भारतीय आहार (Indian diet)

१ जून, १८९१

लेखक- मोहनदास करमचंद गांधी

अनुवाद- प्रवीण कुमार झा

इस लेख की शुरूआत से पहले अपनी योग्यता बता दूँ। जब मिल्स ने भारत का इतिहास लिखा तो अपनी योग्यता बताई, हालांकि न वो भारत कभी गए और न ही वहाँ की भाषाएँ जानते थे। तो मैं वही लिखूँगा, जो मुझे लिखना चाहिए। जब भी कोई किसी से योग्यता पूछता है, इसका अर्थ है कि उसे विश्वास नहीं। तो मैं पहले ही कह दूँ कि भारत के भोजन पर लिखने के लिए मैं स्वयं को योग्य नहीं समझता। दरअसल मैं योग्यता सिद्ध करने के लिए नहीं लिख रहा, बल्कि इसलिए क्योंकि भारत मेरे दिल से जुड़ा है।

मैं बॉम्बे प्रेसिडेंसी के अनुभव लिखूँगा। हालांकि भारत में लगभग २.८ करोड़ लोग रहते हैं। यह यूरोप से अगर रूस अलग कर दें, तो उतना बड़ा देश है। इतने बड़े देश में कई परंपराएँ पलती हैं। तो अगर मेरे लेख से अतिरिक्त आपको कुछ भविष्य में पता लगे, तो यह स्वाभाविक है।

मैं तीन भागों में अपनी बात रखूँगा। पहला वहाँ के लोगों के संबंध में। दूसरा भोजन, और तीसरा भोजन के फायदे इत्यादि।

यह माना जाता है कि भारत में सब शाकाहारी हैं, पर यह सत्य नहीं, यहां तक कि सभी हिन्दू भी नहीं। किंतु बहुसंख्यक शाकाहारी हैं। पर भारत के मांसाहारी आपसे अलग हैं। वो यह नहीं सोचते कि मांस के बिना मर जाएंगें। यह उनका शौक है, जिंदगी की जरूरत नहीं। उन्हें गर खाने को बढ़िया रोटी मिल जाए, खुशी-खुशी खाएंगें। जबकि ब्रिटिश मांसाहारी को हर रोज मांस चाहिए ही। ब्रिटिश को मांस चाहिए, ब्रेड बस उनके पाचन में सहायक है। भारतीय को रोटी चाहिए, मांस बस उसको पचाने के लिए सहायक है।

कल मैं एक अंग्रेज महिला से शाकाहार के विषय में कह रहा था। उन्होनें कहा कि मांस के बिना उनका जीवन संभव नहीं। मैनें पूछा कि अगर कभी ऐसी परिस्थिति आए कि शाकाहारी बनना पड़े। उन्होनें कहा कि यह उनके जीवन का सबसे बुरा वक्त होगा। मैं उन्हें दोष नहीं देता। यह आपके समाज की समस्या है कि आप मांस के बिना नहीं रह सकते।

अब मैं भारत के शाकाहारी भोजनों पर आता हूँ। भारत एक कृषि-प्रधान देश है, विशाल। इसलिए हमारे कृषि उत्पाद भी विस्तृत हैं। हालांकि ब्रिटिश लोग भारत में १७४६ ई. में ही आ गए, पर विडंबना है कि लंदन में भारतीय भोजन कोई जानता ही नहीं। पर इसके जिम्मेदार भी आप ही हैं। आप भारत जा कर भी अंग्रेजों जैसे ही रहते हैं, भारतीयों की तरह नहीं। आपको भोजन तो अंग्रेजी चाहिए ही, बल्कि उसे बनाया भी अंग्रेजी तरीके से जाए। यह तो मनुष्य का सामान्य गुण है कि वो दूसरों की संस्कृति से कुछ सीखे, पर आपमें ऐसी चेष्टा कम दिखी। तमाम ऐंग्लो-इंडियन ने भारत के शाकाहार से कुछ नहीं सीखा।

खैर, आपकी निंदा को विराम देते हुए, हम बात करते हैं भारत के भिन्न-भिन्न प्रकार के मकई की।

गेंहूँ भारत का एक मुख्य अनाज है। चावल, बाजरा, और ज्वार भी। अमीर गेंहू की रोटी खाते हैं, तो गरीब ज्वार-बाजरा की। खासकर दक्षिणी और उत्तरी प्रांतों में। हंटर ने दक्षिणी प्रांतों के बारे में लिखा कि ज्वार, बाजरा और रागी वहाँ प्रमुख हैं। उत्तर के बारे में वो लिखते हैं कि अमीर वहाँ चावल अधिक खाते हैं। आपको भारत में ऐसे लोग मिलेंगें जिसने कभी ज्वार चखा ही न हो। पर गरीब इसकी बहुत इज्जत करते हैं। यहाँ तक कि वो किसी को अलविदा करते वक्त कहते हैं, “ज्वार!” यानी “तुम्हें जीवन भर ज्वार मिलता रहे”। बंगाल प्रांत में चावल की रोटी भी बनती है। बंगाली रोटी से अधिक चावल खाते हैं। देश के अन्य प्रांतों में चावल की रोटी कम ही बनती है।

