शतरंज के खिलाड़ी: कास्पारोव, कार्लसन और आनंद का विस्मयकारी त्रिकोण

रेक्याविक, 2004

उस दिन शतरंज के खेल में एक बड़ा तख्ता-पलट हुआ। विश्व के महान् खिलाड़ी अनातोली कार्पोव एक तेरह वर्ष के बच्चे से हार गए। और जब कल उस बच्चे का मुकाबला गैरी कास्पारोव से होना है तो शतरंज की दुनिया में खबर छपी,

“द बॉय मीट्स द बीस्ट”

इस तेज शतरंज के मुकाबले में अमूमन जूस लेकर बैठने वाले किशोर मैग्नस कार्लसन उस दिन कोला लेकर बैठे, और कास्पारोव का इंतजार करने लगे। नियम यह था कि खिलाड़ी देर से आए तो बाजी हार जाता है। लेकिन चूँकि यहाँ बात कास्पारोव की थी, तो इंतजार किया गया।

कास्पारोव तकरीबन पंद्रह मिनट लेट पहुँचे और मैग्नस के पीछे जाकर खड़े हो गए और कहा, “माफ करना। मेरी ग़लती नहीं। आयोजकों ने मुझे समय ग़लत बताया”

पहली ही चाल में कास्पारोव ग़लत चल गए और बाजी कार्लसन के पक्ष में जाने लगी। कार्लसन कुछ देर में उठ कर टहलने लगे तो कास्पारोव ने नाराजगी से घूरा कि यह क्या बदतमीजी है? आखिर खेल ड्रा रहा और अगले खेल में कास्पारोव ने मात कर दिया।

कास्पारोव ने खेल के बाद कहा, “इस बच्चे में मुझे आज अपनी ही अक्खड़ मिजाज़ी दिखी है। गर इसे तालीम मिलती रही, तो यह अगला कास्पारोव जरूर बनेगा।”

कास्पारोव ने जब कार्लसन से तालीम की बात कही, तो दरअसल एक विश्व-विजेता को शायद अपनी विरासत की चिंता थी। उन्होंने कार्लसन को मॉस्को आने का न्यौता दिया। जब कार्लसन मॉस्को पहुँचे तो पहले दिन उनसे दो वृद्ध मिलने आए। एक कास्पारोव के गुरु थे, और दूसरे कारपोव के। एक चौदह वर्ष के बच्चे की आँखों में उन्होंने बहुत कुछ एक नजर में ही पढ़ लिया। अगले दिन कार्लसन कास्पारोव से रू-ब-रू हुए।

वहाँ तमाम कम्प्यूटर में बस शतरंज की पहली चाल के अलग-अलग रूप लगे थे, और आज तक जितना शतरंज खेला गया, उसका दुनिया का सबसे बड़ा डाटाबेस मौजूद था। कार्लसन को लगा जैसे किसी फौजी रणनीति कैंप में आ गए। कास्पारोव ने पहले ही दिन चार अभ्यास दे दिए, जिनमें कार्लसन तीन सुलझा पाए और थक गए। कास्पारोव ने कहा कि रूसी तब तक नहीं उठते, जब तक सुलझा नहीं लेते। 

कार्लसन ने अपने पिता को फ़ोन मिला कर कहा, “मैंने शतरंज खेल-खेल में ही सीखा। मुझसे यह पढ़ाई न हो पाएगी।”

कास्पारोव को ‘ना’ सुनना बुरा लगा या अच्छा, यह पता नहीं। किंतु कार्लसन का ‘ना’ कहना एक विश्व-विजेता बनने की पहली सीढ़ी जरूर थी!

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शतरंज के मोज़ार्ट कई लोग कहे गए, शायद इसलिए कि यह खेल छुटपन से ही शुरु हो जाता है। बारह-तेरह वर्ष उम्र के ग्रैंड मास्टर घूम रहे हैं। लेकिन मैग्नस को मोज़ार्ट कहने की और भी वजह है। इसकी एक वजह है कि मोज़ार्ट के पिता लियोपोल्ड और मैग्नस के पिता हेनरिक, दोनों अपने-अपने गुण बेटे में डाल गए और बेटा बाप से कहीं आगे निकल गया। दोनों अपनी गाड़ी में सपरिवार यूरोप का चक्कर लगाते और बेटे को खेलते देखते, जीतते देखते। एक संगीत में, तो दूसरा शतरंज में उस्ताद बना। और दोनों के पिता ने इसके पीछे अपना निजी कैरियर काफी हद तक त्याग दिया। तभी मोज़ार्ट ने कहा, “ईश्वर के बाद पिता होता है।”

लेकिन मैग्नस की शुरुआत देर से हुई। पाँच वर्ष तक तो शतरंज को हाथ भी नहीं लगाया। यह और बात है कि उस उम्र तक मैग्नस को नॉर्वे के सभी जिले और दुनिया के सभी गाड़ियों के नाम याद थे। मैग्नस भी मोज़ार्ट की तरह घर में सबसे छोटे थे, और अंतर्मुखी भी। तो जब शतरंज की गोटियाँ हाथ में आई, तो वह उन्हीं से बतियाते। एक छह-सात साल का बच्चा तो एक स्थान पर टिक कर नहीं बैठता, जबकि मैग्नस पूरा दिन एक ही छोटी कुर्सी पर बैठे शतरंज खेलते बिता देते। उनके स्कूल में शिक्षिका ने कहा कि इसका विकास रुक गया है।

शतरंज खिलाड़ी पिता हेनरिक ने कहा, “इसका विकास बस मुझे नजर आ रहा है। यह अब मुझसे भी कहीं आगे निकल गया है।”

विश्वनाथन आनंद को हराना एक वैश्विक रणनीति का नतीजा था या नहीं, यह कहना कठिन है। लेकिन मोहरे तैयार हो रहे थे। हालांकि मैग्नस कार्लसन मात्र मोहरा नहीं थे, लेकिन विश्व विजेता बनने का बाल-हठ तो हावी था ही। पहले यह माहौल बना कि आनंद नॉर्वे आएँ। लेकिन आनंद की आँखों में जो आत्मविश्वास और अनुभव था, उसमें दुनिया के किसी कोने में हराने की कुव्वत थी।

उसी वक्त गैरी कास्पारोव पुन: कार्लसन के गुरु बनने का जिम्मा लेते हैं। आनंद को अगर कोई मात दे सकता था, तो वह थे- स्वयं कास्पारोव। लेकिन उन्हें अपना उत्तराधिकारी चुनना था, स्वयं तो वह अलग हो चुके थे। दूसरी बात यह थी, कि भारत और चीन में शतरंज तेज गति से लोकप्रिय हो रहा था। एक नहीं, सैकड़ों आनंद की फौज तैयार हो रही थी। शतरंज का गढ़ अब भी रूस था, लेकिन सरताज चेन्नई में बैठा था।

दूसरी ओर, नॉर्वे कभी शतरंज में ख़ास नामी रहा नहीं। कार्लसन के आस-पास भी नॉर्वे में कोई नहीं था। अब यह बच्चों का खेल नहीं था, कार्लसन को वाकई रूसी हथियारों की जरूरत थी। वह वापस कास्पारोव के शरण में गए। या यूँ कहिए कि कास्पारोव ने यूरोपीय सत्ता स्थापित करने के लिए कार्लसन को तैयार करना शुरू किया। लेकिन कार्लसन को कास्पारोव का ढंग न तब पसंद था, न अब।

आनंद शतरंज के खेल में इकलौते कई मामलों में थे, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण था उनका तनाव-मुक्त खेल। उनका ‘कूल’ रहना, मुस्कुराना, गप्पियाना शतरंज के अंतर्मुखी खिलाड़ियों के विपरीत था। एक दफे रूस में कार्लसन और आनंद के इंतजामात एक रूसी सुंदर महिला कर रही थीं। जहाँ आनंद उनसे खूब गप्पियाते, कार्लसन नजर उठा कर भी नहीं देखते। उसने कहा कि इस बच्चे को अब किसी लड़की की जरूरत है, वरना यह आनंद से नहीं जीत पाएगा। 

