टोंटी पंचायत

महारानी तलाब पर आज पंचैती बैठी है। ये कोई नयी बात नहीं, हर साल बैठती है। इस पंचैती में पूरा गाँव आता है। कुछ जो दिल्ली-कलकत्ता चले जाए, पंचैती देखने छुट्टी लेकर आते हैं। पिछले कुछ बरख से पंचैती के दिन तलाब किनारे मेला भी लगने लगा है। कचौड़ियाँ छनती है, कंगन बिकते हैं, लमनचूस की रेड़ी और डिस्को वाला म्यूजिक। पंचैत न हुआ, कोई त्यौहार हो गया।

कईयों को ये भी नहीं पता कि पंचैत बैठी किसलिए, पर उन्हें ये जरूर पता है कि कन्नू ठाकुर और तम्मू ठाकुर आज फिर एक दूजे का गला दबाएँगें। कन्नू और तम्मू के लोग एक दूजे की धोती खींचेंगे और चड्डी में दौड़ाएँगें। कीचड़ में द्वंद होगा, गाली-गलौज होगा। बच्चे सीटी बजाएँगे, और बूढ़े फोकट में ज्ञान बाँटेंगें। सरपंच जी मचान पर चढ़ जायेंगें, और छेद वाली बाल्टी से ऐसे चिल्लायेंगें जैसे नेहरू जी स्टाइल भाषण दे रहे हों। मोर भी होगा, कौआ भी होगा, बंदर भी होगा, खाऊँ खाऊँ!

महारानी तलाब इलाके का सबसे बड़ा तालाब है। न पूरब, न पच्छिम। कहीं इतना बड़ा तलाब नहीं। उत्तर में गंगू तलाब है पर वो भी कोई तलाब है? एक महार पर सब शौच करते हैं, दूसरे महार पर पंडित मंतर पढ़कर लूटता है। मल-मूत्र से तर्पण कराता है। छी! महारानी तलाब भले ही छोटा है पर गाँव वालों की शान है। अंजुरि (अंजलि) भर पानी पी लो, तृप्त हो जाओ। अब कोई रात में छुपकर मूत ले, और बात है। दिन दहाड़े कोई शौच करे, ठाकुर लट्ठ ले दौड़ा दें। इस मौके पर कन्नू-तम्मू एक हो जाते हैं। एक ही भाषा बोलते हैं। नहीं तो कन्नू बोले ईर घाट, तम्मू बोले बीर घाट। किसी बात पर नहीं बनती।

गाँव के बुजुर्गों को भी ठीक-ठीक याद नहीं, ये रंजिश कब शुरू हुई। दादा-परदादा के भी पहले की कहानी है। कन्नू-तम्मू के लकड़दादों के जमाने की। अंग्रेजों के जमाने की। या शायद मुगलों के जमाने की।

किंवदंती है कि कई बरख पहले महारानी तलाब का बँटवारा हुआ। तालपत्र पर रेखाएँ खींची गई। कुछ कहते हैं वराह मिहिर ने कॉन्ट्रैक्ट लिया था, कुछ कहते हैं टोडरमल के रंगरूटों नें। कोई कहता है घूस-घास का चक्कर था, कोई कहता है गंगू तलाब वालों नें सस्ती मदिरा पिला दी थी। पूर्वी महार गोल थी, वो सीधी खींच थी। पच्छिमी महार खामख्वाह गोल कर दी। ऐसा विभाजन कर गए, ठाकुरों के मत्थे कुछ न पड़ा। एक बार तालपत्र देखते, एक बार तालाब, और सर पीट लेते। दोनों राजा साहेब के पास गए। राजा साहब का अमीन भँगेड़ी। तालपत्र पर भाँग का गोला डाल रोली करने लगा। रेखायें और आरी-तिरछी हो गई। खैर बँटवारा हुआ, तालाब का एक हिस्सा कन्नू के पूर्वजों का और दूजा तम्मू के।

तालाब तो साक्षात् क्षीरसागर थी। पर तम्मू के पूर्वजों के हाथ क्षीर भी ज्यादा और सागर भी। सब खा-पीकर मोटे होते गए। उधर कन्नू का खानदान कुपोषित।

कुपोषण में बुद्धि भी क्षीण हो जाती है। तम्मू के पूर्वज ताम्रपत्र के तगमे बटोरते गए, महारानी तालाब के पानी से खेत पर खेत सींचते गए। उधर हरियाली, इधर सुखाड़। उधर रंगरेलियाँ, इधर उधार।

राजा-महाराजा चले गए तो सियायतबाज आए। कुछ वाचाल, कुछ चंडाल, कुछ गुरूघंटाल।

कूटनीति का मंत्र है कमजोर के कान भरो, और शक्तिशाली के कान खींचो। पहले कानों को ‘ईयरमार्क’ किया गया। कमजोरों को पहचाना गया। कन्नू-तम्मू से बढ़िया प्रयोग के लिए कोई मॉडल न था। शुरूआत उन्हीं से हुई। तम्मू के कान खींचने की रणनीति बनी। कन्नू के कान भरे गए।

