख़ान, नज़ाकत अली ख़ान (शाम चौरसिया घराना) ने जो बारह-तेरह वर्ष की अवस्था में अपना पहला कार्यक्रम किया, वह बनैली एस्टेट, चंपानगर में किया। यहीं से जब वह अमृतसर गए, तो ओंकारनाथ ठाकुर जी जैसों ने सुना और नाम कर गए।

पाकिस्तान का नाम लिया तो रोशन-आरा-बेग़म की पैदाईश पटना सिटी की है। चंदा बाई नामक तवायफ़ परिवार की बाई की बेटी हैं, और उनके पिता अब्दुल हक ख़ान (किराना घराना) तो दरभंगा राज में थे। वह अब्दुल करीम ख़ान साहब के भाई लगते थे। रोशन आरा बेग़म के गुरु सारंगिया लड्डन ख़ान पटना सिटी में ही रहे और जब तक जीए, रोशन आरा बेग़म पाँच सौ रुपया भेजती रहीं।

फरीदा ख़ानुम जी, जिनका गीत है ‘आज जाने की जिद न करो’। उनका परिवार भी पटना का ही है। उनकी माँ मोख़्तार बेग़म पटना में सारंगिए इमदाद ख़ान (विलायत ख़ान के दादा) से सीखती थीं।

उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान का जन्म-स्थल बिहार है। डुमराँव में ही उन्होंने पाँच वर्ष की व्यवस्था में मंदिर में गाया- ‘एही ठैयाँ मोतिया हेराय गेल हो रामा’, और दरभंगा में तो वह हमेशा आते रहे और उनकी बड़ी इच्छा थी कि मरने से पहले एक बार दरभंगा आएँ। सब प्रोग्राम भी फाइनल हो गया, लेकिन शायद कुछ अंतिम समय में कैंसिल हो गया। वह अपनी फीस के लिए भी बहुत रिजिड हो गए थे, ऐसा सुना है। यूनिवर्सिटी के पास पैसे की कमी रहती ही है।

छन्नूलाल मिश्र के उस्ताद मुजफ्फरपुर के अब्दुल गनी ख़ान (किराना घराना) रहे, जहाँ वह सेवक बन कर सीखते रहे। उनका भी पहला कार्यक्रम बनैली एस्टेट में ही हुआ।

भारत का पहला ग्रामोफ़ोन रिकॉर्डिंग गौहर ज़ान का हुआ। उनका जो पहला कार्यक्रम हुआ, वह दरभंगा दरबार में हुआ और वर्षों तक वह महाराज के पास रही। बाद में कलकत्ता गयी।

उनके साथ ही जोहराबाई आगरेवाली की रिकॉर्डिंग होती थी। अब जोहराबाई कई थी। एक आगरेवाली अलग भी थी। लेकिन यह जोहराबाई पटनेवाली ही थी, जिन्हें लोग आगरेवाली कह रहे हैं। क्योंकि ग्रामोफोन कंपनी जोहराबाई को पटना से कलकत्ता ले जाती थी और छोड़ती थी, यह डॉक्यूमेंटेड है। तो रिकॉर्डिंग दरअसल पटनेवाली की ही है। वही आगरा के कल्लन ख़ान से सीखने गयी थीं। उनकी गायकी ऐसी थी कि ग्वालियर के भैयासाहब गणपतराव ने कलाई बढ़ा कर कहा कि गंडा बाँध दीजिए।

सितार के हमारे समय में दो सरताज हुए। यानी जिनको भले ही ढलती उम्र में, हमने कुछ देखा-सुना। उस्ताद विलायत ख़ान और पं. रविशंकर।

उस्ताद विलायत ख़ान के दादा इमदाद ख़ान, जिनके नाम पर ही इमदादख़ानी घराना है, जिससे अब शाहिद परवेज़ हैं। या विलायत साहब के पुत्र शुजात ख़ान साहब हैं। तो इमदाद ख़ान की परवरिश पटना में हुई। वह भी सारंगिया लड्डन ख़ान से जुड़े थे। हालांकि गजेंद्र बाबू की लिखी इस बात पर मुझे संदेह है।

पं. रविशंकर ने अपनी जीवनी में यह स्पष्ट लिखा है कि उनके वादन पर दो लोगों का प्रभाव रहा। एक तो उनके गुरु अलाउद्दीन ख़ान साहब, और दूसरे दरभंगा के रामेश्वर पाठक। बल्कि कहानी यह है कि अलाउद्दीन ख़ान से जब पंडित जी ने लंबे समय तक सीखा, तो बाबा ने कहा कि अब आगे की सीख भारत में एक व्यक्ति दे सकते हैं। और वह उनको लिए रामेश्वर पाठक के पास दरभंगा आ गए लेकिन पाठक जी चूँकि महाराज को छोड़ नहीं सकते थे, तो गंडा नहीं बाँधा। पंडित रविशंकर लिखते हैं कि राजा बहादुर को बिना रामेश्वर पाठक जी के बिहाग सुने नींद ही नहीं आती थी। वह कैसे जाने देते?

अभिनेत्री नरगिस की माँ जद्दन बाई का गया में कोठी था, और वहाँ जमींदार उनके संगीत का पोषण करते थे। नरगिस ने भी गया से संबंध कायम रखा। उनके बाद उनके बेटे इसे भूल गए।

उस्ताद अलादिया ख़ान जो जयपुर-अतरौली घराना के जनक हैं, उनके नाना सजीले ख़ान बिहार के थे। वह स्वयं भी बिहार-नेपाल के रियासतों में खूब गाए। सजीले ख़ान ने ही राग बिहारी की रचना की, जिसे उनके घराने के लोगों ने खूब गाया। किशोरी अमोनकर जी बेहतरीन राग बिहारी गाती थीं।

किराना घराना की तो एक पूरी शाखा ही दरभंगा में थी। संगीत इतिहासकार मात्र धारवाड़ का नाम लेते हैं, जबकि किराना की आधी फौज दरभंगा में थी। अब्दुल करीम ख़ान के भाई अब्दुल हक, मौला बख़्श, अजीज बख़्श। यही लोग गौहर जान और जोहराबाई के भी उस्ताद थे। मौला बख़्श और अजीज़ बख़्श जब ताजिया निकलते समय मर्सिया गाते दरभंगा की सड़कों पर गुजरते थे तो कहते हैं कि पूरा दरभंगा रोने लगता था। अजीज बख़्श के ही बेटे अब्दुल गनी ख़ान मुजफ्फरपुर आ गए, जिनके शिष्य छन्नूलाल मिश्र जी हैं।

ध्रुपद का जो सबसे पुराना घराना आज तक चल रहा है, वह बेतिया का घराना है। वह शाहजहाँ के समय से आज तक कायम है। भले ही अधिक जान नहीं बची, लेकिन मौजूद है। दरभंगा घराना तो खूब फल-फूल रहा है, और वह भी लगभग बराबर ही पुराना है। डागुर घराना उसके बाद की है। हालांकि यहाँ बानी की बात करनी चाहिए, ध्रुपद में बानी ही मूल है। घराना शब्द खयाल गायकों के लिए पहले था। बेतिया से ही बंगाल का विष्णुपुर घराना जन्मा। बल्कि बंगाल के तीस प्रतिशत ध्रुपदिए स्वयं को बेतिया से जुड़ा ही मानते हैं। फाल्गुनी मित्रा तो खुद को बेतिया का कहते ही हैं।

मैंने सबसे पहले ‘भरत भाष्य’ की बात की। जो संगीत का थाट सिस्टम भातखंडे जी लेकर आए, उसकी व्याख्या अलग-अलग रूप में वर्णरत्नाकर (ज्योतिरीश्वर ठाकुर) और रागतरंगिणी (लोचन) ने तो की ही है, लेकिन पटना सिटी के रज़ा ख़ान ने रागों के कॉमन फीचर पर विभाजन किए हैं। थाट और क्या है? रजा ख़ान ने ही सितार की सबसे पुरानी गत में से एक रजाख़ानी गत भी खोजी। रागों का प्रहर और समय के साथ संबंध हस्तमुक्तावली में वर्णित है। नान्यदेव ने इतने सरल रूप से रस समझाए हैं, जो आज तक चल रहा है। उन्होंने लिखा कि जब विलंबित लय में गाएँगे तो करुणा रस जन्म लेगा, मध्य लय में गाएँगे तो हास्य और शृंगार रस जन्म लेगा और जब द्रुत लय में गाएँगे तो वीर रस, रूद्र रस या भयानक रस जन्म लेगा।