यह बात गौर-ए-तलब है क्योंकि आनंद पहले भी मुस्कुराते हुए कार्लसन और तमाम खिलाड़ियों को हरा चुके थे। तो जब आनंद के खेल समझने के लिए उन्हें नॉर्वे आने का न्यौता दिया गया, आनंद घूमने-फिरने के इरादे से नॉर्वे आ गए। उनके साथ अमरिका की महिला शतरंज चैंपियन ओस्लो पहुँची, और एयरपोर्ट पर ही मैग्नस कार्लसन का बड़ा पोस्टर लगा था। दोनों यह देख कर मुस्कुराए और कहा, “यह बच्चा तो अब बड़ा हो गया।”

यह दोस्ताना मुकाबला समंदर किनारे क्रिस्तियानसंड में था, और शहर के तमाम लोग आनंद को देखने आए थे। उस वक्त वह नॉर्वे के सबसे प्रिय खिलाड़ी थे, और सड़क पर सब ‘विशी विशी’ चिल्ला रहे थे। आनंद जानते थे कि यहाँ के फ़्रेंडली मैच की कोई अहमियत नहीं। वह बड़ी आसानी से कार्लसन से हार गए, खूब खाया-पीया और नॉर्वे के ध्रुवीय इलाके घूमने निकल गए। कार्लसन के दोगुनी उम्र के आनंद ने बड़ी चालाकी से अपना खेल छुपा लिया।

यह तय था कि जो भी लंदन में जीतेगा, वही विश्व-विजेता आनंद से चेन्नई में खेलेगा। लंदन में विश्व के आठ शीर्ष खूँखार खिलाड़ियों की यह जंग शतरंज की दुनिया में एक यादगार पल है। मैग्नस कार्लसन को यह जंग जीतनी ही थी। लेकिन व्लादीमिर क्रामनिक (बिग व्लाद), जिन्होंने महान् गैरी कास्पारोव को सत्ता से बेदखल किया था, उनसे आगे निकलना एक चुनौती थी।

शुरुआती खेलों के बाद यह स्पष्ट हो गया कि क्रामनिक ही आनंद से खेलेंगे। मैग्नस कार्लसन पूरे समय तनाव में खेले, और जैसे-तैसे आगे बढ़े। उन्होंने आखिर अपना वह हथियार अपनाया, जो बचपन से उनकी ताकत थी। लंबा खेल कर अपने विपक्षी को थका देना। राज़ाबोव के साथ खेल में हर दर्शक, क्रामनिक और कम्प्यूटर तक को यह यकीन था कि खेल ड्रॉ होगा। लेकिन सात घंटे तक लगातार खेल कर कार्लसन जीत गए। 

अब क्रामनिक और कार्लसन बराबरी पर थे। लेकिन कार्लसन को इवानचुक (चकी) ने आखिरी खेल में हरा दिया। कार्लसन हताश होकर अपने होटल चले गए। तभी खबर आई कि अप्रत्याशित रूप से अब तक लगातार हारने वाले इवानचुक ने क्रामनिक को भी हरा दिया। बाजीगर कार्लसन आखिरी खेल हार कर भी अंक के आधार पर टूर्नामेंट जीत चुके थे। शतरंज का निर्णायक युद्ध अब भारत में होना था।

नवंबर 2013, चेन्नई, भारत

यूरोप की नजर में भारत ठीक वैसा ही है, जैसा कि झोपड़पट्टियों के मध्य खड़ा चेन्नई का आलीशान हयात रिज़ेन्सी होटल। एक गरीब देश जहाँ अमीरों के अमीर बसते हैं। मैग्नस कार्लसन ने पूरे विश्व में इतनी आवभगत और शान-ओ-शौकत कम ही देखी। उनके दरवाजे के ठीक बाहर राइफ़ल लिए खड़े सुरक्षाकर्मी देख वह घबड़ा गए, और अनुरोध किया कि ये दूर ही रहें। 

इस खेल में कुछ और विडंबनाएँ भी थी। कार्लसन के सहयोगी (सेकंड) एस्पेन असल में आनंद की टीम से जुड़ना चाहते थे, लेकिन यह अपने देशवासी से धोखा होता। एस्पेन तो कार्लसन की रग-रग से वाकिफ थे। वहीं दूसरी ओर, आनंद के सहयोगी शतरंज के ऐसे सेनापति थे जो विश्व-विजेता बनते-बनते रह गए थे। कार्लसन की टीम को आनंद से अधिक खौफ उनके इस सहयोगी पीटर लेको से था, जो यूरोपीय खेल को गहराई से जानते थे।

आनंद पहली चाल क्या चलेंगे, यह कार्लसन की दुविधा थी। क्या वह e4 से खेल शुरू करेंगे? आनंद के पास हमेशा एक नया दाँव होता। लगभग ग्यारह भाषा बोलने वाला यह अनुभवी खिलाड़ी वाकई शतरंज की दुनिया का मायावी सितारा था। कार्लसन को यह अंदेशा हो रहा था कि आनंद जरूर ‘निमज़ो-इंडियन’ खेल यानी d4 से शुरुआत करेंगे, और वहाँ शायद वह फँस जाएँ। 

नॉर्वे के अखबार आनंद को ‘टाइगर ऑफ़ चेन्नई’ पहले से ही कह रहे थे।

मास्को में बैठे कास्पारोव जो आनंद को हारते देखने को बेताब थे, ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया को कहा, “कल से मद्रास में खून बहेगा। खून!”

अगर यह कहा जाए कि पूरी कायनात आनंद को हराने चेन्नई में जुटी थी, तो यह बात शायद ग़लत नहीं। जैसा मैं पहले भी कह चुका हूँ, यह एक वैश्विक लड़ाई थी। मृदुभाषी और सौम्य आनंद के सर पर लगभग एक दशक तक यह ताज रहा, और उनके मुख्य प्रशिक्षक थे डेनमार्क के पीटर नील्सन। लेकिन जब बात भारत और स्कैंडिनैविया के टक्कर की हुई, तो नील्सन का देश-प्रेम शायद जाग उठा। वह पाला बदल कर कार्लसन के साथ चले गए। वह आनंद का हर रहस्य जानते थे, तो आनंद को हराने का परम-ज्ञान उनसे बेहतर कौन देता? 

आनंद इससे निराश तो हुए लेकिन उन्होंने बस एक अलिखित वचन उनसे ले लिया कि नील्सन स्वयं चेन्नई में कार्लसन के साथ न आएँ। और नील्सन ने आनंद को दिया वचन निभाया भी। वह बीमारी का बहाना बना कर नॉर्वे में ही रुक गए। 

लेकिन एक बिनबुलाया मेहमान भी चेन्नई आया, जिसे न आनंद ने बुलाया, न कार्लसन ने। उसकी खबर मिलते ही आनंद की टीम ने उसके दरवाजे पहले दो मैच के लिए बंद कर दिये। अगर वह आँखों के सामने होता, तो आनंद अवश्य हार जाते। कार्लसन की टीम भी उससे नहीं मिली। लेकिन सब हैरान थे कि यह आखिर चेन्नई में करने क्या आया है? वह अवांछित आगंतुक कोई ऐरा-गैरा तो था नहीं। 

शतरंज के दूसरे बादशाह और आनंद के धुर-विरोधी जनाब गैरी कास्पारोव मास्को से चेन्नई पधार चुके थे! 

