यूनाइटेड कलर्स ऑफ इंडिया (United colours of India)

जब अफ्रीका महाद्वीप को भिन्न-भिन्न देशों में बाँटने की योजना बनी, तो बर्लिन में एक सम्मेलन हुआ। ब्रिटिश लोगों को ‘स्क्रैंबल’ नामक खेल बहुत प्रिय था। ‘अक्कड़-बक्कड़ बम्बे-बो’ की तरह वो उसे खेलने लगे, और अफ्रीका को बाँटने लगे। कुछ मानचित्रों के विशेषज्ञ भी बिठाए गए। उन्होनें पहाड़-नदियों के चित्र मानचित्र पर बना दिये। पर आधा अफ्रीका सपाट था, सहारा का रेगिस्तान। कोई भौगोलिक रेखा नहीं थी। उन्होंनें सीधी रेखायें खींच कर कई खाने बने दिया, कहीं सूडान, कहीं नामीबिया, कहीं मॉरीटैनिया लिख डाला। बन गया अफ्रीका। कुछ ऐसे ही उत्तरी अमरीका के वीरान राज्यों को भी बाँटा गया। दरअसल, सिर्फ भोगौलिक सपाटता ही नहीं, यहाँ मनुष्य भी सपाट थे। रेगिस्तान में दूर-दूर तक कोई नजर नहीं आता। कुछ इलाकों में लिलिपुटिया पिग्मी बसते जो दूर से नजर नहीं आते। धर्म-जात का कोई ब्यौरा नहीं। जैसे मरजी बाँट दो।

भारतीय राज्यों को बाँटने में बहुत पापड़ बेलने पड़े। भाषायी आधार तो ठीक है। पर कहाँ महाराष्ट्र खत्म होगा, और कर्नाटक शुरू? कहाँ अचानक लोग मराठी बोलना बंद कर देंगें, उनकी धीमी जीभ फड़फड़ाने लगेगी और कन्नड़ बोलने लगेगी? ये काम अक्सर रातों-रात करना होता। जैसे राज्य बाँटने नहीं, कसाब को लटकाने जा रहे हों। हुबली के लोग जब सुबह उठे तो देखा, किसी बोर्ड पर कुछ लिखा समझ नहीं आ रहा। कहीं फिर से भारत पर फिरंगियों ने कब्जा तो नहीं कर लिया? ये अक्षर अजीब गोल-मटोल कैसे हो गए? शहर का एक व्यापारी जो अक्सर सफर करता, उसने समझाया भाई ये कन्नड़-तेलुगु कुछ है। अखबार पढ़ा तो समझ आया, कर्नाटक राज्य बना और हुबली अब से कर्नाटक है। ये बस एक उदाहरण है, मुझे उत्तर कन्नडिगा लोगों की अस्मिता पर शक नहीं। पर उन राज्यों का क्या, जहाँ भाषा भी एक थी?

पहले बंगाल में से उन लोगों को छाँटा गया, जो लाख कोशिश कर भी मुँह गोल कर बंगाली नहीं बोल पाए। उस पूरे हिस्से को बिहार बना दिया गया, जिनकी अजीब अपभ्रंस बोलियाँ थी। कोस-कोस पर बदलने वाली। इन्हें भाषायी आधार पर बाँटते, तो हर घर एक राज्य होता। इस खिचड़ी को अपने हाल पर छोड़ दिया गया। दक्खिन से उड़ीसा-बंगाल तो थी ही, पश्चिमी सीमा पर जो राज्य बना वो उत्तर प्रदेश कहलाया।

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश। भारत के इन दो प्रदेशों को नीरस नाम मिले। आजादी से पहले भी, आजादी के बाद भी। मध्य प्रदेश पहले ‘सेन्ट्रल प्रोविन्स’ था और उत्तर प्रदेश ‘यूनाइटेड प्रोविंस’। तकनीकी नाम हैं, कोई रस नहीं। इन दो राज्यों को छोड़ दें तो लगभग हर राज्य के नाम के साथ भाषायी या भौगोलिक अस्मिता जुड़ी है। हिमाचल और मेघालय कितने सुन्दर नाम हैं! और लक्षद्वीप? वाह! नाम हो तो ऐसे। पर उत्तर और मध्य प्रदेश नाम रखने वालों ने कुछ मौलिकता नहीं दिखाई। उत्तर में है तो उत्तर, मध्य में है तो मध्य। खैर, कुछ भी कहिए, एक हिंदुस्तान का दिल है तो एक जिगर। विशाल, विविध और विचित्र।

