पापा कहते हैं

पहले ही बता दूँ, इस पोस्ट का आमिर जी से कोई लेना-देना नहीं है. पापा तो सब के कुछ न कुछ कहते हैं. बचपन में मेरी तरफ जब भी देखते, कम से कम पानी तो मंगवा ही लेते. तीन भाईयों में होड़ मच जाती. एक पानी भरता, दूजा उससे लेता, तीजा पिता को देता. पानी न हुआ, रिले रेस हो गया. ये सिलसिला सर्दियों में अक्सर टूट जाता. वो कंपकंपाती ठंड, और घर के बाहर का चापाकल. अजी कौन रजाई से निकलने की ज़हमत करे? पिता की तरफ देखना ही कम हो जाता. पास से गुजरते, तो सब बगले झाँकते.

मैं ये सिद्ध नहीं करना चाहता कि मनुष्य पैदायशी मतलबी होता है. वो तो खैर होता ही है. मनुष्य ही क्या? कैलाश की हिम-आच्छादित पर्वत और कठोर शीत में साक्षात् शिव के लिये पानी कौन लाता होगा? गणेश जी से तो मीलों दूर मानसरोवर तक चला न जाए. कार्तिक का मोर भी बरसात से पहले न नाचे. नंदी ने मानसरोवर ब्राँड के बोतल बना-बना देवताओं में खूब बाँचे और शिव माँगे तो जी! स्टॉक नहीं है. वो तो बस विष का घूँट पी के रह गये. जब नंदी की कालाबाजारी बढ़ी, खुद जटा में वो तकनीक लगायी, भागीरथी बहा दी. लो! पी लो जितना पीना है जगवासियों! मेक इन इंडिया.

पिता पिता होता है. या फिल्मी अंदाज़ में कहें तो ‘बाप से पंगा न लेना’. उसके लिये सब बेटे समान हैं. जब मरजी जिसे एक चाँटा लगा दिया. कान खींच दी. क्या पप्पू, क्या पिंटू? पप्पू-पिंटू की लड़ाई हुई, रोना-धोना, छीना-झपटी, तूतू-मैंमैं. पिता थके-हारे ऑफिस से आए, असहिष्णुता से दोनों को एक-एक थप्पड़ रसीद. दोनों पढ़ने बैठ गये. 

अब कयास मत लगाओ. अराजनैतिक आदमी हूँ. हिंदू-मुस्लिम की तो बात ही न की मैंनें. और पप्पू-पिंटू भी तो बड़े हो गये. लड़ना तो बचपना था. दोनों साथ-साथ लड़कियाँ घूरते, ठिठोली करते. दाँत-काटी दोस्ती भाईयों की. नुक्कड़ पे पड़ोस का लड़का भिड़ गया. दोनों ने क्या धोया? आज तक दाँत में खिड़की बनी हुई है.

कब तक लड़कियाँ घूरते? उमर होने को आई, मुहल्ले में एक-एक कर डोली उठती गयी. पहले मुहल्ला, फिर शहर, फिर जिला. न लड़की बची, न लड़की की जात. भागे-भागे पिता के पास आए. पिता विजयी मुस्कान देकर बोले, “आ गये न रस्ते पे? जब तेरे बाप से कुछ न हुआ, तुमसे क्या खाक होगा?” पंडित बुलवाया, लड़की ढूँढी. गाजे-बाजे के साथ दोनों की शादी हुई. पप्पू की भी ऐश, पिंटू की भी.

मौसम बदला. हर साल की तरह. बस ठंड ज्यादा थी. सालों बाद ऐसी कड़ाके की पड़ी है. पिछली ठंड में तो दादाजी ‘हे राम’ कर चल बसे. 

पिता को कभी जोड़ों का, कभी पीठ का दर्द. 

और पप्पू-पिंटू फिर लड़ने लग गये. अब डिजिटल लड़ाई लड़ते हैं-फेसबुक-वॉट्सऐप वाले. हद कमीने फेसबुक वाले. लाइक-कमेंट दिये. थप्पड़ का तो ऑप्शन ही नहीं. 

पापा ने पहले ही कहा था. बेटा नाम करेगा.

जय भोलेनाथ!

The second innings

One of my nerdy friend, have got two divorces and three wives already. I envy his facebook marriage updates. Probably, the planning begins right at time of marriage. While I have been busy looking for an accountant to manage my taxes, he had been much shrewd to hire a good divorce lawyer. 