वि. आनंद (43 वर्ष/भारत) बनाम मै. कार्लसन (22 वर्ष/नॉर्वे), चेन्नई

नॉर्वे आर्कटिक सर्कल का एक छोटा और वीरान देश है, जहाँ की कुल जनसंख्या चेन्नई की तीन चौथाई है। अगर शीतकालीन खेलों को छोड़ दें, तो किसी भी विश्व-स्तर के खेल में इनकी पैठ नहीं। शतरंज में जहाँ भारत के पचास ग्रैंड मास्टर हैं, नॉर्वे के आठ हैं। ऐसे में अगर कोई खिलाड़ी विश्व-विजेता बनने वाला हो, तो पूरा देश सड़क पर क्यों न हो? हर दुकान, हर गली में शतरंज था। बैंकों का काम ठप्प पड़ गया क्योंकि सभी कर्मचारी शतरंज देखने लगे थे। 

वहीं दूसरी ओर, भारत के लिए शतरंज महज एक खेल था। चुनाव निकट थे, भाजपा ने अपना नया प्रधानमंत्री उम्मीदवार चुना था, और अखबार राजनीति की खबरों से भरे थे। हालांकि आनंद-कार्लसन मैच को पहले पृष्ठ में जगह मिल जाती, लेकिन राजनीति के समक्ष खेल गौण था। कार्लसन के साथ पूरा देश था, जबकि आनंद के साथ ऐसी कोई लहर नहीं थी। 

और रूसी चाणक्य भी तो थे। कास्पारोव को खेल में प्रवेश नहीं मिला, तो बाहर प्रेस के माध्यम से आनंद का मनोबल गिराने लगे। उन्होंने कहा, “अब शतरंज को नए बादशाह की जरूरत है। हम अब बूढ़े हुए।”

लेकिन बूढ़े आनंद भी कम खतरनाक न थे। पहले ही मैच में मात्र 16 चालों में कार्लसन घुटने पर आ गए। उन्हें हाथ खड़ा कर ‘ड्रॉ’ की मांग करनी पड़ी। विश्व-विजेता का स्वप्न संजोए कार्लसन का आत्म-विश्वास पहले दिन ही हिल गया। आनंद मुस्कुराते हुए बाहर निकले। अगली बाजी आनंद की होगी, यह बात लगभग तय थी।

कास्पारोव ने एक किताब लिखी ‘हाउ लाइफ इमिटेट्स चेस’। उनका कहना है कि शतरंज से आदमी का चरित्र झलकता है। बॉबी फ़िशर और कास्पारोव की तरह कार्लसन भी मात्र जीतने के इरादे से खेलते हैं। हारने पर उनकी नींद उड़ जाती है। आनंद अगर जीतने के लिए खेलते भी हैं, तो दिखाते नहीं। और हार कर भी मुस्कुराते रहते हैं। 

कार्लसन कहते हैं कि दुनिया के सभी शतरंज खिलाड़ियों में सबसे कोमल हाथ विशी आनंद का है। वह हाथ मिलाते हैं तो लगता है कोई दोस्त गप्प मारने आया है, शतरंज खेलने नहीं। कास्पारोव इतनी सख़्ती से कुटिल मुस्की देते हाथ मिलाते हैं कि विरोधी घबड़ा जाए। मशहूर खिलाड़ी नाकामुरा ने एक बार कहा, “कार्लसन आँखों से सम्मोहित करते हैं, मुझे काला चश्मा दिया जाए।” यह और बात है कि वह चश्मा लगा कर भी हार गए।

तो जब मधुर आनंद और मायावी कार्लसन की दूसरी बाज़ी हुई, तो आनंद एक जीता हुआ खेल भी बस इस भय से नहीं खेले की वह हार जाएँगे। पहली ही e4 चाल में कार्लसन का अप्रत्याशित c6 उन्हें डरा गया। वह जीत रहे थे, लेकिन अठारहवीं चाल में जान-बूझ कर एक-दूसरे के वज़ीर (रानी) मार खेल ड्रॉ करवा दिया। 

दूसरे ड्रॉ के बाद यह लगने लगा कि आनंद जीतने के बजाय बस किसी भी तरह अपना ताज बचाना चाहते हैं। लेकिन अगले खेल से दर्शक-दीर्घा में कास्पारोव भी होंगे तो क्या शतरंज अपना काला इतिहास दोहराएगा? टॉयलेटगेट?

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शतरंज की दुनिया में एक विभाजन के जिम्मेदार गैरी कास्पारोव ही थे, जब भ्रष्टाचार के आरोप के कारण दो समूह बन गए। दो-दो शतरंज चैंपियन बनने लगे। लेकिन 2006 ई. में दोनों चैंपियनो व्लादिमीर क्रामनिक और टोपालोव के मध्य मुकाबला रख शतरंज को एक करने का फैसला हुआ। इस मुकाबले में एक अजीब बात हुई। क्रामनिक एक मैच के दौरान पचास बार शौचालय गए। टोपालोव ने इल्जाम लगाया कि वह शौचालय जाकर कंप्यूटर की मदद ले रहे हैं! क्रामनिक इसे नकार कर विजेता घोषित हुए। हालांकि जल्द ही उन्हें अपना ताज विश्वनाथन आनंद को सौंपना पड़ा।

चेन्नई में आनंद और कार्लसन का तीसरा मैच भी ड्रॉ हुआ। अब तक गैरी कास्पारोव का प्रवेश-निषेध खत्म हो चुका था, और वह अब दर्शकों में सामने नजर आ रहे थे। आनंद तनाव में आ गए थे, और इसी मध्य कार्लसन का पेट खराब हुआ। वह बारंबार शौचालय जाने लगे। आनंद ने इसका विरोध नहीं किया, और वह खेलते रहे। चौथी बाज़ी ड्रॉ रही। पाँचवी और छठी आनंद झटके में हार गए। इस टॉयलेटगेट पर कभी किसी ने चर्चा नहीं की, और आनंद ने भी यही माना कि वह बुरा खेले।

कास्पारोव ने ट्वीट किया, “अब अगर कार्लसन पागल हो जाएँ, तभी हारेंगे।”

छठी बाज़ी के बाद आनंद की हार सुनिश्चित कर कास्पारोव मास्को निकल गए तो आनंद ने प्रेस में कहा, “एल्विस प्रेस्ले चेन्नई से चले गए। अब हम खेल शुरु करें?”

नॉर्वे की अख़बार में खबर छपी कि चेन्नई के टाइगर अब भी खेल में वापस लौट कर कार्लसन को मात दे सकते हैं। लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। जिस दिन विश्वनाथन आनंद की हार तय हुई, सचिन तेंदुलकर ने भी संन्यास की घोषणा कर दी। देश से शतरंज का जुनून जाता रहा। आनंद के समय जहाँ पैंतीस ग्रैंड मास्टर हो गए थे, आनंद के बाद दस-पंद्रह हुए। वह भी इसलिए कि आनंद अभी पूरी तरह गिरे नहीं हैं।

मेरी एक और थ्योरी है कि शतरंज का राजा विश्व का राजा होता है। विश्व-युद्ध से पहले राजा यूरोप था, फिर जब लाल सेना ने जंग जीती तो दशकों तक रूस का राज रहा। इस सत्ता पर सबसे पहली चोट शीत-युद्ध के समय अमरीका के बॉबी फ़िशर ने रूस के बोरिस स्पास्की को हरा कर की। अमरीका सोवियत पर विजयी हुआ। सोवियत टूटने के बाद रूस के हाथ से भी सत्ता जाती रही। ऐसे वक्त एक तेजी से उभरते देश भारत ने सत्ता संभाली। भारत प्रगति करता गया और शतरंज का ताज भी भारत के सर पर रहा। अब वापस यह ताज यूरोप में नॉर्वे के सर पर आ गया। इस वक्त हर आर्थिक-सामाजिक आंकड़े पर नॉर्वे यूँ भी टॉप पर है। तो इस शृंखला का मूल बिंदु यही है। 

इन शतरंज के मोहरों में देश की किस्मत छुपी है।

Check out the Chennai winning moment here

मैग्नस कार्लसन से जब एक साक्षात्कार में पूछा गया, “आपको पता है, एक मशहूर अमरीकी शतरंज खिलाड़ी ने शतरंज छोड़ कर मार्शल आर्ट खेलना शुरू कर दिया?”

