आईडेंटीटी की खोज

उन दिनों नॉर्वे नया-नया आया था। किसी मरीज का एक काग़ज चाहिए था, तो एक पीले पुर्जे पर उसका नाम और उसका आई.डी. नंबर लिख कर सेक्रेट्री साहिबा को पकड़ा दिया। उन्होनें काग़ज ढूँढ दिए, और पुर्जा कचड़े के डब्बे में। जब सप्ताहांत पर कचड़ा उठाने लोग आए तो वो पुर्जा मिला होगा। वह पीला काग़ज का टुकड़ा बेशकीमती निकला। मुझे नोटिस मिला कि आपने किसी की ‘आईडेंटीटी’ लीक कर दी। वो तो धन्य वो कचड़े वाला जिसने पुर्जा लौटा दिया। अन्यथा जेल हो जाती।

अगली बार मैनें सोचा कि ई-मेल से ही भेजूँगा, पुर्जे पर लिख कर नहीं। फिर से नोटिस आ गया कि ई-मेल पर भी आई.डी. नहीं लिख सकते। वो भी सुरक्षित नहीं। वहाँ भी जेल हो जाएगी। आखिर गुप्त तरीका बताया गया, जो यहाँ नहीं बताऊँगा।

डॉक्टरों के हाथ में एक कुंजी होती है, जिसमें तमाम आई.डी. छुपी होती है। वो कुंजी संभालना जरूरी है। एक दफे और नोटिस आया, जब अपना कम्प्यूटर ताला खुला छोड़ निकल आया था। फिर आईडेंटीटी चोरी का डर।

एक दिन मजाक में एक मनेज़र साहब ने पूछा, “भारत में इस चोरी का भय नहीं?”

मैनें कहा, “पता नहीं। कभी ऐसा सुना नहीं।”

“तो फिर किस चोरी का महत्व है?”

“भारत तो बड़ा देश है। मेरे प्रांत में गर ‘माछ की झोरी’ (मछली की झोली) चोरी हो जाए, तो रूदन-क्रंदन संभव है।”

“फिर तो तुम हमारी तरह वाईकिंग के वंशज लगते हो। वो भी मछली के चक्कर में लड़ाई कर लेते थे।” और वो हंसने लगे।

………

हालिया दो किताबें पढ़ी। एक ‘हाफ़-अ-लाइफ़’ और दूसरी ‘मैज़िक सीड्स’। दोनों एक ही लेखक* कीहैं, जिसमें एकभारतीय विली रामचंद्रन पूरा जीवन अपनी पहचान (आईडेंटीटी) तलाशते रहते हैं।

भारत के विदेश मंत्रालय ने तीस हज़ार रूपए शुल्क पर एक स्कीम बनाई है, जिससे किसी भी भूले-बिछड़े प्रवासी की जड़ ढूँढ दी जाएगी। गर वो एक बार बनारस घाट घूम आएँ, वहाँ के पंडे ही पूरी कुंडली बांच दें। विदेश मंत्रालय क्या पहचान बताएगा? मैं अपनी आईडेंटीटी तो तभी सिमरिया की गंगा में बहा आया, जब गाँव से निकला। अब तो वो अस्थाई है। बदलती रहती है। कोई क्या चुराएगा?

*पोस्ट में किस लेखक की चर्चा है?

पंडित रविशंकर और विलायत खान

पंडित रविशंकर और विलायत खान में वास्तव में कुछ रंजिश थी या लोगों ने ऐसी रंजिश बना दी? कई कहानियाँ हैं, और कई गढ़ी भी गई।

१९५० में लाल किले में दोनों साथ बजाने बैठे। विलायत खान साब घराने से भी सीनीयर थे और तालीम से भी। पर पंडित रविशंकर अलाउद्दीन खान साहब के चेले थे और नेहरू जी का भी खास लगाव था। ज्यादा पॉपुलर थे, और सुभाषी भी। बजाने आते तो लोग अगुवाई करते। विलायत खान साहब के साथ क्या ऊँच-नीच हुई पता नहीं, पर उन्होनें कुछ चाल चली। उन्होनें वो झाला बजाया जो उनके घराने की खासियत थी। पं रविशंकर पीछे रह गए, और पब्लिक ने विलायत खान को बेहतर घोषित कर दिया, अखबारों ने भी। हालात यहाँ तक पहुँचे कि रविशंकर ने उन्हे ‘rematch’ का चैलेंज दे दिया, जो कभी शायद हुआ नहीं।

बाकी कोई कहता है कि विलायत खान ने एक रूपया ज्यादा फीस माँगी क्यूँकि वो सीनीयर थे। रविशंकर ने चाल खेली, और पैसे लेने से मना कर दिया। शर्त के अनुसार विलायत खान को बस एक रूपया पारितोषिक मिला।

