पाकिस्तान एपिसोड 5

लोकतंत्र का दिया बुझने से पहले एक बार फड़फड़ाया। भारत में भले ही एक मजबूत विपक्ष के खड़े होने में दशकों लग गए, और एक पार्टी ही लगभग बिना किसी विरोध के जीतती रही; पाकिस्तान में मजबूत विपक्ष तैयार हुआ। मुस्लिम लीग, जिसने पाकिस्तान बनाया, अपने दो मुख्य नेताओं के मरते ही, बिखरने लगी। किंतु एक समस्या थी।

पाकिस्तान एक दशक तक गणतंत्र नहीं बना था, और ब्रिटिश डोमिनियन का हिस्सा था। तकनीकी तौर पर उसकी महारानी एलिजाबेथ थी, जैसे ऑस्ट्रेलिया या कनाडा की होती है। पाकिस्तान में गवर्नर जनरल और प्रधानमंत्री होते थे, मगर राष्ट्रपति नहीं। उसमें भी शक्ति का अजीबो-गरीब हिसाब-किताब था। एक गवर्नर जनरल प्रधानमंत्री बन गए। फिर एक अमरीका में राजदूत प्रधानमंत्री बन गए। फिर वह प्रधानमंत्री वापस अमरीका में राजदूत बन गए। पाँच साल में पाँच प्रधानमंत्री कहाँ से आए, कहाँ गए, जनता भी अस्पष्ट थी। मैंने यह जाँच कर देखा है। पढ़े-लिखे पाकिस्तानी भी लियाक़त अली ख़ान के बाद के प्रधानमंत्रियों के नाम बता नहीं पाते।

1956 में चौधरी मुहम्मद अली के समय पाकिस्तान आखिर एक गणतंत्र बना। एक कामचलाऊ संविधान तैयार हुआ, और इसकंदर मिर्ज़ा पहले राष्ट्रपति बने। उन्होंने अंग्रेज़ी को औपचारिक भाषा, ऊर्दू और बंगाली को राजभाषा घोषित किया। इसके साथ ही 21 वर्ष से अधिक उम्र के नागरिकों के लिए मताधिकार की व्यवस्था की। एक और काम यह किया कि पंजाब, सिंध, बलूच और खैबर-पख़्तून को एकीकृत कर पश्चिमी पाकिस्तान प्रांत बनाया। उसकी प्रांतीय राजधानी बनी लाहौर।

इस नए पश्चिम पाकिस्तान के पहले मुख्यमंत्री बने ख़ान अब्दुल जब्बार ख़ान। ख़ान साहब ने बंबई से डाक्टरी की पढ़ाई की थी, और अपने छोटे भाई ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान के साथ खुदाई ख़िदमतगार आंदोलन किया था। वह हजारीबाग जेल में भी रहे थे। वह उन व्यक्तियों में थे, जिन्होंने भारत-पाक विभाजन के समर्थन-पत्र पर हस्ताक्षर से इंकार कर दिया था। वह पठानों को भारत का हिस्सा बनना चाहते थे। उन्होंने अपनी रिपब्लिकन पार्टी बना कर मुस्लिम लीग को पश्चिम पाकिस्तान में हराया।

वहीं पूर्वी पाकिस्तान में एच. एस. सुहरावर्दी ने अपनी अवामी लीग बना ली थी। सुहरावर्दी गांधी के सहयोगी रहे थे। हालांकि कलकत्ता में जो भीषण दंगे हुए थे, उस समय वही बंगाल के मुख्यमंत्री थे। उनकी इच्छा तो यह थी कि पूरे बंगाल को ही अलग देश बनाया जाए, पाकिस्तान या भारत का हिस्सा न बने। वह इच्छा पूरी नहीं हुई, मगर मुस्लिम लीग को हरा कर वह पहले पूर्वी पाकिस्तान के मुख्यमंत्री बने; बाद में पूरे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बन गए।

