श्रद्धांजलि: गिरिराज किशोर

कहानियाँ हमारे इर्द-गिर्द ही जन्म लेती है। सहजता से। जिस दौर में गिरिराज किशोर जी की कहानियाँ सामने आयी होंगी, यानी साठ-सत्तर के दशक में; वहाँ लौट कर देखने की मेरी क्षमता नहीं। लेकिन, इतिहास में रुचि है तो इतना मालूम है कि वह अस्थिरता का वक्त था। सामाजिक, राजनैतिक, वैयक्तिक, हर स्तर पर। हिन्दी साहित्य में ‘नयी कहानी’ जन्म ले रही थी, वहीं देश आर्थिक संकट से जूझ रहा था, नेहरू जी की मृत्यु के बाद उनका आभामंडल भी क्षीण पड़ने लगा। भारत ही नहीं, दुनिया ही एक अस्थिर दौर से गुजर रही थी, जब शीत युद्ध और वियतनाम युद्ध के मध्य हिप्पियों का उदय हो रहा था। लेकिन, इन सबके मध्य समाज ज्यों-का-त्यों था।

ऑफ़िस की फाइलें यूँ ही धूल खा रही थे, पेपरवेट के नीचे पन्ने फड़फड़ा रहे थे, मध्य-वर्ग यूँ ही रोजमर्रा के जीवन में संघर्ष कर रहा था, सामंतवाद की शक्ल सिर्फ सतह पर बदल रही थी। लेकिन, रचनाएँ प्रगतिशील होती जा रही थी। दक्षिण अमरीका से भारत तक साहित्यकारों का एक नया ढर्रा। और इन सबके मध्य कुछ ऐसी भी कहानियाँ रची जा रही थी, जो अब भी जमीन पर थे। यथार्थ से जुड़े थे। हमारे आस-पास की घटनाओं और राजनीति से। और वह भी हमारी भाषा में। जैसा प्रेमचंद लिखते थे, गिरिराज जी की भाषा और विषय-चयन कुछ वैसा ही दिखता है। यह संभव है कि उस वक्त प्रेमचंद की साहित्यिक हलकों में महत्ता घटने लगी हो, लेकिन गिरिराज जी ने परंपरा गिरने न दी।

एक पाठक के रूप में मुझे उनके विविध विषय-चयन प्रभावित करते रहे कि एक लेखक का फलक कुछ यूँ भी विस्तृत हो सकता है। गिरिराज जी के ही शब्दों को अगर पढ़ें, “हर लेखक के पास एक चोंच होती है, जिससे वह चिड़िया की तरह समाज में से विषय चुन-चुन कर अपनी झोली में डालता रहता है। वह कंकड़ों के मध्य बारीकी से दाने चुन सकता है।”

यह बात महत्वपूर्ण है। हमें समकालीन लेखन से प्रभावित हुए बिना भी विषय चुनने हैं। ऐसे विषय जो सिर्फ आपकी झोली में हों। उनके विषय-चयन की विविधता शायद यह भी रही हो कि वह सरकारी नौकरियों में जगह बदलते रहे। वह हिन्दी शिक्षण की दुनिया से नहीं जुड़े थे, और न ही पूर्णकालिक साहित्यकार थे। वह तो आम आदमियों की तरह आठ घंटे की असाहित्यिक दफ्तर में बैठ कर, हाट-बाज़ार से सब्जियाँ लाकर, जब घर लौटते होंगे तो फुरसत में कलम उठाते होंगे। जैसे विनोद कुमार शुक्ल या नरेश सक्सेना जी की कलम।

लेकिन, इस पार्ट-टाइम लेखन में भी कोई लगभग हज़ार पृष्ठ का कालजयी ग्रंथ लिख दे। रामचंद्र गुहा के ‘गांधी बिफोर इंडिया’ से पहले ‘पहला गिरमिटिया’ लिखा जा चुका था। और यह गल्प होकर भी तथ्यपरक, विस्तृत और पठनीयता लिए था। इसे पढ़ कर यूँ नहीं लगता कि यह हज़ार अलग-अलग बैठक में लिखी गयी होगी। यह सातत्य ही गिरिराज जी की विशेषता रही होगी कि वह कलम रोज उठाते होंगे, रोज हज़ार शब्द लिखते होंगे। तभी तो इतना कुछ लिख गए। और किसी भी कहानी या उपन्यास में यूँ नहीं लगता कि ‘कन्ट्यूनिटी’ टूटी है। उनकी यह बात मैंने अपने जीवन में उतारना शुरू किया है, और नवोदित लेखकों से भी यह बात कहूँगा।

नवोदित लेखकों के लिए उनके विचार ख़ास हैं। इसे मैंने पहले भी संदर्भित किया है। और इसके अंतिम वाक्य के कुछ उदाहरण भी हैं। गिरिराज जी ने लिखा,

“अच्छे आलोचकों का यही दायित्व है कि वह संभावनाशील रचनाकार के बारे में सकारात्मक रुख अपनाए और पाठकों को उसे समझने में सहायता दें। जिस रचना की समीक्षा होती है, उस पर समीक्षा का भला-बुरा चाहे जैसा भी प्रभाव क्यों न पड़ता हो, वह इतना महत्वपूर्ण नहीं होता जितना कि इस प्रकार की समीक्षा द्वारा रचनाकार के भविष्य की रचनात्मकता को कुण्ठित करने वाला प्रयत्न होता है। ठीक वैसा ही जैसा असमय प्रजनन इंद्रियों को नष्ट करने का प्रयत्न होता है।”

एक और बात कहूँगा कि उनकी कहानियों या उपन्यास में एक परिपूर्णता है। कोई हड़बड़ी नहीं है। ‘पेपरवेट’ को पढ़ते हुए डॉ. जब्बार पटेल निर्देशित फ़िल्म ‘सिंहासन’ मन में आती है। छद्म-समाजवादी राजनीति आज हमें अधिक स्पष्ट अधिक दिख रही है, जो गिरिराज जी को साठ के दशक में ही दिख गयी थी। सत्ताधारी दल का पेपरवेट बना ब्यूरोक्रेट कहिए, या कोई भी ऐसा माध्यम। यह कितना बेहतरीन बिम्ब है! एक सरकारी कर्मचारी के लिए ऐसी रचनाएँ लिखना एक ‘बोल्ड स्टेप’ भी कही जाएगी।

मेरी गिरिराज जी से कभी मुलाकात नहीं हुई। उम्र का भी फासला है, और जमीन का भी। लेकिन, मैंने जब गिरमिटियों का इतिहास ‘कुली लाइन्स’ लिखी, तो कई लोगों ने इसकी तुलना ‘पहला गिरमिटिया’ से की। हालांकि यह तुलना बेमानी थी। एक तो ‘पहला गिरमिटिया’ का कथ्य गिरमिटिया नहीं, गांधी हैं; और दूसरा यह कि गिरिराज जी का आभामंडल ही इतना विस्तृत है कि मेरी रचना उसके समक्ष एक सूक्ष्म कृति है। एक बार राष्ट्रपति के. आर. नारायणन ने इच्छा ज़ाहिर की कि ‘पहला गिरमिटिया’ पढ़ना चाहता हूँ। लेकिन, समस्या यह थी कि हिन्दी वह ठीक से पढ़ नहीं पाते थे। गिरिराज जी ने उसका अंग्रेज़ी अनुवाद कराना शुरू किया। अब विडंबना ऐसी कि जब यह अनुवाद पूर्ण हुआ और छप कर आया, के. आर. नारायणन चल बसे। वह इस किताब के पाठ से वंचित रह गए। आज जब गिरिराज जी नहीं रहे, तो इस वंचन का अर्थ समझा जा सकता है। उनकी सतत रचनाशीलता से हम सभी अब वंचित रह गए। गांधी जी की तरह गिरिराज जी का जीवन भी एक संदेश ही है।

शतरंज के खिलाड़ी: कास्पारोव, कार्लसन और आनंद का विस्मयकारी त्रिकोण

रेक्याविक, 2004

उस दिन शतरंज के खेल में एक बड़ा तख्ता-पलट हुआ। विश्व के महान् खिलाड़ी अनातोली कार्पोव एक तेरह वर्ष के बच्चे से हार गए। और जब कल उस बच्चे का मुकाबला गैरी कास्पारोव से होना है तो शतरंज की दुनिया में खबर छपी,

“द बॉय मीट्स द बीस्ट”

इस तेज शतरंज के मुकाबले में अमूमन जूस लेकर बैठने वाले किशोर मैग्नस कार्लसन उस दिन कोला लेकर बैठे, और कास्पारोव का इंतजार करने लगे। नियम यह था कि खिलाड़ी देर से आए तो बाजी हार जाता है। लेकिन चूँकि यहाँ बात कास्पारोव की थी, तो इंतजार किया गया।

कास्पारोव तकरीबन पंद्रह मिनट लेट पहुँचे और मैग्नस के पीछे जाकर खड़े हो गए और कहा, “माफ करना। मेरी ग़लती नहीं। आयोजकों ने मुझे समय ग़लत बताया”

पहली ही चाल में कास्पारोव ग़लत चल गए और बाजी कार्लसन के पक्ष में जाने लगी। कार्लसन कुछ देर में उठ कर टहलने लगे तो कास्पारोव ने नाराजगी से घूरा कि यह क्या बदतमीजी है? आखिर खेल ड्रा रहा और अगले खेल में कास्पारोव ने मात कर दिया।