रोटी तो चने की भी भारत में बनती है, गेंहूँ मिलाकर। और मटर की भी। पर इससे मुझे अब तरह-तरह के दाल याद आ गए। अरहर, चना, मूंग, तूअर, मोठ*, उरद इत्यादि। इनमें तूर दाल काफी लोकप्रिय है। सब्जियों की बात मैं करूँ तो यह भाषण समाप्त नहीं हो पाएगा। भारत की मिट्टी अनगिनत सब्जियाँ पैदा करती हैं। इसको ऐसे भी कह सकते हैं कि गर भारत को कृषि का संपूर्ण ज्ञान दिया जाए तो दुनिया की हर सब्जी उगाना यहां मुमकिन होगा।

अब आते हैं फलों और बादाम पर। यह विडंबना है कि भारत में फलों की महत्ता कम लोग समझते हैं। हालांकि प्रयोग खूब है, लेकिन एक शौक की तरह। इसे स्वाद के लिए खाते हैं, स्वास्थ्य के लिए नहीं। इस कारणवश भारत के लोगों को स्वास्थ्यप्रद फल जैसे सेब और नारंगी इत्यादि प्रचुर मात्रा में नहीं मिलते। हालांकि मौसमी फल-बादाम खूब मिलते हैं। जैसे गर्मियों में आम सबसे लोकप्रिय है। आम से स्वादिष्ट फल मैनें आज तक नहीं चखा। बहुत लोग अनानस को सर्वोत्तम कहते हैं, पर जिसने आम चख लिया, वो आम को ही सर्वोच्च रखता है। यह तीन महीने मिलता है, और सस्ता है तो अमीर-गरीब सब खा पाते हैं। मैनें तो यह भी सुना कि कुछ लोग बस आम खा कर ही इन महीनों में रहते हैं।

पर समस्या है कि आम ज्यादा दिन टिकते नहीं। यह खाने में आपके सतालू के करीब कहा जा सकता है, और इसमें गुठली होती है। यह कभी-कभी एक छोटे तरबूज जितना बड़ा भी होता है। अब तरबूज याद आ गया, वो भी खूब मिलते हैं गर्मियों में। आपके इंग्लैंड से कहीं बेहतर तरबूज। खैर, अब आपको और फलों के नाम बताकर बोर नहीं करूँगा। बस यह समझ लें कि भारत में मौसमी फलों की कमी नहीं।

यह सब फल गरीबों को मिलते हैं पर दु:ख है कि वो इसका सदुपयोग नहीं करते। कई लोगों को यह भी लगता है कि फल से पेट खराब होता है, हैजा फैलता है। आपका प्रशासन इन पर कुछ हिस्सों में रोक भी लगा देता है। खैर।

बादाम तो भारत में लगभग सभी मिलते हैं। कुछ यहाँ के बादाम हालांकि वहां नहीं मिलते, और कुछ वहां के यहां नहीं मिलते। पर हम बादाम को भोजन नहीं मानते। इसलिए इनकी चर्चा पर मैं विराम देता हूँ। अब बात करेंगें कि भारत में भोजन बनता कैसे है।

अब आपको भारतीय भोजन बनाना इस भाषण में तो नहीं सिखा पाऊँगा। यह मेरी शक्ति से परे है। पर एक रूपरेखा दे देता हूँ। भोजन से उपचार इंग्लैंड में नया-नया आया है। पर भारत में यह कई सदियों से चला आ रहा है। हमारे चिकित्सक दवा भी देते हैं, पर उनके उपचार का बड़ा हिस्सा भोजन में बदलाव है। कभी वो नमक से परहेज कहेंगें, कभी तीखे भोजन से।

अब साधारण सी बात है कि हम गेंहू पीसते हैं, तो उसमें से भूसी/चोकर अलग नहीं करते। हम ताजी पकाई रोटी ही खाते हैं घी लगाकर, ठंडी नहीं। हमारा मांस यही है। कोई कितना खाता है, यह रोटियों की संख्या से ही पता लगता है। दाल-सब्जी की गिनती नहीं होती। बिना दाल, या बिना सब्जी के भोजन संभव है पर बिना रोटी के नहीं।

दाल काफी आसान है। बस पानी में उबालना है। पर उसमें स्वाद तमाम मसालों से आता है। और यहीं कला है। कितनी नमक, कितनी हल्दी, कितना जीरा, कितनी लौंग, और दालचीनी। दाल अच्छी होगी, तो रोटी का लुत्फ आएगा। हालांकि दाल बहुत अधिक भी नहीं खानी चाहिए। और चावल की चर्चा भी कर ही दूँ। लोग कहते हैं कि बंगाली चावल अधिक खाते हैं, तभी मधुमेह के शिकार होते हैं। चावल और रोटी में रोटी बेहतर है। चावल अमीर ज्यादा खाते हैं। गरीब मजदूर रोटी खूब खाते हैं। हालांकि जब मुझे ज्वर हुआ, तो मुझे डॉक्टर ने गीला भात और उसका पानी पीने कहा। और मैं ठीक भी हो गया।

अब आते हैं सब्जियों पर। बनाने का तरीका दाल जैसा ही है, पर तेल और मक्खन का उपयोग ज्यादा होता है। कई बार बेसन भी। हम सादी उबाली हुई सब्जी नहीं खाते। उबले आलू जो आप खाते हैं, भारत में नहीं मिलते। भारत सब्जियाँ बनाने में फ्रांस से कहीं बेहतर है। सब्जी हमारे भोजन में दाल का सहयोगी है। और यह शौक की चीज भी है, कुछ बीमारियों की वजह भी। गरीब सब्जियाँ कम खाते हैं, उनको बस दाल-रोटी मिल जाए, काफी है। कुछ सब्जियाँ स्वास्थ्यवर्द्धक हैं। जैसे एक पालक जैसी दिखने वाली सब्जी ‘तंडलजा’ *। यह आंखों की रोशनी के लिए बहुत अच्छी है।

