राजतरंगिणी (Rajatarangini)

प्रथम_तरंग

रचयिता: कल्हण; पाठ (सरलीकरण/रूपांतरण): प्रवीण कु. झा

कल्प के 6 मन्वंतर पर्यंत हिमालय के बीच एक ‘सतीसर’ नाम की बड़ी झील थी। सातवें यानी वैवस्वत मन्वंतर में कश्यप ऋषि ने सभी देवताओं के सहयोग से उस झील में बसे असुर जलोद्भव को मरवा डाला और उस झील की भूमि में कश्मीर की संरचना की। यह प्रदेश वितस्ता नदी की धारा से और नागराज श्री नीलनाग से पालन किया जाता है। वितस्ता में अमृत और विष दोनों के गुण हैं। इसकी कंदराओं में पार्वती गणेश को दूध पिलाती थी, तो इसमें उस दूध के गुण हैं। और इसकी धारा में साँप आकर जल पीते हैं, इसलिए उसमें नागों के विष का गुण भी है। तमाम रत्न वाले साँपों से सुसज्जित यह देश कुबेर की नगरी लगती है। गरूड़ के भय से इन साँपों की रक्षा के लिए इस प्रदेश में पहाड़ों की दीवार खड़ी की गयी।

यहाँ पापसूदन तीर्थ में लकड़ी (काठ) के बने शिव की पूजा से भोग और मोक्ष, दोनों की प्राप्ति होती है। यहाँ एक निर्जल पर्वत है, जहाँ अगर पुण्यात्मा जाती है तो जल मिल जाता है, लेकिन पापियों को नहीं मिलता। यहाँ धरती से आग की ज्वालाएँ भी निकलती है, जैसे गण हवन कर रहे हों। यहाँ भेड़ पर्वत पर एक झील है जहाँ से गंगा का उद्भव हुआ, वहाँ कई हंस विचरण करते हैं। नन्दीक्षेत्र में एक शिव-मंदिर है, जहाँ देवों द्वारा शिव की पूजा की गयी थी। आज भी उस मंदिर में चंदन-बिन्दु दिखते हैं। यहाँ माँ शारदा के दर्शन से कवियों के द्वारा सेवित दो नदियों- मधुमती और मधुरवाणी की प्राप्ति होती है। कश्मीर में चक्रधर, विजयेश, ईशान, आदिकेशव इत्यादि तीर्थ-स्थल तो हैं ही, यहाँ एक भी ऐसा स्थान नहीं जो तीर्थ नहीं।

‘कश्मीर पर विजय पुण्य की शक्ति से ही की जा सकती है, शस्त्र से नहीं। इसलिए कश्मीर-वासी परलोक से डरते हैं, शस्त्र से नहीं।’

यहाँ ठंड के समय स्नानागारों में गरम जल मिलता है, और गर्मी के समय नदियों में शीतल जल। चूँकि इस स्थान का निर्माण सूर्य के पिता कश्यप ने किया, वो यहाँ कभी भी भीषण गर्मी नहीं लाते। यहाँ बड़े-बड़े विद्या-भवन, शीतल स्वच्छ जल और अंगूर जैसे दुर्लभ फल भी साधारण ही माने जाते हैं। तीनों लोक में पृथ्वी श्रेष्ठ है, उसमें भी उत्तर दिशा, उस दिशा में श्रेष्ठ हिमालय, और हिमालय में सबसे रम्य स्थान है कश्मीर।

कलियुग में इस देश में कौरव-पांडव के समकालीन तृतीय गोनन्द तक 52 राजा हुए। लेकिन उन राजाओं के अत्याचार से कवि या लेखक पनप नहीं पाए। यहाँ के राजा प्रतापी हुए और कश्मीर को सुरक्षित रखा, पर इनका नाम लेने वाला कोई नहीं रहा। जिनके राज में हाथियों के दल थे, धन की वर्षा थी, सुंदरियों का विहार था, और गगन-चुम्बी भवन थे, उन्हें आज कोई याद नहीं करता।

‘इसी लिए कवि से महत्वपूर्ण कोई नहीं। उनके बिना संसार अंधा है।’

कश्मीर में गोनन्द आदि 52 राजाओं नें 2268 वर्ष तक राज किया। जो लोग यह मानते हैं कि महाभारत कलियुग में नहीं, द्वापरयुग के अंत में हुआ, वो मेरी काल-गणना से असहमत हो सकते हैं। पर यह तो सच है ही कि लगभग कलियुग में जितने वर्ष बीते हैं, उतने ही वर्ष राजाओं ने अब तक शासन किया है।

(कलियुग के 653 वर्ष में कौरव-पांडव हुए। अभी शककाल के 1070 वर्ष बीत चुके हैं। तीसरे गोनन्द के समय से आज तक 2330 वर्ष बीत चुके। एक दूसरी गणना भी है। सप्तर्षि एक नक्षत्र से दूसरे नक्षत्र लगभग 100 साल में घूमते हैं। जब युधिष्ठिर का शासन था, वो मघा नक्षत्र में थे, जो शक-काल 2556 था।)

प्रथम तरंग की काल-गणना में अधिकतर टीका लिखने वालों और स्वयं कल्हण को संदेह है। वह पक्की नहीं कही जा सकती।

चंचल गंगा नदी जब बहती थी, तो वह कैलाश पर्वत का उपहास करती, राजा गोनन्द की सेवा में हाज़िर रहती। शेषनाग का विष भरा मस्तक त्याग यह धरती राजा गोनन्द के रत्न-सज्जित भुजाओं के आश्रय में चली गयी।

राजा गोनन्द जरासंध के मित्र थे, और वह कृष्ण से लड़ने के लिए मथुरा पहुँचे। उन्होंने मथुरा को चारों ओर से घेर लिया। वहीं यमुना किनारे अपनी सेना को ठहराया, अपने आतंक से यादव स्त्रियों का हास किया; और यादव सैनिकों का मनोबल तोड़ा। जब यादव सेना हारने लगी तो बलराम रक्षा के लिए आए। लेकिन इन दोनों वीरों में युद्ध चलता रहा और लंबे समय तक कोई विजयी न हो सका। आखिर गोनन्द शस्त्रों से छलनी हुए, और वीरगति को प्राप्त हुए।

गोनन्द के बाद दामोदर कश्मीर के राजा बने, जिनके मन में यादवों से बदले की आग सुलगती रही। जब गांधार-नरेश ने अपनी कन्या के स्वयंवर में राजाओं को निमंत्रण भेजा, तो दामोदर भी अपनी सेना लेकर यादवों से लड़ने निकल पड़े। दामोदर ने जब इस स्वयंवर के लिए आए वीरों पर आक्रमण किया तो भला स्वयं-वर कैसे होता? आखिर कृष्ण ने अपने सुदर्शन से दामोदर का वध कर दिया। कृष्ण ने ही दामोदर की गर्भवती पत्नी यशोमती का राज्याभिषेक कराया।

लेकिन उस वक्त स्त्री को राजा बनते देख मंत्रियों में असंतोष फैल गया।

‘फिर कृष्ण ने उन्हें शांत कराया कि कश्मीर तो पार्वती का ही स्थल है।’

यह सुन कर लोग जो स्त्रियों को भोग्य मानते थे, देवी रूप मानने लगे, और यशोमती को राजमाता। दसवें महीने में यशोमती के बेटे का जन्म हुआ। उसका नाम रखा गया- गोनन्द (द्वितीय)। यहाँ की वितस्ता नदी और कश्मीर की धरती भी इस बालक की उप-माताएँ बनी। यह बच्चा जब किलकारी करता और खेलता, तो उसके साथ खेलते राज-अनुचर पारितोषिक पाते। अगर कोई मंत्री उस बालक की बात नहीं समझ पाता, तो खुद को अपराधी समझता। जब वह बाल-नरेश सिंहासन पर बैठते, तो उनके पैर जमीन तक नहीं पहुँचते। बाल-नरेश को पंखा झलकर आराम करने दिया जाता, मंत्रीगण राज-काज सँभालते।

जब महाभारत युद्ध हुआ तो कौरवों या पांडवों ने इस बाल-नरेश को बच्चा समझ युद्ध के लिए आमंत्रित नहीं किया।

बाद में जो 35 राजा हुए, उनका इतिहास में वर्णन नहीं मिलता। उसके बाद लव नामक एक राजा हुए। वह एक यशस्वी राजा थे जिन्होंने शत्रुओं की नींद हराम की। उन्ही ने 84 लाख पत्थर लगवा कर ‘लोलोर’ और ‘लोलेर’ नामक नगर बसाए। इस प्रतापी राजा लव ने आखिर लेहरी नदी किनारे बसा गाँव लेवर ब्राह्मणों को दान कर दिया और स्वर्गवासी हो गया। लव के बाद कुश आए। कुश के बाद कुशेशय नामक राजा बना, जिसने कुरूहार नामक गाँव ब्राह्मणों को दिया। कुशेशय के बाद अगले राजा हुए – खगेन्द्र। उन्होनें खागी और खोनमुष नामक गांवों की स्थाप्ना की।

खगेन्द्र के पुत्र सुरेन्द्र के सामने तो देवराज इन्द्र भी लज्जित होते थे। उन्होंने दरद देश की सीमा पर सोरक नामक नगर बसाया। उन्होंने ही नरेंद्र भवन और सौरभ नामक दो विहार बनाए। राजा सुरेंद्र के पुत्र नहीं थे। तो उनके बाद दूसरे वंश के राजा गोधर राज करने लगे। राजा गोधर धार्मिक व्यक्ति थे, और उन्होंने ब्राह्मणों को गोधर और हस्तिशाला नामक गाँव दिए। उनके बाद उनके पुत्र सुवर्ण राजा हुए, जो दानवीर थे। उन्होनें ही कराल देश में एक कृत्रिम नदी बहाई- भीष्म कुल्या। उनके बेटे जनक ने विहार और जालौन नामक गाँव बसाए। जनक के बाद उनके पुत्र शचीनर राजा हुए, जो क्षमाशील तो थे ही, पर उनकी आज्ञा कोई ठुकरा नहीं सकता था। इन्होंने शमांगार और शनार नामक दो गाँव बसाए। शचीनर के कोई पुत्र नहीं थे।

