विदेशों की दीवाली

प्रवास में दीवाली के दीये साल-दर-साल बढ़ते ही जा रहे हैं। पंद्रह साल पहले कैलिफोर्निया में एक भारतीय मित्र ने जब दीवाली पर घर के बाहर रोशनी के झालर लटकाए, तो अगले दिन पड़ोसी ने भी लटका दिए। उन्हें लगा कि यह सामाजिक सौहार्द का व्यवहार होगा, लेकिन मालूम पड़ा कि उन पड़ोसी की इच्छा थी क्रिसमस का पहला झालर मुहल्ले में वही लटकाएँ। उन्हें क्या मालूम था कि ये दीवाली के झालर हैं? यह तो खैर अमरीका की बात है, जहाँ उस वक्त भी करोड़ भारतीय थे। बाद में तो खैर 2009 ई. में बराक ओबामा ने व्हाइट हाउस में दीवाली बनायी। कनाडा में उससे दस वर्ष पूर्व से राष्ट्रीय पर्व के रूप में दीवाली मनती रही है। सीधी बात है कि प्रवासी भारतीय अब एक बड़े वोट-बैंक बन गए हैं, दीवाली तो मनेगी ही। लेकिन, मेरी इतिहास में भी रुचि है तो यह जानने की भी है कि यह सिलसिला कब से चल रहा है?

हमें इसके लिए इन नव-पूँजीवादी देशों से दूर जाना होगा। दुनिया का सबसे बड़ा दीवाली का दीया दक्षिण अमरीका के एक छोटे से देश में जलता है। सूरीनाम की राजधानी परामरीबो में एक विशाल दीया जलाया जाता है, और वहीं भारतीय जमा होते हैं। ये उन गिरमिटियों के वंशज हैं जो भारत के गाँवों से ब्रिटिश सरकार गन्ने की खेती के लिए लेकर गयी थी। तो दीवाली की कहानी दरअसल उन्नीसवीं सदी से शुरू होती है, जब खेतिहर मजदूर दीवाली मनाते थे। उनमें न जाति-भेद था, न धर्म-भेद। बल्कि दीवाली के अवसर पर अफ्रीकी और यूरोपीय मूल के लोग भी उनके साथ मिल कर दीवाली मनाते रहे। यही नजारा मॉरीशस, फिजी, कैरीबियन देशों, रियूनियन द्वीप और मलय में भी देखने को मिलता है।

ब्रिटिशों को दीवाली से परिचय कानून की पढ़ाई करने गए मोहनदास करमचंद गांधी ने अपने शुरुआती भाषण में भी कराया, जो बाद में ‘फेस्टिवल्स ऑफ इंडिया’ नाम से संकलित हुआ। उन्होंने दीवाली को एक दिन नहीं, पूरे मास के रूप में समझाया। हालांकि, ब्रिटिश उस वक्त अक्खड़ ही थे, और लंदन में दीवाली मनाने में ख़ास रुचि न थी। अब यह हाल है कि डेविड कैमरॉन अपने घर पर दीवाली मनाते हैं। बहुसांस्कृतिक छवि भी बनानी है, और वोट भी लेने हैं।

छोटे देशों जैसे नॉर्वे में भी अब हज़ारों भारतीय हो गए हैं। हिन्दू सनातन सभा की दीवाली, आर्य समाज की दीवाली, शहरों के अलग-अलग भारतीय संगठनों की दीवाली, क्षेत्रीय संगठनों की दीवाली, दूतावास की सरकारी दीवाली, गरबा वाली दीवाली, भंगड़ा वाली दीवाली, डिस्को वाली दीवाली। न जाने कितनी दीवाली। हालात ये हो गए हैं कि लोग भागे फिर रहे हैं कि कितनी दीवालियों में जाएँ, घर में चुपके से मना कर छुट्टी करें। और कुछ लोग ऐसे भी हैं जो सबसे बना कर रखने के चक्कर में हर जगह जा रहे हैं। और इसलिए इंतजामात भी ऐसे हैं कि दीवाली एक दिन न होकर पूरे महीने मन रहा है। कहीं एक हफ्ते तो कहीं दूजे हफ्ते।

मेरा वर्तमान निवास ओस्लो से अस्सी कि.मी. दूर कॉन्ग्सबर्ग नामक शहर में है। यहाँ इस हफ्ते बहुधा हिन्दीभाषियों की दीवाली है, अगले हफ्ते बिहार से प्रवासियों की अलग दीवाली है, उसके अगले हफ्ते दक्षिण भारतीयों की दीवाली है, और इसी मध्य सनातन हिन्दू मंदिर की भी दीवाली है। मैंने हर जगह पर्ची कटा ली है, कि सबसे बात-मुलाकात हो जाए। मेरे जैसे और भी कई लोगों ने कटा ली होगी, और कुछ लोगों ने कहीं की नहीं कटायी होगी कि कौन जाए? पर्ची कटाने का मतलब हर जगह के खर्च भारतीय ही उठाते हैं, तो पैसे भी भरने ही होते हैं। और तोहफ़ेबाजी भी तो होगी। कुल मिला कर दीवाली में जेब का दिवाला निकलना तय है। मिठाई की दुकानें अधिकतर पाकिस्तानियों की है और उन्हें भी मालूम है कि दीवाली में डिमांड बढ़ेगी तो तैयारी पूरी रखते हैं। हाँ! पटाखों पर पाबंदी है, लेकिन फुलझड़ी और कुछ हल्की-फुल्की लड़ियाँ लोग चला ही लेते हैं। गीत-नृत्य भी खूब होता है, और मंदिरों में गरबा भी मिल सकता है। बड़े देशों में तो खैर बॉलीवुड कलाकार भी पहुँच जाते हैं, यहाँ भी कोई न कोई आ ही जाता है। कई विदेशी भी भारतीय परिधान पहन कर यह तमाशा देखने आ जाते हैं। उन्हें यह क्रिसमस का ही समकक्ष लगता है कि रोशनी है, हँसी-खुशी है, खान-पान है और तोहफ़े हैं। और यह भी कि नया साल आ रहा है।

Previously published in Prabhat Khabar

महेशवाणी और नचारी

भोला बाबा (शिव) के लिए मिथिला में दो तरह के गीत हैं- महेशवाणी और नचारी। दोनों का दो मूड है। यह अंतर समझना जरूरी है, क्योंकि कई बार एक ही तरह से गाने लगते हैं।