कास्पारोव ने खेल के बाद कहा, “इस बच्चे में मुझे आज अपनी ही अक्खड़ मिजाज़ी दिखी है। गर इसे तालीम मिलती रही, तो यह अगला कास्पारोव जरूर बनेगा।”

कास्पारोव ने जब कार्लसन से तालीम की बात कही, तो दरअसल एक विश्व-विजेता को शायद अपनी विरासत की चिंता थी। उन्होंने कार्लसन को मॉस्को आने का न्यौता दिया। जब कार्लसन मॉस्को पहुँचे तो पहले दिन उनसे दो वृद्ध मिलने आए। एक कास्पारोव के गुरु थे, और दूसरे कारपोव के। एक चौदह वर्ष के बच्चे की आँखों में उन्होंने बहुत कुछ एक नजर में ही पढ़ लिया। अगले दिन कार्लसन कास्पारोव से रू-ब-रू हुए।

वहाँ तमाम कम्प्यूटर में बस शतरंज की पहली चाल के अलग-अलग रूप लगे थे, और आज तक जितना शतरंज खेला गया, उसका दुनिया का सबसे बड़ा डाटाबेस मौजूद था। कार्लसन को लगा जैसे किसी फौजी रणनीति कैंप में आ गए। कास्पारोव ने पहले ही दिन चार अभ्यास दे दिए, जिनमें कार्लसन तीन सुलझा पाए और थक गए। कास्पारोव ने कहा कि रूसी तब तक नहीं उठते, जब तक सुलझा नहीं लेते। 

कार्लसन ने अपने पिता को फ़ोन मिला कर कहा, “मैंने शतरंज खेल-खेल में ही सीखा। मुझसे यह पढ़ाई न हो पाएगी।”

कास्पारोव को ‘ना’ सुनना बुरा लगा या अच्छा, यह पता नहीं। किंतु कार्लसन का ‘ना’ कहना एक विश्व-विजेता बनने की पहली सीढ़ी जरूर थी!

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शतरंज के मोज़ार्ट कई लोग कहे गए, शायद इसलिए कि यह खेल छुटपन से ही शुरु हो जाता है। बारह-तेरह वर्ष उम्र के ग्रैंड मास्टर घूम रहे हैं। लेकिन मैग्नस को मोज़ार्ट कहने की और भी वजह है। इसकी एक वजह है कि मोज़ार्ट के पिता लियोपोल्ड और मैग्नस के पिता हेनरिक, दोनों अपने-अपने गुण बेटे में डाल गए और बेटा बाप से कहीं आगे निकल गया। दोनों अपनी गाड़ी में सपरिवार यूरोप का चक्कर लगाते और बेटे को खेलते देखते, जीतते देखते। एक संगीत में, तो दूसरा शतरंज में उस्ताद बना। और दोनों के पिता ने इसके पीछे अपना निजी कैरियर काफी हद तक त्याग दिया। तभी मोज़ार्ट ने कहा, “ईश्वर के बाद पिता होता है।”

लेकिन मैग्नस की शुरुआत देर से हुई। पाँच वर्ष तक तो शतरंज को हाथ भी नहीं लगाया। यह और बात है कि उस उम्र तक मैग्नस को नॉर्वे के सभी जिले और दुनिया के सभी गाड़ियों के नाम याद थे। मैग्नस भी मोज़ार्ट की तरह घर में सबसे छोटे थे, और अंतर्मुखी भी। तो जब शतरंज की गोटियाँ हाथ में आई, तो वह उन्हीं से बतियाते। एक छह-सात साल का बच्चा तो एक स्थान पर टिक कर नहीं बैठता, जबकि मैग्नस पूरा दिन एक ही छोटी कुर्सी पर बैठे शतरंज खेलते बिता देते। उनके स्कूल में शिक्षिका ने कहा कि इसका विकास रुक गया है।

शतरंज खिलाड़ी पिता हेनरिक ने कहा, “इसका विकास बस मुझे नजर आ रहा है। यह अब मुझसे भी कहीं आगे निकल गया है।”

विश्वनाथन आनंद को हराना एक वैश्विक रणनीति का नतीजा था या नहीं, यह कहना कठिन है। लेकिन मोहरे तैयार हो रहे थे। हालांकि मैग्नस कार्लसन मात्र मोहरा नहीं थे, लेकिन विश्व विजेता बनने का बाल-हठ तो हावी था ही। पहले यह माहौल बना कि आनंद नॉर्वे आएँ। लेकिन आनंद की आँखों में जो आत्मविश्वास और अनुभव था, उसमें दुनिया के किसी कोने में हराने की कुव्वत थी।

उसी वक्त गैरी कास्पारोव पुन: कार्लसन के गुरु बनने का जिम्मा लेते हैं। आनंद को अगर कोई मात दे सकता था, तो वह थे- स्वयं कास्पारोव। लेकिन उन्हें अपना उत्तराधिकारी चुनना था, स्वयं तो वह अलग हो चुके थे। दूसरी बात यह थी, कि भारत और चीन में शतरंज तेज गति से लोकप्रिय हो रहा था। एक नहीं, सैकड़ों आनंद की फौज तैयार हो रही थी। शतरंज का गढ़ अब भी रूस था, लेकिन सरताज चेन्नई में बैठा था।

दूसरी ओर, नॉर्वे कभी शतरंज में ख़ास नामी रहा नहीं। कार्लसन के आस-पास भी नॉर्वे में कोई नहीं था। अब यह बच्चों का खेल नहीं था, कार्लसन को वाकई रूसी हथियारों की जरूरत थी। वह वापस कास्पारोव के शरण में गए। या यूँ कहिए कि कास्पारोव ने यूरोपीय सत्ता स्थापित करने के लिए कार्लसन को तैयार करना शुरू किया। लेकिन कार्लसन को कास्पारोव का ढंग न तब पसंद था, न अब।

आनंद शतरंज के खेल में इकलौते कई मामलों में थे, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण था उनका तनाव-मुक्त खेल। उनका ‘कूल’ रहना, मुस्कुराना, गप्पियाना शतरंज के अंतर्मुखी खिलाड़ियों के विपरीत था। एक दफे रूस में कार्लसन और आनंद के इंतजामात एक रूसी सुंदर महिला कर रही थीं। जहाँ आनंद उनसे खूब गप्पियाते, कार्लसन नजर उठा कर भी नहीं देखते। उसने कहा कि इस बच्चे को अब किसी लड़की की जरूरत है, वरना यह आनंद से नहीं जीत पाएगा। 

यह बात गौर-ए-तलब है क्योंकि आनंद पहले भी मुस्कुराते हुए कार्लसन और तमाम खिलाड़ियों को हरा चुके थे। तो जब आनंद के खेल समझने के लिए उन्हें नॉर्वे आने का न्यौता दिया गया, आनंद घूमने-फिरने के इरादे से नॉर्वे आ गए। उनके साथ अमरिका की महिला शतरंज चैंपियन ओस्लो पहुँची, और एयरपोर्ट पर ही मैग्नस कार्लसन का बड़ा पोस्टर लगा था। दोनों यह देख कर मुस्कुराए और कहा, “यह बच्चा तो अब बड़ा हो गया।”

यह दोस्ताना मुकाबला समंदर किनारे क्रिस्तियानसंड में था, और शहर के तमाम लोग आनंद को देखने आए थे। उस वक्त वह नॉर्वे के सबसे प्रिय खिलाड़ी थे, और सड़क पर सब ‘विशी विशी’ चिल्ला रहे थे। आनंद जानते थे कि यहाँ के फ़्रेंडली मैच की कोई अहमियत नहीं। वह बड़ी आसानी से कार्लसन से हार गए, खूब खाया-पीया और नॉर्वे के ध्रुवीय इलाके घूमने निकल गए। कार्लसन के दोगुनी उम्र के आनंद ने बड़ी चालाकी से अपना खेल छुपा लिया।

यह तय था कि जो भी लंदन में जीतेगा, वही विश्व-विजेता आनंद से चेन्नई में खेलेगा। लंदन में विश्व के आठ शीर्ष खूँखार खिलाड़ियों की यह जंग शतरंज की दुनिया में एक यादगार पल है। मैग्नस कार्लसन को यह जंग जीतनी ही थी। लेकिन व्लादीमिर क्रामनिक (बिग व्लाद), जिन्होंने महान् गैरी कास्पारोव को सत्ता से बेदखल किया था, उनसे आगे निकलना एक चुनौती थी।

शुरुआती खेलों के बाद यह स्पष्ट हो गया कि क्रामनिक ही आनंद से खेलेंगे। मैग्नस कार्लसन पूरे समय तनाव में खेले, और जैसे-तैसे आगे बढ़े। उन्होंने आखिर अपना वह हथियार अपनाया, जो बचपन से उनकी ताकत थी। लंबा खेल कर अपने विपक्षी को थका देना। राज़ाबोव के साथ खेल में हर दर्शक, क्रामनिक और कम्प्यूटर तक को यह यकीन था कि खेल ड्रॉ होगा। लेकिन सात घंटे तक लगातार खेल कर कार्लसन जीत गए। 

अब क्रामनिक और कार्लसन बराबरी पर थे। लेकिन कार्लसन को इवानचुक (चकी) ने आखिरी खेल में हरा दिया। कार्लसन हताश होकर अपने होटल चले गए। तभी खबर आई कि अप्रत्याशित रूप से अब तक लगातार हारने वाले इवानचुक ने क्रामनिक को भी हरा दिया। बाजीगर कार्लसन आखिरी खेल हार कर भी अंक के आधार पर टूर्नामेंट जीत चुके थे। शतरंज का निर्णायक युद्ध अब भारत में होना था।