नृत्य में अगर हम आम्रपाली और कोशा जैसी नृत्यांगनाओं की बात न भी करें, तो शोभना नारायण जी की तो कर सकते हैं। वह बिहार की बेटी हैं। मैं हाल में ‘बिरजू लय’ किताब पढ़ रहा था, जहाँ लिखा है कि नृत्य की हस्तिकाओं और मुद्रिकाओं का लिखित विवरण कम मिलता है। यह बस गुरु-शिष्य परंपरा से चल रही है। जबकि बिहार के ओइनवार वंश केशुभंकर ठाकुर ने ‘हस्तमुक्तावली’ सदियों पहले लिख दी थी। ज्योतिरीश्वर ठाकुर ने तो वर्णरत्नाकर में हस्त-संचालन और वक्ष-संचालन के कई रूप बताए है। इतना ही नहीं, कथक का उद्गम-स्थल संभवत: बिहार में रहा हो। शोवना नारायण जी को कामेश्वर सिंह संस्कृत यूनिवर्सिटी में एक चौथी सदी में लिखा श्लोक मिला, जिसमें कथक का वर्णन है। यानी भरत नाट्य शास्त्र से भी पहले बिहार में कथक मौजूद था। गया में तीन कथक ग्राम आज भी मौजूद हैं- कथक बिगहा, कथक ग्राम और कथक जागीर। यह दरअसल संगीतकारों और कथाकारों का गाँव था, जो लोग घूम-घूम कर कथा और नृत्य करते थे। उस गाँव की जब खुदाई हुई तो घुँघरू मिले। सारण में तो मिट्टी के घुँघरू मिले! यह लगभग स्पष्ट है कि यहीं बिहार से कथक नृत्य का उद्भव हुआ।

लेकिन, बात वही है। विष्णु भातखंडे जी ने भारत में घूम-घूम कर रागों का अध्ययन किया, उसे लिखा। लेकिन, बिहार आए ही नहीं। कई राग जो बिहार में जन्मे, उसकी चर्चा वह कर ही नहीं सके। ‘खेत बिलावल’ बेतिया के आनंद किशोर सिंह का बनाया राग है। विद्यापति के पदों में कोराव, कानल, नवीत जैसे राग हैं।

म्यूजिकॉलोजिस्ट की ही बात करें, तो यह मेरी मान्यता है कि बिहार संगीत अध्येताओं का गढ़ रहा है। बल्कि संभव है कि यहाँ संगीत का अध्ययन, विश्लेषण और शास्त्रबद्ध करना अधिक होता हो और संगीतकार बाहर से आते हों। नान्यदेव का ‘भरत भाष्य’, कवि लोचन की ‘रागतरंगिणी’, ज्योतिरीश्वर ठाकुर की ‘वर्णरत्नाकर’, शुभंकर ठाकुर की ‘हस्तमुक्तावली’ और मोहम्मद रज़ा ख़ान की ‘नग़मात-ए-आसिफ़ी’ इसके प्रत्यक्ष प्रमाण है। अगर आधुनिक समय की ही बात लें तो इंटरनेट युग में ब्लॉगर म्यूजिकॉलॉजिस्ट हुए राजन पर्रिकर। उनका पूरा अध्ययन रामाश्रय झा ‘रामरंग’ पर आधारित है। रामरंग जी जैसे बृहत् संगीत अध्येता विरले ही हुए। उनका और उनके गुरु भोलानाथ भट्ट जी की जन्मस्थली दरभंगा। गया के मुनेश्वर दयाल जी और गजेंद्र नारायण सिंह जैसे अध्येता और शोधी ढूँढे न मिले। और मेरा यकीन है कि अभी भी बिहार में संगीत अध्येता मौजूद होंगे। अधकचरे ही सही, जैसा गजेंद्र बाबू कहते थे कि भारत में अब अधकचरे संगीत समीक्षक ही बचे हैं। मेरे जैसे, जिनकी संगीत में शिक्षा नहीं, लेकिन लिख-पढ़ रहे हैं।

ठुमरी रह गया। पुरबिया ठुमरी तो इस मिट्टी में ही जन्मा है, और यह ठुमरी गायक-गायिका मानते हैं कि ऐसी ‘ठाह की ठुमरी’ दूजी नहीं। इसमें कोई हड़बड़ाहट नहीं है, ठहर-ठहर कर गाया जाता है। और बंदिशों में भी गाँव की खुशबू है। जो बनारस भी ठुमरी गयी, वह यहीं से गयी। बड़ी मोती बाई के पिता तो दरभंगा के राय साहब थे। यहीं से वह बनारस गयीं। गया की ढेला बाई की आवाज को भारत की शीर्ष चार आवाजों में कहा गया। उनको अब्दुल करीम ख़ान के बराबर कहा जाता था। उनका एक गीत कुमुद झा दीवान जी गाती हैं- ठारे रहियो तू श्याम, गगरिया मैं घर धरी आऊँ। सुना है कि उनकी आवाज गुड़ का ढेला थी, तो नाम पड़ गया ढेला बाई। उनका कोठा आज भी गया में है, लेकिन उनकी हर निशानी मिट गयी। एकमात्र तस्वीर कुमुद जी के माध्यम से उपलब्ध है।

बेग़म अख़्तर की भी परवरिश गया में हुई और ग़ुलाम मुहम्मद ख़ान उनके गुरु थे। पंद्रह वर्ष में जिस प्रोग्राम में उन्होंने पहली बार मंच पर गाया और सरोजिनी नायडु रो पड़ीं, वह पटना में ही हुआ था। जद्दन बाई, रसूलन बाई, सिद्धेश्वरी देवी, बड़ी मोती बाई सब गया में ही रहती थी। उस वक्त एक ‘शनिचरा क्लब’ था, जहाँ अब शायद बैंक वगैरा खुल गया है। वहीं महफ़िल जमती थी।

बंगाली टप्पा। उसकी रचना भी बिहार की मिट्टी में हुआ। रामनिधि गुप्ता (निधु बाबू) छपरा में क्लर्क थे। उनको लगा कि संगीत सीखना चाहिए तो एक उस्ताद से सीखना शुरू किया। और वहीं छपरा में उन्होंने शराब पीकर टप्पा लिखना शुरू किया, जो बाद में कलकत्ता आए तो लोगों ने गाना शुरू किया।

यहाँ एक और बात कह दूँ कि बिहार में कभी गायकी में ऊँच-नीच अधिक नहीं हुई। अन्य स्थानों पर कई ध्रुपदिए खयाल नहीं गाते। खयालिए ठुमरी नहीं गाते। कि ठुमरी एक कमजोर और तवायफ़ी गायकी है। वहीं पं. रामचतुर मल्लिक जी ने चारों पट गाए। ध्रुपद भी गाया, खयाल भी गाया, ठुमरी-टप्पे भी गाया और विद्यापति गीत भी गाया। इनमें भेद-भाव नहीं किया। यह बिहार की ख़ासियत है।

वादन पर पुन: लौटता हूँ।

सरोद की तो रचना ही कहिए कि बिहार में हुई। पहले यह रबाब था। इसे सरोद बनाने वाले अब्दुल्लाह ख़ान, जो अमजद अली ख़ान साहब के चाचा हुए, वह दरभंगा में ही थे। वह भी और उनके पिता मुराद अली ख़ान भी। बल्कि पहले यह सभी सरोदिए दरभंगा और गया में ही महफ़िल जमाते थे। उस वक्त सरोद का नाम था- कुड़कुड़ बाजा। यहीं से एक शाखा बंगाल गयी जिसमें राधिका मोहन मित्रा और अब बुद्धदेव दास गुप्ता तक हुए।

यह बातें गजेंद्र बाबू पहले ही लिख चुके हैं।

हमें मिल कर अब यह सोचना है कि कैसे बिहार संगीत का गढ़ वापस बने। भोपाल में ध्रुपद संस्थान खुल गया, जहाँ कोई ध्रुपद घराना रहा नहीं। और बिहार में दो मुख्य घराने होते हुए भी नहीं खुल सका। यहाँ तक कि प्रशांत-निशांत मलिक जी को दरभंगा से इलाहाबाद जाकर ध्रुपद संस्थान खोलना पड़ा, क्योंकि राज्य से समुचित सहयोग नहीं मिला।सत्तर के दशक में संगीत महाविद्यालय खुलने वाला था। शिक्षा विभाग ने सब प्रारूप बना लिया, पंचवर्षीय योजना में शामिल हुआ। यहाँ तक कि प्राचार्य नियुक्ति के लिए अखबारों में विज्ञापन भी निकला, लेकिन कुछ हुआ ही नहीं।

