एक प्रवासी भारतीय के लिए कोरोना वायरस

(ये लेख 15 से 23 मार्च, 2020 के मध्य अलग-अलग स्तंभ में लिखे गए)

अब यह लिखना जरूरी लगा, तो कुछ बिंदु रख देता हूँ। भारत की अर्थव्यवस्था खुली होकर भी यह एक बंद देश है। इसके आस-पास दूर-दूर तक कोई लोकतंत्र नहीं। हम कोरोना के गर्भ चीन से सबसे लंबी सीमा रखते हैं, लेकिन वहाँ यूँ ही चहल-कदमी करते तो क्या, ट्रेन से भी आना-जाना संभव नहीं। पाकिस्तान, म्यांमार और बांग्लादेश तक से वही हालात हैं। इसलिए इसकी तुलना यूरोपीय देशों से नहीं हो सकती, जहाँ ‘ओपेन बॉर्डर’ है, बिना पूछ-ताछ, बिना वीसा। यही वजह रही कि चीन से चले वायरस को काफी हद तक ईरान, यूरोप, अरब और अमरीका के रास्ते घूम-फिर कर भारत आना पड़ा। लेकिन, अब तो आ गया। अब आगे क्या?

आगे यह कि इसका प्रभाव उन्हीं स्थानों से शुरू हुआ, जहाँ विदेश आवागमन अधिक है, जैसे बंबई, पुणे, बेंगलुरू, केरल, दिल्ली। इतने में हवाई रास्ता बंद कर दिया गया, लेकिन अंदाज़न हज़ार लोग आ ही गए होंगे। उनमें से सवा सौ अब तक (मार्च 17) पॉजिटिव आ गए। यह लॉट जाँचने में वक्त लगता है, क्योंकि कई लोग शुरू-शुरू में स्वस्थ ही रहते हैं। लेकिन सोचिए! अमरीका से बीस घंटे हवाई जहाज में बैठ कर कोई आदमी मुंबई/पुणे पहुँचा, और उसमें कोरोना निकला। तो क्या इतने लंबे सफर में एक भरे हुए हवाई जहाज और हवाई अड्डे में किसी और को न पसरा होगा? यही यूरोपीय देशों में भी हो रहा है कि पहले दस दिन तो उनको ढूँढते ही निकल जाता है, जो हवाई जहाज से यह लेकर आए थे। उन दस दिनों में लगभग हज़ार-डेढ़ हज़ार ढूँढ लिए जाते हैं। भारत में भी अगले हफ्ते तक मिल ही जाएँगे। भाग कर कहाँ जाएँगे?

उसके बाद भारत में बीमारी का पसार इटली, ईरान या चीन जैसे सघन देशों जैसा ही माना जा सकता है। पहले ही कुछ दिनों में 3 प्रति 100 का मृत्यु-आँकड़ा आ चुका है, जो बाकी के विश्व-औसत से अधिक है। उत्तरी यूरोप मे यह फ़िलहाल 3 प्रति हज़ार चल रहा है। इस गति से भारत में मृत्यु की संख्या तेज गति से बढ़ सकती है। हाँ! यह जरूर है कि इसे उड़ीसा के एक गाँव या हिमाचल के किसी सुदूर इलाके में पहुँचने में वक्त लगेगा, लेकिन मुख्य स्थानों और महानगरों में तो यह पहुँच ही जाएगा। यह भी एक विडंबना है कि पैन्डेमिक का आखिरी छोर विश्व के दूसरी सबसे बड़ी जनसंख्या वाले देश में है। क्योंकि बाकी कई देश अब धीरे-धीरे रिकवरी फेज तक पहुँचते जा रहे हैं। भारत अभी सबसे क्रिटिकल स्थिति में है, जबकि एक आभास हो रहा है कि हम बच जाएँगे, हमारी स्थिति दुनिया में सबसे अच्छी है। यह तो पैन्डेमिक का पैटर्न ही है कि एक समय में कहीं ज्यादा, कहीं कम होता है। यह चलायमान होता है। और इसका संकेत है कि जहाँ पहला केस देर से मिलना शुरू हुआ, उसकी स्थिति सबसे चिंताजनक है।

