Book Review : Chamanlal Kee Diary (Hindi)

Book Review : Chamanlal Kee Diary (Hindi)

Musingsite

15cover190Efront-495x792.jpg

Dr. Pravin Kumar Jha aka Vamagandhi has come out with a collection of satirical articles with his eponymous book (translation : Chamanlal’s Diary) that the author classifies as “Khilandar Sahitya“. Vamagandhi being on WordPress (here’s the blog), I got a review copy from the author himself. The book is in chaste Hindi and much as it seems weird to review it in English, let’s dive into it.

Chamanlal is an alias or alter-ego for the author whose travels and travails throughout the country and beyond have provided him experiences that make for good reading that’s equally hilarious and dark at times. The book is divided into 20 chapters, each standalone and drawing from some part of the contemporary Indian landscape. Some of the descriptions or words used are downright casteist or communalist but for a diary, this should be taken as standard fare. One cannot, and should…

View original post 289 more words

साला मैं तो लेखक बन गया

जो लोग मैथमेटिक्स (गणित) पढ़ते हैं, वो अपनी नोटबुक को अक्सर लाल-हरी धारियों से सजाते नहीं। सवाल पढ़ते हैं, और कीड़े-मकोड़े जैसे गुणा-भाग-सिम्बॉल बनाकर पता नहीं क्या-क्या लिख डालते हैं! मैंनें एक प्रयोग किया था सालों पहले। मैट्रिकुलेशन में गणित के हर सवाल का सजा-धजाकर उत्तर दिया। अल्जेब्रा के डिजाइनदार ब्रेकेट के बीच मुस्कुराते a, b, और c और ब्रैकेट के ठीक बाहर पहरा देते 2, 3। घुमावदार इंटिग्रल। अजी वाह! गणित में १०० में १०० आये थे, पर उस दिन के बात गणित नहीं पढ़ा। कभी नहीं। असल बात थी कि गणित सजने-धजने लिपस्टिक लगाने वाली सुंदरी नहीं, बल्कि वो अजीब सी सवालिया आँखों से घूरती बॉय-कट बालों वाली युवती है जो हाथ घुमा कर पटक देगी। मैं कट लिया।

मुझे लगा मैं संवेदनशील व्यक्ति हूँ, चिकित्सक ही बनूँ तो बेहतर। मुझे क्या पता था यहाँ संवेदना का चीरहरण हो जाएगा। मरीज कराहेगा, तो आप निश्चिंत केस हिस्टरी लंबी करते पूछेंगें, “आप सिगरेट या शराब तो नहीं पीते?” वो हाँ या ना जो भी कहेगा, दर्ज कर लेंगें और आगे सवाल पूछना जारी रखेंगें। महिलाओं को उनके मासिक और यौन संबंध के बारे में कैजुएली पूछेंगें आँखों से आँखों मिला कर। वो शरमाए तो दुबारा पूछेंगें। खैर, सफल रहा। स्पेशलिस्ट भी बना, और कभी मरीज या परिजनों से पिटा भी नहीं। 

लिखना शुरू कब किया ये मैटर नहीं करता। नानी को चिट्ठी लिखा या प्रेमिका को प्रेमपत्र, लिखता वैसे ही सजा-धजा कर। नानी के आँखों में आंसू कभी नहीं आए, बड़ी कड़क थी। पर मुस्कियाती जरूर। प्रेमिका ने पहले दो महिने पढ़े, फिर कहा तुम प्रेम करने आए हो या साहित्य झाड़ने? मैनें भी लिखना बंद कर दिया।

ब्लॉगर तो तब बना जब पता लगा ब्लॉग चीज क्या है? यहाँ हर कोई लेखक बना है। मैं भी बन गया। कोई पढ़े न पढ़े, खुद अपना ही ब्लॉग चार बार पढ़कर मुस्कियाता। लगता, वाह क्या लिखा है! 