रविशंकर आगे बढ़ते गए, विश्व में भारत का नाम किया। विलायत खान साहब अपने शर्तों पर जीते रहे। उनकी फीस इतनी ज्यादा थी, कि ऑल इंडिया रेडियो उनको afford नहीं कर पाती। फीस तो रविशंकर की भी ज्यादा थी, पर रविशंकर आखिर रविशंकर थे। लोग दिल खोलकर पैसे देते थे। रविशंकर को भारत रत्न भी मिला, और विलायत खान साहब ने पद्म-विभूषण लेने से गुस्से में मना कर दिया। किसी ने आग लगाई ब्राह्मण को प्राथमिकता मिली, मुस्लिम को नहीं। किसी ने कहा, रविशंकर अच्छी बंगाली बोलते हैं, और विलायत खान कलकत्ता में रहकर भी ठीक से नहीं बोल पाते।

मुझे दोनों पसंद हैं, मुझे कुछ खास संगीत का ज्ञान भी नहीं। रविशंकर के चेले सितार में नहीं, अनुष्का शंकर रीमिक्स वर्सन हैं वैसे। वहीं विलायत खान से कुछ कम शुजात खान नहीं बजा रहे? वो अपनी विरासत देकर गए। संगीत में विरासत छोड़ना, शिष्य को शिक्षा देना मायने रखता है। तो विलायत एक रूपया ज्यादा के हकदार जरूर हैं।

जब वो मरे, तो देश उन्हें भूल चुका था। सिवाय वाजपेयी जी के जो उनके फैन थे और प्रधानमंत्री भी। वो लूज़र कहीं से नहीं, कुछ लोग बस अपनी शर्तों पर जीना पसंद करते हैं।

मन्ना डे से मेरी मुलाकात

मन्ना डे से मेरी मुलाकात एक डॉक्टर-मरीज के रूप में हुई। मैं चुप-चाप काम करता रहा। ९० बरख की अवस्था में हड्डियाँ कमजोर हो गई थी, तो बैंगलूर में मेरे विभाग में जाँच के सिलसिले में आए थे। मेरे टेक्निसियन ने जाँच की, मैनें प्लेट देखी और रिपोर्ट बना दी। दरअसल मुझे इस हीन अवस्था में इस महान् आत्मा को देखने की इच्छा नहीं थी। लोग फोटो खिंचवा रहे थे, और मैं बस एक कोने में कागजी कारवाई कर रहा था। मुझे दरअसल किसी को स्टेशन या एयरपोर्ट पर सी-ऑफ करना पसंद नहीं। कोई अपना भी जब अंतिम अवस्था में होता है, मैं तटस्थ हो जाता हूँ। डॉक्टरी का एक साइड-ईफेक्ट है कि कुछ अपने घूम-फिर कर आपके आस-पास ही मरते हैं। वो आप पर, आपके मित्रों पर, आपके हस्पताल पर भरोसा करते हैं।
 
मन्ना डे से तो खैर कोई पारिवारिक निकटता नहीं थी, पर उनके घर का सबसे करीबी अस्पताल था तो शायद आए हों। एक शब्द भी नहीं बोले, और मैं चाहता था वो मूक ही रहें। मैनें तो आँख भी नहीं मिलाई, यह भी नहीं कहा कि मैं जीवन-भर आपके कैसेट जमा करता आया हूँ। बेसुरी आवाज में “पूछो न कैसे मैनें…” रियाज करता आया हूँ। वो शिथिल मनुष्य मन्ना डे थे ही नहीं। ही वाज़ जस्ट अन’दर पेशेंट।
 
मन्ना डे तो वो थे जिन्हें जवानी में भीमसेन जोशी से भिड़ा दिया गया था और जीतने को कहा गया था। मन्ना डे घबड़ा गए कि भला गुरू के सामने गाएँ तो गाएँ कैसे? पंडित जी तो प्लेबैक में थे, उन्हें हारना था, यही सीन था। पर हारे हुए जोशीजी को भी हराना सबके बस की नहीं। वो बस मन्ना कर सकते थे, और भारत भूषण के लिये आवाज दी। गाने के बाद पंडित जी ने कहा, “कहाँ फिल्मों में समय बरबाद कर रहे हो? मेरे साथ चलो।” मन्ना डे ने हाथ जोड़ दिए, क्षमा माँगने लगे।
 
यह संगीत का शास्त्रार्थ सुनना आवश्यक है। गजब है।
 

सुबह की चाय: राग बिलावल (अल्हैया बिलावल)

https://youtu.be/kESE7FmXrEg

यह आलेख तभी पढ़ें जब ऊपर दिए राग का लिंक सुन रहे हों। वो आलेख से कई गुणा मधुर और प्रॉडक्टिव होगा। इस राग की वजह से सुबह स्वस्थ मुस्कुराती रहती है। जैसे इसी राग में ‘बावर्ची’ फिल्म का गीत “भोर आई गया अंधियारा..”।* चाय के साथ सुनें, या सुबह ऑफ़ीस के सफर में, या पूजा-पाठ के बैकग्राउंड में, या बिस्तर पर अखबार पढ़ते, यह अपना चयन है।