अगले राजा हुए अशोक, जो शकुनी के प्रपौत्र थे। ये एक पवित्र राजा थे, जिन्होंने जैन धर्म स्वीकारा। इन्होनें शुष्कलेत्र और वितस्तात्र में जैन-स्तूप बनवाए। वितस्तात्र के धर्मारण्य विहार का बना जैन-मंदिर तो विशालकाय था, जिसकी ऊँचाई देखने वाली थी।

‘इसी राजा ने 96 लाख भवनों से बना ‘श्रीनगर’ बसाया।’

राजा ने हिंदू विजयेश्वर मंदिर जो चूने का बना था, उसे तुड़वा कर पत्थर का भव्य जैन मंदिर बनवाया। विजयेश्वर के अतिरिक्त अशोकेश्वर नाम से दो मंदिर पास ही और बनवाए।

अशोक के समय ही कश्मीर पर म्लेच्छों का आक्रमण हुआ, जिनके समूल नाश के लिए राजा अशोक ने शिव की तपस्या प्रारंभ की। इस तपस्या के पश्चात् उन्हें एक यशस्वी पुत्र प्राप्त हुए- जलौक, जो अगले राजा बने। उनकी पवित्रता देख कर तो देव-गण भी आश्चर्य-चकित थे। इस राजा ने पारद (मर्करी) आदि धातुओं से स्वर्ण (या सोने सरीखे धातु) बनाने की शक्ति पाई, और इससे पूरी धरती को स्वर्ण-मय बनाने की उनमें इच्छा जागी।

राजा जलौक नागसरोवर में नाग-कन्याओं से यौन-संबंध भी स्थापित करते रहे। इस राजा ने कई बुद्धिमान बौद्धों को परास्त भी किया। ये शिव-भक्त थे और नन्दीश क्षेत्र के श्रीज्येष्ठचेश्वर में प्रतिदिन शिव की आराधना करते थे। यह यात्रा लंबी थी, लेकिन इस यात्रा में पूरे रास्ते राजा के साथ एक नाग चलता था, और इसलिए हर गाँव में घोड़े की ज़रूरत नहीं होती।

‘उस वीर राजा ने आख़िर म्लेच्छों के दल को हर जगह परास्त कर खत्म कर दिया।’

जिस जगह से म्लेच्छों को उखाड़ फेंका गया, उसका नाम ‘उज्झटडिम्ब’ नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसी राजा ने ‘कान्य-कुब्ज’ और अन्य देशों को जीत कर कश्मीर में विद्वान पंडितों और चारों वर्णों के लोगों को बुलाया। इनकी मदद से राज्य-प्रबंधन में सुधार किए गए। पहले राज्य में सात अधिकारी होते थे- धर्माध्यक्ष, कोषाध्यक्ष, सेनापति, धनाध्यक्ष, विदेश सचिव, पुरोहित और ज्योतिषि। अब युधिष्ठिर के राज की तरह आठवाँ विभाग जुड़ा- कार्य-विभाग!

राजा जलौक ने ही वारबल आदि गाँव ब्राह्मणों को दिए। उसकी रानी ईशान देवी ने कश्मीर और अन्य देशों के द्वारों पर प्रभावशाली मातृ-चक्र की स्थापना की। राजा जलौक ने व्यास से जब नन्दी-पुराण सुना तो उसके मन में नन्दीश क्षेत्र के अलावा सोदर तीर्थ में पूजन की इच्छा जगी। हालांकि उसने श्रीनगर में ही भगवान् ज्येष्ठचेश की स्थापना की थी, लेकिन सोदर तीर्थ जाकर ही पूजा करने की उसकी इच्छा प्रबल हो गयी थी। सोदर तीर्थ उसके निवास से काफी दूर था, तो एक दिन वो व्यस्तता की वजह से जा न सका। इस कारण वो बहुत परेशान हुआ।

लेकिन तभी जमीन से बिल्कुल सोदर-तीर्थ जैसी ही जल-धारा निकलने लगी। उसमें जब उसने स्नान किया तो लगा सोदर तीर्थ यहीं उठ कर आ गया। इस बात की जाँच के लिए उसने एक पात्र मूल सोदर तीर्थ में रख दिया। वो बह कर इसी जल-धारा में आ गया। इससे सिद्ध हो गया कि यह जल-धारा सोदर तीर्थ से ही आ रही है। यह संभव है कि राजा जलौक नन्दीश (शिव) का ही अवतार था। नहीं तो भला ऐसे चमत्कार कैसे होते?

एक समय राजा जलौक विजयेश्वर जा रहे थे, तो रास्ते में एक स्त्री ने भोजन माँगा।

राजा ने पूछा, “तुम क्या खाना पसंद करोगी?”

“मुझे नर-मांस खाने की इच्छा है।” यह कहते हुए स्त्री ने भयंकर रूप धारण कर लिया।

“मैं किसी की हत्या तो नहीं कर सकता। तुम मेरा मांस खा लो।”

“आपका मांस? यह कैसे संभव है? हे राजा! मैनें आज आप में बोधिसत्व देख लिया। आप महान् हैं।”

“बोधिसत्व का क्या अर्थ है?”

“अब आपको मैं सारी बात कहती हूँ। मुझे आपके द्वारा परास्त किए बौद्धों ने भेजा है। मैं लोकालोक पर्वत के समीप अंधकार में रहने वाली डायनों में से हूँ। हम अपने पापों से मुक्ति के लिए बोधिसत्वों के शरण में रहते हैं। बोधिसत्व महात्मा बुद्ध के बाद जो भी बौद्ध ज्ञानी पुरूष हुए, वे लोग हैं। वे अपराधियों पर क्रोधित नहीं होते, उन्हें क्षमा कर देते हैं। वे संसार का कल्याण करते हैं। एक बार एक बौद्ध-विहार में बज रहे वाद्य-यंत्रों से आपकी नींद में खलल पड़ गया, तो आपने सारा विहार ही तहस-नहस कर दिया। इसी का बदला लेने बौद्धों ने मुझे आपके पास भेजा।”

“अच्छा। आगे कहिए।”

“उन्होनें मुझसे कहा कि राजा महाशाक्य है, और इसलिए उसे मैं पीड़ा नहीं दे सकती। आपके दर्शन से मुझे सद्गति मिलेगी। कुछ दुष्टों ने आपका मन मलिन कर रखा है। मैं आपको असंख्य सोने के सिक्के देती हूँ। आप बौद्ध-विहार पुन: बनवा दें। इससे उन दुष्टों का प्रायश्चित हो जाएगा, जिसने आपको इस विहार को तोड़ने के लिए कहा था। मैनें आपसे भोजन माँग कर आपके सत्व की परीक्षा ली थी। अब मैं भी पाप-मुक्त हो जाऊँगी। आपका कल्याण हो। मैं अब जाती हूँ।”

यह कह कर वो अदृश्य हो गयी।

राजा ने उस कृत्या (डायन) के लिए एक कृत्याश्रम विहार बनवाया, और उसकी पूजा करने लगा।

राजा जालौक ने ही नन्दीश क्षेत्र में भगवान् भूतेश का विशाल रत्न-सज्जित पत्थरों का मंदिर बनवाया। इसी राजा ने ज्येष्ठेश भगवान् की पूजा के लिए सौ नाचने-गाने वाली स्त्रियों को रखा था। अंत में राजा जलौक अपनी पत्नी के साथ कनकवाहिनी नदी के किनारे चीर-मोचन में तपस्या करने को बैठे, और आखिर उनकी मृत्यु हुई और वो शिव रूप में लीन हो गए।

राजा जालौक के बाद राजा दामोदर आए। वो किस वंश के थे, यह कहना कठिन है। यह राजा भी संसार में प्रसिद्ध और धन से इतने संपन्न रहे कि देवता कुबेर भी उनके मित्र थे। उन्होनें अपने हजारों यक्षों (इंज़ीनियरों) को लगाकर एक ‘गुड्ड’ नामक बांध बनवाया। इस बांध से दामोदरसूद नामक उसके बसाए नगर में पानी पहुँचता था। पर इस बाँध में एक बड़ा विघ्न आने वाला था।

उस वक्त ब्राह्मणों को नाराज करना राजाओं के लिए एक पाप था। एक दफे राजा दामोदर वितस्ता नदी की ओर नहाने जा रहे थे, उनके पास कई भूखे ब्राह्मण पहुँच गए और भोजन मांगने लगे। राजा बिना ध्यान दिए आगे बढ़ने लगे, तो ब्राह्मणों ने अपनी शक्ति से वितस्ता नदी को ही सामने ला दिया और कहा कि यह रही नदी! अब भोजन दो। पर राजा ने फिर भी ध्यान नहीं दिया और कहा कि नहाने के बाद ही भोजन देंगे। इतना ही नहीं, राजा ने उन्हें वहाँ से चले जाने को कह दिया।

ब्राह्मण नाराज होकर बोले, “जा राजन! तू साँप बन जा।”

“नहीं! मुझे क्षमा कर दें।”

“अब जब एक दिन में संपूर्ण रामायण सुनेगा, तभी तू मुक्त होगा।”

उस दिन के बाद वो राजा साँप बन गया, और आज भी कश्मीर में कहीं भटक रहा है।

राजा दामोदर के बाद हुष्क, जुष्क और कनिष्क नामक राजा हुए, जिन्होंने हुष्कपुर, जुष्कपुर और कनिष्कपुर नामक नगर बसाए। इनमें से जुष्क ने जुष्कपुर और जयस्वामिपुर में बहुत से बौद्ध विहार बनवाए। यह वो वक्त था जब कश्मीर में बौद्ध-धर्म का बोलबाला था। महात्मा बुद्ध की मृत्यु तो डेढ़ सौ वर्ष पूर्व हो चुकी थी, पर नागार्जुन नामक बोधिसत्व ने बौद्ध-धर्म का प्रसार खूब किया था।

इन राजाओं के बाद आए- राजा अभिमन्यु। इन्होंने कण्टकोत्स नामक गांव ब्राह्मणों को दिया। इसी राजा ने अभिमन्युपुर नामक शहर बसा कर वहाँ शिव का मंदिर बनवाया।