इस तरह प्रांतीय चुनावों में मुस्लिम लीग की पूरे पाकिस्तान में ही हार हुई। यही तो लोकतंत्र की ख़ूबसूरती है कि जनता उस दल को भी गिरा सकती है, जिस दल ने देश का निर्माण करने में मुख्य भूमिका निभाई।

इस खूबसूरती पर अमरीका ने चोट करनी शुरू कर दी थी। पहले CIA ने 1953 में ईरान में लोकतांत्रिक प्रधानमंत्री का तख्तापलट करवाया। उसके बाद बग़दाद में एक सेना समझौता हुआ, जिसमें ईरान, इराक, तुर्की और पाकिस्तान ने एक साथ अमरीका से हाथ मिलाया। इसका नाम पड़ा CENTO. अब इजरायल को मिला कर पूरे मध्य एशिया पर अमरीका अपना जाल बिछा चुका था। इस पूरी सैन्य डील में जनरल अयूब ख़ान का बड़ा हाथ था। कबाब में हड्डी थे सुहरावर्दी सरीखे प्रधानमंत्री और पठान ख़ान अब्दुल जब्बार ख़ान।

9 मई 1958 को ख़ान साहब लाहौर में अपने बेटे के घर में अखबार पढ़ रहे थे। उनकी गोली मार कर हत्या कर दी गयी।

अब सुहरावर्दी की बारी थी।

(क्रमश:)

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[चित्र: ख़ान बंधु और नेहरू]

पाकिस्तान एपिसोड 4

पाकिस्तान को जोड़ रहा था इस्लाम, और तोड़ रही थी विविधता। हर प्रांत की संस्कृति भिन्न थी। पूर्वी पाकिस्तान तो खैर भोगौलिक दूरी भी अच्छी-खासी थी, और बीच में था भारत। अब पाकिस्तान के राजनयिक या फौजी दिल्ली से ट्रेन पकड़ कर कलकत्ता और ढाका कैसे जाते? हालांकि आम नागरिक सीमा पार कर भारतीय रेल पकड़ कर ही पूर्वी पाकिस्तान जाते थे। एक पाकिस्तानी व्यक्ति के अनुसार, यह काफ़ी महंगा पड़ता था, और कोई ज़रूरत भी नहीं थी। व्यापारी ट्रक भारत से गुजर कर ही पाकिस्तान जाते थे। मोहम्मद अली जिन्ना ने भारत के रास्ते एक 800 मील के पाकिस्तान अधिकृत कॉरीडोर की मांग की थी, मगर भारत इसके लिए कभी राजी नहीं हुआ। वल्लभभाई पटेल ने इस मांग पर कहा था, “यह एक खूबसूरत बकवास है, जिसे गंभीरता से नहीं लेना चाहिए”। बिहार-यूपी से गुजरती हुई, भारत को दो भागों में काटती एक पाकिस्तानी जमीन वाकई बेतुकी ही थी।

भाषा और संस्कृति की विविधता भारत में कहीं अधिक थी, मगर भारत ने एक जरूरी काम जल्दी कर लिया। संविधान का निर्माण। पाकिस्तान को संविधान बनाते-बनाते एक दशक लग गए, और जब बन कर तैयार हुआ, लोकतंत्र ही साफ हो चुका था। उससे पहले वह गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया ऐक्ट (1935) को ही संविधान रूप में प्रयोग करते थे, जिसके बाद कुछ अस्थायी व्यवस्था हुई। जो पाकिस्तान का संविधान अब मौजूद है, वह तो 1973 में ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो के समय बना। दशकों तक देश बिना संविधान के ही चलता रहा!