नचारी में हम नाच कर शिव से विनती कर रहे हैं, लेकिन इसका मूल ‘नाच’ नहीं, लाचारी है। इसमें भी पुरुष-स्त्री के गाने का लहजा अलग है। पुरुष तो वाकई लाचार दु:खी होकर गाएँगे- ‘कखन हरब दु:ख मोर हे भोलानाथ’ (कब मेरे दु:ख हरेंगे)। बाबाधाम के रास्ते में थके-भकुआए झूमते लेकिन करुणा भाव से गाते काँवड़िए मिलेंगे।

वहीं, स्त्रियाँ इस दु:ख में व्यंग्य का पुट ले आती है। उनकी शिकायत यह होती है कि इतने बूढ़े, फक्कड़ आदमी के साथ भला पार्वती कैसे रहेगी, जो भूतों की बारात लेकर आए हैं? तो यहाँ तंज-मिश्रित दु:ख है।

‘पैंच उधार माँगे गेलौं अंगना, सम्पति मध्य देखल भांग घोटना। गौरा तोर अंगना’

(संपत्ति के नाम पर बस भांग-घोटना है, शिव के आंगन में)

वहीं, महेशबानी इसका एक तरह से जवाब है। यह ‘डेविल्स एडवोकेट’ वाली बात है जिसमें शिव को हम डिफेंड करते हैं। हम इसमें ‘मनाईन’ (पार्वती की माँ) को कहते हैं कि शिव बहुत ही अच्छे व्यक्ति हैं, उन पर लांछन ग़लत है। और यहाँ भी कई बार भक्ति में तंज का प्रवेश हो जाता है, कि भोला बाबा तो भोले हैं। ग़लती तो भांग की है। यह निर्मोही हैं, दुनिया की सोचते हैं, इसलिए स्वयं फक्कड़ रहते हैं। बल्कि महेशबानी का टोन कभी-कभी यूँ लगता है जैसे अमिताभ बच्चन शोले में रिश्ता लेकर गए थे।

‘दु:ख ककरो नहि देल, अहि जोगिया के भांग भुलेलक/धथुर खुआई धन लेल”

(कभी किसी को दु:ख नहीं दिया हमारे महादेव ने; यह तो भांग-धतूरे ने फक्कड़ बना दिया)

नचारी में आप शिव के सामने खड़े हैं, और अपनी बात रख रहे हैं। महेशवाणी में हम शिव के साथ खड़े हैं, और शिव का पक्ष ले रहे हैं। यह बारीक लेकिन महत्वपूर्ण अंतर है। विद्यापति ने अगर गौरी की तरफ से शिकायत में और विनती में नचारी लिखी, तो शिव की तरफ से जवाब में महेशवाणी भी लिखी।

स्त्री-पुरुष, दोनों पक्ष से महादेव को देखना ही अर्धनारीश्वर की भक्ति का रूप रहा।

#ragajourney

दुर्लभ रागों के विशेषज्ञ: अलादिया ख़ान (A rare raga exponent)

भारत में कुछ चिकित्सक लिखते हैं- ‘दुर्लभ रोग विशेषज्ञ’ (rare disease specialist). ऐसी कोई डिग्री होती नहीं, लेकिन वह अपनी पहचान बना लेते हैं कि हल्के-फुल्के निमोनिया वगैरा नहीं देखेंगे। कुछ मामला फँसेगा, तो निपटाएँगे। एक हड्डियों के दुर्लभ रोग विशेषज्ञ मेरे वरिष्ठ भी हैं। आए दिन अखबार में रहते। उनका मानना है कि साधारण हड्डी जोड़ते कमाई तो होगी, नाम न होगा। उसके लिए कुछ दुर्लभ रोग ढूँढना होगा, जो लाखों में एक को होता हो। और इस तरह उनकी ओपीडी दुर्लभ रोगियों से भरी होती जिनको बाकी जगह से जवाब मिल गया होता।

संगीत में एक दुर्लभ राग विशेषज्ञ भी हुए। जब अलादिया ख़ान साहब की आवाज लंबे समय तक अमलेता में तान खींचते हुए चली गयी, तो वह कहीं के नहीं रहे। ऐसे समय में उन्होंने यही तकनीक सोची कि वह राग गाओ जो कोई न गाता हो। कॉमन रागों में तो मुकाबला तगड़ा होगा, दुर्लभ में कहाँ भिड़ोगे?

इस तरह जयपुर-अतरौली (अलादिया ख़ान) घराने में एक फ़ेहरिश्त बनी, और ऐसे-ऐसे भूले बिसरे राग गाए गए कि सब हैरान रहते। दूसरे बिहाग गाएँगे, तो वह बिहगड़ा गाएँगे। ‘निषाद’ से ट्विस्ट कर देंगे। और लोग मालकौंस तो वे संपूर्ण मालकौंस। दूसरे चांदनी केदार तो वे बसंती केदार। अब करो मुकाबला?

यही उनके अक्खड़ से नरम शिष्यों और घराने के गायिका-गायकों में भी ट्रांसफ़र हो गया। इस घराने में आइए। यहाँ दुर्लभ राग मिलेंगे। इनकी कोई शाखा नहीं।

#ragajourney

किशोर कुमार के किस्से (Stories of Kishore Kumar)

किशोर कुमार (आभास कु. गांगुली) और लता जी पहली बार कैसे मिले, इसकी एक कहानी पढ़ी-सुनी है। दोनों मलाड के बॉम्बे टाकीज़ में रिकॉर्डिंग के लिए जा रहे थे। अब लता जी उन्हें पहचानती न थी, पर जहाँ-जहाँ वो ट्रेन बदलती, किशोर कुमार भी बदलते जाते। लता जी को लगा कि कोई सरफिरा पीछे पड़ गया है। वो भागते-भागते स्टूडियो पहुँची, तो वहाँ भी पीछे आ गए। आखिर लोगों ने बताया कि ये अशोक बाबू के भाई हैं, और इनका नाम ही किशोर कुमार है जिनके साथ आपका गायन है।

किशोर दा लता जी से हमेशा अपनी फीस एक रुपया कम लेते, आदर स्वरूप। ऐसी एक रुपए की कहानी पं. रविशंकर और विलायत ख़ान की भी है, पर वो किसी और मसले पर है। वो फिर कभी। यहाँ बस किशोर जी का लता जी के लिए आदर था।

एक दफे लता जी लेट हो गयी, तो उनका हिस्सा भी किशोर दा ने गा दिया। वो गीत “आ के सीधी लगी दिल पे जैसे कटरिया” मशहूर भी रहा, जिसमें पुरूष-स्त्री की आवाज बदल-बदल कर किशोर दा ने मौज-मस्ती में गाया।

किशोर दा को बाद में ‘लता मंगेशकर सम्मान’ मिला। और जब यह सम्मान मिला, उसके अगले साल सरकार ने ‘किशोर कुमार सम्मान’ की भी घोषणा कर दी। मरणोपरांत भी किशोर दा उनके पीछे चलते ही रहे।

क्या किशोर कुमार पर के.एल. सहगल का प्रभाव था? इस पर संदर्भ सुनाने से पहले ये पूछता हूँ कि किशोर दा पर किस का प्रभाव नहीं था? वो तो मजाक-मजाक में अपने भ्राता अशोक कुमार की भी खूबसूरत नकल उतारते। बिना किसी संगीत प्रशिक्षण के वो किसी महान् गायक की कॉपी कर लेते। गायक तो छोड़िए, जरूरत पड़ने पर एक बार लता जी के बदले भी गा दिया!

