जब शौच की सफाई करते थे चीनी

‘कुली लाइन्स’ लिखने के दौरान एक लेख पढ़ा कि मलेशिया में शौच की सफाई वहाँ बस गए चीनी लोग करते थे। भारतीय जो वहाँ गए थे, वे खेती-बाड़ी में ठीक थे, शौच सफाई में ख़ास निपुण नहीं। और स्थानीय लोग तो खैर ऊँचे दर्जे के हुए तो ये निम्न काम क्यों करें? लेकिन मेरी रुचि यह जानने में थी कि मलेशिया को आखिर यह पद्धति बदलनी क्यों पड़ी? जब एक खानदानी वर्ग यह कर ही रहा था, तो करने देते? क्योंकि वहाँ भी यह खानदानी पेशा बन गया था।

फिर मालूम पड़ा कि उनमें भी कोई दया-भाव की बात नहीं थी। उन्हें बस यह सिस्टम प्रगति के लिए बाधक लगा कि कोई आदमी मैनहोल में घुस कर सफाई करे। यह आदम पद्धति लगी। तो शुरुआत तो यही हुई कि जब टैंक जम जाए, तो दूसरा खोद दो। और यही लंबे समय तक चलता रहा, जैसा भारतीय घरों में होता है। वहाँ टैंक में घुस कर सफाई कम ही होती है। दूसरा खोद दिया जाता है। एक और पद्धति यह भी हो गयी कि मैनहॉल तक प्लास्टिक वगैरा न पहुँचे तो वह जाम होगा ही नहीं, और सफाई भी नहीं करनी पड़ेगी। शौच का ट्रीटमेंट हो सकता है, उसमें फँसे प्लास्टिक का उसी पद्धति से नहीं।

यूरोप वगैरा में यूँ गड्ढे खोदते जाने के बजाय ऑटोमेटेड सफाई यंत्र हैं, जो भारत में भी लाने की बात चलती रही है। लेकिन ये मँहगे हैं। और यूँ भी जितने भी ठेकेदार हैं, उनको मैनहोल में कूदने वाले मिल ही जाते हैं। लेकिन ऐसी स्थिति में उन्हें ऑक्सीजन मास्क दी जा सकती है, जो दी नहीं जाती। ऐसा कोई कन्सेप्ट ही नहीं है।

अगर मानवाधिकार और दया-भाव को भूल भी जाएँ, तो भी यह तरीका प्रगति में बाधक है, इस बात को समझने की जरूरत है। क्योंकि मानवाधिकार कहने से यह प्रवचन लगने लगता है, जिसे सुनते सभी हैं, मानता कोई नहीं। पूर्णतया पूँजीवादी पद्धति में भी यह मैनहोल में कूदने वाली बात एक चाँद पर पहुँचने वाले देश में अटपटी है।

आज सुप्रीम कोर्ट ने दो बातें कही,

१. ऐसा भला कोई देश क्यों चाहेगा कि अपने नागरिकों को हमारे मल से बनाए गैस चैम्बर में बिना ऑक्सीजन भेजे?

२. क्या आप उस व्यक्ति से हाथ मिलाना पसंद करेंगे जो प्रतिदिन मल में नहा कर निकलता हो?

(जब भी हम कोई प्लास्टिक, धातु, शीशा एक नाले में फेंकते हैं, उसे बटोरने के लिए एक व्यक्ति मेनहोल में कूदते हैं, ताकि जाम न हो। और उनमें से कुछ लोग वहीं मर भी जाते हैं या बीमार रहते हैं। कुछ जिम्मेदारी हमारी, कुछ सरकार की)

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