मेरुखण्ड : उस्ताद अमीर ख़ान

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एक संगीत की गप-शप में बात हुई कि भला इंदौर भी कोई घराना है? ‘घराना’ तो वह हुआ जिसमें कम से कम तीन पीढ़ीयाँ हो। इंदौर तो उस्ताद अमीर ख़ान से शुरू और समझो उन्हीं से खत्म। कहाँ हुई तीन पीढ़ीयाँ? यही बात लोग पं. जसराज के मेवाती घराना को भी कहते रहे। दिल्ली को भी लोग गायकी घराना नहीं मानते, जबकि वे खुद को सीधा खुसरो से जोड़ते हैं।

मैंने कहा कि दस पीढ़ी के घराने बना लो, और एक उस्ताद अमीर ख़ान दिखा दो। उनकी शैली दिखा दो, संपूर्णता दिखा दो, आलाप और लयकारी में वह ठहराव, वह नज़ाकत, वह गंभीरता दिखा दो। यह बात अब पुरानी हुई कि ‘घराना’ शब्द को अब ऐतिहासिक मान कर पूर्णाहुति दे देनी चाहिए। कुमार गंधर्व, किशोरी अमोनकर, मुकुल शिवपुत्र, उल्हास कशालकर और देवास के राज़ब अली ख़ान किसी घराने के हैं ही नहीं। और भी कई हैं जिन्होंने खुद को जबरदस्ती तानसेन तक से जोड़ रखा है। अगर पीढ़ीयों की ही बात है तो क्या अब अली अकबर ख़ान का कैलिफॉर्निया घराना और इमरत ख़ान का सेंट लुइस घराना बनेगा? और अगर एक शैली की बात है तो रामपुर-सहसवान हो या किराना, उनके हर गायक की शैली अलग रही है। शैली की माने तो बनारस कबीर चौरा के हर गली में कोई घराना मिल जाए।

इकलौते उस्ताद अमीर ख़ान को एक पूरा ‘म्यूज़िक स्कूल’ माना जा सकता है। यूँ लगता है कि जैसे भारत के केंद्र में पूरे हिंदुस्तान का संगीत केंद्रित हो गया है। उन्होंने सब साध लिया और वह भी बिन गंडा बँधाए साध लिया। जब लोग चालीस-चालीस घंटे का ‘चिल्ला’ व्रत कर रियाज करते थे। अमीर ख़ान के पिता शाहमीर ख़ान कहते थे, “दस घंटे रियाज करने से बेहतर है कि चार घंटे रियाज करो और चार घंटे सोच बनाओ।” कितनी साधारण बात है! खयाल का तो अर्थ ही सोच है। बिन सोच बनाए, आदमी क्या खयाल गाएगा?

गायकी का एक सबसे कठिन अंग है- मेरुखण्ड। इसमें एक राग के स्वरों के जितने संभावित क्रम-संयोजन (पर्म्यूटेशन कॉम्बिनेशन) हैं, उसे अलटा-पलटा कर गाया जाता है। यह साधने के लिए अमीर ख़ान बंबई के भिंडीबाज़ार में उस्ताद अमन अली ख़ान के साथ न जाने कितने वक्त बैठे। कई लोग कहते हैं कि तवायफ़ मुन्नी बाई से उनका संबंध भी इसी साधना का अंग था। मुन्नी बाई की माँ जगमगी बाई से किराना घराना के अब्दुल वाहिद ख़ान के संबंध थे। उनके पास कई दुर्लभ चीज (बंदिश) मौजूद थी। दोनों कमरों के बीच एक गुसलखाने में छुप कर उस्ताद अमीर ख़ान उनसे सीखते। वाहिद ख़ान यूँ तो बहरे थे, लेकिन उनको यह लगने लगा कि कोई जासूसी कर रहा है। यह वो जमाना था जब संगीत की जासूसी भी होती थी, अब तो कोई सामने यू-ट्यूब पर रखे संगीत भी न छूए। खैर, वाहिद ख़ान को जब यह शुबहा हुआ, उन्होंने एक चालाकी की। वह बंदिश का स्थायी तो गाते, अंतरा गाते ही नहीं। उन्होंने इस चक्रव्यूह में तो अभिमन्यु को फांस लिया कि अमीर ख़ान ने आधा ही सीखा। जब तक अमीर ख़ान ने उनसे गंडा बँधाने की हिम्मत जुटायी, बहरे वाहिद ख़ान चल बसे। आज भी अगर आप अमीर ख़ान की रिकॉर्डिंग सुने, अंतरा गायब मिलेगा। वह तो वाहिद ख़ान के साथ ही चला गया।

मेरुखण्ड की बात कर रहा था। जब शुजात ख़ान (विलायत ख़ान के बेटे) छोटे थे, तो देहरादून में अपने घर में सुबह-सुबह रियाज कर रहे थे। उस घर में तो ऐसा था कि विलायत ख़ान कहते, उनका मुर्गा भी राग पहाड़ी में बांग देता है। उस वक्त उस्ताद अमीर ख़ान भी वहाँ मौजूद थे, तो रियाज से नींद खुल गयी।

वह शुजात के पास आए और पूछा, “क्या बजा रहे हो?”

उन्होंने कहा, “बिलासखानी तोड़ी”

कहा जाता है कि तानसेन के पुत्र बिलासख़ान अपने महान् पिता के विपरीत मंदबुद्धि थे। वह तोड़ी के बदले भैरवि गा बैठे, और यूँ बन गयी बिलासखानी तोड़ी।

अमीर ख़ान ने पूछा, “यह किसने सिखाया तुम्हें?”