अब सहगल वाली बात पर आता हूँ। एक दफे सचिन देव बर्मन किशोर दा के घर पहुँचे तो वह बाथरूम में थे और नहाते हुए के.एल. सहगल की कॉपी करते बीच में योडल कर रहे थे। जब वो बाहर निकले तो एस.डी. बर्मन ने कहा कि किशोर! तुम ये नकल छोड़ दो, गला तोड़ दो, फिर निकलेगी किशोर कुमार की आवाज!

“कहना है, कहना हैss आज तुम से ये पहली बार। तुम ही तो लाई हो जीवन में मेरे प्यार, प्यार, प्यार।”

फ्लाइट की तैयारी में यही गीत सुनने लगा और मिथिला पहुँच गया। किशोर कुमार ने ही पहुँचाया। वो जब पकड़े जाते हैं, तो ‘अनुराधा अनुराधा…’ कहकर चिल्लाते हैं। क्यों?

किशोर कुमार के कैरैक्टर का नाम इस फिल्म में विद्यापति है। अब आगे की कहानी का कोई पक्का स्रोत नहीं। पर, मैं जितना पता लगा सका, बताता हूँ।

1937 ई. में फिल्म आई थी ‘विद्यापति’ जिसमें पृथ्वीराज कपूर ने मिथिला नरेश शिव सिंह का किरदार निभाया था। उनकी पत्नी कवि विद्यापति से आकर्षित होती है। विद्यापति के कई गीत काफी कामुक हैं, जो अवश्य किसी प्रेमिका से जुड़े होंगें, पर मेरे पास साक्ष्य नहीं। इस फिल्म में उनका रानी से प्रेम दिखाया गया है। अब रानी गई विद्यापति के पास, तो राजा विद्यापति की संगिनी अनुराधा से जुड़ जाते हैं। यह क्रॉस-कनेक्शन है।

विद्यापति रानी के साथ, राजा विद्यापति की संगिनी (गर्लफ्रेंड) के साथ। और वही थी विद्यापति की अनुराधा। यह फिल्म उस समय एक विद्रोही और विवादित फिल्म भी कही गई, जो समाज पर कुप्रभाव डाल सकती थी। खैर।

एक और कनेक्शन यह है कि इस फिल्म में मन्ना डे के चाचा जी के.सी. डे अनुराधा को ढूँढते आते हैं और गीत गाते हैं “गोकुल से गए गिरधारी”। यही के. सी. डे सचिन देव बर्मन के गुरु थे। अब पड़ोसन में संगीत दिया आर.डी. बर्मन ने और मन्ना डे ने भी गायकी की, तो ट्रिब्यूट देना बनता है।

फिल्मों में कुछ भी यूँ ही नहीं होता। हर चीज की वजह होती है। विद्यापति की अनुराधा भी मुझे ‘फिल्मी फिक्शन’ में मिल ही गई। सच में ऐसी कोई अनुराधा थी या नहीं, ये नहीं पता। पर राजा शिव सिंह के समय विद्यापति तो थे।

#ragajourney

शहरनामा (Books on cities)