अभिमन्यु के समय ही चंद्राचार्य नामक पंडित ने एक महत्वपूर्ण कार्य किया। पाणिनी और कात्यायन द्वारा स्थापित ‘महाभाष्य’ व्याकरण जो लुप्त हो रहा था, उसका पुन: प्रचार किया। उन्होंने चांद्र-व्याकरण नाम से एक अपने व्याकरण की भी रचना की।

इसकी महत्ता शायद इसलिए भी थी क्योंकि नागार्जुन द्वारा प्रसारित बौद्ध धर्म भारत में दिग्विजय कर रहा था। बोधिसत्वों ने शास्त्रार्थ में कई पंडितों को हराया और नीलमतपुराण के तर्कों को छिन्न कर दिया। लेकिन जब इस कारण बलि-प्रथा और अन्य कर्मकांड बंद होने शुरू हुए तो कश्मीर के नाग क्रुद्धित हो गए। उन्होंने बर्फबारी शुरू कर दी और कई लोग मरने लगे। पर इसमें मुख्यत: बौद्धों का ही नाश हुआ। बलिदान और होम करने वाले ब्राह्मण बच गए, बौद्ध मरते गए। ऐसी विकट परिस्थिति में राजा अभिमन्यु शीत काल के छह महीने दर्वाभिसार प्रांत में रहने लगे। बर्फबारी की वजह से श्रीनगर में रहना असंभव था।

नागों को प्रसन्न करने के लिए एक काश्यप-गोत्री ब्राह्मण चंद्रदेव ने तप प्रारंभ किया। जब रक्षक-नील नामक नाग आखिर खुश होकर प्रकट हुए तो बर्फबारी रूक गयी और उन्होंने नीलमत पुराण से पूजा करने के लिए कहा। इससे पहले विद्वान चंद्रदेव ने यक्षों के उपद्रव से मुक्ति दी थी। अब इस दूसरे विद्वान चंद्रदेव ने बौद्ध-भिक्षुओं से मुक्ति दिलाई।

अगले राजा बने- तृतीय गोनंद। उनके आने के बाद पुराने कर्म-कांड फिर से शुरू हो गए। नागपूजन, नाग-यज्ञ, नाग-यात्रा, सभी त्यौहार फिर से शुरू हो गए। बौद्ध प्रभाव से यह सब बंद हो गए थे। जब नीलमत-पुराण से पूजा शुरू हुई, तो बर्फबारी भी बंद हो गयी, और बौद्ध समस्या भी खत्म हुई।

कल्हण कहते हैं, “जो राजा प्रजा को कष्ट देते हैं, वो परिवार सहित नष्ट हो जाते हैं। और जो बिगड़े हुए देश में सुख-शांति की स्थापना करते हैं, उनकी कई पीढ़ी तक स्थिरता रहती है।”

शासनकाल (गोनंद तृतीय से युधिष्ठिर तक. सभी नाम उपलब्ध नहीं)

गोनंद तृतीय – 35 वर्ष
विभीषन – 53.5 वर्ष
इंद्रजीत – 35 वर्ष
रावण – 37 वर्ष
विभीषण द्वितीय – 35.5 वर्ष
किन्नर – 39 वर्ष 9 महीने
सिद्ध – 60 वर्ष
उत्पलाक्ष – 30.5 वर्ष
हिरण्याक्ष – 37 वर्ष 7 महीने
हिण्यकुल – 60 वर्ष
वसुकुल – 60 वर्ष
मिहिरकुल– 70 वर्ष
वक – 63 वर्ष 13 दिन
क्षितिनन्द – 30 वर्ष
वसुनन्द – 52 वर्ष 2 महीने
नर – 60 वर्ष
अक्ष– 60 वर्ष
गोपादित्य – 60 वर्ष 6 दिन
गोकर्ण – 57 वर्ष 11 दिन
खिखिलाण्य – 36 वर्ष 3 महीने 10 दिन
युधिष्ठिर

कुल 38 राजाओं का शासनकाल- 1014 वर्ष, 9 दिन

राजा किन्नर जब युद्ध जीत कर आते तो कई किन्नर उनके लिए गीत गाते। इस राजा ने कई अनर्थ किये। इसकी शुरूआत तब हुई जब उसकी एक पत्नी को एक बौद्ध-भिक्षु भगा ले गया। राजा ने गुस्से में आकर सैकड़ों बौद्ध-विहार जला दिए, और उनको दिए हुए गाँव छीन लिए। इस लूट-पाट से जमा किए धन से इस राजा ने वितस्ता नदी के किनारे एक खूबसूरत बागों से सजा एक शहर बसाया। इसी शहर के एक बगीचे में एक बड़ी झील थी। और उस झील में सुश्रुवा नामक एक नाग रहता था।

इसी झील के किनारे एक विशाखा नामक युवा ब्राह्मण बैठ कर सत्तू खा रहा था। जैसे ही वो सत्तू का निवाला लेने ही वाला था कि उसे पायलों की झनक सुनाई दी। जब उसने नजर दौड़ाई तो सामने दो सुंदर नाग-कन्यायें सामने दिख गई। कजरारी आँखें, और कानों में सुंदर झुमके। हवा में लहराते आंचल। उन नाग-कन्यायों को देखते ही उसका मन मचल गया, और वह सत्तू खाते उन्हें निहारता रहा।

तभी उसने देखा कि वो कन्यायें मकई की बालियाँ उखाड़ कर खाने लगी। ब्राह्मण यह देख कर आश्चर्यचकित् हो गया।

“इतनी सुंदर कन्याएँ और यह दरिद्र भोजन?” ब्राह्मण ने कहा, और उन्हें सत्तू खाने को दिया। एक पत्ते का दोना बनाकर पानी भी पिलाया।

खिला-पिला कर वो कमल के पत्तों से उन्हें पंखा झलने लगा, और पूछा,

“आपलोग किस जाति से हैं?”

“हम सुश्रुवा नाग की बेटियाँ है। अगर अच्छा भोजन न मिले तो क्या मकई की बालियाँ नहीं खा सकतीं? मेरा नाम इरावती है, और मेरी शादी विद्याधर चक्रवर्ती से होने वाली है। यह मेरी बहन चित्रलेखा है।” नाग-कन्या ने कहा।

“लेकिन आपलोग इतने गरीब कैसे?”

“यह तो मेरे पिता ही बताएँगे। वो तक्षक नाग की यात्रा में यहाँ आएँगे। उनके माथे से हमेशा जल-धारा बहती रहती है। आप आसानी से पहचान लेंगे। उनके साथ ही हम भी मिलेंगी।”

यह कह कर वो अदृश्य हो गयीं।

कुछ दिनों बाद तमाम नाटक-मंडलियाँ कश्मीर आई और तक्षक नाग-यात्रा प्रारंभ हुई। यहाँ वो विशाखा नामक ब्राह्मण भी सुश्रुवा को ढूँढता पहुँच गया। जब नागराज को उनकी बेटियों ने उस ब्राह्मण से परिचय कराया तो वो भी प्रसन्न हो गए।

“मुझे आपकी बेटियों ने आपकी गरीबी के बारे में बताया।”

“हाँ! यह बातें मैं किसी से कहता नहीं, पर आपको पता लग गया तो कह देता हूँ। हमारी समस्या का कारण वो सामने बैठा साधु है। वो जब तक इन खेतों से नई फसल नहीं खाता, नियमानुसार हम भी नहीं खा सकते। और यह साधु खाता ही नहीं। आप कुछ जुगाड़ लगा कर इसको नई फसल खिला दें तो बड़ी कृपा होगी।”

बस फिर क्या था। उस ब्राह्मण ने चुपके से उस साधु के बर्तन में नया अन्न डाल दिया, और उसकी तपस्या भंग हुई। नागराज खुश होकर ब्राह्मण को अपने घर ले गए, जहाँ उन कन्याओं ने उसकी खूब सेवा की। आखिर ब्राह्मण ने चित्रलेखा का हाथ मांग लिया। नागराज ने अपनी बेटी और खूब सारा धन देकर उसे विदा किया। ब्राह्मण भी वापस शहर लौट कर खूब धनी-सुखी रहने लगा। चित्रलेखा भी उसे खुश रखती थी।

एक दिन चित्रलेखा ने बाहर धान सूखने रखा था, तो एक घोड़ा आकर उसे खाने लगा। आस-पास नौकर नहीं थे तो वो स्वयं ही घोड़ा भगाने के लिए दौड़ी आई। वो अपने आंचल सँभालते घोड़े की पीठ पर हाथों से मार कर भगाने लगी। उसके सुनहरे हाथ के छाप घोड़े की पीठ पर अंकित हो गए।

राजा किन्नर ने पहले भी चंद्रलेखा की खूबसूरती की चर्चा सुनी थी। जब घोड़े की पीठ पर उसके हाथ के निशान दिखे, वो पागल ही हो गया। वो चंद्रलेखा के घर जाकर उसे सताने लगा, पर वो नहीं मानी। आखिर उसने उसके पति विशाखा से ही उसकी पत्नी का हाथ माँग लिया। वो नाराज हो गया, तो राजा ने बलात्कार की कोशिश की। इससे भागकर ब्राह्मण दंपति नागराज के पास पहुँचे। गुस्से में नागराज ने पूरे शहर को तहस-नहस कर दिया। हजारों लोग मारे गए। पूरी वितस्ता नदी खून के रंग की हो गयी।

नागराज की बहन रमण्या भी अपने भाई की सहायता के लिए पत्थर गिराती आई। इसकी वजह से लगभग चालीस कि.मी. (पांच योजन) तक की जमीन में पत्थर ही पत्थर बिखर गए। यह स्थान ‘रमण्याटवी’ कहलाता है।

नागराज स्वयं अपने स्थान को छोड़ कर एक सुंदर पर्वत पर चले गए। वहीं एक बड़ी झील बनाई (जो अमरनाथ के रास्ते में आज भी चक्रधर मंदिर के पास नजर आता है)। उनके जमाई भी ससुर की कृपा से नाग बन गए और वहीं पास में जामातुर सरोवर में रहने लगे।