इसमें सरकार भी ख़ास मदद नहीं कर सकती, यह राष्ट्रीय चेतना से भले संभव है। लेकिन, कोई घर से निकले ही नहीं, मिले ही नहीं, बाज़ार ही न जाए, ट्रेन-बस में न चढ़े, यह भारत में असंभव है। ऐसे में राष्ट्रीय चेतना का मतलब यह होता है कि हम खुद को समुदाय में लाएँ। सभी निजी स्वास्थ्य-केंद्र सहयोग दें। जिनको हल्की बीमारी हो, उम्र कम हो, वे अस्पताल के बेड न भरें। युवक इसके लिए भी तैयार रहें कि स्वास्थ्य-वॉलंटियर बनना पड़े, और आप निश्चिंत रहें, विश्व भर में युवक लगभग इस बीमारी से सुरक्षित हैं। तमाम स्वास्थ्य-कर्मी काम कर ही रहे हैं, और फिट हैं। यह वृद्ध और पहले से बीमार लोगों के लिए ही घातक है, जिनकी संख्या देश में करोड़ों में है। उनकी रक्षा के लिए अस्पताल या सरकार नाकाफ़ी ही रहेगी, कहीं की भी।

यह बीमारी अब चिकित्सकीय नहीं, आर्थिक समस्या बन चुकी है। पूरी दुनिया मानव-इतिहास में इस तरह कभी बंद नहीं हुई।

कोरोना अंडर-टेस्टिंग और ट्रायज

जब सूरत में महामारी आयी तो आपदा-प्रबंधन चिकित्सक टीमों को यह स्पष्ट निर्देश था कि ‘ट्रायज’ प्रणाली अपनानी है। यह किसी भी आपदा (युद्घ/भूकंप/महामारी) के लिए लागू है। इसका अर्थ यह है कि चिकित्सक जरूरतमंदों को अलग-अलग समूहों में बाँटते हैं। पहला, जिसे हल्की बीमारी है; दूसरा, जिसे गंभीर बीमारी है लेकिन बचने की उम्मीद है; तीसरा, जो मरणासन्न है और बचने की उम्मीद कम है। इसमें किसे पहले लिया जाएगा?

दूसरे समूह को प्राथमिकता मिलेगी। तीसरे को मरने छोड़ दिया जाएगा। पहले को घर भेज दिया जाएगा। यही अंतरराष्ट्रीय प्रोटोकॉल है।

आप चाहे ब्रीच कैंडी अस्पताल पहुँच जाएँ, वहाँ एक आइसीयू में पचास वेंटिलेटर की उम्मीद नहीं। दो से चार वेंटिलेटर प्रति आइसीयू, एक बढ़िया आइसीयू है। अब महामारी में क्या करेंगे? महामारी तो छोड़िए, साधारण स्थिति में भी जब बीस-बीस दिन तक वेंटिलेटर पर मरीज रहते हैं और कोई गंभीर जरूरतमंद आ जाता है तो चिकित्सक ‘डू नॉट वेंटिलेट’ लिखवाने के लिए समझाना शुरू कर देते हैं। कि भाई! यह तो बीस दिन से रिकवर नहीं कर पा रहे, वेंटिलेटर अब हटा दिया जाए? मरीज के परिजनों के मानते ही, हटा दिया जाता है। यूरोप में यह निर्णय चिकित्सक और सिर्फ एक निकटतम परिजन मिल कर करते हैं। आपदा के समय यह प्रतिबद्धता भी नहीं। हाँ! इसमें अनैतिक है अगर किसी नेताजी या वीआइपी को वेंटिलेटर और सुविधाएँ दी गयी, और जरूरतमंद को नहीं दी गयी। यह न किया जाए।