फिर आते हैं फल। हम खासकर फलाहार के दिन खाते हैं, रोज-रोज भोजनोपरांत नहीं खाते। आमरस खासकर आम के महीने में लोकप्रिय है, रोटी या चावल के साथ। हम फल को कभी पकाते नहीं। ताजे फल खाते हैं, कई बार खट्टे भी, भले ही स्वास्थ्य के लिए ठीक न हो। सूखे फल बच्चे खूब खाते हैं, जैसे छुहारे। यह शीतकाल में खासकर खाए जाते हैं। छुहारे गरम दूध में डाल कर, और तरह-तरह के मिष्टान्नों में।

बच्चे मीठे बादाम भी खूब पसंद करते हैं। मक्खन और दूध में तले बादाम। नारियल भी हम पीस कर दूध और चीनी डाल कर खाते हैं। आपको नारियल कभी ऐसे लड्डू बना कर चखना चाहिए।

आप सब को एक बात स्पष्ट कर दूँ कि यह भारतीय भोजन का बहुत ही छद्म ज्ञान था। आपको आगे खुद जानना और सीखना होगा। यह अंग्रेजी मांसाहारी और हिंदुस्तानी शाकाहारी भोजन का विभाजन हमारी संस्कृतियों को अलग करता है, जिसे जोड़ना होगा। तभी आपकी हिंदुस्तानियों के प्रति घृणा खत्म होगी। भोजन से ही दो देशों के दिल जुड़ सकते हैं।

#गांधीसाहित्य

(पोर्ट्समाउथ के इस भाषण में गणमान्य ब्रिटिश व्यक्तियों के बीच बाइस वर्ष के गांधी बोलने में काफी घबड़ा रहे थे, जो इस लेख के शुरूआती हिस्से में नजर आता है। The vegetarians 16-5-1891 की रिपोर्ट)

महेंद्र कपूर के क़िस्से (Mahendra Kapoor)

महेंद्र कपूर और राज कपूर सोवियत रूस गए। रूस में तो राज कपूर भगवान थे, महेंद्र कपूर को कोई जानता न था। सभी दर्शक राज कपूर को ही गाने कहने लगे। तो राज कपूर ने गाया, और महेंद्र कपूर ने हारमोनियम बजाया। महेंद्र कपूर ने एक रूसी अनुवादक को कहा कि ‘नीले गगन के तले’ गीत का फटाफट अनुवाद कर दें। और रट्टा मार कर स्टेज पर रूसी भाषा में यह गीत गा दिया। अब तो सभी रूसी उत्साहित होकर तालियाँ बजाने लगे। राज कपूर जब स्टेज पर लौटे तो महेंद्र कपूर हीरो बन चुके थे। राज कपूर ने कहा, “एक कपूर ही दूसरे कपूर को मात दे सकता है।”

एक दूसरा वाक्या है कि एक शाम को पेग लगाते हुए महेंद्र कपूर को राज ने कहा कि तुम्हें बंबई में अपने फ़िल्म में गीत दूँगा। उन्होंने कहा कि आप बड़े आदमी हैं, बंबई जाकर भूल जाएँगे। राज कपूर ने तुरंत जलती सिगरेट लेकर अपनी हथेली पर बुझाया, और कहा कि अब यह दाग़ मुझे याद दिलाता रहेगा कि तुम्हें एक गीत देना है।

वादे के मुताबिक भारत लौट कर राज कपूर ने उन्हें अपनी फ़िल्म में गीत दिया- हर दिल जो प्यार करेगा, वो गाना गाएगा।

आगे की कहानी और मज़ेदार है। मनोज कुमार को इतिहास का बहुत ज्ञान था, और वह महेंद्र कपूर को हर देशभक्ति गीत के समय जोश दिलाने के लिए आजादी से जुड़े क़िस्से सुनाते थे। महेंद्र कपूर भी इन क़िस्सों को सुन कर जोश में आ जाते।

एक बार प्रगति मैदान, दिल्ली में कई गायक और कलाकार आए थे। पहले मो. रफ़ी, मुकेश और किशोर कुमार का गायन था, आखिरी में महेंद्र कपूर का। महेंद्र कपूर ने मनोज कुमार को कहा कि इन तीनों के गाने के बाद मेरा गीत कौन सुनेगा? सभी दर्शक निकल लेंगे। मनोज कुमार ने उन्हें भरोसा दिलाया कि कोई नहीं भागेगा, तुम गाओ। उन्होंने सेटिंग करवा कर प्रगति मैदान के हॉल का दरवाजा बंद करवा दिया कि कोई भागने न पाए। और दिलीप कुमार को कह दिया कि सभी लोगों को लेकर गीत के दौरान स्टेज़ पर चढ़ जाएँ।

दर्शक भागने ही वाले थे कि देखा दरवाजा बंद है। उधर महेंद्र कपूर ने स्टेज पर आकर अपनी ट्रेडमार्क बुलंदी से ‘मेरे देश की धरती’ गाना शुरू कर दिया।दर्शक जो भागने को खड़े थे, वे उंगली उठा-उठा कर नाचने लगे, सभी अभिनेता और गायक भी स्टेज़ पर पहुँच गए।