शुजात ख़ान ने कहा, “अब्बा हज़ूर ने”

“अरे! उनको कुछ आता भी है? सितारिए क्या बूझें बिलासखानी तोड़ी?”

फिर उस अमिताभ बच्चन सरीखी लंबी काया वाले उस्ताद अमीर ख़ान ने अपनी आँखें बंद की, पीठ सीधी की, और धीरे-धीरे आलाप लेना शुरू किया। उनका आलाप इतना धीमा होता कि लोग मज़ाक करते कि उनके दो स्वरों के बीच आदमी एक कप चाय पी ले। यही वह वजह थी कि झूमरा जैसा धीमा ताल बस वही सँभाल पाते। यह कमाल की बात है कि संगीत में गति सुलभ है, और ठहराव कठिन। तो उस्ताद ने बिल्कुल ठहराव के साथ एक-एक स्वर खोलना शुरू किया। मेरु का खण्ड खण्ड होने लगा। इतने में विलायत ख़ान भी जाग गए और देखा कि आज तो कमाल हो रहा है। दुनिया के सर्वोत्तम सितार-वादक चुपचाप तानपुरा लेकर बैठ गए। अमीर ख़ान गा रहे हैं, विलायत ख़ान तानपुरा बजा रहे हैं, और बालक शुजात सितार बजा रहे हैं। यह दृश्य अकल्पनीय है।

यहाँ एक जमीनी रिश्ता बताना जरूरी है। विलायत ख़ान साहब की सगी बहन को उस्ताद अमीर ख़ान ने विवाह के कुछ ही दिनों बाद छोड़ दिया था, और तवायफ़ मुन्नी बाई के साथ रहने लगे थे। जब तक विलायत ख़ान की माँ जिंदा थी, उनसे मिलने की सख्त मनाही थी। लेकिन संगीत का रिश्ता जमीनी नहीं, रूहानी होता है। विलायत ख़ान छुप कर उस्ताद अमीर ख़ान से मिलते और सीखते रहे। उनके सितार में जो सोच नजर आती है, वह अमीर ख़ान से ही प्रभावित है। अब सोच देखिए कि विलायत-इमरत ख़ान बंधु की एक रिकॉर्डिंग मैंने सुनी- अ नाइट ऐट ताज। इसमें सुंदर कोमल मुमताज की ध्वनि विलायत ख़ान के गायकी अंग वाले ‘सिंगिंग सितार’ से आ रही है, और शाहजहाँ का पौरुष भारी-भरकम सुरबहार पर छोटे भाई इमरत बजा रहे हैं। यह कमाल की सोच (इमैज़िनेशन) और कमाल की जुगलबंदी है। अगर इस सोच को और करीब से समझना है तो किसी गोधूलि बेला में उस्ताद अमीर ख़ान का राग मारवा सुना जाए। इसमें ख़्वाह-म-ख़्वाह की कलाबाजी या ऊँची तान नहीं, एक ठहराव है जो ढलते सूरज में दिखना चाहिए। मैं यह नहीं कह रहा कि तान न हो, बड़े ग़ुलाम अली ख़ान इसी मारवा को बुलंद तान लेकर गाते ही हैं। लेकिन हर व्यक्ति का संगीत उसके पूरे व्यक्तित्व का सार भी तो है। अब पंजाब के पहलवान सरीखे भारी-भरकम शरीर और तगड़ी मूँछों वाले बड़े ग़ुलाम ख़ान की तान तो बुलंद होगी ही। वहीं इंदौर की सौम्यता लिए, बिना मूँछों के, सधी नाक और ऐनक में उस्ताद अमीर ख़ान तो सहजता से ही गाएँगे।

विलायत ख़ान कहते थे, “फैयाज़ ख़ान से मैंने शाही अंदाज सीखा, अब्दुल करीम ख़ान से माधुर्य सीखा, बड़े ग़ुलाम ख़ान से मैंने सुर की आजादी सीखी, और अमीर ख़ान से मैंने सीखा- इबादत।”

यही वह वजह थी कि जब अमीर ख़ान की कार दुर्घटना में मृत्यु हुई तो बहन से तलाक के बावजूद उनका शरीर विलायत साहब कलकत्ता लेकर आए। और यह भी इत्तिफाक है कि आज विलायत ख़ान और अमीर ख़ान की कब्र कलकत्ता में एक ही जगह साथ-साथ है। जैसे फिर वही बिलासखानी तोड़ी बज रही हो, मेरु का खण्ड खण्ड हो रहा हो, उस्ताद अमीर ख़ान गा रहे हों।

(Author- Praveen K Jha. Previously published in Prajatantra, Indore)

The Valentine Jayanti

Most popular male gods in India are either Lord Shiva or Hanuman-epitomes of manhood. While Shiva is fav among females, an ideal husband material with two naughty kids, Bajrang Bali Hanuman gulps plenty of laddoos from ‘no woman no cry’ sloganeering bachelors. The moment I realised I am loaded with enough testosterone, I switched from Lord Hanuman to Lord Shiva, and memorised the famous Shiv Tandava mantra. Ready for the kill!

Quiting Lord Hanuman began with quiting gymnasium, where I sweated hard on my biceps and pecs, and began looking like a mini-hanuman. Wore half-sleeve tight T-shirts shopped from Chor-bazaar, walking with forward-thrusted chest. Girl who always sat next to me, disappeared as if my sweat will make her pregnant. Realised my sweaty stinking stupid self and quit the bone-breaking muscle-aching gym sessions.