यही संसाधन-प्रबंधन टेस्टिंग पर भी लागू है। टेस्टिंग-किट बचा कर चलना है। बूथ नहीं खोलने कि लाइन लगा कर जाँच करा लो। जो स्वास्थ्यकर्मी रोज कोरोना मरीजों से संपर्क में हैं, और उन्हें सर्दी-खाँसी हो गयी है, वह भी जाँच नहीं करा रहे। इसलिए कि मरीजों के लिए किट उपलब्ध रहे। वे स्वयं अदल-बदल कर क्वारांटाइन में जा रहे हैं। अब नियम यह आया है कि तीन दिन बाद अगर वह स्वस्थ महसूस कर रहे हैं तो वापस काम पर आ जाएँ। इसी सहयोग की सबसे अपेक्षा है। अपना ट्रायज स्वयं करें कि आपकी जरूरत कितनी है। अगर आपके बचने के चांस 98 % हैं तो क्या वाकई आप पर टेस्ट और अस्पताल का खर्च उठाया जाए, या आप घर बैठें और दूसरों से दूरी बना कर रखें?

यह निर्मम या क्रूर निर्णय नहीं है, यह एक दूसरे को बचाने का संघर्ष है। और यह आज नहीं शुरू हुआ।

कॉन्टैक्ट-ट्रेसिंग

जो विदेश से आए, उनकी कुंडली निकाली जाए। स्कैंडिनैविया में पिछले दस दिन से यही चल रहा है। सभी फ्लाइट की लिस्ट निकाल कर उसके यात्रियों की कुंडली निकाल कर जाँच चल रही है। आप अगर फॉलो कर रहे होंगे तो दिखेगा कि सभी स्कैंडिनैवियाई देश कोरोना जाँच में सबसे आगे चल रहे हैं। फलत: उनकी गिनती भी सबसे तेज गति से बढ़ रही है। लेकिन मृत्यु-दर बहुत कम है। यह ‘कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग’ है। आप अगर किसी मित्र या परिजन को जानते हैं, जो विदेश से आया, उसकी खबर करें। उसे अपने स्तर पर क्वारांटाइन कर दें।

नॉर्वे में तो खैर क्वारांटाइन से भागने पर 2000 डॉलर फाइन या जेल का नोटिस निकल चुका है। अब तक 28500 लोगों की जाँच पूरी हो चुकी है, जिनमें पंद्रह सौ में वायरस पाया गया। उनके सभी कॉन्टैक्ट को घरबंद कर दिया गया। चार बुजुर्गों की मृत्यु हुई। 90 % लोग फिट हैं। जितने जाँचे गए, उनमें भी लगभग 80 % के अंदर वायरस नहीं मिला। अभी भी ढूँढा जा रहा है कि कोई रह तो नहीं गया।

यह सबसे सहज तरीका है, जब संक्रमण को उसके पहले ‘चेक-प्वाइंट’ पर रोका जा सकता है। केरल ने बेहतरीन तरीके से यह कुंडली निकाली और संक्रमण पर रोक लगायी। अब कर्नाटक यह मॉडल अपना रहा है। उड़ीसा ने विदेश से लौटने वालों के ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन का एक साइट बनाया है। वहीं दिल्ली हवाई-अड्डे पर आज देखा कि हंगामा हो गया। लोग जाँच कराने को तैयार नहीं। यह सरकार के साथ-साथ हमारी जिम्मेदारी है कि अपने बीच में से उन लोगों को मार्क करें, और उनके सभी कॉन्टैक्ट को। एयरलाइन्स तो यह डाटा दे ही चुकी होगी, लेकिन देश विशाल है। लोग कहाँ-कहाँ पसर गए होंगे। ईरान से आया वायरस लद्दाख़ में जाकर मिला। इसी तरीके से। कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग से।

भारत का समाज तो बहुत ही घना समाज है। हर व्यक्ति को पूरे मुहल्ले की खबर रहती है। यहाँ यह सुलभ है। यूरोप वाली बात नहीं कि पड़ोस की भी खबर नहीं। इस गुण को अब प्रयोग में लाने का वक्त है। यह मुखबिरी संक्रमण रोक लेगी।

संक्रमण में सबसे अधिक घातक है, वह स्वस्थ व्यक्ति जिसमें कोई लक्षण न हो, लेकिन वायरस पाल रहा हो। उस छुपे रुस्तम को पकड़ने का यही एक माध्यम है।