अगले दिन अखबार में छपा, “मेरे देश की धरती ने महफ़िल जमा दी”

#ragajourney

(यह दोनों संस्मरण एक अंग्रेज़ी लेख से)

घरानों की सैर (Schools of music)

हिंदुस्तानी संगीत है तो घराने हैं। घराने हैं, तो कथाएँ हैं। कथाएँ हैं, तो उनमें रस है। उतना ही, जितना कि संगीत में। क्योंकि कथाएँ बनी ही संगीत से है। मुश्किल ये है कि यह कोई बताता नहीं। अब किसी ने बैठक में सुना दी, किसी ने यूँ ही बातों-बातों में बता दी, और कभी किसी ने लिख दी। पर कोई एक व्यक्ति हो, जो हिंदुस्तानी संगीत से जुड़ी तमाम कथाएँ सुना दे, शायद न मिले। आप कहेंगें कि इसकी ज़रूरत ही क्या है? किस्से-कहानियों से भी भला क्या संगीत बना है? अब यही तो ख़ासियत है। यह संगीत जितना शांत, सौम्य और एकांतशील नजर आता है, उतना ही यह दरबारी माहौल, पान-सुपारी की बैठक, वाह-वाही और इरशाद के बीच बढ़ा है।

घरानों की शुरूआत ग्वालियर से ही हुई, तो यह सफर भी वहीं से शुरू हो।

उस्ताद निसार हुसैन ख़ान का एक अलग रूतबा था। तस्वीरों में जितना देखा, और बैठकों में जैसा उनके बारे में सुना, क्या खूब लंबे-चौड़े बुलंद उस्ताद रहे होंगें! अब एक दफे कहीं ट्रेन से बिना टिकट जा रहे थे, तो उतार दिए गए। उस्ताद वहीं प्लैटफॉर्म पर बैठ कुछ ‘चीज’ गाने लगे। उनकी यह तान सुन ट्रेन रोकनी पड़ी। गाड़ी से उतर कर सभी यात्री नीचे आ गए और वहीं प्लैटफॉर्म पर महफ़िल जम गई। कैसी होगी आखिर संगीत की शक्ति कि ट्रेन रूक जाए?

अब वह कलकत्ता गए तो गवर्नर साहब को रेलगाड़ी तराना गाकर सुनाया। ट्रेन की आवाज की तर्ज पर विलंबित और द्रुत का साम्य बना कर रचा गया तराना। गवर्नर साहब खुश हुए तो ईनाम पूछा। उस्ताद ने आखिर इस बेटिकट की झंझट से निजात पाने के लिए ‘रेल पास’ ही मांग लिया।

ग्वालियर घराने से ही अन्य घराने उपजे। ग्वालियर के बालकृष्ण इचलकरंजीकर जी ने विष्णु दिगंबर पुलुस्कर को सिखाया। वही पुलुस्कर जिनका गाया ‘रघुपति राघव राजा राम’ महात्मा गांधी को इतना भाया कि दिग्विजय कर गया। सीनीयर पुलुस्कर की रिकॉर्डिंग अब भले न मिले पर लोग कहते हैं कि उनके शिष्य ओंकारनाथ ठाकुर में उनकी आवाज कुछ हद तक आयी। आपने उनका गाया ‘वंदे मातरम्’ सुना होगा जो उस आजादी की रात संसद में गाया गया।

आजादी से पहले जब उनकी चर्चा मुसोलिनी ने सुनी, तो बुलावा भिजवाया। मुसोलिनी के समक्ष उन्होनें वीर रस का ‘राग हिंदोलन’ गाया, तो मुसोलिनी को पसीना आ गया, हाथ-पैर कांपने लगे और आखिर उन्होनें कहा, “स्टॉप!” इसके बाद उन्होनें राग छायानट गाया, जिससे करूणा का भाव में डूब कर मुसोलिनी अपनी वायलिन लेकर आ गए और बजाने लगे।

यह रागों से भावनाएँ जगने या रोग ठीक होने में विज्ञान की चर्चा कई बार भटक जाती है। लोग कहते हैं कि अब्दुल करीम ख़ान साहब का कुत्ता भी राग में भूंकता था। यह अतिशयोक्ति भी संगीत की बैठकों का हिस्सा ही है। उस्तादों में एक खुदा या ईश्वर का नजर आना। पर कुछ चमत्कार तो सबके समक्ष ही हैं।

टी.बी. से कुमार गंधर्व का फेफड़ा खत्म हो जाना, और फिर गायन में कीर्तिमान स्थापित करना। अलादिया खान साहब की अपनी आवाज अचानक गुम हो जाना, और एक दिन नयी आवाज में लौटना। बेगम अख्तर का गाना छोड़ते ही बीमार होना, और वापस स्टेज़ पर आते ही ठीक हो जाना, और फिर से सुर टूटते ही मर जाना। संगीत और शरीर के तार तो जुड़े ही हैं।

आज भी संगीत के तमाम घरानों की उपस्थिति कमोबेश नजर आती है। अब भी कई अवशेष हैं। आगरा घराने से सभी खान साहब चल बसे, पर कहीं न कहीं कोई वसीम अहमद खान साहब आज भी गा रहे हैं। ग्वालियर है, जयपुर है, पटियाला है, कैराना है, इमदादखानी है, मेवाती है, बनारस है, रामपुर है, इंदौर है, और ध्रुपद की बानी हैं। गर खो गया तो भिंडीबाज़ार खो गया। मुंबई की भीड़-भाड़ में वो मशहूर घराना, जो कभी लता जी, आशा जी और मन्ना डे को गुर दे गया, अब खत्म हो गया।