ऊपर की प्रस्तुति पलुस्कर जी की आवाज में है। ग्वालियर घराने से मराठी गायक, जो महज 34 वर्ष जीए, पर इतने छोटे जीवन में गायकी के कई पहलू छू गए। मैं एक बार उन्हें ‘मोज़ार्ट’ लिख चुका हूँ।

यह प्रस्तुति शुरू होती है आलाप से, जिसमें गायक ‘विलंबित’ यानी धीमी गति (slow rhythm) में कुछ स्वरों को गा रहे हैं। ग रे ग प ध नी साss। आप कहेंगें, ये कब गाया?

गाया जा रहा है, पर तोड़-तोड़ कर या जोड़ों में। कभी बस गंधार (ग) स्वर में आलाप। पंचम (प) को थोड़ा आंदोलित (हिला-डुला) कर और लंबे लेकिन सुगम तरीके से धैवत (ध) में। और धैवत से ही उठा कर ‘नी सा’ तक। यह विस्तार (improvisation) अलग-अलग तरह से है।** और यह भी ध्यान दें कि स्वर ऊपर चढ़ता है, और उतरता है। आरोह और अवरोह। “दैयाs” जो आलाप का key-word है, वो इस प्रस्तुति का चौराहा (intersection)। यहाँ सुस्ता कर गायक अगली राह पकड़ते हैं।

यू-ट्यूब ने शीर्षक में “दैया कहाँ गए लोग, ब्रज के बसय्या” लिखा जो गलत है। यह अलग बंदिश है। ग्वालियर घराने और मराठीयों का ट्रेडमार्क-

“कवन बँटरिया गइलो, माई देहो बताय।
मैं घरवा गत माइ, चूरिया भइलवा।

लेने गई सौदा रे, अरे हटवारे।
इतनी गली में गइलो कवनवा।”

किशोरी अमोनकर जी का इसी बंदिश में गायन जरूर सुनें किसी सुबह। कवन बँटरिया गइलोsss
…….
____________________
*पटियाला घराना से जुड़ी और फिल्म-स्टार गोविंदा की मां निर्मला जी ने मन्ना डे के साथ गाया है, और ऐक्टिंग भी की है।
**आलाप में मध्यम (म) भी लगा है, पर कम।

Others from Morning tea playlist (Kavan Batariya):
1. रामाश्रय झा ‘रामरंग’- http://www.parrikar.org/mus…/bilawal/jha_alhaiyyabilawal.mp3
2. किशोरी अमोनकर – https://youtu.be/fnJyIW_dJ18
3. कुमार गंधर्व – https://youtu.be/RQcX6WLOoa8
4. पं. नारायणराव व्यास – https://youtu.be/d9aN95g8YVA

(आलेख एक श्रोता का अपना अनुभव है, संगीतकार का नहीं।)

#ragajourney

ई-बुक

किताब से अर्थ तब तक जुड़ा है, जब तक कॉपीराइट, छपाई, वितरण और रॉयल्टी इत्यादि जुड़ी है। और वो ठीक भी है। पर औसतन पांच सौ पृष्ठ की कथेतर (इतिहास इत्यादि) की कीमत सात-आठ सौ रूपए पड़ जाती है। गर कई लेखकों ने लिखा तो हज़ार से अधिक भी। मैं पहले एक-दो किताब ऑर्डर करता, वो लंदन वगैरा से घूमती हफ्ते भर में आती, गर लोकप्रिय न रही हो। अब वही किताबें ‘ई-बुक’ या ‘डिज़िटल पुस्तकालय’ की सदस्यता से लगभग आधे से दहाई दाम पर मिल जाने लगी। यानी उसी खर्च पर एक के बदले दस किताबें।

इसमें गणित सीधा है। छपाई और वितरण काफी हद तक बायपास हो गया, तो दाम घट गया। मेरे लिए सुविधा यह है कि जब भी फलां किताब से फलां संदर्भ उठाना हुआ, एक सर्च बटन से पन्ना खुल गया गर वो मेरी डिज़िटल लाइब्रेरी में है। चाहे मैं कहीं भी बैठा हूँ।

किताब की सुगंध वाला तर्क ठीक है। पर वो सुगंध अगर किसी इत्र के डब्बे में डाल साथ रख ली जाए? पन्ने की खरखराहट के लिए अब ऐप्प में ‘फ्लिप’ करते वक्त ‘क्लक’ आवाज़ निकलने लगी है। आंखों की हानि पर खास नहीं कहूँगा। वो फॉन्ट और रोशनी पर निर्भर करता है। यह पोस्ट मैं जिस माध्यम से लिख रहा हूँ, उसको पढ़ने वाले लोग पहले से इस नशे में लिप्त हैं। वो काग़ज से अधिक हाथ में एक यंत्र लिए चलते हैं, जिसे बोल-चाल की भाषा में मोबाइल कहते हैं। गर बीच-बीच में दो-चार पन्ने पलटते रहें, तो किताबें पढ़ी जाती रहेगी।