असल परिक्षण पर अब उतरा हूँ, जब हिंदी किताब मार्केट में आयी। दोस्तों पर पुराने संबंध का बोझ था। सबको पढ़नी ही पड़ी ‘चमनलाल की डायरी’। दोस्त हैं भी सैकड़ों, जिनके कई रहस्य छुपाए बैठा हूँ। किताब खरीद लो, नहीं तो सारे चिट्ठे खोल दूँगा। कुछ ढीठ को छोड़कर सबने जेब ढीली की। 

बाकी बचे साहित्य-प्रेमी। अंग्रेजों के जमाने के जेलर। आधे अंग्रेजी की तरफ मुड़े, आधे सोशल मीडिया पर टिपटिपा रहे हैं। कोई प्रेमी बचा कहाँ हिंदी साहित्य का!

मेरे एक मित्र अक्सर कहते, “भाड़ में जाए दुनिया। हम बजाए हारमोनिया”. चलिए। फिर बजाया जाए। 

चमनलाल की डायरी

Vamagandhi’s book pre-order begins.

http://www.bookscamel.com/index.php?route=product/product&product_id=220&search=chamanlal+kee+diary

‘Chamanlal Kee Diary’ is a unique compilation of Hindi satires based on contemporary topics in India which author calls ‘Khilandar Sahitya’. Author packs powerful punches of humour in chaste Hindi on debatable and serious topics like homosexuality, reservation system, women empowerment, environment etc. Fictional protagonist Chamanlal seems to be a humorous side of author himself and story revolves across pan-India as well as American dreams. Stories seem pretty realistic as if his own experiences, but equally queer and humorous, striking the most where it matters.

चमनलाल जी का सफर यूँ तो हास्यव्यंग्य की शैली में ढला है, परंतु इनकी २० कथायें देश के भिन्नभिन्न जीवंत मुद्दों पर आधारित है. समलैंगिकता, आरक्षण, नारी सशक्तिकरण जैसे मुद्दों पर आधारित व्यंग्य से कुछ रोजमर्रा जीवन की समस्याओं पर चुटीले व्यंग्य. कुछ बाड़मेड़, कुछ खंडवा, कुछ बिहार, कुछ दक्खिन, कुछ दिल्ली, कुछ बिदेस. मिलाजुला के एक मजेदारफनराइडहै चमनलाल की डायरी.


For pre-order: Click here

http://www.bookscamel.com/index.php?route=product/product&product_id=220&search=chamanlal+kee+diary

The mutes and the mutants

Recently our Nobel laureate Kailash Satyarthi Jee tweeted,

जापान में एक वैज्ञानिक ने मुझे गर्व से कहा, “हमारी तरक्की का राज है कि हम विज्ञान, चिकित्सा व इंजीनियरींग अपनी भाषा में ही पढ़ते हैं. वाह”

(A scientist in Japan proudly told me, “The reason for our success is that we study science, medicine and engineering in our language. Wow!)

Surely Japanese would have narrated in English, but Satyarthi Jee (who otherwise tweets in English) made it a point to put it in devnagari script. Among celebrities, I usually follow Miss funny bone, one of my childhood crush.

If heart-throb Twinkle Khanna would have tweeted, I would have hardly cared but this man is a grounded social activist. And ofcourse people like Gandhi and Bhartendu Harishchandra told this long back.

What’s the thing about studying science in Hindi or Tamil? Would it really make a difference?

I studied science completely in english, and did pretty well. But, the language I am most comfortable in my village or small city or even big city milieu is Hindi. I did well in science, because my language was pretty okay too.

One of my hard-core villager friend could never do science in English. He kept edging me in Mathematics, but never in Physics. Man scored 99% in maths almost always, but 40-50% in science. Because maths didn’t have language. Ofcourse, I sailed to become a superspecialist doctor and he runs a small medicine shop in his village.

In one of my recent village visits, I bumped into him. We had a tea at his shabby country medicine shop. His adolescent kid asked something about, how the fan works? I told him about some ‘motor’ which makes it turn in chaste hindi. But, he kept propping one question after another and I laughed off. How would I remember so much of physics?