अब आप ही कहिए कि जब गायन, वादन और नृत्य, तीनों की जड़ें बिहार में है तो अवहेलना आखिर क्यों?
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(यह बिहार संग्रहालय में आखर​ परिवार द्वारा आयोजित व्याख्यान का स्मृति आधारित ट्रांस्क्रिप्ट। कुछेक बातें जो कही, अब याद नहीं।)

यूनाइटेड कलर्स ऑफ इंडिया (United colours of India)

जब अफ्रीका महाद्वीप को भिन्न-भिन्न देशों में बाँटने की योजना बनी, तो बर्लिन में एक सम्मेलन हुआ। ब्रिटिश लोगों को ‘स्क्रैंबल’ नामक खेल बहुत प्रिय था। ‘अक्कड़-बक्कड़ बम्बे-बो’ की तरह वो उसे खेलने लगे, और अफ्रीका को बाँटने लगे। कुछ मानचित्रों के विशेषज्ञ भी बिठाए गए। उन्होनें पहाड़-नदियों के चित्र मानचित्र पर बना दिये। पर आधा अफ्रीका सपाट था, सहारा का रेगिस्तान। कोई भौगोलिक रेखा नहीं थी। उन्होंनें सीधी रेखायें खींच कर कई खाने बने दिया, कहीं सूडान, कहीं नामीबिया, कहीं मॉरीटैनिया लिख डाला। बन गया अफ्रीका। कुछ ऐसे ही उत्तरी अमरीका के वीरान राज्यों को भी बाँटा गया। दरअसल, सिर्फ भोगौलिक सपाटता ही नहीं, यहाँ मनुष्य भी सपाट थे। रेगिस्तान में दूर-दूर तक कोई नजर नहीं आता। कुछ इलाकों में लिलिपुटिया पिग्मी बसते जो दूर से नजर नहीं आते। धर्म-जात का कोई ब्यौरा नहीं। जैसे मरजी बाँट दो।

भारतीय राज्यों को बाँटने में बहुत पापड़ बेलने पड़े। भाषायी आधार तो ठीक है। पर कहाँ महाराष्ट्र खत्म होगा, और कर्नाटक शुरू? कहाँ अचानक लोग मराठी बोलना बंद कर देंगें, उनकी धीमी जीभ फड़फड़ाने लगेगी और कन्नड़ बोलने लगेगी? ये काम अक्सर रातों-रात करना होता। जैसे राज्य बाँटने नहीं, कसाब को लटकाने जा रहे हों। हुबली के लोग जब सुबह उठे तो देखा, किसी बोर्ड पर कुछ लिखा समझ नहीं आ रहा। कहीं फिर से भारत पर फिरंगियों ने कब्जा तो नहीं कर लिया? ये अक्षर अजीब गोल-मटोल कैसे हो गए? शहर का एक व्यापारी जो अक्सर सफर करता, उसने समझाया भाई ये कन्नड़-तेलुगु कुछ है। अखबार पढ़ा तो समझ आया, कर्नाटक राज्य बना और हुबली अब से कर्नाटक है। ये बस एक उदाहरण है, मुझे उत्तर कन्नडिगा लोगों की अस्मिता पर शक नहीं। पर उन राज्यों का क्या, जहाँ भाषा भी एक थी?

पहले बंगाल में से उन लोगों को छाँटा गया, जो लाख कोशिश कर भी मुँह गोल कर बंगाली नहीं बोल पाए। उस पूरे हिस्से को बिहार बना दिया गया, जिनकी अजीब अपभ्रंस बोलियाँ थी। कोस-कोस पर बदलने वाली। इन्हें भाषायी आधार पर बाँटते, तो हर घर एक राज्य होता। इस खिचड़ी को अपने हाल पर छोड़ दिया गया। दक्खिन से उड़ीसा-बंगाल तो थी ही, पश्चिमी सीमा पर जो राज्य बना वो उत्तर प्रदेश कहलाया।

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश। भारत के इन दो प्रदेशों को नीरस नाम मिले। आजादी से पहले भी, आजादी के बाद भी। मध्य प्रदेश पहले ‘सेन्ट्रल प्रोविन्स’ था और उत्तर प्रदेश ‘यूनाइटेड प्रोविंस’। तकनीकी नाम हैं, कोई रस नहीं। इन दो राज्यों को छोड़ दें तो लगभग हर राज्य के नाम के साथ भाषायी या भौगोलिक अस्मिता जुड़ी है। हिमाचल और मेघालय कितने सुन्दर नाम हैं! और लक्षद्वीप? वाह! नाम हो तो ऐसे। पर उत्तर और मध्य प्रदेश नाम रखने वालों ने कुछ मौलिकता नहीं दिखाई। उत्तर में है तो उत्तर, मध्य में है तो मध्य। खैर, कुछ भी कहिए, एक हिंदुस्तान का दिल है तो एक जिगर। विशाल, विविध और विचित्र।

मध्य प्रदेश तो आजादी के बाद कई बार बच्चों के घरौंदों की तरह तोड़ा-बनाया गया। पहले कुछ छोटे-मोटे राजघरानों को इकट्ठा कर ‘सेंट्रल प्रोविंस’ से जोड़ा और नागपुर राजधानी बनी। भूपाल के होते नागपुर? यहाँ भी नीरसता विजयी रही। मैं ये नहीं कह रहा कि नागपुर नीरस है, पर भोपाल नवाबों की बस्ती, शायरों का शामियाना। अगर उन्हें लखनऊ मिला, तो इन्हें नागपुर क्यूँ? और नागपुर को बॉम्बे राज्य से तोड़ कर मध्य प्रदेश में धकियाना भी तो गलत था। नागपुर तो जो आई, विदर्भ भी लपेट लिया।

विदर्भ कोई लेना नहीं चाहता। भला हर बरख भी कहीं सूखा देखा है क्या? कोयला है, खनिज है, जंगल है पर एक बूँद पानी नहीं। खैर, आखिर जिसका जो था, उसे मिल गया। विदर्भ-नागपुर की डोली वापस मायके भेज दी गई, और राष्ट्र के अंदर महाराष्ट्र की स्थाप्ना हुई।

मध्यप्रदेश फिर भी जुगाड़ु राज्य ही रहा। कहीं का कुनबा, कहीं का जोड़ा। बुंदेल, मालवा, सिंधिया, मांडू, होलकर, गोंड, भोपाल, ओरछा, रीवा सब कभी अलग-थलग थे। मुझे भय है एक दिन बिग-बैंग की तरह फट न पड़ें! छत्तीसगढ़ तो खैर छिटक ही गया। पर जो भी कहिए, हिंदुस्तान का सबसे शांत राज्य है जहाँ महाकाल भी भाँग पीकर सोते हैं। छत्तीसगढ़ अलग हुआ तो नक्सल-नुक्सल भी निकल लिए। नर्मदा बचाने वाले भी बम्बई बसते हैं। गर वो कार्बाइड प्लांट न होता, तो मध्य प्रदेश और खुशनुमा होता। पर उस बात को भी अब कुछ दशक हो गए। कुछ दर्द मिले पर हिंदुस्तान का दिल बाघ-बाघ रहा। कान्हा, बाँधवगढ़, पन्ना, सतपुरा। हर जगह बाघ मिलेंगें। एम.पी. गजब है।

दक्खिन बाँटना तो हमेशा से आसान था। मैसूर, मद्रास, हैदराबाद, त्रावणकोर तो बस नाम भर थे। तमिल लोगों को सदियों से पता था कि कहाँ से मलयालम की शुरूआत होगी, और कहाँ से तेलुगु। हल्की-फुल्की छीना-झपटी हुई, पर वो भी कर्नाटक के दाल-भात में मूसलचंद बनने से। मैसूर जब कर्नाटक बना तो उसने कुछ हैदराबाद, कुछ तमिलनाडु, कुछ त्रावणकोर और कुछ महाराष्ट्र से लपेटा। और क्या लपेटा! कुवेम्पु की कविताओं का जादू कहिए, या राजनैतिक पैतराबाजों का कौशल। कर्नाटक राज्य ने भाषाई इलाकों से परे की जमीन भी काबिज की। कूर्गी, मराठी, कोंकणी, तूलू और तेलुगु भाषी इलाके भी कर्नाटक में भरे पड़े हैं।

राजस्थान, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल और कश्मीर। और भी कई राज्य बने, पर इन राज्यों से परे भी एक दुनिया है।

भारत के ‘चिकेन-नेक’ की दुनिया!