“कन्नू! ये बँटवारा ही गलत है। तालाब का सारा जल तो तम्मू ले जाता है और तुम्हें भनक तक नहीं होती।”

“क्या कहते हो? पुश्तैनी बँटवारा है। वो देखो तालाब के बींच खूँटा गड़ा है। पच्छिम से मेरा, पूरब से उनका।”

“भई, खूँटा ही तो गलत गड़ा है।”

“मुझे तो बीचों-बीच नजर आ रहा है।”
“हाँ, पर उधर से महार गोल है। तुम नापी करवा लो।”

“अरे जाओ! राजा साहब के जमाने का खूँटा है। पत्थर की लकीर है।”

कन्नू ने उनको देहरी से भगाया और हुक्का खींचने लग गए। पता नहीं क्यूँ, आज खूँटे पर संदेह वाकई हो रहा था। कहीं तम्मू ने खूँटा खिसका तो नहीं ली? भला उसके खेत लहलहा क्यूँ रहे हैं और हमारे सूखे पड़े हैं? और महार तो वाकई गोल है। भला नापी कराने में हर्ज क्या? इतने बरख में कितने तूफान आए, खूँटा न हिला होगा? दादा साहब के जमाने में भी सुना है खूँटे पर सवाल उठे थे। और कागज-पत्तर भी पुराने हुए। पक्की नापी करवा के नये कागज बनवाऊँगा तहसीलदार से। फिर मेरे खेत भी लहलहायेंगें। शम्भू साव का सारा कर्जा निपट जाएगा।

अगले ही दिन अमीन को खबर दी, और तलाब की नापी शुरू हुई। चाहे पूरब-पच्छिम नापो, या उत्तर-दक्खिन। खूँटा हर तरफ से गलत। कन्नू सर पकड़ कर बैठ गए। तम्मू तमतमा गए। गाली-गलौज हुई। हाथापाई शुरू हुई। कन्नू कमजोर था, पर गजब की फुर्ती थी। झट से तम्मू की गर्दन पर लटक गया और चूल खींच कर गिरा दिया। तम्मू जब तक सँभलता, कन्नू छाती पर बैठ मेढकों की तरह उछलने लगा। राहगीर तमाशबीन बन गए।

ये एक ऐतिहासिक मल्लयुद्ध की शुरूआत थी, जिसे सियासती चौकड़ीबाजों ने ‘महारानी तलाब जल-विवाद’ का नाम दे डाला।

पंचायत बिठाई गई। अमीन की गवाही हुई। खूँटा ठीक से गाड़ने का फैसला हुआ। मछुआरे भेजे गये। सब बाप-बाप करते वापस आये। खूँटे की जड़ में साँपों का बसेरा।

“खानदानी खूँटा है ये। विरासत है हमारी। साँपों की रस्सी बनाकर देवासुर संग्राम करोगे तभी हिलेगा।” तम्मू ने जुमला फेंका।

पंचायत खलबला गयी। कन्नू-तम्मू को अपने हाल पर छोड़ भाग गई। कन्नू ने भी घुटने टेक दिये।

पर सियासतगर्द कहाँ रूकने वाले थे।

“देश चाँद पर पहुँच गया, और तुम इन अंधविश्वासों में अटके पड़े हो कन्नू?”

“तो क्या करूँ? पंचायत के मछुआरे भी फेल हो गए। मुझसे न हिलेगा वो खूँटा!”

“तो खूँटा हिलाने कह कौन रहा है? पानी बाँध दो।”

“क्या मजाक कर रहे हो? भला पानी भी बाँध सका है कोई?”

“अपने गाँव का ही तो है वीशू, विलायत से पढ़कर आया है। डैम बनाता है डैम! जहाँ मरजी, वहीं पानी बाँध दे।”

“भाई, मेरी समझ कुछ नहीं आ रहा। जो मरजी करना है कर लो।”

बड़ा शातिर इंजीनियर था वीशू। चेहरे से तेज चमकता था, गंगू तलाब के पंडित से भी ज्यादा। पैनी नजर और शुतुरमुर्ग सी चाल। महीने भर में तालाब के तल को टेढ़ा कर डाला और तालाब के पानी को कन्नू की ओर मोड़ कर डैम की टोंटी कस दी। अब कन्नू जितनी टोंटी खोले, तम्मू को उतनी पानी नसीब हो। टोंटी बंद तो पानी बंद।

तम्मू के खेत सूखने लगे, कम्मू के लहलहाने लगे। वीशु की विलायती टोंटी ने तो प्रकृति बदल कर रख दी। देवासुर-संग्राम में तकनीकी टोंटी लगाकर भाग गया। फलाँ बटन दबाओ तो अमृत और फलाँ दबाओ तो विष। और सारे बटन कन्नू के पास।

तम्मू ठहरा गँवार, और छुटभैये नेताओं की राजनीति का मारा। त्राहि-माम करता पंचायत भागा। सारी अकड़ स्वाहा हो गयी।

“हजूर! कन्नू से कहें, मुझे कम से कम हक की बराबर पानी छोड़े।”

“हाँ भई कन्नू! बात तो गलत नहीं है। तुम उतनी टोंटी खोल दिया करो।”

“पहले पुरखों की बेईमानी का हिसाब तो चुकता हो।” कन्नू अकड़ कर बोला।

“वो सब पुरानी बाते हैं, और ठहरे तो भाई-भाई ही।”

“ठीक है। तुम भी क्या याद रखोगे तम्मू! जा खोल दी टोंटी आज। लहलहा ले अपने खेत!”