(क्या किन्नर राजा के एक स्त्री के मोह के कारण पूरा शहर नष्ट हो जाना ठीक था? यह प्रश्न अब निराधार है। पर कल्हण के अनुसार एक ब्राह्मण से अन्याय का फल प्रलय ही है।) जब कश्मीर ध्वस्त हो रहा था, तब किस्मत से एक राजकुमार विजयेश्वर तीर्थयात्रा पर थे। राजकुमार सिद्ध ही अगले राजा बने और उन्होंने अपने पिता की गलती से सीख ली। वो शांतचित्त और शिव-भक्त राजा थे।

उस राजा ने अपने पुण्य से अपने पिता के पाप का प्रायश्चित तो किया ही, उसके शासनकाल में धर्म की विजय हुई। उसकी मृत्यु के बाद सभी देवताओं ने उसका स्वागत किया और स्वर्गलोक में सात दिन तक उत्सव हुआ।

राजा मिहिरकुल एक दुष्ट राजा था। उसके शासनकाल में म्लेच्छों का वर्चस्व होता गया, और उत्तर भारत अपने भयंकर काल में था। वो और उसके सैनिक नरभक्षी थे, जो शत्रुओं को मार कर उनका मांस खाते थे। जब उसकी सेना आती थी तो कौवे और गिद्ध मंडराने लगते थे। यहाँ तक कि उसके अंत:पुर में भी नरभक्षण चलता रहता था। वो राजा दिखता भी बेताल सा भयानक था। राजा बालकों के प्रति निर्दयी, स्त्रियों के लिए घृणा रखने वाला और वृद्धों का निरादर करने वाला था।

एक दिन उसने अपनी पत्नी को सिंहल प्रदेश (श्रीलंका) के सोने से सज्जित चोली पहने देखा तो क्रुद्ध हो गया। उसने जाँच की तो यह पक्का हो गया कि यह सोना सिंहल प्रदेश का ही है। क्रोध में उसने सिंहल पर आक्रमण की योजना बनाई। पागल हाथियों से भरी उसकी सेना ने सिंहल-नरेश पर आक्रमण कर उन्हें हरा दिया। वहाँ के राक्षस भी भयभीत हो गए जैसे रामचंद्र ने फिर से लंका पर आक्रमण कर दिया हो। वहाँ दूसरे राजा को बिठा कर वो सूर्य के चित्र वाला झंडा उठा कर ले आया।

सिंहल से लौटते वक्त उसने चोल राजा, कर्नाट राजा और लाट राजा को भी परास्त किया। वहाँ के सभी नगर और महल ध्वस्त करता वो कश्मीर लौटा। जब वो कश्मीर के द्वार पर पहुँचा तो एक हाथी पहाड़ से नीचे गिर गया। उस हाथी की चीत्कार से राजा इतना खुश हुआ कि उसने एक-एक कर सौ हाथी पहाड़ से गिरवा दिए, और उनकी चीख सुन ठहाके मारता रहा। कल्हण लिखते हैं कि उसके कई कुकर्म तो इतने घृणित थे कि वर्णित भी नहीं किए जा सकते।

लोग कहते हैं कि राजा मिहिरकुल इतना दुर्दांत बना, इसके पीछे कारण कुछ और था। एक भूरिश्रवा नामक नाग ने नगर तहस-नहस कर दिया था। उस वक्त खश जाति के लोगों ने नगर पर कब्जा कर लिया। उनका खात्मा करते-करते ही यह राजा नरसंहार में लुत्फ़ लेने लगा।

एक और कथा है कि चंद्रकुल्या नदी के प्रवाह को मोड़ने के लिए कार्य चल रहा था, लेकिन बीच में एक बड़ा पत्थर हिलाना असंभव सा था। राजा को स्वप्न आया कि उस पत्थर पर कोई यक्ष बैठा है। कोई पतिव्रता स्त्री अगर पत्थर को छूए तो पत्थर हिल जाएगा। कई स्त्रियों ने उसे छूआ, पर वो टस से मस न हुआ। आखिर एक कुम्हार की पत्नी चंद्रवती ने पत्थर छूआ तो वो चल पड़ा। पर कुम्हार की ऐसी जुर्रत देख कर राजा क्रोधित हो गया। उसने उसके परिवार को तो मार ही दिया, तीन करोड़ स्त्रियों को मरवा डाला।

हालांकि उस राजा ने कुछ पुण्य भी किए। श्रीनगर में मिहिरेश्वर की स्थापना की। होलाड क्षेत्र में मिहिरपुर शहर बसाया। गांधार के ब्राह्मणों को उसने एक हज़ार गांव बाँटे। यह दान उसने जयेश्वर तीर्थ में किया।

आखिर उस दुष्ट राजा की एक गंभीर बीमारी से मृत्यु हुई और धरती को चैन मिला। कल्हण के अनुसार उसने तमाम शस्त्रों को गरम कर उसके ऊपर अपना शरीर रख खुद को भस्म कर लिया। यह उसकी पाप-मुक्ति का मार्ग था।

राजा मिहिरकुल का पुत्र वक जब राजा बना तो प्रजा डर गई कि यह अपने पिता सा दुष्ट न हो। पर वो अपने पिता का ठीक विपरीत और धर्म-कर्म वाला राजा था। इस राजा ने वकश्वभ्र में वकेश्वर मंदिर बनाया। उसने वकवती नदी की धारा निकाल कर उसके किनारे लवणोत्स नगर बसाया।

राजा वक को एक योगिनी ने अपने रूप से मोह लिया, और तंत्र-मंत्र से उसे और उसके परिवार की बलि चढ़ा दी। इस बलि से उस योगिनी को आकाश-गमन की प्राप्ति हुई। खेरी मठ का शतकपालेश्वर मंदिर, मातृचक्र, और वो पत्थर जिस पर योगिनी के निशान हैं, वो इतिहास में इस घटना के साक्षी रहे।

हालांकि राजा वक का एक पुत्र क्षितिनन्द बच गया था, और वही अगला राजा बना।

टोंटी पंचायत

महारानी तलाब पर आज पंचैती बैठी है। ये कोई नयी बात नहीं, हर साल बैठती है। इस पंचैती में पूरा गाँव आता है। कुछ जो दिल्ली-कलकत्ता चले जाए, पंचैती देखने छुट्टी लेकर आते हैं। पिछले कुछ बरख से पंचैती के दिन तलाब किनारे मेला भी लगने लगा है। कचौड़ियाँ छनती है, कंगन बिकते हैं, लमनचूस की रेड़ी और डिस्को वाला म्यूजिक। पंचैत न हुआ, कोई त्यौहार हो गया।

कईयों को ये भी नहीं पता कि पंचैत बैठी किसलिए, पर उन्हें ये जरूर पता है कि कन्नू ठाकुर और तम्मू ठाकुर आज फिर एक दूजे का गला दबाएँगें। कन्नू और तम्मू के लोग एक दूजे की धोती खींचेंगे और चड्डी में दौड़ाएँगें। कीचड़ में द्वंद होगा, गाली-गलौज होगा। बच्चे सीटी बजाएँगे, और बूढ़े फोकट में ज्ञान बाँटेंगें। सरपंच जी मचान पर चढ़ जायेंगें, और छेद वाली बाल्टी से ऐसे चिल्लायेंगें जैसे नेहरू जी स्टाइल भाषण दे रहे हों। मोर भी होगा, कौआ भी होगा, बंदर भी होगा, खाऊँ खाऊँ!

महारानी तलाब इलाके का सबसे बड़ा तालाब है। न पूरब, न पच्छिम। कहीं इतना बड़ा तलाब नहीं। उत्तर में गंगू तलाब है पर वो भी कोई तलाब है? एक महार पर सब शौच करते हैं, दूसरे महार पर पंडित मंतर पढ़कर लूटता है। मल-मूत्र से तर्पण कराता है। छी! महारानी तलाब भले ही छोटा है पर गाँव वालों की शान है। अंजुरि (अंजलि) भर पानी पी लो, तृप्त हो जाओ। अब कोई रात में छुपकर मूत ले, और बात है। दिन दहाड़े कोई शौच करे, ठाकुर लट्ठ ले दौड़ा दें। इस मौके पर कन्नू-तम्मू एक हो जाते हैं। एक ही भाषा बोलते हैं। नहीं तो कन्नू बोले ईर घाट, तम्मू बोले बीर घाट। किसी बात पर नहीं बनती।

गाँव के बुजुर्गों को भी ठीक-ठीक याद नहीं, ये रंजिश कब शुरू हुई। दादा-परदादा के भी पहले की कहानी है। कन्नू-तम्मू के लकड़दादों के जमाने की। अंग्रेजों के जमाने की। या शायद मुगलों के जमाने की।

किंवदंती है कि कई बरख पहले महारानी तलाब का बँटवारा हुआ। तालपत्र पर रेखाएँ खींची गई। कुछ कहते हैं वराह मिहिर ने कॉन्ट्रैक्ट लिया था, कुछ कहते हैं टोडरमल के रंगरूटों नें। कोई कहता है घूस-घास का चक्कर था, कोई कहता है गंगू तलाब वालों नें सस्ती मदिरा पिला दी थी। पूर्वी महार गोल थी, वो सीधी खींच थी। पच्छिमी महार खामख्वाह गोल कर दी। ऐसा विभाजन कर गए, ठाकुरों के मत्थे कुछ न पड़ा। एक बार तालपत्र देखते, एक बार तालाब, और सर पीट लेते। दोनों राजा साहेब के पास गए। राजा साहब का अमीन भँगेड़ी। तालपत्र पर भाँग का गोला डाल रोली करने लगा। रेखायें और आरी-तिरछी हो गई। खैर बँटवारा हुआ, तालाब का एक हिस्सा कन्नू के पूर्वजों का और दूजा तम्मू के।

तालाब तो साक्षात् क्षीरसागर थी। पर तम्मू के पूर्वजों के हाथ क्षीर भी ज्यादा और सागर भी। सब खा-पीकर मोटे होते गए। उधर कन्नू का खानदान कुपोषित।