मेरी भी यह छोटी सैर अब समाप्त होती है। कई किस्से रह गए। वह गंडा बंधाने की कहानियाँ। वह बंटवारे में अलग हुआ संगीत। वह फैयाज़ खान के मज़ार को, और रसूलन बाई के घर को दंगों में नेस्तनाबूद करना। वह सरकारी पेंशनों का बंद हो जाना। घरानों का देश से पलायन होना, और अमरीका-यूरोप में बस जाना। यहाँ से संगीत का जाना, और वहाँ से आना। और फिर फ़्यूजन हो जाना। मुझे शिकायत नहीं, संगीत का सफर तब भी अनवरत चलता था, अब भी चल रह रहा है। हाँ! जड़ों को खाद-पानी मिले तो यह फलता-फूलता रहेगा।

(फ़ोटो मित्र प्रवीण यायावर जी के सौजन्य से। यह 3 या 4 अक्तूबर को छपा था।)

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अंधी गली: जल-निकास पर बात

मैं जब गुड़गाँव में था, तो उसके दो हिस्से थे, जैसा कई भारतीय नव-नगरों में है। नया गुड़गाँव नयी-नवेली गगनचुंबी इमारतों से सज रहा था, और पुराना गुड़गाँव भी यथाशक्ति पुरानी इमारतों के ऊपर ही ईंट जोड़ने में लगा था। लेकिन, जिस गति से इमारतें बनती जा रही थी, नाले बन ही नहीं रहे थे। एक बिल्डिंग में फ्लैट देखने गया तो पता किया कि गंदा पानी कहाँ जमा होगा। कहा कि सेप्टिक टैंक में। मैंने पूछा कि दो-तीन सौ मकानों का कचड़ा एक गड्ढे में विलीन हो जाएगा? कहा कि भर जाने पर उस कचड़े को कहीं और ले जाएँगे। यानी, इतनी इमारतें बन गयी, और जल-निकास की व्यवस्था ही नहीं। नतीजा तो खैर मेरे निकलते-निकलते ही दिखने लगा था, अब शायद सुधार हुआ हो।

चंडीगढ़ जैसे सुनियोजित शहरों में पानी जमने लगा। मैं एक बार मैसूर के नव-मोहल्ले में गया, तो वहाँ भी पानी जमा हुआ। मैंने सुन रखा था कि भारत की सबसे सुंदर जल-निकास व्यवस्था अगर कहीं है तो मैसूर में है। मैसूर राजाओं ने ही भूमिगत जल-निकास सिस्टम बना लिया था। लेकिन, यह तो पुराने मैसूर में बना था। नया मैसूर तो उसी गुड़गाँव मॉडल पर है, जहाँ कचड़ा एक अंधी गली में जाकर जमा हो जाता है। जबकि यह ध्यान रहे कि मैसूर या पुणे की मिट्टी ऐसी है, जो जल सोख लेती है। हर जगह ऐसी छन्नीदार मिट्टी नहीं होती।

वैसे अगर यह सारे नाले अंधी गली से न गुजर कर, तमाम पतली धाराओं से बहते हुए नदी में ही चले जाते तो क्या हल निकल जाता? यह बात अब सभी विशाल महानगरों के लोग समझ चुके हैं कि यह प्रायोगिक नहीं। उन्हें नदी में बहने से इतर जल को समाहित करने के रास्ते ढूँढने ही होंगे। न्यूयॉर्क तक को आखिर अपने शहर को दो भागों में विभाजित करना पड़ा। एक हरा, एक कंक्रीट। जबकि वहाँ ड्रेनेज सिस्टम तो भूमिगत है ही, और नदी-समुद्र सब है। लेकिन जितनी तेजी से एक हरित पट्टी जल को सोखती है, उतने कहाँ ये बरसाती नाले कर पाएँगे? यह प्रकृति की छन्नी है। अगरतला जल-जमाव से डूबता है, लेकिन उत्तर-पूर्व के सबसे बड़े वृष्टि-क्षेत्र अगर नहीं डूबते तो इसकी वजह वहाँ की यह हरियाली ही है। लेकिन, एक ऐसे शहर में, जहाँ अब ऐसे इलाके बचे नहीं, यह पूरा इकोसिस्टम खड़ा करने में चार-पाँच दशक लग जाएँगे। तब तक तो बिन पेंदी के काल्पनिक नालों में ही जोड़-घटाव संभव है। प्रकृति का गणित न सही, कन्क्रीट का गणित सही। बड़ी-बड़ी इमारतों के किनारे बहते पतले-पतले नाले, जाएँ तो जाएँ कहाँ?

