सिनेमा में लोक संगीत (Folk in cinema)

सच पूछिए तो फ़िल्म और लोकगीत का कोई साम्य ही नहीं है। लोकगीत में कई लेयर होते हैं। वह किसी ख़ास सिचुएशन या सीन के लिए नहीं बनाए जाते, उनका क्षेत्र विस्तृत होता है। अक्सर तंज होता है कि लोकगीत ‘वेदर रिपोर्ट’ की तरह होती है, हर मौसम के गीत। लेकिन बात ‘वेदर रिपोर्ट’ तक सीमित नहीं है। उस ऋतु में विरह का भी गान है, प्रेम का भी वर्णन है, करुणा भी है और उल्लास भी। मैंने एक बार कहा कि मगही गीतों में परिवार-बोध है, मैथिली गीतों में भक्ति की प्रधानता रही है और भोजपुरी लोकगीतों में रोमांस की। तो ये बस मौसम की जानकारी वाले गीत नहीं। इनके कई आयाम हैं।

मैं हालिया हवाई जहाज में एक फ़िल्म देख रहा था जिसमें पंजाबी लोक-गायक दलजीत दोसाँझ हॉकी खिलाड़ी का अभिनय कर रहे थे। मुझे ताज्जुब हुआ कि एक लोक-गायक अभिनय तो कर रहे हैं, लेकिन लोकगीत क्यों नहीं गा रहे। फिर उनका एक साक्षात्कार देखा जिसमें वह कहते हैं कि फ़िल्मों में लोकगीत की जगह नहीं और मैं रैप-पॉप गाता नहीं। वह मेरे प्रिय गायक रहे हैं और उनकी गुरुदास मान के साथ एक जुगलबंदी मैं अक्सर सुनता हूँ। लेकिन, वह ग़लत नहीं कह रहे। फ़िल्म के किसी सीन पर लोकगीत बिठाना लोकगीत को सीमित करना है। हिंदुस्तानी संगीत के साथ भी यही समस्या है।

लेकिन लोकधुन तो प्रयोग किए जा सकते हैं। जब शिव-हरि (हरि प्रसाद चौरसिया और शिव कुमार शर्मा) ने ‘सिलसिला’ फ़िल्म में संगीत दिया तो शिव जी ने पहाड़ी धुनों का खूब प्रयोग किया। और तब चौरसिया जी को भी जोश आया कि यूपी की धुन भी आए और ‘रंग बरसे भीगे चुनरवाली’ गीत डाला गया। जगजीत सिंह ने पंजाबी टप्पे गाया कोठे पे माहिया’, वही धुन अब ‘लैम्बॉर्गिनी’ गीत में है।

ये सब तो बाद की बातें हैं, मैं ढूँढ रहा था कि शुरुआत कहाँ से हुई होगी? जब पहली बोलती फ़िल्म 1931 ई. में ‘आलम आरा’ बनी और उस दौर की जितनी फ़िल्में बनी, सब में गीत अधिक होते और दृश्य कम। और तब तक सुगम संगीत की तो अवधारणा बनी नहीं थी। या तो हिंदुस्तानी संगीत था या लोकगीत। जो भी गीत बने, उसी आधार पर बनने शुरू हुए।

एक उसी दौर का गीत है, जो शायद सबसे पुराना फ़िल्मी गीत है- फ़िल्म ‘फ़रेबजाल’ का गीत ‘साची कहो मोसे बतियाँ, कहाँ रहे सारी रतियाँ’। अब यह गीत किस क्षेत्र का लगता है? यह जरूर यूपी-बिहार के ठुमरी गीतों पर आधारित होगा। ‘बाल जोबन’ फ़िल्म की चर्चा मैंने अपनी किताब ‘कुली लाइन्स’ में भी की है, जो गिरमिटिया देशों में पहुँची पहली बोलती फ़िल्म थी। उसमें एक मारवाड़ी लोकगीत है- ‘बिछुड़े री घाली पीहर’। यह गीत यू-ट्यूब पर सबसे पुराना फ़िल्मी लोकगीत मुझे मिला।

मेरा खयाल है कि ऐसे सैकड़ों गीत शुरुआती दौर में मिलेंगे, क्योंकि उस वक्त और था ही क्या? इसी दौर में पहली बार शायद हैदर साहब लाहौर से ढोल लेकर पंजाबी लोकगीत लेकर आए, और धीरे-धीरे कई पंजाबी धुनें फ़िल्मों में आती गयी। लेकिन मेरा मानना है कि अगर गिनती की जाए तो बिहार-यूपी के लोकगीतों की संख्या कहीं ज्यादा होगी। चाहे गंवई माहौल हो, या तवायफ़ों के गीत, वहीं से आएँगे। और रोमांटिक गीत भी। दिलीप कुमार की फ़िल्मों के गीत लीजिए-नैन लड़ जइहें’। ‘उड़े जब जब जुल्फें तेरी’ में पंजाबी धुन है, लेकिन नाच और माहौल यूपी का है। यह फ़िल्म में ही संभव है।

