श्रद्धांजलि: गिरिराज किशोर

कहानियाँ हमारे इर्द-गिर्द ही जन्म लेती है। सहजता से। जिस दौर में गिरिराज किशोर जी की कहानियाँ सामने आयी होंगी, यानी साठ-सत्तर के दशक में; वहाँ लौट कर देखने की मेरी क्षमता नहीं। लेकिन, इतिहास में रुचि है तो इतना मालूम है कि वह अस्थिरता का वक्त था। सामाजिक, राजनैतिक, वैयक्तिक, हर स्तर पर। हिन्दी साहित्य में ‘नयी कहानी’ जन्म ले रही थी, वहीं देश आर्थिक संकट से जूझ रहा था, नेहरू जी की मृत्यु के बाद उनका आभामंडल भी क्षीण पड़ने लगा। भारत ही नहीं, दुनिया ही एक अस्थिर दौर से गुजर रही थी, जब शीत युद्ध और वियतनाम युद्ध के मध्य हिप्पियों का उदय हो रहा था। लेकिन, इन सबके मध्य समाज ज्यों-का-त्यों था।

ऑफ़िस की फाइलें यूँ ही धूल खा रही थे, पेपरवेट के नीचे पन्ने फड़फड़ा रहे थे, मध्य-वर्ग यूँ ही रोजमर्रा के जीवन में संघर्ष कर रहा था, सामंतवाद की शक्ल सिर्फ सतह पर बदल रही थी। लेकिन, रचनाएँ प्रगतिशील होती जा रही थी। दक्षिण अमरीका से भारत तक साहित्यकारों का एक नया ढर्रा। और इन सबके मध्य कुछ ऐसी भी कहानियाँ रची जा रही थी, जो अब भी जमीन पर थे। यथार्थ से जुड़े थे। हमारे आस-पास की घटनाओं और राजनीति से। और वह भी हमारी भाषा में। जैसा प्रेमचंद लिखते थे, गिरिराज जी की भाषा और विषय-चयन कुछ वैसा ही दिखता है। यह संभव है कि उस वक्त प्रेमचंद की साहित्यिक हलकों में महत्ता घटने लगी हो, लेकिन गिरिराज जी ने परंपरा गिरने न दी।

एक पाठक के रूप में मुझे उनके विविध विषय-चयन प्रभावित करते रहे कि एक लेखक का फलक कुछ यूँ भी विस्तृत हो सकता है। गिरिराज जी के ही शब्दों को अगर पढ़ें, “हर लेखक के पास एक चोंच होती है, जिससे वह चिड़िया की तरह समाज में से विषय चुन-चुन कर अपनी झोली में डालता रहता है। वह कंकड़ों के मध्य बारीकी से दाने चुन सकता है।”

यह बात महत्वपूर्ण है। हमें समकालीन लेखन से प्रभावित हुए बिना भी विषय चुनने हैं। ऐसे विषय जो सिर्फ आपकी झोली में हों। उनके विषय-चयन की विविधता शायद यह भी रही हो कि वह सरकारी नौकरियों में जगह बदलते रहे। वह हिन्दी शिक्षण की दुनिया से नहीं जुड़े थे, और न ही पूर्णकालिक साहित्यकार थे। वह तो आम आदमियों की तरह आठ घंटे की असाहित्यिक दफ्तर में बैठ कर, हाट-बाज़ार से सब्जियाँ लाकर, जब घर लौटते होंगे तो फुरसत में कलम उठाते होंगे। जैसे विनोद कुमार शुक्ल या नरेश सक्सेना जी की कलम।

लेकिन, इस पार्ट-टाइम लेखन में भी कोई लगभग हज़ार पृष्ठ का कालजयी ग्रंथ लिख दे। रामचंद्र गुहा के ‘गांधी बिफोर इंडिया’ से पहले ‘पहला गिरमिटिया’ लिखा जा चुका था। और यह गल्प होकर भी तथ्यपरक, विस्तृत और पठनीयता लिए था। इसे पढ़ कर यूँ नहीं लगता कि यह हज़ार अलग-अलग बैठक में लिखी गयी होगी। यह सातत्य ही गिरिराज जी की विशेषता रही होगी कि वह कलम रोज उठाते होंगे, रोज हज़ार शब्द लिखते होंगे। तभी तो इतना कुछ लिख गए। और किसी भी कहानी या उपन्यास में यूँ नहीं लगता कि ‘कन्ट्यूनिटी’ टूटी है। उनकी यह बात मैंने अपने जीवन में उतारना शुरू किया है, और नवोदित लेखकों से भी यह बात कहूँगा।

नवोदित लेखकों के लिए उनके विचार ख़ास हैं। इसे मैंने पहले भी संदर्भित किया है। और इसके अंतिम वाक्य के कुछ उदाहरण भी हैं। गिरिराज जी ने लिखा,