……

‘अमेज़न अनलिमिटेड’ खास उपयोगी नहीं, बशर्तें कि अश्लील या प्रेरणादायक ‘मोटापा कैसे कम करें’ इत्यादि पढ़नी हो। कुछ ढंग की किताबें नहीं है। ‘अमेज़न प्राईम’ बेहतर होगी क्योंकि डिलिवरी मुफ्त हो जाती है।

Notnul में कुछ दुर्लभ और ऊँची गुणवत्ता की पत्रिकाएँ और कथेतर किताबें मिली। मुझे अच्छी लगी। और आशाएँ हैं।

Juggernaut में सबसे अधिक हिंदी की मुफ्त किताबें नजर आती हैं। मंटो, मन्नू भंडारी, प्रेमचंद, शरतचंद्र, ब्रजेश्वर मदान, जयशंकर प्रसाद..कई लोगों की किताबें।

Kindle (मोबाइल ऐप्प) में अचानक राजकमल और हिंद-युग्म ने कई किताबें डालनी शुरू की है। बाकियों ने भी डाली हो, पता नहीं। पर फॉन्ट मनचाहा चुनो, किताबें सस्ती, और डिलिवरी सेकंड से भी कम समय में।

Storytel ऐप्प पर अठारह घंटे की ‘राग दरबारी’ का ऑडियो डालने के लिए राजकमल को साधुवाद। मेरे विचार से राजकमल की सौ किताबें ऑडियो पर आ गई। मैं ऑडियो कभी सुनता नहीं, पर ‘काशी का अस्सी’ शायद सुन लूँ।

‘गद्य-कोश’ और ‘कविता-कोश’ में तो लगभग सभी हैं। पर फॉन्ट छोटी नजर आती है, जिसे बदलते रहना पड़ता है। पर जो मुफ्त में सब पढ़ जाना चाहते हैं, उनके लिए बढ़िया है।

…..

कोई भी ई-बुक प्रकाशक लेखक को औसतन 40-60 प्रतिशत रॉयल्टी देते हैं। यह श्रम का मार्क्सवादी विभाजन है, जो श्रम के अनुरूप मिलता है। मसलन ई-बुक में प्रकाशक सिवाय कुछ सॉफ्टवेयर कार्य के अतिरिक्त कुछ खास नहीं करते। किताब ऑनलाईन ही वितरित होती है, तो दौड़-भाग और स्टॉल वितरण नहीं है।

लेकिन, इसमें एक बड़ी समस्या है, संपादन का न होना। गर किताबें संपादित हों, तो लेखक का प्रतिशत घटता है। और यह होना भी चाहिए। भारतीय ई-बुक प्रकाशक संपादन या मार्केटिंग पर कम ध्यान देते रहे हैं, सिवाय ‘जगरनॉट’ सरीखों के। जाहिर है, वहाँ रॉयल्टी घट कर 10-20 प्रतिशत तक आ जाएगी, जो प्रिंट के बराबर है। पश्चिमी संपादक यह पहले से करते आ रहे हैं। मेडिकल की तमाम मोटी किताबें चित्र-सहित और ‘इंटरैक्टिव’ रूप में पहले से ‘ई-बुक’ रूप में प्रचलित रही हैं। बल्कि, वो खुद ही अपडेट भी होती रहती है।

यह बात ध्यान देने योग्य है कि ‘ई-बुक’ लेखक या प्रकाशक कभी भी ‘अपडेट’ कर सकते हैं। यह नहीं कि महज कुछ सुधारों के लिए नया संस्करण महीनों चक्कर काट रहा है। आपने किताब खरीदी, आपके पास हमेशा ‘अपडेटेड’ किताब रहेगी। यह सब कोई नयी बात नहीं। यह लगभग एक दशक से चल रहा है। पूरी की पूरी पुस्तकालय ही डिज़िटल कर दी गयी, भारत में भी। जो पीछे रह गए, वो काग़जी किताब बिक्री में भी पीछे ही हैं।