संविधान बनाने में एक समस्या थी। वह किस कानून से चलेंगे? इस्लाम धर्म के सदियों पुराने बनाए कानून से? या आधुनिक दुनिया के कानून से? मसलन भारतीय संविधान तो आधुनिक लोकतंत्र का टेक्स्टबुक संविधान था।

पाकिस्तान के मुसलमान पीढ़ियों से भारत में रहे थे, जहाँ हिन्दू, सिख और अन्य धर्मी भी उनके साथ रहते थे। उनकी तुलना अरब देशों के मुसलमानों से संभव नहीं थी। भले धर्म-आधारित राष्ट्रवाद से पाकिस्तान बना हो, शरिया कानून की ख़ास समझ सभी को नहीं थी। उन्होंने तो ब्रिटिश कानून देखा था।

यह भी ध्यान रहे कि एक बड़ा तबका तरक्कीपसंद पढ़े-लिखे मुसलमानों का था, जिनमें कई कम्युनिस्ट ख़यालातों के थे और इस लिहाज़ से धर्म को पूरी तरह समर्पित नहीं थे। नमाज़ी मुसलमान तो कम ही थे। हाँ! उन्होंने पढ़ सब रखा था। एक वाकया है कि फ़ैज अहमद फ़ैज जब जहल में थे, तो बाकी कैदियों को कुरान पढ़ाते। जेलर ने टोका कि आप तो ला-मज़हबी (नास्तिक) हैं, आपको कुरान-शरीफ़ की क्या समझ?

पूर्वी पाकिस्तान में तो लगभग बाइस प्रतिशत जनसंख्या हिन्दू थी, जबकि पश्चिमी पाकिस्तान में दो प्रतिशत से भी कम थी। ज़ाहिर है वहाँ इस्लाम संविधान लाना कठिन था। एक तरफ भाषा आंदोलन पहले से चल रहा था, यह दूसरी चोट तो देश ही हिला कर रख देती।

अमरीका के राष्ट्रपति आइजनहावर ने यह समस्या हल कर दी। एक बार जब अयूब ख़ान रक्षामंत्री बन गए, अमरीका ने करोड़ों डॉलर की राशि पाकिस्तान को इस शर्त पर देने का वादा किया, अगर वे साम्यवाद से लड़ने के लिए हाथ मिलाएँ। साम्यवाद से लड़ने का मतलब सोवियत से लड़ना तो था ही, उन तमाम तरक्कीपसंद विचारधारा के मुसलमानों से भी लड़ना था जिनके हाथ में पत्र-पत्रिकाएँ, अखबार, साहित्य जैसी चीजें थे। जिनके मन में एक आधुनिक लोकतांत्रिक पाकिस्तान था।

अमरीकी डॉलर ने पूर्वी पाकिस्तान के जूट उद्योग को भी छोटा बना दिया। अब उन्हें दबा कर रखना आसान था। अमरीका पाकिस्तान को उस तानाशाही में तब्दील करने वाला था, जहाँ यह कठिनता से हासिल आज़ादी खत्म हो जाएगी।

(क्रमश:)

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पाकिस्तान एपिसोड 3

पाकिस्तान ब्रिटिश भारत का एक छोटा हिस्सा था। वह अपने-आप में एक सिस्टम नहीं था कि उसको अलग करते ही गाड़ी चलने लगेगी। वहाँ की अर्थव्यवस्था हिन्दुओं के हाथ में थी, जो विभाजन के बाद भारत आ गए थे। रावलपिंडी एक बड़ा कैन्टोनमैंट जरूर था, मगर पूरी फौज मुसलमान फ़ौज तो थी नहीं। प्रशासनिक अधिकारियों की संख्या लें तो लगभग बारह सौ अफ़सरों में मात्र सौ मुसलमान थे, जिनमें से बीस ने पाकिस्तान जाने से इंकार कर दिया। इससे पहले कि बाकियों का मन बदलता, ‘ऑपरेशन पाकिस्तान’ के तहत ब्रिटिश हवाई जहाज भेज कर उन्हें दिल्ली से उठवाया गया।

ब्रिटिश भारत के लगभग पंद्रह हज़ार फैक्टरियों में हज़ार पाकिस्तान के हिस्से आए, लेकिन उनमें भी कईयों के मालिक हिन्दू या सिख ही थे। नए पाकिस्तान के हाथ में नकद भी नहीं था। जो धन का बंटवारा भारत से होना था, वह इस कारण कुछ समय अटका दिया गया कि वे कश्मीर में घुसपैठ पर न लगा दें।

