कोरिया की रानी ‘री’ और मैं

राजा की गद्दी। अनुवाद यही ठीक रहेगा। एक बहुमंजिली इमारत की इक्कीसवीं मंजिल का वो कोना जहाँ खड़े होकर उटोया का द्वीप दिखता है। इसी उटोया द्वीप पर एक श्वेत चरमपंथी ने कभी साठ-सत्तर लोगों को शीतल-रक्त मृत्यु दे दी थी।

शब्दानुवाद की यही समस्या है। ‘हॉर्सेस-माउथ’ को कोई तुरंग-मुख कह गए, ‘कोल्ड-ब्लडेड’ को मुझे शीतल-रक्त कहना पड़ रहा है। और होटल की ‘किंग्स सीट’ को राजा की गद्दी। उस दिन राजा की गद्दी पर कोरिया की रानी बैठी थीं। कितना सुंदर नाम था- री। न तिलोत्तमा, न पद्मावती, बस री। यह जरूर अयोध्या की रानी सुरीरत्ना की वंशज होंगीं। रत्न और सुर खत्म हो गया, बस ‘री’ रह गया, और मध्यमा और तर्जनी के बीच विराजमान सिगरेट।

मैं री के करीब ही खड़ा द्वीप का अवलोकन कर रहा था। जब से विश्व में समाजवाद आया, रानी के समीप अब कोई भी टॉम, डिक या हैरी खड़ा हो सकता है। हालांकि मैं इन तीनों महानुभावों से भिन्न था। मैं उस सामंतवादी मिट्टी का बना हूँ, जहाँ स्त्री का द्विचर रूप है। स्त्री पूज्य है वा त्यज्य। स्त्री का और कोई स्वरूप नहीं। मैनें कई बार चिनार के पतझड़ी शृंगार से ध्यान हटाकर इस युवती को देखा। और युवती से ध्यान हटाकर चिनार को। मुझे इस युवती में कभी रानी नजर आ रही है, कभी बौद्ध देवी थंका। यह त्यज्य तो नहीं, पूज्य ही हैं।

“आप भी इसी होटल में ठहरी हैं?”

“हाँ! और आप? जरूर ऑफ़ीस के ‘क्रिशमस टेबल’ में आए होंगें? वरना एशियाई क्यों यहाँ आने लगे?”

“एशियाई सुनकर अच्छा लगा। अमरीका में एशियाई अलग और इंडियन अलग कहते हैं।”

“वो तो नाक का फर्क है।” री कुर्सी पर झूलते हुए हँसने लगी।

“मैं समझा नहीं। हिंदुस्तानियों की नाक भला बाकी एशियाई की नाक से कब ऊँची हो गयी?”

“ये मैनें कब कहा कि आपकी नाक ऊँची है?”

“क्षमा कीजिएगा। मेरा मतलब नस्लीय टिप्पणी से नहीं था। हिंदुस्तान में नाक इज्जत से जुड़ी है।”

“नाक से। मूंछों से। पौरूष से। जाति से। धर्म से। धन से। हर चीज से जुड़ी है आप हिंदुस्तानियों की इज्जत। ऐसा सुना है।”

“हम इतने भी बुरे नहीं। पर आपके देश में इज्जत का तराजू क्या है?”

“पता नहीं। मेरी इज्जत तो अब एक नॉर्वेज़ियन के हवाले है।” री फिर से कुर्सी झूलाते बचकानी हँसी हँसने लगी।

री से उन दो दिनों में अच्छी मित्रता हो गयी। संभवत: उस होटल में उस पार के हम दो ही लोग थे। ‘उस पार’ मतलब यूरोप से बाहर की दुनिया के।

उसका पति भी उसी होटल में था, पर कभी मिला नहीं। हालांकि री जब राजा की गद्दी पर नहीं मिलती तो अपने कमरे में पति के साथ ही होती। पर यह बमुश्किल आध-एक घंटे का मामला होता। पुनश्च अपनी राजगद्दी पर वो विराजमान हो जाती, सिगरेट लिए। वो दो दिन गर कार्य-घंटों (वर्किंग हावर) के हिसाब से गिनें, तो मेरे साथ री ने अधिक बिताए। खुली हवा में, उटोया द्वीप किनारे। कोरिया की बातें करते। मैं भाषा के तार जोड़ता कि कैसे तमिल और कोरियन के बीच संबंघ है। और अयोध्या से संबंध। पर री को जैसे ख़ास रूचि न थी। हाँ! वो डॉक्टरी की बातें पूछती। अंतरंग बातें।

“क्या सत्तर वर्ष का पुरूष नपुंसक नहीं होता?”

“अब नपुंसक की उम्र-सीमा बढ़ गयी है। कई दवाएँ आ गयी हैं। पर क्यों पूछ रही हो?”