किंडल पर कैसे करते हैं बुक प्रकाशित

FB Promoकिंडल पर कोई भी बुक प्रकाशित कर सकता है। आप चाहे तो यूँ ही किसी बच्चे से की-बोर्ड पर रगड़वा लें, और kdp.amazon.com पर जाकर डाल दें, छप जाएगा। उनके पास कोई संपादकीय बोर्ड नहीं है। इसमें अपने सामान की जिम्मेदारी लेखक की ही है। किंडल यह शुरूआती काम मुफ्त में करता है। हाँ! गर यह कचरा बिक गया, तो हिस्सेदारी लेता है। कुछ दोस्त-यार कचरा खरीद भी लेंगें, और ‘शून्य’ पूंजी लगाकर सौ-दो सौ रूपए के मालिक आप हो लेंगें। तो ‘कैसे छापें?’ का उत्तर यही है, कि फलां साइट पर जाएँ, वहाँ अपनी पांडुलिपि अपलोड करें, एक कवर चुन लें, और छाप लें। पांडुलिपि हिंदी में ‘यूनीकोड’ या एक जैसी फॉन्ट में हो, एलाइनमेंट वगैरा न हो, हर अध्याय नए पृष्ठ से शुरू हो, और ‘preview’ कर देख लें कि सब ठीक है या नहीं। चौबीस घंटे के अंदर आप विश्व के सभी अमेज़न पर होंगें। आप कभी भी कोई वर्तनी-दोष या चाहें तो पूरा कन्टेंट ही बदल सकते हैं।

अब प्रश्न यह है कि गर अच्छा लिखा तो बढ़िया प्रकाशक को क्यों न दें? और गर घटिया लिखा तो छापें ही क्यों? इसके बिंदुवार उत्तर देता हूँ-

1. 50 हजार शब्द से कम लिखा प्रकाशक अक्सर लेते नहीं। कथा-संग्रह भी अच्छे प्रकाशक ऐरू-गैरू का नहीं छापते। ‘प्रतिनिधि कहानियाँ’ नामचीन लोगों की ही आती हैं। गर आपके पास ऐसा माल है, और अच्छा लिखा है, तो कागज न बरबाद करें, डिज़िटल डाल दें। पतली किताब है, लोग पढ़ लेंगें।
2. आपकी लिखने की गति अगर बहुत ही ज्यादा है, कि हर महीने एक किताब रगड़ देते हैं, तो इतने किताब छपने से रहे। अच्छे प्रकाशक एक किताब पर छह महीने से कुछ वर्ष तक लगा सकते हैं। इतने में आपने बीस किताबें लिख दी, जो बीस वर्ष में छपेगी। आप रहेंगें भी या नहीं, पता नहीं। तो आंक लें कि आपने क्या लिखा जिसमें वक्त लगा, और अद्भुत् लिख गए। और क्या लिखा, जो पठनीय है, पर छपनीय नहीं। उस हिसाब से बांट लें।
3. कविता-संग्रह मेरा मानना है कि डिज़िटल ही हो। हालांकि कवियों को सम्मान की भी अपेक्षा होती है, जो प्रकाशक बेहतर दिलवाते हैं। पर बिक्री के हिसाब से फिलहाल मुझे यह प्रकाशन पर बोझ लगता है। जो कविता-प्रेमी हैं, वो डिज़िटल में भी एक-एक कविता का खूब लुत्फ लेंगें। पर मैं कवि नहीं, इसलिए यह कवि ही जानें।
4. लुगदी लेखन, क्राईम थ्रिलर, सीरीज़ लेखन, अश्लील लेखन के नए लेखकों के लिए किंडल गजब का अवसर हो सकता है। हर किसी को मेरठ के प्रकाशक नहीं मिलते, जो एकमुश्त बड़ी रकम देकर चलता करें। अब वो जमाना गया। इंटरनेट पर अंग्रेजी लुगदी खूब पढ़ी जाती है। आप पॉपुलर हुए, और गर धड़ाधड़ निकालें, तो खूब चलेगी।
5. रोचक कथेतर लेखन जैसे फिल्म, खेल, संगीत. इतिहास इत्यादि भी बढ़िया चल सकते हैं। बशर्तें कि आप ठीक-ठाक विशेषज्ञ हों।

पर किंडल से मिलेगा क्या?

किंडल या कोई भी ई-बुक प्रकाशक (जगरनॉट, नॉटनुल, पोथी इत्यादि) मोटी और पारदर्शी रॉयल्टी देते हैं। 35 से 70 प्रतिशत तक। आम प्रकाशक 10 प्रतिशत देते हैं। यानी उधर सात बिकी, इधर एक, बराबर। किंडल की एक और स्कीम है- ‘kdp select’ जिसमें जुड़ने के बाद आपकी किताब ‘kindle unlimited’ वालों को मुफ्त मिलेगी, पर आपको 70 प्रतिशत रॉयल्टी मिलती रहेगी। फर्ज करिए कि भारत में कई लोगों ने यह unlimited ले ली, और आपकी किताब बस यूँ ही मुफ्त के नाम पर रख ली। वो चाहें एक पन्ना पढ़ पटक दें, आपको पैसे मिल गए। यह पूरा पारदर्शी है। आप real time देख सकते हैं कि कितनी बिकी, कितने पन्ने आज पढ़े गए, और आपने कितने कमाए। इतना ही नहीं kdpselect का एक ग्लोबल फंड है, जिसकी रॉयल्टी भी अलग से मिलेगी।

क्या भारत के लिए उपयुक्त है? 