‘चिकेन-नेक’ को समझने के लिये एक मोटे गत्ते पर भारत का मानचित्र चिपकायें। अब एक कैंची चलाकर नक्शे को काट कर अलग कर लें। इस नक्शे को १० मिनट पानी में छोड़ दें। अब नक्शे को बाहर निकालें। इस प्रयोग को मैनें कई बार किया है। नक्शे का एक हिस्सा या तो अलग हो चुका होता है, या पेंडुलम की तरह लटक कर डोलने लगता है। एक पतला सा भूमिखंड जोड़ता है ‘चिकेन-लेग’ को भारत से। इस पूरे ‘चिकेन-लेग’ को मिला-जुला कर उत्तर-पूर्व कहा जाता है।

ये वाकई अलग दुनिया है, जिस दुनिया के कई हिस्से किये गए, फिर भी कई और करने की माँग है। कईयों ने झंडे भी तैयार कर रखे हैं। यहाँ के लोग पूरे भारत में नजर आयेंगें, पर शेष (या मूल) भारत के लोग यहाँ कम ही नजर आयेंगें। बाकी देश रेलवे की लाइनों से पटी पड़ी है, यहाँ हेलिकॉप्टर चलते हैं। उधर हारमोनिया, इधर गिटार। रहन-सहन, भोजन, शौक, संगीत, भाषायें, धर्म, जाति-परंपरा सब भिन्न-भिन्न। चीन इन्हें अपना हिस्सा माने न माने, इन्हें भारतीय अक्सर चीनी कहते हैं। कभी-कभी लगता है हिंदुस्तान का दिल यहीं कहीं बसा है, जो अनवरत धड़क रहा है। एक पतली सी धमनी से जुड़ा है, पर पूरे देश में निर्मोह प्रवाहित हो रहा है। ऊर्जित, अविचल। ये मेडल पर मेडल दिये जा रहे हैं, और बदले में हम शायद कुछ खास नहीं दे रहे।

सिनेमा में लोक संगीत (Folk in cinema)

सच पूछिए तो फ़िल्म और लोकगीत का कोई साम्य ही नहीं है। लोकगीत में कई लेयर होते हैं। वह किसी ख़ास सिचुएशन या सीन के लिए नहीं बनाए जाते, उनका क्षेत्र विस्तृत होता है। अक्सर तंज होता है कि लोकगीत ‘वेदर रिपोर्ट’ की तरह होती है, हर मौसम के गीत। लेकिन बात ‘वेदर रिपोर्ट’ तक सीमित नहीं है। उस ऋतु में विरह का भी गान है, प्रेम का भी वर्णन है, करुणा भी है और उल्लास भी। मैंने एक बार कहा कि मगही गीतों में परिवार-बोध है, मैथिली गीतों में भक्ति की प्रधानता रही है और भोजपुरी लोकगीतों में रोमांस की। तो ये बस मौसम की जानकारी वाले गीत नहीं। इनके कई आयाम हैं।

मैं हालिया हवाई जहाज में एक फ़िल्म देख रहा था जिसमें पंजाबी लोक-गायक दलजीत दोसाँझ हॉकी खिलाड़ी का अभिनय कर रहे थे। मुझे ताज्जुब हुआ कि एक लोक-गायक अभिनय तो कर रहे हैं, लेकिन लोकगीत क्यों नहीं गा रहे। फिर उनका एक साक्षात्कार देखा जिसमें वह कहते हैं कि फ़िल्मों में लोकगीत की जगह नहीं और मैं रैप-पॉप गाता नहीं। वह मेरे प्रिय गायक रहे हैं और उनकी गुरुदास मान के साथ एक जुगलबंदी मैं अक्सर सुनता हूँ। लेकिन, वह ग़लत नहीं कह रहे। फ़िल्म के किसी सीन पर लोकगीत बिठाना लोकगीत को सीमित करना है। हिंदुस्तानी संगीत के साथ भी यही समस्या है।

लेकिन लोकधुन तो प्रयोग किए जा सकते हैं। जब शिव-हरि (हरि प्रसाद चौरसिया और शिव कुमार शर्मा) ने ‘सिलसिला’ फ़िल्म में संगीत दिया तो शिव जी ने पहाड़ी धुनों का खूब प्रयोग किया। और तब चौरसिया जी को भी जोश आया कि यूपी की धुन भी आए और ‘रंग बरसे भीगे चुनरवाली’ गीत डाला गया। जगजीत सिंह ने पंजाबी टप्पे गाया कोठे पे माहिया’, वही धुन अब ‘लैम्बॉर्गिनी’ गीत में है।

ये सब तो बाद की बातें हैं, मैं ढूँढ रहा था कि शुरुआत कहाँ से हुई होगी? जब पहली बोलती फ़िल्म 1931 ई. में ‘आलम आरा’ बनी और उस दौर की जितनी फ़िल्में बनी, सब में गीत अधिक होते और दृश्य कम। और तब तक सुगम संगीत की तो अवधारणा बनी नहीं थी। या तो हिंदुस्तानी संगीत था या लोकगीत। जो भी गीत बने, उसी आधार पर बनने शुरू हुए।

एक उसी दौर का गीत है, जो शायद सबसे पुराना फ़िल्मी गीत है- फ़िल्म ‘फ़रेबजाल’ का गीत ‘साची कहो मोसे बतियाँ, कहाँ रहे सारी रतियाँ’। अब यह गीत किस क्षेत्र का लगता है? यह जरूर यूपी-बिहार के ठुमरी गीतों पर आधारित होगा। ‘बाल जोबन’ फ़िल्म की चर्चा मैंने अपनी किताब ‘कुली लाइन्स’ में भी की है, जो गिरमिटिया देशों में पहुँची पहली बोलती फ़िल्म थी। उसमें एक मारवाड़ी लोकगीत है- ‘बिछुड़े री घाली पीहर’। यह गीत यू-ट्यूब पर सबसे पुराना फ़िल्मी लोकगीत मुझे मिला।

मेरा खयाल है कि ऐसे सैकड़ों गीत शुरुआती दौर में मिलेंगे, क्योंकि उस वक्त और था ही क्या? इसी दौर में पहली बार शायद हैदर साहब लाहौर से ढोल लेकर पंजाबी लोकगीत लेकर आए, और धीरे-धीरे कई पंजाबी धुनें फ़िल्मों में आती गयी। लेकिन मेरा मानना है कि अगर गिनती की जाए तो बिहार-यूपी के लोकगीतों की संख्या कहीं ज्यादा होगी। चाहे गंवई माहौल हो, या तवायफ़ों के गीत, वहीं से आएँगे। और रोमांटिक गीत भी। दिलीप कुमार की फ़िल्मों के गीत लीजिए-नैन लड़ जइहें’। ‘उड़े जब जब जुल्फें तेरी’ में पंजाबी धुन है, लेकिन नाच और माहौल यूपी का है। यह फ़िल्म में ही संभव है।

लोकगीतों का प्रयोग तब भी होता है जब क्षेत्र-विशेष प्लॉट होता है। कश्मीर होगा तो ‘बुमड़ो बुमड़ो’ डाला जाएगा। राजस्थान होगा तो ‘झूमर’ गीत बनेंगे। गुजरात होगा तो डांडिया। ‘अरे जा रे हट नटखट’ भी गुजराती धुन ही है, जिसमें कुछ पहाड़ी प्रभाव भी है। ‘मंथनफ़िल्म में क्या सुंदर राजस्थानी लोकगीत है! वहीं पंडित रविशंकर ने भी जब ‘गोदान’ फ़िल्म का संगीत दिया तो अपनी शास्त्रीय संगीत थोपने की कोशिश नहीं की, और पिपरा के पतवा सरीखे डोले मनवा’ गीत दिया। लोकगीत ही उस माहौल में ढलते हैं। पंजाबी लोकगीतों में टप्पे, भंगड़ा, माहिया, छल्ला। सभी प्रयोग किए गए। छल्ला गीत गुरदास मान से लेकर हाल की फ़िल्मों तक चल रहा है। और बंगाली लोकधुनों को तो आना ही था।

