मेरुखण्ड : उस्ताद अमीर ख़ान

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एक संगीत की गप-शप में बात हुई कि भला इंदौर भी कोई घराना है? ‘घराना’ तो वह हुआ जिसमें कम से कम तीन पीढ़ीयाँ हो। इंदौर तो उस्ताद अमीर ख़ान से शुरू और समझो उन्हीं से खत्म। कहाँ हुई तीन पीढ़ीयाँ? यही बात लोग पं. जसराज के मेवाती घराना को भी कहते रहे। दिल्ली को भी लोग गायकी घराना नहीं मानते, जबकि वे खुद को सीधा खुसरो से जोड़ते हैं।

मैंने कहा कि दस पीढ़ी के घराने बना लो, और एक उस्ताद अमीर ख़ान दिखा दो। उनकी शैली दिखा दो, संपूर्णता दिखा दो, आलाप और लयकारी में वह ठहराव, वह नज़ाकत, वह गंभीरता दिखा दो। यह बात अब पुरानी हुई कि ‘घराना’ शब्द को अब ऐतिहासिक मान कर पूर्णाहुति दे देनी चाहिए। कुमार गंधर्व, किशोरी अमोनकर, मुकुल शिवपुत्र, उल्हास कशालकर और देवास के राज़ब अली ख़ान किसी घराने के हैं ही नहीं। और भी कई हैं जिन्होंने खुद को जबरदस्ती तानसेन तक से जोड़ रखा है। अगर पीढ़ीयों की ही बात है तो क्या अब अली अकबर ख़ान का कैलिफॉर्निया घराना और इमरत ख़ान का सेंट लुइस घराना बनेगा? और अगर एक शैली की बात है तो रामपुर-सहसवान हो या किराना, उनके हर गायक की शैली अलग रही है। शैली की माने तो बनारस कबीर चौरा के हर गली में कोई घराना मिल जाए।

इकलौते उस्ताद अमीर ख़ान को एक पूरा ‘म्यूज़िक स्कूल’ माना जा सकता है। यूँ लगता है कि जैसे भारत के केंद्र में पूरे हिंदुस्तान का संगीत केंद्रित हो गया है। उन्होंने सब साध लिया और वह भी बिन गंडा बँधाए साध लिया। जब लोग चालीस-चालीस घंटे का ‘चिल्ला’ व्रत कर रियाज करते थे। अमीर ख़ान के पिता शाहमीर ख़ान कहते थे, “दस घंटे रियाज करने से बेहतर है कि चार घंटे रियाज करो और चार घंटे सोच बनाओ।” कितनी साधारण बात है! खयाल का तो अर्थ ही सोच है। बिन सोच बनाए, आदमी क्या खयाल गाएगा?

गायकी का एक सबसे कठिन अंग है- मेरुखण्ड। इसमें एक राग के स्वरों के जितने संभावित क्रम-संयोजन (पर्म्यूटेशन कॉम्बिनेशन) हैं, उसे अलटा-पलटा कर गाया जाता है। यह साधने के लिए अमीर ख़ान बंबई के भिंडीबाज़ार में उस्ताद अमन अली ख़ान के साथ न जाने कितने वक्त बैठे। कई लोग कहते हैं कि तवायफ़ मुन्नी बाई से उनका संबंध भी इसी साधना का अंग था। मुन्नी बाई की माँ जगमगी बाई से किराना घराना के अब्दुल वाहिद ख़ान के संबंध थे। उनके पास कई दुर्लभ चीज (बंदिश) मौजूद थी। दोनों कमरों के बीच एक गुसलखाने में छुप कर उस्ताद अमीर ख़ान उनसे सीखते। वाहिद ख़ान यूँ तो बहरे थे, लेकिन उनको यह लगने लगा कि कोई जासूसी कर रहा है। यह वो जमाना था जब संगीत की जासूसी भी होती थी, अब तो कोई सामने यू-ट्यूब पर रखे संगीत भी न छूए। खैर, वाहिद ख़ान को जब यह शुबहा हुआ, उन्होंने एक चालाकी की। वह बंदिश का स्थायी तो गाते, अंतरा गाते ही नहीं। उन्होंने इस चक्रव्यूह में तो अभिमन्यु को फांस लिया कि अमीर ख़ान ने आधा ही सीखा। जब तक अमीर ख़ान ने उनसे गंडा बँधाने की हिम्मत जुटायी, बहरे वाहिद ख़ान चल बसे। आज भी अगर आप अमीर ख़ान की रिकॉर्डिंग सुने, अंतरा गायब मिलेगा। वह तो वाहिद ख़ान के साथ ही चला गया।

मेरुखण्ड की बात कर रहा था। जब शुजात ख़ान (विलायत ख़ान के बेटे) छोटे थे, तो देहरादून में अपने घर में सुबह-सुबह रियाज कर रहे थे। उस घर में तो ऐसा था कि विलायत ख़ान कहते, उनका मुर्गा भी राग पहाड़ी में बांग देता है। उस वक्त उस्ताद अमीर ख़ान भी वहाँ मौजूद थे, तो रियाज से नींद खुल गयी।

वह शुजात के पास आए और पूछा, “क्या बजा रहे हो?”