Switching to Shiva meant attitude, male anger and the ‘third-eye’. Trick worked. The girl returned, and my third-eye was all on her. Always talked to her looking down, with ‘trinetra’ right at her face. Soon I was in love like one of those Amol Palekar movies. I would strategically chose seat next to her, but would never talk, never meet eyes. And when the bubbly girl would offer to come to college canteen, the angry Shiva in me would rise from nowhere and reject her. As if I have millions of tasks. Same night, I would be drinking like ‘neelkanth’.

Then came the festival of love. Valentine’s day. Angry Shiva seemed to send his Sainiks in city of Pune to vandalise it. While Hanuman’s Bajrangi Sena is already locking horns somewhere else. Choice between brown-eyed girl and gods was little difficult, but boiling testosterone in me finally won.

Red roses were soaring high in demand, so chose the pink, and hid it between shining white Govinda-style baniyaan and my dashing blue full-sleeves, stuck beneath my jeans at waist. After a quick Reiki of library and canteen, located her among bunch of frolicking girls. To take the rose out sharply, made a window in shirt keeping the lower button open. Crashed into girls, and the rose right in her hand! Execution was flawless like Godse shooting Gandhi. We had a Vada-Pav together and remained friends forever. Never knew bloody rose was colour-coded. ‘Pink’ meant rose without testicles.

Happy Valentine’s!

The land of Nobel

Nobel Prize had been a childhood fascination for me, from the days I began collecting trophies in school quizzes and gully-debates. While Mother Teresa and Rabindra Nath Tagore seemed too ethereal, Hargobind Khorana seemed achievable and I began studying medicine. And when I first opened my email account on Hotmail, one of my first emails was directed to khorana@mit.edu scripted in a broken english,

Dear Dr. Khorana,

I had been fascinated by your research from childhood, and wish to join your lab. Though I am in process of application to your university and have taken all requisite tests, there are meagre chances to join your prestigious university. Please accept me as Eklavya if not Arjuna, by just replying this email.

Regards.”

Man never replied. Eklavya turned Devdas. Cursed the old man with abuses gulping bouts of drinks. Years later, I figured out man didn’t know how to reply emails. He didn’t even reply to White House when they conferred him with National Medal of Science. A white house representative had to track him down on foot to make him attend.

Anyway, I figured out, to win a Nobel- you have to become a cynic psychopath scientist with a french beard, an Einsteinian hairstyle, a test-tube in hand, and sitting in a US-lab. And here I was! Sitting in a prime lab in United States, with similar attire and outlook, and joined the most cynic professor’s lab. Man kept snails as his pets, who even followed his orders! My research progressed with snail pace, and I would have taken more Vodka shots in those test-tubes than performing experiments. Well, that was cynic!

One day my professor asked, “So Kumar! How is your research going?”

In serendipidity, I answered, “I am making a mathematical model of snail behaviour.” Huh!

“Hey! That’s awesome. Let’s meet up this wednesday and see it.”

WTF? Mathematical model of snail behaviour!!! What the hell is that?

Greatest solution to all problems existed even those days some 12 years back. Baba Google!

With a good bout of plagiarism and copy-paste Java animation programme, I was ready with a simulation program on snail movement. My professor clapped when the snail model moved dodgily on the computer screen. When I discussed the model with an IITian friend, man wrote his first mathematical paper on some ‘stochastic behaviour’ and scribbled my name in acknowledgement. The snail shit was superhit!

But, I knew Nobel would never be awarded for decoding a snail’s behaviour. It has to be a ground-breaking research which will shake the world. Something like, “The formula to kill the cancer”, “the secret of addiction”, “the special gene responsible for woman’s abnormal behaviour”, “the neuron which excites on seeing the porn”, “why Katappa killed Bahubali?”.

I quit the US Lab, and began my journey to ground-breaking research, breaking a coconut in one of the famous south Indian temples. The priest said looking at me, “You have a bright future waiting for you, all you lack is focus.” Priest was damn right!

Focus! I googled and ordered the famous book by Daniel Goleman “FOCUS”.

I don’t know if I misunderstood him, but to achieve a target, I understood I have to be close to the target. Left the country, weathered the snow, and landed for good in Land of Nobel. Searching for the clerk in Nobel committee who will get things done for me, and assures, “Kaam ho jaayega” (The work will be done!)

Norway! Here I am! Come on Nobel, now lay on me!

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 Epilogue:

In a dinner with Nobel laureate physicist Anthony Leggett (who incidently was my room-mate’s guide) in 2004, he asked, “Doc! You would know it better. Isn’t virus a live moving nanoparticle which targets our cells? Why the hell people are crazy for designing one to target this or that, when its right in front of us? Leave it. I don’t know anything about this.” And he laughed away.

Years later, in 2012, Nature published ‘virus as nano-particles’, what they called ground-breaking research. Beautiful minds toss such ideas on dinner table!

 

The blue ice: a shit-com

For whatever reasons, birds always found my head as a coveted shitting destination. Even in a crowded environment, if a bird is flying around, I would gear up myself holding a file or book overhead. My transient breath of relief would be annuled as the raven comes back swifter dropping on me accurately like a targeted missile. I was brutally splattered with bird-droppings during my short stint in Indian Institute of Science, which boasted of highest density of nasty crows (kauwa). For the first time in my life, I wore a Govinda-style yellow shirt to camouflage the shitty polka-drops.