पाकिस्तान के पास जो भी आर्थिक ताकत थी, वह पूर्वी पाकिस्तान में थी। वहाँ जूट के उद्योग थे। उनके भी प्रोशेसिंग कारखाने भारत के हिस्से चले गये थे, मगर पूर्वी पाकिस्तान काफ़ी हद तक पश्चिमी पाकिस्तान का पेट पालता रहा।

इन बंगालियों ने पाकिस्तान को पाला तो ज़रूर, मगर ये अंदर ही अंदर घुटने भी लगे। वे पाकिस्तान की आधी से अधिक आबादी थे, मगर गद्दी कराची में थी। उनके और पश्चिम पाकिस्तान के मध्य मात्र धर्म की डोर थी। यह डोर मजबूत थी, मगर जब भाषा की बात आयी तो यह डोर उलझ गयी।

मोहम्मद अली जिन्ना का मानना था कि पूरे देश को जोड़ने के लिए एक भाषा ज़रूरी है, जो ऊर्दू हो। वह आज़ादी के बाद एक ही बार ढाका गए, और यह बात कह आए। बंगाली इस मुद्दे पर अड़ गए कि बंगाल में तो बंगाली चलेगी, उर्दू नहीं।

दरअसल, जिन्ना या लियाक़त अली ख़ान स्वयं पाकिस्तान क्षेत्र से नहीं थे। उनके लिए भी वहाँ की भाषा और संस्कृति उतनी ही अनजान थी, जितना बिहार-यूपी से आए मुसलमानों के लिए। वह पंजाबी, बंगाली या सिंधी कैसे बोल पाते? वह तो गुजरात के होकर भी गुजराती बोलने में लड़खड़ाते थे। उनकी तालीम अंग्रेज़ी में थी, और उर्दू भी अंग्रेज़ीदा अंदाज़ में बोलते थे। उनकी एक तक़रीर पाकिस्तान में तीस वर्ष तक प्रतिदिन प्रसारित हुई, जिसमें वह कहते हैं,

“आप सब आज़ाद हैं अपने मंदिरों में जाने के लिए। आप सब आज़ाद हैं अपने मस्जिदों में जाने के लिए। आप सब आज़ाद हैं किसी भी इबादतगाह में जाने के लिए।”

(1977 में किसी ने यह तक़रीर ही गायब कर दी, और प्रसारण रुक गया। अब यूट्यूब पर मिल जाएगी।)

जिन्ना की मृत्यु और लियाक़त अली ख़ान की हत्या के बाद पाकिस्तान संभालने लायक कोई बचा नहीं। अगले प्रधानमंत्री एक बंगाली ख़्वाजा निज़ामुद्दीन बनाए गए। बंगालियों को लगा कि अब उनकी बात मान ली जाएगी। मगर वह भी बंगाल जाकर कह आए कि उर्दू ही भाषा रहेगी। पंजाबी, सिंधी, बलोच, कश्मीरी, पख़्तून तो उर्दू के लिए जैसे-तैसे मान (?) भी गए, बंगाल के लिए यह मुद्दा पाकिस्तान को दो टुकड़ों में बाँटने की चिनगारी बन गया। 

एक विद्यार्थी शेख़ मुजीब-उर-रहमान को छात्रों को भड़काने के जुर्म में जेल भेजा गया। 21 फरवरी 1952 को ढाका के छात्रों पर गोली चलायी गयी, और उनमें आठ छात्रों के शहीद होते ही बंगाल जल उठा। प्रधानमंत्री निज़ामुद्दीन को हटा कर दूसरे बंगाली मोहम्मद अली बोगरा को प्रधानमंत्री बनाया गया। उन्होंने हालात देखते हुए सेनाध्यक्ष अयूब ख़ान को रक्षा मंत्री बना दिया। इस तरह पाकिस्तानी सेना का वहाँ की राजनीति में रेड कारपेट बिछा कर स्वागत हुआ।

अमरीका भी यही चाहता था।

(क्रमश:)

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पाकिस्तान एपिसोड 2

“स्कूली इतिहास में यह पढ़ाया जाता है कि कौन सी घटना कब घटी, कहाँ घटी। लेकिन, यह बात कम पढ़ाई जाती है कि अमुक घटना क्यों घटी? कहाँ ग़लती हुई?”