बंगाल ने संगीतकारों की फौज ही दी। एस.डी. बर्मन को भटियाली धुनें ख़ास पसंद थी, और उनके फ़िल्मों में माँझी का सीन जान-बूझ कर डाल देते होंगे। सलिल चौधरी ने भीगंगा आए कहाँ से’ बनाया ही। सलिल चौधरी तो असम के बिहू को भी ‘दैया रे दैया रे चढ़ गयो पापी बिछुआ में ले आए। बाउल गीत भी आए। जैसे- ‘मेरी प्यारी बिंदु’ पड़ोसन फ़िल्म की, या देवदास फ़िल्म की ‘आन मिलो आन मिलो साँवरे, आन मिलो

छत्तीसगढ़ का लोकगीत पीपली लाइव फ़िल्म में है- चोला माटी के राम। गीत रमैया वस्तावैया’ भी जयकिशन ने तेलुगु मजदूरों से सुना तो शैलेंद्र को लिखने कहा। एक गायक थे शैलेंद्र, वह भी पहाड़ी धुनों पर गाते थे जैसे- ‘होगा तुमसे प्यारा कौन’। मराठी लावणी भी खूब गायी गयी- हाल की ‘चिकनी चमेली’ गीत। इसी तरह बाजीराव मस्तानी का ‘पिंगा‘ गीत। या कोंकण का मुंगड़ा मुंगड़ा मैं गुड़ की डली’। यहाँ मुंदड़ा का अर्थ बड़ी चींटी जैसे कीड़े से है। बंटी-बबली का ‘कजरारे कजरारे’ भी यूपी का किन्नर धुन है।धम धम धरम धरैया रे, सबसे बड़े लड़ैया रेआल्हा गीत है। ’तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ’ विद्यापति गीत की धुन है।

मौसम के हिसाब से लोकगीत आते रहे और त्यौहारों के हिसाब से भी। जैसे जोगीरा गीत होली के अवसर पर। कजरी भी गाए गए। मन्ना डे का गाया एक भोजपुरी कजरी है। मैं यह भी कहूँगा कि तवायफ़ों के गीतों को भी लोकगायकी से अलग न माना जाए। है तो वह भी लोक ही। ‘ठारे रहियो’ गीत को लोकगीत की नजर से क्यों न देखा जाए? ‘नजर लागी राजा तोरे बंगले पर, ‘पान खाए सैयाँ हमारो’ लोकभाषा के गीत ही तो हैं।मोरे सैयाँ जी उतरेंगे पार, नदिया धीरे बहो फ़िल्म में भी है। लोकगीत भी है। चंदन (तिवारी) ने भी गाया।

हाँ! यह जरूर है कि आज की फ़िल्मों से गाँव ही लुप्त हो गया है तो लोकगीत की जगह कम है। शहरी परिवेश में लोकगीत कठिन है। लेकिन नए रूप में ‘चलत मुसाफ़िर मोह लियो रे’ पर वरुण धवन थिरक ही रहे हैं। कई नए फ़िल्मों के नाम पहले भी मैंने गिनाए जिनमें नए रूप में लोकगीत प्रयोग हुए हैं। यह ठीक है कि लोकगीतों को गाँव में रहने दिया जाए, और उसे फ़िल्मों में लाना उसके मूल स्वरूप को तोड़ना है। लेकिन फ़िल्मों ने इन गीतों को लोकप्रिय तो बनाया ही। तो चित्रगुप्त का ‘जा जा रे सुगना जा रे’ लता जी से गवाना ग़लत नहीं था।

हमें सही माहौल देना होगा, सीन के हिसाब से कुछ बदलाव करने होंगे। लोकगीत में जो वाद्य-यंत्र प्रयोग होते हैं, और जो स्वरमान होता है, वह फ़िल्मों में फिट नहीं बैठता। कैलाश खेर और पापोन कुछ दिन चलते हैं, लेकिन लंबे समय नहीं चल पाते। लेकिन, उसे सुगम बना कर तो लाया ही जा सकता है। कहब लग जाइ धक सेगीत तो आया ही। और आते ही रहेंगे। आखिर फ़िल्म भी लोक का ही तो माध्यम है।

(‘मैथिली भोजपुरी अकादमी’ के सौजन्य से मोती बीए स्मृति में ‘सिनेमा में लोकगीत’ आख्यान अंश स्मृति के आधार पर. वक्ता- प्रवीण झा. 2/8/2019)

दो दुनिया (Two worlds)

V.S._Naipaul

नोबेल पुरस्कार भाषण का अंश
(विदियाधर सूरजप्रसाद नायपॉल, अनुवाद: प्रवीण झा)

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यह मेरे लिए असामान्य है। मैंने पाठ अवश्य किए हैं, लेकिन कभी भाषण नहीं दिया। मुझे जो भाषण देने कहते हैं, उन्हें मैं कहता हूँ कि मेरे पास भाषण देने के लिए कुछ नहीं है। और यह सच है। यह बात अजीब लग सकती है कि जिस व्यक्ति ने अपने जीवन के पचास वर्ष मात्र शब्द, भावों और विचारों में बिताए, उसके पास कहने के लिए शब्द ही नहीं है। लेकिन मेरे संबंध में जो कुछ भी मूल्यवान है, वह मेरी पुस्तकों में ही है। इसके अतिरिक्त जो भी है, वह अपरिपक्व है। मुझे इसका बोध नहीं, और संभवत: मेरी अगली पुस्तक की प्रतीक्षा में है। यह भाग्य से कभी अचानक मुझ तक आएगा, जब मैं लिखने बैठूँगा। यह आश्चर्य का तत्त्व (एलिमेंट ऑफ़ सरप्राइज) ही मैं अपनी लेखनी में ढूँढता हूँ। यह स्वयं के आकलन का तरीका इतना आसान तो नहीं ही है।

प्रूस्त ने बहुत बारीकी से एक लेखक के रूप में लेखक, और एक सामाजिक व्यक्ति के रूप में लेखक, के अंतर बताए हैं। यह उनके निबंध संग्रह ‘अगेन्स्ट सेंते ब्यूवे’ में मिलेगा।

उन्नीसवीं सदी के फ़्रेंच आलोचक सेंते ब्यूवे की अवमानना थी कि लेखक को समझने के लिए उसके बाह्य-स्वरूप और उसके जीवन को समझना आवश्यक है। यह एक आकर्षक अवधारणा नजर आती है कि एक व्यक्ति के माध्यम से उसकी कृति पर दृष्टि डाली जाए। यह अवधारणा अकाट्य नजर आती है। लेकिन प्रूस्त ने इस अवधारणा की तर्कपूर्वक धज्जियाँ उड़ाई। प्रूस्त ने लिखा, “सेंते ब्यूवे का तरीका हमारी अंतरात्मा की मामूली समझ पर भी ध्यान नहीं देता। यह कि पुस्तक हमारे दूसरे पक्ष की कृति है, जो हमारे अन्यथा मुखर सामाजिक पक्ष से भिन्न है। अगर हम उस पक्ष को समझने का प्रयास करेंगे, और उस आधार पर अपनी धारणा बनाएँगे, तब हमें शायद सही निष्कर्ष मिले।”

प्रूस्त के यह शब्द आपके साथ होने चाहिए जब आप किसी लेखक या किसी भी व्यक्ति की जीवनी पढ़ रहे हों, जिनसे आप प्रेरणा लेना चाहते हों। जीवनी में जीवन के हर रहस्य और संबंध आपके समक्ष होंगे, लेकिन उनकी लेखनी का रहस्य न होगा। किसी भी तरह का दस्तावेजीकरण हमें वहाँ नहीं पहुँचा सकता। लेखक की जीवनी तो क्या, आत्मकथा भी अपूर्ण होती है।

प्रूस्त तो इस विस्तारण के उस्ताद हैं, लेकिन मैं कुछ देर के लिए ‘अगेंस्ट सेंते ब्यूवे’ पर लौटना चाहूँगा। प्रूस्त लिखते हैं, “दरअसल लेखक अपने अंतरात्मा की उक्ति, जो एकांत में लिखी गयी, वही हमारे समक्ष प्रस्तुत करता है। सामाजिक जीवन में तो हमारा सतही रूप ही सबके समक्ष होता है, अंतरात्मा की उक्ति नहीं। जब हम अपने उस रूप को, जो समाज के मध्य है, किनारे कर देंगे, तभी हमारी अंतरात्मा की ध्वनि सुनाई देगी।”

जब प्रूस्त यह लिख रहे थे, उस वक्त उन्हें वह विषय नहीं मिला था, जो उनके महान् साहित्यिक परिश्रम का सुंदर प्रतिफल होगा। और आप मेरे दिए संदर्भ से यह अंदाज़ा लगा सकते हैं कि वह अपने आत्म-बोध पर विश्वास करते थे कि उनका भाग्य ही एक दिन उन्हें विषय देगा। मैंने यह संदर्भ कई स्थानों पर दिए हैं। इसका कारण है कि मैं अपना कार्य इन्हीं सिद्धांतों पर करता हूँ। मैंने अपने आत्म-बोध पर भरोसा किया है। शुरुआत में भी किया था, अब भी करता हूँ। मुझे इल्म नहीं कि आगे क्या होगा और क्या लिख बैठूँगा। मैंने लेखन का विषय अपने आत्म-बोध पर छोड़ रखा है। मेरे पास एक सोच और एक रूपरेखा जरूर होती है, जब मैं लिखना शुरू करता हूँ; लेकिन यह समझने में मुझे भी बरसों लग जाते हैं कि आखिर मैंने लिखा क्या?