Its not about talent. Both of us were barely 20-30 ranks apart in college days, now we are 2-3 wives apart. If each wife is given a score of 2, he is at whopping 6, while I have a measly score of 2 with two negative (-) points of kids making it ‘zero’….cipher…..shoonya. Damn! Its all about talent.

While many of my earlier posts (e.g. Desi midlife crisis) does point towards me being in ‘frustrated forties’, I am not. Neither my clicking ‘follow’ on any remotely girlish gravatar proves anything. That reminds me, I once followed a long haired fellow in half-downloaded gravatar on my phone, proved to be a thick-moustached, heavily bearded spiritual guru later. To magnify my embarassment, he would send ‘love and light’ in his comments. 

Anyway, a craving for second innings and to even the score did lead me sieving through unanswered facebook requests. I diligently sorted out wheat from the chaff, I mean women from men. Next step was to exclude ones with many hobnobbing mutual friends. Criteria was set to ‘less than three’ mutual friends. After adding all of them, I just waited, like my wife waits for ‘whistle’ of pressure-cooker. The vibrations, the dancing nozzle, and the warning muzzled sounds culminating to extreme shrillness announces ‘rice is ready’. I too was vibrating and dancing like a cooker nozzle. 

And, it worked!!!

Many, “Sorry! May I know you?”, popped on my mac. 

The question griped me, and pushed me to oblivion. Having spent close to 40 yrs on earth, world doesn’t know me. People win Wimbledon, become bollywood superstar, bomb countries by this age. And me? Sending facebook requests to girls? Is my identity restrained to a mutual friend? Nah!

I just snubbed off, unfriended all of them, and got back to life, wife and rice.

Second innings begin with fall of early wickets. 

Match forecast: Brutal thrashing, innings defeat and follow on, when wifey reads it.

कबिरा खड़ा बाज़ार में

तोतली टूटी-फूटी बोली थी, नाक बहती, निकर खिसकती, फिर भी सवाल जरूर पूछा जाता- बड़े होकर क्या बनोगे? इस सवाल के ज़वाब से भी IQ का संबंध है. कोई डॉक्टर, कोई इंजीनियर, कोई पायलट, जो माँ-बाप सिखाते बोल देते. मैंने कहा, “साईंटिस्ट बनूँगा, नोबेल प्राइज जीतूँगा, और मरने से पहले राष्ट्रपति भी.” पूछनेवाले मुँह एँठते-कहते, “झा साब! और कुछ बने ना बने, आपका बेटा लम्बी लम्बी जरूर छोड़ेगा.”

अंकल की बात दिल पे लग गयी. मैंने कहा आविष्कार तो मैं कर के रहूँगा. लेकिन क्या? 

कबीर दास के दोहे से पहला आइडिया आया.

“बोए पेड़ बबूल का, आम कहाँ से होये”.

मैंने कहा अब तो बबूल के पेड़ पे आम लगा के रहूँगा. ऐसी खुराफातों के लिये भाई शुरूआत में जरूर साथ देते हैं ताकि प्लान फेल होने पर उछल उछल कर ठिठोली कर सकें. 

पड़ोसी गाँव के मामाजी ने ग्राफ्टिंग के गुर सिखाए, माँ से जिद कर केमिकल खरीदे, और बबूल के पेड़ पर एक-एक बड़े सलीके से सर्जिकल कटिंग कर जोड़ बनाता गया. एक टहनी भी न लगी, सामने के आम का लहलहाता पेड़ गंजा जरूर हो गया. पिताजी ने इन्क्वायरी बिठाई, भाईयों ने फुलझड़ी लगाई, और एक महान वैज्ञानिक पटाखों की तरह बजा दिया गया.

“निंदक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय”

निंदा और ठिठोली करने वाले तो घर में ही था. कबीर दास के इसी फंडे पे हिम्मत दुगुनी हो गयी. 

इस बार बिजली बनाने की सोची. गाँव के लिये बिजली नयी चीज़ थी. वो तो बस उस बिज़ली से वाकिफ थे जो मवेशी मेले में नाचने आती. भाई-साब ने आईडिया दिया, गाँव के पचास लोग हर रात साईकिल चलायेंगे, डायनमो इफेक्ट से पचास घरों में बल्ब जलेंगे.

“धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय”

प्लान साइकल की स्पीड से फुस्स हो गया.