Then, my friend took charge. He began from simple concepts and flowed all the way till ‘फूरियर परिवर्तन’ (fourier transformation). He was drawing sinusoidal waves, using calculus. It was all like ‘the beautiful mind’. We both quit physics at same time, with him trailing way behind my marks. But, here is the genius explaining ‘भौतिकी’ (physics), rotting in a village shop!!

I practice medicine completely in Norsk in Norway. So the germans and americans who have migrated in this beautiful country. And, Norway has best health system in world as per stats.

Let’s see which sentence from medicine is easier to understand for hindi-speaking people,

Flexor digitorum profundus contracts the medial four interphalangeal joints of hand.”

Flexor digitorum profundus हाथ की चार उंगलियों के जोड़ों को खींचता है.”

I think many more would have excelled in medicine, if they just have used the language they speak.

We all have become mutants, and many have become mutes.

ज्वेल थीफ

इटली-यात्रा जिसने भी करी हो, पूरा वापस नहीं आया होगा. लुटना तय है। चाहे आपका अजीज कैमरा हो, या गॉगल्स। कुछ न कुछ इटली माता को चढ़ा के ही आना होगा। और ये कोई राजनैतिक व्यंग्य नहीं है, और न ही सिसली के किसी डॉन की कहानी। ये छिटपुट जेबकतरों और शौकिया चोरों से जुड़ी है। ये चोर आप में भी हो सकता है। गर अब तक नहीं करी तो आज कर लो। योजना बनाओ और ऐसे चुराओ की पकड़े न जा सको। कोई सबूत, कोई गवाह मत छोड़ना।

मैनें पहली चोरी कब की, क्यूँ की, याद नहीं, पर पकड़ा जरूर गया और खूब चपेत भी पड़ी। दूसरी दफा कुछ अक्ल आ गई थी, और एक मँजे चोर से मित्रता भी हुई। पढ़ाई-लिखाई का शौक था, भला जूते चुरा कर क्या करता? एक मित्र की नयी नवेली ‘वैशाली’ ब्रांड की सादी नोटबुक चुरा ली। अजी क्या कड़क पन्ने थे! पर जब भी लिखता, डरा रहता। जैसे कोई पास आता, झट से कूल्हों के नीचे दबा मुस्कुराने लगता। एकदम चोरों वाली हँसी। कभी नोटबुक को कक्षा में नहीं ले जाता। हमेशा बिस्तर के नीचे दबा के रखता।

पर जिनकी नोटबुक चोरी हुई, उन्होंने जासूस रख लिया। छात्रावास के हर लड़के की तलाशी शुरू हुई। कईयों के पास वैसी ही नोटबुक थी, पकड़े तो पकड़े कैसे? पर जैसे ही मेरे पास आया, मेरी जबान लड़खड़ाने लगी। जासूस ने भाँपा और देखा बिस्तर में एक उभार है। झट से नोटबुक खींच ली। बड़ी जिल्लत हुई। वहीं चपेत लगा देता, बुरा-भला कह देता, और बात थी। सबसे चाटू (boring) शिक्षक के पास ले गया। अटल गाँधीवादी। उनके नीति वचन घंटे भर चले। मैं चक्कर खा कर गिर पड़ा।

फिर लगा, चोरी भी एक कला है। चार्ल्स शोभराज पर किताब ले आया और भूरे गत्ते लगा कर पढ़ने लगा। नटवरलाल भी पढ़ डाला और जासूसों से टकराने के लिये शर्लॉक होम्स भी। अब चोरी बिल्कुल फूलप्रूफ होनी चाहिये. और आक्रमण भी बड़ा। पुणे की एक सबसे व्यस्त बेकरी की रेकी करनी शुरू की। वहाँ के बन-मस्के (bread-butter) बड़े मशहूर थे। जन्मदिन की पार्टी वहीं तय कर दी। सब खाये-पीये चल दिये। मैंनें दुकानदार की ओर विजयी मुस्कान दी और भाग कर मित्र की मोटरसाइकल पर बैठ गया। क्या लूट मचाई बन-मस्के की! पर एक खौफ दिल में पैठ गया। हजारों लोग रोज आते-जाते पर मेरी उस रस्ते से गुजरने की हिम्मत न होती।

