मैथिली भाषा पर कुछ बातें

मुझे नहीं लगता कि इस भाषा का पतन हो रहा है, या यह कभी खत्म होगी जैसा हालिया एक ट्वीट में देखा। बल्कि अभी इतने किताबें छप रही हैं जितनी शायद दशकों से नहीं छपी होगी। रोज ही कोई न कोई विमोचन हो रहा है। मेरे घर में, पाँच घर छोड़ के, दो गाँव छोड़ के, दो जिला छोड़ के। हर जगह। हिन्दी के क्षेत्र के अनुपात से पाँच-दस गुणा अधिक और लोग खर्च कर के छपवा रहे हैं। पढ़ी भी जा रही है, जितनी पहुँच है उतनी।

शुरु से ही विश्वविद्यालय में पढ़ाई रहने की वजह से शोध और विमर्श खूब छपे हैं और नियमित छप रहे हैं। प्रोफेसरों को छपवाना पड़ता भी है कि तरक्की होती रहे, और यूँ भी। शोध छपने की क्या महत्ता है, यह बताने की जरूरत नहीं।

एप्रोच शब्दश: लड़ाका नहीं रहा, लेकिन भाषा के मामले में समय-समय पर मुहिम चलती ही रहती है। कोई मैथिल यह पोस्ट पढ़ कर भी लिख जाएँगे कि हिन्दी में क्यों लिखा।

मैथिली से इतर भी क्रॉस-मार्केटिंग होती रही है, और हिन्दी तथा अंग्रेजी में लोग मिथिला पर नियमित लिखते रहे हैं। इन माध्यमों से मैथिली की बात होती रही है। बल्कि बाकायदा एक सम्मान/पुरस्कार है जो सिर्फ उन्हें मिलता है जो हिन्दी और मैथिली, दोनों में लिखते हों। तो नागार्जुन, आरसी प्रसाद सिंह, हरिमोहन झा, राजकमल चौधरी, गंगेश गुंजन, उषाकिरण खाँ जी जैसे लोग यह द्विभाषी धर्म बखूबी निभाते रहे हैं। वहीं जयकांत मिश्र से मिथिलेश जी तक अंग्रेज़ी में खूब लिखा गया और अब भी जा रहा है। मैं खुद भी लिख रहा हूँ।

युवा पीढ़ी नए जोश के साथ तो है ही, वरिष्ठों के साथ संवाद में नियमित है। भाषा को संस्कृति से गहरे तौर पर लिंक कर दिया गया है कि अधिकतर कार्य बिन भाषा के संभव ही नहीं। और यह एक छुपा हुआ पक्ष है जो सतह से नजर न आएगा।

गतिविधियाँ बहुत ज्यादा है, और ग्रामीण स्तर से लेकर महानगरों तक है। एक कवि सम्मेलन में सौ कवि भी मिल सकते हैं, अगर मौका दिया जाए। भिन्न-भिन्न गुणवत्ता के।

बाकी, जो नकारात्मक पक्ष है, उसको तो मैं सदा से नजर-अंदाज करने वालों में हूँ।

(Published previously in Hindustan)

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