कन्नू-तम्मू गले मिले और पंचायत खत्म हुई।

कुछ दिन सब ठीक चला, पर फिर ये टोंटा-टोंटी चालू हो गयी। कभी तम्मू का बेटा कन्नू के बेटे से स्कूल में भिड़ जाए तो दो दिन टोंटी बंद। कभी जनाना झगड़ा तो टोंटी बंद। आज संडे तो टोंटी बंद। कल रामनवमी तो टोंटी बंद।

हर साल पंचायत बैठती, और दोनों मल्ल-युद्ध करते। गाँव वालों का मनोरंजन करते।

तमाशबीन बढ़ते गए। टोंटी पर सियासत बढ़ती गई। टोंटी को सरकारी टोंटी घोषित कर दी गई। बड़े-बड़े नेता आते हैं, टोंटी के साथ सेल्फी खिंचवाते हैं। कन्नू और तम्मू मूक दर्शक हैं। कठपुतलियाँ हैं। जब मर्जी टोंटी दायें-बायें घुमा लड़वा दिया। टोंटी न हुआ विडियो-गेम का ‘जॉय-स्टीक’ हो गया।

“कहाँ है ये महारानी तलाब?” एक परदेशी राहगीर ने पूछा।

“यहाँ से दक्खिन नाक की सीध में।”

कन्नू-तम्मू की लड़ाई में महारानी तलाब भी गजब पॉपुलर हो रही है।

(कावेरी जल विवाद लगभग २५० सालों से चल रहा दो राज्यों के मध्य एक अनवरत मतभेद है)

The Valentine Jayanti

Most popular male gods in India are either Lord Shiva or Hanuman-epitomes of manhood. While Shiva is fav among females, an ideal husband material with two naughty kids, Bajrang Bali Hanuman gulps plenty of laddoos from ‘no woman no cry’ sloganeering bachelors. The moment I realised I am loaded with enough testosterone, I switched from Lord Hanuman to Lord Shiva, and memorised the famous Shiv Tandava mantra. Ready for the kill!

Quiting Lord Hanuman began with quiting gymnasium, where I sweated hard on my biceps and pecs, and began looking like a mini-hanuman. Wore half-sleeve tight T-shirts shopped from Chor-bazaar, walking with forward-thrusted chest. Girl who always sat next to me, disappeared as if my sweat will make her pregnant. Realised my sweaty stinking stupid self and quit the bone-breaking muscle-aching gym sessions.

Switching to Shiva meant attitude, male anger and the ‘third-eye’. Trick worked. The girl returned, and my third-eye was all on her. Always talked to her looking down, with ‘trinetra’ right at her face. Soon I was in love like one of those Amol Palekar movies. I would strategically chose seat next to her, but would never talk, never meet eyes. And when the bubbly girl would offer to come to college canteen, the angry Shiva in me would rise from nowhere and reject her. As if I have millions of tasks. Same night, I would be drinking like ‘neelkanth’.

Then came the festival of love. Valentine’s day. Angry Shiva seemed to send his Sainiks in city of Pune to vandalise it. While Hanuman’s Bajrangi Sena is already locking horns somewhere else. Choice between brown-eyed girl and gods was little difficult, but boiling testosterone in me finally won.

Red roses were soaring high in demand, so chose the pink, and hid it between shining white Govinda-style baniyaan and my dashing blue full-sleeves, stuck beneath my jeans at waist. After a quick Reiki of library and canteen, located her among bunch of frolicking girls. To take the rose out sharply, made a window in shirt keeping the lower button open. Crashed into girls, and the rose right in her hand! Execution was flawless like Godse shooting Gandhi. We had a Vada-Pav together and remained friends forever. Never knew bloody rose was colour-coded. ‘Pink’ meant rose without testicles.

Happy Valentine’s!

The land of Nobel

Nobel Prize had been a childhood fascination for me, from the days I began collecting trophies in school quizzes and gully-debates. While Mother Teresa and Rabindra Nath Tagore seemed too ethereal, Hargobind Khorana seemed achievable and I began studying medicine. And when I first opened my email account on Hotmail, one of my first emails was directed to khorana@mit.edu scripted in a broken english,

Dear Dr. Khorana,

I had been fascinated by your research from childhood, and wish to join your lab. Though I am in process of application to your university and have taken all requisite tests, there are meagre chances to join your prestigious university. Please accept me as Eklavya if not Arjuna, by just replying this email.

Regards.”