The fear of bird-droppings soon extended to any flying object as I would hide even at sight of aeroplane. I always wondered what happens to the shit in the air. Most convenient way would be to disperse it in vastness of atmosphere, and cruise away. The untimely rains and windy splatters. My curiousity ended recently when an elderly woman in Bhopal (city in central India) got hit by a huge chunk of ice fallen from sky. Early investigations suggested it could be ‘blue ice’, human excreta disposed from aeroplanes which gets frozen in stratosphere. My fear wasn’t completely ungrounded and some do throw the shit right up in the air, especially Indian planes devoid of sanitary space on ground.

While the aeroplane mystery took some time, Indian railways were pretty blatant and open-minded from its inception. A hole in the toilet peeps directly down on track. At a usual train velocity of 150 km/hr, a 15 minute shit of yours can make roughly 38 km trail of shit droppings. Considering ever-engaged toilets in trains, the multi-origin shitty trail would extend from origin to destination spanning some 1000 kms. One of the royal heir I heard of, always took a local 30 minute railway stretch every morning at 6 0’clock, only to shit in moving train! His habit seem to have ended at a serious note when he disregarded the statutatory warning displayed in Indian Railways – Please do not use toilets when the train stops at platform. People say, constipated Raja-Saa’b continued his rituals even when train stopped. Sanitation fellows with long brooms began cleaning the toilets, shoving through holes beneath the train, and gave a powerful thrust when they found anything obstructive. This time, it was Raja Saa’b’s ass!

I haven’t utilised public toilets much in life, since I considered them as some sacred love destination. Similar to temple walls, toilet walls too are studded with scribbled names of ‘love-couples’. I wonder how somebody can have an amorous feeling while shitting, and scribble his flame’s name. Extreme love! Isn’t it? As I recently travelled and about to position myself strategically on a shaking commode, I found it written on toilet wall – I love you Priya. I pity the love of poor girl Priya with the shitty boy.

There were days even in my life, when village toilets were reserved for women who seem to have incessant affair with bathrooms. I would be forced to stroll to bamboo-plantations and ease myself with bushy grasses rubbing my body. Umpeen times would I change my position as I would imagine somebody staring at me and breaching my privacy. At a distance, I saw a queue of villagers shitting calmly with one palm on their cheek as if in a great contemplation. Surely, those early days devoid of toilets, gave India great philosophers. Even today, at least my blogging ideas shoot off from long gruelling sessions in toilet. Doesn’t my blog stink?

[a satire on need of sanitation in developing nations; a sequel to earlier blog ‘Love is in the air’]

झुकी झुकी सी नज़र

कल अपने २३वें व्हाट्स-ऐप ग्रुप का उदघाटन समारोह था, जिसका प्रादुर्भाव महज़ उन लोगों से हुआ, जिनकी तोंद निकली है. मेरे वो मित्र जो अपने उदर से असंतुष्ट हैं, शामिल हुये और स्वास्थ्यवर्द्धक पोस्ट फारवर्ड करने लगे. खाने-पीने की रणनीति बनी और यहाँ तक की आपस के उदरों की मौजूदा तस्वीरें भी शेयर हो गये. मामला गंभीर निकला और ऑड-इवेन प्रणाली पर योग और जिम की अदला-बदली तय की गयी. खैर, मूलत: एक और वजह मिल गयी ग्रुप बनाने की. जिरह और हास-परिहास की पुरानी आदत और कभी आत्म-चिंतन की वज़ह से अक्सरहाँ ग्रुप से बाहर-अंदर होता रहता हूँ. पर कौतूहल है कि हर दो मिनट में फोन को टटोलने पर मज़बूर कर देता. ये कैसी चुंबकीय गुलामी है? फेसबुक पे लाइक कितने तो व्हॉट्स-ऐप पे चुटकुले पे कोई भला हंसा क्यूँ नहीं? न हँसे मेरी बला से, अजी बिल्कुल ताजा भेजा था. साँप सूँघ गया क्या ग्रुप को? बस ऊहापोह सी लगी रहती.

ये माजरा पहले न था. ताश के पत्ते निकलते या पकौड़े तले जाते. चाय की दुकान पर एक-एक कर दोस्तों का जमावड़ा होता. काफिले आते-जाते, मुद्दे बदलते, वाद-विवाद होता, और हम अक्खड़ जमे रहते. आवाज में बुलंदी, नजर ऊँची और ठहाके ऐसे की नुक्कड़ पे बस अपना ही राज. कभी सिक्का जमता तो कभी किरकिरी होती, पर डटे रहते. 

ऐसा नहीं कि टेलीफोन न था. चौक पे सरकारी औफिस में सस्ते में ट्रंक-कॉल बुक होती, एक छोटी खिड़की से रिसीवर पकड़ाते, और पीछे खड़े लाइन में लगे लोग दाँये-बाँये देख न सुनने का स्वाँग रचाते. अजी, कौन सी प्रेमिका से गूफ्तगू है? वो राँची वाले फूफा जी होंगे या दिल्ली वाले मामाजी. प्रेम-संलाप करना हो तो अगले चौराहे पे STD बूथ है, कटघरे में जितनी मरजी दबी आवाज में बतिया लो. बस ऊपर वो LED स्क्रीन पे मिनट देखते रहना! बड़े जालिम होते वो टेलीफोन वाले, हर तीन मिनट में पैसे दुगुना. 5 मिनट 59 सेकंड में जिसने झट से रिसीवर रखा, वो है चपल चतुर.

