टोंटी पंचायत

महारानी तलाब पर आज पंचैती बैठी है। ये कोई नयी बात नहीं, हर साल बैठती है। इस पंचैती में पूरा गाँव आता है। कुछ जो दिल्ली-कलकत्ता चले जाए, पंचैती देखने छुट्टी लेकर आते हैं। पिछले कुछ बरख से पंचैती के दिन तलाब किनारे मेला भी लगने लगा है। कचौड़ियाँ छनती है, कंगन बिकते हैं, लमनचूस की रेड़ी और डिस्को वाला म्यूजिक। पंचैत न हुआ, कोई त्यौहार हो गया।

कईयों को ये भी नहीं पता कि पंचैत बैठी किसलिए, पर उन्हें ये जरूर पता है कि कन्नू ठाकुर और तम्मू ठाकुर आज फिर एक दूजे का गला दबाएँगें। कन्नू और तम्मू के लोग एक दूजे की धोती खींचेंगे और चड्डी में दौड़ाएँगें। कीचड़ में द्वंद होगा, गाली-गलौज होगा। बच्चे सीटी बजाएँगे, और बूढ़े फोकट में ज्ञान बाँटेंगें। सरपंच जी मचान पर चढ़ जायेंगें, और छेद वाली बाल्टी से ऐसे चिल्लायेंगें जैसे नेहरू जी स्टाइल भाषण दे रहे हों। मोर भी होगा, कौआ भी होगा, बंदर भी होगा, खाऊँ खाऊँ!

महारानी तलाब इलाके का सबसे बड़ा तालाब है। न पूरब, न पच्छिम। कहीं इतना बड़ा तलाब नहीं। उत्तर में गंगू तलाब है पर वो भी कोई तलाब है? एक महार पर सब शौच करते हैं, दूसरे महार पर पंडित मंतर पढ़कर लूटता है। मल-मूत्र से तर्पण कराता है। छी! महारानी तलाब भले ही छोटा है पर गाँव वालों की शान है। अंजुरि (अंजलि) भर पानी पी लो, तृप्त हो जाओ। अब कोई रात में छुपकर मूत ले, और बात है। दिन दहाड़े कोई शौच करे, ठाकुर लट्ठ ले दौड़ा दें। इस मौके पर कन्नू-तम्मू एक हो जाते हैं। एक ही भाषा बोलते हैं। नहीं तो कन्नू बोले ईर घाट, तम्मू बोले बीर घाट। किसी बात पर नहीं बनती।

गाँव के बुजुर्गों को भी ठीक-ठीक याद नहीं, ये रंजिश कब शुरू हुई। दादा-परदादा के भी पहले की कहानी है। कन्नू-तम्मू के लकड़दादों के जमाने की। अंग्रेजों के जमाने की। या शायद मुगलों के जमाने की।

किंवदंती है कि कई बरख पहले महारानी तलाब का बँटवारा हुआ। तालपत्र पर रेखाएँ खींची गई। कुछ कहते हैं वराह मिहिर ने कॉन्ट्रैक्ट लिया था, कुछ कहते हैं टोडरमल के रंगरूटों नें। कोई कहता है घूस-घास का चक्कर था, कोई कहता है गंगू तलाब वालों नें सस्ती मदिरा पिला दी थी। पूर्वी महार गोल थी, वो सीधी खींच थी। पच्छिमी महार खामख्वाह गोल कर दी। ऐसा विभाजन कर गए, ठाकुरों के मत्थे कुछ न पड़ा। एक बार तालपत्र देखते, एक बार तालाब, और सर पीट लेते। दोनों राजा साहेब के पास गए। राजा साहब का अमीन भँगेड़ी। तालपत्र पर भाँग का गोला डाल रोली करने लगा। रेखायें और आरी-तिरछी हो गई। खैर बँटवारा हुआ, तालाब का एक हिस्सा कन्नू के पूर्वजों का और दूजा तम्मू के।

तालाब तो साक्षात् क्षीरसागर थी। पर तम्मू के पूर्वजों के हाथ क्षीर भी ज्यादा और सागर भी। सब खा-पीकर मोटे होते गए। उधर कन्नू का खानदान कुपोषित।