1. पटना

पटना: खोया हुआ शहर– अरुण सिंह

पटना रफ कट– सिद्धार्थ चौधरी

पटना: दास्तां-ए-पाटलीपुत्र- रामजी मिश्र मनोहर

पटना: अ मैटर ऑफ रैट्स- अमिताव कुमार

2. फैजाबाद

शहरनामा फैजाबाद- यतींद्र मिश्र

3. गोरखपुर

शहरनामा गोरखपुर- वेद प्रकाश पाण्डे

4. मुंबई

मैक्सिमम सिटी- सुकेतु मेहता

5. लखनऊ

किस्सा किस्सा लखनऊआ- हिमांशु वाजपेयी

लखनऊ: सिटी ऑफ इल्यूजन- रोज़ी जोन्स

आपका लखनऊ- योगेश प्रवीण

लखनऊ मेरा लखनऊ- मनोहर श्याम जोशी

दूसरा लखनऊ- नदीम हसनैन

लखनऊ डोमेनियर्स- अखिलेश मयंक

6. दिल्ली

दिल्ली जो एक शहर था- महेश्वर दयाल

सिटी ऑफ ज़िन्स- विलियम डैलरिम्पल

डेल्ही:अननोन टेल्स ऑफ सिटी और लिंगरिंग चार्म्स ऑफ डेल्ही- आर वी स्मिथ

डेल्ही- खुशवंत सिंह

7. बनारस

कैलिडोस्कोप सिटी: अ यर इन बनारस- पियर्स मूर

बनारस: सिटी ऑफ लाइट्स- डायना एल एक

काशी- ओ.पी. केजरीवाल

8. कावरेत्ती

लक्षद्वीप एडवेंचर्स- दीपक दयाल

9. पॉन्डिचेरी

अ हाउस इन पांडीचेरी- ली लांग्ले

10. जमालपुर

जमालपुर का साहित्यिक इतिहास- उमाशंकर निशेष

नाइट ट्रेन टू जमालपुर- एंड्रयूज मार्टिन

जमालपुर यर्स- आनंदमूर्ति

11. कलकत्ता

सिटी ऑफ जॉय- डोमिनिक लापीयरे

12. बेंगलुरू

बैंगलोर- पीटर कोलैको

13. जैसलमेर

सोनार किला- सत्यजीत रे

14. पलामू

कोयल के किनारे किनारे

मक्लुस्कीगंज- विकास कु. झा

15. दरभंगा

डिस्ट्रिक्ट गजेटियर- पी.सी. राय चौधरी

16. गाज़ीपुर

आधा गाँव- राही मासूम रज़ा

श्वेत पत्र- विवेकी राय

17. देवास

एक शहर देवास, कवि नईम और मैं- प्रकाश कांत

18. राँची

राँची स्मृति मंजूषा- राम रंजन सेन

राँची: तब और अब- श्रवण कु. गोस्वामी

19. समस्तीपुर

समस्तीपुर गजटियर- नरेश कुमार विकल

20. इलाहाबाद

जीरो रोड- नासिरा शर्मा

शहर में कर्फ्यू- विभूति नारायण राय

21. शाहजहाँपुर

शाहजहाँपुर का इतिहास- नानक चंद महरोत्रा

22. बगहा

जंगल जहाँ से शुरू होता है- संजीव

23. जौनपुर

कोहबर की शर्त- केशव प्रसाद मिश्र

24. मुंगेर

मुंगेर, थ्रू द एजेज- डी पी यादव

#शहरनामा

The old man with ‘tuk tuk

पाकिस्तान ही क्या, यह उपमहाद्वीप की ही समस्या थी कि विकेट गिरने शुरु होए तो फिर ताश के पत्तों की तरह गिर गए। कुछ मौके आते कि पाँच विकेट गिरने पर कपिल देव ने अकेले धुआँधार खेल मैच जिता दिया, या जावेद मियाँदाद जम गए और आखिरी गेंद में छक्का मार ही जीता। लेकिन यह बस कुछ यादगार पारीयों तक ही सिमटा था। श्रीलंका में भी राणातुंगा-डीसिल्वा ने ‘96 के आस-पास ही मिडल-ऑर्डर को मजबूती दी, लेकिन तब तक वे बूढ़े हो चुके थे।

लेकिन, बूढ़े खिलाड़ियों में एक नाम उस वक्त जरूर याद आता है जब भारत-पाकिस्तान का खेल आता है। जिस उम्र में खिलाड़ी रिटायर होने लगते हैं, उस वक्त यह खिलाड़ी टी-20 टीम में चुना जाता है। छठे स्थान पर उतर कर पाकिस्तान को कई खेलों में विजय दिलाता है, जोगिंदर शर्मा के आखिरी ओवर में भी छक्का लगा कर भारतीयों को मियाँदाद की याद दिलाता है। और फिर भारत से हार कर पाकिस्तान की जनता के लिए मरदूद बनता है।

पाकिस्तान में चुटकुले चलते, उलाहना दिए जाते कि मिस्बा-उल-हक कि तरह टुक-टुक मत कर यार! लेकिन इस खिलाड़ी में टुकटुकाने की भी क्षमता थी, और लंबे छक्के लगाने की भी। यह पाकिस्तान का सबसे सफल टेस्ट कप्तान भी बना। लेकिन मिस्बा-उल-हक पाकिस्तान में मोहाली की उस हार के लिए ही याद किया जाता रहेगा, जब वह अंत तक अकेले लड़ता तो रहा लेकिन यह बूढ़ा आखिर गिर गया।

भारत को भी यह फिनिशर जरूर याद रहेगा, जो फिनिश न कर सका।

#दीवार #finishers #cricket

पायजामा पिकासो (The Pyjama Picasso)

एकदिवसीय खेल कभी ओपनर्स का खेल था। वह गिरे तो खेल लगभग खत्म। अब तेंदुलकर-गांगुली गिरे, या मार्श-बून। यह जरूर था कि इन्हें गिराना आसान न था। लेकिन विश्व-विजेता टीमों में जब बड़े-बड़ों के गिरने का लोग जश्न मना रहे होते, तो च्विंगम चबाते खूँखार विवियन रिचर्ड्स को मैदान में आते देख सोचते कि भला क्यों विकेट जल्दी-जल्दी ले लिए।

इन ‘मिडल-ऑर्डर’ के उस्तादों में जब ऑस्ट्रैलिया के एक खिलाड़ी की चिकित्सकीय जाँच हुई तो पाया गया कि उसकी हृदय-गति कम है, और फेफड़े मजबूत हैं। यानी वह तनाव लेता नहीं, और भाग खूब सकता है। उस खिलाड़ी माइकल बेवन ने अपनी जीवनी में भी लिखा कि तनाव देने की ही चीज होती है, लेने के नहीं। चार गेंद में बारह ही रन तो बनाने हैं। वह चाहते तो पहले तेज गति से भी खेल सकते थे, लेकिन वह कछुआ चाल से धीरे-धीरे रन चुराते हुए इस मंजिल तक पहुँचे और फिर जीत भी गए। बस हर गेंद में एक रन आने की तरकीब हो, एक गेंद छूटी तो दो रन; दो गेंदें छूटी तो एक चौका।

एक समीक्षक ने कहा कि बेवन के दिमाग में कैलकुलेटर है, और हाथ में एक नाजुक चिमटा है। वह अपनी मर्जी से गेंद को उठा कर दो फील्डर के बीच निकालना जानता है। और इसलिए स्टीव वॉ ने उन्हें पायजामे में पिकासो कहा, जबकि स्टीव वॉ स्वयं इस तकनीक के उस्ताद थे। जो ‘96 के बाद के क्रिकेट देख रहे होंगे, उन्होंने बेवन को आउट होते कम ही देखा होगा। बल्कि ‘नॉट आउट’ रहने की वजह से उनका औसत उनके उच्चतम स्कोर से अधिक था।

एक खिलाड़ी जिसने अपने जीवन में गिने-चुने छक्के लगाए, दो सौ से ऊपर मैचों में मात्र छह शतक लगाए, आज भी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ फिनिशर्स में क्यों गिना जाता है? कुछ तो बात होगी।

#दीवार #finishers #cricket #walls

सोशल मीडिया में ‘कन्फ्लिक्ट-मैनेजमेंट’

सोशल मीडिया में आपसी टकराव या मतभेद आम बात है, किंतु कभी-कभार इससे मित्रता टूटने से लेकर मानसिक क्षति तक बात पहुँच जाती है। सोशल मीडिया की वजह से दंगे भी हो रहे हैं, और मृत्यु भी। विश्व के अधिकतर देशों में (भारत में भी) राजनीति और धर्म अहम् मुद्दे हैं, जिनसे सोशल मीडिया में ‘कन्फ्लिक्ट’ जन्म लेते है। लोकतांत्रिक देशों में पार्टी या पंथ की ओर झुकाव होना प्राकृतिक है। सब के वैयक्तिक विचार और पारिवारिक मसले भी भिन्न हैं। अलोकतांत्रिक देशों में तो सोशल मीडिया पर एक हद तक पाबंदी और नियंत्रण भी है। कई बार लिखने वाला बच निकलता है, और उसकी पोस्ट शेयर होकर युवाओं या अपरिपक्व लोगों के बीच मतभेद का कारण बनती है। वहीं दूसरी ओर, लेखक पर भी भौतिक, मानसिक या वैधानिक आघात संभव हैं। तो यह सवाल मौजू है कि इनसे कैसे निजात पाएँ? ‘कन्फ्लिक्ट-मैनेजमेंट’ आखिर कैसे करें?

