पाकिस्तान एपिसोड 2

“स्कूली इतिहास में यह पढ़ाया जाता है कि कौन सी घटना कब घटी, कहाँ घटी। लेकिन, यह बात कम पढ़ाई जाती है कि अमुक घटना क्यों घटी? कहाँ ग़लती हुई?”

यह कथन एडॉल्फ हिटलर लिखित ‘मीनकैम्फ़’ से है, लेकिन बात ठीक लगती है। मैं पाकिस्तान के इतिहास में हिटलर को यूँ ही नहीं ला रहा। बल्कि, इस इतिहास के मुख्य पात्रों में जगह दे रहा हूँ।

आखिर 1947 के दो दशक पूर्व ही क्यों पाकिस्तान की मांग उठी? अलग मुस्लिम देश तो पहले भी बन सकता था। अगर दोनों धर्म पिछली सदियों में कभी भी साथ रहने के लिए उपयुक्त नहीं थे, तो पहले ही बंटवारा हो गया होता। यह तर्क दिया जा सकता है कि पहले मुगल शासन था, इसलिए अल्पसंख्यक होने के बावजूद मुसलमानों को अलग देश की जरूरत नहीं पड़ी।

लेकिन, इस तर्क को भारत तक सीमित रख कर बात पूरी नहीं होती। दुनिया में क्या चल रहा था? सभी अचानक अपनी-अपनी जमीन क्यों तलाशने लगे?

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद साम्यवाद और नाज़ीवाद, दोनों का उदय हुआ। दोनों ही विचार भारत में आए, और दोनों के अपने-अपने प्रभाव पड़े।

1930 से ‘टू नेशन थ्योरी’ खुल कर आनी शुरू हुई, जब हिटलर का कद बढ़ रहा था। पूरी दुनिया में ‘पितृभूमि’ (फादरलैंड) और ‘शुद्ध नस्ल’ जैसे शब्द ज़बान पर आने लगे थे। ‘पाकिस्तान’ शब्द के निर्माता चौधरी रहमत अली नाज़ीवाद से इतने प्रभावित थे, कि उनको हिटलर के कई वाक्य कंठस्थ थे। जिस वर्ष हिटलर जर्मनी के चांसलर बने, उसी वर्ष उन्होंने शुद्ध मुसलमान देश पाकिस्तान के पैम्फ्लेट बाँटने भी शुरू कर दिए।

अपने-अपने नस्लों, अपने धर्मों, अपने हज़ारों वर्ष पुराने पुरखों की जमीन तलाशना और एकजुट होना। हिन्दुत्व शब्द द्वारा हिन्दुओं को एकजुट करना, मुस्लिम लीग द्वारा मुसलमानों को एकजुट करना, यहूदियों का सियोनवाद। यूरोप के अलग-अलग ईसाई समूहों का जर्मन, पोल, रोमाँ, फ्रेंच आदि में पृथक्करण। बाहरी नस्लों को अपने देश से बाहर निकालना। सब साथ ही शुरू हुआ और द्वितीय विश्व-युद्ध तक अपने विकराल रूप में आ गया। न सिर्फ यूरोप में, बल्कि भारत जैसे देशों में भी।

रहमत अली युवा ख़ून थे, हिटलर से प्रभावित हो गए, कोई अजूबी बात नहीं। उस समय जर्मनी और हिटलर ही उगता सूरज था। मोहम्मद अली जिन्ना के विचारों में द्वंद्व है। एक तरफ तो इस्लाम देश की कामना दिखती है, वहीं दूसरी तरफ एक भय भी दिखता है कि अंग्रेज़ों के जाने के बाद मुसलमानों के साथ क्या होगा। क्या वही स्थिति होगी जो यूरोप में यहूदियों की हुई? यहूदियों ने अपनी जमीन तलाश ली, मगर भारतीय मुसलमान कहाँ जाएँगे? उनकी पितृभूमि आखिर है कहाँ? वे तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी भारतीय ही हैं।

भय से हुआ, या बल से। युद्ध से हुआ, या कूटनीति से। महज दो दशकों में ऐसे कट-छँट कर नस्ल-धर्म आधारित देश तैयार हो गए। युद्ध के बाद पश्चिम एशिया की एक सीमा पर यहूदियों का देश इज़रायल और दूसरी सीमा पर मुसलमानों का देश पाकिस्तान बना।

कुछ देश ऐसे बच गए, जिनमें यह नाज़ीवाद का भूत मंडरा कर कहीं कोने में पड़ा रह गया। जहाँ इंद्रधनुषी लोकतंत्र कायम रहा। अफ़सोस उनमें से एक पाकिस्तान नहीं था, जिसकी कीमत उसे बार-बार चुकानी पड़ी।

कंपनी बाग, जहाँ लियाक़त अली ख़ान को गोली लगी, उसका नामकरण लियाक़त बाग़ किया गया। इत्तफ़ाकन पाँच दशक बाद उसी बाग़ में बेनज़ीर भुट्टो की भी हत्या कर दी गयी। लियाक़त अली ख़ान को गोली एक अफ़ग़ान व्यक्ति ने मारी, जो पाकिस्तान में राजनैतिक शरणार्थी था। वह ऐबटाबाद में उसी इलाके में सरकारी खर्च पर रहता था, जहाँ बरसों बाद बिन लादेन को शरण दी गयी।

इससे पहले कि वह पकड़ा जाता और कुछ कहता, उसे उसी वक्त गोली मार दी गयी। केस की जाँच कर रहे मुख्य पुलिस अधिकारी की हवाई दुर्घटना हो गयी (या करवा दी गयी)। क़यास लगते हैं कि अमरीका-सोवियत शीत-युद्ध की पहली गोलियों में एक पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाक़त ख़ान को लगी। यह हत्या एक अंतरराष्ट्रीय साजिश थी, जिसमें वे ब्रिटिश भी शामिल थे जिनकी प्रशासनिक पकड़ पाकिस्तान से खत्म नहीं हुई थी। हालांकि स्कॉटलैंड यार्ड की टीम बुलवा कर जाँच करने पर कुछ पक्के सबूत नहीं मिले।

लियाक़त अली ख़ान ने एक तरफ अमरीकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन से बीस बिलियन डॉलर की आर्थिक मदद मांगी थी, दूसरी तरफ़ वह सोवियत की यात्रा पर जाने की ऊहापोह में थे। उनकी हत्या वह ‘टर्निंग प्वाइंट’ थी, जिसके बाद सोवियत विकल्प खत्म हो गया। पाकिस्तान पूरी तरह अमरीका के चंगुल में आ गया। धीरे-धीरे अपनी ही फ़ौज के चंगुल में भी।

(क्रमश:)

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