२००४ ईसवी में पहली बार रिसर्च करने इंडियन इंस्टिच्यूट अॉफ साइंस में किशोर वैज्ञानिक रूपेण चयनित हुआ. रिसर्च का तो पता नहीं, कैंटिन के डोसे लाज़वाब थे. और रात को लैब के बाहर चाय. वाह! मज़ेदार. बाकि रिसर्च तो क्या, इस टेस्ट्यूब से उस टेस्ट्यूब. चार घंटे बाद रीडिंग लो. फिर वही रीपीट करते रहो. इस से कहीं ज्यादा प्रयोग तो मेरी माँ मुरब्बे-अचार में कर ले.

“जिन खोजा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ”

आखिरकार मेडिकल की पढ़ाई खत्म होते ही पहली फुरसत में अमरीका निकल लिया. दो बड़े फैकल्टी के लैब पसंद आये. हमारे आधे फैसले तो हेड-टेल या अक्कर बक्कर बम्बे बो से होते हैं. डॉ लिगेट विजयी रहे, लातेरबूर हार गये. मैं भी जी-जान से रिसर्च में लग गया. डॉ. लातेरबूर को देखता तो मंद मुस्कान देता. बिना फंडिंग के गरीब दयनीय परिस्थिति थी उनके लैब की.

“जाति न पूछो साधू की, पूछ लिजिये ज्ञान”

२००५ दिसंबर: Paul laterbur wins Nobel Prize in medicine.

मतलब यूँ कहिये, सारे गणित धरे के धरे रह गये. थोड़े दिन टेस्ट-ट्यूब में चाय-साय बनाई, और वापस आ गया डाक-साब बनने.

मेक इन इंडिया कोई जुमला भले ही हो, बड़े जुगत का काम है. अजी मुरब्बे नहीं बनाने, रिसर्च और आविष्कार करने हैं.

“कबिरा खड़ा बाज़ार में, माँगे सबकी खैर”

लालू रिटर्न्स और मैं

मेरे जैसे अपने को बुद्धिजीवी कहने वाले अक्सर राजनैतिक चुप्पी साध लेते हैं. ये कह कर कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता. लोगों ने देश से भागने के चक्कर में जी जान मेहनत की, जुगाड़ लगाए, और नेताओं नें ये रोड, वो इंडस्ट्री खड़े कर दिये कमीशनखोरी के चक्कर में. मज़ाक मज़ाक में देश टैलेंट की खान बन गया, और विकास के हिलोड़ें लेने लगा. इसी धक्केबाजी में मैं भी बिहार के एक गाँव से उठ कर अमरीका रिटर्न डॉक्टर बन बैठा. पर इसका सारा क्रेडिट महानुभाव लालूजी को. भला मोमबत्ती में पढ़ने में जो शक्ति थी वो ट्यूबलाइट में कहाँ? इधर उधर ध्यान हीं नहीं जाता. कागज पे एक गोल प्रकाशित क्षेत्र दिखता, उसके अतिरिक्त सब अंधेरा. जूही चावला की एक तस्वीर दिवाल पे लगा रखी थी. अंधेरे में बिल्कुल भूतनी नजर आती. ऐसे डरावने माहौल में तो आदमी दो ही चीज़ें पढ़ पाए- एक सामने रखी किताब, या फिर हनुमान चालीसा. 

बकवास करने की, जिरह करने की पुरानी आदत थी, और पढ़ने की तो बाय डिफॉल्ट थी ही. नेहरू-गाँधी पे इतने भाषन दिये, और हर गली-नुक्कड़ पे गाँधी परिवार की इतनी मूर्तियाँ देखी, कट्टर काँग्रेसी बन गया. नेहरू की ‘डिस्कवरी अॉफ इंडिया’ लगभग कंठस्थ थी. राजीव गाँधी के स्मार्टनेस का कायल था. सोचता मैं भी गोरी फँसाऊँगा. उस वक्त बी.जे.पी धीरे-धीरे उभर रही थी.

कुछ बच्चे हर क्लास में अपनी उम्र से बड़े दिखते है. आखिरी बेंच पे बैठते, बॉसगिरी, मटरगश्ती करते. मुझे बहला-फुसला दिवाल फाँद सिनेमा दिखाते. सब पक्के देशभक्त लेकिन. वो भगत सिंह स्टाइल जोश वाले. मैंने भी सोचा ये असली वाला मामला है. खाकी शॉर्ट पहन शाखा पे जाने लगा, रोज़ हनुमान मंदिर जाता और पाँचजन्य पढ़ता. साध्वी ऋतांभरा की सी.डी. सुन सीनें में हवा भरता.