“अच्छे आलोचकों का यही दायित्व है कि वह संभावनाशील रचनाकार के बारे में सकारात्मक रुख अपनाए और पाठकों को उसे समझने में सहायता दें। जिस रचना की समीक्षा होती है, उस पर समीक्षा का भला-बुरा चाहे जैसा भी प्रभाव क्यों न पड़ता हो, वह इतना महत्वपूर्ण नहीं होता जितना कि इस प्रकार की समीक्षा द्वारा रचनाकार के भविष्य की रचनात्मकता को कुण्ठित करने वाला प्रयत्न होता है। ठीक वैसा ही जैसा असमय प्रजनन इंद्रियों को नष्ट करने का प्रयत्न होता है।”

एक और बात कहूँगा कि उनकी कहानियों या उपन्यास में एक परिपूर्णता है। कोई हड़बड़ी नहीं है। ‘पेपरवेट’ को पढ़ते हुए डॉ. जब्बार पटेल निर्देशित फ़िल्म ‘सिंहासन’ मन में आती है। छद्म-समाजवादी राजनीति आज हमें अधिक स्पष्ट अधिक दिख रही है, जो गिरिराज जी को साठ के दशक में ही दिख गयी थी। सत्ताधारी दल का पेपरवेट बना ब्यूरोक्रेट कहिए, या कोई भी ऐसा माध्यम। यह कितना बेहतरीन बिम्ब है! एक सरकारी कर्मचारी के लिए ऐसी रचनाएँ लिखना एक ‘बोल्ड स्टेप’ भी कही जाएगी।

मेरी गिरिराज जी से कभी मुलाकात नहीं हुई। उम्र का भी फासला है, और जमीन का भी। लेकिन, मैंने जब गिरमिटियों का इतिहास ‘कुली लाइन्स’ लिखी, तो कई लोगों ने इसकी तुलना ‘पहला गिरमिटिया’ से की। हालांकि यह तुलना बेमानी थी। एक तो ‘पहला गिरमिटिया’ का कथ्य गिरमिटिया नहीं, गांधी हैं; और दूसरा यह कि गिरिराज जी का आभामंडल ही इतना विस्तृत है कि मेरी रचना उसके समक्ष एक सूक्ष्म कृति है। एक बार राष्ट्रपति के. आर. नारायणन ने इच्छा ज़ाहिर की कि ‘पहला गिरमिटिया’ पढ़ना चाहता हूँ। लेकिन, समस्या यह थी कि हिन्दी वह ठीक से पढ़ नहीं पाते थे। गिरिराज जी ने उसका अंग्रेज़ी अनुवाद कराना शुरू किया। अब विडंबना ऐसी कि जब यह अनुवाद पूर्ण हुआ और छप कर आया, के. आर. नारायणन चल बसे। वह इस किताब के पाठ से वंचित रह गए। आज जब गिरिराज जी नहीं रहे, तो इस वंचन का अर्थ समझा जा सकता है। उनकी सतत रचनाशीलता से हम सभी अब वंचित रह गए। गांधी जी की तरह गिरिराज जी का जीवन भी एक संदेश ही है।

शतरंज के खिलाड़ी: कास्पारोव, कार्लसन और आनंद का विस्मयकारी त्रिकोण

रेक्याविक, 2004

उस दिन शतरंज के खेल में एक बड़ा तख्ता-पलट हुआ। विश्व के महान् खिलाड़ी अनातोली कार्पोव एक तेरह वर्ष के बच्चे से हार गए। और जब कल उस बच्चे का मुकाबला गैरी कास्पारोव से होना है तो शतरंज की दुनिया में खबर छपी,

“द बॉय मीट्स द बीस्ट”

इस तेज शतरंज के मुकाबले में अमूमन जूस लेकर बैठने वाले किशोर मैग्नस कार्लसन उस दिन कोला लेकर बैठे, और कास्पारोव का इंतजार करने लगे। नियम यह था कि खिलाड़ी देर से आए तो बाजी हार जाता है। लेकिन चूँकि यहाँ बात कास्पारोव की थी, तो इंतजार किया गया।

कास्पारोव तकरीबन पंद्रह मिनट लेट पहुँचे और मैग्नस के पीछे जाकर खड़े हो गए और कहा, “माफ करना। मेरी ग़लती नहीं। आयोजकों ने मुझे समय ग़लत बताया”

पहली ही चाल में कास्पारोव ग़लत चल गए और बाजी कार्लसन के पक्ष में जाने लगी। कार्लसन कुछ देर में उठ कर टहलने लगे तो कास्पारोव ने नाराजगी से घूरा कि यह क्या बदतमीजी है? आखिर खेल ड्रा रहा और अगले खेल में कास्पारोव ने मात कर दिया।

कास्पारोव ने खेल के बाद कहा, “इस बच्चे में मुझे आज अपनी ही अक्खड़ मिजाज़ी दिखी है। गर इसे तालीम मिलती रही, तो यह अगला कास्पारोव जरूर बनेगा।”