उन्होंने कहा, “बिलासखानी तोड़ी”

कहा जाता है कि तानसेन के पुत्र बिलासख़ान अपने महान् पिता के विपरीत मंदबुद्धि थे। वह तोड़ी के बदले भैरवि गा बैठे, और यूँ बन गयी बिलासखानी तोड़ी।

अमीर ख़ान ने पूछा, “यह किसने सिखाया तुम्हें?”

शुजात ख़ान ने कहा, “अब्बा हज़ूर ने”

“अरे! उनको कुछ आता भी है? सितारिए क्या बूझें बिलासखानी तोड़ी?”

फिर उस अमिताभ बच्चन सरीखी लंबी काया वाले उस्ताद अमीर ख़ान ने अपनी आँखें बंद की, पीठ सीधी की, और धीरे-धीरे आलाप लेना शुरू किया। उनका आलाप इतना धीमा होता कि लोग मज़ाक करते कि उनके दो स्वरों के बीच आदमी एक कप चाय पी ले। यही वह वजह थी कि झूमरा जैसा धीमा ताल बस वही सँभाल पाते। यह कमाल की बात है कि संगीत में गति सुलभ है, और ठहराव कठिन। तो उस्ताद ने बिल्कुल ठहराव के साथ एक-एक स्वर खोलना शुरू किया। मेरु का खण्ड खण्ड होने लगा। इतने में विलायत ख़ान भी जाग गए और देखा कि आज तो कमाल हो रहा है। दुनिया के सर्वोत्तम सितार-वादक चुपचाप तानपुरा लेकर बैठ गए। अमीर ख़ान गा रहे हैं, विलायत ख़ान तानपुरा बजा रहे हैं, और बालक शुजात सितार बजा रहे हैं। यह दृश्य अकल्पनीय है।

यहाँ एक जमीनी रिश्ता बताना जरूरी है। विलायत ख़ान साहब की सगी बहन को उस्ताद अमीर ख़ान ने विवाह के कुछ ही दिनों बाद छोड़ दिया था, और तवायफ़ मुन्नी बाई के साथ रहने लगे थे। जब तक विलायत ख़ान की माँ जिंदा थी, उनसे मिलने की सख्त मनाही थी। लेकिन संगीत का रिश्ता जमीनी नहीं, रूहानी होता है। विलायत ख़ान छुप कर उस्ताद अमीर ख़ान से मिलते और सीखते रहे। उनके सितार में जो सोच नजर आती है, वह अमीर ख़ान से ही प्रभावित है। अब सोच देखिए कि विलायत-इमरत ख़ान बंधु की एक रिकॉर्डिंग मैंने सुनी- अ नाइट ऐट ताज। इसमें सुंदर कोमल मुमताज की ध्वनि विलायत ख़ान के गायकी अंग वाले ‘सिंगिंग सितार’ से आ रही है, और शाहजहाँ का पौरुष भारी-भरकम सुरबहार पर छोटे भाई इमरत बजा रहे हैं। यह कमाल की सोच (इमैज़िनेशन) और कमाल की जुगलबंदी है। अगर इस सोच को और करीब से समझना है तो किसी गोधूलि बेला में उस्ताद अमीर ख़ान का राग मारवा सुना जाए। इसमें ख़्वाह-म-ख़्वाह की कलाबाजी या ऊँची तान नहीं, एक ठहराव है जो ढलते सूरज में दिखना चाहिए। मैं यह नहीं कह रहा कि तान न हो, बड़े ग़ुलाम अली ख़ान इसी मारवा को बुलंद तान लेकर गाते ही हैं। लेकिन हर व्यक्ति का संगीत उसके पूरे व्यक्तित्व का सार भी तो है। अब पंजाब के पहलवान सरीखे भारी-भरकम शरीर और तगड़ी मूँछों वाले बड़े ग़ुलाम ख़ान की तान तो बुलंद होगी ही। वहीं इंदौर की सौम्यता लिए, बिना मूँछों के, सधी नाक और ऐनक में उस्ताद अमीर ख़ान तो सहजता से ही गाएँगे।

विलायत ख़ान कहते थे, “फैयाज़ ख़ान से मैंने शाही अंदाज सीखा, अब्दुल करीम ख़ान से माधुर्य सीखा, बड़े ग़ुलाम ख़ान से मैंने सुर की आजादी सीखी, और अमीर ख़ान से मैंने सीखा- इबादत।”

यही वह वजह थी कि जब अमीर ख़ान की कार दुर्घटना में मृत्यु हुई तो बहन से तलाक के बावजूद उनका शरीर विलायत साहब कलकत्ता लेकर आए। और यह भी इत्तिफाक है कि आज विलायत ख़ान और अमीर ख़ान की कब्र कलकत्ता में एक ही जगह साथ-साथ है। जैसे फिर वही बिलासखानी तोड़ी बज रही हो, मेरु का खण्ड खण्ड हो रहा हो, उस्ताद अमीर ख़ान गा रहे हों।

(Author- Praveen K Jha. Previously published in Prajatantra, Indore)