यह कथन एडॉल्फ हिटलर लिखित ‘मीनकैम्फ़’ से है, लेकिन बात ठीक लगती है। मैं पाकिस्तान के इतिहास में हिटलर को यूँ ही नहीं ला रहा। बल्कि, इस इतिहास के मुख्य पात्रों में जगह दे रहा हूँ।

आखिर 1947 के दो दशक पूर्व ही क्यों पाकिस्तान की मांग उठी? अलग मुस्लिम देश तो पहले भी बन सकता था। अगर दोनों धर्म पिछली सदियों में कभी भी साथ रहने के लिए उपयुक्त नहीं थे, तो पहले ही बंटवारा हो गया होता। यह तर्क दिया जा सकता है कि पहले मुगल शासन था, इसलिए अल्पसंख्यक होने के बावजूद मुसलमानों को अलग देश की जरूरत नहीं पड़ी।

लेकिन, इस तर्क को भारत तक सीमित रख कर बात पूरी नहीं होती। दुनिया में क्या चल रहा था? सभी अचानक अपनी-अपनी जमीन क्यों तलाशने लगे?

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद साम्यवाद और नाज़ीवाद, दोनों का उदय हुआ। दोनों ही विचार भारत में आए, और दोनों के अपने-अपने प्रभाव पड़े।

1930 से ‘टू नेशन थ्योरी’ खुल कर आनी शुरू हुई, जब हिटलर का कद बढ़ रहा था। पूरी दुनिया में ‘पितृभूमि’ (फादरलैंड) और ‘शुद्ध नस्ल’ जैसे शब्द ज़बान पर आने लगे थे। ‘पाकिस्तान’ शब्द के निर्माता चौधरी रहमत अली नाज़ीवाद से इतने प्रभावित थे, कि उनको हिटलर के कई वाक्य कंठस्थ थे। जिस वर्ष हिटलर जर्मनी के चांसलर बने, उसी वर्ष उन्होंने शुद्ध मुसलमान देश पाकिस्तान के पैम्फ्लेट बाँटने भी शुरू कर दिए।

अपने-अपने नस्लों, अपने धर्मों, अपने हज़ारों वर्ष पुराने पुरखों की जमीन तलाशना और एकजुट होना। हिन्दुत्व शब्द द्वारा हिन्दुओं को एकजुट करना, मुस्लिम लीग द्वारा मुसलमानों को एकजुट करना, यहूदियों का सियोनवाद। यूरोप के अलग-अलग ईसाई समूहों का जर्मन, पोल, रोमाँ, फ्रेंच आदि में पृथक्करण। बाहरी नस्लों को अपने देश से बाहर निकालना। सब साथ ही शुरू हुआ और द्वितीय विश्व-युद्ध तक अपने विकराल रूप में आ गया। न सिर्फ यूरोप में, बल्कि भारत जैसे देशों में भी।

रहमत अली युवा ख़ून थे, हिटलर से प्रभावित हो गए, कोई अजूबी बात नहीं। उस समय जर्मनी और हिटलर ही उगता सूरज था। मोहम्मद अली जिन्ना के विचारों में द्वंद्व है। एक तरफ तो इस्लाम देश की कामना दिखती है, वहीं दूसरी तरफ एक भय भी दिखता है कि अंग्रेज़ों के जाने के बाद मुसलमानों के साथ क्या होगा। क्या वही स्थिति होगी जो यूरोप में यहूदियों की हुई? यहूदियों ने अपनी जमीन तलाश ली, मगर भारतीय मुसलमान कहाँ जाएँगे? उनकी पितृभूमि आखिर है कहाँ? वे तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी भारतीय ही हैं।