कुपोषण में बुद्धि भी क्षीण हो जाती है। तम्मू के पूर्वज ताम्रपत्र के तगमे बटोरते गए, महारानी तालाब के पानी से खेत पर खेत सींचते गए। उधर हरियाली, इधर सुखाड़। उधर रंगरेलियाँ, इधर उधार।

राजा-महाराजा चले गए तो सियायतबाज आए। कुछ वाचाल, कुछ चंडाल, कुछ गुरूघंटाल।

कूटनीति का मंत्र है कमजोर के कान भरो, और शक्तिशाली के कान खींचो। पहले कानों को ‘ईयरमार्क’ किया गया। कमजोरों को पहचाना गया। कन्नू-तम्मू से बढ़िया प्रयोग के लिए कोई मॉडल न था। शुरूआत उन्हीं से हुई। तम्मू के कान खींचने की रणनीति बनी। कन्नू के कान भरे गए।

“कन्नू! ये बँटवारा ही गलत है। तालाब का सारा जल तो तम्मू ले जाता है और तुम्हें भनक तक नहीं होती।”

“क्या कहते हो? पुश्तैनी बँटवारा है। वो देखो तालाब के बींच खूँटा गड़ा है। पच्छिम से मेरा, पूरब से उनका।”

“भई, खूँटा ही तो गलत गड़ा है।”

“मुझे तो बीचों-बीच नजर आ रहा है।”
“हाँ, पर उधर से महार गोल है। तुम नापी करवा लो।”

“अरे जाओ! राजा साहब के जमाने का खूँटा है। पत्थर की लकीर है।”

कन्नू ने उनको देहरी से भगाया और हुक्का खींचने लग गए। पता नहीं क्यूँ, आज खूँटे पर संदेह वाकई हो रहा था। कहीं तम्मू ने खूँटा खिसका तो नहीं ली? भला उसके खेत लहलहा क्यूँ रहे हैं और हमारे सूखे पड़े हैं? और महार तो वाकई गोल है। भला नापी कराने में हर्ज क्या? इतने बरख में कितने तूफान आए, खूँटा न हिला होगा? दादा साहब के जमाने में भी सुना है खूँटे पर सवाल उठे थे। और कागज-पत्तर भी पुराने हुए। पक्की नापी करवा के नये कागज बनवाऊँगा तहसीलदार से। फिर मेरे खेत भी लहलहायेंगें। शम्भू साव का सारा कर्जा निपट जाएगा।

अगले ही दिन अमीन को खबर दी, और तलाब की नापी शुरू हुई। चाहे पूरब-पच्छिम नापो, या उत्तर-दक्खिन। खूँटा हर तरफ से गलत। कन्नू सर पकड़ कर बैठ गए। तम्मू तमतमा गए। गाली-गलौज हुई। हाथापाई शुरू हुई। कन्नू कमजोर था, पर गजब की फुर्ती थी। झट से तम्मू की गर्दन पर लटक गया और चूल खींच कर गिरा दिया। तम्मू जब तक सँभलता, कन्नू छाती पर बैठ मेढकों की तरह उछलने लगा। राहगीर तमाशबीन बन गए।

ये एक ऐतिहासिक मल्लयुद्ध की शुरूआत थी, जिसे सियासती चौकड़ीबाजों ने ‘महारानी तलाब जल-विवाद’ का नाम दे डाला।

पंचायत बिठाई गई। अमीन की गवाही हुई। खूँटा ठीक से गाड़ने का फैसला हुआ। मछुआरे भेजे गये। सब बाप-बाप करते वापस आये। खूँटे की जड़ में साँपों का बसेरा।

“खानदानी खूँटा है ये। विरासत है हमारी। साँपों की रस्सी बनाकर देवासुर संग्राम करोगे तभी हिलेगा।” तम्मू ने जुमला फेंका।

पंचायत खलबला गयी। कन्नू-तम्मू को अपने हाल पर छोड़ भाग गई। कन्नू ने भी घुटने टेक दिये।

पर सियासतगर्द कहाँ रूकने वाले थे।

“देश चाँद पर पहुँच गया, और तुम इन अंधविश्वासों में अटके पड़े हो कन्नू?”

“तो क्या करूँ? पंचायत के मछुआरे भी फेल हो गए। मुझसे न हिलेगा वो खूँटा!”

“तो खूँटा हिलाने कह कौन रहा है? पानी बाँध दो।”

“क्या मजाक कर रहे हो? भला पानी भी बाँध सका है कोई?”

“अपने गाँव का ही तो है वीशू, विलायत से पढ़कर आया है। डैम बनाता है डैम! जहाँ मरजी, वहीं पानी बाँध दे।”

“भाई, मेरी समझ कुछ नहीं आ रहा। जो मरजी करना है कर लो।”

बड़ा शातिर इंजीनियर था वीशू। चेहरे से तेज चमकता था, गंगू तलाब के पंडित से भी ज्यादा। पैनी नजर और शुतुरमुर्ग सी चाल। महीने भर में तालाब के तल को टेढ़ा कर डाला और तालाब के पानी को कन्नू की ओर मोड़ कर डैम की टोंटी कस दी। अब कन्नू जितनी टोंटी खोले, तम्मू को उतनी पानी नसीब हो। टोंटी बंद तो पानी बंद।

तम्मू के खेत सूखने लगे, कम्मू के लहलहाने लगे। वीशु की विलायती टोंटी ने तो प्रकृति बदल कर रख दी। देवासुर-संग्राम में तकनीकी टोंटी लगाकर भाग गया। फलाँ बटन दबाओ तो अमृत और फलाँ दबाओ तो विष। और सारे बटन कन्नू के पास।

तम्मू ठहरा गँवार, और छुटभैये नेताओं की राजनीति का मारा। त्राहि-माम करता पंचायत भागा। सारी अकड़ स्वाहा हो गयी।

“हजूर! कन्नू से कहें, मुझे कम से कम हक की बराबर पानी छोड़े।”

“हाँ भई कन्नू! बात तो गलत नहीं है। तुम उतनी टोंटी खोल दिया करो।”

“पहले पुरखों की बेईमानी का हिसाब तो चुकता हो।” कन्नू अकड़ कर बोला।

“वो सब पुरानी बाते हैं, और ठहरे तो भाई-भाई ही।”

“ठीक है। तुम भी क्या याद रखोगे तम्मू! जा खोल दी टोंटी आज। लहलहा ले अपने खेत!”

कन्नू-तम्मू गले मिले और पंचायत खत्म हुई।

कुछ दिन सब ठीक चला, पर फिर ये टोंटा-टोंटी चालू हो गयी। कभी तम्मू का बेटा कन्नू के बेटे से स्कूल में भिड़ जाए तो दो दिन टोंटी बंद। कभी जनाना झगड़ा तो टोंटी बंद। आज संडे तो टोंटी बंद। कल रामनवमी तो टोंटी बंद।

हर साल पंचायत बैठती, और दोनों मल्ल-युद्ध करते। गाँव वालों का मनोरंजन करते।

तमाशबीन बढ़ते गए। टोंटी पर सियासत बढ़ती गई। टोंटी को सरकारी टोंटी घोषित कर दी गई। बड़े-बड़े नेता आते हैं, टोंटी के साथ सेल्फी खिंचवाते हैं। कन्नू और तम्मू मूक दर्शक हैं। कठपुतलियाँ हैं। जब मर्जी टोंटी दायें-बायें घुमा लड़वा दिया। टोंटी न हुआ विडियो-गेम का ‘जॉय-स्टीक’ हो गया।

“कहाँ है ये महारानी तलाब?” एक परदेशी राहगीर ने पूछा।

“यहाँ से दक्खिन नाक की सीध में।”

कन्नू-तम्मू की लड़ाई में महारानी तलाब भी गजब पॉपुलर हो रही है।

(कावेरी जल विवाद लगभग २५० सालों से चल रहा दो राज्यों के मध्य एक अनवरत मतभेद है)

मेरुखण्ड : उस्ताद अमीर ख़ान

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एक संगीत की गप-शप में बात हुई कि भला इंदौर भी कोई घराना है? ‘घराना’ तो वह हुआ जिसमें कम से कम तीन पीढ़ीयाँ हो। इंदौर तो उस्ताद अमीर ख़ान से शुरू और समझो उन्हीं से खत्म। कहाँ हुई तीन पीढ़ीयाँ? यही बात लोग पं. जसराज के मेवाती घराना को भी कहते रहे। दिल्ली को भी लोग गायकी घराना नहीं मानते, जबकि वे खुद को सीधा खुसरो से जोड़ते हैं।

मैंने कहा कि दस पीढ़ी के घराने बना लो, और एक उस्ताद अमीर ख़ान दिखा दो। उनकी शैली दिखा दो, संपूर्णता दिखा दो, आलाप और लयकारी में वह ठहराव, वह नज़ाकत, वह गंभीरता दिखा दो। यह बात अब पुरानी हुई कि ‘घराना’ शब्द को अब ऐतिहासिक मान कर पूर्णाहुति दे देनी चाहिए। कुमार गंधर्व, किशोरी अमोनकर, मुकुल शिवपुत्र, उल्हास कशालकर और देवास के राज़ब अली ख़ान किसी घराने के हैं ही नहीं। और भी कई हैं जिन्होंने खुद को जबरदस्ती तानसेन तक से जोड़ रखा है। अगर पीढ़ीयों की ही बात है तो क्या अब अली अकबर ख़ान का कैलिफॉर्निया घराना और इमरत ख़ान का सेंट लुइस घराना बनेगा? और अगर एक शैली की बात है तो रामपुर-सहसवान हो या किराना, उनके हर गायक की शैली अलग रही है। शैली की माने तो बनारस कबीर चौरा के हर गली में कोई घराना मिल जाए।

इकलौते उस्ताद अमीर ख़ान को एक पूरा ‘म्यूज़िक स्कूल’ माना जा सकता है। यूँ लगता है कि जैसे भारत के केंद्र में पूरे हिंदुस्तान का संगीत केंद्रित हो गया है। उन्होंने सब साध लिया और वह भी बिन गंडा बँधाए साध लिया। जब लोग चालीस-चालीस घंटे का ‘चिल्ला’ व्रत कर रियाज करते थे। अमीर ख़ान के पिता शाहमीर ख़ान कहते थे, “दस घंटे रियाज करने से बेहतर है कि चार घंटे रियाज करो और चार घंटे सोच बनाओ।” कितनी साधारण बात है! खयाल का तो अर्थ ही सोच है। बिन सोच बनाए, आदमी क्या खयाल गाएगा?