उसी वक्त स्कूल के एक बड़े जलसे में लालूजी को सुना. क्या स्कूल का जलसा? हेलीकॉप्टर से वो आये, और सारा गाँव उमड़ पड़ा. स्कूल के बच्चे भीड़ में लुप्त हो गये. वो शाखा वाली अपर क्लास नहाये-सुनाये लोगों की भीड़ नहीं, अर्धनग्न लुंगी-गमछा वाले. साला मेरा परशुराम धोबी सीना तान आगे बैठा? वो दूधवाला भी? अकड़ तो देखो! हमारी ब्राह्मनों की बस्ती में मालिक-मालिक बोल घिघियाता है, और यहाँ? खैर, लालूजी बोले और एक छाप छोड़ गये. छुटपन में ही अहसास हो गया, ये विदूषक और स्टैंड-अप कॉमेडियन बड़ा शातिर है. मैंनें भी अपने अंदर हास्य लाने की वर्जिश शुरू कर दी और शाखा की उत्तेजकता से कन्नी काट ली. दलितों और मुसलमानों की तरफदारी करने लगा. शौकिया समाज़वादी बन गया.

ज़ब आडवाणी जी का रथ मेरे जिले से कुछ दूर रूका, और बाबरी नेस्तनाबूद हुआ, मैनें राष्ट्रिया सहिष्णुता पे स्कूल की असेंबली में भाषण दे डाला, और लालू को बना दिया उसका हीरो. किस्मत से ८० % निचली जाति और ग्रामीनों के लिये आरक्षित स्कूल था. कुछ तालियाँ भी बजी. पर हॉस्टल वापस पहुँचा तो तगड़े घबड़ू जवानों ने पुंगी बजा दी. खैर, दलबदलू प्रवृत्ति थी और वाक्-शक्ति बेहतर थी, बहला फुसला भेज दिया.

मेरा अनुमान ठीक ही निकला. लालूजी शातिर रहे; लोग कहते हैं, बहोत लूट-पाट मचायी. भ्रष्टाचार की रेस में सबसे आगे. समाजवाद से मन टूट गया. मैंने भी राजनैतिक सन्यास ले लिया. वाजपेयीजी के भाषण पे मंत्रमुग्ध होता, लेकिन कोई पार्टीवाद नहीं.

सालों गुज़र गये. डॉक्टर बनते बनते दशक गुजर जाते हैं. देश में भी सन्नाटा था. राव साब, देवगौडा, मनमोहन सिंह सरीखे मूक नेता हों तो बच्चो का मन न भटके. मैं भी अच्छा खासा पढ़ लिख सेटल हो गया.

जब केजरीवाल जी ने मुहिम छेड़ी, तो फिर खुराफाती दिमाग कुलबुलाया. फेसबुक पे लंबे-लंबे पोस्ट लिखने लगा. पर इतिहास लौटा, और वो शाखा वाले घबड़ू जवान भी. पुंगी बजा दी. मेरी भी, केजरीवाल की भी. लेकिन वो तो हार्डकोर देशी जुगाड़ू निकले. लोकपाल तो अब गूगल पे भी न मिले. अब ये वामगाँधी जाए तो जाए कहाँ? पाकिस्तान?

बड़े दल-बदलू और मतलबी होते हैं हम जैसे बिहारी. अब पठाखे यहाँ बजे या पाकिस्तान में, खुराफाती जनता तो खुराफात ही करेगी. 

The common wall: great Indian neighbours

I love him but I just don’t like the way he gurgles and clears throat every morning. We greet each other when we rush to pick our newspapers; While I give a conceited grin holding an intellectual The Hindu, he mocks me with saucy hot Times supplement. He keeps his car shinier than mine, and would light up his house 15 seconds before me in Diwaali. And both of our wives are locked in everlasting sugar-coated fierce duel. The day one joins Yoga, other joins Zumba, and the fight goes on. 

Years back somewhere in 1985, our childhood neighbour got a videocon colour TV, which was talk of mohalla. A month later, a massive deluge happened and our entire city was flooded. Yet, my dad sailing through waist-high water, was lifting a large box on his head, like Vasudev lifting Lord Krishna. It was a new Onida TV which said, “Neighbour’s envy; Owner’s pride.” 