कुपोषण में बुद्धि भी क्षीण हो जाती है। तम्मू के पूर्वज ताम्रपत्र के तगमे बटोरते गए, महारानी तालाब के पानी से खेत पर खेत सींचते गए। उधर हरियाली, इधर सुखाड़। उधर रंगरेलियाँ, इधर उधार।

राजा-महाराजा चले गए तो सियायतबाज आए। कुछ वाचाल, कुछ चंडाल, कुछ गुरूघंटाल।

कूटनीति का मंत्र है कमजोर के कान भरो, और शक्तिशाली के कान खींचो। पहले कानों को ‘ईयरमार्क’ किया गया। कमजोरों को पहचाना गया। कन्नू-तम्मू से बढ़िया प्रयोग के लिए कोई मॉडल न था। शुरूआत उन्हीं से हुई। तम्मू के कान खींचने की रणनीति बनी। कन्नू के कान भरे गए।

“कन्नू! ये बँटवारा ही गलत है। तालाब का सारा जल तो तम्मू ले जाता है और तुम्हें भनक तक नहीं होती।”

“क्या कहते हो? पुश्तैनी बँटवारा है। वो देखो तालाब के बींच खूँटा गड़ा है। पच्छिम से मेरा, पूरब से उनका।”

“भई, खूँटा ही तो गलत गड़ा है।”

“मुझे तो बीचों-बीच नजर आ रहा है।”
“हाँ, पर उधर से महार गोल है। तुम नापी करवा लो।”

“अरे जाओ! राजा साहब के जमाने का खूँटा है। पत्थर की लकीर है।”

कन्नू ने उनको देहरी से भगाया और हुक्का खींचने लग गए। पता नहीं क्यूँ, आज खूँटे पर संदेह वाकई हो रहा था। कहीं तम्मू ने खूँटा खिसका तो नहीं ली? भला उसके खेत लहलहा क्यूँ रहे हैं और हमारे सूखे पड़े हैं? और महार तो वाकई गोल है। भला नापी कराने में हर्ज क्या? इतने बरख में कितने तूफान आए, खूँटा न हिला होगा? दादा साहब के जमाने में भी सुना है खूँटे पर सवाल उठे थे। और कागज-पत्तर भी पुराने हुए। पक्की नापी करवा के नये कागज बनवाऊँगा तहसीलदार से। फिर मेरे खेत भी लहलहायेंगें। शम्भू साव का सारा कर्जा निपट जाएगा।

अगले ही दिन अमीन को खबर दी, और तलाब की नापी शुरू हुई। चाहे पूरब-पच्छिम नापो, या उत्तर-दक्खिन। खूँटा हर तरफ से गलत। कन्नू सर पकड़ कर बैठ गए। तम्मू तमतमा गए। गाली-गलौज हुई। हाथापाई शुरू हुई। कन्नू कमजोर था, पर गजब की फुर्ती थी। झट से तम्मू की गर्दन पर लटक गया और चूल खींच कर गिरा दिया। तम्मू जब तक सँभलता, कन्नू छाती पर बैठ मेढकों की तरह उछलने लगा। राहगीर तमाशबीन बन गए।

ये एक ऐतिहासिक मल्लयुद्ध की शुरूआत थी, जिसे सियासती चौकड़ीबाजों ने ‘महारानी तलाब जल-विवाद’ का नाम दे डाला।

पंचायत बिठाई गई। अमीन की गवाही हुई। खूँटा ठीक से गाड़ने का फैसला हुआ। मछुआरे भेजे गये। सब बाप-बाप करते वापस आये। खूँटे की जड़ में साँपों का बसेरा।

“खानदानी खूँटा है ये। विरासत है हमारी। साँपों की रस्सी बनाकर देवासुर संग्राम करोगे तभी हिलेगा।” तम्मू ने जुमला फेंका।

पंचायत खलबला गयी। कन्नू-तम्मू को अपने हाल पर छोड़ भाग गई। कन्नू ने भी घुटने टेक दिये।

पर सियासतगर्द कहाँ रूकने वाले थे।

“देश चाँद पर पहुँच गया, और तुम इन अंधविश्वासों में अटके पड़े हो कन्नू?”