गायकी का एक सबसे कठिन अंग है- मेरुखण्ड। इसमें एक राग के स्वरों के जितने संभावित क्रम-संयोजन (पर्म्यूटेशन कॉम्बिनेशन) हैं, उसे अलटा-पलटा कर गाया जाता है। यह साधने के लिए अमीर ख़ान बंबई के भिंडीबाज़ार में उस्ताद अमन अली ख़ान के साथ न जाने कितने वक्त बैठे। कई लोग कहते हैं कि तवायफ़ मुन्नी बाई से उनका संबंध भी इसी साधना का अंग था। मुन्नी बाई की माँ जगमगी बाई से किराना घराना के अब्दुल वाहिद ख़ान के संबंध थे। उनके पास कई दुर्लभ चीज (बंदिश) मौजूद थी। दोनों कमरों के बीच एक गुसलखाने में छुप कर उस्ताद अमीर ख़ान उनसे सीखते। वाहिद ख़ान यूँ तो बहरे थे, लेकिन उनको यह लगने लगा कि कोई जासूसी कर रहा है। यह वो जमाना था जब संगीत की जासूसी भी होती थी, अब तो कोई सामने यू-ट्यूब पर रखे संगीत भी न छूए। खैर, वाहिद ख़ान को जब यह शुबहा हुआ, उन्होंने एक चालाकी की। वह बंदिश का स्थायी तो गाते, अंतरा गाते ही नहीं। उन्होंने इस चक्रव्यूह में तो अभिमन्यु को फांस लिया कि अमीर ख़ान ने आधा ही सीखा। जब तक अमीर ख़ान ने उनसे गंडा बँधाने की हिम्मत जुटायी, बहरे वाहिद ख़ान चल बसे। आज भी अगर आप अमीर ख़ान की रिकॉर्डिंग सुने, अंतरा गायब मिलेगा। वह तो वाहिद ख़ान के साथ ही चला गया।

मेरुखण्ड की बात कर रहा था। जब शुजात ख़ान (विलायत ख़ान के बेटे) छोटे थे, तो देहरादून में अपने घर में सुबह-सुबह रियाज कर रहे थे। उस घर में तो ऐसा था कि विलायत ख़ान कहते, उनका मुर्गा भी राग पहाड़ी में बांग देता है। उस वक्त उस्ताद अमीर ख़ान भी वहाँ मौजूद थे, तो रियाज से नींद खुल गयी।

वह शुजात के पास आए और पूछा, “क्या बजा रहे हो?”

उन्होंने कहा, “बिलासखानी तोड़ी”

कहा जाता है कि तानसेन के पुत्र बिलासख़ान अपने महान् पिता के विपरीत मंदबुद्धि थे। वह तोड़ी के बदले भैरवि गा बैठे, और यूँ बन गयी बिलासखानी तोड़ी।

अमीर ख़ान ने पूछा, “यह किसने सिखाया तुम्हें?”

शुजात ख़ान ने कहा, “अब्बा हज़ूर ने”

“अरे! उनको कुछ आता भी है? सितारिए क्या बूझें बिलासखानी तोड़ी?”

फिर उस अमिताभ बच्चन सरीखी लंबी काया वाले उस्ताद अमीर ख़ान ने अपनी आँखें बंद की, पीठ सीधी की, और धीरे-धीरे आलाप लेना शुरू किया। उनका आलाप इतना धीमा होता कि लोग मज़ाक करते कि उनके दो स्वरों के बीच आदमी एक कप चाय पी ले। यही वह वजह थी कि झूमरा जैसा धीमा ताल बस वही सँभाल पाते। यह कमाल की बात है कि संगीत में गति सुलभ है, और ठहराव कठिन। तो उस्ताद ने बिल्कुल ठहराव के साथ एक-एक स्वर खोलना शुरू किया। मेरु का खण्ड खण्ड होने लगा। इतने में विलायत ख़ान भी जाग गए और देखा कि आज तो कमाल हो रहा है। दुनिया के सर्वोत्तम सितार-वादक चुपचाप तानपुरा लेकर बैठ गए। अमीर ख़ान गा रहे हैं, विलायत ख़ान तानपुरा बजा रहे हैं, और बालक शुजात सितार बजा रहे हैं। यह दृश्य अकल्पनीय है।

यहाँ एक जमीनी रिश्ता बताना जरूरी है। विलायत ख़ान साहब की सगी बहन को उस्ताद अमीर ख़ान ने विवाह के कुछ ही दिनों बाद छोड़ दिया था, और तवायफ़ मुन्नी बाई के साथ रहने लगे थे। जब तक विलायत ख़ान की माँ जिंदा थी, उनसे मिलने की सख्त मनाही थी। लेकिन संगीत का रिश्ता जमीनी नहीं, रूहानी होता है। विलायत ख़ान छुप कर उस्ताद अमीर ख़ान से मिलते और सीखते रहे। उनके सितार में जो सोच नजर आती है, वह अमीर ख़ान से ही प्रभावित है। अब सोच देखिए कि विलायत-इमरत ख़ान बंधु की एक रिकॉर्डिंग मैंने सुनी- अ नाइट ऐट ताज। इसमें सुंदर कोमल मुमताज की ध्वनि विलायत ख़ान के गायकी अंग वाले ‘सिंगिंग सितार’ से आ रही है, और शाहजहाँ का पौरुष भारी-भरकम सुरबहार पर छोटे भाई इमरत बजा रहे हैं। यह कमाल की सोच (इमैज़िनेशन) और कमाल की जुगलबंदी है। अगर इस सोच को और करीब से समझना है तो किसी गोधूलि बेला में उस्ताद अमीर ख़ान का राग मारवा सुना जाए। इसमें ख़्वाह-म-ख़्वाह की कलाबाजी या ऊँची तान नहीं, एक ठहराव है जो ढलते सूरज में दिखना चाहिए। मैं यह नहीं कह रहा कि तान न हो, बड़े ग़ुलाम अली ख़ान इसी मारवा को बुलंद तान लेकर गाते ही हैं। लेकिन हर व्यक्ति का संगीत उसके पूरे व्यक्तित्व का सार भी तो है। अब पंजाब के पहलवान सरीखे भारी-भरकम शरीर और तगड़ी मूँछों वाले बड़े ग़ुलाम ख़ान की तान तो बुलंद होगी ही। वहीं इंदौर की सौम्यता लिए, बिना मूँछों के, सधी नाक और ऐनक में उस्ताद अमीर ख़ान तो सहजता से ही गाएँगे।

विलायत ख़ान कहते थे, “फैयाज़ ख़ान से मैंने शाही अंदाज सीखा, अब्दुल करीम ख़ान से माधुर्य सीखा, बड़े ग़ुलाम ख़ान से मैंने सुर की आजादी सीखी, और अमीर ख़ान से मैंने सीखा- इबादत।”

यही वह वजह थी कि जब अमीर ख़ान की कार दुर्घटना में मृत्यु हुई तो बहन से तलाक के बावजूद उनका शरीर विलायत साहब कलकत्ता लेकर आए। और यह भी इत्तिफाक है कि आज विलायत ख़ान और अमीर ख़ान की कब्र कलकत्ता में एक ही जगह साथ-साथ है। जैसे फिर वही बिलासखानी तोड़ी बज रही हो, मेरु का खण्ड खण्ड हो रहा हो, उस्ताद अमीर ख़ान गा रहे हों।

(Author- Praveen K Jha. Previously published in Prajatantra, Indore)

कोरिया की रानी ‘री’ और मैं

राजा की गद्दी। अनुवाद यही ठीक रहेगा। एक बहुमंजिली इमारत की इक्कीसवीं मंजिल का वो कोना जहाँ खड़े होकर उटोया का द्वीप दिखता है। इसी उटोया द्वीप पर एक श्वेत चरमपंथी ने कभी साठ-सत्तर लोगों को शीतल-रक्त मृत्यु दे दी थी।

शब्दानुवाद की यही समस्या है। ‘हॉर्सेस-माउथ’ को कोई तुरंग-मुख कह गए, ‘कोल्ड-ब्लडेड’ को मुझे शीतल-रक्त कहना पड़ रहा है। और होटल की ‘किंग्स सीट’ को राजा की गद्दी। उस दिन राजा की गद्दी पर कोरिया की रानी बैठी थीं। कितना सुंदर नाम था- री। न तिलोत्तमा, न पद्मावती, बस री। यह जरूर अयोध्या की रानी सुरीरत्ना की वंशज होंगीं। रत्न और सुर खत्म हो गया, बस ‘री’ रह गया, और मध्यमा और तर्जनी के बीच विराजमान सिगरेट।

मैं री के करीब ही खड़ा द्वीप का अवलोकन कर रहा था। जब से विश्व में समाजवाद आया, रानी के समीप अब कोई भी टॉम, डिक या हैरी खड़ा हो सकता है। हालांकि मैं इन तीनों महानुभावों से भिन्न था। मैं उस सामंतवादी मिट्टी का बना हूँ, जहाँ स्त्री का द्विचर रूप है। स्त्री पूज्य है वा त्यज्य। स्त्री का और कोई स्वरूप नहीं। मैनें कई बार चिनार के पतझड़ी शृंगार से ध्यान हटाकर इस युवती को देखा। और युवती से ध्यान हटाकर चिनार को। मुझे इस युवती में कभी रानी नजर आ रही है, कभी बौद्ध देवी थंका। यह त्यज्य तो नहीं, पूज्य ही हैं।

“आप भी इसी होटल में ठहरी हैं?”

“हाँ! और आप? जरूर ऑफ़ीस के ‘क्रिशमस टेबल’ में आए होंगें? वरना एशियाई क्यों यहाँ आने लगे?”

