पाकिस्तान एपिसोड 5

लोकतंत्र का दिया बुझने से पहले एक बार फड़फड़ाया। भारत में भले ही एक मजबूत विपक्ष के खड़े होने में दशकों लग गए, और एक पार्टी ही लगभग बिना किसी विरोध के जीतती रही; पाकिस्तान में मजबूत विपक्ष तैयार हुआ। मुस्लिम लीग, जिसने पाकिस्तान बनाया, अपने दो मुख्य नेताओं के मरते ही, बिखरने लगी। किंतु एक समस्या थी।

पाकिस्तान एक दशक तक गणतंत्र नहीं बना था, और ब्रिटिश डोमिनियन का हिस्सा था। तकनीकी तौर पर उसकी महारानी एलिजाबेथ थी, जैसे ऑस्ट्रेलिया या कनाडा की होती है। पाकिस्तान में गवर्नर जनरल और प्रधानमंत्री होते थे, मगर राष्ट्रपति नहीं। उसमें भी शक्ति का अजीबो-गरीब हिसाब-किताब था। एक गवर्नर जनरल प्रधानमंत्री बन गए। फिर एक अमरीका में राजदूत प्रधानमंत्री बन गए। फिर वह प्रधानमंत्री वापस अमरीका में राजदूत बन गए। पाँच साल में पाँच प्रधानमंत्री कहाँ से आए, कहाँ गए, जनता भी अस्पष्ट थी। मैंने यह जाँच कर देखा है। पढ़े-लिखे पाकिस्तानी भी लियाक़त अली ख़ान के बाद के प्रधानमंत्रियों के नाम बता नहीं पाते।

1956 में चौधरी मुहम्मद अली के समय पाकिस्तान आखिर एक गणतंत्र बना। एक कामचलाऊ संविधान तैयार हुआ, और इसकंदर मिर्ज़ा पहले राष्ट्रपति बने। उन्होंने अंग्रेज़ी को औपचारिक भाषा, ऊर्दू और बंगाली को राजभाषा घोषित किया। इसके साथ ही 21 वर्ष से अधिक उम्र के नागरिकों के लिए मताधिकार की व्यवस्था की। एक और काम यह किया कि पंजाब, सिंध, बलूच और खैबर-पख़्तून को एकीकृत कर पश्चिमी पाकिस्तान प्रांत बनाया। उसकी प्रांतीय राजधानी बनी लाहौर।

इस नए पश्चिम पाकिस्तान के पहले मुख्यमंत्री बने ख़ान अब्दुल जब्बार ख़ान। ख़ान साहब ने बंबई से डाक्टरी की पढ़ाई की थी, और अपने छोटे भाई ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान के साथ खुदाई ख़िदमतगार आंदोलन किया था। वह हजारीबाग जेल में भी रहे थे। वह उन व्यक्तियों में थे, जिन्होंने भारत-पाक विभाजन के समर्थन-पत्र पर हस्ताक्षर से इंकार कर दिया था। वह पठानों को भारत का हिस्सा बनना चाहते थे। उन्होंने अपनी रिपब्लिकन पार्टी बना कर मुस्लिम लीग को पश्चिम पाकिस्तान में हराया।

वहीं पूर्वी पाकिस्तान में एच. एस. सुहरावर्दी ने अपनी अवामी लीग बना ली थी। सुहरावर्दी गांधी के सहयोगी रहे थे। हालांकि कलकत्ता में जो भीषण दंगे हुए थे, उस समय वही बंगाल के मुख्यमंत्री थे। उनकी इच्छा तो यह थी कि पूरे बंगाल को ही अलग देश बनाया जाए, पाकिस्तान या भारत का हिस्सा न बने। वह इच्छा पूरी नहीं हुई, मगर मुस्लिम लीग को हरा कर वह पहले पूर्वी पाकिस्तान के मुख्यमंत्री बने; बाद में पूरे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बन गए।

इस तरह प्रांतीय चुनावों में मुस्लिम लीग की पूरे पाकिस्तान में ही हार हुई। यही तो लोकतंत्र की ख़ूबसूरती है कि जनता उस दल को भी गिरा सकती है, जिस दल ने देश का निर्माण करने में मुख्य भूमिका निभाई।

इस खूबसूरती पर अमरीका ने चोट करनी शुरू कर दी थी। पहले CIA ने 1953 में ईरान में लोकतांत्रिक प्रधानमंत्री का तख्तापलट करवाया। उसके बाद बग़दाद में एक सेना समझौता हुआ, जिसमें ईरान, इराक, तुर्की और पाकिस्तान ने एक साथ अमरीका से हाथ मिलाया। इसका नाम पड़ा CENTO. अब इजरायल को मिला कर पूरे मध्य एशिया पर अमरीका अपना जाल बिछा चुका था। इस पूरी सैन्य डील में जनरल अयूब ख़ान का बड़ा हाथ था। कबाब में हड्डी थे सुहरावर्दी सरीखे प्रधानमंत्री और पठान ख़ान अब्दुल जब्बार ख़ान।

9 मई 1958 को ख़ान साहब लाहौर में अपने बेटे के घर में अखबार पढ़ रहे थे। उनकी गोली मार कर हत्या कर दी गयी।

अब सुहरावर्दी की बारी थी।

(क्रमश:)

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[चित्र: ख़ान बंधु और नेहरू]

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