मलीन वीर-गाथा

जब भारत-पाक विभाजन हुआ तो अक्सर हिंदू इधर भागे, मुस्लिम उधर। पर हिंदुओं का एक वर्ग पाकिस्तान से हिला ही नहीं। आज भी पाकिस्तानी हिंदुओं का एक बड़ा हिस्सा बाल्मिकी समाज है। ये वो समाज है, जो इधर रहें या उधर, काम मल ढोने का ही करता। शायद उन्हें ये लगा हो कि पाकिस्तान छोटा है, कितना मल निकालेंगें? ऊपर से रमजान के महीने में तो भोजन भी कम, मल भी कम। हिंदुस्तान के दस प्रतिशत से ज्यादा मल तो न निकालेंगें। ऊपर से कई झेलम, चिनाब, रावी, सतलज किनारे बैठ जाएँगें। उधर तो एक गंगा है, पर वो पवित्र है। दिन दहाड़े कोई गंगा किनारे शौच नहीं कर सकता। बची यमुना, वो तो चिंदी सी है।

पाकिस्तान में भोजन भी गरिष्ठ है, मसालेदार है। कब्जियत होगी। वहाँ तो सुबह कान पर जनेऊ रख शौच करने वालों की फौज है। हर कोई घर में ब्लड-प्रेशर की दवा रखे न रखे, कायम-चूर्ण टाइप पाचन की गोली जरूर रखता है। कोई अखबार पढ़ पेट हल्का करता है, कोई बादाम दूध पीकर। जब तक खाने के बराबर निकाल न दें, उन्हें चैन नहीं आता।

शौच जीवन का उद्देश्य है, जीजीविषा का मुख्य साधन है। उत्तम शौच से ही मोक्ष की प्राप्ति होगी। असंतुष्ट शौच से तो मृत्यु बेहतर। भगवन् भी तीन वरदान माँगे, तो प्रथम इच्छा कब्जियत मुक्त जीवन की होगी। सात्विक भोजन का अर्थ मन की शांति नहीं, मलद्वार की शांति है। मलद्वार से ही पंचतत्व का उद्गार होता है। क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा। मल ही सृष्टि में अजर-अमर है, यथार्थ है। बाकी सब क्षणभंगुर है, माया है।

किंतु, मल को छूने का अधिकार, इसे ढोने का अधिकार, ये हर मानव को नहीं। कठिन तप करना होता है। गाँधीजी जैसे तपस्वियों और निर्मोहियों को ये सौभाग्य मिला। योगी जो अनवरत प्राणायाम कर सकते हैं, साँस रोक कर हवा में उड़ सकते हैं। ये हम-आप नहीं कर सकते। दो मिनट मल की दुर्गंध सहने की क्षमता नहीं। डॉक्टर भी जब मल-मूत्र की जाँच लिखता है, हाथ-पाँव फूल जाते हैं। नर्स छोटा कटोरा पकड़ाती है, आप शौचालय से खाली हाथ वापस आते हैं। एक पराजित सेनापति की तरह। शर्म से सर झुकाए। चाहो तो सर कलम कर दो, पर ये पौरूष, ये वीरता मुझमें नहीं। कुछ मूत्र लाने में सफल हो भी जाएँ, मल में घुटने टेक देते हैं। जो कर पाया, उसकी वीर गाथाएँ सुनाई जाती है। फलाँ अस्पताल में मल के सैंपल दही की छाँछ में भरकर ले गया था, फलाँ माचिस की डिब्बी में। एक परमवीर चक्र का पात्र, एक वीर चक्र का।

खैर, जब विभाजन के बाद ये समस्या आई कि कोई मल ढोने वाला न मिले, तो आपातकालीन बैठक बिठाई गई। मल की चर्चा हो रही है, तो बैठक का विकृत अर्थ न सोचें। ये गणमान्यों की कैबिनट बैठक थी, जो भारतीय संसद के ‘ग्रीन रूम’ में संचालित हुई।

“प्रधानमंत्री महोदय! वाइसरॉय साहब से कहकर पाकिस्तान में रह गए हिंदुओं को भारत बुलवाया जाए।”

“हाँ! लेकिन ये कार्य कठिन है। वो मिलिट्री दे देंगें, पर बाल्मिकियों को वापस नहीं करेंगें।”

“ये तो लॉटरी लग गई उनकी। ये कैसा विभाजन है, कि हमें बस खोटे सिक्के मिले?”

“सुना है वो भी आना नहीं चाहते।”

“तो हल क्या है?”