नवंबर 2013, चेन्नई, भारत

यूरोप की नजर में भारत ठीक वैसा ही है, जैसा कि झोपड़पट्टियों के मध्य खड़ा चेन्नई का आलीशान हयात रिज़ेन्सी होटल। एक गरीब देश जहाँ अमीरों के अमीर बसते हैं। मैग्नस कार्लसन ने पूरे विश्व में इतनी आवभगत और शान-ओ-शौकत कम ही देखी। उनके दरवाजे के ठीक बाहर राइफ़ल लिए खड़े सुरक्षाकर्मी देख वह घबड़ा गए, और अनुरोध किया कि ये दूर ही रहें। 

इस खेल में कुछ और विडंबनाएँ भी थी। कार्लसन के सहयोगी (सेकंड) एस्पेन असल में आनंद की टीम से जुड़ना चाहते थे, लेकिन यह अपने देशवासी से धोखा होता। एस्पेन तो कार्लसन की रग-रग से वाकिफ थे। वहीं दूसरी ओर, आनंद के सहयोगी शतरंज के ऐसे सेनापति थे जो विश्व-विजेता बनते-बनते रह गए थे। कार्लसन की टीम को आनंद से अधिक खौफ उनके इस सहयोगी पीटर लेको से था, जो यूरोपीय खेल को गहराई से जानते थे।

आनंद पहली चाल क्या चलेंगे, यह कार्लसन की दुविधा थी। क्या वह e4 से खेल शुरू करेंगे? आनंद के पास हमेशा एक नया दाँव होता। लगभग ग्यारह भाषा बोलने वाला यह अनुभवी खिलाड़ी वाकई शतरंज की दुनिया का मायावी सितारा था। कार्लसन को यह अंदेशा हो रहा था कि आनंद जरूर ‘निमज़ो-इंडियन’ खेल यानी d4 से शुरुआत करेंगे, और वहाँ शायद वह फँस जाएँ। 

नॉर्वे के अखबार आनंद को ‘टाइगर ऑफ़ चेन्नई’ पहले से ही कह रहे थे।

मास्को में बैठे कास्पारोव जो आनंद को हारते देखने को बेताब थे, ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया को कहा, “कल से मद्रास में खून बहेगा। खून!”

अगर यह कहा जाए कि पूरी कायनात आनंद को हराने चेन्नई में जुटी थी, तो यह बात शायद ग़लत नहीं। जैसा मैं पहले भी कह चुका हूँ, यह एक वैश्विक लड़ाई थी। मृदुभाषी और सौम्य आनंद के सर पर लगभग एक दशक तक यह ताज रहा, और उनके मुख्य प्रशिक्षक थे डेनमार्क के पीटर नील्सन। लेकिन जब बात भारत और स्कैंडिनैविया के टक्कर की हुई, तो नील्सन का देश-प्रेम शायद जाग उठा। वह पाला बदल कर कार्लसन के साथ चले गए। वह आनंद का हर रहस्य जानते थे, तो आनंद को हराने का परम-ज्ञान उनसे बेहतर कौन देता? 

आनंद इससे निराश तो हुए लेकिन उन्होंने बस एक अलिखित वचन उनसे ले लिया कि नील्सन स्वयं चेन्नई में कार्लसन के साथ न आएँ। और नील्सन ने आनंद को दिया वचन निभाया भी। वह बीमारी का बहाना बना कर नॉर्वे में ही रुक गए। 

लेकिन एक बिनबुलाया मेहमान भी चेन्नई आया, जिसे न आनंद ने बुलाया, न कार्लसन ने। उसकी खबर मिलते ही आनंद की टीम ने उसके दरवाजे पहले दो मैच के लिए बंद कर दिये। अगर वह आँखों के सामने होता, तो आनंद अवश्य हार जाते। कार्लसन की टीम भी उससे नहीं मिली। लेकिन सब हैरान थे कि यह आखिर चेन्नई में करने क्या आया है? वह अवांछित आगंतुक कोई ऐरा-गैरा तो था नहीं। 

शतरंज के दूसरे बादशाह और आनंद के धुर-विरोधी जनाब गैरी कास्पारोव मास्को से चेन्नई पधार चुके थे! 

वि. आनंद (43 वर्ष/भारत) बनाम मै. कार्लसन (22 वर्ष/नॉर्वे), चेन्नई

नॉर्वे आर्कटिक सर्कल का एक छोटा और वीरान देश है, जहाँ की कुल जनसंख्या चेन्नई की तीन चौथाई है। अगर शीतकालीन खेलों को छोड़ दें, तो किसी भी विश्व-स्तर के खेल में इनकी पैठ नहीं। शतरंज में जहाँ भारत के पचास ग्रैंड मास्टर हैं, नॉर्वे के आठ हैं। ऐसे में अगर कोई खिलाड़ी विश्व-विजेता बनने वाला हो, तो पूरा देश सड़क पर क्यों न हो? हर दुकान, हर गली में शतरंज था। बैंकों का काम ठप्प पड़ गया क्योंकि सभी कर्मचारी शतरंज देखने लगे थे। 

वहीं दूसरी ओर, भारत के लिए शतरंज महज एक खेल था। चुनाव निकट थे, भाजपा ने अपना नया प्रधानमंत्री उम्मीदवार चुना था, और अखबार राजनीति की खबरों से भरे थे। हालांकि आनंद-कार्लसन मैच को पहले पृष्ठ में जगह मिल जाती, लेकिन राजनीति के समक्ष खेल गौण था। कार्लसन के साथ पूरा देश था, जबकि आनंद के साथ ऐसी कोई लहर नहीं थी। 

और रूसी चाणक्य भी तो थे। कास्पारोव को खेल में प्रवेश नहीं मिला, तो बाहर प्रेस के माध्यम से आनंद का मनोबल गिराने लगे। उन्होंने कहा, “अब शतरंज को नए बादशाह की जरूरत है। हम अब बूढ़े हुए।”

लेकिन बूढ़े आनंद भी कम खतरनाक न थे। पहले ही मैच में मात्र 16 चालों में कार्लसन घुटने पर आ गए। उन्हें हाथ खड़ा कर ‘ड्रॉ’ की मांग करनी पड़ी। विश्व-विजेता का स्वप्न संजोए कार्लसन का आत्म-विश्वास पहले दिन ही हिल गया। आनंद मुस्कुराते हुए बाहर निकले। अगली बाजी आनंद की होगी, यह बात लगभग तय थी।

कास्पारोव ने एक किताब लिखी ‘हाउ लाइफ इमिटेट्स चेस’। उनका कहना है कि शतरंज से आदमी का चरित्र झलकता है। बॉबी फ़िशर और कास्पारोव की तरह कार्लसन भी मात्र जीतने के इरादे से खेलते हैं। हारने पर उनकी नींद उड़ जाती है। आनंद अगर जीतने के लिए खेलते भी हैं, तो दिखाते नहीं। और हार कर भी मुस्कुराते रहते हैं। 

कार्लसन कहते हैं कि दुनिया के सभी शतरंज खिलाड़ियों में सबसे कोमल हाथ विशी आनंद का है। वह हाथ मिलाते हैं तो लगता है कोई दोस्त गप्प मारने आया है, शतरंज खेलने नहीं। कास्पारोव इतनी सख़्ती से कुटिल मुस्की देते हाथ मिलाते हैं कि विरोधी घबड़ा जाए। मशहूर खिलाड़ी नाकामुरा ने एक बार कहा, “कार्लसन आँखों से सम्मोहित करते हैं, मुझे काला चश्मा दिया जाए।” यह और बात है कि वह चश्मा लगा कर भी हार गए।

तो जब मधुर आनंद और मायावी कार्लसन की दूसरी बाज़ी हुई, तो आनंद एक जीता हुआ खेल भी बस इस भय से नहीं खेले की वह हार जाएँगे। पहली ही e4 चाल में कार्लसन का अप्रत्याशित c6 उन्हें डरा गया। वह जीत रहे थे, लेकिन अठारहवीं चाल में जान-बूझ कर एक-दूसरे के वज़ीर (रानी) मार खेल ड्रॉ करवा दिया। 

दूसरे ड्रॉ के बाद यह लगने लगा कि आनंद जीतने के बजाय बस किसी भी तरह अपना ताज बचाना चाहते हैं। लेकिन अगले खेल से दर्शक-दीर्घा में कास्पारोव भी होंगे तो क्या शतरंज अपना काला इतिहास दोहराएगा? टॉयलेटगेट?