साल-दो साल की बुकिंग पे आखिर घर में भी फोन लग ही गया. क्या उत्सव का माहौल? पड़ोसी बधाई देते, और नंबर जरूर नोट कर जाते. शुक्र है अब चौक पे न जाना. झा-सा’ब के घर फोन जो लग गया. बात की बात, और मुफ्त की चाय सो अलग. और शामत हम बच्चों की, जो घंटे-दो घंटे मुहल्ले में फोन आने का संवाद लिये घूमते. ये तो धन्य टेलीफोन विभाग वाले की अक्सर फोन डेड रहता, और हम चैन की साँस लेते.

मेडिकल कॉलेज में भी यही फोन-बूथ का सिलसिला चलता रहा. रात को ११ बजे के बाद फोन के रेट कम हो जाते, और हमारी कतार लग जाती. आधी नींद में वार्तालाप भी कम होता, और पैसे बचे सो अलग. तभी एक क्रांति हुई. एक रेडियो-नुमा या भारी भरकम वायरलेस जैसी चीज, जो फोन का काम करती. हॉस्टल में इक्के-दुक्के अमीरजादों नें खरीदी और हम कौतूहलवश निहारते. जींस में लटकाते, तो आधी जींस एक तरफ खिसक जाती और कूल्हे अर्द्धनग्न. हाथ से कान तक लाने में यूँ प्रतीत होता, जैसे गाँडीव उठा रहे हो.

बड़ी कशमकश में हमने भी एक अभूतपूर्व जुगाड़ू निर्णय लिया. पाँच मित्रों ने मिल एक मोबाइल फोन खरीदा, और ये बंटवारा कर डाला कि हफ्ते में अमुक दिन इसका राजा कौन? दोस्त इसे पाँचाली कह उपहास करते, पर हम पाँडवों ने चीरहरण न होने दिया. ठीक-ठीक याद नहीं पर वो ‘मोटोरोला’ कंपनी का फोन सालों चला, अविवादित, अजीर्ण.

आज अपनी आई-फोन ६ प्लस की ग्लैमरस माशूका के होते हुये भी उस पाँचाली की बहोत याद आती है. रिंगटोन ऐसा कि पड़ोसी भी जाग ले, भरपूर वजन कि फोन उठाओ तो डोले-शोले बन जायें. सीना तना, आवाज में कड़क अंदाज. धीरे बोलने वाले, कमजोर दिलों वाले दूर ही रहे.

कॉफी पी रहा हूँ और सामने बैठी युवती के नजर उठने का इंतजार है. आधे घंटे से नजर झुकाये, अकेले खिलखिला रही है. अजी वो ही क्या, मैं, आप और ये सारा आशियाँ. कूबड़ों की तरह झुकी कमर, पागलों की तरह अकेले में हंसना, और तोंदूमलों का ग्रूप!

पापा कहते हैं

पहले ही बता दूँ, इस पोस्ट का आमिर जी से कोई लेना-देना नहीं है. पापा तो सब के कुछ न कुछ कहते हैं. बचपन में मेरी तरफ जब भी देखते, कम से कम पानी तो मंगवा ही लेते. तीन भाईयों में होड़ मच जाती. एक पानी भरता, दूजा उससे लेता, तीजा पिता को देता. पानी न हुआ, रिले रेस हो गया. ये सिलसिला सर्दियों में अक्सर टूट जाता. वो कंपकंपाती ठंड, और घर के बाहर का चापाकल. अजी कौन रजाई से निकलने की ज़हमत करे? पिता की तरफ देखना ही कम हो जाता. पास से गुजरते, तो सब बगले झाँकते.

मैं ये सिद्ध नहीं करना चाहता कि मनुष्य पैदायशी मतलबी होता है. वो तो खैर होता ही है. मनुष्य ही क्या? कैलाश की हिम-आच्छादित पर्वत और कठोर शीत में साक्षात् शिव के लिये पानी कौन लाता होगा? गणेश जी से तो मीलों दूर मानसरोवर तक चला न जाए. कार्तिक का मोर भी बरसात से पहले न नाचे. नंदी ने मानसरोवर ब्राँड के बोतल बना-बना देवताओं में खूब बाँचे और शिव माँगे तो जी! स्टॉक नहीं है. वो तो बस विष का घूँट पी के रह गये. जब नंदी की कालाबाजारी बढ़ी, खुद जटा में वो तकनीक लगायी, भागीरथी बहा दी. लो! पी लो जितना पीना है जगवासियों! मेक इन इंडिया.

पिता पिता होता है. या फिल्मी अंदाज़ में कहें तो ‘बाप से पंगा न लेना’. उसके लिये सब बेटे समान हैं. जब मरजी जिसे एक चाँटा लगा दिया. कान खींच दी. क्या पप्पू, क्या पिंटू? पप्पू-पिंटू की लड़ाई हुई, रोना-धोना, छीना-झपटी, तूतू-मैंमैं. पिता थके-हारे ऑफिस से आए, असहिष्णुता से दोनों को एक-एक थप्पड़ रसीद. दोनों पढ़ने बैठ गये. 

अब कयास मत लगाओ. अराजनैतिक आदमी हूँ. हिंदू-मुस्लिम की तो बात ही न की मैंनें. और पप्पू-पिंटू भी तो बड़े हो गये. लड़ना तो बचपना था. दोनों साथ-साथ लड़कियाँ घूरते, ठिठोली करते. दाँत-काटी दोस्ती भाईयों की. नुक्कड़ पे पड़ोस का लड़का भिड़ गया. दोनों ने क्या धोया? आज तक दाँत में खिड़की बनी हुई है.