इसका जवाब पता नहीं। पर जब पूरी दुनिया में चल ही रहा है तो भारत क्या मंगल ग्रह से है? अंग्रेजी पढ़ने वाला बड़ा वर्ग पिछले पांच वर्षों से भारत में भी किंडल पर किताब पढ़ रहे हैं। मैं स्वयं खूंखार किंडल पाठक हूँ। इतिहास से पॉर्न तक पढ़ता हूँ। हिंदी अब आनी शुरू हुई है, पांच वर्ष बाद असर दिखेगा ही।

यह कार्य कैसे बेहतर किया जाए?

लिखा अच्छा जाए। ‘प्रूफ़-रीड’ अच्छी कराई जाए। ऑनलाइन मार्केटिंग टूल का उपयोग किया जाए। काबिल ग्राफिक डिज़ाइनर की भी मदद ली जाए। और उनसे संपर्क करें, जो यह कार्य करते रहे हैं।

Reproduced from author’s facebook account. This column has been also published on http://www.nayaharyana.com

भारतीय त्यौहार

Originally written by Mohandas K. Gandhi. Translation by Praveen Jha ‘Vamagandhi’

मार्च, १८९१

अभी ईस्टर का वक्त है तो सोचा कुछ ऐसे त्यौहारों पर लिखूँ, जो इस वक्त भारत में होते हैं, पर उनको समझना आपके लिए शुरूआत में कठिन होगा। इसलिए शुरूआत दीवाली से करता हूँ, जो ईस्टर से काफी बड़ा उत्सव है।

दीवाली हर्षोल्लास के रूप में आपके क्रिसमस के बराबर समझ लें। यह हिंदू कैलेंडर के आखिरी महिनों, या आपके कैलेंडर में नवंबर में आता है। यह सामाजिक और धार्मिक उत्सव है, जो महीना भर चलता है। अश्विन मास (हिंदू कैलेंडर का बारहवाँ महीना) की पहली तारीख को बच्चे पटाखों से खेलकर दीवाली का आग़ाज करते हैं। पहले नौ दिन नवरात्र कहलाता है, जब गरबी खेला जाता है।

बीसतीस लोग मिल कर एक बड़ा घेरा बनाते हैं, और बीच में एक रोशनी के लिए लैंप रखा होता है। वहीं केंद्र में एक व्यक्ति बैठ कर कुछ लोकगीत या छंद कहता है। जैसे वो गाता है, बाकी लोग कुछ झुक कर ताली बजाते वह दोहराते हैं, और गोलगोल घूमते हैं। गरबी सुनने का अलग ही आनंद है।

हालांकि इस गरबी में पुरूष ही होते हैं। महिलाओं की गरबी नहीं होती या अलग से होती है। कुछ परिवारों में व्रत की भी परंपरा है। घर में एक ही व्यक्ति व्रत रख ले, काफी है। यह व्रत रखने वाला बस एक ही वक्त शाम को भोजन करता है। कई लोग फल या कंद दिन में खाते हैं।

दसवाँ दिन दशहरा कहलाता है, जब मित्र एकदूसरे के घर भोजन करते हैं। मिठाई बँटती है। दशहरा को छोड़ बाकी दिन रात को ही उत्सव होता है। दशहरा के बाद कुछ पंद्रह दिन शांति होती है, हालांकि महिलाएँ मिठाई वगैरा बनाने में व्यस्त होती है। भारत में उच्च कुल की महिलाएँ भी भोजन खुद ही बनाती हैं। भारतीय स्त्रियों के लिए पाककला में निपुणता एक गौरव का विषय है।

गीतउत्सव बिताते हम अश्विन मास के तेरहवें दिन पर पहुँचते हैं, जिसेधनतेरसकहते हैं। यह धन की देवी लक्ष्मी की पूजा है। अमीर लोग तमाम गहने, हीरे, जवाहरात, सिक्के एक संदूक में रखते हैं। उसको यह पूजन के लिए रखते हैं, खर्च नहीं करते। कई लोग दूध और जल से सिक्कों को धो कर फूल भी चढ़ाते हैं।

चौदहवाँ दिनकाली चौदशहै। इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठना होता है, और आलसी लोग भी इस दिन सुबह जरूर नहाते हैं। माँएँ बच्चों को जबरदस्ती उठा कर ठंड में नहलातीं हैं। कहते हैं, इस रात श्मशान में भूत घूमने आते हैं। जो भूतप्रेत में विश्वास करते हैं, वो अपने मित्र भूतों से मिलने जा सकते हैं। जो डरपोक लोग हैं, वो कालीचौदश की रात नहीं निकलते।