सुभाष चंद्र बोस: एक संगीतकार (Subhash Chandra Bose as musician)

पहले यह स्पष्ट कर दूँ कि ‘बोस’ के स्पीकर से सुभाष चंद्र बोस का कुछ लेना-देना नहीं है। लेकिन, सुभाष चंद्र बोस से संगीत जुड़ा है। आजाद हिंद फौज के जब कौमी तराना (राष्ट्रगान) की बात हुई, तो बोस को ‘वन्दे मातरम्’ और ‘जन गण मन’ दोनों ही क्लिष्ट और अभिजात्य लगे। उन्होंने कैप्टन आबिद अली और राम सिंह ठाकुर के साथ मिल कर इसका लोक-अनुवाद किया, और वही उनका राष्ट्रगान बना,

“शुभ सुख चैन की बरखा बरसे
भारत भाग है जागा
पंजाबसिंधगुजरातमराठा
द्राविड़ उत्कल बंगा

चंचल सागर, विंध, हिमालय,
नीला जमुना, गंगा

तेरे नित गुन गाएँ,
तुझ सा जीवन पाएँ,
हर तन पाए आशा,
सूरज बन कर जग पर चमके,
भारत नाम सुभागा

जय हो, जय हो, जय हो
जय जय जय हो।”

इसमें जो संगीत दिया जाना था, तो बोस ने कहा कि ऐसा न हो कि लोग सो जाएँ। ताल और सुर ऐसे हों कि गहरी नींद में सोए भी जाग जाएँ। तभी इसे पश्चिमी बीट्स और राग देस के मिश्रण से राम सिंह ठाकुर ने संगीत दिया। और इसी तरह इनका मार्चिंग गीत बना- ‘कदम कदम बढ़ाए जा’। इन दोनों गीतों के संगीत बिठाने में बोस का हाथ था। इसके अलावा भी आजाद हिंद फौज के कई गीत बने, जिस संकलन की आजादी के बाद कैसेट-सी.डी. भी आई।

हालिया बोस के प्रिय गीतों का संग्रह निकला जिसमें रबींद्र संगीत, विद्यापति गीत डाल कर बेचे गए। मुझे इसका कोई ज्ञान नहीं कि वाकई बोस की इन गीतों में ऐसी ही रुचि थी। लेकिन होगी ही। यह दोनों संगीत बंगाल में खूब सुने जाते थे। काजी नुजरूल इस्लाम को बोस ने कहा था, “आपके गीत ऐसे हैं कि युद्ध में लड़ते भी जोश आए और बंदी हुए तो भी”

और राम सिंह ठाकुर का तो खैर क्या कहूँ? कमाल के फौजी संगीतकार। उन्हें सुभाष जी ने अपनी जर्मनी से लाई वायलिन देकर कहा, “राम! यह वायलिन आजाद हिंदुस्तान में भी बजाना”

और उन्होंने आजाद भारत की आकाशवाणी में वह वायलिन बजायी भी।

#ragajourney

क्या पुस्तकालय अब किसी काम के नहीं? (Are libraries are obsolete?)

यह प्रश्न कई लोगों ने पूछा है, और मैंने भी पुस्तकालय में मिले लोगों से पूछा कि आप भला यहाँ क्यों खड़े हैं? एक ने कहा कि उनके घर का एक पौधा बारम्बार सूख रहा है, और उस पर एक किताब यहाँ थी जो गुम हो गयी। गूगल पर जितने टोटके थे, सब आजमा लिए। उन्हें दूसरे शहर के पुस्तकालय से किताब मंगा दी गयी। दरअसल ऐसी किताबें बाजार में नहीं मिलती कि इनकी बिक्री कम है (और इसलिए मँहगी है)। वहाँ थ्रिलर और रोमांस अधिक बिकते हैं। ग्रंथालय में ऐसी कई किताबें सहजता से मिल जाती है, जो ‘आउट ऑफ़ प्रिंट’ हो गयी।

अमरीका और यूरोप में हर व्यक्ति (बच्चे भी) के पास एक पुस्तकालय कार्ड होता ही है। भारत में भी सभी मुख्य शहरों में यह मुफ्त या नाम-मात्र फ़ीस पर उपलब्ध है। अमरीका के एक सर्वे में लगभग आधी जनसंख्या पुस्तकालय का इस्तेमाल करती है। यूरोप में भी पुस्तकालय अक्सर सिनेमा हॉल के साथ ही बनने लगे हैं, तो लोग आते-जाते रहते हैं। मुफ्त में दो किताब उठा ली। वह रखने गए तो दो और उठा ली। यह चक्र चलता रहता है।

आज के डिज़िटल युग में यह और सुलभ हो गया है। किताबें घर बैठे बुक हो जाती है। हाँ! यह जरूर है कि भारत जैसे देश में इसकी आदत घट गयी है। समय नहीं मिलता। हर दसवाँ आदमी एक ही किताब पढ़ रहा होता है, जो ट्रेंड में हो। ऐसे में पूछ उसी की होती है, जो ऐसी चीज जानता हो, जो ट्रेंड में नहीं हो। और उसका एकमात्र आसान स्रोत पुस्तकालय है।

अब पौधे सूख रहे हों, तो समस्या पौधे की तो नहीं ही है। हमें बस यह अपने आप से पूछना है कि पुस्तकालय कार्ड कहाँ बनेगा?