मैंने पहले कहा है कि मेरे विषय में जो भी मूल्यवान है, वह मेरी किताबों में है। अब मैं इस पर आगे की बात कहता हूँ। मैं यह कहता हूँ कि मैं अपनी पुस्तकों का योग-फल हूँ। हर पुस्तक जो मेरे आत्म-बोध से जन्मी, वह मेरे अनुभव का ही विस्तार है। मेरे जीवन के किसी साहित्यिक बिंदु पर जो आखिरी पुस्तक होगी, उसमें उससे पहले लिखी किताबें समाहित होगी।

इसका कारण मेरी पृष्ठभूमि है। मेरी पृष्ठभूमि जितनी सुलभ है, उतनी ही भ्रांतिपूर्ण। मैं ट्रिनिडाड में जन्मा। वेनेजुएला के ओर्निको नदी के मुहाने पर छोटा सा द्वीप। तो ट्रिनिडाड न पूरी तरह दक्षिण अमरीका का हिस्सा है, न कैरीबियन का। यह नई दुनिया के एक बागान (प्लांटेशन) उपनिवेश की तरह विकसित किया गया। 1932 ई. में मेरे जन्म के समय यहाँ की जनसंख्या चार लाख थी। उनमें डेढ़ लाख भारतीय थे। लगभग सभी गंगा के मैदानी इलाकों से आए हिन्दू और मुसलमान।

यह मेरा छोटा सा समुदाय था। इस भारतीय आप्रवास का बड़ा हिस्सा 1880 ई. के बाद का था। मसौदा कुछ इस तरह था। मजदूरों का बागान से पाँच साल का बंधन था। यह अवधि खत्म होने पर उन्हें भारत वापसी का टिकट मिलता अथवा पाँच एकड़ जमीन। 1917 ई. में गांधी और अन्य लोगों के विरोध से यह प्रथा खत्म कर दी गयी। इस विरोध के कारण अंतिम किश्त में आए लोगों को न टिकट मिली, न जमीन। ऐसे लोग तो कहीं के न रहे। ये लोग पोर्ट-ऑफ-स्पेन की सड़कों पर सोते। मैंने बचपन में उन्हें सड़कों पर पड़े देखा है। मुझे लगता है कि मुझे उस वक्त उनकी परिस्थिति का बोध नहीं था, यह बात मेरे ध्यान में बाद में आयी। उस वक्त उनकी परिस्थिति का मुझ पर कोई असर नहीं पड़ा। यह उस उपनिवेश में हो रही निर्दयता का मात्र उदाहरण है।

मेरा जन्म एक छोटे शहर शगुआनास में हुआ। यह परीआ की खाड़ी से दो-तीन मील की दूरी पर था। शगुआनास भारतीयों के लिए उच्चारण और हिज्जे के हिसाब से विचित्र नाम था तो वह इसे भारतीय जाति-नाम ‘चौहान’ कहते थे।

मैं चौंतीस साल का था जब मुझे अपने जन्म-स्थान के विषय में पता लगा। मैं सोलह वर्ष से लंदन में रह रहा था, और उस वक्त मैं अपनी नौवीं किताब लिख रहा था। यह ट्रिनिडाड के मानव-इतिहास पर आधारित था जिसमें मैं वहाँ की कथाएँ पुनर्जीवित कर रहा था। मैं ब्रिटिश संग्रहालय जाकर स्पैनिश काग़जात पलटता रहता। ये काग़जात 1890 ई. के वेनेजुएला विवाद के संदर्भ में स्पैनिश आर्काईवों से ब्रिटिश सरकार के लिए नकल (कॉपी) किए गए थे। यह विवाद 1530 ई. में शुरू हुआ और स्पैनिश सत्ता के अंत तक चलता रहा।

मैं ‘एल डोरैडो’ के बेवकूफाना खोज और अंग्रेज नायक वाल्टर रेली के संबंध में पढ़ रहा था। 1595 ई. में उसने ट्रिनिडाड पर आक्रमण कर सभी स्पैनिश लोगों को मार कर, ओर्निको तक ‘एल डोरैडो’ खोजते हुए यात्रा की। उसे कुछ नहीं मिला पर इंग्लैंड जाकर कहा कि ‘एल डोरैडो’ मिल गया। उसके पास दिखाने के लिए मात्र कुछ रेत और कुछ सोना था। उसने दावा किया कि ओर्निको की रेत से यह सोना निकला। जिस जौहरी ने उसे जाँचा, उसने कहा कि रेत में कुछ भी नहीं और सोना उत्तरी अफ्रीका का है। उसने अपनी बात को साबित करने के लिए एक किताब लिखी और चार सदी तक लोग मानते रहे कि उसे कुछ मिला था। उस पुस्तक का लंबा शीर्षक ही भ्रामक है- “एक विशाल, समृद्ध और सुंदर गुयाना साम्राज्य की खोज, जो महान् स्वर्णिम मानोआ (एल डोरैडो) के पास है, और एमेरिया, आरोमिया, अमापिया तथा अन्य रियासतों के करीब”

इसमें कितना सच नजर आता है? वह शायद ही कभी ओर्निको पहुँच पाया।

और फिर जैसा अति-आत्मविश्वासी लोगों के साथ होता है, रेली अपनी ही कल्पनाओं का शिकार होता है। बीस साल बाद, वृद्ध और बीमार रेली को लंदन कारागार से रिहा किया गया और गुयाना जाकर सोने की खान खोजने कहा गया। इस छलपूर्ण यात्रा में उन्होंने अपना बेटा खो दिया। एक पिता ने अपनी झूठी प्रतिष्ठा के फेर में अपना बेटा गँवा दिया। हताशा और ग्लानि से भरे रेली के पास जीने का कोई मूल्य नहीं बचा था और वह सूली पर चढ़ने लंदन लौट गया।

कहानी यहाँ खत्म हो जानी थी। लेकिन स्पैनिश स्मृतियाँ लंबी होती है। शायद इसलिए उनकी राजकीय चिट्ठियाँ भी देर से पहुँचती थी। ट्रिनिडाड की चिट्ठियों को स्पेन पहुँचने में दो साल भी लग जाते थे। आठ साल के बाद भी ट्रिनिडाड और गुयाना के स्पैनिश खाड़ी के ‘इंडियन्स’ (मूल निवासी) से हिसाब बराबर कर रहे थे। एक दिन ब्रिटिश संग्रहालय में मैंने स्पेन के राजा की ट्रिनिडाड के गवर्नर को लिखी चिट्ठी पढ़ी। उसमें तारीख लिखी थी- 12 अक्तूबर 1625!