आह! पंद्रहवां दिन गया और आज दीवाली की सुबह। आज पटाखे फोड़े जाएँगें। आज कोई उधार नहीं देगा, और कोई लेगा। सब लेनदेन एक रात पहले ही निपटाया जाएगा।

आप चौराहे पर खड़े हैं, सामने से एक अहीर दुधियासफेद वस्त्र में चल कर रहा है। अपनी दाढ़ी के किनारे के बालों को सलीके से पगड़ी के अंदर खोंसे, कुछ टूटेफूटे लोकगीत गाते। उसके पीछे गायबैल के झुंड, जिनके सींग लाल और हरे रंगे हैं और चांदी की परत चढ़ी है। उनके पीछे सर पर मटके एक गद्दे पर टिकाए अहीरन महिलाएँ। आप सोचेंगें उन मटकों में है क्या? और तभी छलक कर कुछ दूध गिर पड़ेगा।

तभी एक विशाल काया का आदमी दिखेगा। बड़ी पगड़ी, और मोटी मूँछें। पगड़ी में एक लंबी कलम की डंडी खोंसी हुई। और कमर में एक चांदी कलर का कपड़ा जिस पर स्याहदानी टिकी है। वह साहूकार है।

आज हर तरह के लोग इस उत्सव में सरीक हैं।

रात हो गई है। गलियाँ रोशनी से चौंधिया रही है। आपके  रीजेंट स्ट्रीट या ऑक्सफॉर्ड स्ट्रीट जिसने नहीं देखा, उसके लिए यह सचमुच चौंधियाने वाली है, हालांकि आपके क्रिस्टल पैलेस के समकक्ष शायद बस बॉम्बे में हो। पुरूष, स्त्रियाँ और बच्चे रंगबिरंगे कपड़ों में घूम रहे हैं, जो इस रोशनी में सतरंगी चमक रहे हैं। आज विद्या की देवी सरस्वती की पूजा भी है। व्यापारी आज अपनी बहीखाता फिर से शुरू करते हैं, पहले पन्ने से। पुरोहित ब्राह्मण कुछ मंत्र पढ़ रहे हैं। पूजा समाप्त होते ही अधीर बच्चे पटाखे फोड़ना शुरू कर देते हैं। चूँकि यह एक नियत समय होता है, हर गली के पटाखे एक साथ बजने लगते हैं। जो धार्मिक श्रद्धालु व्यक्ति हैं, वो मंदिर जाते हैं, पर मंदिर में भी आज चमकदमक ही चारों तरफ है।

अगले दिन, यानी नए वर्ष पर सब एक दूसरे के घर जाते हैं। उस दिन रसोई में आग नहीं जलती, और पिछली रात तैयार किया ठंडा खाना कई घरों में खाते हैं। पर खाने की कमी नहीं, कितना भी खाओ, खत्म नहीं कर पाएँगें। जो धनी परिवार हैं, वह तरहतरह के पकवान और सब्जियाँ खरीद कर खाते हैं।

नए वर्ष के दूसरे दिन कुछ शांति होती है। रसोई में आग जलाई जाती है। अब खाना भी हल्का होता है, क्योंकि पिछले दिन गरिष्ठ भोजन था। कुछ शरारती लड़कों के अतिरिक्त अब कोई पटाखे नहीं फोड़ता। अब दिए भी कम जलते हैं। दीवाली अब समाप्त होता है।

अब समझते हैं कि दीवाली के महीने से भारत के समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है, और लोग कैसे अनायास ही कितनी आवश्यक चीजें कर लेते हैं? पहली बात कि परिवार के लोग एक खास स्थान पर मिलजुल लेते हैं। पति पूरे वर्ष भले ही काम की वजह से दूर रहा हो, इस अवसर पर पत्नी से मिलने जाता है। पिता अपने बच्चों से मिलने जाते हैं। बच्चे जो बाहर पढ़ रहे हैं, वो लौट आते हैं। जिससे जो बन पड़ा, नए कपड़े पहनते हैं। धनी लोग नए गहने बनवाते हैं। यहां तक कि पुराने झगड़े भी भुला दिए जाते हैं।

घरों की साफसफाई होती है, रंगाईपुताई भी। पुराने फर्नीचर चमकाए जाते हैं। पुराने कर्ज भी कई लोग उतार देते हैं। लोग अक्सर एक एक नए बर्तन जरूर खरीदते हैं। दानपुण्य होता है। जो लोग धर्म में कम रूचि रखते हैं, वो भी मंदिर जाने लगते हैं, पूजापाठ करते हैं।

त्यौहार के समय कोई झगड़ना नहीं चाहता, और गालियाँ नहीं देता, एक बुरी आदत जो खासकर समाज के निचले तबके में व्यापक है। कम शब्दों में कहें, तो यह शांति और उल्लास का समय है। तो यह जो आपको अंधविश्वास नजर आता है, उसके अंदर कई निहित गुण छुपे हैं जो एक बेहतर समाज के निर्माण में सहायक हैं।