सोशल मीडिया या कहीं भी ‘कन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट’ के पाँच सूत्र है- दो ‘A’ और तीन ‘C’.

१. Accomodate – एक को हार माननी होगी या दूसरे की बात माननी होगी।

२. Avoid- आप घोर असहमत हैं, तो टिप्पणी न करना। या लगे कि बिल्कुल नहीं बनने वाली, तो ब्लॉक करना।

३. Collaborate- दो, पाँच या सौ भिन्न प्रवृत्ति के लोग किसी एक बिंदु के लिए सहयोग दे सकते हैं। सोशल मीडिया समूह बना सकते हैं। उसके नियम बना कर संगठित रूप से कुछ सकारात्मक कर सकते हैं।

४. Compromise- सिर्फ एक नहीं, दोनों कुछ कदम पीछे लें, माफी माँगें, समझौता करें। कहा-सुना माफ करें।

५. Compete- यह मीमांसा कही जा सकती है। कई बार दो श्रेष्ठ और योग्य व्यक्ति एक दूसरे की रचनात्मक आलोचना कर सकते हैं, शास्त्रार्थ कर सकते हैं। इससे भी ज्ञान-सृजन होता है।

दो या अधिक व्यक्तियों के मध्य भिन्न-भिन्न स्थिति संभव है। पूर्ण असहमति गर अभिव्यक्त हो, तो उत्तर छोटी दें या न दें, या यह स्पष्ट कह दें कि चूंकि पूर्ण असहमति है, इसलिए इसमें बात आगे संभव नहीं। कुछ कदम तो दोनों को चलना होगा। ज्यादा असहमति या किसी खास बिंदु पर घोर असहमति हो तो इसका यथासंभव उत्तर दिया जा सकता है। पर शुरूआत कुछ ऐसा करना ठीक है कि, “आपकी असहमति का सम्मान है लेकिन…” इत्यादि। थोड़ी असहमति का तो दिल खोल कर स्वागत करें। आप यह भी कह सकते हैं, “आपकी बात ठीक है। मैं ही गलत कह गया।” या “आपका प्वाइंट नोट कर लिया है।” इत्यादि। पूर्ण असहमति की पुनरावृति हो रही हो यानी कोई बारम्बार आपसे पूर्ण असहमत हैं। यह ‘डेडलॉक’ है, जिसका हल असंभव हो रहा है। इसमें ईर्ष्या और घृणा भी जुड़ सकती है। एक-दूसरे को पढ़ कर तनाव हो सकता है। वो आपके न उत्तर देने पर भी टिप्पणियों में दूसरों से उलझते दिख सकते हैं। इसके दो पैटर्न हैं। पहला यह कि वह व्यक्ति परिपक्व हैं या मंजे खिलाड़ी है। आपसे असहमति के बाद भी आपको पढ़ते रहे हैं, और आप आश्वस्त हैं कि उन्हें तनाव नहीं होता। उनके साथ कुछ मजाकिया नोंक-झोंक चल सकती है। पर उनके पैटर्न को समझने में वक्त जरूर लगाएँ। दूसरा यह कि वह व्यक्ति नियमित रूप से क्रोधित हैं, या अपशब्द कह रहे हैं और आप यह महसूस कर रहे हैं कि वह तनाव में हैं। ऐसे में आपस में पर्दा डालना ही श्रेयस्कर होगा। इसे फ़ेसबुक के शब्दों में ‘ब्लॉक’ कहते हैं, पर यह उनकी तनाव-मुक्ति के लिए आवश्यक है। किसी भी परिस्थिति में “Thy shall do no harm.” यानी आप किसी को मानसिक या शारीरिक हानि पहुँचाने का प्रयास न करें। दूसरों की क्षति तो न ही हो।

अगला प्रश्न यह है कि अपनी क्षति कैसे रोकी जाए?

हर व्यक्ति का आत्मावलोकन ढर्रा अलग है। कई लोग सोशल मीडिया से ही दूरी बना लेते हैं। ख़ास कर भारतीय महिलाएँ अपना दायरा समेट लेती हैं। यह उचित भी है कि सोशल मीडिया से एक सुरक्षित दूरी बना कर रखी जाए। लेकिन यह आज के ‘स्मार्ट-फोन’ दौर में असंभव होता जा रहा है। आप इससे बच कर नहीं रह सकते। अकेले पड़ जाएँगे। यह अपने-आप में अवसाद का कारण है। किशोर और युवा-वर्ग में एक और बात देखी जा रही है कि वे ‘पीयर-प्रेशर’ में अवसाद-ग्रस्त हो जाते हैं। फलाँ बेहतर दिखता है, बेहतर लिखता है, बेहतर जीवन जीता है। इससे अवसाद जन्म लेता है। लेकिन, यह एक ‘वर्चुअल’ दुनिया का अंदाजा भी देता है कि बाहर की दुनिया में भी इस तरह के तनाव मौजूद हैं। यह एक तरह का ‘सिमुलेशन प्रॉजेक्ट’ है कि आप ‘वर्चुअल’ दुनिया के तनाव झेल गए, तो बाहरी दुनिया के तनाव झेलने में कुछ आसानी होगी। कूप-मंडुक नहीं रहेंगे और यह खबर होगी कि दुनिया में भांति-भांति की प्रतिभाएँ हैं। इनसे किसी भी तरह का ‘पीयर-प्रेशर’ न बनने पाए।

एक दूसरा माध्यम है तकनीक का उपयोग। तकनीक अब यह बता देती है कि सोशल मीडिया का प्रतिदिन कितने घंटे उपयोग किया जा रहा है। इसे धीरे-धीरे एक सुरक्षित स्तर तक लाया जा सकता है। हालांकि सुरक्षित स्तर की परिभाषा अब तक नहीं बनी। आज जब सोशल मीडिया प्रोमोशन का भी माध्यम है, संवाद का भी, और वांछित-अवांछित ज्ञान का भी, तो यह स्तर तय करना कठिन है। कई लोगों ने इसे सकारात्मक साधन बनाया है, और उनका सोशल मीडिया उपयोग अधिक है। इसके विपरीत कई लोगों ने इसे नकारात्मक साधन बनाया है, और उनका भी उपयोग अधिक है। तो यह स्पष्ट है कि नकारात्मक उपयोग का स्तर और समय घटाना है, या शून्य करना है।