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शतरंज की दुनिया में एक विभाजन के जिम्मेदार गैरी कास्पारोव ही थे, जब भ्रष्टाचार के आरोप के कारण दो समूह बन गए। दो-दो शतरंज चैंपियन बनने लगे। लेकिन 2006 ई. में दोनों चैंपियनो व्लादिमीर क्रामनिक और टोपालोव के मध्य मुकाबला रख शतरंज को एक करने का फैसला हुआ। इस मुकाबले में एक अजीब बात हुई। क्रामनिक एक मैच के दौरान पचास बार शौचालय गए। टोपालोव ने इल्जाम लगाया कि वह शौचालय जाकर कंप्यूटर की मदद ले रहे हैं! क्रामनिक इसे नकार कर विजेता घोषित हुए। हालांकि जल्द ही उन्हें अपना ताज विश्वनाथन आनंद को सौंपना पड़ा।

चेन्नई में आनंद और कार्लसन का तीसरा मैच भी ड्रॉ हुआ। अब तक गैरी कास्पारोव का प्रवेश-निषेध खत्म हो चुका था, और वह अब दर्शकों में सामने नजर आ रहे थे। आनंद तनाव में आ गए थे, और इसी मध्य कार्लसन का पेट खराब हुआ। वह बारंबार शौचालय जाने लगे। आनंद ने इसका विरोध नहीं किया, और वह खेलते रहे। चौथी बाज़ी ड्रॉ रही। पाँचवी और छठी आनंद झटके में हार गए। इस टॉयलेटगेट पर कभी किसी ने चर्चा नहीं की, और आनंद ने भी यही माना कि वह बुरा खेले।

कास्पारोव ने ट्वीट किया, “अब अगर कार्लसन पागल हो जाएँ, तभी हारेंगे।”

छठी बाज़ी के बाद आनंद की हार सुनिश्चित कर कास्पारोव मास्को निकल गए तो आनंद ने प्रेस में कहा, “एल्विस प्रेस्ले चेन्नई से चले गए। अब हम खेल शुरु करें?”

नॉर्वे की अख़बार में खबर छपी कि चेन्नई के टाइगर अब भी खेल में वापस लौट कर कार्लसन को मात दे सकते हैं। लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। जिस दिन विश्वनाथन आनंद की हार तय हुई, सचिन तेंदुलकर ने भी संन्यास की घोषणा कर दी। देश से शतरंज का जुनून जाता रहा। आनंद के समय जहाँ पैंतीस ग्रैंड मास्टर हो गए थे, आनंद के बाद दस-पंद्रह हुए। वह भी इसलिए कि आनंद अभी पूरी तरह गिरे नहीं हैं।

मेरी एक और थ्योरी है कि शतरंज का राजा विश्व का राजा होता है। विश्व-युद्ध से पहले राजा यूरोप था, फिर जब लाल सेना ने जंग जीती तो दशकों तक रूस का राज रहा। इस सत्ता पर सबसे पहली चोट शीत-युद्ध के समय अमरीका के बॉबी फ़िशर ने रूस के बोरिस स्पास्की को हरा कर की। अमरीका सोवियत पर विजयी हुआ। सोवियत टूटने के बाद रूस के हाथ से भी सत्ता जाती रही। ऐसे वक्त एक तेजी से उभरते देश भारत ने सत्ता संभाली। भारत प्रगति करता गया और शतरंज का ताज भी भारत के सर पर रहा। अब वापस यह ताज यूरोप में नॉर्वे के सर पर आ गया। इस वक्त हर आर्थिक-सामाजिक आंकड़े पर नॉर्वे यूँ भी टॉप पर है। तो इस शृंखला का मूल बिंदु यही है। 

इन शतरंज के मोहरों में देश की किस्मत छुपी है।

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मैग्नस कार्लसन से जब एक साक्षात्कार में पूछा गया, “आपको पता है, एक मशहूर अमरीकी शतरंज खिलाड़ी ने शतरंज छोड़ कर मार्शल आर्ट खेलना शुरू कर दिया?”

उन्होंने कहा “शायद उन्हें हिंसा पसंद नहीं होगी। शतरंज से अधिक हिंसात्मक खेल कोई नहीं।”

जब आनंद को लोग टाइगर (बाघ) बुलाते, तो कार्लसन ने स्वयं को क्रोकोडाइल (मगरमच्छ) कहना पसंद किया। यह अजीब बात है कि शतरंज जैसे अहिंसक खेल में बाघ और मगरमच्छ जैसी उपमाएँ दी गयी। लेकिन यह बात सच है कि मार्शल-आर्ट या मुक्केबाजी की चोट हफ्ते-महीने में ठीक हो जाती है, लेकिन शतरंज ऐसी चोट देता है कि महीनों नींद-चैन उड़ जाए। 

लोगों ने मान लिया था कि चेन्नई में हार के बाद आनंद अब कभी कार्लसन के साथ नहीं खेलेंगे। ख़ास कर भारतीयों में ‘किलर इंस्टिक्ट’ कम माना जाता है। लेकिन जिस व्यक्ति ने छुटपन से प्यादे-मोहरे और रणनीति में ही जीवन बिताया हो, वह शातिर और खूँखार बन ही जाता है। बाहर से सौम्य दिखना आनंद का एक मुखौटा है, जिससे कई आक्रामक खिलाड़ी भी धोखा खाते रहे हैं। 

जब दुबई के ‘विश्व रैपिड चेस’ में आनंद पहुँचे, तो लगातार तीन बाज़ी अलग-अलग लोगों से हार गए। आनंद ‘रैपिड चेस’ के अजेय योद्धा रहे हैं, और यह हार किसी को समझ नहीं आया। दूसरी तरफ कार्लसन लगातार जीत रहे थे। कार्लसन का विजय-रथ आखिर रुका। 

विश्वनाथन आनंद ने कार्लसन को दुबई में मात कर दिया! लोग कयास लगाते हैं कि आनंद जान-बूझ कर शुरुआती खेल हारे थे, जैसे बाघ आक्रमण से पहले तीन कदम पीछे लेता है। या शायद वह चेन्नई से दुबई मात्र कार्लसन से बदला लेने आए थे। 

कयास तो कयास हैं, लेकिन बाघ-मगरमच्छ की अगली लड़ाई हुई उस राज-मुकुट के लिए जो आनंद चेन्नई में हार गए थे। और यह बाजी थी कास्पारोव के घर- रूस में! 

सोची (रूस), 2014

रूस की धरती शतरंज का मक्का कही जा सकती है। यहाँ हर तीसरा बच्चा शतरंज खिलाड़ी हो तो ताज्जुब नहीं। विश्वनाथन आनंद जब पिछले वर्ष अपने घर से पंद्रह मिनट के  फासले पर होटल में खेल रहे थे, तब वह तनाव में थे। लेकिन रूस में वह अलग ही मिज़ाज में थे। वह अपनी पत्नी अरूणा के साथ आए थे, जो उनकी मैनेजर भी हैं। और अब बिल्कुल दबाव में नहीं नजर आ रहे थे। 

शतरंज का एक और नियम है कि इसके राजा से वही लड़ सकता है जो बाकी बाहुबलियों को हरा कर आया हो। आनंद ने अपनी हार के चार महीने बाद ही विश्व कैंडीडेट चैंपियनशिप में सबको परास्त कर दिया था। और अब वह कार्लसन से अपना ताज वापस लेने रूस आए थे। 

इसी रूस की धरती पर दो वर्ष पूर्व आनंद ने बोरिस गेलफ़ांड को हरा कर अपना ताज छठे साल लगातार कायम रखा था। उन्हें उम्मीद थी कि वह रूस से जीत कर ही जाएँगे। लेकिन इस बार कुछ अलग बात थी। अब तक पर्दे के पीछे रहने वाले कास्पारोव सीधे-सीधे कार्लसन के ‘सेकंड’ बन कर आनंद से भिड़ रहे थे।

सोची का पहला मैच ड्रॉ रहा। दूसरे में कार्लसन जीत गए। लेकिन तीसरे मैच में आनंद ने वापस कार्लसन को हरा दिया। बल्कि अब आनंद इतने खुल कर खेल रहे थे कि कास्पारोव को यह लग गया कि वह अपना ताज वापस लेकर ही जाएँगे। और छठे मैच में कार्लसन ने ऐसा ‘ब्लंडर’ किया कि आनंद की जीत ‘लगभग’ तय हो गयी। 

लेकिन आनंद को वह ग़लती नजर ही नहीं आयी और वह उससे भी बड़ी ग़लती कर बैठे। सबने कहा कि ऐसी ग़लती असंभव है। आनंद ने उस दिन प्रेस में हताश होकर कहा, “इंसान ग़लती कर जाता है। मेरा अनुभव कहता है कि मैं अब हार चुका हूँ। लेकिन मैं अपने तीन वर्ष के बेटे के लिए खेलूँगा कि वह बड़ा होकर जब मेरा खेल देखे, यह ग़लती न दोहराए। और यह देख ले कि उसका पिता ग़लतियों के बाद भी खत्म नहीं हो जाता।”

लंबी रेस का घोड़ा वही है जिसने हार को बस एक ख़ास बिंदु पर नियति मानी है। कार्लसन आनंद को हराने से पहले लंदन में आखिरी बाज़ी हार कर ही आए थे। आनंद हारने के बाद दुबई में कार्लसन को हराते हैं। और उसी साल सोची में कार्लसन जीतते हैं। पुन: आनंद 2017 में कार्लसन को हराते हैं। अब तक खेले अलग-अलग फॉर्मैट की बाज़ीयों में दोनों ने आठ-आठ खेल जीते थे।

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जो भी हो, कास्पारोव का स्वप्न साकार हुआ। मैंने उनके चरित्र को अनायास कुछ कुटिल जरूर बनाया है, लेकिन कास्पारोव एक आदर्शवादी व्यक्ति हैं। शतरंज संगठन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा कर अलग होने वाले पहले व्यक्ति कास्पारोव ही थे। वह ‘नो नॉनसेंस’ व्यक्ति माने जाते हैं, हाव-भाव से भी। वह हारे भी तो आखिर अपने ही पूर्व ‘सेकंड’ क्रामनिक से, जिन्होंने कास्पारोव को उनकी ही ‘निगेटिव चेस’ और पुरानी ‘बर्लिन डिफ़ेंस’ के बल पर मात दी।