उन्होंने कहा “शायद उन्हें हिंसा पसंद नहीं होगी। शतरंज से अधिक हिंसात्मक खेल कोई नहीं।”

जब आनंद को लोग टाइगर (बाघ) बुलाते, तो कार्लसन ने स्वयं को क्रोकोडाइल (मगरमच्छ) कहना पसंद किया। यह अजीब बात है कि शतरंज जैसे अहिंसक खेल में बाघ और मगरमच्छ जैसी उपमाएँ दी गयी। लेकिन यह बात सच है कि मार्शल-आर्ट या मुक्केबाजी की चोट हफ्ते-महीने में ठीक हो जाती है, लेकिन शतरंज ऐसी चोट देता है कि महीनों नींद-चैन उड़ जाए। 

लोगों ने मान लिया था कि चेन्नई में हार के बाद आनंद अब कभी कार्लसन के साथ नहीं खेलेंगे। ख़ास कर भारतीयों में ‘किलर इंस्टिक्ट’ कम माना जाता है। लेकिन जिस व्यक्ति ने छुटपन से प्यादे-मोहरे और रणनीति में ही जीवन बिताया हो, वह शातिर और खूँखार बन ही जाता है। बाहर से सौम्य दिखना आनंद का एक मुखौटा है, जिससे कई आक्रामक खिलाड़ी भी धोखा खाते रहे हैं। 

जब दुबई के ‘विश्व रैपिड चेस’ में आनंद पहुँचे, तो लगातार तीन बाज़ी अलग-अलग लोगों से हार गए। आनंद ‘रैपिड चेस’ के अजेय योद्धा रहे हैं, और यह हार किसी को समझ नहीं आया। दूसरी तरफ कार्लसन लगातार जीत रहे थे। कार्लसन का विजय-रथ आखिर रुका। 

विश्वनाथन आनंद ने कार्लसन को दुबई में मात कर दिया! लोग कयास लगाते हैं कि आनंद जान-बूझ कर शुरुआती खेल हारे थे, जैसे बाघ आक्रमण से पहले तीन कदम पीछे लेता है। या शायद वह चेन्नई से दुबई मात्र कार्लसन से बदला लेने आए थे। 

कयास तो कयास हैं, लेकिन बाघ-मगरमच्छ की अगली लड़ाई हुई उस राज-मुकुट के लिए जो आनंद चेन्नई में हार गए थे। और यह बाजी थी कास्पारोव के घर- रूस में! 

सोची (रूस), 2014

रूस की धरती शतरंज का मक्का कही जा सकती है। यहाँ हर तीसरा बच्चा शतरंज खिलाड़ी हो तो ताज्जुब नहीं। विश्वनाथन आनंद जब पिछले वर्ष अपने घर से पंद्रह मिनट के  फासले पर होटल में खेल रहे थे, तब वह तनाव में थे। लेकिन रूस में वह अलग ही मिज़ाज में थे। वह अपनी पत्नी अरूणा के साथ आए थे, जो उनकी मैनेजर भी हैं। और अब बिल्कुल दबाव में नहीं नजर आ रहे थे। 

शतरंज का एक और नियम है कि इसके राजा से वही लड़ सकता है जो बाकी बाहुबलियों को हरा कर आया हो। आनंद ने अपनी हार के चार महीने बाद ही विश्व कैंडीडेट चैंपियनशिप में सबको परास्त कर दिया था। और अब वह कार्लसन से अपना ताज वापस लेने रूस आए थे। 

इसी रूस की धरती पर दो वर्ष पूर्व आनंद ने बोरिस गेलफ़ांड को हरा कर अपना ताज छठे साल लगातार कायम रखा था। उन्हें उम्मीद थी कि वह रूस से जीत कर ही जाएँगे। लेकिन इस बार कुछ अलग बात थी। अब तक पर्दे के पीछे रहने वाले कास्पारोव सीधे-सीधे कार्लसन के ‘सेकंड’ बन कर आनंद से भिड़ रहे थे।

सोची का पहला मैच ड्रॉ रहा। दूसरे में कार्लसन जीत गए। लेकिन तीसरे मैच में आनंद ने वापस कार्लसन को हरा दिया। बल्कि अब आनंद इतने खुल कर खेल रहे थे कि कास्पारोव को यह लग गया कि वह अपना ताज वापस लेकर ही जाएँगे। और छठे मैच में कार्लसन ने ऐसा ‘ब्लंडर’ किया कि आनंद की जीत ‘लगभग’ तय हो गयी। 

लेकिन आनंद को वह ग़लती नजर ही नहीं आयी और वह उससे भी बड़ी ग़लती कर बैठे। सबने कहा कि ऐसी ग़लती असंभव है। आनंद ने उस दिन प्रेस में हताश होकर कहा, “इंसान ग़लती कर जाता है। मेरा अनुभव कहता है कि मैं अब हार चुका हूँ। लेकिन मैं अपने तीन वर्ष के बेटे के लिए खेलूँगा कि वह बड़ा होकर जब मेरा खेल देखे, यह ग़लती न दोहराए। और यह देख ले कि उसका पिता ग़लतियों के बाद भी खत्म नहीं हो जाता।”

लंबी रेस का घोड़ा वही है जिसने हार को बस एक ख़ास बिंदु पर नियति मानी है। कार्लसन आनंद को हराने से पहले लंदन में आखिरी बाज़ी हार कर ही आए थे। आनंद हारने के बाद दुबई में कार्लसन को हराते हैं। और उसी साल सोची में कार्लसन जीतते हैं। पुन: आनंद 2017 में कार्लसन को हराते हैं। अब तक खेले अलग-अलग फॉर्मैट की बाज़ीयों में दोनों ने आठ-आठ खेल जीते थे।

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जो भी हो, कास्पारोव का स्वप्न साकार हुआ। मैंने उनके चरित्र को अनायास कुछ कुटिल जरूर बनाया है, लेकिन कास्पारोव एक आदर्शवादी व्यक्ति हैं। शतरंज संगठन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा कर अलग होने वाले पहले व्यक्ति कास्पारोव ही थे। वह ‘नो नॉनसेंस’ व्यक्ति माने जाते हैं, हाव-भाव से भी। वह हारे भी तो आखिर अपने ही पूर्व ‘सेकंड’ क्रामनिक से, जिन्होंने कास्पारोव को उनकी ही ‘निगेटिव चेस’ और पुरानी ‘बर्लिन डिफ़ेंस’ के बल पर मात दी।

फिलहाल कास्पारोव ने भारत-चीन से शतरंज को कमजोर कर स्कैंडिनैविया और यूरोप की ओर मोड़ दिया है। कार्लसन प्रतिभाशाली जरूर हैं, लेकिन यह बात अब पक्के तौर पर कही जा सकती है कि कास्पारोव ने उन्हें अपनी इस लड़ाई का सेनापति बनाया। यूरोप की सत्ता स्थापित हो चुकी है। भारत में शतरंज अवसान पर है। मुझे कुछ उम्मीद है कि भारत-नेपाल मूल के युवा डच खिलाड़ी अनीश गिरी कार्लसन को हरा दें, अन्यथा कोई भारतीय दूर-दूर तक नहीं। हाँ! विश्वनाथन आनंद जब तक जीएँगे, रैपिड और ब्लिट्ज चेस के सरताज रहेंगे ही। यह आश्चर्यजनक है कि उम्र के साथ उनकी गति बढ़ती ही जा रही है। लेकिन यह भी विडंबना है कि शतरंज (चतुरंग) का आविष्कार जिस देश में हुआ, उस देश की बिसात सिमटती जा रही है। 

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The land of Nobel

Nobel Prize had been a childhood fascination for me, from the days I began collecting trophies in school quizzes and gully-debates. While Mother Teresa and Rabindra Nath Tagore seemed too ethereal, Hargobind Khorana seemed achievable and I began studying medicine. And when I first opened my email account on Hotmail, one of my first emails was directed to khorana@mit.edu scripted in a broken english,

Dear Dr. Khorana,

I had been fascinated by your research from childhood, and wish to join your lab. Though I am in process of application to your university and have taken all requisite tests, there are meagre chances to join your prestigious university. Please accept me as Eklavya if not Arjuna, by just replying this email.

Regards.”

Man never replied. Eklavya turned Devdas. Cursed the old man with abuses gulping bouts of drinks. Years later, I figured out man didn’t know how to reply emails. He didn’t even reply to White House when they conferred him with National Medal of Science. A white house representative had to track him down on foot to make him attend.

Anyway, I figured out, to win a Nobel- you have to become a cynic psychopath scientist with a french beard, an Einsteinian hairstyle, a test-tube in hand, and sitting in a US-lab. And here I was! Sitting in a prime lab in United States, with similar attire and outlook, and joined the most cynic professor’s lab. Man kept snails as his pets, who even followed his orders! My research progressed with snail pace, and I would have taken more Vodka shots in those test-tubes than performing experiments. Well, that was cynic!

One day my professor asked, “So Kumar! How is your research going?”

In serendipidity, I answered, “I am making a mathematical model of snail behaviour.” Huh!

“Hey! That’s awesome. Let’s meet up this wednesday and see it.”