Man never replied. Eklavya turned Devdas. Cursed the old man with abuses gulping bouts of drinks. Years later, I figured out man didn’t know how to reply emails. He didn’t even reply to White House when they conferred him with National Medal of Science. A white house representative had to track him down on foot to make him attend.

Anyway, I figured out, to win a Nobel- you have to become a cynic psychopath scientist with a french beard, an Einsteinian hairstyle, a test-tube in hand, and sitting in a US-lab. And here I was! Sitting in a prime lab in United States, with similar attire and outlook, and joined the most cynic professor’s lab. Man kept snails as his pets, who even followed his orders! My research progressed with snail pace, and I would have taken more Vodka shots in those test-tubes than performing experiments. Well, that was cynic!

One day my professor asked, “So Kumar! How is your research going?”

In serendipidity, I answered, “I am making a mathematical model of snail behaviour.” Huh!

“Hey! That’s awesome. Let’s meet up this wednesday and see it.”

WTF? Mathematical model of snail behaviour!!! What the hell is that?

Greatest solution to all problems existed even those days some 12 years back. Baba Google!

With a good bout of plagiarism and copy-paste Java animation programme, I was ready with a simulation program on snail movement. My professor clapped when the snail model moved dodgily on the computer screen. When I discussed the model with an IITian friend, man wrote his first mathematical paper on some ‘stochastic behaviour’ and scribbled my name in acknowledgement. The snail shit was superhit!

But, I knew Nobel would never be awarded for decoding a snail’s behaviour. It has to be a ground-breaking research which will shake the world. Something like, “The formula to kill the cancer”, “the secret of addiction”, “the special gene responsible for woman’s abnormal behaviour”, “the neuron which excites on seeing the porn”, “why Katappa killed Bahubali?”.

I quit the US Lab, and began my journey to ground-breaking research, breaking a coconut in one of the famous south Indian temples. The priest said looking at me, “You have a bright future waiting for you, all you lack is focus.” Priest was damn right!

Focus! I googled and ordered the famous book by Daniel Goleman “FOCUS”.

I don’t know if I misunderstood him, but to achieve a target, I understood I have to be close to the target. Left the country, weathered the snow, and landed for good in Land of Nobel. Searching for the clerk in Nobel committee who will get things done for me, and assures, “Kaam ho jaayega” (The work will be done!)

Norway! Here I am! Come on Nobel, now lay on me!

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 Epilogue:

In a dinner with Nobel laureate physicist Anthony Leggett (who incidently was my room-mate’s guide) in 2004, he asked, “Doc! You would know it better. Isn’t virus a live moving nanoparticle which targets our cells? Why the hell people are crazy for designing one to target this or that, when its right in front of us? Leave it. I don’t know anything about this.” And he laughed away.

Years later, in 2012, Nature published ‘virus as nano-particles’, what they called ground-breaking research. Beautiful minds toss such ideas on dinner table!

 

Mixed doubles

Two fascinations of rich elite class remained with me for long— playing golf, and having rejuvenation spa. The swinging shiny chiseled golf-stick, stroll through golf-courses donning a stylish golf-hat, and a ride on those golf carts with hot women. Ah heaven! For records, golf fascination remains. But, frequent body-aches pushed me to a rejuvenation spa situated bang opposite my hospital, which displayed a half-naked woman lying flat with some oil dripping on her nude back.
Well, I had some oil-massages from village barber, and at a local akhaada-style gym during early young days. The masochistic telmaalish (oil massage). While the barber would kick and thrash randomly on body, giving harsh spins to the neck and torso, generating cracking sounds through every joint of body, the akhaada one was soft oil massage rubbing chest and back like some gay-porn. 
My eyes searched for some pehelwaan (muscleman) figure in the spa, but all it had were the dark-haired north-eastern fair-skinned girls with accented crisp english. A shiver ran through spine as they seemed to scan my body, and guided me to a dark room. I wondered if some beastly muscle-man is lurking in dark. May be a revenge from the dark past.

Years back in med-school days, we witnessed some sadistic sessions of homosexual thrashings. A fair smooth-skinned fellow (colloquially called ‘chikna‘) would set the honeytrap in public toilet at a happening posh street in midnight. He would trap a gay with erudite suggestive gestures, bring him to hostel, and suddenly a group of sadistic fellows would thrash him brutally. The Gandhian in me would run to his rescue, only to be scorned and laughed at, as homosexual chikna. Soon I began growing my beard to never ever called chikna again.

Coming back to the spa session, there wasn’t any muscleman waiting, rather one of those chikni girls ordered me to be naked. What? A respected suave doctor and father of two daughters, stripping off in a dark room with a woman? What if a patient is lying next to me, and figures out Doctor-saab has a mole on his ass? Forget a patient, what if this girl visits my hospital next day and gives a naughty smirk in front of my colleagues? I just covered my face with palm, followed her orders, and my hindu self began muttering HanumanChalisa (a religious chant). She was indifferently massaging my body, while I was differently shrinking and giggling when she touched the sole of my feet. I don’t know if she sensed my discomfort or was surprised at my repulsive behaviour. She asked, “Are you a gay?” This was extreme insult to my sexuality, and I retorted, “Why? Are you a lesbian?” 