समुदाय चेतना

यह मानव-संस्कृति का हिस्सा रहा है, जो छोटे-बड़े कार्य से लेकर आपदा तक के लिए प्रयोग में रहा है। इसका फॉर्मैट साधारण है। एक समुदाय एक लक्ष्य तय करता है, जैसे बाढ़ के समय टूटे पुल की मरम्मत करनी है। हर उम्र के लोग जमा होते हैं, सामान इकट्ठा किए जाते हैं, वहीं साझा चूल्हा पर खाना बन रहा होता है, गीत गा रहे होते हैं और पुल बन रहा होता है। बिहार के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में यह (कन्सार) आम है। सरकारी मदद तो जब आएगी, तब आएगी। शायद कभी न आए।

यूरोपीय देशों में यह विश्व-युद्ध के समय शुरू हुआ, जब राज्याध्यक्ष हिटलर के आक्रमण से भाग गए, सरकार रही नहीं, और जनता ने खुद ही मिल कर कार्य संभालने शुरू किए। यह प्रथा नॉर्वे में ‘दुग्नाद’ कहलाती है। इसमें लोगों को एक नोटिस आ जाता है कि आज मुहल्ले के सभी गिरे पेड़ हटा कर किनारे करने हैं और सफाई करनी है। यह कहने के लिए स्वैच्छिक है, लेकिन, यह होता अनिवार्य है। आप चाहे कितने भी अमीर हों, आपको फावड़ा, बड़े झाड़ू लेकर पहुँचना ही है। वहाँ खाने-पीने का इंतजाम भी सब मिल कर करेंगे, संगीत बजेगा, और काम होगा। हद तो यह है कि सरकारी स्कूलों के मैदान और कैम्पस की अर्धवार्षिक सफाई भी सरकार नहीं करती, सभी अभिभावक मिल कर करते हैं। यही सालों से प्रथा चली आ रही है।

लगभग एक हफ्ते पहले नॉर्वे की प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय दुग्नाद की घोषणा कर दी। ऐसा दशकों से नहीं हुआ था। इसका अर्थ ही है कि अब सरकार बस सहायक भूमिका निभाएगी, कार्य तो जनता को ही करना है। अब फेसबुक का जमाना है तो वहाँ भी कैम्पेन शुरू हो गए, लक्ष्य दिए जाने लगे। उन्हीं में एक लक्ष्य है कि एक भी क्वारांटाइन घर से निकलने न पाए। मुहल्ले वाले यह सुनिश्चित करें, जरूरत हो तो पुलिस को खबर करें। उनको राशन-पानी की जरूरत हो तो लाकर देते रहें, लेकिन घर से निकलने न दें। और अब नया लक्ष्य मिला है कि जितने भी स्वास्थ्य में थोड़े-बहुत भी अनुभव वाले लोग हैं, वे रजिस्टर करें। यह मास-मेसेज सरकार की तरफ से सबको मिल गया।

अब इसमें यह नहीं कह सकते कि यह मेरी जिम्मेदारी नहीं, सरकार की है। सरकार की भूमिका बस कोऑर्डिनेशन की है। और उन हज़ारों लोगों की मदद, जिन्हें नौकरी से निकाला जा रहा है। निजी अस्पतालों ने जब अपने द्वार खोल दिए हैं, तो उनके होने वाली आर्थिक हानि में भी सरकार कुछ मदद कर रही है। लेकिन, कुल मिलाकर सामुदायिक चेतना का अर्थ यही है कि अब सरकार भी इस समुदाय का हिस्सा ही है। उसे भी हमें ही बचाना है। यह राष्ट्र-आपदा ही नहीं, विश्व-आपदा है और इसमें निजी स्वार्थ का स्थान न्यूनतम है।

यह आपदा खत्म हुई तो यही लोग एक-दूसरे का मुँह भी नहीं ताकेंगे। बैक टू बिजनेस चल देंगे। भारत इस मामले में कई कदम आगे है, और यहाँ समुदाय-बोध कभी खत्म नहीं होता। बस इसे जगाने की देरी है। यह इमरजेंसी है और मान कर चलिए कि दुनिया की काबिल सरकारों में भी इसे रोकने की शक्ति नहीं।