कब तक लड़कियाँ घूरते? उमर होने को आई, मुहल्ले में एक-एक कर डोली उठती गयी. पहले मुहल्ला, फिर शहर, फिर जिला. न लड़की बची, न लड़की की जात. भागे-भागे पिता के पास आए. पिता विजयी मुस्कान देकर बोले, “आ गये न रस्ते पे? जब तेरे बाप से कुछ न हुआ, तुमसे क्या खाक होगा?” पंडित बुलवाया, लड़की ढूँढी. गाजे-बाजे के साथ दोनों की शादी हुई. पप्पू की भी ऐश, पिंटू की भी.

मौसम बदला. हर साल की तरह. बस ठंड ज्यादा थी. सालों बाद ऐसी कड़ाके की पड़ी है. पिछली ठंड में तो दादाजी ‘हे राम’ कर चल बसे. 

पिता को कभी जोड़ों का, कभी पीठ का दर्द. 

और पप्पू-पिंटू फिर लड़ने लग गये. अब डिजिटल लड़ाई लड़ते हैं-फेसबुक-वॉट्सऐप वाले. हद कमीने फेसबुक वाले. लाइक-कमेंट दिये. थप्पड़ का तो ऑप्शन ही नहीं. 

पापा ने पहले ही कहा था. बेटा नाम करेगा.

जय भोलेनाथ!

The second innings

One of my nerdy friend, have got two divorces and three wives already. I envy his facebook marriage updates. Probably, the planning begins right at time of marriage. While I have been busy looking for an accountant to manage my taxes, he had been much shrewd to hire a good divorce lawyer. 

Its not about talent. Both of us were barely 20-30 ranks apart in college days, now we are 2-3 wives apart. If each wife is given a score of 2, he is at whopping 6, while I have a measly score of 2 with two negative (-) points of kids making it ‘zero’….cipher…..shoonya. Damn! Its all about talent.

While many of my earlier posts (e.g. Desi midlife crisis) does point towards me being in ‘frustrated forties’, I am not. Neither my clicking ‘follow’ on any remotely girlish gravatar proves anything. That reminds me, I once followed a long haired fellow in half-downloaded gravatar on my phone, proved to be a thick-moustached, heavily bearded spiritual guru later. To magnify my embarassment, he would send ‘love and light’ in his comments. 

Anyway, a craving for second innings and to even the score did lead me sieving through unanswered facebook requests. I diligently sorted out wheat from the chaff, I mean women from men. Next step was to exclude ones with many hobnobbing mutual friends. Criteria was set to ‘less than three’ mutual friends. After adding all of them, I just waited, like my wife waits for ‘whistle’ of pressure-cooker. The vibrations, the dancing nozzle, and the warning muzzled sounds culminating to extreme shrillness announces ‘rice is ready’. I too was vibrating and dancing like a cooker nozzle. 

And, it worked!!!

Many, “Sorry! May I know you?”, popped on my mac. 

The question griped me, and pushed me to oblivion. Having spent close to 40 yrs on earth, world doesn’t know me. People win Wimbledon, become bollywood superstar, bomb countries by this age. And me? Sending facebook requests to girls? Is my identity restrained to a mutual friend? Nah!

I just snubbed off, unfriended all of them, and got back to life, wife and rice.

Second innings begin with fall of early wickets. 

Match forecast: Brutal thrashing, innings defeat and follow on, when wifey reads it.

कबिरा खड़ा बाज़ार में

तोतली टूटी-फूटी बोली थी, नाक बहती, निकर खिसकती, फिर भी सवाल जरूर पूछा जाता- बड़े होकर क्या बनोगे? इस सवाल के ज़वाब से भी IQ का संबंध है. कोई डॉक्टर, कोई इंजीनियर, कोई पायलट, जो माँ-बाप सिखाते बोल देते. मैंने कहा, “साईंटिस्ट बनूँगा, नोबेल प्राइज जीतूँगा, और मरने से पहले राष्ट्रपति भी.” पूछनेवाले मुँह एँठते-कहते, “झा साब! और कुछ बने ना बने, आपका बेटा लम्बी लम्बी जरूर छोड़ेगा.”

अंकल की बात दिल पे लग गयी. मैंने कहा आविष्कार तो मैं कर के रहूँगा. लेकिन क्या? 

कबीर दास के दोहे से पहला आइडिया आया.

“बोए पेड़ बबूल का, आम कहाँ से होये”.

मैंने कहा अब तो बबूल के पेड़ पे आम लगा के रहूँगा. ऐसी खुराफातों के लिये भाई शुरूआत में जरूर साथ देते हैं ताकि प्लान फेल होने पर उछल उछल कर ठिठोली कर सकें. 

पड़ोसी गाँव के मामाजी ने ग्राफ्टिंग के गुर सिखाए, माँ से जिद कर केमिकल खरीदे, और बबूल के पेड़ पर एक-एक बड़े सलीके से सर्जिकल कटिंग कर जोड़ बनाता गया. एक टहनी भी न लगी, सामने के आम का लहलहाता पेड़ गंजा जरूर हो गया. पिताजी ने इन्क्वायरी बिठाई, भाईयों ने फुलझड़ी लगाई, और एक महान वैज्ञानिक पटाखों की तरह बजा दिया गया.