विविध भारती और रेडियो सीलॉन

कल यूँ ही हम दो मित्र ‘बिनाका गीत माला’ याद करने लगे। हमें लगा कि हमारे बच्चे जाने-अनजाने में भी ख़ास रफी-लता-मुकेश नहीं सुन पाएँगें। केबल टी.वी. के बाद वो कम सुने जाते हैं। न के बराबर।

पुराने संतोष (एक ब्रांड) रेडियो में हमारा कांटा ‘रेडियो सीलोन’ और बाद में ‘विविध भारती’ पर अटकने लगा। एक शॉर्ट-वेव पर, एक मीडीयम-वेव पर। वहाँ से कांटा हट जाता, तो बड़ी कठिनता से वापस पकड़ाता। मुझे लगता था ‘सीलोन’ भारत का शिलॉंग होगा। बाद में पता लगा कि ये श्रीलंका का है।

इसका इतिहास भी बड़ा रोचक था। कभी एक केस्कर साहब नामक मंत्री हुए। उन्होनें फिल्मी गानों पर पाबंदी कर दी, यह कहकर कि वो बकवास है। बस शास्त्रीय संगीत बजेगा। लोग ‘ऑल इंडिया रेडियो’ त्याग रेडियो सीलॉन सुनने लगे। और उन्ही दिनों अमीन सायनी साहब का उदय हुआ। फिर बाद में ‘बिनाका गीत माला’। बुजुर्ग बताते थे कि इसके हिट-लिस्ट में आने के लिए कई निर्देशक पीछे पड़ जाते। कहते कि लिस्ट ठीक से नहीं बनाई गई।

केस्कर साहब तो खैर बहुत पहले मान गए होंगें। पर विविध भारती पर बिनाका (बाद में सिबाका) मेरे ख्याल से 1990 के आस-पास आया। तब तक फौजी भाईयों के साथ ‘जयमाला’ हिट था। विविध भारती का रिसेप्शन भी अच्छा था। सीलॉन सुनना कम होने लगा।

मुझे (भी) यही लगता है कि ‘विविध भारती’ दरअसल ‘रेडियो सीलॉन’ को टक्कर देने आई होगी। और वह कामयाब भी रही, लेकिन अमीन सायनी की आवाज़ एक ऐसी ट्रेडमार्क बनी कि एकरस आवाज़ों के बदले बुलंद और स्पष्ट वक्ताओं की खोज शुरु हुई होगी। वही सिलसिला अब ‘बिग बॉस’ की आवाज़ तक चल रहा है। ‘वॉयस-ओवर’ जब पुरुष देते हैं तो मिमियाई सी या पतली आवाज ख़ास नहीं चलती, खुले गले की कम स्वरमान (लो पिच) वाली आवाज में ही दम नजर आता है। जबकि ऐसे आवाज़ विरले ही मिलते हैं।

आवाज़ की मानकता भले ही रेडियो सीलॉन से आयी हो, लेकिन विविधता में ‘विविध भारती’ बाजी मार गयी। जहाँ ‘रेडियो सीलॉन’ बस ‘बिनाका गीतमाला’ के दम पर रही, ‘विविध भारती’ ने झड़ी लगा दी। फौजी भाई की जयमाला, छायागीत, भूले बिसरे गीत.. लोगों को लगा कि जब इतना कुछ एक साथ मिल रहा है तो भला रेडियो सीलॉन क्यों सुनें?

दूसरी बात यह कि अमीन सायनी का जोड़ा सीलॉन के पास नहीं (कम) आया। लेकिन विविध भारती के पास एक से एक उद्घोषक आते गए। कमल शर्मा, ममता सिंह, अमरकान्त जी…न जाने कितने लोग तो पिछले दशक में भी रहे (और हैं) जबकि रेडियो अब डिज़िटल होता गया। ऐप्प बन गया। मुझे आज भी रेडियो सीलॉन याद आता है, लेकिन सुनता जब भी हूँ, ‘विविध भारती’ और ‘रागम’ चैनल ही हूँ। उसकी गुणवत्ता आज भी बरकरार है।

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संगीत और भोजन

संगीत और भोजन का अनन्य रिश्ता है। कहावत है, “भूखे भजन न होय गोपाला, ले लो अपनी कंठी माला”। पं. जसराज भी कहते हैं कि पहले चाय-सिंघाड़ा खिला के घंटों गवा लेते थे, अब लाख-दो लाख न दें तो कौन गाने जाए? गाने-बजाने वाले अक्सर खूब खाने वाले हुए। लताफ़त हुसैन ख़ान संगीतकार मदन मोहन जी को कहते थे, “तुम गाना कम बनाओ, और खाना अधिक। वैसे भी अधिक अच्छा वही बनाते हो।” अब सोच लीजिए इतने बड़े संगीतकार खाना आखिर कैसा बनाते होंगे कि गीतों से बेहतर कहा गया?

उस वक्त गाने-बजाने वाले अपना ख़ानसामा लिए भी घूमते थे। बड़े ग़ुलाम अली ख़ान तो पंद्रहबीस चपाती और एक पूरा मुर्गा देसी घी के साथ खाते, तभी वह बुलंद आवाज निकलती।

एक बार बंबई में देसी घी मिला, तो बाजारु घी लेकर आए। उन्होंने कहा कि इस घी खाकर आवाज भी बाजारु निकलेगी। पंजाब एक व्यक्ति को भेजा गया, वह घी लेकर आया, फिर खापी कर दोतीन दिन बाद गाने बैठे।

आगरा के एक उस्ताद रोज काजू-बादाम खाने वाले आदमी। जब बूढ़े हुए तो दाँत टूट गए थे, बेटे पीस कर खिलाते। एक दिन मूंगफली-चना पीस कर खिला दिया कि बुढ़ऊ क्या बूझेंगे? उन्होंने खाते ही थूक कर कहा, “नामुरादों! किसे ठग रहे हो? जो तीव्र मध्यम और शुद्घ मध्यम में फर्क बता दे, वह क्या मूँगफली और बादाम में फर्क न कर पाएगा?”