कई बार सोशल मीडिया से ‘ब्रेक’ लेना भी नकारात्मकता घटाता है, जब पुनर्जागृत होकर लौटते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि व्यक्ति के वास्तविक जीवन और वर्चुअल जीवन के मध्य का अनुपात क्या है? ऐसे केस मिल रहे हैं, जब सोशल मीडिया पर मुखर व्यक्ति जब किसी से आमने-सामने बात करते हैं तो एक शब्द नहीं कह पाते। उनकी मुस्कुराहट फ़ोन तक ही सीमीत रह जाती है और वास्तविक जीवन में हँस नहीं पाते। यह स्थिति उचित नहीं। सोशल मीडिया में बिताया गया समय बाहरी दुनिया में बिताए गए समय से कम हो, तो अवसाद या ‘मल्टिपल पर्सनालिटी डिसॉर्डर’ की समस्या कम होगी।

स्वयं को सुरक्षित रखने के दो अन्य मुख्य साधन हैं- धैर्य और सचेतना। अक्सर सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया बहुत शीघ्र आती है, जिससे बचना चाहिए। वक्त लेकर ही प्रतिक्रिया देनी चाहिए या धारणा बनानी चाहिए। यह धैर्य आवश्यक है। इसी तरह विश्लेषक क्षमता और सचेतना। बहुकोणीय विश्लेषक क्षमता हर किसी में हो, यह जरूरी नहीं। यह अनुभव और अध्ययन से ही शनै:-शनै: विकसित होता है। लेकिन ‘कन्फ्लिक्ट’ के अवसर पर सभी पक्षों को समझना और विश्लेषण करना सोशल मीडिया में भी संभव है। चेतना मनुष्य का गुण है, जिसके लिए इन्द्रिय सक्रिय रहने चाहिए। ‘परसेप्शन’ तभी तो संभव होगा। आधी बात पढ़ना, ध्यान न देना, या यूँ ही कुछ लिख देना चेतना की कमी है।

सोशल मीडिया विश्व में अपेक्षाकृत नयी विधा है, जो पिछले दो दशकों में विकसित हुई है। इसमें परिपक्वता आने में भी वक्त लगेगा और प्रयोग भी करने होंगे। किसी भी निष्कर्ष पर अभी पहुँचना कठिन है। कोई ‘गोल्डेन रूल’ भी बनाना असंभव है। लेकिन जो मूलभूत साधन हैं, जिसे हम संवाद में प्रयोग में लाते हैं, वह नहीं बदलते। समस्या तभी आती है जब हम ‘वर्चुअल’ दुनिया को वास्तविक दुनिया से अलग रखते हैं, और दोनों को दो भिन्न रूप में जीने लगते हैं। यह दोनों जब एकरूप होंगे तो समस्या नहीं होगी। यानी काल्पनिक दुनिया में जिससे हम संवाद कर रहे हैं, उनसे उसी रूप में करें जैसे वह सामने बैठे हों। जिस तरह से हम बाहर विवाद सुलझाते हैं, उसी तरह सोशल मीडिया में भी। यह बात जितनी साधारण और सहज लगती है, उतनी है नहीं। आखिर ‘कन्फ्लिक्ट’ बाहरी दुनिया में भी, ‘वर्चुअल’ में भी और मनुष्य के अपने मष्तिष्क में भी। अगर यह सहज होता, तो ‘कन्फ्लिक्ट’ होते ही क्यों? यह व्यक्तिगत नहीं, सामाजिक परिपक्वता की बात है, जिसके लिए सामूहिक और बहुपक्षीय प्रयत्न से ही रास्ता निकलता है।

Previously published in Kadambini June 2019

भारतीय आहार (Indian diet)

१ जून, १८९१

लेखक- मोहनदास करमचंद गांधी

अनुवाद- प्रवीण कुमार झा

इस लेख की शुरूआत से पहले अपनी योग्यता बता दूँ। जब मिल्स ने भारत का इतिहास लिखा तो अपनी योग्यता बताई, हालांकि न वो भारत कभी गए और न ही वहाँ की भाषाएँ जानते थे। तो मैं वही लिखूँगा, जो मुझे लिखना चाहिए। जब भी कोई किसी से योग्यता पूछता है, इसका अर्थ है कि उसे विश्वास नहीं। तो मैं पहले ही कह दूँ कि भारत के भोजन पर लिखने के लिए मैं स्वयं को योग्य नहीं समझता। दरअसल मैं योग्यता सिद्ध करने के लिए नहीं लिख रहा, बल्कि इसलिए क्योंकि भारत मेरे दिल से जुड़ा है।

मैं बॉम्बे प्रेसिडेंसी के अनुभव लिखूँगा। हालांकि भारत में लगभग २.८ करोड़ लोग रहते हैं। यह यूरोप से अगर रूस अलग कर दें, तो उतना बड़ा देश है। इतने बड़े देश में कई परंपराएँ पलती हैं। तो अगर मेरे लेख से अतिरिक्त आपको कुछ भविष्य में पता लगे, तो यह स्वाभाविक है।

मैं तीन भागों में अपनी बात रखूँगा। पहला वहाँ के लोगों के संबंध में। दूसरा भोजन, और तीसरा भोजन के फायदे इत्यादि।

यह माना जाता है कि भारत में सब शाकाहारी हैं, पर यह सत्य नहीं, यहां तक कि सभी हिन्दू भी नहीं। किंतु बहुसंख्यक शाकाहारी हैं। पर भारत के मांसाहारी आपसे अलग हैं। वो यह नहीं सोचते कि मांस के बिना मर जाएंगें। यह उनका शौक है, जिंदगी की जरूरत नहीं। उन्हें गर खाने को बढ़िया रोटी मिल जाए, खुशी-खुशी खाएंगें। जबकि ब्रिटिश मांसाहारी को हर रोज मांस चाहिए ही। ब्रिटिश को मांस चाहिए, ब्रेड बस उनके पाचन में सहायक है। भारतीय को रोटी चाहिए, मांस बस उसको पचाने के लिए सहायक है।

कल मैं एक अंग्रेज महिला से शाकाहार के विषय में कह रहा था। उन्होनें कहा कि मांस के बिना उनका जीवन संभव नहीं। मैनें पूछा कि अगर कभी ऐसी परिस्थिति आए कि शाकाहारी बनना पड़े। उन्होनें कहा कि यह उनके जीवन का सबसे बुरा वक्त होगा। मैं उन्हें दोष नहीं देता। यह आपके समाज की समस्या है कि आप मांस के बिना नहीं रह सकते।