“हल ये है कि हम एक विश्व-स्तरीय संस्थान बनाएँगें। इस विधा में दक्षता पाएँगें। आज ही मलद्वार रिसर्च संस्थान की नींव रखी जाए। पंजाब और पूर्वांचल के प्रसिद्ध मलबुद्धियों को आचार्य बनाया जाए।”

“पर छात्र कौन होंगें? ये तो जातीय कला है, हम-आप नहीं कर सकते। गाँधीजी जब सिखाते थे, भागे फिरते थे, याद नहीं?”

“छात्रवृत्ति घोषित की जाए। डीग्री दी जाए। डॉक्टॉरेट दी जाए।”

“जैसी आपकी इच्छा। मेरे विचार से यमुना पार की जमीन ठीक रहेगी। दुर्गंध उधर ही लुप्त हो जाएगी। दिल्ली पर रहम करें हजूर।”

“आप यमुना पार बनाएँ या दक्कन ले जाएँ, पर शोध संस्थान के उद्घाटन के लिये पश्चिमी कमोड बनवाएँ। हम सब विलायती हो गए हैं, अब ऊकड़ूँ नहीं बैठा जाता।”

“मैनें इसका हल सोच रखा है। हम बस रिबन काट कर वापस आ जाएँगें। भला प्रधानमंत्री वगैरा भी शौच करते हैं क्या?”

यमुना पार गाजीपुर नामक इलाके में ‘मलमूत्र प्रबंधन संस्थान’ की स्थापना हुई। छात्रवृत्ति के चक्कर में हजारों छात्रों ने नामांकन कराया, पर महीने भर में सब नाक दबाकर भागे। कुछ निमोनिया से पीड़ीत हुए, कुछ अमोनिया से। कई पागल हो गए, बहकी-बहकी बातें करते। दिमाग मलित हो गया था, गोबरमय। बस वो छात्र रह गए, जिनमें संस्कार थे, खानदानी कौशल था। या जिन्हें पता था, उनका मुकाम यही है। संस्थान के अंदर भी, संस्थान से बाहर भी। यहाँ कम से कम डीग्री नसीब होगी। सम्मान मिलेगा।

धीरे-धीरे देश में फौज तैयार हो गई। मेहतरों की बेहतरी हुई। नाम भी बदल कर ‘मैनुअल स्कैवेन्जर’ किया गया। अब लगता कि किसी मिशन पर निकले हैं।

देश भी बदल रहा था। सड़कों की नीचे सुरंगें बन रही थी, जहाँ सर पर खदान-मजदूरों की तरह लाइट लगाकर मल इकट्ठा करना होता। कॉन्ट्रैक्ट मिलते। घंटे-घंटे का मोल था। गोताखोरों की तरह एक मैन-होल में छलांग मारो, और मलिन-विकृत दूसरे मैन-होल से अवतरित हो। नौसिखिए तो भटक कर रह जाएँ। पत्नियाँ राज-तिलक कर विदा करती। जंग जीत कर वापस आने वालों को सम्मानित किया जाता। शहीदों को फूल-मालाएँ चढ़ाई जाती।

पर धीरे-धीरे ये उद्योग क्षीण पड़ने लगा। सेफ्टी-टैंक और सुलभ क्रांति ने इन वीरों का जीवन तहस-नहस कर दिया। बटन दबाओ और सब छू-मंतर। एक-एक कर ये मलवीर फ्लश होते चले गए। संस्थान भी बंद कर दिया गया। अब डीग्री हो या डॉक्टॉरेट, शौचालय के बाहरे सिक्के जोड़ो। वीरता और कौशल का कोई मोल ही नहीं। जैसे फाइटर पाइलट को एयरलाइन की बिलिंग में बिठा दिया हो।

कुछ निराश होकर गाँव वापस चले गए, जहाँ आज भी उनके कला की कद्र है। कुछ अमोनिया फ्लेवर का इत्र लिए घूमते हैं। कुछ यूँ ही यमुना में गोते लगाकर मलिन होने का आनंद लेते हैं। कुछ संस्थान की पुरानी इमारत को ढूँढते हैं, जहाँ अब कचड़े का पहाड़ बन गया है। गाजीपुर के कचड़े के ढेर से कौए भगाते हैं। अपना स्वर्णिम इतिहास याद करते हैं।

दिल्ली के वसंत विहार में खाए-पीए अघाओं ने शौच किया, और एक मलवीर मैनहोल में मर गये।

(आँकड़ों के अनुसार आज भी देश में लगभग १.५ लाख लोग ‘मैनुअल स्कैवेन्जर’ हैं।)

Published also in Nivaaan Times

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