Woman casually said, “Yes, I am. My husband died of excessive drinking barely three years after marriage. I hate having relationship with men.” 

Her confession shed off my inhibitions, as if the woman was harmless and my humanly wiggling willy too shrunk back. So did the pride of false man-hood, the gay-beating, and the lesbian-hatred. 

The blue ice: a shit-com

For whatever reasons, birds always found my head as a coveted shitting destination. Even in a crowded environment, if a bird is flying around, I would gear up myself holding a file or book overhead. My transient breath of relief would be annuled as the raven comes back swifter dropping on me accurately like a targeted missile. I was brutally splattered with bird-droppings during my short stint in Indian Institute of Science, which boasted of highest density of nasty crows (kauwa). For the first time in my life, I wore a Govinda-style yellow shirt to camouflage the shitty polka-drops.

The fear of bird-droppings soon extended to any flying object as I would hide even at sight of aeroplane. I always wondered what happens to the shit in the air. Most convenient way would be to disperse it in vastness of atmosphere, and cruise away. The untimely rains and windy splatters. My curiousity ended recently when an elderly woman in Bhopal (city in central India) got hit by a huge chunk of ice fallen from sky. Early investigations suggested it could be ‘blue ice’, human excreta disposed from aeroplanes which gets frozen in stratosphere. My fear wasn’t completely ungrounded and some do throw the shit right up in the air, especially Indian planes devoid of sanitary space on ground.

While the aeroplane mystery took some time, Indian railways were pretty blatant and open-minded from its inception. A hole in the toilet peeps directly down on track. At a usual train velocity of 150 km/hr, a 15 minute shit of yours can make roughly 38 km trail of shit droppings. Considering ever-engaged toilets in trains, the multi-origin shitty trail would extend from origin to destination spanning some 1000 kms. One of the royal heir I heard of, always took a local 30 minute railway stretch every morning at 6 0’clock, only to shit in moving train! His habit seem to have ended at a serious note when he disregarded the statutatory warning displayed in Indian Railways – Please do not use toilets when the train stops at platform. People say, constipated Raja-Saa’b continued his rituals even when train stopped. Sanitation fellows with long brooms began cleaning the toilets, shoving through holes beneath the train, and gave a powerful thrust when they found anything obstructive. This time, it was Raja Saa’b’s ass!

I haven’t utilised public toilets much in life, since I considered them as some sacred love destination. Similar to temple walls, toilet walls too are studded with scribbled names of ‘love-couples’. I wonder how somebody can have an amorous feeling while shitting, and scribble his flame’s name. Extreme love! Isn’t it? As I recently travelled and about to position myself strategically on a shaking commode, I found it written on toilet wall – I love you Priya. I pity the love of poor girl Priya with the shitty boy.

There were days even in my life, when village toilets were reserved for women who seem to have incessant affair with bathrooms. I would be forced to stroll to bamboo-plantations and ease myself with bushy grasses rubbing my body. Umpeen times would I change my position as I would imagine somebody staring at me and breaching my privacy. At a distance, I saw a queue of villagers shitting calmly with one palm on their cheek as if in a great contemplation. Surely, those early days devoid of toilets, gave India great philosophers. Even today, at least my blogging ideas shoot off from long gruelling sessions in toilet. Doesn’t my blog stink?

[a satire on need of sanitation in developing nations; a sequel to earlier blog ‘Love is in the air’]

झुकी झुकी सी नज़र

कल अपने २३वें व्हाट्स-ऐप ग्रुप का उदघाटन समारोह था, जिसका प्रादुर्भाव महज़ उन लोगों से हुआ, जिनकी तोंद निकली है. मेरे वो मित्र जो अपने उदर से असंतुष्ट हैं, शामिल हुये और स्वास्थ्यवर्द्धक पोस्ट फारवर्ड करने लगे. खाने-पीने की रणनीति बनी और यहाँ तक की आपस के उदरों की मौजूदा तस्वीरें भी शेयर हो गये. मामला गंभीर निकला और ऑड-इवेन प्रणाली पर योग और जिम की अदला-बदली तय की गयी. खैर, मूलत: एक और वजह मिल गयी ग्रुप बनाने की. जिरह और हास-परिहास की पुरानी आदत और कभी आत्म-चिंतन की वज़ह से अक्सरहाँ ग्रुप से बाहर-अंदर होता रहता हूँ. पर कौतूहल है कि हर दो मिनट में फोन को टटोलने पर मज़बूर कर देता. ये कैसी चुंबकीय गुलामी है? फेसबुक पे लाइक कितने तो व्हॉट्स-ऐप पे चुटकुले पे कोई भला हंसा क्यूँ नहीं? न हँसे मेरी बला से, अजी बिल्कुल ताजा भेजा था. साँप सूँघ गया क्या ग्रुप को? बस ऊहापोह सी लगी रहती.