मास क्वारांटाइन

इसकी जरूरत अमूमन नहीं पड़ती, लेकिन बड़े देशों में यह कभी-कभी जरूरी होता है। जैसे चीन और भारत बड़े देश हैं, जहाँ अगर संक्रमण का केंद्र मालूम है, तो उसे बाकी के देश से काट कर ‘क्वारांटाइन’ करना पड़ता है। चीन में इसमें कुछ देर हुई, लेकिन पहले वूहान और आस-पास के शहरों के रास्ते बंद कर दिए गए, फिर पूरे हूबइ प्रांत के। इस वजह से काफी हद तक संक्रमण उस इलाके तक सीमित रह गया, और पूरे चीन में उस विकराल रूप में नहीं पसरा। इसका प्रबंधन भी सुलभ होता है कि पूरे देश की बजाय एक क्षेत्र पर फोकस करना। और आज चीन इस स्थिति में पहुँच रहा है कि एक भी नए केस नहीं मिल रहे। यह भारत में भी पहले गुजरात प्लेग के समय किया जा चुका है।

नॉर्वे में मेरे जिले में पिछले हफ्ते में मात्र एक केस मिला। मेरे पड़ोस के दो जिलों में भी बस एक-एक केस हैं। लेकिन ठीक अगले दो जिलों को मिला कर एक हज़ार केस हैं! ऐसा कैसे संभव है कि दो जिले मिला कर हज़ार केस हों, और पड़ोसी में बस एक? यह तो कोई तार्किक अनुपात ही नहीं। और ऐसा भी नहीं कि ट्रेन-बस बंद कर दिए गए। यह ‘मास क्वारांटाइन’ से संभव हो पाता है, जब उस क्षेत्र के लोगों को आवा-जाही बंद करने कह दिया जाता है। अब बीमारी पूरी गति से पसरेगी, लेकिन एक सीमित क्षेत्र में। वहाँ सरकारी फंड और संसाधन भी केंद्रित किए जाएँगे। इससे कुछ बीमारियों में एक सामूहिक इम्यूनिटी भी बनती है, जिसे ‘हर्ड इम्यूनिटी’ कहते हैं। लेकिन, कोरोना में यह संभव नहीं हो सका है।

भारत में भी यह पद्धति लागू है ही, और हो भी रही है। महाराष्ट्र से यातायात घटाने के प्रयास चल रहे हैं। जिन शहरों में एक भी केस मिल रहे हैं, वहाँ धारा 144 लगाने की कवायद चल रही है। यानी, उस शहर के लोग सामूहिक रूप से क्वारांटाइन पर चले जाएँ और आगे पसरने न दें।

यह ब्रह्मास्त्र है, लेकिन आर्थिक रूप से यह सबसे कारगर उपाय है। क्योंकि पूरे देश में पसरने के बाद संसाधन का वितरण असंभव होता जाता है, जिस समस्या से अमरीका जैसा शक्तिशाली और धनी देश अब जूझ रहा है।

आयु का गणित

अब यह कोई छुपा रहस्य नहीं कि कोरोना एक ख़ास आयु-वर्ग को टारगेट कर रहा है। तमाम कॉन्सपिरेसी थ्योरी के पीछे भी यह कहानी है जब वे इस साँख्यिकी का हवाला देते हैं। यह इस मामले में विचित्र तो है कि अगर यह महामारी अपने चरम पर पहुँच जाती है तो संभवत: अस्सी वर्ष से ऊपर की बड़ी जनसंख्या खत्म हो चुकी होगी। ये प्रश्न भी उठ रहे हैं कि जर्मनी और स्कैंडिनैविया में मरीजों की संख्या के मुकाबले मृत्यु-दर क्यों कम है? इसका भी जवाब यहीं छुपा है।

अगर आँकड़े देखें जाएँ तो इन देशों के कोरोना मरीजों में लगभग तीन-चौथाई सत्तर वर्ष से कम उम्र के लोग हैं। और उन पर कोरोना का प्रभाव कुछ ख़ास नहीं पड़ रहा। वहीं इटली के मरीजों में लगभग सत्तर प्रतिशत लोगों की उम्र पचास से ऊपर है, तो सैकड़ों मर रहे हैं।