“तो क्या करूँ? पंचायत के मछुआरे भी फेल हो गए। मुझसे न हिलेगा वो खूँटा!”

“तो खूँटा हिलाने कह कौन रहा है? पानी बाँध दो।”

“क्या मजाक कर रहे हो? भला पानी भी बाँध सका है कोई?”

“अपने गाँव का ही तो है वीशू, विलायत से पढ़कर आया है। डैम बनाता है डैम! जहाँ मरजी, वहीं पानी बाँध दे।”

“भाई, मेरी समझ कुछ नहीं आ रहा। जो मरजी करना है कर लो।”

बड़ा शातिर इंजीनियर था वीशू। चेहरे से तेज चमकता था, गंगू तलाब के पंडित से भी ज्यादा। पैनी नजर और शुतुरमुर्ग सी चाल। महीने भर में तालाब के तल को टेढ़ा कर डाला और तालाब के पानी को कन्नू की ओर मोड़ कर डैम की टोंटी कस दी। अब कन्नू जितनी टोंटी खोले, तम्मू को उतनी पानी नसीब हो। टोंटी बंद तो पानी बंद।

तम्मू के खेत सूखने लगे, कम्मू के लहलहाने लगे। वीशु की विलायती टोंटी ने तो प्रकृति बदल कर रख दी। देवासुर-संग्राम में तकनीकी टोंटी लगाकर भाग गया। फलाँ बटन दबाओ तो अमृत और फलाँ दबाओ तो विष। और सारे बटन कन्नू के पास।

तम्मू ठहरा गँवार, और छुटभैये नेताओं की राजनीति का मारा। त्राहि-माम करता पंचायत भागा। सारी अकड़ स्वाहा हो गयी।

“हजूर! कन्नू से कहें, मुझे कम से कम हक की बराबर पानी छोड़े।”

“हाँ भई कन्नू! बात तो गलत नहीं है। तुम उतनी टोंटी खोल दिया करो।”

“पहले पुरखों की बेईमानी का हिसाब तो चुकता हो।” कन्नू अकड़ कर बोला।

“वो सब पुरानी बाते हैं, और ठहरे तो भाई-भाई ही।”

“ठीक है। तुम भी क्या याद रखोगे तम्मू! जा खोल दी टोंटी आज। लहलहा ले अपने खेत!”

कन्नू-तम्मू गले मिले और पंचायत खत्म हुई।

कुछ दिन सब ठीक चला, पर फिर ये टोंटा-टोंटी चालू हो गयी। कभी तम्मू का बेटा कन्नू के बेटे से स्कूल में भिड़ जाए तो दो दिन टोंटी बंद। कभी जनाना झगड़ा तो टोंटी बंद। आज संडे तो टोंटी बंद। कल रामनवमी तो टोंटी बंद।

हर साल पंचायत बैठती, और दोनों मल्ल-युद्ध करते। गाँव वालों का मनोरंजन करते।

तमाशबीन बढ़ते गए। टोंटी पर सियासत बढ़ती गई। टोंटी को सरकारी टोंटी घोषित कर दी गई। बड़े-बड़े नेता आते हैं, टोंटी के साथ सेल्फी खिंचवाते हैं। कन्नू और तम्मू मूक दर्शक हैं। कठपुतलियाँ हैं। जब मर्जी टोंटी दायें-बायें घुमा लड़वा दिया। टोंटी न हुआ विडियो-गेम का ‘जॉय-स्टीक’ हो गया।

“कहाँ है ये महारानी तलाब?” एक परदेशी राहगीर ने पूछा।

“यहाँ से दक्खिन नाक की सीध में।”

कन्नू-तम्मू की लड़ाई में महारानी तलाब भी गजब पॉपुलर हो रही है।

(कावेरी जल विवाद लगभग २५० सालों से चल रहा दो राज्यों के मध्य एक अनवरत मतभेद है)

