पाकिस्तान एपिसोड 3

पाकिस्तान ब्रिटिश भारत का एक छोटा हिस्सा था। वह अपने-आप में एक सिस्टम नहीं था कि उसको अलग करते ही गाड़ी चलने लगेगी। वहाँ की अर्थव्यवस्था हिन्दुओं के हाथ में थी, जो विभाजन के बाद भारत आ गए थे। रावलपिंडी एक बड़ा कैन्टोनमैंट जरूर था, मगर पूरी फौज मुसलमान फ़ौज तो थी नहीं। प्रशासनिक अधिकारियों की संख्या लें तो लगभग बारह सौ अफ़सरों में मात्र सौ मुसलमान थे, जिनमें से बीस ने पाकिस्तान जाने से इंकार कर दिया। इससे पहले कि बाकियों का मन बदलता, ‘ऑपरेशन पाकिस्तान’ के तहत ब्रिटिश हवाई जहाज भेज कर उन्हें दिल्ली से उठवाया गया।

ब्रिटिश भारत के लगभग पंद्रह हज़ार फैक्टरियों में हज़ार पाकिस्तान के हिस्से आए, लेकिन उनमें भी कईयों के मालिक हिन्दू या सिख ही थे। नए पाकिस्तान के हाथ में नकद भी नहीं था। जो धन का बंटवारा भारत से होना था, वह इस कारण कुछ समय अटका दिया गया कि वे कश्मीर में घुसपैठ पर न लगा दें।

पाकिस्तान के पास जो भी आर्थिक ताकत थी, वह पूर्वी पाकिस्तान में थी। वहाँ जूट के उद्योग थे। उनके भी प्रोशेसिंग कारखाने भारत के हिस्से चले गये थे, मगर पूर्वी पाकिस्तान काफ़ी हद तक पश्चिमी पाकिस्तान का पेट पालता रहा।

इन बंगालियों ने पाकिस्तान को पाला तो ज़रूर, मगर ये अंदर ही अंदर घुटने भी लगे। वे पाकिस्तान की आधी से अधिक आबादी थे, मगर गद्दी कराची में थी। उनके और पश्चिम पाकिस्तान के मध्य मात्र धर्म की डोर थी। यह डोर मजबूत थी, मगर जब भाषा की बात आयी तो यह डोर उलझ गयी।

मोहम्मद अली जिन्ना का मानना था कि पूरे देश को जोड़ने के लिए एक भाषा ज़रूरी है, जो ऊर्दू हो। वह आज़ादी के बाद एक ही बार ढाका गए, और यह बात कह आए। बंगाली इस मुद्दे पर अड़ गए कि बंगाल में तो बंगाली चलेगी, उर्दू नहीं।

दरअसल, जिन्ना या लियाक़त अली ख़ान स्वयं पाकिस्तान क्षेत्र से नहीं थे। उनके लिए भी वहाँ की भाषा और संस्कृति उतनी ही अनजान थी, जितना बिहार-यूपी से आए मुसलमानों के लिए। वह पंजाबी, बंगाली या सिंधी कैसे बोल पाते? वह तो गुजरात के होकर भी गुजराती बोलने में लड़खड़ाते थे। उनकी तालीम अंग्रेज़ी में थी, और उर्दू भी अंग्रेज़ीदा अंदाज़ में बोलते थे। उनकी एक तक़रीर पाकिस्तान में तीस वर्ष तक प्रतिदिन प्रसारित हुई, जिसमें वह कहते हैं,

“आप सब आज़ाद हैं अपने मंदिरों में जाने के लिए। आप सब आज़ाद हैं अपने मस्जिदों में जाने के लिए। आप सब आज़ाद हैं किसी भी इबादतगाह में जाने के लिए।”

(1977 में किसी ने यह तक़रीर ही गायब कर दी, और प्रसारण रुक गया। अब यूट्यूब पर मिल जाएगी।)

जिन्ना की मृत्यु और लियाक़त अली ख़ान की हत्या के बाद पाकिस्तान संभालने लायक कोई बचा नहीं। अगले प्रधानमंत्री एक बंगाली ख़्वाजा निज़ामुद्दीन बनाए गए। बंगालियों को लगा कि अब उनकी बात मान ली जाएगी। मगर वह भी बंगाल जाकर कह आए कि उर्दू ही भाषा रहेगी। पंजाबी, सिंधी, बलोच, कश्मीरी, पख़्तून तो उर्दू के लिए जैसे-तैसे मान (?) भी गए, बंगाल के लिए यह मुद्दा पाकिस्तान को दो टुकड़ों में बाँटने की चिनगारी बन गया। 

एक विद्यार्थी शेख़ मुजीब-उर-रहमान को छात्रों को भड़काने के जुर्म में जेल भेजा गया। 21 फरवरी 1952 को ढाका के छात्रों पर गोली चलायी गयी, और उनमें आठ छात्रों के शहीद होते ही बंगाल जल उठा। प्रधानमंत्री निज़ामुद्दीन को हटा कर दूसरे बंगाली मोहम्मद अली बोगरा को प्रधानमंत्री बनाया गया। उन्होंने हालात देखते हुए सेनाध्यक्ष अयूब ख़ान को रक्षा मंत्री बना दिया। इस तरह पाकिस्तानी सेना का वहाँ की राजनीति में रेड कारपेट बिछा कर स्वागत हुआ।

अमरीका भी यही चाहता था।

(क्रमश:)

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