ये माजरा पहले न था. ताश के पत्ते निकलते या पकौड़े तले जाते. चाय की दुकान पर एक-एक कर दोस्तों का जमावड़ा होता. काफिले आते-जाते, मुद्दे बदलते, वाद-विवाद होता, और हम अक्खड़ जमे रहते. आवाज में बुलंदी, नजर ऊँची और ठहाके ऐसे की नुक्कड़ पे बस अपना ही राज. कभी सिक्का जमता तो कभी किरकिरी होती, पर डटे रहते. 

ऐसा नहीं कि टेलीफोन न था. चौक पे सरकारी औफिस में सस्ते में ट्रंक-कॉल बुक होती, एक छोटी खिड़की से रिसीवर पकड़ाते, और पीछे खड़े लाइन में लगे लोग दाँये-बाँये देख न सुनने का स्वाँग रचाते. अजी, कौन सी प्रेमिका से गूफ्तगू है? वो राँची वाले फूफा जी होंगे या दिल्ली वाले मामाजी. प्रेम-संलाप करना हो तो अगले चौराहे पे STD बूथ है, कटघरे में जितनी मरजी दबी आवाज में बतिया लो. बस ऊपर वो LED स्क्रीन पे मिनट देखते रहना! बड़े जालिम होते वो टेलीफोन वाले, हर तीन मिनट में पैसे दुगुना. 5 मिनट 59 सेकंड में जिसने झट से रिसीवर रखा, वो है चपल चतुर.

साल-दो साल की बुकिंग पे आखिर घर में भी फोन लग ही गया. क्या उत्सव का माहौल? पड़ोसी बधाई देते, और नंबर जरूर नोट कर जाते. शुक्र है अब चौक पे न जाना. झा-सा’ब के घर फोन जो लग गया. बात की बात, और मुफ्त की चाय सो अलग. और शामत हम बच्चों की, जो घंटे-दो घंटे मुहल्ले में फोन आने का संवाद लिये घूमते. ये तो धन्य टेलीफोन विभाग वाले की अक्सर फोन डेड रहता, और हम चैन की साँस लेते.

मेडिकल कॉलेज में भी यही फोन-बूथ का सिलसिला चलता रहा. रात को ११ बजे के बाद फोन के रेट कम हो जाते, और हमारी कतार लग जाती. आधी नींद में वार्तालाप भी कम होता, और पैसे बचे सो अलग. तभी एक क्रांति हुई. एक रेडियो-नुमा या भारी भरकम वायरलेस जैसी चीज, जो फोन का काम करती. हॉस्टल में इक्के-दुक्के अमीरजादों नें खरीदी और हम कौतूहलवश निहारते. जींस में लटकाते, तो आधी जींस एक तरफ खिसक जाती और कूल्हे अर्द्धनग्न. हाथ से कान तक लाने में यूँ प्रतीत होता, जैसे गाँडीव उठा रहे हो.

बड़ी कशमकश में हमने भी एक अभूतपूर्व जुगाड़ू निर्णय लिया. पाँच मित्रों ने मिल एक मोबाइल फोन खरीदा, और ये बंटवारा कर डाला कि हफ्ते में अमुक दिन इसका राजा कौन? दोस्त इसे पाँचाली कह उपहास करते, पर हम पाँडवों ने चीरहरण न होने दिया. ठीक-ठीक याद नहीं पर वो ‘मोटोरोला’ कंपनी का फोन सालों चला, अविवादित, अजीर्ण.

आज अपनी आई-फोन ६ प्लस की ग्लैमरस माशूका के होते हुये भी उस पाँचाली की बहोत याद आती है. रिंगटोन ऐसा कि पड़ोसी भी जाग ले, भरपूर वजन कि फोन उठाओ तो डोले-शोले बन जायें. सीना तना, आवाज में कड़क अंदाज. धीरे बोलने वाले, कमजोर दिलों वाले दूर ही रहे.

कॉफी पी रहा हूँ और सामने बैठी युवती के नजर उठने का इंतजार है. आधे घंटे से नजर झुकाये, अकेले खिलखिला रही है. अजी वो ही क्या, मैं, आप और ये सारा आशियाँ. कूबड़ों की तरह झुकी कमर, पागलों की तरह अकेले में हंसना, और तोंदूमलों का ग्रूप!

What woman want: A mathematical approach

Disclaimer: With all due respect to our great forefathers who never dared to venture into this territory, I, Vamagandhi, present this piece with nobel and humanitarian intentions. Any coincidence and resemblance is purely incidental, unintentional, unmotivated, and all their synonyms. 

…………………..

1. Binary mind (0 and 1 rule): 

Hypothesis: Women have two strongly opposite opinions decided impromptu, and thus difficult to guess.

Tests conducted: Buying anything for woman: Anything. From toilet soap to a glittering jewellery.

Results:

A loud exciting yeaayyy, the hugs and kisses, and o-i-luv-u-so-much;

Or,

a disgruntled face, vocal blurt-out, stamping feet, and go-change-it-immediately. 

2. Stochastic process: 

Hypothesis: Every decision is indeterminate, and you have to rely on series of indeterminate events to derive a certain probability. 