कास्पारोव ने जब कार्लसन से तालीम की बात कही, तो दरअसल एक विश्व-विजेता को शायद अपनी विरासत की चिंता थी। उन्होंने कार्लसन को मॉस्को आने का न्यौता दिया। जब कार्लसन मॉस्को पहुँचे तो पहले दिन उनसे दो वृद्ध मिलने आए। एक कास्पारोव के गुरु थे, और दूसरे कारपोव के। एक चौदह वर्ष के बच्चे की आँखों में उन्होंने बहुत कुछ एक नजर में ही पढ़ लिया। अगले दिन कार्लसन कास्पारोव से रू-ब-रू हुए।

वहाँ तमाम कम्प्यूटर में बस शतरंज की पहली चाल के अलग-अलग रूप लगे थे, और आज तक जितना शतरंज खेला गया, उसका दुनिया का सबसे बड़ा डाटाबेस मौजूद था। कार्लसन को लगा जैसे किसी फौजी रणनीति कैंप में आ गए। कास्पारोव ने पहले ही दिन चार अभ्यास दे दिए, जिनमें कार्लसन तीन सुलझा पाए और थक गए। कास्पारोव ने कहा कि रूसी तब तक नहीं उठते, जब तक सुलझा नहीं लेते। 

कार्लसन ने अपने पिता को फ़ोन मिला कर कहा, “मैंने शतरंज खेल-खेल में ही सीखा। मुझसे यह पढ़ाई न हो पाएगी।”

कास्पारोव को ‘ना’ सुनना बुरा लगा या अच्छा, यह पता नहीं। किंतु कार्लसन का ‘ना’ कहना एक विश्व-विजेता बनने की पहली सीढ़ी जरूर थी!

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शतरंज के मोज़ार्ट कई लोग कहे गए, शायद इसलिए कि यह खेल छुटपन से ही शुरु हो जाता है। बारह-तेरह वर्ष उम्र के ग्रैंड मास्टर घूम रहे हैं। लेकिन मैग्नस को मोज़ार्ट कहने की और भी वजह है। इसकी एक वजह है कि मोज़ार्ट के पिता लियोपोल्ड और मैग्नस के पिता हेनरिक, दोनों अपने-अपने गुण बेटे में डाल गए और बेटा बाप से कहीं आगे निकल गया। दोनों अपनी गाड़ी में सपरिवार यूरोप का चक्कर लगाते और बेटे को खेलते देखते, जीतते देखते। एक संगीत में, तो दूसरा शतरंज में उस्ताद बना। और दोनों के पिता ने इसके पीछे अपना निजी कैरियर काफी हद तक त्याग दिया। तभी मोज़ार्ट ने कहा, “ईश्वर के बाद पिता होता है।”

लेकिन मैग्नस की शुरुआत देर से हुई। पाँच वर्ष तक तो शतरंज को हाथ भी नहीं लगाया। यह और बात है कि उस उम्र तक मैग्नस को नॉर्वे के सभी जिले और दुनिया के सभी गाड़ियों के नाम याद थे। मैग्नस भी मोज़ार्ट की तरह घर में सबसे छोटे थे, और अंतर्मुखी भी। तो जब शतरंज की गोटियाँ हाथ में आई, तो वह उन्हीं से बतियाते। एक छह-सात साल का बच्चा तो एक स्थान पर टिक कर नहीं बैठता, जबकि मैग्नस पूरा दिन एक ही छोटी कुर्सी पर बैठे शतरंज खेलते बिता देते। उनके स्कूल में शिक्षिका ने कहा कि इसका विकास रुक गया है।

शतरंज खिलाड़ी पिता हेनरिक ने कहा, “इसका विकास बस मुझे नजर आ रहा है। यह अब मुझसे भी कहीं आगे निकल गया है।”

विश्वनाथन आनंद को हराना एक वैश्विक रणनीति का नतीजा था या नहीं, यह कहना कठिन है। लेकिन मोहरे तैयार हो रहे थे। हालांकि मैग्नस कार्लसन मात्र मोहरा नहीं थे, लेकिन विश्व विजेता बनने का बाल-हठ तो हावी था ही। पहले यह माहौल बना कि आनंद नॉर्वे आएँ। लेकिन आनंद की आँखों में जो आत्मविश्वास और अनुभव था, उसमें दुनिया के किसी कोने में हराने की कुव्वत थी।

उसी वक्त गैरी कास्पारोव पुन: कार्लसन के गुरु बनने का जिम्मा लेते हैं। आनंद को अगर कोई मात दे सकता था, तो वह थे- स्वयं कास्पारोव। लेकिन उन्हें अपना उत्तराधिकारी चुनना था, स्वयं तो वह अलग हो चुके थे। दूसरी बात यह थी, कि भारत और चीन में शतरंज तेज गति से लोकप्रिय हो रहा था। एक नहीं, सैकड़ों आनंद की फौज तैयार हो रही थी। शतरंज का गढ़ अब भी रूस था, लेकिन सरताज चेन्नई में बैठा था।