“निंदक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय”

निंदा और ठिठोली करने वाले तो घर में ही था. कबीर दास के इसी फंडे पे हिम्मत दुगुनी हो गयी. 

इस बार बिजली बनाने की सोची. गाँव के लिये बिजली नयी चीज़ थी. वो तो बस उस बिज़ली से वाकिफ थे जो मवेशी मेले में नाचने आती. भाई-साब ने आईडिया दिया, गाँव के पचास लोग हर रात साईकिल चलायेंगे, डायनमो इफेक्ट से पचास घरों में बल्ब जलेंगे.

“धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय”

प्लान साइकल की स्पीड से फुस्स हो गया.

२००४ ईसवी में पहली बार रिसर्च करने इंडियन इंस्टिच्यूट अॉफ साइंस में किशोर वैज्ञानिक रूपेण चयनित हुआ. रिसर्च का तो पता नहीं, कैंटिन के डोसे लाज़वाब थे. और रात को लैब के बाहर चाय. वाह! मज़ेदार. बाकि रिसर्च तो क्या, इस टेस्ट्यूब से उस टेस्ट्यूब. चार घंटे बाद रीडिंग लो. फिर वही रीपीट करते रहो. इस से कहीं ज्यादा प्रयोग तो मेरी माँ मुरब्बे-अचार में कर ले.

“जिन खोजा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ”

आखिरकार मेडिकल की पढ़ाई खत्म होते ही पहली फुरसत में अमरीका निकल लिया. दो बड़े फैकल्टी के लैब पसंद आये. हमारे आधे फैसले तो हेड-टेल या अक्कर बक्कर बम्बे बो से होते हैं. डॉ लिगेट विजयी रहे, लातेरबूर हार गये. मैं भी जी-जान से रिसर्च में लग गया. डॉ. लातेरबूर को देखता तो मंद मुस्कान देता. बिना फंडिंग के गरीब दयनीय परिस्थिति थी उनके लैब की.

“जाति न पूछो साधू की, पूछ लिजिये ज्ञान”

२००५ दिसंबर: Paul laterbur wins Nobel Prize in medicine.

मतलब यूँ कहिये, सारे गणित धरे के धरे रह गये. थोड़े दिन टेस्ट-ट्यूब में चाय-साय बनाई, और वापस आ गया डाक-साब बनने.

मेक इन इंडिया कोई जुमला भले ही हो, बड़े जुगत का काम है. अजी मुरब्बे नहीं बनाने, रिसर्च और आविष्कार करने हैं.

“कबिरा खड़ा बाज़ार में, माँगे सबकी खैर”

लालू रिटर्न्स और मैं

मेरे जैसे अपने को बुद्धिजीवी कहने वाले अक्सर राजनैतिक चुप्पी साध लेते हैं. ये कह कर कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता. लोगों ने देश से भागने के चक्कर में जी जान मेहनत की, जुगाड़ लगाए, और नेताओं नें ये रोड, वो इंडस्ट्री खड़े कर दिये कमीशनखोरी के चक्कर में. मज़ाक मज़ाक में देश टैलेंट की खान बन गया, और विकास के हिलोड़ें लेने लगा. इसी धक्केबाजी में मैं भी बिहार के एक गाँव से उठ कर अमरीका रिटर्न डॉक्टर बन बैठा. पर इसका सारा क्रेडिट महानुभाव लालूजी को. भला मोमबत्ती में पढ़ने में जो शक्ति थी वो ट्यूबलाइट में कहाँ? इधर उधर ध्यान हीं नहीं जाता. कागज पे एक गोल प्रकाशित क्षेत्र दिखता, उसके अतिरिक्त सब अंधेरा. जूही चावला की एक तस्वीर दिवाल पे लगा रखी थी. अंधेरे में बिल्कुल भूतनी नजर आती. ऐसे डरावने माहौल में तो आदमी दो ही चीज़ें पढ़ पाए- एक सामने रखी किताब, या फिर हनुमान चालीसा. 

बकवास करने की, जिरह करने की पुरानी आदत थी, और पढ़ने की तो बाय डिफॉल्ट थी ही. नेहरू-गाँधी पे इतने भाषन दिये, और हर गली-नुक्कड़ पे गाँधी परिवार की इतनी मूर्तियाँ देखी, कट्टर काँग्रेसी बन गया. नेहरू की ‘डिस्कवरी अॉफ इंडिया’ लगभग कंठस्थ थी. राजीव गाँधी के स्मार्टनेस का कायल था. सोचता मैं भी गोरी फँसाऊँगा. उस वक्त बी.जे.पी धीरे-धीरे उभर रही थी.

कुछ बच्चे हर क्लास में अपनी उम्र से बड़े दिखते है. आखिरी बेंच पे बैठते, बॉसगिरी, मटरगश्ती करते. मुझे बहला-फुसला दिवाल फाँद सिनेमा दिखाते. सब पक्के देशभक्त लेकिन. वो भगत सिंह स्टाइल जोश वाले. मैंने भी सोचा ये असली वाला मामला है. खाकी शॉर्ट पहन शाखा पे जाने लगा, रोज़ हनुमान मंदिर जाता और पाँचजन्य पढ़ता. साध्वी ऋतांभरा की सी.डी. सुन सीनें में हवा भरता.