अब मैं भारत के शाकाहारी भोजनों पर आता हूँ। भारत एक कृषि-प्रधान देश है, विशाल। इसलिए हमारे कृषि उत्पाद भी विस्तृत हैं। हालांकि ब्रिटिश लोग भारत में १७४६ ई. में ही आ गए, पर विडंबना है कि लंदन में भारतीय भोजन कोई जानता ही नहीं। पर इसके जिम्मेदार भी आप ही हैं। आप भारत जा कर भी अंग्रेजों जैसे ही रहते हैं, भारतीयों की तरह नहीं। आपको भोजन तो अंग्रेजी चाहिए ही, बल्कि उसे बनाया भी अंग्रेजी तरीके से जाए। यह तो मनुष्य का सामान्य गुण है कि वो दूसरों की संस्कृति से कुछ सीखे, पर आपमें ऐसी चेष्टा कम दिखी। तमाम ऐंग्लो-इंडियन ने भारत के शाकाहार से कुछ नहीं सीखा।

खैर, आपकी निंदा को विराम देते हुए, हम बात करते हैं भारत के भिन्न-भिन्न प्रकार के मकई की।

गेंहूँ भारत का एक मुख्य अनाज है। चावल, बाजरा, और ज्वार भी। अमीर गेंहू की रोटी खाते हैं, तो गरीब ज्वार-बाजरा की। खासकर दक्षिणी और उत्तरी प्रांतों में। हंटर ने दक्षिणी प्रांतों के बारे में लिखा कि ज्वार, बाजरा और रागी वहाँ प्रमुख हैं। उत्तर के बारे में वो लिखते हैं कि अमीर वहाँ चावल अधिक खाते हैं। आपको भारत में ऐसे लोग मिलेंगें जिसने कभी ज्वार चखा ही न हो। पर गरीब इसकी बहुत इज्जत करते हैं। यहाँ तक कि वो किसी को अलविदा करते वक्त कहते हैं, “ज्वार!” यानी “तुम्हें जीवन भर ज्वार मिलता रहे”। बंगाल प्रांत में चावल की रोटी भी बनती है। बंगाली रोटी से अधिक चावल खाते हैं। देश के अन्य प्रांतों में चावल की रोटी कम ही बनती है।

रोटी तो चने की भी भारत में बनती है, गेंहूँ मिलाकर। और मटर की भी। पर इससे मुझे अब तरह-तरह के दाल याद आ गए। अरहर, चना, मूंग, तूअर, मोठ*, उरद इत्यादि। इनमें तूर दाल काफी लोकप्रिय है। सब्जियों की बात मैं करूँ तो यह भाषण समाप्त नहीं हो पाएगा। भारत की मिट्टी अनगिनत सब्जियाँ पैदा करती हैं। इसको ऐसे भी कह सकते हैं कि गर भारत को कृषि का संपूर्ण ज्ञान दिया जाए तो दुनिया की हर सब्जी उगाना यहां मुमकिन होगा।

अब आते हैं फलों और बादाम पर। यह विडंबना है कि भारत में फलों की महत्ता कम लोग समझते हैं। हालांकि प्रयोग खूब है, लेकिन एक शौक की तरह। इसे स्वाद के लिए खाते हैं, स्वास्थ्य के लिए नहीं। इस कारणवश भारत के लोगों को स्वास्थ्यप्रद फल जैसे सेब और नारंगी इत्यादि प्रचुर मात्रा में नहीं मिलते। हालांकि मौसमी फल-बादाम खूब मिलते हैं। जैसे गर्मियों में आम सबसे लोकप्रिय है। आम से स्वादिष्ट फल मैनें आज तक नहीं चखा। बहुत लोग अनानस को सर्वोत्तम कहते हैं, पर जिसने आम चख लिया, वो आम को ही सर्वोच्च रखता है। यह तीन महीने मिलता है, और सस्ता है तो अमीर-गरीब सब खा पाते हैं। मैनें तो यह भी सुना कि कुछ लोग बस आम खा कर ही इन महीनों में रहते हैं।

पर समस्या है कि आम ज्यादा दिन टिकते नहीं। यह खाने में आपके सतालू के करीब कहा जा सकता है, और इसमें गुठली होती है। यह कभी-कभी एक छोटे तरबूज जितना बड़ा भी होता है। अब तरबूज याद आ गया, वो भी खूब मिलते हैं गर्मियों में। आपके इंग्लैंड से कहीं बेहतर तरबूज। खैर, अब आपको और फलों के नाम बताकर बोर नहीं करूँगा। बस यह समझ लें कि भारत में मौसमी फलों की कमी नहीं।

यह सब फल गरीबों को मिलते हैं पर दु:ख है कि वो इसका सदुपयोग नहीं करते। कई लोगों को यह भी लगता है कि फल से पेट खराब होता है, हैजा फैलता है। आपका प्रशासन इन पर कुछ हिस्सों में रोक भी लगा देता है। खैर।

बादाम तो भारत में लगभग सभी मिलते हैं। कुछ यहाँ के बादाम हालांकि वहां नहीं मिलते, और कुछ वहां के यहां नहीं मिलते। पर हम बादाम को भोजन नहीं मानते। इसलिए इनकी चर्चा पर मैं विराम देता हूँ। अब बात करेंगें कि भारत में भोजन बनता कैसे है।

अब आपको भारतीय भोजन बनाना इस भाषण में तो नहीं सिखा पाऊँगा। यह मेरी शक्ति से परे है। पर एक रूपरेखा दे देता हूँ। भोजन से उपचार इंग्लैंड में नया-नया आया है। पर भारत में यह कई सदियों से चला आ रहा है। हमारे चिकित्सक दवा भी देते हैं, पर उनके उपचार का बड़ा हिस्सा भोजन में बदलाव है। कभी वो नमक से परहेज कहेंगें, कभी तीखे भोजन से।

अब साधारण सी बात है कि हम गेंहू पीसते हैं, तो उसमें से भूसी/चोकर अलग नहीं करते। हम ताजी पकाई रोटी ही खाते हैं घी लगाकर, ठंडी नहीं। हमारा मांस यही है। कोई कितना खाता है, यह रोटियों की संख्या से ही पता लगता है। दाल-सब्जी की गिनती नहीं होती। बिना दाल, या बिना सब्जी के भोजन संभव है पर बिना रोटी के नहीं।

दाल काफी आसान है। बस पानी में उबालना है। पर उसमें स्वाद तमाम मसालों से आता है। और यहीं कला है। कितनी नमक, कितनी हल्दी, कितना जीरा, कितनी लौंग, और दालचीनी। दाल अच्छी होगी, तो रोटी का लुत्फ आएगा। हालांकि दाल बहुत अधिक भी नहीं खानी चाहिए। और चावल की चर्चा भी कर ही दूँ। लोग कहते हैं कि बंगाली चावल अधिक खाते हैं, तभी मधुमेह के शिकार होते हैं। चावल और रोटी में रोटी बेहतर है। चावल अमीर ज्यादा खाते हैं। गरीब मजदूर रोटी खूब खाते हैं। हालांकि जब मुझे ज्वर हुआ, तो मुझे डॉक्टर ने गीला भात और उसका पानी पीने कहा। और मैं ठीक भी हो गया।