दीवाली की छुट्टियाँ भारत में एक ही समय होती है, पर मनाने के तरीके अलग हैं, तो मेरा विवरण पूरे भारत के लिए एक नहीं। अब आप इसकी बुराइयाँ निकालेंगें तो निकल ही आएँगें, पर बुरे गुणों को परे करना और अच्छे गुणों को देखना ही एक स्वस्थ मानसिकता है।

दीवाली के बाद जो बड़ा त्यौहार है, वो है होली। होली आपके ईस्टर के आसपास के समय में होता है। हिंदू कैलेंडर से फाल्गुण पूर्णिमा के दिन। यह वसंत का समय है। पेड़ों में कोपलें फूट रहे हैं। गरम कपड़े लोगों ने उतार फेंकें। वसंत की सुंदरता मंदिरों में भी नजर आएगी। आप जैसे ही मंदिर में कदम रखेंगें (अभी सिर्फ हिंदू ही प्रवेश कर सकते हैं), आपको फूलों की खूशबू मिलेगी। भक्त ठाकुरजी (भगवान) के लिए सीढ़ीयों पर फूलों की माला गांथ रहे हैं। गुलाब, चमेली, मोगरा। जैसे ही दर्शन के लिए पट खुलेगा, आपको फव्वारे नजर आएँगें। एक अद्भुत् सुगंध। ठाकुरजी हल्के रंग के कपड़ों से आभूषित हैं। फूलमालाओं में छुपे ठाकुरजी को देखना कठिन हो रहा है। उन्हें झूलाया जा रहा है। और झूले में भी हरे सुगंधित पत्ते बिखरे हैं।

मंदिर के बाहर उतनी मर्यादा नहीं। होली के पंद्रह दिन पूर्व अशिष्ट भाषा में बात करते लोग मिल सकते हैं। छोटे गांवों में महिलाएँ कीचड़ में चलती दिखती हैं। उन पर भद्दी टिप्पणियाँ करते लोग। पुरूषों का भी वही हाल होता है। लोगों ने अपने गुट बना रखे हैं। और एक गुट दूसरे गुट से अपशब्दों की प्रतिद्वंद्विता करता है। भद्दे गीतों की। इस द्वंद्व में बस पुरूष हैं, महिलाएँ नहीं।

दरअसल इस महीने में अश्लील बातें करना बुरा नहीं माना जाता। लोग एक दूसरे पर ढेले भी मारते हैं। एक दूसरे पर कीचड़ फेंकते हैं, इसलिए सफेद कपड़े पहनें।  होली के दिन तक तो यह चरम पर पहुँच जाता है। आप घर में हों, या बाहर, अश्लील बातें ही सुनाई देगी। और गलती से किसी दोस्त के घर गए तो पूरे कीचड़ और पानी से नहला दिए जाएँगें।

होली की शाम लकड़ी या गोबर की एक बड़ी ढेर जलायी जाती है। कभीकभी यह ढेर २४ फीट से भी ऊंची, और लकड़ियाँ मोटी होती है। सातआठ दिन तक आग जलती रहती है। आखिर लोग इस पर पानी गरम करते हैं, और वही पानी डाल कर इसे बुझा देते हैं।

आपको मैनें पहले बताया होली में अश्लील वातावरण के संबंध में। पर शिक्षा और सतत विकास के बाद इसमें अब बदलाव रहा है। अमीर और संभ्रांत लोग होली में अश्लीलता नहीं लाते। कीचड़ के बदले रंग का इस्तेमाल करते हैं। बाल्टी भर पानी के बदले छोटी पिचकारी। नारंगी रंग का पानी सबसे अधिक प्रयोग होता है। यहकेसुदा’ * फूल के पत्तों से तैयार होता है। कुछ अधिक अमीर गुलाब जल का भी प्रयोग करते हैं। मित्र और परिवारजन मिल कर भोजन वगैरा करते हैं।

दीवाली और होली में एक पवित्र और अश्लील का अलग ही विरोधाभासी संबंध है। दीवाली कई दिनों के व्रत वाले महीने के बाद आता है, तो उस दिन भोजन का अलग ही आनंद होता है। होली इसके ठीक विपरीत खूब खाएपीए शीतकालीन महीनों के बाद आता है। होली में अश्लील गीत, तो दीवाली में पवित्र मंत्रोच्चार और भजन। दीवाली में ठंडे मोटे कपड़े, तो होली में पतले कपड़े या नंगधड़ंग लोग। दीवाली साल के सबसे अंधेरे दिनों में, तो होली फाल्गुण की रोशन पूर्णिमा में। एक में दिए जलाए जाते हैं, और दूसरे में इतनी रोशनी है कि सब बुझा दिए जाते हैं।