Rest of the TV-deprived neighbourhood would gather to watch the ’87 world cup. TV was disproportionate large in our small home; My mother would fry delicious pakodas for kids who parted with us; While, neighbour uncle would slap any guy caught smiling when India lost wicket. India lost the world cup, but we won as better host.

Event led to an unsaid ‘cold war’, a war of superiority, and we took the brunt most. If his kids got more marks, I was screwed and vice versa. But, my dad suddenly become Gandhian and began giving Amir Khanish lectures. He arranged many Vajpayee-Musharraf style meetings but one day the neighbour kid stole all our fresh lemons and the war resumed. Lemons were returned, kid beaten and a wall was erected. The wall on which we urinated for long.

We moved from kid-hood to adulthood, and my father turned into Robinhood helping any needy, but neighbourhood bitterness persisted. Whenever friendship of our generation bloomed, aunty would charge at her son, “If you like them. Go and stay with them.” As if we were Pakistan, and he was Shahrukh khan, huh!  Shahrukh khan my foot!! He wasn’t even close to Rajpal Yadav. 

Years gone past, we moved to other states, other countries, globalised. The wall stands but lost its sheen with some algae layers at bottom, I believe nobody urinated on it for years. Faded yet a memory stands, when there wasn’t a wall, a TV, and a reason to fight. Our fathers played chess, while we toiled in mud and sand.

Uff! He coughed again. Bloody! Man has TB I think. 

तालीम

कुछ चीजें न याद है और न ख्वाहिस हैं सुनने की. भला उस जमाने में डाइपर रहे होंगें, शोभा डे जैसे हाइ-फाई लोगों ने पहनें होंगे, हम तो नंग-धड़ंग घूमते रहे. दूरदर्शन पे तो डायपर वगैरा के विज्ञापन भी नहीं आते थे, क्या हगीज़ और क्या पैंम्पर्स? इसकी एक वज़ह शायद ये भी रही हो कि कार और फ्लाइट में घूमना फिरना कम था. अब ट्रेन-बसों में तो खिड़की से धार बहाने की बच्चों को आजादी थी. न उम्र रही, और न आज़ादी; ये मलाल रह गया कि डायपर कभी न पहन सके. 

विज्ञापन तो क्या थे? सुनील गावस्कर और वेंगसरकर तो छोड़ो, आलोकनाथ तक साबुन के विज्ञापन में. नहाने से जैसे नफरत सी हो गयी. वो तो धन्यभाग्य पहली दफा प्रीति जिंटा एक ऐड में दीखी और जैसे देश में स्नान-क्रांति आ गयी. 

डायपर तो एक छोटी कड़ी है. तालीम तो जैसे अधूरी सी रह गयी. अजी आधे तो ऐसे जीये, “बी.ए. हुए, नौकर हुए, पेंशन मिली और मर गये”. बच्चों को वन्डरला (एक फन रिसोर्ट) घूमाने गया. जोश में पानी में छलाँग भी मार दी, और ऊँकडू हो दायें-बायें लात मारने लगा. कई जुगत लगाये. बच्चे तैरते हुये ठिठोली करने लगे. हिम्मत तो देखो! भला कोई अपने बाप पे भी हँसता है? मैं एक बारी छुटपन में शतरंज के खेल में पिताजी पे हँसा. अजी वो थप्पर रसीद करा, कि अगली शाम तक शतरंज खेलने की हिम्मत न बनी. अब ये और बात है, लतखोर प्रवृत्ति थी कि अगली शाम फिर बिसात बिठा ली.

किताबों का शौक था या नहीं, ठीक ठीक याद नहीं. पर पढ़ डाली जो सामने दिखी वो. एक बारी तो रोमानिया का इतिहास तक पढ़ डाला. अब माँ-बाप भी शेखी बघारने में कंधे पे बंदूक रख देते. घर में बर्तन कम, कप-शिल्ड ज्यादा दिखने लगे. कोई बड़ी बात नहीं, अगर मिश्रा अंकल को मेरे क्विज-डिबेट वाली ट्रौफी में चाय पिला दी हो. इसी धक्केबाजी में मेडिकल परीक्षा भी दिला दी. अब तक तो वो मशीन बन गया था, कि एक तरफ से सवाल डालो तो, दूसरी तरफ से जवाब निकले. ये सिलसिला चलता रहा, और मैं पढ़ता रहा. मशीन घिसती, खराब होती, पर धड़धकेल चलती रहती.