लोकगीतों का प्रयोग तब भी होता है जब क्षेत्र-विशेष प्लॉट होता है। कश्मीर होगा तो ‘बुमड़ो बुमड़ो’ डाला जाएगा। राजस्थान होगा तो ‘झूमर’ गीत बनेंगे। गुजरात होगा तो डांडिया। ‘अरे जा रे हट नटखट’ भी गुजराती धुन ही है, जिसमें कुछ पहाड़ी प्रभाव भी है। ‘मंथनफ़िल्म में क्या सुंदर राजस्थानी लोकगीत है! वहीं पंडित रविशंकर ने भी जब ‘गोदान’ फ़िल्म का संगीत दिया तो अपनी शास्त्रीय संगीत थोपने की कोशिश नहीं की, और पिपरा के पतवा सरीखे डोले मनवा’ गीत दिया। लोकगीत ही उस माहौल में ढलते हैं। पंजाबी लोकगीतों में टप्पे, भंगड़ा, माहिया, छल्ला। सभी प्रयोग किए गए। छल्ला गीत गुरदास मान से लेकर हाल की फ़िल्मों तक चल रहा है। और बंगाली लोकधुनों को तो आना ही था।

बंगाल ने संगीतकारों की फौज ही दी। एस.डी. बर्मन को भटियाली धुनें ख़ास पसंद थी, और उनके फ़िल्मों में माँझी का सीन जान-बूझ कर डाल देते होंगे। सलिल चौधरी ने भीगंगा आए कहाँ से’ बनाया ही। सलिल चौधरी तो असम के बिहू को भी ‘दैया रे दैया रे चढ़ गयो पापी बिछुआ में ले आए। बाउल गीत भी आए। जैसे- ‘मेरी प्यारी बिंदु’ पड़ोसन फ़िल्म की, या देवदास फ़िल्म की ‘आन मिलो आन मिलो साँवरे, आन मिलो

छत्तीसगढ़ का लोकगीत पीपली लाइव फ़िल्म में है- चोला माटी के राम। गीत रमैया वस्तावैया’ भी जयकिशन ने तेलुगु मजदूरों से सुना तो शैलेंद्र को लिखने कहा। एक गायक थे शैलेंद्र, वह भी पहाड़ी धुनों पर गाते थे जैसे- ‘होगा तुमसे प्यारा कौन’। मराठी लावणी भी खूब गायी गयी- हाल की ‘चिकनी चमेली’ गीत। इसी तरह बाजीराव मस्तानी का ‘पिंगा‘ गीत। या कोंकण का मुंगड़ा मुंगड़ा मैं गुड़ की डली’। यहाँ मुंदड़ा का अर्थ बड़ी चींटी जैसे कीड़े से है। बंटी-बबली का ‘कजरारे कजरारे’ भी यूपी का किन्नर धुन है।धम धम धरम धरैया रे, सबसे बड़े लड़ैया रेआल्हा गीत है। ’तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ’ विद्यापति गीत की धुन है।

मौसम के हिसाब से लोकगीत आते रहे और त्यौहारों के हिसाब से भी। जैसे जोगीरा गीत होली के अवसर पर। कजरी भी गाए गए। मन्ना डे का गाया एक भोजपुरी कजरी है। मैं यह भी कहूँगा कि तवायफ़ों के गीतों को भी लोकगायकी से अलग न माना जाए। है तो वह भी लोक ही। ‘ठारे रहियो’ गीत को लोकगीत की नजर से क्यों न देखा जाए? ‘नजर लागी राजा तोरे बंगले पर, ‘पान खाए सैयाँ हमारो’ लोकभाषा के गीत ही तो हैं।मोरे सैयाँ जी उतरेंगे पार, नदिया धीरे बहो फ़िल्म में भी है। लोकगीत भी है। चंदन (तिवारी) ने भी गाया।

हाँ! यह जरूर है कि आज की फ़िल्मों से गाँव ही लुप्त हो गया है तो लोकगीत की जगह कम है। शहरी परिवेश में लोकगीत कठिन है। लेकिन नए रूप में ‘चलत मुसाफ़िर मोह लियो रे’ पर वरुण धवन थिरक ही रहे हैं। कई नए फ़िल्मों के नाम पहले भी मैंने गिनाए जिनमें नए रूप में लोकगीत प्रयोग हुए हैं। यह ठीक है कि लोकगीतों को गाँव में रहने दिया जाए, और उसे फ़िल्मों में लाना उसके मूल स्वरूप को तोड़ना है। लेकिन फ़िल्मों ने इन गीतों को लोकप्रिय तो बनाया ही। तो चित्रगुप्त का ‘जा जा रे सुगना जा रे’ लता जी से गवाना ग़लत नहीं था।

हमें सही माहौल देना होगा, सीन के हिसाब से कुछ बदलाव करने होंगे। लोकगीत में जो वाद्य-यंत्र प्रयोग होते हैं, और जो स्वरमान होता है, वह फ़िल्मों में फिट नहीं बैठता। कैलाश खेर और पापोन कुछ दिन चलते हैं, लेकिन लंबे समय नहीं चल पाते। लेकिन, उसे सुगम बना कर तो लाया ही जा सकता है। कहब लग जाइ धक सेगीत तो आया ही। और आते ही रहेंगे। आखिर फ़िल्म भी लोक का ही तो माध्यम है।

(‘मैथिली भोजपुरी अकादमी’ के सौजन्य से मोती बीए स्मृति में ‘सिनेमा में लोकगीत’ आख्यान अंश स्मृति के आधार पर. वक्ता- प्रवीण झा. 2/8/2019)

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