उसी वक्त स्कूल के एक बड़े जलसे में लालूजी को सुना. क्या स्कूल का जलसा? हेलीकॉप्टर से वो आये, और सारा गाँव उमड़ पड़ा. स्कूल के बच्चे भीड़ में लुप्त हो गये. वो शाखा वाली अपर क्लास नहाये-सुनाये लोगों की भीड़ नहीं, अर्धनग्न लुंगी-गमछा वाले. साला मेरा परशुराम धोबी सीना तान आगे बैठा? वो दूधवाला भी? अकड़ तो देखो! हमारी ब्राह्मनों की बस्ती में मालिक-मालिक बोल घिघियाता है, और यहाँ? खैर, लालूजी बोले और एक छाप छोड़ गये. छुटपन में ही अहसास हो गया, ये विदूषक और स्टैंड-अप कॉमेडियन बड़ा शातिर है. मैंनें भी अपने अंदर हास्य लाने की वर्जिश शुरू कर दी और शाखा की उत्तेजकता से कन्नी काट ली. दलितों और मुसलमानों की तरफदारी करने लगा. शौकिया समाज़वादी बन गया.

ज़ब आडवाणी जी का रथ मेरे जिले से कुछ दूर रूका, और बाबरी नेस्तनाबूद हुआ, मैनें राष्ट्रिया सहिष्णुता पे स्कूल की असेंबली में भाषण दे डाला, और लालू को बना दिया उसका हीरो. किस्मत से ८० % निचली जाति और ग्रामीनों के लिये आरक्षित स्कूल था. कुछ तालियाँ भी बजी. पर हॉस्टल वापस पहुँचा तो तगड़े घबड़ू जवानों ने पुंगी बजा दी. खैर, दलबदलू प्रवृत्ति थी और वाक्-शक्ति बेहतर थी, बहला फुसला भेज दिया.

मेरा अनुमान ठीक ही निकला. लालूजी शातिर रहे; लोग कहते हैं, बहोत लूट-पाट मचायी. भ्रष्टाचार की रेस में सबसे आगे. समाजवाद से मन टूट गया. मैंने भी राजनैतिक सन्यास ले लिया. वाजपेयीजी के भाषण पे मंत्रमुग्ध होता, लेकिन कोई पार्टीवाद नहीं.

सालों गुज़र गये. डॉक्टर बनते बनते दशक गुजर जाते हैं. देश में भी सन्नाटा था. राव साब, देवगौडा, मनमोहन सिंह सरीखे मूक नेता हों तो बच्चो का मन न भटके. मैं भी अच्छा खासा पढ़ लिख सेटल हो गया.

जब केजरीवाल जी ने मुहिम छेड़ी, तो फिर खुराफाती दिमाग कुलबुलाया. फेसबुक पे लंबे-लंबे पोस्ट लिखने लगा. पर इतिहास लौटा, और वो शाखा वाले घबड़ू जवान भी. पुंगी बजा दी. मेरी भी, केजरीवाल की भी. लेकिन वो तो हार्डकोर देशी जुगाड़ू निकले. लोकपाल तो अब गूगल पे भी न मिले. अब ये वामगाँधी जाए तो जाए कहाँ? पाकिस्तान?

बड़े दल-बदलू और मतलबी होते हैं हम जैसे बिहारी. अब पठाखे यहाँ बजे या पाकिस्तान में, खुराफाती जनता तो खुराफात ही करेगी. 

The common wall: great Indian neighbours

I love him but I just don’t like the way he gurgles and clears throat every morning. We greet each other when we rush to pick our newspapers; While I give a conceited grin holding an intellectual The Hindu, he mocks me with saucy hot Times supplement. He keeps his car shinier than mine, and would light up his house 15 seconds before me in Diwaali. And both of our wives are locked in everlasting sugar-coated fierce duel. The day one joins Yoga, other joins Zumba, and the fight goes on. 

Years back somewhere in 1985, our childhood neighbour got a videocon colour TV, which was talk of mohalla. A month later, a massive deluge happened and our entire city was flooded. Yet, my dad sailing through waist-high water, was lifting a large box on his head, like Vasudev lifting Lord Krishna. It was a new Onida TV which said, “Neighbour’s envy; Owner’s pride.” 

Rest of the TV-deprived neighbourhood would gather to watch the ’87 world cup. TV was disproportionate large in our small home; My mother would fry delicious pakodas for kids who parted with us; While, neighbour uncle would slap any guy caught smiling when India lost wicket. India lost the world cup, but we won as better host.

Event led to an unsaid ‘cold war’, a war of superiority, and we took the brunt most. If his kids got more marks, I was screwed and vice versa. But, my dad suddenly become Gandhian and began giving Amir Khanish lectures. He arranged many Vajpayee-Musharraf style meetings but one day the neighbour kid stole all our fresh lemons and the war resumed. Lemons were returned, kid beaten and a wall was erected. The wall on which we urinated for long.

We moved from kid-hood to adulthood, and my father turned into Robinhood helping any needy, but neighbourhood bitterness persisted. Whenever friendship of our generation bloomed, aunty would charge at her son, “If you like them. Go and stay with them.” As if we were Pakistan, and he was Shahrukh khan, huh!  Shahrukh khan my foot!! He wasn’t even close to Rajpal Yadav. 

Years gone past, we moved to other states, other countries, globalised. The wall stands but lost its sheen with some algae layers at bottom, I believe nobody urinated on it for years. Faded yet a memory stands, when there wasn’t a wall, a TV, and a reason to fight. Our fathers played chess, while we toiled in mud and sand.

Uff! He coughed again. Bloody! Man has TB I think.