कोरिया की रानी ‘री’ और मैं

राजा की गद्दी। अनुवाद यही ठीक रहेगा। एक बहुमंजिली इमारत की इक्कीसवीं मंजिल का वो कोना जहाँ खड़े होकर उटोया का द्वीप दिखता है। इसी उटोया द्वीप पर एक श्वेत चरमपंथी ने कभी साठ-सत्तर लोगों को शीतल-रक्त मृत्यु दे दी थी।

शब्दानुवाद की यही समस्या है। ‘हॉर्सेस-माउथ’ को कोई तुरंग-मुख कह गए, ‘कोल्ड-ब्लडेड’ को मुझे शीतल-रक्त कहना पड़ रहा है। और होटल की ‘किंग्स सीट’ को राजा की गद्दी। उस दिन राजा की गद्दी पर कोरिया की रानी बैठी थीं। कितना सुंदर नाम था- री। न तिलोत्तमा, न पद्मावती, बस री। यह जरूर अयोध्या की रानी सुरीरत्ना की वंशज होंगीं। रत्न और सुर खत्म हो गया, बस ‘री’ रह गया, और मध्यमा और तर्जनी के बीच विराजमान सिगरेट।

मैं री के करीब ही खड़ा द्वीप का अवलोकन कर रहा था। जब से विश्व में समाजवाद आया, रानी के समीप अब कोई भी टॉम, डिक या हैरी खड़ा हो सकता है। हालांकि मैं इन तीनों महानुभावों से भिन्न था। मैं उस सामंतवादी मिट्टी का बना हूँ, जहाँ स्त्री का द्विचर रूप है। स्त्री पूज्य है वा त्यज्य। स्त्री का और कोई स्वरूप नहीं। मैनें कई बार चिनार के पतझड़ी शृंगार से ध्यान हटाकर इस युवती को देखा। और युवती से ध्यान हटाकर चिनार को। मुझे इस युवती में कभी रानी नजर आ रही है, कभी बौद्ध देवी थंका। यह त्यज्य तो नहीं, पूज्य ही हैं।

“आप भी इसी होटल में ठहरी हैं?”

“हाँ! और आप? जरूर ऑफ़ीस के ‘क्रिशमस टेबल’ में आए होंगें? वरना एशियाई क्यों यहाँ आने लगे?”

“एशियाई सुनकर अच्छा लगा। अमरीका में एशियाई अलग और इंडियन अलग कहते हैं।”

“वो तो नाक का फर्क है।” री कुर्सी पर झूलते हुए हँसने लगी।

“मैं समझा नहीं। हिंदुस्तानियों की नाक भला बाकी एशियाई की नाक से कब ऊँची हो गयी?”

“ये मैनें कब कहा कि आपकी नाक ऊँची है?”

“क्षमा कीजिएगा। मेरा मतलब नस्लीय टिप्पणी से नहीं था। हिंदुस्तान में नाक इज्जत से जुड़ी है।”

“नाक से। मूंछों से। पौरूष से। जाति से। धर्म से। धन से। हर चीज से जुड़ी है आप हिंदुस्तानियों की इज्जत। ऐसा सुना है।”

“हम इतने भी बुरे नहीं। पर आपके देश में इज्जत का तराजू क्या है?”

“पता नहीं। मेरी इज्जत तो अब एक नॉर्वेज़ियन के हवाले है।” री फिर से कुर्सी झूलाते बचकानी हँसी हँसने लगी।

री से उन दो दिनों में अच्छी मित्रता हो गयी। संभवत: उस होटल में उस पार के हम दो ही लोग थे। ‘उस पार’ मतलब यूरोप से बाहर की दुनिया के।

उसका पति भी उसी होटल में था, पर कभी मिला नहीं। हालांकि री जब राजा की गद्दी पर नहीं मिलती तो अपने कमरे में पति के साथ ही होती। पर यह बमुश्किल आध-एक घंटे का मामला होता। पुनश्च अपनी राजगद्दी पर वो विराजमान हो जाती, सिगरेट लिए। वो दो दिन गर कार्य-घंटों (वर्किंग हावर) के हिसाब से गिनें, तो मेरे साथ री ने अधिक बिताए। खुली हवा में, उटोया द्वीप किनारे। कोरिया की बातें करते। मैं भाषा के तार जोड़ता कि कैसे तमिल और कोरियन के बीच संबंघ है। और अयोध्या से संबंध। पर री को जैसे ख़ास रूचि न थी। हाँ! वो डॉक्टरी की बातें पूछती। अंतरंग बातें।

“क्या सत्तर वर्ष का पुरूष नपुंसक नहीं होता?”