अब आते हैं सब्जियों पर। बनाने का तरीका दाल जैसा ही है, पर तेल और मक्खन का उपयोग ज्यादा होता है। कई बार बेसन भी। हम सादी उबाली हुई सब्जी नहीं खाते। उबले आलू जो आप खाते हैं, भारत में नहीं मिलते। भारत सब्जियाँ बनाने में फ्रांस से कहीं बेहतर है। सब्जी हमारे भोजन में दाल का सहयोगी है। और यह शौक की चीज भी है, कुछ बीमारियों की वजह भी। गरीब सब्जियाँ कम खाते हैं, उनको बस दाल-रोटी मिल जाए, काफी है। कुछ सब्जियाँ स्वास्थ्यवर्द्धक हैं। जैसे एक पालक जैसी दिखने वाली सब्जी ‘तंडलजा’ *। यह आंखों की रोशनी के लिए बहुत अच्छी है।

फिर आते हैं फल। हम खासकर फलाहार के दिन खाते हैं, रोज-रोज भोजनोपरांत नहीं खाते। आमरस खासकर आम के महीने में लोकप्रिय है, रोटी या चावल के साथ। हम फल को कभी पकाते नहीं। ताजे फल खाते हैं, कई बार खट्टे भी, भले ही स्वास्थ्य के लिए ठीक न हो। सूखे फल बच्चे खूब खाते हैं, जैसे छुहारे। यह शीतकाल में खासकर खाए जाते हैं। छुहारे गरम दूध में डाल कर, और तरह-तरह के मिष्टान्नों में।

बच्चे मीठे बादाम भी खूब पसंद करते हैं। मक्खन और दूध में तले बादाम। नारियल भी हम पीस कर दूध और चीनी डाल कर खाते हैं। आपको नारियल कभी ऐसे लड्डू बना कर चखना चाहिए।

आप सब को एक बात स्पष्ट कर दूँ कि यह भारतीय भोजन का बहुत ही छद्म ज्ञान था। आपको आगे खुद जानना और सीखना होगा। यह अंग्रेजी मांसाहारी और हिंदुस्तानी शाकाहारी भोजन का विभाजन हमारी संस्कृतियों को अलग करता है, जिसे जोड़ना होगा। तभी आपकी हिंदुस्तानियों के प्रति घृणा खत्म होगी। भोजन से ही दो देशों के दिल जुड़ सकते हैं।

#गांधीसाहित्य

(पोर्ट्समाउथ के इस भाषण में गणमान्य ब्रिटिश व्यक्तियों के बीच बाइस वर्ष के गांधी बोलने में काफी घबड़ा रहे थे, जो इस लेख के शुरूआती हिस्से में नजर आता है। The vegetarians 16-5-1891 की रिपोर्ट)

महेंद्र कपूर के क़िस्से (Mahendra Kapoor)

महेंद्र कपूर और राज कपूर सोवियत रूस गए। रूस में तो राज कपूर भगवान थे, महेंद्र कपूर को कोई जानता न था। सभी दर्शक राज कपूर को ही गाने कहने लगे। तो राज कपूर ने गाया, और महेंद्र कपूर ने हारमोनियम बजाया। महेंद्र कपूर ने एक रूसी अनुवादक को कहा कि ‘नीले गगन के तले’ गीत का फटाफट अनुवाद कर दें। और रट्टा मार कर स्टेज पर रूसी भाषा में यह गीत गा दिया। अब तो सभी रूसी उत्साहित होकर तालियाँ बजाने लगे। राज कपूर जब स्टेज पर लौटे तो महेंद्र कपूर हीरो बन चुके थे। राज कपूर ने कहा, “एक कपूर ही दूसरे कपूर को मात दे सकता है।”

एक दूसरा वाक्या है कि एक शाम को पेग लगाते हुए महेंद्र कपूर को राज ने कहा कि तुम्हें बंबई में अपने फ़िल्म में गीत दूँगा। उन्होंने कहा कि आप बड़े आदमी हैं, बंबई जाकर भूल जाएँगे। राज कपूर ने तुरंत जलती सिगरेट लेकर अपनी हथेली पर बुझाया, और कहा कि अब यह दाग़ मुझे याद दिलाता रहेगा कि तुम्हें एक गीत देना है।

वादे के मुताबिक भारत लौट कर राज कपूर ने उन्हें अपनी फ़िल्म में गीत दिया- हर दिल जो प्यार करेगा, वो गाना गाएगा।

आगे की कहानी और मज़ेदार है। मनोज कुमार को इतिहास का बहुत ज्ञान था, और वह महेंद्र कपूर को हर देशभक्ति गीत के समय जोश दिलाने के लिए आजादी से जुड़े क़िस्से सुनाते थे। महेंद्र कपूर भी इन क़िस्सों को सुन कर जोश में आ जाते।

एक बार प्रगति मैदान, दिल्ली में कई गायक और कलाकार आए थे। पहले मो. रफ़ी, मुकेश और किशोर कुमार का गायन था, आखिरी में महेंद्र कपूर का। महेंद्र कपूर ने मनोज कुमार को कहा कि इन तीनों के गाने के बाद मेरा गीत कौन सुनेगा? सभी दर्शक निकल लेंगे। मनोज कुमार ने उन्हें भरोसा दिलाया कि कोई नहीं भागेगा, तुम गाओ। उन्होंने सेटिंग करवा कर प्रगति मैदान के हॉल का दरवाजा बंद करवा दिया कि कोई भागने न पाए। और दिलीप कुमार को कह दिया कि सभी लोगों को लेकर गीत के दौरान स्टेज़ पर चढ़ जाएँ।

दर्शक भागने ही वाले थे कि देखा दरवाजा बंद है। उधर महेंद्र कपूर ने स्टेज पर आकर अपनी ट्रेडमार्क बुलंदी से ‘मेरे देश की धरती’ गाना शुरू कर दिया।दर्शक जो भागने को खड़े थे, वे उंगली उठा-उठा कर नाचने लगे, सभी अभिनेता और गायक भी स्टेज़ पर पहुँच गए।

अगले दिन अखबार में छपा, “मेरे देश की धरती ने महफ़िल जमा दी”

#ragajourney

(यह दोनों संस्मरण एक अंग्रेज़ी लेख से)