भय से हुआ, या बल से। युद्ध से हुआ, या कूटनीति से। महज दो दशकों में ऐसे कट-छँट कर नस्ल-धर्म आधारित देश तैयार हो गए। युद्ध के बाद पश्चिम एशिया की एक सीमा पर यहूदियों का देश इज़रायल और दूसरी सीमा पर मुसलमानों का देश पाकिस्तान बना।

कुछ देश ऐसे बच गए, जिनमें यह नाज़ीवाद का भूत मंडरा कर कहीं कोने में पड़ा रह गया। जहाँ इंद्रधनुषी लोकतंत्र कायम रहा। अफ़सोस उनमें से एक पाकिस्तान नहीं था, जिसकी कीमत उसे बार-बार चुकानी पड़ी।

कंपनी बाग, जहाँ लियाक़त अली ख़ान को गोली लगी, उसका नामकरण लियाक़त बाग़ किया गया। इत्तफ़ाकन पाँच दशक बाद उसी बाग़ में बेनज़ीर भुट्टो की भी हत्या कर दी गयी। लियाक़त अली ख़ान को गोली एक अफ़ग़ान व्यक्ति ने मारी, जो पाकिस्तान में राजनैतिक शरणार्थी था। वह ऐबटाबाद में उसी इलाके में सरकारी खर्च पर रहता था, जहाँ बरसों बाद बिन लादेन को शरण दी गयी।

इससे पहले कि वह पकड़ा जाता और कुछ कहता, उसे उसी वक्त गोली मार दी गयी। केस की जाँच कर रहे मुख्य पुलिस अधिकारी की हवाई दुर्घटना हो गयी (या करवा दी गयी)। क़यास लगते हैं कि अमरीका-सोवियत शीत-युद्ध की पहली गोलियों में एक पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाक़त ख़ान को लगी। यह हत्या एक अंतरराष्ट्रीय साजिश थी, जिसमें वे ब्रिटिश भी शामिल थे जिनकी प्रशासनिक पकड़ पाकिस्तान से खत्म नहीं हुई थी। हालांकि स्कॉटलैंड यार्ड की टीम बुलवा कर जाँच करने पर कुछ पक्के सबूत नहीं मिले।

लियाक़त अली ख़ान ने एक तरफ अमरीकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन से बीस बिलियन डॉलर की आर्थिक मदद मांगी थी, दूसरी तरफ़ वह सोवियत की यात्रा पर जाने की ऊहापोह में थे। उनकी हत्या वह ‘टर्निंग प्वाइंट’ थी, जिसके बाद सोवियत विकल्प खत्म हो गया। पाकिस्तान पूरी तरह अमरीका के चंगुल में आ गया। धीरे-धीरे अपनी ही फ़ौज के चंगुल में भी।

(क्रमश:)

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पाकिस्तान एपिसोड 1

दरबार-ए-वतन में जब इक दिन सब जाने वाले जाएँगे
कुछ अपनी सज़ा को पहुँचेंगे, कुछ अपनी जज़ा ले जाएँगे

  • फ़ैज अहमद फ़ैज

16 अक्तूबर, 1951. कंपनी बाग़, रावलपिंडी

लियाक़त अली ख़ान उस दिन जब एक लाख की भीड़ को संबोधित करने मंच पर जा रहे थे, तो उन्हें अपने सामने पूरा पाकिस्तान दिख रहा था। वह स्वप्न जो उन्होंने, मोहम्मद अली जिन्ना, सुहरावर्दी, अल्लामा इकबाल और तमाम लोगों ने साथ देखा था। ब्रिटिश भारत के मुसलमानों के लिए एक देश की।

लेकिन, यह पाकिस्तान शब्द जन्मा कैसे?

भारत में मुसलमान हज़ार वर्षों से रह रहे थे, लेकिन यह शब्द उनकी जबान पर नहीं आया। ख़िलाफ़त के समय भी अगर मुस्लिम दुनिया की बात चली, तो भी पाकिस्तान शब्द नहीं उभरा। 1933 में लंदन में बैठे एक युवक चौधरी रहमत अली के मन में यह Pakstan शब्द पहली बार आया। शायद इससे एक पाक (पवित्र) स्थान का बोध होता हो? मगर यह ऊर्दू और संस्कृत शब्दों की संधि कैसे हो गयी?