अमूमन ऐसे लोगों को रट्टू-घिस्सू, पढ़ाकू कहके भी दुत्कारते हैं. जब जब ये महसूस होता, एक गिटार क्लास या जिम ज्वाइन कर लेता. लेडीज़ हौस्टल के चक्कर मार लेता. या होस्टल सुप्रीटेंडेंट के घर दीवाले में बम फोड़नें में शामिल हो लेता. ऐसा लगा जैसे तालीम दुगुनी हो गयी हो. किताबों मे झुका सर जैसे तन गया हो. मशीन में जैसे जान आ गयी हो.

मतलब जी वो कहते हैं, माँ दा लाडला बिगड़ गया. 

हरे-नीले चश्में पहन, कंधे तक बाल बढ़ा जिम मौरीसन सुनने लगा. रॉक शो में जा बाल को आगे-पीछे करने लगा, जैसे वो धोबीघाट की धोबन करती है. परिपक्वता इस मुकाम पे ला देगी, अंदाजा न था. आईना देखा तो जैसे बिहारी टोन में दिल की आवाज आयी, “साला, धोबी बना दिया बे!”.

समाजवाद और साम्यवाद का वकील हूँ. डॉक्टर हो या धोबी, तालीम तो तालीम है. मेरी दकियानूशी तालीम बदली. और देश भी तो कच्छे से डाइपर तक आ गया. 

………

एक शिरकत अंग्रेजी में भी

Another brick in Deewaar

The intelligent idiot

While rest of the world thinks I am a genius, atleast there is one human on this planet who proclaims me an idiot because I always bring an expired sandwich-bread! Would Newton or Einstein would have checked expiry date on a bread? Being a doctor, I do mean what an expiry means. But, this bloody bread expires within a week, as if all the fungus in the world are waiting for that very hour to infect all the humans. The fury of expired bread-loaf….hooohooohaaaa…..won’t spare anyone.

Well, this may be one idiocy, but there are plenty.

# I always withdraw twice from ATM and play with all the buttons, just to see an irritated face of person standing behind me.

# I always get down to pee when a bus halts even for a minute. I strongly believe, bus always stops to bestow this pleasure on us.

# I love to stand in a busy traffic on Maratahalli bridge (bangaloreans would know travails of it), just to catch a glimpse of dog-sex happening beneath; and as I smile in ecstasy, many passerby bikers join me to create a huge traffic jam.

# I always give tip to the waiter beforehand, because I believe he would fart on my burger to make it spicy otherwise.

# I never put fan on max speed and never sleep directly below it, because one astrologer told I would die of a fan falling on me.

# I have thrown some 437 coins in river ganges from the passing train, since somebody told it fulfils the wishes.

# I love to ease myself in the toilet in running train, but I never use toilet in a flight.

(I believe plane toilets have some vacuum-cleaner mechanism, which would pull my mojo into it.)

# I go to toilet three times every morning, one for headlines, one for editorial and one for sports page reading.

# I pretend as if my vehicle broke down when somebody honks from behind, giving an abrupt stop, jerky starts and slow nudges.

# I recently had a wonderful dinner at a marriage party, and couldn’t find my family because they were sitting in true marriage party happening in some other marriage hall on same street.

# I remember the full name of Pablo Picasso

Pablo Diego Jose Francisco de Paula Juan Nepomuceno Maria de los Remedios Cipriano de la Santisima Trinidad Ruiz y Picasso

..
P.S. Will be back with another post if alive

(I am making a suicidal attempt of eating four loafs of an expired bread while writing this post)

The lover’s nest a.k.a FOSLA ka ghosla

I learnt most of the Ghazals, when I was lovestruck for the first time and mastered them with each failures and heartbreaks as they say. Somehow the complex urdu poetry absorbs all the woes, while you try to figure out what it actually means. A country exemplary for epitomes of love like Tajmahal to Kamasutra, has incidently the largest inventory of lovelorns, frequently abbreviated as FOSLA (Frustrated one-sided lover association).

Although I had never been a president of FOSLA since there were much strong contenders, I must have played some stupid game like ‘FLAMES’ and sang lovesongs. While giving a debate speech, I would look in crowd for the blue-eyed girl, with my tone fluctuating with her facial expressions. Once I was narrating Subhash Chandra Bose speech in an adrenaline-charged loud voice, and she just gave me a casual smile. The smile turned Bose into some Kamadev (love-god) incarnate, and in a soft enamored voice I said, “Tum Mujhe Pyaar do, Main tumhen Azaadi Doonga” (You give me love, I will give you freedom). Not to mention, I received the punishment #1 – a brutally tiring diatribe (read my old blog).