राजा ने लिखा था, “मुझे आप से इंडियन्स की धरती चगुआनास की जानकारी चाहिए। आपके अनुसार उनकी संख्या हज़ार से अधिक है, और वे इतने गिरे हुए लोग हैं कि जब शहर लूटा जा रहा था, वे ब्रिटिशों की अगुवाई कर रहे थे। उनके इस अपराध की सजा नहीं मिल पायी थी क्योंकि हमारी सेना उपलब्ध नहीं थी; और चूँकि इंडियन्स हमें मालिक नहीं मानते तो हमने दंड देने का फैसला लिया है। मेरी आज्ञा का पालन करें और मुझे ख़बर करते रहें कि आप क्या कर रहे हैं।”

गवर्नर ने क्या किया, यह मुझे नहीं पता। मुझे संग्रहालय में शगुआनास को कोई और संदर्भ नहीं मिला। शायद सेवील के स्पैनिश आर्काइव के काग़जों के अम्बार में चगुआनास के अन्य संदर्भ रहे हों, जिसकी नकल बनाना ब्रिटिश भूल गए। सत्य यह है कि कुछ हज़ार इंडियन्स आदिवासी जो पारिया की खाड़ी के दोनो तरफ बसे थे, वे ऐसे विलुप्त हुए कि अब शगुआनास या चौहान में उन्हें कोई नहीं जानता। मुझे यूँ लगा कि उस ब्रिटिश संग्रहालय में 1625 ई. के बाद उस स्पेन के राजा की चिट्ठी का अर्थ ढूँढने वाला मैं पहली व्यक्ति था। वह काग़ज मुझसे पहले मात्र 1896-97 ई. में पढ़ा गया था, और फिर दशकों तक नहीं पढ़ा गया।

हम शगुआनास में रहते थे। जब मैंने अपने विद्यालय जाना प्रारंभ किया, प्रतिदिन मैं अपनी दादी के घर के सामने से गुजरता; दो-तीन दुकान पार करते ही चाइनीज़ पार्लर, जुबली थिएटर; वह दुर्गंध करती सस्ते साबुन की पुर्तगाली फैक्ट्री, जहाँ साबुन की टिक्कियाँ सुखाई जाती; और मैं आखिर शगुआनास राजकीय विद्यालय पहुँचता। विद्यालय के आगे गन्ने के बागान थे, जो पारिया की खाड़ी तक फैले थे। जो लोग बाग़ान से बेदखल हो गए थे, उनके अपने खेत, अपनी दिनचर्या, अपने नियम और अपने धर्मस्थल थे। उन्हें इल्म रहा हो कि ओरिनोको नदी कितनी तीव्र गति से पारिया की खाड़ी में गिरती है। अब उनके सभी कौशल और उनका अस्तित्व समाप्त हो चुका है।

दुनिया हर समय चलायमान रहती है। लोग हर जगह बेदखल होते रहते हैं। मुझे आश्चर्य हुआ जब 1967 ई. में पहली बार मुझे अपने जन्म-स्थान के संबंध में ऐसी बातें मालूम हुई जो मुझे पता ही न थी। दरअसल हम इन कृषि-प्रधान उपनिवेशों में अंधों की तरह रहते थे। यह वहाँ के अधिकारियों की अंधेरे में रखने की चाल नहीं थी। हमें बस इसका ज्ञान नहीं था। शगुआनास के विषय में जानना न ही महत्वपूर्ण था, न सुलभ। वहाँ कुछ आदिवासी जरूर थे। ब्रिटिश गयाना के ये लोग हास्य के पात्र थे। जंगली और हो-हल्ला करने वाले- वाराहूण! मुझे लगता था कि यह शब्द यूँ ही बना दिया गया, लेरिन वेनेजुएला यात्रा के दौरान मुझे मालूम हुआ कि यह वाकई एक आदिवासी जाति है।

बचपन की एक धुँधली सी कहानी थी. जो अब मेरे लिए एक विदारक कथा है। ये आदिवासी मुख्यभूमि से नाव पर आते थे, जंगलों से गुजरते द्वीप के दक्षिणी छोर तक जाते थे, और फिर कुछ फल उठा कर चढ़ावा चढ़ाते थे। और उसके पश्चात पारिया की खाड़ी से गुजरते ओरिनोको के मुहाने तक चले जाते थे। यह प्रक्रिया जरूर महत्वपूर्ण होगी जो चार सौ वर्षों के उनके विलुप्तप्राय इतिहास में बच कर रह गयी होगी। या शायद वे वेनेजुएला और ट्रिनिडाड की समान वनस्पति होने के बावजूद एक ख़ास फल ढूँढने आते थे। मुझे नहीं मालूम। मुझे याद भी नहीं कि किसी ने यह सवाल पूछा हो। और अब स्मृतियाँ भी खो गयी। वह पवित्र जमीन अगर वाकई थी, तो वह अब सपाट हो चुकी है।

जो बीत गयी, वह बात गयी। मुझे लगता है कि यही सामान्य नजरिया है। और हम भारतीय, जो भारत से प्रवासित हुए, वे इसी नजरिए के साथ द्वीप पर रहे। हम रीति-रिवाजों से जीवन जीते रहे; लेकिन कभी अपना आकलन नहीं किया, जहाँ से ज्ञान का उद्गम होता। हम में से आधे लोग यह ढोंग करते रहे या संभवत: मात्र अनुभव जमा करते रहे; लेकिन कभी ऐसी सोच नहीं बनायी कि हम अपने साथ एक ऐसा भारत लेकर आए हैं जिसे कालीन की तरह इस सपाट धरती पर बिछा सकते हैं।

शगुआनास में मेरी दादी का घर दो हिस्सों में बँटा था। सामने का हिस्सा ईंट और प्लास्टर से बना था, जिसमें सफ़ेद रंग चढ़ा था। यह किसी भारतीय घर की तरह था, जिसमें ऊपरी तल पर एक विशाल रेलिंग लगी छत होती, और उसके ऊपर के तल पर पूजा-घर होता। यह शिल्प-कला के हिसाब से काफी समृद्ध था, कि खंभों पर कमल-पत्र और हिंदू देवी-देवता उकेरे थे; सब भारत से लायी स्मृतियों से बनाए गए। ट्रिनिडाड के हिसाब से यह विचित्र वास्तु-कला थी। इस घर के पीछे एक पुल से जुड़ी फ्रेंच कैरीबियन शैली की इमारत थी। प्रवेश-द्वार घर के दोनों हिस्सों के मध्य किनारों से होकर था। यह लकड़ी के फ़्रेम से बना लोहे का विशाल द्वार था। यह द्वार उस घर को घोर निजता देती थी।

तो बचपन में मुझे दो दुनिया का बोध हुआ, एक जो उस ऊँचे द्वार के बाहर शुरु होता, और एक घर के अंदर; या यूँ कहिए कि अपनी दादी की दुनिया। यह हमारे जाति-बोध के कुछ अवशेष थे, जिसे आखिर खत्म कर दिया गया। ट्रिनिडाड के आप्रवासियों के लिए जातिवाद का अंत एक तरह की सुरक्षा थी, क्योंकि यह उपेक्षित समुदाय था। कुछ समय के लिए, और मात्र कुछ समय के लिए, अपने तरीके से जीना, अपने शर्तों पर जीना, हमारे मिटते हुए भारत में जीना। यह अजीब सी आत्म-केंद्रित धारणा थी। हमने अपने अंदर झाँका, अपने दिन जीए; और बाहर की दुनिया अंधकारमय थी, जिससे हमने कोई सवाल नहीं किए।

हमारे पड़ोस में एक मुस्लिम की दुकान थी। मेरी दादी की दुकान का एक कोना उसके दुकान की दीवाल से लगा था। उसका नाम था- मियाँ। हमें उसे और उसके परिवार के संबंध में बस इतना ही मालूम था। हमने शायद उसे देखा भी हो, लेकिन मेरे मन में कोई छवि अब नहीं उभरती। हमें मुस्लिमों का कुछ पता नहीं होता। यह परायापन और अपनी निजता से बाहर रखना दूसरे हिंदुओं के लिए भी था। जैसे, हम दिन में भात और रात को रोटी खाते। कुछ लोग इस प्राकृतिक नियम का पालन न कर रात में भात खाते। मुझे ये लोग अजनबी नजर आते। आप यह कल्पना करिए कि मैं उस वक्त सात वर्ष से कम उम्र का था, क्योंकि सात वर्ष के उम्र में ही चगुआनास में दादी की यह दुनिया मेरे लिए खत्म हो गयी। हम राजधानी चले आए, और बाद में उत्तर-पश्चिम की पहाड़ों पर।

लेकिन मन की यह प्रवृत्ति की कुछ दरवाजे खोले, कुछ बंद किए, यह कुछ समय चलता रहा। अगर मेरे पिता ने लघु-कथाएँ नहीं लिखी होती तो मुझे भारतीय समुदाय के जीवन का कोई ज्ञान न होता। उन कथाओं ने मुझे ज्ञान के अतिरिक्त भी बहुत कुछ दिया। मुझे एक तरह से ठोस बनाया। दुनिया में खड़े होने की एक जगह दी। इन कथाओं के बिना न जाने मेरा मष्तिष्क कैसा होता?