WTF? Mathematical model of snail behaviour!!! What the hell is that?

Greatest solution to all problems existed even those days some 12 years back. Baba Google!

With a good bout of plagiarism and copy-paste Java animation programme, I was ready with a simulation program on snail movement. My professor clapped when the snail model moved dodgily on the computer screen. When I discussed the model with an IITian friend, man wrote his first mathematical paper on some ‘stochastic behaviour’ and scribbled my name in acknowledgement. The snail shit was superhit!

But, I knew Nobel would never be awarded for decoding a snail’s behaviour. It has to be a ground-breaking research which will shake the world. Something like, “The formula to kill the cancer”, “the secret of addiction”, “the special gene responsible for woman’s abnormal behaviour”, “the neuron which excites on seeing the porn”, “why Katappa killed Bahubali?”.

I quit the US Lab, and began my journey to ground-breaking research, breaking a coconut in one of the famous south Indian temples. The priest said looking at me, “You have a bright future waiting for you, all you lack is focus.” Priest was damn right!

Focus! I googled and ordered the famous book by Daniel Goleman “FOCUS”.

I don’t know if I misunderstood him, but to achieve a target, I understood I have to be close to the target. Left the country, weathered the snow, and landed for good in Land of Nobel. Searching for the clerk in Nobel committee who will get things done for me, and assures, “Kaam ho jaayega” (The work will be done!)

Norway! Here I am! Come on Nobel, now lay on me!

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 Epilogue:

In a dinner with Nobel laureate physicist Anthony Leggett (who incidently was my room-mate’s guide) in 2004, he asked, “Doc! You would know it better. Isn’t virus a live moving nanoparticle which targets our cells? Why the hell people are crazy for designing one to target this or that, when its right in front of us? Leave it. I don’t know anything about this.” And he laughed away.

Years later, in 2012, Nature published ‘virus as nano-particles’, what they called ground-breaking research. Beautiful minds toss such ideas on dinner table!

 

The blue ice: a shit-com

For whatever reasons, birds always found my head as a coveted shitting destination. Even in a crowded environment, if a bird is flying around, I would gear up myself holding a file or book overhead. My transient breath of relief would be annuled as the raven comes back swifter dropping on me accurately like a targeted missile. I was brutally splattered with bird-droppings during my short stint in Indian Institute of Science, which boasted of highest density of nasty crows (kauwa). For the first time in my life, I wore a Govinda-style yellow shirt to camouflage the shitty polka-drops.

The fear of bird-droppings soon extended to any flying object as I would hide even at sight of aeroplane. I always wondered what happens to the shit in the air. Most convenient way would be to disperse it in vastness of atmosphere, and cruise away. The untimely rains and windy splatters. My curiousity ended recently when an elderly woman in Bhopal (city in central India) got hit by a huge chunk of ice fallen from sky. Early investigations suggested it could be ‘blue ice’, human excreta disposed from aeroplanes which gets frozen in stratosphere. My fear wasn’t completely ungrounded and some do throw the shit right up in the air, especially Indian planes devoid of sanitary space on ground.

While the aeroplane mystery took some time, Indian railways were pretty blatant and open-minded from its inception. A hole in the toilet peeps directly down on track. At a usual train velocity of 150 km/hr, a 15 minute shit of yours can make roughly 38 km trail of shit droppings. Considering ever-engaged toilets in trains, the multi-origin shitty trail would extend from origin to destination spanning some 1000 kms. One of the royal heir I heard of, always took a local 30 minute railway stretch every morning at 6 0’clock, only to shit in moving train! His habit seem to have ended at a serious note when he disregarded the statutatory warning displayed in Indian Railways – Please do not use toilets when the train stops at platform. People say, constipated Raja-Saa’b continued his rituals even when train stopped. Sanitation fellows with long brooms began cleaning the toilets, shoving through holes beneath the train, and gave a powerful thrust when they found anything obstructive. This time, it was Raja Saa’b’s ass!

I haven’t utilised public toilets much in life, since I considered them as some sacred love destination. Similar to temple walls, toilet walls too are studded with scribbled names of ‘love-couples’. I wonder how somebody can have an amorous feeling while shitting, and scribble his flame’s name. Extreme love! Isn’t it? As I recently travelled and about to position myself strategically on a shaking commode, I found it written on toilet wall – I love you Priya. I pity the love of poor girl Priya with the shitty boy.

There were days even in my life, when village toilets were reserved for women who seem to have incessant affair with bathrooms. I would be forced to stroll to bamboo-plantations and ease myself with bushy grasses rubbing my body. Umpeen times would I change my position as I would imagine somebody staring at me and breaching my privacy. At a distance, I saw a queue of villagers shitting calmly with one palm on their cheek as if in a great contemplation. Surely, those early days devoid of toilets, gave India great philosophers. Even today, at least my blogging ideas shoot off from long gruelling sessions in toilet. Doesn’t my blog stink?

[a satire on need of sanitation in developing nations; a sequel to earlier blog ‘Love is in the air’]

झुकी झुकी सी नज़र

कल अपने २३वें व्हाट्स-ऐप ग्रुप का उदघाटन समारोह था, जिसका प्रादुर्भाव महज़ उन लोगों से हुआ, जिनकी तोंद निकली है. मेरे वो मित्र जो अपने उदर से असंतुष्ट हैं, शामिल हुये और स्वास्थ्यवर्द्धक पोस्ट फारवर्ड करने लगे. खाने-पीने की रणनीति बनी और यहाँ तक की आपस के उदरों की मौजूदा तस्वीरें भी शेयर हो गये. मामला गंभीर निकला और ऑड-इवेन प्रणाली पर योग और जिम की अदला-बदली तय की गयी. खैर, मूलत: एक और वजह मिल गयी ग्रुप बनाने की. जिरह और हास-परिहास की पुरानी आदत और कभी आत्म-चिंतन की वज़ह से अक्सरहाँ ग्रुप से बाहर-अंदर होता रहता हूँ. पर कौतूहल है कि हर दो मिनट में फोन को टटोलने पर मज़बूर कर देता. ये कैसी चुंबकीय गुलामी है? फेसबुक पे लाइक कितने तो व्हॉट्स-ऐप पे चुटकुले पे कोई भला हंसा क्यूँ नहीं? न हँसे मेरी बला से, अजी बिल्कुल ताजा भेजा था. साँप सूँघ गया क्या ग्रुप को? बस ऊहापोह सी लगी रहती.

ये माजरा पहले न था. ताश के पत्ते निकलते या पकौड़े तले जाते. चाय की दुकान पर एक-एक कर दोस्तों का जमावड़ा होता. काफिले आते-जाते, मुद्दे बदलते, वाद-विवाद होता, और हम अक्खड़ जमे रहते. आवाज में बुलंदी, नजर ऊँची और ठहाके ऐसे की नुक्कड़ पे बस अपना ही राज. कभी सिक्का जमता तो कभी किरकिरी होती, पर डटे रहते. 

ऐसा नहीं कि टेलीफोन न था. चौक पे सरकारी औफिस में सस्ते में ट्रंक-कॉल बुक होती, एक छोटी खिड़की से रिसीवर पकड़ाते, और पीछे खड़े लाइन में लगे लोग दाँये-बाँये देख न सुनने का स्वाँग रचाते. अजी, कौन सी प्रेमिका से गूफ्तगू है? वो राँची वाले फूफा जी होंगे या दिल्ली वाले मामाजी. प्रेम-संलाप करना हो तो अगले चौराहे पे STD बूथ है, कटघरे में जितनी मरजी दबी आवाज में बतिया लो. बस ऊपर वो LED स्क्रीन पे मिनट देखते रहना! बड़े जालिम होते वो टेलीफोन वाले, हर तीन मिनट में पैसे दुगुना. 5 मिनट 59 सेकंड में जिसने झट से रिसीवर रखा, वो है चपल चतुर.

साल-दो साल की बुकिंग पे आखिर घर में भी फोन लग ही गया. क्या उत्सव का माहौल? पड़ोसी बधाई देते, और नंबर जरूर नोट कर जाते. शुक्र है अब चौक पे न जाना. झा-सा’ब के घर फोन जो लग गया. बात की बात, और मुफ्त की चाय सो अलग. और शामत हम बच्चों की, जो घंटे-दो घंटे मुहल्ले में फोन आने का संवाद लिये घूमते. ये तो धन्य टेलीफोन विभाग वाले की अक्सर फोन डेड रहता, और हम चैन की साँस लेते.