इस गणित के पीछे एक और वजह है कि जर्मनी और स्कैंडिनैविया बड़े पैमाने पर जाँच कर रही है। जर्मनी में तो ‘ड्राइव-थ्रू’ से कोरोना की जाँच हो रही है। ऐसा दक्षिण कोरिया में जरूर हुआ कि हल्के शक पर भी पकड़ कर जाँच करने लगे, लेकिन अन्य देश इस तरह की रणनीति नहीं अपना रहे। भारत के बजट पर तो यह मुमकिन ही नहीं, हमें भी यह समझना चाहिए। नॉर्वे में लगभग 45000 लोगों को जाँचने के बाद 2000 पॉजिटिव मिले। और मृत्यु हुए मात्र सात। यह ‘ओवर-टेस्टिंग’ है, जो एक अमीर देश ही एफॉर्ड कर सकता है; भले WHO कहती रहे।

लेकिन, एक बात जो स्पष्ट दिखने लगी है, वह ये कि सत्तर वर्ष से ऊपर के लोग अब पूरी तरह से सचेत हो गए हैं। और चूंकि इन देशों में वृद्ध अलग ही रहते हैं तो उनका अपने परिवार से संपर्क यूँ भी कम है। वहीं, ईरान में यह देखा गया कि स्वस्थ बेटे-बेटियों ने अपने अंदर पल रहे वायरस घर के बुजुर्गों को संक्रमित किए, और वे चल बसे। भारत में भी जो दूसरी मृत्यु हुई, वह यूरोप से लौटे बेटे ने अपनी बूढ़ी माँ को दिया था। हमारे समाज में बुज़ुर्ग अपने संतानों से अधिक संपर्क में हैं, कई निर्भर भी हैं, इसलिए उन तक बीमारी पहुँचनी सहज है। भले वे पूरे दिन घर में ही रहें, उनके संतान बाहर से वायरस ले आएँगे। युवा वायरस पाल कर भी स्वस्थ रहेंगे, लेकिन उनके घर के बुजुर्ग गंभीर हो जाएँगे।

इस पूरी भूमिका का ध्येय यह है कि हम जब ऑफिस से या बाहर से घर लौटें, तो निश्चिंत रह सकते हैं कि कोई गंभीर बीमारी नहीं होगी। लेकिन, आप यह ध्यान रखें कि घर में बुजुर्ग भी हैं, और उनके लिए यह जानलेवा हो सकता है। उनसे संपर्क से पहले, अपने कपड़े बदल कर, हाथ धोकर, वायरस-मुक्त हो जाएँ। तभी मिलें। यह बात कोरोना से इतर भी लागू होती है।

उस संतान की मनोस्थिति सोचिए, जिसे मामूली छींक आयी, वह ठीक भी हो गया; लेकिन उसे मालूम पड़ा कि उसी की वजह से उसकी माँ की मृत्यु हो गयी। यह भला कौन चाहेगा?

महामारी के समय बिजनेस कैसे चले?

हमलोग उस व्यवस्था में हैं, जहाँ हर हफ्ते कंपनी का आय-व्यय ईमेल पर रहता है। दिल की धड़कनें भी उससे नियंत्रित होती है। जैसी ही यह गिरता है, आपातकालीन बोर्ड-मीटिंग बैठ जाती है। अब तो यह रोज ही होती है, कि आगे क्या?

जब दक्षिण कोरिया के प्रधानमंत्री ने कहा कि लॉकडाउन अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी का शब्द है, तो कई लोगों ने विरोध किया। लेकिन, वह जानते थे कि उनकी व्यवस्था इन कंपनियों के बंद होते ही सड़क पर आ जाएगी। वह पकिया पूँजीवादी देश के मुखिया हैं। मुझे यकीन है कि डॉनाल्ड ट्रंप जैसे मँजे हुए पूँजीवादी भी लॉकडाउन नाम से ही हिल जाएँगे। कहावत है- ‘अमेरिका नेवर स्टॉप्स’। WTC क्रैश के अगली सुबह भी सब काम पर नॉर्मली गए।