“अब नपुंसक की उम्र-सीमा बढ़ गयी है। कई दवाएँ आ गयी हैं। पर क्यों पूछ रही हो?”

“क्योंकि मेरा पति सत्तर वर्ष का है!” और री फिर से झूल-झूल कर हंसने लगी।

मैं सन्न रह गया। यह बीस-तीस वर्ष की बाला भला सत्तर वर्षीय व्यक्ति के साथ इस ध्रुवीय देश में क्यों है? री के पति उनके शक्करी-पिता हैं। ओह! पुन: शब्दानुवाद हो गया। सुगर-डैडी। जब युवतियाँ अपनी ख़ास आर्थिक जरूरतों के लिए एक धनी वृद्ध से जुड़ जाती हैं। यह पश्चिम के मधुर संबंध हैं, जो पूरब में शनै:-शनै: आ ही जाएँगें। कुछ ज्ञान-हस्तांतरण उपरांत। हिंदुस्तान में भी शकरपिता-युग आएगा। पूंजीवाद, प्रगतिशीलता और नारी उन्मुक्ति जब चरम पर होगी, तब सुगर-देवों का भी अवतरण होगा। तब स्त्री द्विचर नहीं होगी। पूज्य और त्यज्य के मध्य त्रिशंकु भी होंगी। उन्मुक्त। शकर-पुत्री।

री का पति उसे आकाश में मिला। आधुनिक पुष्पक-विमान पर। जब कोरिया से जहाज हिमालय के ऊपर उड़ रहा था, तो उसने पहली बार री के शरीर पर हाथ रखा, और री मुक्त हो गयी। उसकी मुक्ति कब यौन-गुलामी बन गयी, यह री को स्मरण नहीं। री अब भी मुक्त है, किंतु जब ज़नाब अपनी पौरूष-उत्प्रेरक दवा फांक लेते हैं तो री दासी बन जाती है।

“इस दवा के साइड-इफेक्ट भी तो होते होंगें?” री ने सिगरेट की कश लेते प्रश्न किया।

“हाँ! होते हैं।”

“क्या इस से मृत्यु संभव है? हार्ट-अटैक?”

“संभव तो है। पर क्यों पूछ रही हो?”

“सोचती हूँ, ये बुड्ढा कब मरेगा?” अब वह उछल कर कुर्सी पर पद्मासन में बैठ गयी थी, और अनवरत हँस रही थी।

एक वृद्ध पति एक दिन काम-मुद्रा में मृत हो जाए? यह कैसी कामना है? री की हंसी अब अट्टहासी रूप ले रही थी। और इस भय से मेरा पौरूष कांप रहा था। मैं खिड़की से बाहर देखने लगा। कैसे इस उटोया-द्वीप पर घूम-घूम कर गोली मारी होगी? भाव-शून्य होकर हत्या की होगी, या री की तरह उन्मादित ठहाकों के साथ? कोल्ड-ब्लडेड मर्डर क्या सचमुच कोल्ड ही होता होगा?

“तुम्हारी समस्या क्या है री? अगर प्रेम नहीं तो त्याग क्यों नहीं देती?”

“प्रेम है। तभी तो नहीं त्यागती।”

“तो फिर ऐसी कामना?”