दूसरी ओर, नॉर्वे कभी शतरंज में ख़ास नामी रहा नहीं। कार्लसन के आस-पास भी नॉर्वे में कोई नहीं था। अब यह बच्चों का खेल नहीं था, कार्लसन को वाकई रूसी हथियारों की जरूरत थी। वह वापस कास्पारोव के शरण में गए। या यूँ कहिए कि कास्पारोव ने यूरोपीय सत्ता स्थापित करने के लिए कार्लसन को तैयार करना शुरू किया। लेकिन कार्लसन को कास्पारोव का ढंग न तब पसंद था, न अब।

आनंद शतरंज के खेल में इकलौते कई मामलों में थे, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण था उनका तनाव-मुक्त खेल। उनका ‘कूल’ रहना, मुस्कुराना, गप्पियाना शतरंज के अंतर्मुखी खिलाड़ियों के विपरीत था। एक दफे रूस में कार्लसन और आनंद के इंतजामात एक रूसी सुंदर महिला कर रही थीं। जहाँ आनंद उनसे खूब गप्पियाते, कार्लसन नजर उठा कर भी नहीं देखते। उसने कहा कि इस बच्चे को अब किसी लड़की की जरूरत है, वरना यह आनंद से नहीं जीत पाएगा। 

यह बात गौर-ए-तलब है क्योंकि आनंद पहले भी मुस्कुराते हुए कार्लसन और तमाम खिलाड़ियों को हरा चुके थे। तो जब आनंद के खेल समझने के लिए उन्हें नॉर्वे आने का न्यौता दिया गया, आनंद घूमने-फिरने के इरादे से नॉर्वे आ गए। उनके साथ अमरिका की महिला शतरंज चैंपियन ओस्लो पहुँची, और एयरपोर्ट पर ही मैग्नस कार्लसन का बड़ा पोस्टर लगा था। दोनों यह देख कर मुस्कुराए और कहा, “यह बच्चा तो अब बड़ा हो गया।”

यह दोस्ताना मुकाबला समंदर किनारे क्रिस्तियानसंड में था, और शहर के तमाम लोग आनंद को देखने आए थे। उस वक्त वह नॉर्वे के सबसे प्रिय खिलाड़ी थे, और सड़क पर सब ‘विशी विशी’ चिल्ला रहे थे। आनंद जानते थे कि यहाँ के फ़्रेंडली मैच की कोई अहमियत नहीं। वह बड़ी आसानी से कार्लसन से हार गए, खूब खाया-पीया और नॉर्वे के ध्रुवीय इलाके घूमने निकल गए। कार्लसन के दोगुनी उम्र के आनंद ने बड़ी चालाकी से अपना खेल छुपा लिया।

यह तय था कि जो भी लंदन में जीतेगा, वही विश्व-विजेता आनंद से चेन्नई में खेलेगा। लंदन में विश्व के आठ शीर्ष खूँखार खिलाड़ियों की यह जंग शतरंज की दुनिया में एक यादगार पल है। मैग्नस कार्लसन को यह जंग जीतनी ही थी। लेकिन व्लादीमिर क्रामनिक (बिग व्लाद), जिन्होंने महान् गैरी कास्पारोव को सत्ता से बेदखल किया था, उनसे आगे निकलना एक चुनौती थी।

शुरुआती खेलों के बाद यह स्पष्ट हो गया कि क्रामनिक ही आनंद से खेलेंगे। मैग्नस कार्लसन पूरे समय तनाव में खेले, और जैसे-तैसे आगे बढ़े। उन्होंने आखिर अपना वह हथियार अपनाया, जो बचपन से उनकी ताकत थी। लंबा खेल कर अपने विपक्षी को थका देना। राज़ाबोव के साथ खेल में हर दर्शक, क्रामनिक और कम्प्यूटर तक को यह यकीन था कि खेल ड्रॉ होगा। लेकिन सात घंटे तक लगातार खेल कर कार्लसन जीत गए। 

अब क्रामनिक और कार्लसन बराबरी पर थे। लेकिन कार्लसन को इवानचुक (चकी) ने आखिरी खेल में हरा दिया। कार्लसन हताश होकर अपने होटल चले गए। तभी खबर आई कि अप्रत्याशित रूप से अब तक लगातार हारने वाले इवानचुक ने क्रामनिक को भी हरा दिया। बाजीगर कार्लसन आखिरी खेल हार कर भी अंक के आधार पर टूर्नामेंट जीत चुके थे। शतरंज का निर्णायक युद्ध अब भारत में होना था।

नवंबर 2013, चेन्नई, भारत

यूरोप की नजर में भारत ठीक वैसा ही है, जैसा कि झोपड़पट्टियों के मध्य खड़ा चेन्नई का आलीशान हयात रिज़ेन्सी होटल। एक गरीब देश जहाँ अमीरों के अमीर बसते हैं। मैग्नस कार्लसन ने पूरे विश्व में इतनी आवभगत और शान-ओ-शौकत कम ही देखी। उनके दरवाजे के ठीक बाहर राइफ़ल लिए खड़े सुरक्षाकर्मी देख वह घबड़ा गए, और अनुरोध किया कि ये दूर ही रहें। 