फिलहाल कास्पारोव ने भारत-चीन से शतरंज को कमजोर कर स्कैंडिनैविया और यूरोप की ओर मोड़ दिया है। कार्लसन प्रतिभाशाली जरूर हैं, लेकिन यह बात अब पक्के तौर पर कही जा सकती है कि कास्पारोव ने उन्हें अपनी इस लड़ाई का सेनापति बनाया। यूरोप की सत्ता स्थापित हो चुकी है। भारत में शतरंज अवसान पर है। मुझे कुछ उम्मीद है कि भारत-नेपाल मूल के युवा डच खिलाड़ी अनीश गिरी कार्लसन को हरा दें, अन्यथा कोई भारतीय दूर-दूर तक नहीं। हाँ! विश्वनाथन आनंद जब तक जीएँगे, रैपिड और ब्लिट्ज चेस के सरताज रहेंगे ही। यह आश्चर्यजनक है कि उम्र के साथ उनकी गति बढ़ती ही जा रही है। लेकिन यह भी विडंबना है कि शतरंज (चतुरंग) का आविष्कार जिस देश में हुआ, उस देश की बिसात सिमटती जा रही है। 

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विदेशों की दीवाली

प्रवास में दीवाली के दीये साल-दर-साल बढ़ते ही जा रहे हैं। पंद्रह साल पहले कैलिफोर्निया में एक भारतीय मित्र ने जब दीवाली पर घर के बाहर रोशनी के झालर लटकाए, तो अगले दिन पड़ोसी ने भी लटका दिए। उन्हें लगा कि यह सामाजिक सौहार्द का व्यवहार होगा, लेकिन मालूम पड़ा कि उन पड़ोसी की इच्छा थी क्रिसमस का पहला झालर मुहल्ले में वही लटकाएँ। उन्हें क्या मालूम था कि ये दीवाली के झालर हैं? यह तो खैर अमरीका की बात है, जहाँ उस वक्त भी करोड़ भारतीय थे। बाद में तो खैर 2009 ई. में बराक ओबामा ने व्हाइट हाउस में दीवाली बनायी। कनाडा में उससे दस वर्ष पूर्व से राष्ट्रीय पर्व के रूप में दीवाली मनती रही है। सीधी बात है कि प्रवासी भारतीय अब एक बड़े वोट-बैंक बन गए हैं, दीवाली तो मनेगी ही। लेकिन, मेरी इतिहास में भी रुचि है तो यह जानने की भी है कि यह सिलसिला कब से चल रहा है?

हमें इसके लिए इन नव-पूँजीवादी देशों से दूर जाना होगा। दुनिया का सबसे बड़ा दीवाली का दीया दक्षिण अमरीका के एक छोटे से देश में जलता है। सूरीनाम की राजधानी परामरीबो में एक विशाल दीया जलाया जाता है, और वहीं भारतीय जमा होते हैं। ये उन गिरमिटियों के वंशज हैं जो भारत के गाँवों से ब्रिटिश सरकार गन्ने की खेती के लिए लेकर गयी थी। तो दीवाली की कहानी दरअसल उन्नीसवीं सदी से शुरू होती है, जब खेतिहर मजदूर दीवाली मनाते थे। उनमें न जाति-भेद था, न धर्म-भेद। बल्कि दीवाली के अवसर पर अफ्रीकी और यूरोपीय मूल के लोग भी उनके साथ मिल कर दीवाली मनाते रहे। यही नजारा मॉरीशस, फिजी, कैरीबियन देशों, रियूनियन द्वीप और मलय में भी देखने को मिलता है।

ब्रिटिशों को दीवाली से परिचय कानून की पढ़ाई करने गए मोहनदास करमचंद गांधी ने अपने शुरुआती भाषण में भी कराया, जो बाद में ‘फेस्टिवल्स ऑफ इंडिया’ नाम से संकलित हुआ। उन्होंने दीवाली को एक दिन नहीं, पूरे मास के रूप में समझाया। हालांकि, ब्रिटिश उस वक्त अक्खड़ ही थे, और लंदन में दीवाली मनाने में ख़ास रुचि न थी। अब यह हाल है कि डेविड कैमरॉन अपने घर पर दीवाली मनाते हैं। बहुसांस्कृतिक छवि भी बनानी है, और वोट भी लेने हैं।

छोटे देशों जैसे नॉर्वे में भी अब हज़ारों भारतीय हो गए हैं। हिन्दू सनातन सभा की दीवाली, आर्य समाज की दीवाली, शहरों के अलग-अलग भारतीय संगठनों की दीवाली, क्षेत्रीय संगठनों की दीवाली, दूतावास की सरकारी दीवाली, गरबा वाली दीवाली, भंगड़ा वाली दीवाली, डिस्को वाली दीवाली। न जाने कितनी दीवाली। हालात ये हो गए हैं कि लोग भागे फिर रहे हैं कि कितनी दीवालियों में जाएँ, घर में चुपके से मना कर छुट्टी करें। और कुछ लोग ऐसे भी हैं जो सबसे बना कर रखने के चक्कर में हर जगह जा रहे हैं। और इसलिए इंतजामात भी ऐसे हैं कि दीवाली एक दिन न होकर पूरे महीने मन रहा है। कहीं एक हफ्ते तो कहीं दूजे हफ्ते।

मेरा वर्तमान निवास ओस्लो से अस्सी कि.मी. दूर कॉन्ग्सबर्ग नामक शहर में है। यहाँ इस हफ्ते बहुधा हिन्दीभाषियों की दीवाली है, अगले हफ्ते बिहार से प्रवासियों की अलग दीवाली है, उसके अगले हफ्ते दक्षिण भारतीयों की दीवाली है, और इसी मध्य सनातन हिन्दू मंदिर की भी दीवाली है। मैंने हर जगह पर्ची कटा ली है, कि सबसे बात-मुलाकात हो जाए। मेरे जैसे और भी कई लोगों ने कटा ली होगी, और कुछ लोगों ने कहीं की नहीं कटायी होगी कि कौन जाए? पर्ची कटाने का मतलब हर जगह के खर्च भारतीय ही उठाते हैं, तो पैसे भी भरने ही होते हैं। और तोहफ़ेबाजी भी तो होगी। कुल मिला कर दीवाली में जेब का दिवाला निकलना तय है। मिठाई की दुकानें अधिकतर पाकिस्तानियों की है और उन्हें भी मालूम है कि दीवाली में डिमांड बढ़ेगी तो तैयारी पूरी रखते हैं। हाँ! पटाखों पर पाबंदी है, लेकिन फुलझड़ी और कुछ हल्की-फुल्की लड़ियाँ लोग चला ही लेते हैं। गीत-नृत्य भी खूब होता है, और मंदिरों में गरबा भी मिल सकता है। बड़े देशों में तो खैर बॉलीवुड कलाकार भी पहुँच जाते हैं, यहाँ भी कोई न कोई आ ही जाता है। कई विदेशी भी भारतीय परिधान पहन कर यह तमाशा देखने आ जाते हैं। उन्हें यह क्रिसमस का ही समकक्ष लगता है कि रोशनी है, हँसी-खुशी है, खान-पान है और तोहफ़े हैं। और यह भी कि नया साल आ रहा है।

Previously published in Prabhat Khabar

महेशवाणी और नचारी

भोला बाबा (शिव) के लिए मिथिला में दो तरह के गीत हैं- महेशवाणी और नचारी। दोनों का दो मूड है। यह अंतर समझना जरूरी है, क्योंकि कई बार एक ही तरह से गाने लगते हैं।

नचारी में हम नाच कर शिव से विनती कर रहे हैं, लेकिन इसका मूल ‘नाच’ नहीं, लाचारी है। इसमें भी पुरुष-स्त्री के गाने का लहजा अलग है। पुरुष तो वाकई लाचार दु:खी होकर गाएँगे- ‘कखन हरब दु:ख मोर हे भोलानाथ’ (कब मेरे दु:ख हरेंगे)। बाबाधाम के रास्ते में थके-भकुआए झूमते लेकिन करुणा भाव से गाते काँवड़िए मिलेंगे।

वहीं, स्त्रियाँ इस दु:ख में व्यंग्य का पुट ले आती है। उनकी शिकायत यह होती है कि इतने बूढ़े, फक्कड़ आदमी के साथ भला पार्वती कैसे रहेगी, जो भूतों की बारात लेकर आए हैं? तो यहाँ तंज-मिश्रित दु:ख है।

‘पैंच उधार माँगे गेलौं अंगना, सम्पति मध्य देखल भांग घोटना। गौरा तोर अंगना’

(संपत्ति के नाम पर बस भांग-घोटना है, शिव के आंगन में)

वहीं, महेशबानी इसका एक तरह से जवाब है। यह ‘डेविल्स एडवोकेट’ वाली बात है जिसमें शिव को हम डिफेंड करते हैं। हम इसमें ‘मनाईन’ (पार्वती की माँ) को कहते हैं कि शिव बहुत ही अच्छे व्यक्ति हैं, उन पर लांछन ग़लत है। और यहाँ भी कई बार भक्ति में तंज का प्रवेश हो जाता है, कि भोला बाबा तो भोले हैं। ग़लती तो भांग की है। यह निर्मोही हैं, दुनिया की सोचते हैं, इसलिए स्वयं फक्कड़ रहते हैं। बल्कि महेशबानी का टोन कभी-कभी यूँ लगता है जैसे अमिताभ बच्चन शोले में रिश्ता लेकर गए थे।