किस्मत ही बुरी थी। नयी नवेली प्रेमिका को उसी बन-मस्के का शौक। मैं चाँद ला के दूँगा। न जी! बस वो बन-मस्का। कभी-कभी शक होता वो भी कोई भेदिया जासूस तो न थी। खैर, पुस्तकालय से देर निकले और अंधेरे में जैसे-तैसे पहुँचा। दुकानदार स्वभावत: मुस्कुराया और मेरी घिघ्घी बंध गयी। खुद ही बोल पड़ा, आपके पैसे देना भूल गया था। उसने भी शरारती निगाहों से देखा, और प्रेमिका ने शक की निगाहों से।

ऐसे ही कुछ और छोटे-मोटे हादसे हुए। उस जमाने में भी चाहे शोरूम से चड्डी चुरा कर भागो, ‘बीप’ जरूर बजता। बड़ी बेइज्जती होती।लगता कहाँ शैक्षिक नोटबुक की चोरी से चड्डी तक आ गया। चोर तो न बन सका, चोरी का स्तर भी निम्नतम। यहाँ तक कि ट्रेन में बाजू वाले का अखबार उठा कर पढ़ने लगा, वो भी चोर समझ बैठा।

शायद चोर भी भगवान बनाकर भेजते हैं। हर गधा चोर नहीं बन सकता। गधा क्या, मेरे जैसा शातिर भी नहीं। दुबारा समझा दूँ, गधा बस उपमा है। आप किसी गधे को नहीं पढ़ रहे। पता नहीं क्यूँ आपकी नजर भी उसी बन-मस्के वाले की याद दिलाती है जो मुझ पर मंद-मंद मुस्किया रहा था।

हमारे गाँव से कुछ दूर चोरों की बस्ती है। जब गाँव में छिट-पुट चोरी हुई तो मुखिया ने उनको बुलावा भिजवाया। सब चोर इकट्ठे हुए। गर्मी की छुट्टियाँ थी। मैं भी पंचायत में बैठा। अब चोरों की बात भी ठीक थी। यही उनका skill था। यही रोजी-रोटी। जो हम नहीं कर सकते, वो चुटकी में करते हैं। आखिर ये तय हुआ, हम चोरों को ५ रूपया प्रति घर देंगें। ताकि उनका चूल्हा जलता रहे। मीटिंग समाप्त हुई, तो मुखिया जी का चाँदी का पनबट्टा गायब। चोर झट से मुस्कियाते वापस कर गये। जी, हम तो कला दिखा रहे थे, अब चोरी करेंगें भी तो शौकिया प्रेक्टिस में।

अगली छुट्टियों में गया, तो चोरियाँ बंद। चोर आते, साथ चाय पीते और ५ रूपया लेकर जाते।

इच्छा होती इन चोरों से कुछ ट्रिक सीख लूँ। बस एक वो फिल्मी अंदाज में ‘लास वेगास’ के कैसिनो लूटने या लंदन से कोहिनूर उड़ाने की इच्छा है।

#experiments_with_truth@vamagandhi

उल्टी गंगा

जब से यूरोप आया, कचड़े छाँटने ने नाक में दम कर रखा है. कागज अलग, प्लास्टिक अलग, धातु अलग, खाद्य कचड़ा अलग, शीशा अलग. मतलब एक चिकेन तंदूरी और कुछ बीयर के कैन निपटाने के बाद उस कचड़े को छाँटने में नशा उतर जाए. कैन धातु है, उसका प्लास्टिक कवर, चिकेन की हड्डियाँ, सामने बिछे टिशू पेपर, और अभी-अभी फूटा शीशे का गिलास. सब अलग-अलग रास्ते चुनेंगें. ये कचड़ों का जातिवाद नहीं तो और क्या है?