इस खेल में कुछ और विडंबनाएँ भी थी। कार्लसन के सहयोगी (सेकंड) एस्पेन असल में आनंद की टीम से जुड़ना चाहते थे, लेकिन यह अपने देशवासी से धोखा होता। एस्पेन तो कार्लसन की रग-रग से वाकिफ थे। वहीं दूसरी ओर, आनंद के सहयोगी शतरंज के ऐसे सेनापति थे जो विश्व-विजेता बनते-बनते रह गए थे। कार्लसन की टीम को आनंद से अधिक खौफ उनके इस सहयोगी पीटर लेको से था, जो यूरोपीय खेल को गहराई से जानते थे।

आनंद पहली चाल क्या चलेंगे, यह कार्लसन की दुविधा थी। क्या वह e4 से खेल शुरू करेंगे? आनंद के पास हमेशा एक नया दाँव होता। लगभग ग्यारह भाषा बोलने वाला यह अनुभवी खिलाड़ी वाकई शतरंज की दुनिया का मायावी सितारा था। कार्लसन को यह अंदेशा हो रहा था कि आनंद जरूर ‘निमज़ो-इंडियन’ खेल यानी d4 से शुरुआत करेंगे, और वहाँ शायद वह फँस जाएँ। 

नॉर्वे के अखबार आनंद को ‘टाइगर ऑफ़ चेन्नई’ पहले से ही कह रहे थे।

मास्को में बैठे कास्पारोव जो आनंद को हारते देखने को बेताब थे, ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया को कहा, “कल से मद्रास में खून बहेगा। खून!”

अगर यह कहा जाए कि पूरी कायनात आनंद को हराने चेन्नई में जुटी थी, तो यह बात शायद ग़लत नहीं। जैसा मैं पहले भी कह चुका हूँ, यह एक वैश्विक लड़ाई थी। मृदुभाषी और सौम्य आनंद के सर पर लगभग एक दशक तक यह ताज रहा, और उनके मुख्य प्रशिक्षक थे डेनमार्क के पीटर नील्सन। लेकिन जब बात भारत और स्कैंडिनैविया के टक्कर की हुई, तो नील्सन का देश-प्रेम शायद जाग उठा। वह पाला बदल कर कार्लसन के साथ चले गए। वह आनंद का हर रहस्य जानते थे, तो आनंद को हराने का परम-ज्ञान उनसे बेहतर कौन देता? 

आनंद इससे निराश तो हुए लेकिन उन्होंने बस एक अलिखित वचन उनसे ले लिया कि नील्सन स्वयं चेन्नई में कार्लसन के साथ न आएँ। और नील्सन ने आनंद को दिया वचन निभाया भी। वह बीमारी का बहाना बना कर नॉर्वे में ही रुक गए। 

लेकिन एक बिनबुलाया मेहमान भी चेन्नई आया, जिसे न आनंद ने बुलाया, न कार्लसन ने। उसकी खबर मिलते ही आनंद की टीम ने उसके दरवाजे पहले दो मैच के लिए बंद कर दिये। अगर वह आँखों के सामने होता, तो आनंद अवश्य हार जाते। कार्लसन की टीम भी उससे नहीं मिली। लेकिन सब हैरान थे कि यह आखिर चेन्नई में करने क्या आया है? वह अवांछित आगंतुक कोई ऐरा-गैरा तो था नहीं। 

शतरंज के दूसरे बादशाह और आनंद के धुर-विरोधी जनाब गैरी कास्पारोव मास्को से चेन्नई पधार चुके थे! 

वि. आनंद (43 वर्ष/भारत) बनाम मै. कार्लसन (22 वर्ष/नॉर्वे), चेन्नई

नॉर्वे आर्कटिक सर्कल का एक छोटा और वीरान देश है, जहाँ की कुल जनसंख्या चेन्नई की तीन चौथाई है। अगर शीतकालीन खेलों को छोड़ दें, तो किसी भी विश्व-स्तर के खेल में इनकी पैठ नहीं। शतरंज में जहाँ भारत के पचास ग्रैंड मास्टर हैं, नॉर्वे के आठ हैं। ऐसे में अगर कोई खिलाड़ी विश्व-विजेता बनने वाला हो, तो पूरा देश सड़क पर क्यों न हो? हर दुकान, हर गली में शतरंज था। बैंकों का काम ठप्प पड़ गया क्योंकि सभी कर्मचारी शतरंज देखने लगे थे। 

वहीं दूसरी ओर, भारत के लिए शतरंज महज एक खेल था। चुनाव निकट थे, भाजपा ने अपना नया प्रधानमंत्री उम्मीदवार चुना था, और अखबार राजनीति की खबरों से भरे थे। हालांकि आनंद-कार्लसन मैच को पहले पृष्ठ में जगह मिल जाती, लेकिन राजनीति के समक्ष खेल गौण था। कार्लसन के साथ पूरा देश था, जबकि आनंद के साथ ऐसी कोई लहर नहीं थी। 