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छौंक

न्यूयॉर्कर में एक लेख पढ़ रहा था जिसमें ‘छौंक’ की व्याख्या है। लेख अच्छा है, लेकिन छौंक को पूर्णतया देशी कन्सेप्ट कहा जाए या इतालवी ड्रेसिंग या मेक्सिकन और थाई व्यंजनों में खरे मसालों के प्रयोग से जोड़ा जाए?

मुझे लगता है कि भारतीय ‘छौंक’ लगाना काफी मिनिमलिस्टिक है, कि बस दो-चार अवययों से संसार रच दिया जाता है। मिथिला में पचफोरन (जीरा, सरसों, मंगरैल, अजवायन, मेथी) हर घर में पहले से बना-बनाया मिल जाएगा। इसमें एक लाल मिर्च और घी डाल दीजिए, हलका गरम करिए, और डाल कर ढक दीजिए। छन क आवाज आयी, तो नाम पड़ गया छौंक। यही पंजाब का तड़का, गुजरात का वेगर और कर्नाटक का ओग्गराने है जो लेख में भी लिखा है। दक्खिन में तो खैर दसफोरन है। दालचीनी, करीपत्ता (हरा), धनिया के बीज और जाने क्या क्या!

मैं या और भी कई लोग छौंक का प्रयोग नहीं भी करते, और पहले ही खरे मसाले भूँज कर फिर सब्जी बनाते हैं। छौंक बस दाल तक सीमित है। जबकि पाश्चात्य व्यंजनों में यह बाद में ही पड़ता है, मक्खन में खरे मसाले, सरसों, हालापेनो आदि डाल कर। मछली पर भी कुछ ऐसे ही। वहीं थाई व्यंजनों में चूँकि रसदार व्यवस्था है, करी बनाने की, तो उसमें कुछ पहले, कुछ बाद में, सब पड़ता है। इसलिए छौंक पर भारत का एकाधिकार है, यह गौरव के लिए ठीक है, लेकिन कमो-बेश है हर जगह।

एक बात जरूर है कि छौंक की टाइमिंग, और स्वाद में मूलभूत परिवर्तन में भारतीय व्यंजन कहीं आगे निकल जाते हैं। यह मेटामॉर्फोसिस है। बिना छौंक के भोजन लारवा-प्यूपा है, छौंक पड़ते ही वह तितली बन जाती है। उसकी सतरंगी महक पसरने लगती है।

संदर्भित अंग्रेज़ी लेख- https://www.newyorker.com/…/chhonk-the-indian-spice-infusio…

#Culture #Food

जाने तेतरी: मनेर से सूरीनाम

पटना के पास एक जगह है मनेर। वहाँ एक दरग़ाह है मनेर शरीफ़ और मनेर के लड्डू भी मशहूर हैं। वहीं से एक महिला अपने बच्चे के साथ भाग कर कलकत्ता के रास्ते जहाज पर सूरीनाम पहुँच गयी। यह बात 1880 ई. की है। उस वक्त भारत में एक मुस्लिम महिला की स्थिति जैसी भी हो, पर अपने बच्चे को लेकर परिवार छोड़ कर सात समंदर पार भाग जाना हिम्मत का काम है।

कहते हैं, “पलायन नारी मुक्ति का द्वार है”। भागी हुई लड़कियाँ मुक्त हो जाती है।

वह महिला जानी तेतरी भी मुक्त हो गयी। उसने गन्ना खेतों में खूब मजदूरी की, अपना बच्चा भी पाला और एक हिंदू बच्चा भी गोद लिया। कुछ ही वर्षों में जानी उन मजदूरों की सरदारनी बन गयी, और लोग उससे सुझाव वगैरा लेने जाते। इतना ही नहीं, जानी मजदूरों के हक की लीडर भी बनी।

तेतरी के साथ लगभग चार सौ मजदूर एक स्कॉटिश बागान में काम करते, जहाँ के हालात बुरे थे। उन्हें कोल्हू के बैल की तरह काम कराया जाता, और खूब ज्यादतियाँ होती। एक दिन सब्र का बाँध टूट गया, और तेतरी-रामजनी ने मिल कर सत्याग्रह छेड़ दिया। फिरंगियों की फौज ने जब घेरा तो मजदूरों ने भी ढेले-बोतल उठा लिया और तेतरी ने समूह को लीड करते चिल्लाया, “आवा! हिम्मत है तो आवा।”

मजदूरों को घेर कर फायरिंग हुई, और एक गोली तेतरी की पीठ पर लगी। रामजनी नदी में कूद गए। तेतरी के साथ छह हिंदुस्तानी शहीद हुए।

वर्षों बाद जब मैं तेतरी की खोज में निकला, तो मालूम पड़ा कि वह भुला दी गयी थी। फिर एक हिंदुस्तानी ने तेतरी की लड़ाई वापस शुरु की। उनसे मैं मिला भी। आखिर एक अंग्रेज की मूर्ति को गिरा कर सूरीनाम की राजधानी में जानी तेतरी की मुर्ति स्थापित की गयी। यह बात भी छिड़ी कि इस्लाम में मूर्ति पूजा नहीं होती, उस पर सबने कहा, “ओ न हिन्दू हइ, न मुसलमान, ओ हमार हिंदुस्तानी माई हइ।”

#कुली_लाइन्स #बिदेसिया #गिरमिट #कन्त्राकी

#CoolieLines

पुस्तक का अमेजन लिंक – amzn.to/2Ufb8hw