“हार्ट-अटैक की कामना भी कोई कामना है? यह तो स्वाभाविक मृत्यु है।”

“पर पति की मृत्यु की कामना तो है ही। यह मेरे लिए विचित्र है।”

“हम एशियाईयों का प्रेम जैसे वेश्या का प्रेम। उसकी बेटियाँ भी यही समझतीं हैं। उसके परिवार में मेरा यही अस्तित्व है।”

“तो बेटियों से मित्रता कर लो। उनको मातृत्व दो।”

“मातृत्व? वो क्या है? मेरी माँ तो मुझे स्मरण नहीं। वो कौन थीं, किस परिवार से थीं, कुछ ज्ञात नहीं। कहीं तुम्हारे देश से तो नहीं, वो महारानी?” और री फिर हँसने लगी।

री की हँसी अब मेरे लिए असहनीयता की सीमा पर थी। मातृत्व-बोध से मुक्त भी नारी का अस्तित्व संभव है? कहाँ मैं द्विचर रूप में अटका पड़ा हूँ, और यहाँ एक मायावी युवती क्षण-क्षण अपने बहिमुखी अस्तित्व का परिचय दे रही है।

री की कोरियन माँ पता नहीं कौन थीं? पर पिता मानसिक विक्षिप्त थे। शायद विस्मरण रोग अलझाइमर था। री उनकी सेवा करती। मृत्यु के समय तक साथ थी, पर पिता ने कभी री को पहचाना ही नहीं। वो अबोध थे। भाव-शून्य। कोल्ड। क्या यह ‘कोल्डत्व’ संक्रामक है? उनसे री को पसर गया, री से उसके पति को, और अब कहीं मुझ तक तो नहीं आ जाएगा? क्या यह रोग चुंबन से पसरता है या बस छूने से? उस शाम कहीं मेरे हाथ भी री तक तो नहीं पहुँचे, या मेरा पौरूष कांप गया था? क्या मेरी भारतीयता इस हिमालय पार की बाला के स्पर्श मात्र से समाप्त हो जाएगी? एक दिन मैं भी भाव-शून्य हो जाऊँगा? और तभी विश्व-नागरिकता मिलेगी? जब मैं ‘कोल्ड’ हो जाऊँगा?

चिनार के पत्ते दो दिन में कितने झड़ गए! लगता है रात तूफ़ान आया था।

सुबह अखबार में पढ़ा कि उटोया के उस हत्यारे ने अर्जी दी कि जेल का विडियो-गेम ‘प्ले-स्टेशन’ का नया संस्करण उपलब्ध कराया जाए। नए संस्करण में कुछ और वीभत्स खेल आए हैं। सरकार ने मानवाधिकार की रक्षा के लिए उसकी अर्जी मान ली है।

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(प्रवीण झा की यह कथा पहले जानकीपुल पर प्रकाशित)

The blue ice: a shit-com

For whatever reasons, birds always found my head as a coveted shitting destination. Even in a crowded environment, if a bird is flying around, I would gear up myself holding a file or book overhead. My transient breath of relief would be annuled as the raven comes back swifter dropping on me accurately like a targeted missile. I was brutally splattered with bird-droppings during my short stint in Indian Institute of Science, which boasted of highest density of nasty crows (kauwa). For the first time in my life, I wore a Govinda-style yellow shirt to camouflage the shitty polka-drops.

The fear of bird-droppings soon extended to any flying object as I would hide even at sight of aeroplane. I always wondered what happens to the shit in the air. Most convenient way would be to disperse it in vastness of atmosphere, and cruise away. The untimely rains and windy splatters. My curiousity ended recently when an elderly woman in Bhopal (city in central India) got hit by a huge chunk of ice fallen from sky. Early investigations suggested it could be ‘blue ice’, human excreta disposed from aeroplanes which gets frozen in stratosphere. My fear wasn’t completely ungrounded and some do throw the shit right up in the air, especially Indian planes devoid of sanitary space on ground.

While the aeroplane mystery took some time, Indian railways were pretty blatant and open-minded from its inception. A hole in the toilet peeps directly down on track. At a usual train velocity of 150 km/hr, a 15 minute shit of yours can make roughly 38 km trail of shit droppings. Considering ever-engaged toilets in trains, the multi-origin shitty trail would extend from origin to destination spanning some 1000 kms. One of the royal heir I heard of, always took a local 30 minute railway stretch every morning at 6 0’clock, only to shit in moving train! His habit seem to have ended at a serious note when he disregarded the statutatory warning displayed in Indian Railways – Please do not use toilets when the train stops at platform. People say, constipated Raja-Saa’b continued his rituals even when train stopped. Sanitation fellows with long brooms began cleaning the toilets, shoving through holes beneath the train, and gave a powerful thrust when they found anything obstructive. This time, it was Raja Saa’b’s ass!