Well, Shahjahan was a royal Mughal who would have charged his army, captivated Mumtaz’s father and taken her as prized possession.  If Shahjahan were an aam aadmi, he would have roamed around the gully where Mumtaz lived, lifted gas cylinders for her dad, and would have been content with a glass of water offered from Mumtaz. He could have never built Tajmahal, but must had shaved every morning, and walked with his two hands in pocket across Mumtaz, furtively catching a side-glimpse. While the road-side romeos ogle at Mumtaz, Shahjahan would warn, “Tameez se beta! Bhabhi hai.” Mumtaz would have been mohalla’s bhabhi never knowing who the hell is Shahjahan? If anybody dared to whistle, he would pounce like a mughal warrior.

Some shayar said, “Shahjahan tumne Tajmahal banakar, Hum gareebon ka udaya hai mazaak”. (O shahjahan! you made fun of we poor people by making a Tajmahal)

Aurangzeb must have cursed Shahjahan while paying EMIs for his Dad’s Tajmahal. Poor man could never build anything for himself, and no girl gave bhav to the poor king.

Akbar had Jodha.

Salim had Anarkali.

Shahjahan had Mumtaz.

Aurangjeb had Begum who? Probably, one of the founding member of FOSLA Aurangzeb was. Respect!

And what about Kamasutra?

The FOSLA library always had a strong collection of porn, which would be circulated among members, with each member tearing pages of their choices till the last member receives nothing, better termed colloquially as, ‘Babaji ka thullu‘. Whatever would have been the intentions of Vatsyayana in writing Kamasutra, I wonder how its pages are preserved till date.

To say FOSLA is a man-only institution, is a bit biased opinion. From ages, one-sided love was more common in women who would dream of a prince riding on horse. Well, it transformed to a Shahrukh Khan running in knicker later. Whatever movie said, if father is even a bit of Amrish Puri, a girl would never dare to love. These TV soap and romantic movie crazy melodramatic creatures surely form a huge chunk of FOSLA.

Men or women; the young and the old; and the bloggers with long lovelorn letters and poetry. The glory prevails. Long live FOSLA!

बस यूँ ही, मेरे मन की.

यूँ तो मैं हिंदी में कुछ खास लिखता नहीं, बचपन से वही मिडिल क्लास वाली अंग्रेजी की कवायद. लेकिन आज़ ज़रा देशी मामला है, और ये ब्लोग-स्लोग में तो क्या गोरे और क्या पाकिस्तानी? कोई भी मुँह उठा के लाइक करने आ जाता है. धर्मपत्नी जी भी परेशान, कि ये किन लड़कियों के कमेंट्स पढ़ मुस्कुराते रहते हो? मैने कहा ऐसा नहीं है. आधा वामपंथी, आधा गाँधीवीदी है ये वामगाँधी. निर्मोही. निर्विकार.

तो प्वाइंट पे आता हूँ.

ये किसी छिटपुट बात के बतंगड़ पे किसी गाँव में कोई हादसा हो गया. कुछ खाने पीने का मामला था. छुटपन में हॉस्टल के मेस में मैनें भी काफी तोड़-फोड़ मचाई थी. खानसामें मेघलाल की लुंगी खींच चड्डी में दौड़ाया था. साले ने तूर दाल ऐसी बनाई की चार गोताखोर डाले फिर भी दाल का दाना नहीं. जीभ मत लपलपाओ अब तूर दाल के नाम पे. मेरा ब्लोग तो सस्ते में पढ़ रहे हो ना? और जकरबर्ग मियाँ अमरीका वाले ने चाहा तो बिल्कुल मुफ्त.

हाँ जी तो हम कहाँ थे? वो कुछ वही बजरंग बली के भक्तों ने मोहम्मद साब के चेले को…. फिर कान खड़े हो गये? अबे सिनेमाखोरों, ‘बजरंगी भाईजान’ की कहानी नहीं सुना रहा मैं! ये तो ग्लैमर-स्लैमर से कोसों दूर गाँव-साँव का मामला है.

खैर. तसल्ली है. भुखमरी से न मरा कोई. बढिया माँस-मुँस खा के डकार के मरा. मेरे अस्पताल में तो वो खडूँस डाइटिसीयन है. आधे तो वो गीली खिचड़ी और उबले कद्दू खा के सिधार गये.