“क्योंकि मेरा पति सत्तर वर्ष का है!” और री फिर से झूल-झूल कर हंसने लगी।

मैं सन्न रह गया। यह बीस-तीस वर्ष की बाला भला सत्तर वर्षीय व्यक्ति के साथ इस ध्रुवीय देश में क्यों है? री के पति उनके शक्करी-पिता हैं। ओह! पुन: शब्दानुवाद हो गया। सुगर-डैडी। जब युवतियाँ अपनी ख़ास आर्थिक जरूरतों के लिए एक धनी वृद्ध से जुड़ जाती हैं। यह पश्चिम के मधुर संबंध हैं, जो पूरब में शनै:-शनै: आ ही जाएँगें। कुछ ज्ञान-हस्तांतरण उपरांत। हिंदुस्तान में भी शकरपिता-युग आएगा। पूंजीवाद, प्रगतिशीलता और नारी उन्मुक्ति जब चरम पर होगी, तब सुगर-देवों का भी अवतरण होगा। तब स्त्री द्विचर नहीं होगी। पूज्य और त्यज्य के मध्य त्रिशंकु भी होंगी। उन्मुक्त। शकर-पुत्री।

री का पति उसे आकाश में मिला। आधुनिक पुष्पक-विमान पर। जब कोरिया से जहाज हिमालय के ऊपर उड़ रहा था, तो उसने पहली बार री के शरीर पर हाथ रखा, और री मुक्त हो गयी। उसकी मुक्ति कब यौन-गुलामी बन गयी, यह री को स्मरण नहीं। री अब भी मुक्त है, किंतु जब ज़नाब अपनी पौरूष-उत्प्रेरक दवा फांक लेते हैं तो री दासी बन जाती है।

“इस दवा के साइड-इफेक्ट भी तो होते होंगें?” री ने सिगरेट की कश लेते प्रश्न किया।

“हाँ! होते हैं।”

“क्या इस से मृत्यु संभव है? हार्ट-अटैक?”

“संभव तो है। पर क्यों पूछ रही हो?”

“सोचती हूँ, ये बुड्ढा कब मरेगा?” अब वह उछल कर कुर्सी पर पद्मासन में बैठ गयी थी, और अनवरत हँस रही थी।

एक वृद्ध पति एक दिन काम-मुद्रा में मृत हो जाए? यह कैसी कामना है? री की हंसी अब अट्टहासी रूप ले रही थी। और इस भय से मेरा पौरूष कांप रहा था। मैं खिड़की से बाहर देखने लगा। कैसे इस उटोया-द्वीप पर घूम-घूम कर गोली मारी होगी? भाव-शून्य होकर हत्या की होगी, या री की तरह उन्मादित ठहाकों के साथ? कोल्ड-ब्लडेड मर्डर क्या सचमुच कोल्ड ही होता होगा?

“तुम्हारी समस्या क्या है री? अगर प्रेम नहीं तो त्याग क्यों नहीं देती?”

“प्रेम है। तभी तो नहीं त्यागती।”

“तो फिर ऐसी कामना?”

“हार्ट-अटैक की कामना भी कोई कामना है? यह तो स्वाभाविक मृत्यु है।”

“पर पति की मृत्यु की कामना तो है ही। यह मेरे लिए विचित्र है।”

“हम एशियाईयों का प्रेम जैसे वेश्या का प्रेम। उसकी बेटियाँ भी यही समझतीं हैं। उसके परिवार में मेरा यही अस्तित्व है।”

“तो बेटियों से मित्रता कर लो। उनको मातृत्व दो।”

“मातृत्व? वो क्या है? मेरी माँ तो मुझे स्मरण नहीं। वो कौन थीं, किस परिवार से थीं, कुछ ज्ञात नहीं। कहीं तुम्हारे देश से तो नहीं, वो महारानी?” और री फिर हँसने लगी।

री की हँसी अब मेरे लिए असहनीयता की सीमा पर थी। मातृत्व-बोध से मुक्त भी नारी का अस्तित्व संभव है? कहाँ मैं द्विचर रूप में अटका पड़ा हूँ, और यहाँ एक मायावी युवती क्षण-क्षण अपने बहिमुखी अस्तित्व का परिचय दे रही है।

री की कोरियन माँ पता नहीं कौन थीं? पर पिता मानसिक विक्षिप्त थे। शायद विस्मरण रोग अलझाइमर था। री उनकी सेवा करती। मृत्यु के समय तक साथ थी, पर पिता ने कभी री को पहचाना ही नहीं। वो अबोध थे। भाव-शून्य। कोल्ड। क्या यह ‘कोल्डत्व’ संक्रामक है? उनसे री को पसर गया, री से उसके पति को, और अब कहीं मुझ तक तो नहीं आ जाएगा? क्या यह रोग चुंबन से पसरता है या बस छूने से? उस शाम कहीं मेरे हाथ भी री तक तो नहीं पहुँचे, या मेरा पौरूष कांप गया था? क्या मेरी भारतीयता इस हिमालय पार की बाला के स्पर्श मात्र से समाप्त हो जाएगी? एक दिन मैं भी भाव-शून्य हो जाऊँगा? और तभी विश्व-नागरिकता मिलेगी? जब मैं ‘कोल्ड’ हो जाऊँगा?

चिनार के पत्ते दो दिन में कितने झड़ गए! लगता है रात तूफ़ान आया था।

सुबह अखबार में पढ़ा कि उटोया के उस हत्यारे ने अर्जी दी कि जेल का विडियो-गेम ‘प्ले-स्टेशन’ का नया संस्करण उपलब्ध कराया जाए। नए संस्करण में कुछ और वीभत्स खेल आए हैं। सरकार ने मानवाधिकार की रक्षा के लिए उसकी अर्जी मान ली है।

——
(प्रवीण झा की यह कथा पहले जानकीपुल पर प्रकाशित)

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