Tests conducted: Restaurant menu is a perfect set of variables. Based on many stochastic predictions, I could accurately predict she is going to detest what she finally ordered, and we will be switching our meals soon. 

Results: I slurped the Chicken Jakutti in a nasty broth, while she gobbled on my Afghani Kebabs. Goddamn! Stochastic process!!

3. Mutual exclusion principle

Hypothesis: No two critical processes can be handled at same time, and one is bound to compromise or change the source.

Test conducted: The famous TV remote experiment where a climax of football match competes with climax of TV soap.

Result: Ofcourse the TV soap continued. Watched the highlights late night.

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Early results forecasted. Experiments running…..

लविंग लाइसेंस

वो वक्त भी था जब युवतीयों को देख गुदगुदी कम सिहरन ज्यादा होती. ट्यूशन पढ़ने आती खिलखिलाती लड़कियाँ सामने से आती, तो पैर काँप जाते, साइकिल से औंधे-मुँह गिरता, लड़कियाँ मुँह दबा उपहास करती हँसती निकल जाती. कोई कलम भी माँग ले, तो छिज्जी उंगली और अंगूठे के बीच आखिरी कोना पकड़ता; सर झुका कलम ऐसे बढ़ाता जैसे हाथ में साँप की पूँछ आ गयी हो; छोड़ भाग आता. 

ये सिलसिला कब तक चला, याद नहीं. पर हाँ, कई गुलाब कोसते रहे,  “हाथ में ही रखोगे लल्लू, या उसे दोगे भी? मज़े में गुलदस्ते में था. खामख्वाह तेरे भी बीस रूपये गये, और मैं भी इंतजार में मुरझा गया.” 

मैं क्या? बड़े बड़े शूरमा हिल जायें. भगवान राम को भी जनक से छुप-छुपा, शानू के गाने गा, सीता को इम्प्रेस करना होता, तो रामायण की कथा कुछ और होती. धनुष तोड़ने से मिल जाए तो भैया! हॉस्टल में हमने भी बहोत तोड़-फोड़ मचाई. 

खैर! त्रेतायुग से कलियुग के ट्रांजीशन में परिवर्तन तो लाज़मी था. मैंने भी आखिर इस क्षेत्र में कई प्रयोग किये, ‘ट्रायल-एरर’ से लेकर ‘व्हाट वूमन वांट्स्’ की तह तक. हाथ में मर्दाना अकड़ और गूफ्तगू का सहज़ अंदाज़. जैसी युवती, वैसी अदाकारी. पढ़ाकू को ज्ञान, फिल्मी-चक्कर वालों को रोमाँस-डोज़, और कन्फ्यूज्ड मंदबुद्धि सुंदरियों को झूठी तारीफ. बस सिक्का जम गया. ज्ञान बाँटने का शौकीन था. लवगुरू बन गया.

गुरू गुड़ रह गया, चेले चीनी खाने लगे. समय बदल रहा था. मेरे फॉर्मूले आउट-डेटेड होने लगे. न वो रिझाना. न वो मनाना. न वो घंटों प्यार की गूफ्तगू. अजी! कौन बैंक जाये, पासबुक-इंट्री करे? ATM स्वाइप का ज़माना आ गया. पहले ऊबड़-खाबड़ रोड पे ऑटोरिक्शा में क्षणिक श्पर्श में ही शरीर तप्त-कंपित हो जाते, अब तो पब्लिक-पार्क में लिपटे पड़े मिलते हैं. क्षुब्ध, मैंने भी सन्यास ले लिया. कोई खास शारिरीक संबंधों से शिकायत नहीं थी, परंतु इस प्रेम में उचाटपन और अस्थिरता दिखी. वो कहते हैं ना, आज पूजा, कल कोई दूजा. फिर मेरे जैसे पुजारी की क्या आवश्यकता?

अरसों बीत गये. कल फ्लाइट की सीट पे अनमना सा था. सफ़र में सोने की पुरानी आदत, और सामने वाली सीट पे कुलबुलाहट. सीट के बीच से पड़ी एक अनचाही नज़र ने ही कह दिया, नवविवाहिता जोड़ा है. चूड़ियों से सुसज्जित आधी से अधिक बाँह, जो बारम्बार पति के हाथ को झटकती. पति भी कहाँ मानने वाला? कभी कमर, कभी वक्ष की ओर, और मैं मुँह छुपाता बैठे-बैठे आधी-तिरछी करवट लेता. तभी कुछ अप्रत्याशित हुआ और मैं काँप गया. पीली साड़ी, माँग में मोटी सिन्दूरी रेखा और स्वर्ण गहनों में लदी युवती ने पति का हाथ मरोड़ा और अंग्रेजी में कहा, “What do you think you fool? You got a license to love me or what? Stay away.” चार दिन की शादी में वस्त्रहरण का लाइसेंस तो नहीं मिल जाता.