‘दु:ख ककरो नहि देल, अहि जोगिया के भांग भुलेलक/धथुर खुआई धन लेल”

(कभी किसी को दु:ख नहीं दिया हमारे महादेव ने; यह तो भांग-धतूरे ने फक्कड़ बना दिया)

नचारी में आप शिव के सामने खड़े हैं, और अपनी बात रख रहे हैं। महेशवाणी में हम शिव के साथ खड़े हैं, और शिव का पक्ष ले रहे हैं। यह बारीक लेकिन महत्वपूर्ण अंतर है। विद्यापति ने अगर गौरी की तरफ से शिकायत में और विनती में नचारी लिखी, तो शिव की तरफ से जवाब में महेशवाणी भी लिखी।

स्त्री-पुरुष, दोनों पक्ष से महादेव को देखना ही अर्धनारीश्वर की भक्ति का रूप रहा।

#ragajourney

दुर्लभ रागों के विशेषज्ञ: अलादिया ख़ान (A rare raga exponent)

भारत में कुछ चिकित्सक लिखते हैं- ‘दुर्लभ रोग विशेषज्ञ’ (rare disease specialist). ऐसी कोई डिग्री होती नहीं, लेकिन वह अपनी पहचान बना लेते हैं कि हल्के-फुल्के निमोनिया वगैरा नहीं देखेंगे। कुछ मामला फँसेगा, तो निपटाएँगे। एक हड्डियों के दुर्लभ रोग विशेषज्ञ मेरे वरिष्ठ भी हैं। आए दिन अखबार में रहते। उनका मानना है कि साधारण हड्डी जोड़ते कमाई तो होगी, नाम न होगा। उसके लिए कुछ दुर्लभ रोग ढूँढना होगा, जो लाखों में एक को होता हो। और इस तरह उनकी ओपीडी दुर्लभ रोगियों से भरी होती जिनको बाकी जगह से जवाब मिल गया होता।

संगीत में एक दुर्लभ राग विशेषज्ञ भी हुए। जब अलादिया ख़ान साहब की आवाज लंबे समय तक अमलेता में तान खींचते हुए चली गयी, तो वह कहीं के नहीं रहे। ऐसे समय में उन्होंने यही तकनीक सोची कि वह राग गाओ जो कोई न गाता हो। कॉमन रागों में तो मुकाबला तगड़ा होगा, दुर्लभ में कहाँ भिड़ोगे?

इस तरह जयपुर-अतरौली (अलादिया ख़ान) घराने में एक फ़ेहरिश्त बनी, और ऐसे-ऐसे भूले बिसरे राग गाए गए कि सब हैरान रहते। दूसरे बिहाग गाएँगे, तो वह बिहगड़ा गाएँगे। ‘निषाद’ से ट्विस्ट कर देंगे। और लोग मालकौंस तो वे संपूर्ण मालकौंस। दूसरे चांदनी केदार तो वे बसंती केदार। अब करो मुकाबला?

यही उनके अक्खड़ से नरम शिष्यों और घराने के गायिका-गायकों में भी ट्रांसफ़र हो गया। इस घराने में आइए। यहाँ दुर्लभ राग मिलेंगे। इनकी कोई शाखा नहीं।

#ragajourney

किशोर कुमार के किस्से (Stories of Kishore Kumar)

किशोर कुमार (आभास कु. गांगुली) और लता जी पहली बार कैसे मिले, इसकी एक कहानी पढ़ी-सुनी है। दोनों मलाड के बॉम्बे टाकीज़ में रिकॉर्डिंग के लिए जा रहे थे। अब लता जी उन्हें पहचानती न थी, पर जहाँ-जहाँ वो ट्रेन बदलती, किशोर कुमार भी बदलते जाते। लता जी को लगा कि कोई सरफिरा पीछे पड़ गया है। वो भागते-भागते स्टूडियो पहुँची, तो वहाँ भी पीछे आ गए। आखिर लोगों ने बताया कि ये अशोक बाबू के भाई हैं, और इनका नाम ही किशोर कुमार है जिनके साथ आपका गायन है।

किशोर दा लता जी से हमेशा अपनी फीस एक रुपया कम लेते, आदर स्वरूप। ऐसी एक रुपए की कहानी पं. रविशंकर और विलायत ख़ान की भी है, पर वो किसी और मसले पर है। वो फिर कभी। यहाँ बस किशोर जी का लता जी के लिए आदर था।

एक दफे लता जी लेट हो गयी, तो उनका हिस्सा भी किशोर दा ने गा दिया। वो गीत “आ के सीधी लगी दिल पे जैसे कटरिया” मशहूर भी रहा, जिसमें पुरूष-स्त्री की आवाज बदल-बदल कर किशोर दा ने मौज-मस्ती में गाया।

किशोर दा को बाद में ‘लता मंगेशकर सम्मान’ मिला। और जब यह सम्मान मिला, उसके अगले साल सरकार ने ‘किशोर कुमार सम्मान’ की भी घोषणा कर दी। मरणोपरांत भी किशोर दा उनके पीछे चलते ही रहे।

क्या किशोर कुमार पर के.एल. सहगल का प्रभाव था? इस पर संदर्भ सुनाने से पहले ये पूछता हूँ कि किशोर दा पर किस का प्रभाव नहीं था? वो तो मजाक-मजाक में अपने भ्राता अशोक कुमार की भी खूबसूरत नकल उतारते। बिना किसी संगीत प्रशिक्षण के वो किसी महान् गायक की कॉपी कर लेते। गायक तो छोड़िए, जरूरत पड़ने पर एक बार लता जी के बदले भी गा दिया!

अब सहगल वाली बात पर आता हूँ। एक दफे सचिन देव बर्मन किशोर दा के घर पहुँचे तो वह बाथरूम में थे और नहाते हुए के.एल. सहगल की कॉपी करते बीच में योडल कर रहे थे। जब वो बाहर निकले तो एस.डी. बर्मन ने कहा कि किशोर! तुम ये नकल छोड़ दो, गला तोड़ दो, फिर निकलेगी किशोर कुमार की आवाज!

“कहना है, कहना हैss आज तुम से ये पहली बार। तुम ही तो लाई हो जीवन में मेरे प्यार, प्यार, प्यार।”

फ्लाइट की तैयारी में यही गीत सुनने लगा और मिथिला पहुँच गया। किशोर कुमार ने ही पहुँचाया। वो जब पकड़े जाते हैं, तो ‘अनुराधा अनुराधा…’ कहकर चिल्लाते हैं। क्यों?

किशोर कुमार के कैरैक्टर का नाम इस फिल्म में विद्यापति है। अब आगे की कहानी का कोई पक्का स्रोत नहीं। पर, मैं जितना पता लगा सका, बताता हूँ।

1937 ई. में फिल्म आई थी ‘विद्यापति’ जिसमें पृथ्वीराज कपूर ने मिथिला नरेश शिव सिंह का किरदार निभाया था। उनकी पत्नी कवि विद्यापति से आकर्षित होती है। विद्यापति के कई गीत काफी कामुक हैं, जो अवश्य किसी प्रेमिका से जुड़े होंगें, पर मेरे पास साक्ष्य नहीं। इस फिल्म में उनका रानी से प्रेम दिखाया गया है। अब रानी गई विद्यापति के पास, तो राजा विद्यापति की संगिनी अनुराधा से जुड़ जाते हैं। यह क्रॉस-कनेक्शन है।

विद्यापति रानी के साथ, राजा विद्यापति की संगिनी (गर्लफ्रेंड) के साथ। और वही थी विद्यापति की अनुराधा। यह फिल्म उस समय एक विद्रोही और विवादित फिल्म भी कही गई, जो समाज पर कुप्रभाव डाल सकती थी। खैर।

एक और कनेक्शन यह है कि इस फिल्म में मन्ना डे के चाचा जी के.सी. डे अनुराधा को ढूँढते आते हैं और गीत गाते हैं “गोकुल से गए गिरधारी”। यही के. सी. डे सचिन देव बर्मन के गुरु थे। अब पड़ोसन में संगीत दिया आर.डी. बर्मन ने और मन्ना डे ने भी गायकी की, तो ट्रिब्यूट देना बनता है।

फिल्मों में कुछ भी यूँ ही नहीं होता। हर चीज की वजह होती है। विद्यापति की अनुराधा भी मुझे ‘फिल्मी फिक्शन’ में मिल ही गई। सच में ऐसी कोई अनुराधा थी या नहीं, ये नहीं पता। पर राजा शिव सिंह के समय विद्यापति तो थे।

#ragajourney

शहरनामा (Books on cities)