मेडिकल कॉलेज में भी यही फोन-बूथ का सिलसिला चलता रहा. रात को ११ बजे के बाद फोन के रेट कम हो जाते, और हमारी कतार लग जाती. आधी नींद में वार्तालाप भी कम होता, और पैसे बचे सो अलग. तभी एक क्रांति हुई. एक रेडियो-नुमा या भारी भरकम वायरलेस जैसी चीज, जो फोन का काम करती. हॉस्टल में इक्के-दुक्के अमीरजादों नें खरीदी और हम कौतूहलवश निहारते. जींस में लटकाते, तो आधी जींस एक तरफ खिसक जाती और कूल्हे अर्द्धनग्न. हाथ से कान तक लाने में यूँ प्रतीत होता, जैसे गाँडीव उठा रहे हो.

बड़ी कशमकश में हमने भी एक अभूतपूर्व जुगाड़ू निर्णय लिया. पाँच मित्रों ने मिल एक मोबाइल फोन खरीदा, और ये बंटवारा कर डाला कि हफ्ते में अमुक दिन इसका राजा कौन? दोस्त इसे पाँचाली कह उपहास करते, पर हम पाँडवों ने चीरहरण न होने दिया. ठीक-ठीक याद नहीं पर वो ‘मोटोरोला’ कंपनी का फोन सालों चला, अविवादित, अजीर्ण.

आज अपनी आई-फोन ६ प्लस की ग्लैमरस माशूका के होते हुये भी उस पाँचाली की बहोत याद आती है. रिंगटोन ऐसा कि पड़ोसी भी जाग ले, भरपूर वजन कि फोन उठाओ तो डोले-शोले बन जायें. सीना तना, आवाज में कड़क अंदाज. धीरे बोलने वाले, कमजोर दिलों वाले दूर ही रहे.

कॉफी पी रहा हूँ और सामने बैठी युवती के नजर उठने का इंतजार है. आधे घंटे से नजर झुकाये, अकेले खिलखिला रही है. अजी वो ही क्या, मैं, आप और ये सारा आशियाँ. कूबड़ों की तरह झुकी कमर, पागलों की तरह अकेले में हंसना, और तोंदूमलों का ग्रूप!

लविंग लाइसेंस

वो वक्त भी था जब युवतीयों को देख गुदगुदी कम सिहरन ज्यादा होती. ट्यूशन पढ़ने आती खिलखिलाती लड़कियाँ सामने से आती, तो पैर काँप जाते, साइकिल से औंधे-मुँह गिरता, लड़कियाँ मुँह दबा उपहास करती हँसती निकल जाती. कोई कलम भी माँग ले, तो छिज्जी उंगली और अंगूठे के बीच आखिरी कोना पकड़ता; सर झुका कलम ऐसे बढ़ाता जैसे हाथ में साँप की पूँछ आ गयी हो; छोड़ भाग आता. 

ये सिलसिला कब तक चला, याद नहीं. पर हाँ, कई गुलाब कोसते रहे,  “हाथ में ही रखोगे लल्लू, या उसे दोगे भी? मज़े में गुलदस्ते में था. खामख्वाह तेरे भी बीस रूपये गये, और मैं भी इंतजार में मुरझा गया.” 

मैं क्या? बड़े बड़े शूरमा हिल जायें. भगवान राम को भी जनक से छुप-छुपा, शानू के गाने गा, सीता को इम्प्रेस करना होता, तो रामायण की कथा कुछ और होती. धनुष तोड़ने से मिल जाए तो भैया! हॉस्टल में हमने भी बहोत तोड़-फोड़ मचाई. 

खैर! त्रेतायुग से कलियुग के ट्रांजीशन में परिवर्तन तो लाज़मी था. मैंने भी आखिर इस क्षेत्र में कई प्रयोग किये, ‘ट्रायल-एरर’ से लेकर ‘व्हाट वूमन वांट्स्’ की तह तक. हाथ में मर्दाना अकड़ और गूफ्तगू का सहज़ अंदाज़. जैसी युवती, वैसी अदाकारी. पढ़ाकू को ज्ञान, फिल्मी-चक्कर वालों को रोमाँस-डोज़, और कन्फ्यूज्ड मंदबुद्धि सुंदरियों को झूठी तारीफ. बस सिक्का जम गया. ज्ञान बाँटने का शौकीन था. लवगुरू बन गया.

गुरू गुड़ रह गया, चेले चीनी खाने लगे. समय बदल रहा था. मेरे फॉर्मूले आउट-डेटेड होने लगे. न वो रिझाना. न वो मनाना. न वो घंटों प्यार की गूफ्तगू. अजी! कौन बैंक जाये, पासबुक-इंट्री करे? ATM स्वाइप का ज़माना आ गया. पहले ऊबड़-खाबड़ रोड पे ऑटोरिक्शा में क्षणिक श्पर्श में ही शरीर तप्त-कंपित हो जाते, अब तो पब्लिक-पार्क में लिपटे पड़े मिलते हैं. क्षुब्ध, मैंने भी सन्यास ले लिया. कोई खास शारिरीक संबंधों से शिकायत नहीं थी, परंतु इस प्रेम में उचाटपन और अस्थिरता दिखी. वो कहते हैं ना, आज पूजा, कल कोई दूजा. फिर मेरे जैसे पुजारी की क्या आवश्यकता?

अरसों बीत गये. कल फ्लाइट की सीट पे अनमना सा था. सफ़र में सोने की पुरानी आदत, और सामने वाली सीट पे कुलबुलाहट. सीट के बीच से पड़ी एक अनचाही नज़र ने ही कह दिया, नवविवाहिता जोड़ा है. चूड़ियों से सुसज्जित आधी से अधिक बाँह, जो बारम्बार पति के हाथ को झटकती. पति भी कहाँ मानने वाला? कभी कमर, कभी वक्ष की ओर, और मैं मुँह छुपाता बैठे-बैठे आधी-तिरछी करवट लेता. तभी कुछ अप्रत्याशित हुआ और मैं काँप गया. पीली साड़ी, माँग में मोटी सिन्दूरी रेखा और स्वर्ण गहनों में लदी युवती ने पति का हाथ मरोड़ा और अंग्रेजी में कहा, “What do you think you fool? You got a license to love me or what? Stay away.” चार दिन की शादी में वस्त्रहरण का लाइसेंस तो नहीं मिल जाता.

नारी-सम्मान और प्रेम के पुजारी को इस वीरांगना में असुर नहीं, साक्षात् दुर्गा दिखी. इस लविंग लाइसेंस के कई इम्तिहान हैं. प्रेम-शास्त्र कल भी था, आज भी है, अज़र-अमर, Evergreen. सिलेबस ही तो बदला है, विषय तो वही है. सोचता हूँ, पाठशाला फिर जैसे-तैसे चालू कर ही दूँ, ईमानदारी से लाइसेंस की. 

कबिरा खड़ा बाज़ार में

तोतली टूटी-फूटी बोली थी, नाक बहती, निकर खिसकती, फिर भी सवाल जरूर पूछा जाता- बड़े होकर क्या बनोगे? इस सवाल के ज़वाब से भी IQ का संबंध है. कोई डॉक्टर, कोई इंजीनियर, कोई पायलट, जो माँ-बाप सिखाते बोल देते. मैंने कहा, “साईंटिस्ट बनूँगा, नोबेल प्राइज जीतूँगा, और मरने से पहले राष्ट्रपति भी.” पूछनेवाले मुँह एँठते-कहते, “झा साब! और कुछ बने ना बने, आपका बेटा लम्बी लम्बी जरूर छोड़ेगा.”

अंकल की बात दिल पे लग गयी. मैंने कहा आविष्कार तो मैं कर के रहूँगा. लेकिन क्या? 

कबीर दास के दोहे से पहला आइडिया आया.

“बोए पेड़ बबूल का, आम कहाँ से होये”.

मैंने कहा अब तो बबूल के पेड़ पे आम लगा के रहूँगा. ऐसी खुराफातों के लिये भाई शुरूआत में जरूर साथ देते हैं ताकि प्लान फेल होने पर उछल उछल कर ठिठोली कर सकें. 