रहमत अली ने भी ‘पवित्र स्थान’ नहीं सोचा था। उनके अनुसार यह एक एक्रोनिम था। P से पंजाब, A से अफ़गान (खैबर-पख्तून), K से कश्मीर, S से सिंध और Stan से बलूचिस्तान। बाद में लोगों को लगा कि बोलने के लिए एक बीच में ‘I’ घुसेड़ना जरूरी है, तो बना Pakistan। लेकिन बंगाल का क्या? उसके लिए तो अक्षर ही नहीं। रहमत अली ने कहा था कि बंगस्तान (बंगाल) और ओस्मानिस्तान (हैदराबाद) दो अन्य मुसलमान देश बन जाएँगे।

मुस्लिम लीग ने इस शब्द को तो अपना लिया मगर रहमत अली को ख़ास तवज्जो नहीं दी। बाद में जब विभाजन के बाद वह बोरिया-बिस्तर लेकर नए पाकिस्तान में लौटे तो नाराज़ हो गए कि मेरा मॉडल नहीं अपनाया गया। गुस्से में उन्होंने कायद-ए-आजम को ‘क्विसलिंग-ए-आजम’ कह दिया। (क्विसलिंग एक नॉर्वे के गद्दार थे जो नाजियों से मिल गए थे। बाद में यह शब्द लियाक़त अली ख़ान ने शेख़ अब्दुल्ला के लिए प्रयोग किया।)

ज़ाहिर है रहमत अली का सारा बोरिया-बिस्तर छीन कर, उनको देशनिकाला दे दिया गया। वह लंदन में ही कुछ साल बाद मर गए। जिन्होंने पाकिस्तान शब्द दिया, उनका तो यह हश्र हुआ। कायद-ए-आजम रोगग्रस्त होकर भी यथासंभव प्रशासन की ज़िम्मेदारी अपने कंधे पर उठाते रहे। मगर 1948 में ही उनकी मृत्यु हो गयी।

लियाक़त अली ख़ान अब पाकिस्तान के सर्वेसर्वा थे। ऐसे पाकिस्तान के, जहाँ का पंजाब विभाजन के बाद दो खंडों में बँट चुका था, पख़्तून और बलूच अपनी स्वतंत्रता चाह रहे थे। बंगालियों को उन पर थोपी गयी राजभाषा ऊर्दू से कोई सरोकार था नहीं। और कश्मीर? जिस तरह नेहरू पर कश्मीर गंवाने का आरोप भारत में लगता रहा, लियाक़त अली ख़ान पर यह आरोप पाकिस्तान में हमेशा लगता रहेगा।

उस दिन कंपनी बाग में उनके सामने बैठे एक व्यक्ति ने उनकी छाती में दो गोलियाँ दाग दी। पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री का अंत कुछ यूँ सर-ए-आम हुआ।

भला एक देश के संस्थापक की हत्या उसके देशवासी क्यों करना चाहेंगे? हाँ! कश्मीर गंवाने की नाखुशी अवाम में ज़रूर थी।

कुछ ही महीनों पहले इसी रावलपिंडी में एक षडयंत्र हुआ, जहाँ तख्तापलट की साजिश हुई थी। सभी षड्यंत्रकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया, जिनमें शामिल थे मेजर जनरल अकबर ख़ान, उनके कुछ अन्य फौजी सहयोगी, पाकिस्तान कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव सय्यद सज्जाद ज़हीर, और……म़शहूर शायर फ़ैज अहमद फ़ैज।

(क्रमश:)

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पाकिस्तान

भूमिका

पाकिस्तान का इतिहास हमने कहाँ पढ़ा है? भारतीयों ने बहुधा भारत में पढ़ा होगा। पाकिस्तानियों ने पाकिस्तान में। अन्य देश के लोगों ने किसी अंग्रेज़ी किताब या अनुवाद में पढ़ा होगा।