1. पटना

पटना: खोया हुआ शहर– अरुण सिंह

पटना रफ कट– सिद्धार्थ चौधरी

पटना: दास्तां-ए-पाटलीपुत्र- रामजी मिश्र मनोहर

पटना: अ मैटर ऑफ रैट्स- अमिताव कुमार

2. फैजाबाद

शहरनामा फैजाबाद- यतींद्र मिश्र

3. गोरखपुर

शहरनामा गोरखपुर- वेद प्रकाश पाण्डे

4. मुंबई

मैक्सिमम सिटी- सुकेतु मेहता

5. लखनऊ

किस्सा किस्सा लखनऊआ- हिमांशु वाजपेयी

लखनऊ: सिटी ऑफ इल्यूजन- रोज़ी जोन्स

आपका लखनऊ- योगेश प्रवीण

लखनऊ मेरा लखनऊ- मनोहर श्याम जोशी

दूसरा लखनऊ- नदीम हसनैन

लखनऊ डोमेनियर्स- अखिलेश मयंक

6. दिल्ली

दिल्ली जो एक शहर था- महेश्वर दयाल

सिटी ऑफ ज़िन्स- विलियम डैलरिम्पल

डेल्ही:अननोन टेल्स ऑफ सिटी और लिंगरिंग चार्म्स ऑफ डेल्ही- आर वी स्मिथ

डेल्ही- खुशवंत सिंह

7. बनारस

कैलिडोस्कोप सिटी: अ यर इन बनारस- पियर्स मूर

बनारस: सिटी ऑफ लाइट्स- डायना एल एक

काशी- ओ.पी. केजरीवाल

8. कावरेत्ती

लक्षद्वीप एडवेंचर्स- दीपक दयाल

9. पॉन्डिचेरी

अ हाउस इन पांडीचेरी- ली लांग्ले

10. जमालपुर

जमालपुर का साहित्यिक इतिहास- उमाशंकर निशेष

नाइट ट्रेन टू जमालपुर- एंड्रयूज मार्टिन

जमालपुर यर्स- आनंदमूर्ति

11. कलकत्ता

सिटी ऑफ जॉय- डोमिनिक लापीयरे

12. बेंगलुरू

बैंगलोर- पीटर कोलैको

13. जैसलमेर

सोनार किला- सत्यजीत रे

14. पलामू

कोयल के किनारे किनारे

मक्लुस्कीगंज- विकास कु. झा

15. दरभंगा

डिस्ट्रिक्ट गजेटियर- पी.सी. राय चौधरी

16. गाज़ीपुर

आधा गाँव- राही मासूम रज़ा

श्वेत पत्र- विवेकी राय

17. देवास

एक शहर देवास, कवि नईम और मैं- प्रकाश कांत

18. राँची

राँची स्मृति मंजूषा- राम रंजन सेन

राँची: तब और अब- श्रवण कु. गोस्वामी

19. समस्तीपुर

समस्तीपुर गजटियर- नरेश कुमार विकल

20. इलाहाबाद

जीरो रोड- नासिरा शर्मा

शहर में कर्फ्यू- विभूति नारायण राय

21. शाहजहाँपुर

शाहजहाँपुर का इतिहास- नानक चंद महरोत्रा

22. बगहा

जंगल जहाँ से शुरू होता है- संजीव

23. जौनपुर

कोहबर की शर्त- केशव प्रसाद मिश्र

24. मुंगेर

मुंगेर, थ्रू द एजेज- डी पी यादव

#शहरनामा

The old man with ‘tuk tuk

पाकिस्तान ही क्या, यह उपमहाद्वीप की ही समस्या थी कि विकेट गिरने शुरु होए तो फिर ताश के पत्तों की तरह गिर गए। कुछ मौके आते कि पाँच विकेट गिरने पर कपिल देव ने अकेले धुआँधार खेल मैच जिता दिया, या जावेद मियाँदाद जम गए और आखिरी गेंद में छक्का मार ही जीता। लेकिन यह बस कुछ यादगार पारीयों तक ही सिमटा था। श्रीलंका में भी राणातुंगा-डीसिल्वा ने ‘96 के आस-पास ही मिडल-ऑर्डर को मजबूती दी, लेकिन तब तक वे बूढ़े हो चुके थे।

लेकिन, बूढ़े खिलाड़ियों में एक नाम उस वक्त जरूर याद आता है जब भारत-पाकिस्तान का खेल आता है। जिस उम्र में खिलाड़ी रिटायर होने लगते हैं, उस वक्त यह खिलाड़ी टी-20 टीम में चुना जाता है। छठे स्थान पर उतर कर पाकिस्तान को कई खेलों में विजय दिलाता है, जोगिंदर शर्मा के आखिरी ओवर में भी छक्का लगा कर भारतीयों को मियाँदाद की याद दिलाता है। और फिर भारत से हार कर पाकिस्तान की जनता के लिए मरदूद बनता है।

पाकिस्तान में चुटकुले चलते, उलाहना दिए जाते कि मिस्बा-उल-हक कि तरह टुक-टुक मत कर यार! लेकिन इस खिलाड़ी में टुकटुकाने की भी क्षमता थी, और लंबे छक्के लगाने की भी। यह पाकिस्तान का सबसे सफल टेस्ट कप्तान भी बना। लेकिन मिस्बा-उल-हक पाकिस्तान में मोहाली की उस हार के लिए ही याद किया जाता रहेगा, जब वह अंत तक अकेले लड़ता तो रहा लेकिन यह बूढ़ा आखिर गिर गया।

भारत को भी यह फिनिशर जरूर याद रहेगा, जो फिनिश न कर सका।

#दीवार #finishers #cricket

पायजामा पिकासो (The Pyjama Picasso)

एकदिवसीय खेल कभी ओपनर्स का खेल था। वह गिरे तो खेल लगभग खत्म। अब तेंदुलकर-गांगुली गिरे, या मार्श-बून। यह जरूर था कि इन्हें गिराना आसान न था। लेकिन विश्व-विजेता टीमों में जब बड़े-बड़ों के गिरने का लोग जश्न मना रहे होते, तो च्विंगम चबाते खूँखार विवियन रिचर्ड्स को मैदान में आते देख सोचते कि भला क्यों विकेट जल्दी-जल्दी ले लिए।

इन ‘मिडल-ऑर्डर’ के उस्तादों में जब ऑस्ट्रैलिया के एक खिलाड़ी की चिकित्सकीय जाँच हुई तो पाया गया कि उसकी हृदय-गति कम है, और फेफड़े मजबूत हैं। यानी वह तनाव लेता नहीं, और भाग खूब सकता है। उस खिलाड़ी माइकल बेवन ने अपनी जीवनी में भी लिखा कि तनाव देने की ही चीज होती है, लेने के नहीं। चार गेंद में बारह ही रन तो बनाने हैं। वह चाहते तो पहले तेज गति से भी खेल सकते थे, लेकिन वह कछुआ चाल से धीरे-धीरे रन चुराते हुए इस मंजिल तक पहुँचे और फिर जीत भी गए। बस हर गेंद में एक रन आने की तरकीब हो, एक गेंद छूटी तो दो रन; दो गेंदें छूटी तो एक चौका।

एक समीक्षक ने कहा कि बेवन के दिमाग में कैलकुलेटर है, और हाथ में एक नाजुक चिमटा है। वह अपनी मर्जी से गेंद को उठा कर दो फील्डर के बीच निकालना जानता है। और इसलिए स्टीव वॉ ने उन्हें पायजामे में पिकासो कहा, जबकि स्टीव वॉ स्वयं इस तकनीक के उस्ताद थे। जो ‘96 के बाद के क्रिकेट देख रहे होंगे, उन्होंने बेवन को आउट होते कम ही देखा होगा। बल्कि ‘नॉट आउट’ रहने की वजह से उनका औसत उनके उच्चतम स्कोर से अधिक था।

एक खिलाड़ी जिसने अपने जीवन में गिने-चुने छक्के लगाए, दो सौ से ऊपर मैचों में मात्र छह शतक लगाए, आज भी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ फिनिशर्स में क्यों गिना जाता है? कुछ तो बात होगी।

#दीवार #finishers #cricket #walls

सोशल मीडिया में ‘कन्फ्लिक्ट-मैनेजमेंट’

सोशल मीडिया में आपसी टकराव या मतभेद आम बात है, किंतु कभी-कभार इससे मित्रता टूटने से लेकर मानसिक क्षति तक बात पहुँच जाती है। सोशल मीडिया की वजह से दंगे भी हो रहे हैं, और मृत्यु भी। विश्व के अधिकतर देशों में (भारत में भी) राजनीति और धर्म अहम् मुद्दे हैं, जिनसे सोशल मीडिया में ‘कन्फ्लिक्ट’ जन्म लेते है। लोकतांत्रिक देशों में पार्टी या पंथ की ओर झुकाव होना प्राकृतिक है। सब के वैयक्तिक विचार और पारिवारिक मसले भी भिन्न हैं। अलोकतांत्रिक देशों में तो सोशल मीडिया पर एक हद तक पाबंदी और नियंत्रण भी है। कई बार लिखने वाला बच निकलता है, और उसकी पोस्ट शेयर होकर युवाओं या अपरिपक्व लोगों के बीच मतभेद का कारण बनती है। वहीं दूसरी ओर, लेखक पर भी भौतिक, मानसिक या वैधानिक आघात संभव हैं। तो यह सवाल मौजू है कि इनसे कैसे निजात पाएँ? ‘कन्फ्लिक्ट-मैनेजमेंट’ आखिर कैसे करें?

सोशल मीडिया या कहीं भी ‘कन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट’ के पाँच सूत्र है- दो ‘A’ और तीन ‘C’.