पड़ोसी गाँव के मामाजी ने ग्राफ्टिंग के गुर सिखाए, माँ से जिद कर केमिकल खरीदे, और बबूल के पेड़ पर एक-एक बड़े सलीके से सर्जिकल कटिंग कर जोड़ बनाता गया. एक टहनी भी न लगी, सामने के आम का लहलहाता पेड़ गंजा जरूर हो गया. पिताजी ने इन्क्वायरी बिठाई, भाईयों ने फुलझड़ी लगाई, और एक महान वैज्ञानिक पटाखों की तरह बजा दिया गया.

“निंदक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय”

निंदा और ठिठोली करने वाले तो घर में ही था. कबीर दास के इसी फंडे पे हिम्मत दुगुनी हो गयी. 

इस बार बिजली बनाने की सोची. गाँव के लिये बिजली नयी चीज़ थी. वो तो बस उस बिज़ली से वाकिफ थे जो मवेशी मेले में नाचने आती. भाई-साब ने आईडिया दिया, गाँव के पचास लोग हर रात साईकिल चलायेंगे, डायनमो इफेक्ट से पचास घरों में बल्ब जलेंगे.

“धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय”

प्लान साइकल की स्पीड से फुस्स हो गया.

२००४ ईसवी में पहली बार रिसर्च करने इंडियन इंस्टिच्यूट अॉफ साइंस में किशोर वैज्ञानिक रूपेण चयनित हुआ. रिसर्च का तो पता नहीं, कैंटिन के डोसे लाज़वाब थे. और रात को लैब के बाहर चाय. वाह! मज़ेदार. बाकि रिसर्च तो क्या, इस टेस्ट्यूब से उस टेस्ट्यूब. चार घंटे बाद रीडिंग लो. फिर वही रीपीट करते रहो. इस से कहीं ज्यादा प्रयोग तो मेरी माँ मुरब्बे-अचार में कर ले.

“जिन खोजा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ”

आखिरकार मेडिकल की पढ़ाई खत्म होते ही पहली फुरसत में अमरीका निकल लिया. दो बड़े फैकल्टी के लैब पसंद आये. हमारे आधे फैसले तो हेड-टेल या अक्कर बक्कर बम्बे बो से होते हैं. डॉ लिगेट विजयी रहे, लातेरबूर हार गये. मैं भी जी-जान से रिसर्च में लग गया. डॉ. लातेरबूर को देखता तो मंद मुस्कान देता. बिना फंडिंग के गरीब दयनीय परिस्थिति थी उनके लैब की.

“जाति न पूछो साधू की, पूछ लिजिये ज्ञान”

२००५ दिसंबर: Paul laterbur wins Nobel Prize in medicine.

मतलब यूँ कहिये, सारे गणित धरे के धरे रह गये. थोड़े दिन टेस्ट-ट्यूब में चाय-साय बनाई, और वापस आ गया डाक-साब बनने.

मेक इन इंडिया कोई जुमला भले ही हो, बड़े जुगत का काम है. अजी मुरब्बे नहीं बनाने, रिसर्च और आविष्कार करने हैं.

“कबिरा खड़ा बाज़ार में, माँगे सबकी खैर”

The common wall: great Indian neighbours

I love him but I just don’t like the way he gurgles and clears throat every morning. We greet each other when we rush to pick our newspapers; While I give a conceited grin holding an intellectual The Hindu, he mocks me with saucy hot Times supplement. He keeps his car shinier than mine, and would light up his house 15 seconds before me in Diwaali. And both of our wives are locked in everlasting sugar-coated fierce duel. The day one joins Yoga, other joins Zumba, and the fight goes on. 

Years back somewhere in 1985, our childhood neighbour got a videocon colour TV, which was talk of mohalla. A month later, a massive deluge happened and our entire city was flooded. Yet, my dad sailing through waist-high water, was lifting a large box on his head, like Vasudev lifting Lord Krishna. It was a new Onida TV which said, “Neighbour’s envy; Owner’s pride.” 

Rest of the TV-deprived neighbourhood would gather to watch the ’87 world cup. TV was disproportionate large in our small home; My mother would fry delicious pakodas for kids who parted with us; While, neighbour uncle would slap any guy caught smiling when India lost wicket. India lost the world cup, but we won as better host.

Event led to an unsaid ‘cold war’, a war of superiority, and we took the brunt most. If his kids got more marks, I was screwed and vice versa. But, my dad suddenly become Gandhian and began giving Amir Khanish lectures. He arranged many Vajpayee-Musharraf style meetings but one day the neighbour kid stole all our fresh lemons and the war resumed. Lemons were returned, kid beaten and a wall was erected. The wall on which we urinated for long.

We moved from kid-hood to adulthood, and my father turned into Robinhood helping any needy, but neighbourhood bitterness persisted. Whenever friendship of our generation bloomed, aunty would charge at her son, “If you like them. Go and stay with them.” As if we were Pakistan, and he was Shahrukh khan, huh!  Shahrukh khan my foot!! He wasn’t even close to Rajpal Yadav. 

Years gone past, we moved to other states, other countries, globalised. The wall stands but lost its sheen with some algae layers at bottom, I believe nobody urinated on it for years. Faded yet a memory stands, when there wasn’t a wall, a TV, and a reason to fight. Our fathers played chess, while we toiled in mud and sand.

Uff! He coughed again. Bloody! Man has TB I think. 

तालीम

कुछ चीजें न याद है और न ख्वाहिस हैं सुनने की. भला उस जमाने में डाइपर रहे होंगें, शोभा डे जैसे हाइ-फाई लोगों ने पहनें होंगे, हम तो नंग-धड़ंग घूमते रहे. दूरदर्शन पे तो डायपर वगैरा के विज्ञापन भी नहीं आते थे, क्या हगीज़ और क्या पैंम्पर्स? इसकी एक वज़ह शायद ये भी रही हो कि कार और फ्लाइट में घूमना फिरना कम था. अब ट्रेन-बसों में तो खिड़की से धार बहाने की बच्चों को आजादी थी. न उम्र रही, और न आज़ादी; ये मलाल रह गया कि डायपर कभी न पहन सके. 

विज्ञापन तो क्या थे? सुनील गावस्कर और वेंगसरकर तो छोड़ो, आलोकनाथ तक साबुन के विज्ञापन में. नहाने से जैसे नफरत सी हो गयी. वो तो धन्यभाग्य पहली दफा प्रीति जिंटा एक ऐड में दीखी और जैसे देश में स्नान-क्रांति आ गयी. 

डायपर तो एक छोटी कड़ी है. तालीम तो जैसे अधूरी सी रह गयी. अजी आधे तो ऐसे जीये, “बी.ए. हुए, नौकर हुए, पेंशन मिली और मर गये”. बच्चों को वन्डरला (एक फन रिसोर्ट) घूमाने गया. जोश में पानी में छलाँग भी मार दी, और ऊँकडू हो दायें-बायें लात मारने लगा. कई जुगत लगाये. बच्चे तैरते हुये ठिठोली करने लगे. हिम्मत तो देखो! भला कोई अपने बाप पे भी हँसता है? मैं एक बारी छुटपन में शतरंज के खेल में पिताजी पे हँसा. अजी वो थप्पर रसीद करा, कि अगली शाम तक शतरंज खेलने की हिम्मत न बनी. अब ये और बात है, लतखोर प्रवृत्ति थी कि अगली शाम फिर बिसात बिठा ली.

किताबों का शौक था या नहीं, ठीक ठीक याद नहीं. पर पढ़ डाली जो सामने दिखी वो. एक बारी तो रोमानिया का इतिहास तक पढ़ डाला. अब माँ-बाप भी शेखी बघारने में कंधे पे बंदूक रख देते. घर में बर्तन कम, कप-शिल्ड ज्यादा दिखने लगे. कोई बड़ी बात नहीं, अगर मिश्रा अंकल को मेरे क्विज-डिबेट वाली ट्रौफी में चाय पिला दी हो. इसी धक्केबाजी में मेडिकल परीक्षा भी दिला दी. अब तक तो वो मशीन बन गया था, कि एक तरफ से सवाल डालो तो, दूसरी तरफ से जवाब निकले. ये सिलसिला चलता रहा, और मैं पढ़ता रहा. मशीन घिसती, खराब होती, पर धड़धकेल चलती रहती.