I haven’t utilised public toilets much in life, since I considered them as some sacred love destination. Similar to temple walls, toilet walls too are studded with scribbled names of ‘love-couples’. I wonder how somebody can have an amorous feeling while shitting, and scribble his flame’s name. Extreme love! Isn’t it? As I recently travelled and about to position myself strategically on a shaking commode, I found it written on toilet wall – I love you Priya. I pity the love of poor girl Priya with the shitty boy.

There were days even in my life, when village toilets were reserved for women who seem to have incessant affair with bathrooms. I would be forced to stroll to bamboo-plantations and ease myself with bushy grasses rubbing my body. Umpeen times would I change my position as I would imagine somebody staring at me and breaching my privacy. At a distance, I saw a queue of villagers shitting calmly with one palm on their cheek as if in a great contemplation. Surely, those early days devoid of toilets, gave India great philosophers. Even today, at least my blogging ideas shoot off from long gruelling sessions in toilet. Doesn’t my blog stink?

[a satire on need of sanitation in developing nations; a sequel to earlier blog ‘Love is in the air’]

When babies came from sky

[adult contents warning: user discretion advised]

One of the prominent politician thinks mobile phones are reason behind child abuse since people are getting easy access to child porn. Quite a funny thought. No smart phones. No child abuse. What an Idea sirjee? Though I laughed at thought, it took me back to the days when porn was limited to some smuggled Hustler magazine or a revolutionary writer called Mastram. Soft porn stuff could be found in some hindi mags like Manohar Kahaniyan or Saras Salil.

As I remember from medschool days, child becomes aware of its own sex by 3 years. In most part of rural India, naked children with the dangling male thingy could be seen running around. When asked, show your mama (maternal uncle), they will proudly point out and run away laughing. Similar innuendos existed for female organs like maternal grandmother or anyone from mother’s family. Unaware, uncorrupt kids would bask naked in mud, pond; chase hen or a spare bicycle tyre; boys and girls alike.

Not only kids, women of Dalit or down-trodden communities would be hardly caring of their attire when they bath in public ponds or would be performing their morning rituals in barren fields. A dalit women with a big ‘ghoonghat’ upto knees was easing herself in morning with her ass facing towards people when a feudally superior one shouted, “Hey you! Turn the ghoonghat towards us, and ass on other side.”

Ignorance of sex and stigmas wasn’t restricted to the lower social strata. In our med school ragging days, we were asked how many holes a female has? Most couldn’t answer. One to pee, and one to shit, was the commonest reply. And mind you, these were chosen geniuses in biology. 

From childhood, its taught that babies either come from sky or we borrow from hospital. This seemed to so deeply creep in, most adolescent males could never imagine a 3 kg baby coming out of a tiny hole. It was unheard, unseen. I have seen village kids playing with balloons made of condoms they pick from rich home’s garbage. They never learnt, since newspaper ads or the large government banners never explicitly mentioned, and TV channels are swiftly switched when a saucy condom ad begins.

For women, things probably happen a bit differently. From ages, they have been trained as a baby-making machines. In south India, arrival of menses is celebrated as a grand function while the poor girl in agonising pain wonders whats wrong with her body. In spite of feeders from elderly females, sex and childbirth remains confusing for many. They just couldn’t imagine how a tiny imperceptible hole would do everything from bleeding every month, to satisfy a man and give birth to a kid-who-looks-mammoth-now. Won’t it just rip the body apart?

Now, many kids have access to umpteen youtube videos and porn collections, even on the smartphones as netajee pointed. On whatsapp, some would send a hot video, other would bounce back, “its old dude.” They know that babies don’t come from sky and would give a naughty grin when parents would explain so. I believe they know sexuality so well, that they would not allow a stranger to grope or abuse them.

But, what about small 3-6 yrs kids who barely learnt to talk, and understand us? 

