श्रद्धांजलि: गिरिराज किशोर

कहानियाँ हमारे इर्द-गिर्द ही जन्म लेती है। सहजता से। जिस दौर में गिरिराज किशोर जी की कहानियाँ सामने आयी होंगी, यानी साठ-सत्तर के दशक में; वहाँ लौट कर देखने की मेरी क्षमता नहीं। लेकिन, इतिहास में रुचि है तो इतना मालूम है कि वह अस्थिरता का वक्त था। सामाजिक, राजनैतिक, वैयक्तिक, हर स्तर पर। हिन्दी साहित्य में ‘नयी कहानी’ जन्म ले रही थी, वहीं देश आर्थिक संकट से जूझ रहा था, नेहरू जी की मृत्यु के बाद उनका आभामंडल भी क्षीण पड़ने लगा। भारत ही नहीं, दुनिया ही एक अस्थिर दौर से गुजर रही थी, जब शीत युद्ध और वियतनाम युद्ध के मध्य हिप्पियों का उदय हो रहा था। लेकिन, इन सबके मध्य समाज ज्यों-का-त्यों था।

ऑफ़िस की फाइलें यूँ ही धूल खा रही थे, पेपरवेट के नीचे पन्ने फड़फड़ा रहे थे, मध्य-वर्ग यूँ ही रोजमर्रा के जीवन में संघर्ष कर रहा था, सामंतवाद की शक्ल सिर्फ सतह पर बदल रही थी। लेकिन, रचनाएँ प्रगतिशील होती जा रही थी। दक्षिण अमरीका से भारत तक साहित्यकारों का एक नया ढर्रा। और इन सबके मध्य कुछ ऐसी भी कहानियाँ रची जा रही थी, जो अब भी जमीन पर थे। यथार्थ से जुड़े थे। हमारे आस-पास की घटनाओं और राजनीति से। और वह भी हमारी भाषा में। जैसा प्रेमचंद लिखते थे, गिरिराज जी की भाषा और विषय-चयन कुछ वैसा ही दिखता है। यह संभव है कि उस वक्त प्रेमचंद की साहित्यिक हलकों में महत्ता घटने लगी हो, लेकिन गिरिराज जी ने परंपरा गिरने न दी।

एक पाठक के रूप में मुझे उनके विविध विषय-चयन प्रभावित करते रहे कि एक लेखक का फलक कुछ यूँ भी विस्तृत हो सकता है। गिरिराज जी के ही शब्दों को अगर पढ़ें, “हर लेखक के पास एक चोंच होती है, जिससे वह चिड़िया की तरह समाज में से विषय चुन-चुन कर अपनी झोली में डालता रहता है। वह कंकड़ों के मध्य बारीकी से दाने चुन सकता है।”

यह बात महत्वपूर्ण है। हमें समकालीन लेखन से प्रभावित हुए बिना भी विषय चुनने हैं। ऐसे विषय जो सिर्फ आपकी झोली में हों। उनके विषय-चयन की विविधता शायद यह भी रही हो कि वह सरकारी नौकरियों में जगह बदलते रहे। वह हिन्दी शिक्षण की दुनिया से नहीं जुड़े थे, और न ही पूर्णकालिक साहित्यकार थे। वह तो आम आदमियों की तरह आठ घंटे की असाहित्यिक दफ्तर में बैठ कर, हाट-बाज़ार से सब्जियाँ लाकर, जब घर लौटते होंगे तो फुरसत में कलम उठाते होंगे। जैसे विनोद कुमार शुक्ल या नरेश सक्सेना जी की कलम।