अमूमन ऐसे लोगों को रट्टू-घिस्सू, पढ़ाकू कहके भी दुत्कारते हैं. जब जब ये महसूस होता, एक गिटार क्लास या जिम ज्वाइन कर लेता. लेडीज़ हौस्टल के चक्कर मार लेता. या होस्टल सुप्रीटेंडेंट के घर दीवाले में बम फोड़नें में शामिल हो लेता. ऐसा लगा जैसे तालीम दुगुनी हो गयी हो. किताबों मे झुका सर जैसे तन गया हो. मशीन में जैसे जान आ गयी हो.

मतलब जी वो कहते हैं, माँ दा लाडला बिगड़ गया. 

हरे-नीले चश्में पहन, कंधे तक बाल बढ़ा जिम मौरीसन सुनने लगा. रॉक शो में जा बाल को आगे-पीछे करने लगा, जैसे वो धोबीघाट की धोबन करती है. परिपक्वता इस मुकाम पे ला देगी, अंदाजा न था. आईना देखा तो जैसे बिहारी टोन में दिल की आवाज आयी, “साला, धोबी बना दिया बे!”.

समाजवाद और साम्यवाद का वकील हूँ. डॉक्टर हो या धोबी, तालीम तो तालीम है. मेरी दकियानूशी तालीम बदली. और देश भी तो कच्छे से डाइपर तक आ गया. 

………

एक शिरकत अंग्रेजी में भी

Another brick in Deewaar

बस यूँ ही, मेरे मन की.

यूँ तो मैं हिंदी में कुछ खास लिखता नहीं, बचपन से वही मिडिल क्लास वाली अंग्रेजी की कवायद. लेकिन आज़ ज़रा देशी मामला है, और ये ब्लोग-स्लोग में तो क्या गोरे और क्या पाकिस्तानी? कोई भी मुँह उठा के लाइक करने आ जाता है. धर्मपत्नी जी भी परेशान, कि ये किन लड़कियों के कमेंट्स पढ़ मुस्कुराते रहते हो? मैने कहा ऐसा नहीं है. आधा वामपंथी, आधा गाँधीवीदी है ये वामगाँधी. निर्मोही. निर्विकार.

तो प्वाइंट पे आता हूँ.

ये किसी छिटपुट बात के बतंगड़ पे किसी गाँव में कोई हादसा हो गया. कुछ खाने पीने का मामला था. छुटपन में हॉस्टल के मेस में मैनें भी काफी तोड़-फोड़ मचाई थी. खानसामें मेघलाल की लुंगी खींच चड्डी में दौड़ाया था. साले ने तूर दाल ऐसी बनाई की चार गोताखोर डाले फिर भी दाल का दाना नहीं. जीभ मत लपलपाओ अब तूर दाल के नाम पे. मेरा ब्लोग तो सस्ते में पढ़ रहे हो ना? और जकरबर्ग मियाँ अमरीका वाले ने चाहा तो बिल्कुल मुफ्त.

हाँ जी तो हम कहाँ थे? वो कुछ वही बजरंग बली के भक्तों ने मोहम्मद साब के चेले को…. फिर कान खड़े हो गये? अबे सिनेमाखोरों, ‘बजरंगी भाईजान’ की कहानी नहीं सुना रहा मैं! ये तो ग्लैमर-स्लैमर से कोसों दूर गाँव-साँव का मामला है.

खैर. तसल्ली है. भुखमरी से न मरा कोई. बढिया माँस-मुँस खा के डकार के मरा. मेरे अस्पताल में तो वो खडूँस डाइटिसीयन है. आधे तो वो गीली खिचड़ी और उबले कद्दू खा के सिधार गये.

सुनते हैं, बड़ी तादाद में लोग बाग आये. मरने से पहले भी. मरने के बाद भी. अजी गाँधीजी को एक गोडसे ने निपटा दिया था. पर ये लॉजिक बेकार है. वो ठहरे गोमूत्र पीने वाले शाकाहारी जब तब भूख हड़ताल वाले कंकालनुमा व्यकतित्व. और इधर तो गोमाँस वाला हट्टा कट्टा. खैर ये गाय वाय से दूर ही रहना ठीक. आदर करो या निरादर. मारे दोनों सूरतों में जाओगे. न गाँधी बचे न वो बचा.

अखबार में ये पुरष्कार वापसी का दौर आया तो मैंनें भी बचपन के क्विज डिबेट वाले अवार्ड ढूँढे. ये चिंदीचोर लेखक. अवार्ड वापस करने गये तब लोगों को पता लगा कि ये है कौन जनाब. इनसे ज्यादा तो मेरे ब्लोग के फौलोवर निकलें. मेरे क्या आपके भी. देशी कोई पढता कहाँ है? हाँ पीते बहोत है.

अब जो हुआ वो तो हो गया. मैं नहीं करता कुछ वापिस. मेरे जैसे बिरले ही मिलेंगे. आज भी स्याही वाली कलम से लिखता हूँ. अजी दवात से वो कलम में स्याही डालने का मज़ा ही कुछ और है. अब स्याही पोतने का तो तजुर्बा नहीं. हा हा हा हा.

When babies came from sky

[adult contents warning: user discretion advised]

One of the prominent politician thinks mobile phones are reason behind child abuse since people are getting easy access to child porn. Quite a funny thought. No smart phones. No child abuse. What an Idea sirjee? Though I laughed at thought, it took me back to the days when porn was limited to some smuggled Hustler magazine or a revolutionary writer called Mastram. Soft porn stuff could be found in some hindi mags like Manohar Kahaniyan or Saras Salil.

As I remember from medschool days, child becomes aware of its own sex by 3 years. In most part of rural India, naked children with the dangling male thingy could be seen running around. When asked, show your mama (maternal uncle), they will proudly point out and run away laughing. Similar innuendos existed for female organs like maternal grandmother or anyone from mother’s family. Unaware, uncorrupt kids would bask naked in mud, pond; chase hen or a spare bicycle tyre; boys and girls alike.

Not only kids, women of Dalit or down-trodden communities would be hardly caring of their attire when they bath in public ponds or would be performing their morning rituals in barren fields. A dalit women with a big ‘ghoonghat’ upto knees was easing herself in morning with her ass facing towards people when a feudally superior one shouted, “Hey you! Turn the ghoonghat towards us, and ass on other side.”

Ignorance of sex and stigmas wasn’t restricted to the lower social strata. In our med school ragging days, we were asked how many holes a female has? Most couldn’t answer. One to pee, and one to shit, was the commonest reply. And mind you, these were chosen geniuses in biology. 

From childhood, its taught that babies either come from sky or we borrow from hospital. This seemed to so deeply creep in, most adolescent males could never imagine a 3 kg baby coming out of a tiny hole. It was unheard, unseen. I have seen village kids playing with balloons made of condoms they pick from rich home’s garbage. They never learnt, since newspaper ads or the large government banners never explicitly mentioned, and TV channels are swiftly switched when a saucy condom ad begins.

For women, things probably happen a bit differently. From ages, they have been trained as a baby-making machines. In south India, arrival of menses is celebrated as a grand function while the poor girl in agonising pain wonders whats wrong with her body. In spite of feeders from elderly females, sex and childbirth remains confusing for many. They just couldn’t imagine how a tiny imperceptible hole would do everything from bleeding every month, to satisfy a man and give birth to a kid-who-looks-mammoth-now. Won’t it just rip the body apart?

Now, many kids have access to umpteen youtube videos and porn collections, even on the smartphones as netajee pointed. On whatsapp, some would send a hot video, other would bounce back, “its old dude.” They know that babies don’t come from sky and would give a naughty grin when parents would explain so. I believe they know sexuality so well, that they would not allow a stranger to grope or abuse them.

But, what about small 3-6 yrs kids who barely learnt to talk, and understand us? 

Author opines-the abuses may end only by two ways-

 1. The netajee way of going back to the days without phone and imposing a blanket porn ban.

2. Improve sexual education ( the good and bad touches) at earliest comprehensible age. 

Chose the 2nd option. They surely love to hear they came out of mummy’s tummy.