“एशियाई सुनकर अच्छा लगा। अमरीका में एशियाई अलग और इंडियन अलग कहते हैं।”

“वो तो नाक का फर्क है।” री कुर्सी पर झूलते हुए हँसने लगी।

“मैं समझा नहीं। हिंदुस्तानियों की नाक भला बाकी एशियाई की नाक से कब ऊँची हो गयी?”

“ये मैनें कब कहा कि आपकी नाक ऊँची है?”

“क्षमा कीजिएगा। मेरा मतलब नस्लीय टिप्पणी से नहीं था। हिंदुस्तान में नाक इज्जत से जुड़ी है।”

“नाक से। मूंछों से। पौरूष से। जाति से। धर्म से। धन से। हर चीज से जुड़ी है आप हिंदुस्तानियों की इज्जत। ऐसा सुना है।”

“हम इतने भी बुरे नहीं। पर आपके देश में इज्जत का तराजू क्या है?”

“पता नहीं। मेरी इज्जत तो अब एक नॉर्वेज़ियन के हवाले है।” री फिर से कुर्सी झूलाते बचकानी हँसी हँसने लगी।

री से उन दो दिनों में अच्छी मित्रता हो गयी। संभवत: उस होटल में उस पार के हम दो ही लोग थे। ‘उस पार’ मतलब यूरोप से बाहर की दुनिया के।

उसका पति भी उसी होटल में था, पर कभी मिला नहीं। हालांकि री जब राजा की गद्दी पर नहीं मिलती तो अपने कमरे में पति के साथ ही होती। पर यह बमुश्किल आध-एक घंटे का मामला होता। पुनश्च अपनी राजगद्दी पर वो विराजमान हो जाती, सिगरेट लिए। वो दो दिन गर कार्य-घंटों (वर्किंग हावर) के हिसाब से गिनें, तो मेरे साथ री ने अधिक बिताए। खुली हवा में, उटोया द्वीप किनारे। कोरिया की बातें करते। मैं भाषा के तार जोड़ता कि कैसे तमिल और कोरियन के बीच संबंघ है। और अयोध्या से संबंध। पर री को जैसे ख़ास रूचि न थी। हाँ! वो डॉक्टरी की बातें पूछती। अंतरंग बातें।

“क्या सत्तर वर्ष का पुरूष नपुंसक नहीं होता?”

“अब नपुंसक की उम्र-सीमा बढ़ गयी है। कई दवाएँ आ गयी हैं। पर क्यों पूछ रही हो?”

“क्योंकि मेरा पति सत्तर वर्ष का है!” और री फिर से झूल-झूल कर हंसने लगी।

मैं सन्न रह गया। यह बीस-तीस वर्ष की बाला भला सत्तर वर्षीय व्यक्ति के साथ इस ध्रुवीय देश में क्यों है? री के पति उनके शक्करी-पिता हैं। ओह! पुन: शब्दानुवाद हो गया। सुगर-डैडी। जब युवतियाँ अपनी ख़ास आर्थिक जरूरतों के लिए एक धनी वृद्ध से जुड़ जाती हैं। यह पश्चिम के मधुर संबंध हैं, जो पूरब में शनै:-शनै: आ ही जाएँगें। कुछ ज्ञान-हस्तांतरण उपरांत। हिंदुस्तान में भी शकरपिता-युग आएगा। पूंजीवाद, प्रगतिशीलता और नारी उन्मुक्ति जब चरम पर होगी, तब सुगर-देवों का भी अवतरण होगा। तब स्त्री द्विचर नहीं होगी। पूज्य और त्यज्य के मध्य त्रिशंकु भी होंगी। उन्मुक्त। शकर-पुत्री।

री का पति उसे आकाश में मिला। आधुनिक पुष्पक-विमान पर। जब कोरिया से जहाज हिमालय के ऊपर उड़ रहा था, तो उसने पहली बार री के शरीर पर हाथ रखा, और री मुक्त हो गयी। उसकी मुक्ति कब यौन-गुलामी बन गयी, यह री को स्मरण नहीं। री अब भी मुक्त है, किंतु जब ज़नाब अपनी पौरूष-उत्प्रेरक दवा फांक लेते हैं तो री दासी बन जाती है।

“इस दवा के साइड-इफेक्ट भी तो होते होंगें?” री ने सिगरेट की कश लेते प्रश्न किया।

“हाँ! होते हैं।”

“क्या इस से मृत्यु संभव है? हार्ट-अटैक?”

“संभव तो है। पर क्यों पूछ रही हो?”

“सोचती हूँ, ये बुड्ढा कब मरेगा?” अब वह उछल कर कुर्सी पर पद्मासन में बैठ गयी थी, और अनवरत हँस रही थी।

एक वृद्ध पति एक दिन काम-मुद्रा में मृत हो जाए? यह कैसी कामना है? री की हंसी अब अट्टहासी रूप ले रही थी। और इस भय से मेरा पौरूष कांप रहा था। मैं खिड़की से बाहर देखने लगा। कैसे इस उटोया-द्वीप पर घूम-घूम कर गोली मारी होगी? भाव-शून्य होकर हत्या की होगी, या री की तरह उन्मादित ठहाकों के साथ? कोल्ड-ब्लडेड मर्डर क्या सचमुच कोल्ड ही होता होगा?

“तुम्हारी समस्या क्या है री? अगर प्रेम नहीं तो त्याग क्यों नहीं देती?”

“प्रेम है। तभी तो नहीं त्यागती।”

“तो फिर ऐसी कामना?”

“हार्ट-अटैक की कामना भी कोई कामना है? यह तो स्वाभाविक मृत्यु है।”

“पर पति की मृत्यु की कामना तो है ही। यह मेरे लिए विचित्र है।”

“हम एशियाईयों का प्रेम जैसे वेश्या का प्रेम। उसकी बेटियाँ भी यही समझतीं हैं। उसके परिवार में मेरा यही अस्तित्व है।”

“तो बेटियों से मित्रता कर लो। उनको मातृत्व दो।”

“मातृत्व? वो क्या है? मेरी माँ तो मुझे स्मरण नहीं। वो कौन थीं, किस परिवार से थीं, कुछ ज्ञात नहीं। कहीं तुम्हारे देश से तो नहीं, वो महारानी?” और री फिर हँसने लगी।

री की हँसी अब मेरे लिए असहनीयता की सीमा पर थी। मातृत्व-बोध से मुक्त भी नारी का अस्तित्व संभव है? कहाँ मैं द्विचर रूप में अटका पड़ा हूँ, और यहाँ एक मायावी युवती क्षण-क्षण अपने बहिमुखी अस्तित्व का परिचय दे रही है।

री की कोरियन माँ पता नहीं कौन थीं? पर पिता मानसिक विक्षिप्त थे। शायद विस्मरण रोग अलझाइमर था। री उनकी सेवा करती। मृत्यु के समय तक साथ थी, पर पिता ने कभी री को पहचाना ही नहीं। वो अबोध थे। भाव-शून्य। कोल्ड। क्या यह ‘कोल्डत्व’ संक्रामक है? उनसे री को पसर गया, री से उसके पति को, और अब कहीं मुझ तक तो नहीं आ जाएगा? क्या यह रोग चुंबन से पसरता है या बस छूने से? उस शाम कहीं मेरे हाथ भी री तक तो नहीं पहुँचे, या मेरा पौरूष कांप गया था? क्या मेरी भारतीयता इस हिमालय पार की बाला के स्पर्श मात्र से समाप्त हो जाएगी? एक दिन मैं भी भाव-शून्य हो जाऊँगा? और तभी विश्व-नागरिकता मिलेगी? जब मैं ‘कोल्ड’ हो जाऊँगा?

चिनार के पत्ते दो दिन में कितने झड़ गए! लगता है रात तूफ़ान आया था।

सुबह अखबार में पढ़ा कि उटोया के उस हत्यारे ने अर्जी दी कि जेल का विडियो-गेम ‘प्ले-स्टेशन’ का नया संस्करण उपलब्ध कराया जाए। नए संस्करण में कुछ और वीभत्स खेल आए हैं। सरकार ने मानवाधिकार की रक्षा के लिए उसकी अर्जी मान ली है।

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(प्रवीण झा की यह कथा पहले जानकीपुल पर प्रकाशित)

The blue ice: a shit-com

For whatever reasons, birds always found my head as a coveted shitting destination. Even in a crowded environment, if a bird is flying around, I would gear up myself holding a file or book overhead. My transient breath of relief would be annuled as the raven comes back swifter dropping on me accurately like a targeted missile. I was brutally splattered with bird-droppings during my short stint in Indian Institute of Science, which boasted of highest density of nasty crows (kauwa). For the first time in my life, I wore a Govinda-style yellow shirt to camouflage the shitty polka-drops.

The fear of bird-droppings soon extended to any flying object as I would hide even at sight of aeroplane. I always wondered what happens to the shit in the air. Most convenient way would be to disperse it in vastness of atmosphere, and cruise away. The untimely rains and windy splatters. My curiousity ended recently when an elderly woman in Bhopal (city in central India) got hit by a huge chunk of ice fallen from sky. Early investigations suggested it could be ‘blue ice’, human excreta disposed from aeroplanes which gets frozen in stratosphere. My fear wasn’t completely ungrounded and some do throw the shit right up in the air, especially Indian planes devoid of sanitary space on ground.

While the aeroplane mystery took some time, Indian railways were pretty blatant and open-minded from its inception. A hole in the toilet peeps directly down on track. At a usual train velocity of 150 km/hr, a 15 minute shit of yours can make roughly 38 km trail of shit droppings. Considering ever-engaged toilets in trains, the multi-origin shitty trail would extend from origin to destination spanning some 1000 kms. One of the royal heir I heard of, always took a local 30 minute railway stretch every morning at 6 0’clock, only to shit in moving train! His habit seem to have ended at a serious note when he disregarded the statutatory warning displayed in Indian Railways – Please do not use toilets when the train stops at platform. People say, constipated Raja-Saa’b continued his rituals even when train stopped. Sanitation fellows with long brooms began cleaning the toilets, shoving through holes beneath the train, and gave a powerful thrust when they found anything obstructive. This time, it was Raja Saa’b’s ass!