और रूसी चाणक्य भी तो थे। कास्पारोव को खेल में प्रवेश नहीं मिला, तो बाहर प्रेस के माध्यम से आनंद का मनोबल गिराने लगे। उन्होंने कहा, “अब शतरंज को नए बादशाह की जरूरत है। हम अब बूढ़े हुए।”

लेकिन बूढ़े आनंद भी कम खतरनाक न थे। पहले ही मैच में मात्र 16 चालों में कार्लसन घुटने पर आ गए। उन्हें हाथ खड़ा कर ‘ड्रॉ’ की मांग करनी पड़ी। विश्व-विजेता का स्वप्न संजोए कार्लसन का आत्म-विश्वास पहले दिन ही हिल गया। आनंद मुस्कुराते हुए बाहर निकले। अगली बाजी आनंद की होगी, यह बात लगभग तय थी।

कास्पारोव ने एक किताब लिखी ‘हाउ लाइफ इमिटेट्स चेस’। उनका कहना है कि शतरंज से आदमी का चरित्र झलकता है। बॉबी फ़िशर और कास्पारोव की तरह कार्लसन भी मात्र जीतने के इरादे से खेलते हैं। हारने पर उनकी नींद उड़ जाती है। आनंद अगर जीतने के लिए खेलते भी हैं, तो दिखाते नहीं। और हार कर भी मुस्कुराते रहते हैं। 

कार्लसन कहते हैं कि दुनिया के सभी शतरंज खिलाड़ियों में सबसे कोमल हाथ विशी आनंद का है। वह हाथ मिलाते हैं तो लगता है कोई दोस्त गप्प मारने आया है, शतरंज खेलने नहीं। कास्पारोव इतनी सख़्ती से कुटिल मुस्की देते हाथ मिलाते हैं कि विरोधी घबड़ा जाए। मशहूर खिलाड़ी नाकामुरा ने एक बार कहा, “कार्लसन आँखों से सम्मोहित करते हैं, मुझे काला चश्मा दिया जाए।” यह और बात है कि वह चश्मा लगा कर भी हार गए।

तो जब मधुर आनंद और मायावी कार्लसन की दूसरी बाज़ी हुई, तो आनंद एक जीता हुआ खेल भी बस इस भय से नहीं खेले की वह हार जाएँगे। पहली ही e4 चाल में कार्लसन का अप्रत्याशित c6 उन्हें डरा गया। वह जीत रहे थे, लेकिन अठारहवीं चाल में जान-बूझ कर एक-दूसरे के वज़ीर (रानी) मार खेल ड्रॉ करवा दिया। 

दूसरे ड्रॉ के बाद यह लगने लगा कि आनंद जीतने के बजाय बस किसी भी तरह अपना ताज बचाना चाहते हैं। लेकिन अगले खेल से दर्शक-दीर्घा में कास्पारोव भी होंगे तो क्या शतरंज अपना काला इतिहास दोहराएगा? टॉयलेटगेट?

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शतरंज की दुनिया में एक विभाजन के जिम्मेदार गैरी कास्पारोव ही थे, जब भ्रष्टाचार के आरोप के कारण दो समूह बन गए। दो-दो शतरंज चैंपियन बनने लगे। लेकिन 2006 ई. में दोनों चैंपियनो व्लादिमीर क्रामनिक और टोपालोव के मध्य मुकाबला रख शतरंज को एक करने का फैसला हुआ। इस मुकाबले में एक अजीब बात हुई। क्रामनिक एक मैच के दौरान पचास बार शौचालय गए। टोपालोव ने इल्जाम लगाया कि वह शौचालय जाकर कंप्यूटर की मदद ले रहे हैं! क्रामनिक इसे नकार कर विजेता घोषित हुए। हालांकि जल्द ही उन्हें अपना ताज विश्वनाथन आनंद को सौंपना पड़ा।

चेन्नई में आनंद और कार्लसन का तीसरा मैच भी ड्रॉ हुआ। अब तक गैरी कास्पारोव का प्रवेश-निषेध खत्म हो चुका था, और वह अब दर्शकों में सामने नजर आ रहे थे। आनंद तनाव में आ गए थे, और इसी मध्य कार्लसन का पेट खराब हुआ। वह बारंबार शौचालय जाने लगे। आनंद ने इसका विरोध नहीं किया, और वह खेलते रहे। चौथी बाज़ी ड्रॉ रही। पाँचवी और छठी आनंद झटके में हार गए। इस टॉयलेटगेट पर कभी किसी ने चर्चा नहीं की, और आनंद ने भी यही माना कि वह बुरा खेले।

कास्पारोव ने ट्वीट किया, “अब अगर कार्लसन पागल हो जाएँ, तभी हारेंगे।”

छठी बाज़ी के बाद आनंद की हार सुनिश्चित कर कास्पारोव मास्को निकल गए तो आनंद ने प्रेस में कहा, “एल्विस प्रेस्ले चेन्नई से चले गए। अब हम खेल शुरु करें?”