Author opines-the abuses may end only by two ways-

 1. The netajee way of going back to the days without phone and imposing a blanket porn ban.

2. Improve sexual education ( the good and bad touches) at earliest comprehensible age. 

Chose the 2nd option. They surely love to hear they came out of mummy’s tummy. 

The nagging world of bloggers

Few days back while I was gobbling on some delicious ‘kebabs’, I got a SMS from my wife ‘Quit Facebook’. Like old age telegrams, which usually brought bad news in rudest impathetic way, ‘FATHER DIED. MOTHER SICK’. Telegram virtually meant a death-knell or something equally sinister. A terse warning SMS from wife was no less than the telegram. With a ‘kebab’ in one hand, I somehow manoevred to ‘deactivate’ my account and ‘delete’ the facebook app. Reason seemed to be pretty obvious- my nagging verbose sunday blogs bombarded on casual respite-seeking petty humans. Devoid of facebook likes, I was virtually thrown into the world of like/comment/award-hungry blogger beasts on WordPress and blogger networks.

The world of bloggers

Verbal diarrheas

Blogposts seem to never end, like an incoherent rant after a marijuana puff. If you are bored at very first paragraph, you click on ‘like’ and move ahead. If you somehow sail through the entire post, you ‘reblog’ it to share your suffering with rest of world. Did wordpress really mean ‘revenge’ instead of the ‘reblog’ button? A smart blogger would just randomly click ‘like’ to all blogs with his notifications flooded with undeserved ‘thanks’ messages. Probably, one who is thanking is just reminding him that suffering is not going to end.

Shakespeare out of the grave

Recently I read a blog which said something like, “procrastination of obfuscated maladies may abrogate one of his quintessential hackneyed philosophy”.  

Oh! You dared to read my blog? I will trap you in such a verbal monkey-maze, you will doubt if you ever went to school.

On the top of it, if it’s a poem written by some amateur John Keats, neither you understand the language nor the theme. Either its a blurt of some grad-school hopeful GRE-muggers or somebody working on a blogging course prompt or a ten-words-a-day practicing guys or a sadist language buff. Sadist language buffs are most dangerous of them who would drag you to read your post, and give a sleepless night of ignorance. Drowned in ignominy, I ordered a good dictionary from Amazon.

Blog or image gallery?

If your blog doesn’t have some pic like a ‘whirling balloons’, ‘back of a dusky women’, ‘weird flower species’, ‘pondering nerdy fellow’, you are doomed. I don’t know why great poets and novelists never got this genius idea. Imagine a royal bengal tiger sitting in the middle of William Blake’s blog mocking Edgar Allen Poe’s raven. Alfred Tennyson ‘like’ing them, and blasting them with long harangues in comments.

Autistic rants

Many shy girls, married women, back-benchers, bullied school kids, repititive losers, people in mid-life crisis (oh! that’s me. read my old blog),  or old men reminiscing their past lives become expressive in virtual space. Broken love and sexual starvation finds a space for forbidden and hidden emotions. Teenagers platter their secret love life, with blog titled ‘the way he touched me’. If you have a blogger girlfriend, beware with your moves! Next day it might be a blogging sensation with hundred of ‘likes’.

Attention-seekers

Why would I care in the middle of night if phone suddenly buzzes with a notification? Why would somebody reply to a comment within seconds? A conceited grin at rising list of followers. A blog homepage studded with digital ‘blogger awards’ as if they represent Nobel and Bookers. Its but natural to expect enough appreciation when you spend hours writing, rearranging and designing your blog. Everytime somebody ‘likes’, you read your entire blog again in self-appreciation. A forced positivity. And ofcourse, a ‘like’ by an opposite sex may carry a bit more weightage.

Money-minting blogs

These are the people who really get a minuscule worth for their blogs. Tech-savvies or travelogues or photographers, with huge traffic. But, essentially, they can’t be categorised as blogs rather informative websites.

Three essentials of bloggers

  1. Write for others: Something which looks interesting and awesome to you, may not appeal a bit to others.
  2. Be original: No prompts; No premonitions; No peer pressure.
  3. Comment and like genuinely: Read a blog, encourage with true comments, and don’t like unless you really do so.

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