१. Accomodate – एक को हार माननी होगी या दूसरे की बात माननी होगी।

२. Avoid- आप घोर असहमत हैं, तो टिप्पणी न करना। या लगे कि बिल्कुल नहीं बनने वाली, तो ब्लॉक करना।

३. Collaborate- दो, पाँच या सौ भिन्न प्रवृत्ति के लोग किसी एक बिंदु के लिए सहयोग दे सकते हैं। सोशल मीडिया समूह बना सकते हैं। उसके नियम बना कर संगठित रूप से कुछ सकारात्मक कर सकते हैं।

४. Compromise- सिर्फ एक नहीं, दोनों कुछ कदम पीछे लें, माफी माँगें, समझौता करें। कहा-सुना माफ करें।

५. Compete- यह मीमांसा कही जा सकती है। कई बार दो श्रेष्ठ और योग्य व्यक्ति एक दूसरे की रचनात्मक आलोचना कर सकते हैं, शास्त्रार्थ कर सकते हैं। इससे भी ज्ञान-सृजन होता है।

दो या अधिक व्यक्तियों के मध्य भिन्न-भिन्न स्थिति संभव है। पूर्ण असहमति गर अभिव्यक्त हो, तो उत्तर छोटी दें या न दें, या यह स्पष्ट कह दें कि चूंकि पूर्ण असहमति है, इसलिए इसमें बात आगे संभव नहीं। कुछ कदम तो दोनों को चलना होगा। ज्यादा असहमति या किसी खास बिंदु पर घोर असहमति हो तो इसका यथासंभव उत्तर दिया जा सकता है। पर शुरूआत कुछ ऐसा करना ठीक है कि, “आपकी असहमति का सम्मान है लेकिन…” इत्यादि। थोड़ी असहमति का तो दिल खोल कर स्वागत करें। आप यह भी कह सकते हैं, “आपकी बात ठीक है। मैं ही गलत कह गया।” या “आपका प्वाइंट नोट कर लिया है।” इत्यादि। पूर्ण असहमति की पुनरावृति हो रही हो यानी कोई बारम्बार आपसे पूर्ण असहमत हैं। यह ‘डेडलॉक’ है, जिसका हल असंभव हो रहा है। इसमें ईर्ष्या और घृणा भी जुड़ सकती है। एक-दूसरे को पढ़ कर तनाव हो सकता है। वो आपके न उत्तर देने पर भी टिप्पणियों में दूसरों से उलझते दिख सकते हैं। इसके दो पैटर्न हैं। पहला यह कि वह व्यक्ति परिपक्व हैं या मंजे खिलाड़ी है। आपसे असहमति के बाद भी आपको पढ़ते रहे हैं, और आप आश्वस्त हैं कि उन्हें तनाव नहीं होता। उनके साथ कुछ मजाकिया नोंक-झोंक चल सकती है। पर उनके पैटर्न को समझने में वक्त जरूर लगाएँ। दूसरा यह कि वह व्यक्ति नियमित रूप से क्रोधित हैं, या अपशब्द कह रहे हैं और आप यह महसूस कर रहे हैं कि वह तनाव में हैं। ऐसे में आपस में पर्दा डालना ही श्रेयस्कर होगा। इसे फ़ेसबुक के शब्दों में ‘ब्लॉक’ कहते हैं, पर यह उनकी तनाव-मुक्ति के लिए आवश्यक है। किसी भी परिस्थिति में “Thy shall do no harm.” यानी आप किसी को मानसिक या शारीरिक हानि पहुँचाने का प्रयास न करें। दूसरों की क्षति तो न ही हो।

अगला प्रश्न यह है कि अपनी क्षति कैसे रोकी जाए?

हर व्यक्ति का आत्मावलोकन ढर्रा अलग है। कई लोग सोशल मीडिया से ही दूरी बना लेते हैं। ख़ास कर भारतीय महिलाएँ अपना दायरा समेट लेती हैं। यह उचित भी है कि सोशल मीडिया से एक सुरक्षित दूरी बना कर रखी जाए। लेकिन यह आज के ‘स्मार्ट-फोन’ दौर में असंभव होता जा रहा है। आप इससे बच कर नहीं रह सकते। अकेले पड़ जाएँगे। यह अपने-आप में अवसाद का कारण है। किशोर और युवा-वर्ग में एक और बात देखी जा रही है कि वे ‘पीयर-प्रेशर’ में अवसाद-ग्रस्त हो जाते हैं। फलाँ बेहतर दिखता है, बेहतर लिखता है, बेहतर जीवन जीता है। इससे अवसाद जन्म लेता है। लेकिन, यह एक ‘वर्चुअल’ दुनिया का अंदाजा भी देता है कि बाहर की दुनिया में भी इस तरह के तनाव मौजूद हैं। यह एक तरह का ‘सिमुलेशन प्रॉजेक्ट’ है कि आप ‘वर्चुअल’ दुनिया के तनाव झेल गए, तो बाहरी दुनिया के तनाव झेलने में कुछ आसानी होगी। कूप-मंडुक नहीं रहेंगे और यह खबर होगी कि दुनिया में भांति-भांति की प्रतिभाएँ हैं। इनसे किसी भी तरह का ‘पीयर-प्रेशर’ न बनने पाए।

एक दूसरा माध्यम है तकनीक का उपयोग। तकनीक अब यह बता देती है कि सोशल मीडिया का प्रतिदिन कितने घंटे उपयोग किया जा रहा है। इसे धीरे-धीरे एक सुरक्षित स्तर तक लाया जा सकता है। हालांकि सुरक्षित स्तर की परिभाषा अब तक नहीं बनी। आज जब सोशल मीडिया प्रोमोशन का भी माध्यम है, संवाद का भी, और वांछित-अवांछित ज्ञान का भी, तो यह स्तर तय करना कठिन है। कई लोगों ने इसे सकारात्मक साधन बनाया है, और उनका सोशल मीडिया उपयोग अधिक है। इसके विपरीत कई लोगों ने इसे नकारात्मक साधन बनाया है, और उनका भी उपयोग अधिक है। तो यह स्पष्ट है कि नकारात्मक उपयोग का स्तर और समय घटाना है, या शून्य करना है।

कई बार सोशल मीडिया से ‘ब्रेक’ लेना भी नकारात्मकता घटाता है, जब पुनर्जागृत होकर लौटते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि व्यक्ति के वास्तविक जीवन और वर्चुअल जीवन के मध्य का अनुपात क्या है? ऐसे केस मिल रहे हैं, जब सोशल मीडिया पर मुखर व्यक्ति जब किसी से आमने-सामने बात करते हैं तो एक शब्द नहीं कह पाते। उनकी मुस्कुराहट फ़ोन तक ही सीमीत रह जाती है और वास्तविक जीवन में हँस नहीं पाते। यह स्थिति उचित नहीं। सोशल मीडिया में बिताया गया समय बाहरी दुनिया में बिताए गए समय से कम हो, तो अवसाद या ‘मल्टिपल पर्सनालिटी डिसॉर्डर’ की समस्या कम होगी।

स्वयं को सुरक्षित रखने के दो अन्य मुख्य साधन हैं- धैर्य और सचेतना। अक्सर सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया बहुत शीघ्र आती है, जिससे बचना चाहिए। वक्त लेकर ही प्रतिक्रिया देनी चाहिए या धारणा बनानी चाहिए। यह धैर्य आवश्यक है। इसी तरह विश्लेषक क्षमता और सचेतना। बहुकोणीय विश्लेषक क्षमता हर किसी में हो, यह जरूरी नहीं। यह अनुभव और अध्ययन से ही शनै:-शनै: विकसित होता है। लेकिन ‘कन्फ्लिक्ट’ के अवसर पर सभी पक्षों को समझना और विश्लेषण करना सोशल मीडिया में भी संभव है। चेतना मनुष्य का गुण है, जिसके लिए इन्द्रिय सक्रिय रहने चाहिए। ‘परसेप्शन’ तभी तो संभव होगा। आधी बात पढ़ना, ध्यान न देना, या यूँ ही कुछ लिख देना चेतना की कमी है।

सोशल मीडिया विश्व में अपेक्षाकृत नयी विधा है, जो पिछले दो दशकों में विकसित हुई है। इसमें परिपक्वता आने में भी वक्त लगेगा और प्रयोग भी करने होंगे। किसी भी निष्कर्ष पर अभी पहुँचना कठिन है। कोई ‘गोल्डेन रूल’ भी बनाना असंभव है। लेकिन जो मूलभूत साधन हैं, जिसे हम संवाद में प्रयोग में लाते हैं, वह नहीं बदलते। समस्या तभी आती है जब हम ‘वर्चुअल’ दुनिया को वास्तविक दुनिया से अलग रखते हैं, और दोनों को दो भिन्न रूप में जीने लगते हैं। यह दोनों जब एकरूप होंगे तो समस्या नहीं होगी। यानी काल्पनिक दुनिया में जिससे हम संवाद कर रहे हैं, उनसे उसी रूप में करें जैसे वह सामने बैठे हों। जिस तरह से हम बाहर विवाद सुलझाते हैं, उसी तरह सोशल मीडिया में भी। यह बात जितनी साधारण और सहज लगती है, उतनी है नहीं। आखिर ‘कन्फ्लिक्ट’ बाहरी दुनिया में भी, ‘वर्चुअल’ में भी और मनुष्य के अपने मष्तिष्क में भी। अगर यह सहज होता, तो ‘कन्फ्लिक्ट’ होते ही क्यों? यह व्यक्तिगत नहीं, सामाजिक परिपक्वता की बात है, जिसके लिए सामूहिक और बहुपक्षीय प्रयत्न से ही रास्ता निकलता है।

Previously published in Kadambini June 2019