नॉर्वे की अख़बार में खबर छपी कि चेन्नई के टाइगर अब भी खेल में वापस लौट कर कार्लसन को मात दे सकते हैं। लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। जिस दिन विश्वनाथन आनंद की हार तय हुई, सचिन तेंदुलकर ने भी संन्यास की घोषणा कर दी। देश से शतरंज का जुनून जाता रहा। आनंद के समय जहाँ पैंतीस ग्रैंड मास्टर हो गए थे, आनंद के बाद दस-पंद्रह हुए। वह भी इसलिए कि आनंद अभी पूरी तरह गिरे नहीं हैं।

मेरी एक और थ्योरी है कि शतरंज का राजा विश्व का राजा होता है। विश्व-युद्ध से पहले राजा यूरोप था, फिर जब लाल सेना ने जंग जीती तो दशकों तक रूस का राज रहा। इस सत्ता पर सबसे पहली चोट शीत-युद्ध के समय अमरीका के बॉबी फ़िशर ने रूस के बोरिस स्पास्की को हरा कर की। अमरीका सोवियत पर विजयी हुआ। सोवियत टूटने के बाद रूस के हाथ से भी सत्ता जाती रही। ऐसे वक्त एक तेजी से उभरते देश भारत ने सत्ता संभाली। भारत प्रगति करता गया और शतरंज का ताज भी भारत के सर पर रहा। अब वापस यह ताज यूरोप में नॉर्वे के सर पर आ गया। इस वक्त हर आर्थिक-सामाजिक आंकड़े पर नॉर्वे यूँ भी टॉप पर है। तो इस शृंखला का मूल बिंदु यही है। 

इन शतरंज के मोहरों में देश की किस्मत छुपी है।

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मैग्नस कार्लसन से जब एक साक्षात्कार में पूछा गया, “आपको पता है, एक मशहूर अमरीकी शतरंज खिलाड़ी ने शतरंज छोड़ कर मार्शल आर्ट खेलना शुरू कर दिया?”

उन्होंने कहा “शायद उन्हें हिंसा पसंद नहीं होगी। शतरंज से अधिक हिंसात्मक खेल कोई नहीं।”

जब आनंद को लोग टाइगर (बाघ) बुलाते, तो कार्लसन ने स्वयं को क्रोकोडाइल (मगरमच्छ) कहना पसंद किया। यह अजीब बात है कि शतरंज जैसे अहिंसक खेल में बाघ और मगरमच्छ जैसी उपमाएँ दी गयी। लेकिन यह बात सच है कि मार्शल-आर्ट या मुक्केबाजी की चोट हफ्ते-महीने में ठीक हो जाती है, लेकिन शतरंज ऐसी चोट देता है कि महीनों नींद-चैन उड़ जाए। 

लोगों ने मान लिया था कि चेन्नई में हार के बाद आनंद अब कभी कार्लसन के साथ नहीं खेलेंगे। ख़ास कर भारतीयों में ‘किलर इंस्टिक्ट’ कम माना जाता है। लेकिन जिस व्यक्ति ने छुटपन से प्यादे-मोहरे और रणनीति में ही जीवन बिताया हो, वह शातिर और खूँखार बन ही जाता है। बाहर से सौम्य दिखना आनंद का एक मुखौटा है, जिससे कई आक्रामक खिलाड़ी भी धोखा खाते रहे हैं। 

जब दुबई के ‘विश्व रैपिड चेस’ में आनंद पहुँचे, तो लगातार तीन बाज़ी अलग-अलग लोगों से हार गए। आनंद ‘रैपिड चेस’ के अजेय योद्धा रहे हैं, और यह हार किसी को समझ नहीं आया। दूसरी तरफ कार्लसन लगातार जीत रहे थे। कार्लसन का विजय-रथ आखिर रुका। 

विश्वनाथन आनंद ने कार्लसन को दुबई में मात कर दिया! लोग कयास लगाते हैं कि आनंद जान-बूझ कर शुरुआती खेल हारे थे, जैसे बाघ आक्रमण से पहले तीन कदम पीछे लेता है। या शायद वह चेन्नई से दुबई मात्र कार्लसन से बदला लेने आए थे। 

कयास तो कयास हैं, लेकिन बाघ-मगरमच्छ की अगली लड़ाई हुई उस राज-मुकुट के लिए जो आनंद चेन्नई में हार गए थे। और यह बाजी थी कास्पारोव के घर- रूस में! 