I haven’t utilised public toilets much in life, since I considered them as some sacred love destination. Similar to temple walls, toilet walls too are studded with scribbled names of ‘love-couples’. I wonder how somebody can have an amorous feeling while shitting, and scribble his flame’s name. Extreme love! Isn’t it? As I recently travelled and about to position myself strategically on a shaking commode, I found it written on toilet wall – I love you Priya. I pity the love of poor girl Priya with the shitty boy.

There were days even in my life, when village toilets were reserved for women who seem to have incessant affair with bathrooms. I would be forced to stroll to bamboo-plantations and ease myself with bushy grasses rubbing my body. Umpeen times would I change my position as I would imagine somebody staring at me and breaching my privacy. At a distance, I saw a queue of villagers shitting calmly with one palm on their cheek as if in a great contemplation. Surely, those early days devoid of toilets, gave India great philosophers. Even today, at least my blogging ideas shoot off from long gruelling sessions in toilet. Doesn’t my blog stink?

[a satire on need of sanitation in developing nations; a sequel to earlier blog ‘Love is in the air’]

लविंग लाइसेंस

वो वक्त भी था जब युवतीयों को देख गुदगुदी कम सिहरन ज्यादा होती. ट्यूशन पढ़ने आती खिलखिलाती लड़कियाँ सामने से आती, तो पैर काँप जाते, साइकिल से औंधे-मुँह गिरता, लड़कियाँ मुँह दबा उपहास करती हँसती निकल जाती. कोई कलम भी माँग ले, तो छिज्जी उंगली और अंगूठे के बीच आखिरी कोना पकड़ता; सर झुका कलम ऐसे बढ़ाता जैसे हाथ में साँप की पूँछ आ गयी हो; छोड़ भाग आता. 

ये सिलसिला कब तक चला, याद नहीं. पर हाँ, कई गुलाब कोसते रहे,  “हाथ में ही रखोगे लल्लू, या उसे दोगे भी? मज़े में गुलदस्ते में था. खामख्वाह तेरे भी बीस रूपये गये, और मैं भी इंतजार में मुरझा गया.” 

मैं क्या? बड़े बड़े शूरमा हिल जायें. भगवान राम को भी जनक से छुप-छुपा, शानू के गाने गा, सीता को इम्प्रेस करना होता, तो रामायण की कथा कुछ और होती. धनुष तोड़ने से मिल जाए तो भैया! हॉस्टल में हमने भी बहोत तोड़-फोड़ मचाई. 

खैर! त्रेतायुग से कलियुग के ट्रांजीशन में परिवर्तन तो लाज़मी था. मैंने भी आखिर इस क्षेत्र में कई प्रयोग किये, ‘ट्रायल-एरर’ से लेकर ‘व्हाट वूमन वांट्स्’ की तह तक. हाथ में मर्दाना अकड़ और गूफ्तगू का सहज़ अंदाज़. जैसी युवती, वैसी अदाकारी. पढ़ाकू को ज्ञान, फिल्मी-चक्कर वालों को रोमाँस-डोज़, और कन्फ्यूज्ड मंदबुद्धि सुंदरियों को झूठी तारीफ. बस सिक्का जम गया. ज्ञान बाँटने का शौकीन था. लवगुरू बन गया.

गुरू गुड़ रह गया, चेले चीनी खाने लगे. समय बदल रहा था. मेरे फॉर्मूले आउट-डेटेड होने लगे. न वो रिझाना. न वो मनाना. न वो घंटों प्यार की गूफ्तगू. अजी! कौन बैंक जाये, पासबुक-इंट्री करे? ATM स्वाइप का ज़माना आ गया. पहले ऊबड़-खाबड़ रोड पे ऑटोरिक्शा में क्षणिक श्पर्श में ही शरीर तप्त-कंपित हो जाते, अब तो पब्लिक-पार्क में लिपटे पड़े मिलते हैं. क्षुब्ध, मैंने भी सन्यास ले लिया. कोई खास शारिरीक संबंधों से शिकायत नहीं थी, परंतु इस प्रेम में उचाटपन और अस्थिरता दिखी. वो कहते हैं ना, आज पूजा, कल कोई दूजा. फिर मेरे जैसे पुजारी की क्या आवश्यकता?

अरसों बीत गये. कल फ्लाइट की सीट पे अनमना सा था. सफ़र में सोने की पुरानी आदत, और सामने वाली सीट पे कुलबुलाहट. सीट के बीच से पड़ी एक अनचाही नज़र ने ही कह दिया, नवविवाहिता जोड़ा है. चूड़ियों से सुसज्जित आधी से अधिक बाँह, जो बारम्बार पति के हाथ को झटकती. पति भी कहाँ मानने वाला? कभी कमर, कभी वक्ष की ओर, और मैं मुँह छुपाता बैठे-बैठे आधी-तिरछी करवट लेता. तभी कुछ अप्रत्याशित हुआ और मैं काँप गया. पीली साड़ी, माँग में मोटी सिन्दूरी रेखा और स्वर्ण गहनों में लदी युवती ने पति का हाथ मरोड़ा और अंग्रेजी में कहा, “What do you think you fool? You got a license to love me or what? Stay away.” चार दिन की शादी में वस्त्रहरण का लाइसेंस तो नहीं मिल जाता.

नारी-सम्मान और प्रेम के पुजारी को इस वीरांगना में असुर नहीं, साक्षात् दुर्गा दिखी. इस लविंग लाइसेंस के कई इम्तिहान हैं. प्रेम-शास्त्र कल भी था, आज भी है, अज़र-अमर, Evergreen. सिलेबस ही तो बदला है, विषय तो वही है. सोचता हूँ, पाठशाला फिर जैसे-तैसे चालू कर ही दूँ, ईमानदारी से लाइसेंस की. 

कबिरा खड़ा बाज़ार में

तोतली टूटी-फूटी बोली थी, नाक बहती, निकर खिसकती, फिर भी सवाल जरूर पूछा जाता- बड़े होकर क्या बनोगे? इस सवाल के ज़वाब से भी IQ का संबंध है. कोई डॉक्टर, कोई इंजीनियर, कोई पायलट, जो माँ-बाप सिखाते बोल देते. मैंने कहा, “साईंटिस्ट बनूँगा, नोबेल प्राइज जीतूँगा, और मरने से पहले राष्ट्रपति भी.” पूछनेवाले मुँह एँठते-कहते, “झा साब! और कुछ बने ना बने, आपका बेटा लम्बी लम्बी जरूर छोड़ेगा.”

अंकल की बात दिल पे लग गयी. मैंने कहा आविष्कार तो मैं कर के रहूँगा. लेकिन क्या? 

कबीर दास के दोहे से पहला आइडिया आया.

“बोए पेड़ बबूल का, आम कहाँ से होये”.

मैंने कहा अब तो बबूल के पेड़ पे आम लगा के रहूँगा. ऐसी खुराफातों के लिये भाई शुरूआत में जरूर साथ देते हैं ताकि प्लान फेल होने पर उछल उछल कर ठिठोली कर सकें. 

पड़ोसी गाँव के मामाजी ने ग्राफ्टिंग के गुर सिखाए, माँ से जिद कर केमिकल खरीदे, और बबूल के पेड़ पर एक-एक बड़े सलीके से सर्जिकल कटिंग कर जोड़ बनाता गया. एक टहनी भी न लगी, सामने के आम का लहलहाता पेड़ गंजा जरूर हो गया. पिताजी ने इन्क्वायरी बिठाई, भाईयों ने फुलझड़ी लगाई, और एक महान वैज्ञानिक पटाखों की तरह बजा दिया गया.

“निंदक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय”

निंदा और ठिठोली करने वाले तो घर में ही था. कबीर दास के इसी फंडे पे हिम्मत दुगुनी हो गयी. 

इस बार बिजली बनाने की सोची. गाँव के लिये बिजली नयी चीज़ थी. वो तो बस उस बिज़ली से वाकिफ थे जो मवेशी मेले में नाचने आती. भाई-साब ने आईडिया दिया, गाँव के पचास लोग हर रात साईकिल चलायेंगे, डायनमो इफेक्ट से पचास घरों में बल्ब जलेंगे.

“धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय”

प्लान साइकल की स्पीड से फुस्स हो गया.

२००४ ईसवी में पहली बार रिसर्च करने इंडियन इंस्टिच्यूट अॉफ साइंस में किशोर वैज्ञानिक रूपेण चयनित हुआ. रिसर्च का तो पता नहीं, कैंटिन के डोसे लाज़वाब थे. और रात को लैब के बाहर चाय. वाह! मज़ेदार. बाकि रिसर्च तो क्या, इस टेस्ट्यूब से उस टेस्ट्यूब. चार घंटे बाद रीडिंग लो. फिर वही रीपीट करते रहो. इस से कहीं ज्यादा प्रयोग तो मेरी माँ मुरब्बे-अचार में कर ले.

“जिन खोजा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ”

आखिरकार मेडिकल की पढ़ाई खत्म होते ही पहली फुरसत में अमरीका निकल लिया. दो बड़े फैकल्टी के लैब पसंद आये. हमारे आधे फैसले तो हेड-टेल या अक्कर बक्कर बम्बे बो से होते हैं. डॉ लिगेट विजयी रहे, लातेरबूर हार गये. मैं भी जी-जान से रिसर्च में लग गया. डॉ. लातेरबूर को देखता तो मंद मुस्कान देता. बिना फंडिंग के गरीब दयनीय परिस्थिति थी उनके लैब की.

“जाति न पूछो साधू की, पूछ लिजिये ज्ञान”

२००५ दिसंबर: Paul laterbur wins Nobel Prize in medicine.

मतलब यूँ कहिये, सारे गणित धरे के धरे रह गये. थोड़े दिन टेस्ट-ट्यूब में चाय-साय बनाई, और वापस आ गया डाक-साब बनने.

मेक इन इंडिया कोई जुमला भले ही हो, बड़े जुगत का काम है. अजी मुरब्बे नहीं बनाने, रिसर्च और आविष्कार करने हैं.

“कबिरा खड़ा बाज़ार में, माँगे सबकी खैर”