खैर, कुछ रणनीतियाँ जो योजना में है, या पहले की गयी है, उनका जिक्र कर रहा हूँ। इनमें अधिकतर भारत में संभव नहीं।

1. मालिक की जिम्मेदारी- कंपनी के मालिक यह स्क्रीनिंग खुद कर रहे हैं। दक्षिण कोरिया में तो कंपनी के दरवाजे पर ही बुखार होने पर ‘बज़र’ बज जाता है। यहाँ भी तापमान-स्कैनर और स्क्रीनिंग की व्यवस्था लगायी जा रही है।

2. जॉब क्वारांटाइन- मैनुफैक्चरिंग सेक्टर में यह करने की योजना है। एक जिले में शुरू हो चुका। इसमें हर आदमी दूरी बना कर रहेगा, उसका जॉब एरिया और कॉन्टैक्ट सीमित रहेगा। यह व्यवस्था भी मालिक की है।

3. रोटेशन- यह महाराष्ट्र में शुरू किया जा चुका है कि बारी-बारी से लोग काम पर आ रहे हैं। स्वास्थ्य में यहाँ रोटेशन क्वारांटाइन है। यानी, जो कोरोना मरीज से संपर्क में रहा, वह क्वारांटाइन में जा रहा है, और उसके लौटने पर अगला जाएगा। यह मान कर कि बीमारी अभी लंबी चलेगी।

4. बल्क एस.एम.एस., ड्रोन मेसेज, प्रचार से एलर्ट बनाए रखना।

5. GPS क्वारांटइन- यह भी इक्कीसवीं सदी की सुविधा है कि अस्पताल के आइसोलेशन वार्ड भरने की बजाय केस को अपने घर में ही एक चिप दी जाए। और गतिविधि ट्रैक रखी जाए। यह दक्षिण कोरिया के बाद यूरोप में किया जा रहा है। कमाल की बात है कि इस लॉजिस्टिक में दिमाग भारतीय कंपनियों का भी है।

6. कड़े जुर्माने- क्वारांटाइन से भागने की सजा लगभग आधी वेतन के बराबर है, अथवा जेल

7. नौकरी से निकालना- वर्कफोर्स घटा कर उनसे काम अधिक लेना। यह तो आर्थिक मंदी का प्रतिफल है ही। इस उम्मीद पर कि गाड़ी वापस पटरी पर आ जाएगी।

8. वृद्धों का आइसोलेशन- यह भारत में असंभव है, लेकिन वृद्धाश्रम वाले देशों में यह किया जा रहा है।

9. अधिक और तेज जाँच- यह भी अमीर देशों के लिए ही। खर्च बीमा कंपनी, इंप्लॉयर और सरकार बाँट सकती है।

10. खरीद-बिक्री का रीटेल से ऑनलाइन शिफ्ट

11. कुछ क्षेत्रों में वर्क फ्रॉम होम और टेली-एजुकेशन

इन सब पर सही-ग़लत की बात हो सकती है, लेकिन ध्यान रहे कि दुनिया में समाजवाद अगर है भी, तो उसकी नींव पूँजीवाद है। मानवीय मूल्य उसी ‘प्रॉफिट-लॉस’ के पास गिरवी हैं। दान-पुण्य भी बैंक-बैलेंस से ही छन कर आता है, और सरकारी खजाना भी।

इम्युनिटी

अब लोग कई लेख-अफवाह आदि पढ़ कर कोरोना-विशेषज्ञ बन गए होंगे। WHO के निदेशक ने पिछले महीने इस बीमारी को ‘इन्फोडेमिक’ कहा कि लोग महामारी से अधिक सूचना-मारी से मर जाएँगे। सोचिए कि एक अस्सी साल के बुजुर्ग जिन्हें हृदयाघात आ चुका है, जब रोज इटली की खबरें टीवी पर सुनते होंगे तो कैसी नींद सोते होंगे? कोरोना तो बाद में आएगा, वह इस अवसाद भरे माहौल से दम तोड़ देंगे। इटली की खबर में सच्चाई है और मैंने भी पहले (पोस्ट 6.) लिखा है, लेकिन चिकित्सक इस सच्चाई का ढिंढोरा उनके समक्ष भला क्यों पीटें? परिजन भी क्यों डराएँ?