सुनते हैं, बड़ी तादाद में लोग बाग आये. मरने से पहले भी. मरने के बाद भी. अजी गाँधीजी को एक गोडसे ने निपटा दिया था. पर ये लॉजिक बेकार है. वो ठहरे गोमूत्र पीने वाले शाकाहारी जब तब भूख हड़ताल वाले कंकालनुमा व्यकतित्व. और इधर तो गोमाँस वाला हट्टा कट्टा. खैर ये गाय वाय से दूर ही रहना ठीक. आदर करो या निरादर. मारे दोनों सूरतों में जाओगे. न गाँधी बचे न वो बचा.

अखबार में ये पुरष्कार वापसी का दौर आया तो मैंनें भी बचपन के क्विज डिबेट वाले अवार्ड ढूँढे. ये चिंदीचोर लेखक. अवार्ड वापस करने गये तब लोगों को पता लगा कि ये है कौन जनाब. इनसे ज्यादा तो मेरे ब्लोग के फौलोवर निकलें. मेरे क्या आपके भी. देशी कोई पढता कहाँ है? हाँ पीते बहोत है.

अब जो हुआ वो तो हो गया. मैं नहीं करता कुछ वापिस. मेरे जैसे बिरले ही मिलेंगे. आज भी स्याही वाली कलम से लिखता हूँ. अजी दवात से वो कलम में स्याही डालने का मज़ा ही कुछ और है. अब स्याही पोतने का तो तजुर्बा नहीं. हा हा हा हा.

When babies came from sky

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One of the prominent politician thinks mobile phones are reason behind child abuse since people are getting easy access to child porn. Quite a funny thought. No smart phones. No child abuse. What an Idea sirjee? Though I laughed at thought, it took me back to the days when porn was limited to some smuggled Hustler magazine or a revolutionary writer called Mastram. Soft porn stuff could be found in some hindi mags like Manohar Kahaniyan or Saras Salil.

As I remember from medschool days, child becomes aware of its own sex by 3 years. In most part of rural India, naked children with the dangling male thingy could be seen running around. When asked, show your mama (maternal uncle), they will proudly point out and run away laughing. Similar innuendos existed for female organs like maternal grandmother or anyone from mother’s family. Unaware, uncorrupt kids would bask naked in mud, pond; chase hen or a spare bicycle tyre; boys and girls alike.

Not only kids, women of Dalit or down-trodden communities would be hardly caring of their attire when they bath in public ponds or would be performing their morning rituals in barren fields. A dalit women with a big ‘ghoonghat’ upto knees was easing herself in morning with her ass facing towards people when a feudally superior one shouted, “Hey you! Turn the ghoonghat towards us, and ass on other side.”

Ignorance of sex and stigmas wasn’t restricted to the lower social strata. In our med school ragging days, we were asked how many holes a female has? Most couldn’t answer. One to pee, and one to shit, was the commonest reply. And mind you, these were chosen geniuses in biology. 

From childhood, its taught that babies either come from sky or we borrow from hospital. This seemed to so deeply creep in, most adolescent males could never imagine a 3 kg baby coming out of a tiny hole. It was unheard, unseen. I have seen village kids playing with balloons made of condoms they pick from rich home’s garbage. They never learnt, since newspaper ads or the large government banners never explicitly mentioned, and TV channels are swiftly switched when a saucy condom ad begins.

For women, things probably happen a bit differently. From ages, they have been trained as a baby-making machines. In south India, arrival of menses is celebrated as a grand function while the poor girl in agonising pain wonders whats wrong with her body. In spite of feeders from elderly females, sex and childbirth remains confusing for many. They just couldn’t imagine how a tiny imperceptible hole would do everything from bleeding every month, to satisfy a man and give birth to a kid-who-looks-mammoth-now. Won’t it just rip the body apart?

Now, many kids have access to umpteen youtube videos and porn collections, even on the smartphones as netajee pointed. On whatsapp, some would send a hot video, other would bounce back, “its old dude.” They know that babies don’t come from sky and would give a naughty grin when parents would explain so. I believe they know sexuality so well, that they would not allow a stranger to grope or abuse them.

But, what about small 3-6 yrs kids who barely learnt to talk, and understand us? 

Author opines-the abuses may end only by two ways-

 1. The netajee way of going back to the days without phone and imposing a blanket porn ban.

2. Improve sexual education ( the good and bad touches) at earliest comprehensible age. 

Chose the 2nd option. They surely love to hear they came out of mummy’s tummy.