बाहर की दुनिया अंधकारमय थी, जिसकी हमारे मन में कोई जिज्ञासा न थी। मेरी उम्र मात्र इतनी थी कि भारतीय ग्रंथों जैसे रामायण की कुछ समझ बन पायी। जो हमारे परिवार में पाँच वर्ष या उसके बाद आए, उनके भाग्य में यह भी नहीं था। हमें किसी ने हिन्दी नहीं सिखायी। कभी कोई कुछ अक्षर लिख गया, बस उतना ही; बाकी हमें खुद ही सीखना था। और जैसे-जैसे अंग्रेज़ी ने हमारे घर में प्रवेश किया, हमने अपनी भाषा खोनी शुरू की। मेरी दादी के घर में धर्म ही धर्म था, खूब पाठ-पूजा होती, कुछ तो कई दिनों तक चलते। लेकिन हमें भाषा समझ नहीं आती और किसी ने कभी हमें अनुवाद कर समझाया नहीं। इसलिए हमारे पूर्वजों का धर्म हमारे दैनिक जीवन से खत्म होता गया, और एक रहस्य बनता गया।

धरती का ध्येय जुड़ाव है और फांक होना प्रकृति।

मैंने अपनी किताब में भी लिखा है कि आईसलैंड में धरती बीचों-बीच दो फांक होती रहती है। जिसकी आभासी तुलना मैंने सीता के जन्म और समाधि से की है। यह दरअसल दो टेक्टॉनिक प्लेट का जुड़ना, अलग होना भी है। मैं जब प्रेत की बात करता हूँ, तो कहता हूँ कि वहाँ लोगों ने उन इलाकों में सड़क और मकान नहीं बनाए, जहाँ प्रेत हैं। प्रकृति बची रही।

समस्या तब आती है, जब विज्ञान और तर्क विश्वास की धज्जियाँ उड़ाते हैं। और तब भी जब विश्वास बलवान होकर विज्ञान और तर्क को धत्ता बताता है।

मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर में बलात्कार पर ईश्वर क्यों चुप हैं? आप कहते हैं, वो हैं ही नहीं? अरे अंधों! वो उस घर में उन्हें दिखे नहीं, तभी तो यह कुकर्म किया। न अंदर बैठों को दिखते हैं, न बाहर बैठों को। तो कहाँ होंगे ईश्वर? पेड़ पर पेड़ काटे जा रहे हो, और कहते हो कि पेड़ पर प्रेत बैठने वाली बात झूठी है? ईश्वर को देखा नहीं, तो प्रेत की चीत्कार भी नहीं सुनी होगी।

गांधी अपने प्रारंभिक लेख ‘फ़ेस्टिवल्स ऑफ़ इंडिया’ में, सावरकर अपने प्रसिद्ध लेख ‘क्ष-किरण’ में, आईंस्टाईन अपने ‘रिलीज़न ऐन्ड साईन्स’ में यह बातें समझा चुके हैं। पर आपके लिए तो गांधी, सावरकर और आईन्सटाईन ही तीन गैंग के हैं, तो क्या कहूँ?

मिथिला की सीता जमीन से निकली बेटी ही थी। कहाँ से? जमीन से? उनके हाथ में किसी जाति या धर्म का झंडा नहीं था। मिथिला का ‘आधा गांव’ आज भी मर्सिया गाता-खेलता है। मिथिला में जात-पात की भिन्नता भी है, और एकता भी।

लिख ‘मिथिला’ रहा हूँ, पर इसे धरती ही समझिए। आईसलैंड भी मिथिला ही है। धरती वहाँ भी फटती है। धरती का ध्येय जुड़ाव है और फांक होना प्रकृति।

मल्लिकार्जुन मंसूर

संगीत में गरीब-फकीरों के लिए जगह नहीं। एक वाद-विवाद में यह बात चल पड़ी। मुद्दा शास्त्रीय संगीत का था जो राज घरानों में ही पला-बढ़ा। राज घराने खत्म हुए, संगीत भी खत्म होने लगा। असगरी बाई भी टीकमगढ़ की शानो-शौकत याद कर भावुक हो उठती हैं। पर मुझे लगता है कि फकीरों की आवाज ही अलग है। और घरानों से जुदा भी कुछ लोग तो जरूर हुए।

कुमार गंधर्व की चर्चा मैं करता रहा हूँ, हालांकि फकीरी उनके पुत्र मुकुल जी ने निभाई और रसातल में चले गए। पर एक फकीर हैं, जो पैदाईशी गरीब-फकीर ही रहे, और वो उनकी गायन शैली में भी नजर आता है।

गर गाते समय चेहरे की भंगिमा, गले का थरथराना, होठों का तेज गति से कंपन देखना हो तो, या तो भीमसेन जोशी जी को देखिए, या देखिए मल्लिकार्जुन मंसूर को। कठिन और लीक से हटकर रागों को गाने की कुव्वत उनमें है। राग विभास हो, गौड़ मल्हार हो, असावरी हो। आज झिंझोटी सुन रहा हूँ।

तकनीकी बात करता हूँ। रागों में अलाप पहले आता है, बंदिश बाद में। पर मंसूर जब गाते हैं, बंदिश के बीच में वापस अलाप में भी आ जाते हैं, और गले को कंपन देकर गमक भी उसी वक्त। यह रीति के विपरीत है। यह कुमार गंधर्व, मंसूर या जयपुर घराने वाले कुछ लोग ही करते हैं।

इतना ही नहीं, नाक से गाना, तालु से गाना। ये नहीं कि बस गले से गा दिया। यह सब अलग-अलग स्केल लाता है, पर यह सब नहीं करते। यह रागों की परंपरा को तोड़ना है, पर मंसूर का स्टाइल है। वो बंधे नहीं, और इसलिए जब भी कभी स्वच्छंद सुर सुनने की इच्छा होती है, मल्लिकार्जुन मंसूर जी को सुन लेता हूँ।

आप अगर संगीत के विद्यार्थी नहीं, मेरी तरह बस श्रोता हैं तो मंसूर जी को गाहे-बगाहे सुनते रहें। विद्यार्थियों के लिए परंपरा तोड़ने से पहले निभाना मेरे ख्याल से जरूरी है।

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किराना कहिये या कैराना

पंडित भीमसेन जोशी किराना घराना से थे। किराना कहिये या कैराना। वही कैराना जो समाचारों में हाल में बदनाम रहा, कभी संगीत का गढ़ था।

एक कहानी कल ही पढ़ी। गायकवाड़ महाराज के पास नामी अालिया बख्श और फतेह अली (आलिया-फत्तू) की जोड़ी थी। वो गाते तो उनके बाद किसी के गाने की हिम्मत नहीं होती। यह तौहीन कैराना के अब्दुल करीम खान साहब ने की बीस बरख में। वो गाया कि हिंदुस्तान हिल गया। और तो और, गायकवाड़ राजकुमारी ताराबाई रातों-रात उनके साथ भाग गई। राजकुमारी तो छोड़िए प्रेम में, पर ११ बरख के पंडित जोशी उन्हें सुनकर घर से भाग गए कि गायक बनना है। यह कहकर कि करीम साहब जैसा गाना है। भला ऐसा क्या गाते होंगें कि सब उनके साथ भाग पड़ते?

कोई कहता है पं. भीमसेन जोशी जैसा मारू बिहाग कोई नहीं गा सकता। हम जैसे अनाड़ी कहते हैं, पंडितजी जैसा ही कोई नहीं गा सकता। और पंडित जी कहते कि करीम साहब जैसा कोई नहीं गा सकता।

ऐसा नहीं है कि करीम साहब पर उँगलियाँ नहीं उठीं। उन्हें पुणे के कट्टर हिंदू और मुस्लिम दोनों प्रश्न करते। वह रोज गायत्री मंत्र का जाप करते, और उनके अधिकतर शिष्य हिंदू थे। खासकर रामभाऊ कुंडगोलकर जो बाद में ‘सवाई गंधर्व’ नाम से मशहूर हुए। करीम खान साहब ने बाल गंगाधर तिलक के सामने ‘हरि ओम तत्सत्’ भजन सुनाया था, और तिलक मंत्रमुग्ध हो गए थे। गायकी-मौशिकी में यह आम था। अलाउद्दीन खान साहब मैहर देवी की पूजा करते थे। ये कैराना-फैराना तो तब की देन है, जब संगीत उड़ गया और गर्द रह गया। हम रह गए, आप रह गए।

मारू बिहाग पर चर्चा कभी बाद में। फिल्मी तर्ज दे देता हूँ आइडिया लगाने के लिए। “दिल चीज क्या है आप मेरी जान लीजिए….” मारू बिहाग की छवि है। या लता जी का “तुम तो..प्यार हो…सजना..तुम तो…”

गिरिजा देवी की चर्चा हुई। उन्हें ही सुन रहा था, और करीम खान साहब को पढ़ रहा था।

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