यह बात कोई रहस्य नहीं कि अमुक बुजुर्ग ने ये अस्सी बसंत किन-किन विषाणुओं और जीवाणुओं के मध्य रह कर गुजारे होंगे। पटेल चेस्ट संस्थान दिल्ली के केंद्र में है, जहाँ तपेदिक के मरीज यूँ ही चाय पीते मिल जाएँगे, और नॉर्थ कैम्पस के कपल भी वहीं साथ बैठे। कभी यही तपेदिक एक अभिशाप था, लेकिन हालात कुछ यूँ बने कि लाखों लोग गुप्त तपेदिक या पुराने तपेदिक के साथ लंबा जीवन जी गए। भारत में इबोला और नीपा जैसे 77-95 % मृत्यु-दर वाले खूँखार वायरस आकर भी आतंक न मचा सके। येल्लो फीवर आया ही नहीं।

कोरोना की ही बात करें तो पहले SARS आया (2003), विश्व के 29 देशों में फैला, हज़ारों लोग मरे। भारत में मात्र तीन मरीज मिले, और तीनों ठीक हुए। MERS (कोरोना का दूसरा वायरस) पूरे मध्य एशिया में कहर मचाता रहा, और कई भारतीय वहाँ से आते-जाते रहे, लेकिन भारत में एक मरीज न मिला। और अब यह तीसरा कोरोना। यह भी अब नहीं आया, फरवरी में ही आ गया, और डेढ़ महीने तक सुस्त रहा। वूहान में जब यह चरम पर था, तब जो 327 भारतीय वहाँ से लाए गए, उनमें भी नहीं मिला। वे आखिर कैसे बच गए? और जो अब मर रहे हैं, वे क्यों मर रहे हैं?

इसका उत्तर भी वहीं छिपा है कि इस फौलादी इम्युनिटी के बावजूद भारत में औसत आयु कम है। हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था का वितरण विषम है। उम्र के साथ ‘हाइ रिस्क ग्रुप’ यानी हृदय-रोग, रक्तचाप, गुर्दा-रोग, या जीवनशैली समस्याओं के समूह बढ़ते जा रहे हैं। इस वायरस में यह ख़ास देखा गया है कि उम्र और पुराने मर्जों से कमजोर व्यक्ति टूट जाता है। पंजाब में मृत्यु हृदयाघात से, तो पटना में मृत्यु गुर्दा रोग के मरीज की होती है। पटना के मरीज की कम उम्र में ही किडनी की समस्या थी। आने वाले समय में ऐसी मृत्यु और भी कई होगी।

लेकिन, इसे ‘इन्फोडेमिक’ बनाने से बचना होगा। क्रिकेट स्कोर की तरह रोज पूछना कि आज कितने? इससे अब चिकित्सक भी टूटने लगे हैं, जनता तो खैर टूटेगी ही। हाँ! यह पूछिए कि आज कितनों की इम्युनिटी ने वायरस को मात दिया? साठ से ऊपर के टॉम हैन्क्स दंपति कोरोना पाले घर पर बैठे हैं, और दूसरे हफ्ते में कह रहे हैं कि अब तक स्वस्थ हैं। ऐसी और भी कहानियाँ रोज मिलेगी, जिनका शरीर लड़ रहा है। हम संभल कर रहें, पॉजिटिव रहें, हमारा भी लड़ेगा।

सुनें मेरी बातचीत स्टोरीटेल, इंडिया पर गिरिराज किराडू से

ऑडियोबूम पॉडकास्ट – https://audioboom.com/posts/7536684-

ऐप्पल पॉडकास्ट- https://podcasts.apple.com/us/podcast/bolti-kitabein-%E0%A4%AC-%E0%A4%B2%E0%A4%A4-%E0%A4%95-%E0%A4%A4-%E0%A4%AC/id1385298984

प्लेयर FM- https://player.fm/series/bolti-kitabein-boltii-kitaaben/ep-67-yh-snsaar-kaa-ant-ktii-nhiin-hai-ummiid-rkhiye-khyaal-rkhiye-ddon