दक्खिनी हिन्दी

दक्खिन के कई मुसलमान दखिनी हिंदी बोलते हैं। इसे दखिनी ऊर्दू भी कहते हैं, पर मूलत: यह दखिनी हिंदी और दखिनी ऊर्दू एक ही है। कहते हैं दखिनी के अंतिम कवि हुए वली औरंगाबादी, और वही ऊर्दू के पहले कवि भी हुए।

यह बातें आज मेरे एक मलयाली मित्र के पिता ने बताई। वो मेरी हिंदी किताब एक दिन में निपटा गए। वाजपेयी जी से ‘श्रम श्री’ पुरस्कार पा चुके हैं, और उनकी लिखी कविताएँ भी सुना गए। उनके घर गया तो सब मलयाली फिल्म देख रहे थे। छोटे बच्चे हिंदी में बतिया रहे थे, वो भी नॉर्वे में। यह कई हिंदू परिवारों में देखने को नहीं मिलता। पर दक्खिन के कई मुस्लिम परिवारों की मातृभाषा आज भी दखिनी ही है। चाहे कहीं भी हों।

दखिनी ख़ालिस ऊर्दू नहीं है, खड़ी बोली के करीब है। हैदराबादी भाषा इसी का एक रूप है।

मेरे कू, तेरे कू, साहिब लोगाँ, चपाती बनाको दूँ? कायकू जायींगा?

हैदराबाद में इसमें अनुनासिका का उपयोग शायद खूब होता है। तमिल और मलयाली मुसलमानों में नाक का उपयोग बोली में कम है।

दरअसल कर्नाटक के कई हिस्से जो निजाम के अंदर थे, और वो हिस्से जो आदिल शाह के अंदर थे, वहाँ मुसलमानों में दखिनी का प्रभाव रहा। उन्होनें कन्नड़-तेलुगु भी सीखा, पर मातृभाषा दखिनी ही रही, जिसे वो ऊर्दू कहते हैं। पर लखनवी ऊर्दू के सामने यह कहीं से ऊर्दू नहीं नजर आती। ऊर्दू लिपि भी तमिल और मलयाली मुसलमान नहीं समझ पाते। देवनागरी पढ़ गए।

हालांकि यहाँ एक दूसरा वर्ग भी है जो यमन-अरब से व्यापारी बन कर आए और यहीं बस गए। वो अब स्थानीय भाषा बोलते हैं। जैसे अब्दुल कलाम तमिलभाषी थे। इसी तरह मैंगलूरू के बेयरी भाषी लोग। पर फिर भी बड़ा प्रतिशत हिंदी भाषी ही है।

गर हिंदी भाषियों की गिनती करनी हो, तो इन दखिनी मुसलमानों को भी गिनना चाहिए।

(दखिनी = दक्कनी = दक्खिनी)

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