लेकिन, इस पार्ट-टाइम लेखन में भी कोई लगभग हज़ार पृष्ठ का कालजयी ग्रंथ लिख दे। रामचंद्र गुहा के ‘गांधी बिफोर इंडिया’ से पहले ‘पहला गिरमिटिया’ लिखा जा चुका था। और यह गल्प होकर भी तथ्यपरक, विस्तृत और पठनीयता लिए था। इसे पढ़ कर यूँ नहीं लगता कि यह हज़ार अलग-अलग बैठक में लिखी गयी होगी। यह सातत्य ही गिरिराज जी की विशेषता रही होगी कि वह कलम रोज उठाते होंगे, रोज हज़ार शब्द लिखते होंगे। तभी तो इतना कुछ लिख गए। और किसी भी कहानी या उपन्यास में यूँ नहीं लगता कि ‘कन्ट्यूनिटी’ टूटी है। उनकी यह बात मैंने अपने जीवन में उतारना शुरू किया है, और नवोदित लेखकों से भी यह बात कहूँगा।

नवोदित लेखकों के लिए उनके विचार ख़ास हैं। इसे मैंने पहले भी संदर्भित किया है। और इसके अंतिम वाक्य के कुछ उदाहरण भी हैं। गिरिराज जी ने लिखा,

“अच्छे आलोचकों का यही दायित्व है कि वह संभावनाशील रचनाकार के बारे में सकारात्मक रुख अपनाए और पाठकों को उसे समझने में सहायता दें। जिस रचना की समीक्षा होती है, उस पर समीक्षा का भला-बुरा चाहे जैसा भी प्रभाव क्यों न पड़ता हो, वह इतना महत्वपूर्ण नहीं होता जितना कि इस प्रकार की समीक्षा द्वारा रचनाकार के भविष्य की रचनात्मकता को कुण्ठित करने वाला प्रयत्न होता है। ठीक वैसा ही जैसा असमय प्रजनन इंद्रियों को नष्ट करने का प्रयत्न होता है।”

एक और बात कहूँगा कि उनकी कहानियों या उपन्यास में एक परिपूर्णता है। कोई हड़बड़ी नहीं है। ‘पेपरवेट’ को पढ़ते हुए डॉ. जब्बार पटेल निर्देशित फ़िल्म ‘सिंहासन’ मन में आती है। छद्म-समाजवादी राजनीति आज हमें अधिक स्पष्ट अधिक दिख रही है, जो गिरिराज जी को साठ के दशक में ही दिख गयी थी। सत्ताधारी दल का पेपरवेट बना ब्यूरोक्रेट कहिए, या कोई भी ऐसा माध्यम। यह कितना बेहतरीन बिम्ब है! एक सरकारी कर्मचारी के लिए ऐसी रचनाएँ लिखना एक ‘बोल्ड स्टेप’ भी कही जाएगी।

मेरी गिरिराज जी से कभी मुलाकात नहीं हुई। उम्र का भी फासला है, और जमीन का भी। लेकिन, मैंने जब गिरमिटियों का इतिहास ‘कुली लाइन्स’ लिखी, तो कई लोगों ने इसकी तुलना ‘पहला गिरमिटिया’ से की। हालांकि यह तुलना बेमानी थी। एक तो ‘पहला गिरमिटिया’ का कथ्य गिरमिटिया नहीं, गांधी हैं; और दूसरा यह कि गिरिराज जी का आभामंडल ही इतना विस्तृत है कि मेरी रचना उसके समक्ष एक सूक्ष्म कृति है। एक बार राष्ट्रपति के. आर. नारायणन ने इच्छा ज़ाहिर की कि ‘पहला गिरमिटिया’ पढ़ना चाहता हूँ। लेकिन, समस्या यह थी कि हिन्दी वह ठीक से पढ़ नहीं पाते थे। गिरिराज जी ने उसका अंग्रेज़ी अनुवाद कराना शुरू किया। अब विडंबना ऐसी कि जब यह अनुवाद पूर्ण हुआ और छप कर आया, के. आर. नारायणन चल बसे। वह इस किताब के पाठ से वंचित रह गए। आज जब गिरिराज जी नहीं रहे, तो इस वंचन का अर्थ समझा जा सकता है। उनकी सतत रचनाशीलता से हम सभी अब वंचित रह गए। गांधी जी की तरह गिरिराज जी का जीवन भी एक संदेश ही है।

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