जब प्लास्टिक के बदले पेपर के झोले वाली क्रांति आई, कितनी सब्जियाँ रास्ते की भेंट चढ़ गई. अब पेपर क्या उठायेगा मुग्दलनुमा लौकीयों, नुकीली भिंडी और मूलियों का भार? वो तो पोलीथीन का लचीलापन ही संभाल पाए. जूट के झोले खरीदे, पर उसे उठाने में बड़ी शर्मिंदगी होती. गेहूआँ रंग और रेशों से झांकती सब्जियाँ. इज्जत का फलूदा.

तर्क ये है कि आप कागज ‘रिसाइकल’ कर सकते हैं, प्लास्टिक नहीं. बिदेशों में तो शौच भी कागज से ही करते हैं. नाक पोछते हैं. फर्श पोछते हैं. सोचिये ‘रिसाइकल’ होकर आया और आप जिस अखबार को पढ़ रहे हों, उससे कोई शौच कर चुका हो. राम-राम.

और रिसाइकल करोगे भी कितना? आखिर तो पेड़ काटने ही होंगे, कागज के लिये. बहुगुणा जी होते तो चार चमेट मारते. ‘चिपको आंदोलन’ याद है न? पेड़ से चिपक जाते. मतलब न प्लास्टिक, न कागज. पर्यावरण-संरक्षण का मतलब है, सीधा मूली खेत से उखाड़ो और खरगोश की तरह वहीँ खा लो.

ऐसा नहीं कि पर्यावरण वालों से बैर है. बाकी समाज-सेवी क्या कम हैं? 

जब से केरल में साक्षरता बढ़ी, पूरा केरल पलायन कर गया. अब हर कोई पढ़-लिख गया तो वहाँ प्रतियोगिता ही इतनी हो गयी. कोई खाड़ी देश लंक लेकर भागा, तो कोई देश भर के हस्पतालों में सेट हो गया. जितनी साक्षरता है, उतने में तो नौकरी के लाले हैं. सब पढ़ गए तो भगवान ही मालिक. मेहनत करने वालों, पढ़ना-लिखना मत सीखो. तुम पढ़ गये, तो मेहनत कौन करेगा?

मेरे कुछ महिला-मित्र हैं नारी-सशक्तिकरण का झंडा लेकर. एक तो नारी जन्मजात शक्ति है, और ताकत दी तो चंड-मुंड-महिषासुर भाँति मारे जाओगे. खाने को खाना न होगा. पीने को पानी न होगा. कब तक उबले अंडों और ब्रेड पर गुजारा करोगे? कपड़ों से गंध आएगी, बर्तनों से बू. सारी बुद्धि छू.

मेरे बच्चों ने अंग्रेजी का एक गाना दिल से लगा रखा है. “वी डॉंट नीड नो एजुकेशन”. जब पढ़ने को कहो, गाने लगते हैं और पैर से ताल भी देते हैं. बाल-सशक्तिकरण में तो नोबेल मिल रहे हैं आजकल. बच्चा आपके सामने वो कश्मीर से लाया झूमर गेंद मार कर फोड़ दे. शीशे पूरे घर बिखर जाए. आपको कुछ नहीं कहना. बस मुस्कुराना है. ना ना! बिल्कुल पुराने दिन याद मत करना जब जरा पानी गिराने पर झट से एक चपेत पड़ती थी.

अजी क्यों धर्म और जातिवाद मिटाने पर लगे हो? पासपोर्ट में ‘उपनाम’ क्या लिखोगे? उपनाम तो छोड़ो, नाम क्या लोगे? अमर तो हिंदू हो गया, आमिर तो मुस्लिम. पूरा नोमेन्क्लेचर ही बदलना होगा. जो जैसा है ठीक है. और दलित-आरक्षण तो है ही न? बोलो नाम चाहिये या नौकरी? 

मिला जुला के धरती माँ को बचाने में समय क्यों व्यर्थ करें? माँ की गोद में बच्चे सू-सू पॉटी करते हैं. खुद ही पोंछते हैं क्या? मचाओ जितना गंध मचाना है. माँ सब संभाल लेगी.