सोची (रूस), 2014

रूस की धरती शतरंज का मक्का कही जा सकती है। यहाँ हर तीसरा बच्चा शतरंज खिलाड़ी हो तो ताज्जुब नहीं। विश्वनाथन आनंद जब पिछले वर्ष अपने घर से पंद्रह मिनट के  फासले पर होटल में खेल रहे थे, तब वह तनाव में थे। लेकिन रूस में वह अलग ही मिज़ाज में थे। वह अपनी पत्नी अरूणा के साथ आए थे, जो उनकी मैनेजर भी हैं। और अब बिल्कुल दबाव में नहीं नजर आ रहे थे। 

शतरंज का एक और नियम है कि इसके राजा से वही लड़ सकता है जो बाकी बाहुबलियों को हरा कर आया हो। आनंद ने अपनी हार के चार महीने बाद ही विश्व कैंडीडेट चैंपियनशिप में सबको परास्त कर दिया था। और अब वह कार्लसन से अपना ताज वापस लेने रूस आए थे। 

इसी रूस की धरती पर दो वर्ष पूर्व आनंद ने बोरिस गेलफ़ांड को हरा कर अपना ताज छठे साल लगातार कायम रखा था। उन्हें उम्मीद थी कि वह रूस से जीत कर ही जाएँगे। लेकिन इस बार कुछ अलग बात थी। अब तक पर्दे के पीछे रहने वाले कास्पारोव सीधे-सीधे कार्लसन के ‘सेकंड’ बन कर आनंद से भिड़ रहे थे।

सोची का पहला मैच ड्रॉ रहा। दूसरे में कार्लसन जीत गए। लेकिन तीसरे मैच में आनंद ने वापस कार्लसन को हरा दिया। बल्कि अब आनंद इतने खुल कर खेल रहे थे कि कास्पारोव को यह लग गया कि वह अपना ताज वापस लेकर ही जाएँगे। और छठे मैच में कार्लसन ने ऐसा ‘ब्लंडर’ किया कि आनंद की जीत ‘लगभग’ तय हो गयी। 

लेकिन आनंद को वह ग़लती नजर ही नहीं आयी और वह उससे भी बड़ी ग़लती कर बैठे। सबने कहा कि ऐसी ग़लती असंभव है। आनंद ने उस दिन प्रेस में हताश होकर कहा, “इंसान ग़लती कर जाता है। मेरा अनुभव कहता है कि मैं अब हार चुका हूँ। लेकिन मैं अपने तीन वर्ष के बेटे के लिए खेलूँगा कि वह बड़ा होकर जब मेरा खेल देखे, यह ग़लती न दोहराए। और यह देख ले कि उसका पिता ग़लतियों के बाद भी खत्म नहीं हो जाता।”

लंबी रेस का घोड़ा वही है जिसने हार को बस एक ख़ास बिंदु पर नियति मानी है। कार्लसन आनंद को हराने से पहले लंदन में आखिरी बाज़ी हार कर ही आए थे। आनंद हारने के बाद दुबई में कार्लसन को हराते हैं। और उसी साल सोची में कार्लसन जीतते हैं। पुन: आनंद 2017 में कार्लसन को हराते हैं। अब तक खेले अलग-अलग फॉर्मैट की बाज़ीयों में दोनों ने आठ-आठ खेल जीते थे।

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जो भी हो, कास्पारोव का स्वप्न साकार हुआ। मैंने उनके चरित्र को अनायास कुछ कुटिल जरूर बनाया है, लेकिन कास्पारोव एक आदर्शवादी व्यक्ति हैं। शतरंज संगठन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा कर अलग होने वाले पहले व्यक्ति कास्पारोव ही थे। वह ‘नो नॉनसेंस’ व्यक्ति माने जाते हैं, हाव-भाव से भी। वह हारे भी तो आखिर अपने ही पूर्व ‘सेकंड’ क्रामनिक से, जिन्होंने कास्पारोव को उनकी ही ‘निगेटिव चेस’ और पुरानी ‘बर्लिन डिफ़ेंस’ के बल पर मात दी।

फिलहाल कास्पारोव ने भारत-चीन से शतरंज को कमजोर कर स्कैंडिनैविया और यूरोप की ओर मोड़ दिया है। कार्लसन प्रतिभाशाली जरूर हैं, लेकिन यह बात अब पक्के तौर पर कही जा सकती है कि कास्पारोव ने उन्हें अपनी इस लड़ाई का सेनापति बनाया। यूरोप की सत्ता स्थापित हो चुकी है। भारत में शतरंज अवसान पर है। मुझे कुछ उम्मीद है कि भारत-नेपाल मूल के युवा डच खिलाड़ी अनीश गिरी कार्लसन को हरा दें, अन्यथा कोई भारतीय दूर-दूर तक नहीं। हाँ! विश्वनाथन आनंद जब तक जीएँगे, रैपिड और ब्लिट्ज चेस के सरताज रहेंगे ही। यह आश्चर्यजनक है कि उम्र के साथ उनकी गति बढ़ती ही जा रही है। लेकिन यह भी विडंबना है कि शतरंज (चतुरंग) का आविष्कार जिस देश में हुआ, उस देश की बिसात सिमटती जा रही है। 

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