भारत में वर्तमान पाकिस्तान क्षेत्र का इतिहास विस्तार से पढ़ाया गया है, जिसमें सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर विभाजन तक का विवरण है। उसके बाद वह चूँकि भारत का हिस्सा नहीं रहा, तो उस देश का इतिहास भी स्कूली इतिहास में कुछ भारत-पाक युद्धों और साधारण राजनैतिक खाके तक सिमट गया।

पाकिस्तानी विद्यालयों में इतिहास विषय को भारत की ही तरह ‘समाज विज्ञान’ के अंतर्गत ले आया गया। वहाँ यह आठवीं कक्षा तक मु’असराती-उलूम (सोशल स्टडीज़) के अंतर्गत और नौवीं कक्षा से मुताला-ए-पाकिस्तान (पाकिस्तान स्टडीज़) विषयों के रूप में पढ़ाया जाता है। वहाँ भी अलग-अलग प्रांतों के अपने पाठ्यक्रम शिक्षा मंत्रालय द्वारा जाँच कर स्कूलों के लिए निर्गत किए जाते हैं। इन किताबों में पाकिस्तान देश के इतिहास के अतिरिक्त प्रांतीय इतिहास भी शामिल किया जाता है, जैसे पंजाब, सिंध आदि।

इस बात पर अनेक लेख मिल जाएँगे कि किस तरह भारत में पढ़ाया जाने वाला पाकिस्तान का इतिहास, और पाकिस्तान में पढ़ाया जाने वाला भारत का इतिहास, एक-दूसरे के विलोम हैं। ऐसे पड़ोसी देश जिनके विभाजन से अब तक संबंध बिगड़े ही हुए हैं, इस तरह का विरोधाभास स्वाभाविक है। 2019 में पाकिस्तानी अखबार ‘डॉन’ के लेख से पहले भारत के अरुण शौरी और पाकिस्तान के के. के. अजीज अपनी-अपनी पुस्तकों में विस्तार से पाकिस्तान में पढ़ाए जा रहे विकृत इतिहास पर भौहें सिकोड़ चुके हैं।

तीसरा इतिहास जो यूरोप-अमरीका के लोगों तक पहुँचा, वह क्या कहता है? वह इतिहास इस भारत-पाकिस्तान द्वंद्व से इतर भी लिखा गया, और केंद्र में रख कर भी। यह संभव है कि उन्होंने दोनों देशों के इतिहासकारों को पढ़ कर राय बनायी होगी। यह भी संभव है कि वे पाकिस्तान में घूम कर या कुछ समय बिता कर इतिहास लिखते होंगे। या यह संभव है कि उन्हें उतना ही मालूम होगा, जितना उन्हें बताया गया होगा। अमूमन मूल स्थान के लोग बाहरी लोगों द्वारा लिखे इतिहास को ‘टिप ऑफ आइसबर्ग’ कह कर ख़ारिज कर देते हैं।

एक भारतीय होने के नाते मेरे लिए पाकिस्तान का इतिहास या उसका एक अंश लिखना इसलिए कठिन है क्योंकि मैं कभी पाकिस्तान गया नहीं। चूँकि मैं इतिहासकार नहीं, इसलिए मेरा प्रशिक्षण भी नहीं। मगर एक विद्यार्थी होने के नाते इन तीनों दृष्टियों से गुजरते हुए सवाल रखना आसान है। उदाहरणस्वरूप, पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की पहली कक्षा की किताब के सोलहवें पन्ने पर एक प्रश्न लिखा है- पाकिस्तान किसने बनाया?

उत्तर है- कायद-ए-आजम ने

अगर भारत के पहली कक्षा (पाँच-छह वर्ष) के बच्चे से यही प्रश्न पूछा जाए कि भारत किसने बनाया तो, क्या वह जवाब दे पाएगा/पाएगी?

क्या पाकिस्तान के लिए भी यह प्रश्न इतना सरल है?

(क्रमश:)

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