नारी-सम्मान और प्रेम के पुजारी को इस वीरांगना में असुर नहीं, साक्षात् दुर्गा दिखी. इस लविंग लाइसेंस के कई इम्तिहान हैं. प्रेम-शास्त्र कल भी था, आज भी है, अज़र-अमर, Evergreen. सिलेबस ही तो बदला है, विषय तो वही है. सोचता हूँ, पाठशाला फिर जैसे-तैसे चालू कर ही दूँ, ईमानदारी से लाइसेंस की. 

Avataar

A fellow passenger once dissected my genealogy and told me I belong to an ultra-purified Brahmin community. Not sure, if the semens of forefathers have been rigorously pasteurized and purified by reverse osmosis, but whatever, the outcome is right here, scribbling an yet-again-nasty blog.

Time-and-again, the racial superiority was validated by hook or by crook. My priest in Bangalore was surprised when I finished a 6 hour-long Vaastu-puja in 2 hours as most of the complex Sanskrit Shlokas seem to emanate from me as vedic hymns. As he got up in praise, we figured out his guide-book was actually written by my long-dead grandpa who died 9 months before my birth. Many believe I am his incarnate. Re-birth, an incarnate of a Sanskrit scholar. Why me?? I feel like a walking ghost everytime I see a smiling ‘daadu’s portrait’ in my village courtyard.

My neck-to-neck competitor in school was a Muslim friend, who defeated me in ‘Battle of Social Studies’ to the ‘Gory battle of Mathematics’. I doubted if he was Aurangzeb incarnate, born to denigrate a Brahmin pride. 

With great power, some fool said, comes great responsibilities.

With the sacred thread running from shoulder-to-waist, I rechristened myself as ‘Janeu-man‘. (janeu is colloquial term for sacred brahmin thread). While my hindu friends cheered and sneered, I cozied up with my destined enemy. I would enjoy having ‘Iftaar-party’ with him and he would learn sanskrit shlokas to garnish his achilles-heel ‘hindi’ papersThe last decisive ‘Battle of matriculation’ turned indecisive. We both were declared joint-toppers. I had beaten him in his forte of ‘maths’ and he shattered me in my own backyard ‘hindi’. Recently, in an alumni meet, the school notice-board seemed over-crowded in year of 1995 with two names somehow accommodated together.

Event crucified the upholder of hinduism, and demon of Gandhi corrupted my mind. When a brawl happened in medical school over some isolated muslim fellows cheering for Pakistan team, I would chip-in as peace-proclaimant. The wobbling Inzemaam or the flairy Afridi, I loved the team, though could never cheer for them in Shiv-sena infested Pune hostel. 

Pak-loving Kashmiri medicos beaten and bruised by Shiv Sainiks. What are we building? Brand ambassadors for Lashkar-e-Taiba? 

I cozied up with them, cheered for Afridi, and soon came the Multan test! Viru and his flamboyance! We all cheered for only man that day, whether in Pune or in Multan. Viru shattered the borders.

Some years later, my dad, a devout Brahmin, navigated through the stinking streets of muslim ghetto, studded with all-species-butchering shops, and threw me into feet of Khan Saa’b, the best driving teacher in city. I somehow manoevred to grab his feet beneath his lungi. His shanty displayed a Pakistan flag and a large portrait of Ramallah in Palestine. I was surprised why my dad, who otherwise refuses to eat in same plate as muslim, did this to me. May be a revenge to his father who might have slapped him in his childhood. Afterall, I am ‘grandpa returns’.

Surprises galore! That pak-loving khan saab brings a packet of incenses, and asks me to take out a statue of goddess hidden behind a wrecked car engine. Before training, he insisted for a puja of that engine with goddess kept on top and I began reciting the durga-shlokas. This wasn’t all. He corrected me in one of them, and gave a lesson on hindu values which are being ignored by new kids on the block. My dad had shoved 101 rupees in my trouser-pocket beforehand, which I handed over to Pandit Khan, touched his feet and learnt to become best driver in city. He would tell stories of his long friendship of my dad and him, and I would be awed in my hard-core hindu dad’s real self.

Puzzled, I quizzed my dad. 

He said, “Why do you sport a US flag on your T-shirt? Probably, you like americans who live thousand miles away. Khan Saa’b loves our neighbour country. I don’t like either. My choice, your choice, his choice. Go! Get a glass of water now!”

Grandpa smiled at his avataar from heaven, and I smiled back to him. I doubt if he is gobbling on muttons and having ‘iftaar’ party up there. Hypocrite gandhians! Huh!

The half-burnt beedi

Sunrays breaching the window crevices,

A grimace cursing the intolerant sun.

My peep through the slanket,

The sleeves in the blanket,

Bedroom cafe and the lurching woman.


The rattle of the tea-cups,

And the battle of the sloths.

Gusty winds from the east,

And the undaunted snoring beast.


The scent of a woman.

Her hairs afloat,

the shiver in the lips,

And the cluttering teeth.

Love irresistible, and so the Darjeeling tea.

The broken bangles, the amorous moves, and

The brutal neighbour, with the mighty gargles

The lips so close, and the boisterous laugh,

The shattered love, and

The half-burnt beedi.