मध्य प्रदेश तो आजादी के बाद कई बार बच्चों के घरौंदों की तरह तोड़ा-बनाया गया। पहले कुछ छोटे-मोटे राजघरानों को इकट्ठा कर ‘सेंट्रल प्रोविंस’ से जोड़ा और नागपुर राजधानी बनी। भूपाल के होते नागपुर? यहाँ भी नीरसता विजयी रही। मैं ये नहीं कह रहा कि नागपुर नीरस है, पर भोपाल नवाबों की बस्ती, शायरों का शामियाना। अगर उन्हें लखनऊ मिला, तो इन्हें नागपुर क्यूँ? और नागपुर को बॉम्बे राज्य से तोड़ कर मध्य प्रदेश में धकियाना भी तो गलत था। नागपुर तो जो आई, विदर्भ भी लपेट लिया।

विदर्भ कोई लेना नहीं चाहता। भला हर बरख भी कहीं सूखा देखा है क्या? कोयला है, खनिज है, जंगल है पर एक बूँद पानी नहीं। खैर, आखिर जिसका जो था, उसे मिल गया। विदर्भ-नागपुर की डोली वापस मायके भेज दी गई, और राष्ट्र के अंदर महाराष्ट्र की स्थाप्ना हुई।

मध्यप्रदेश फिर भी जुगाड़ु राज्य ही रहा। कहीं का कुनबा, कहीं का जोड़ा। बुंदेल, मालवा, सिंधिया, मांडू, होलकर, गोंड, भोपाल, ओरछा, रीवा सब कभी अलग-थलग थे। मुझे भय है एक दिन बिग-बैंग की तरह फट न पड़ें! छत्तीसगढ़ तो खैर छिटक ही गया। पर जो भी कहिए, हिंदुस्तान का सबसे शांत राज्य है जहाँ महाकाल भी भाँग पीकर सोते हैं। छत्तीसगढ़ अलग हुआ तो नक्सल-नुक्सल भी निकल लिए। नर्मदा बचाने वाले भी बम्बई बसते हैं। गर वो कार्बाइड प्लांट न होता, तो मध्य प्रदेश और खुशनुमा होता। पर उस बात को भी अब कुछ दशक हो गए। कुछ दर्द मिले पर हिंदुस्तान का दिल बाघ-बाघ रहा। कान्हा, बाँधवगढ़, पन्ना, सतपुरा। हर जगह बाघ मिलेंगें। एम.पी. गजब है।

दक्खिन बाँटना तो हमेशा से आसान था। मैसूर, मद्रास, हैदराबाद, त्रावणकोर तो बस नाम भर थे। तमिल लोगों को सदियों से पता था कि कहाँ से मलयालम की शुरूआत होगी, और कहाँ से तेलुगु। हल्की-फुल्की छीना-झपटी हुई, पर वो भी कर्नाटक के दाल-भात में मूसलचंद बनने से। मैसूर जब कर्नाटक बना तो उसने कुछ हैदराबाद, कुछ तमिलनाडु, कुछ त्रावणकोर और कुछ महाराष्ट्र से लपेटा। और क्या लपेटा! कुवेम्पु की कविताओं का जादू कहिए, या राजनैतिक पैतराबाजों का कौशल। कर्नाटक राज्य ने भाषाई इलाकों से परे की जमीन भी काबिज की। कूर्गी, मराठी, कोंकणी, तूलू और तेलुगु भाषी इलाके भी कर्नाटक में भरे पड़े हैं।

राजस्थान, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल और कश्मीर। और भी कई राज्य बने, पर इन राज्यों से परे भी एक दुनिया है।

भारत के ‘चिकेन-नेक’ की दुनिया!

‘चिकेन-नेक’ को समझने के लिये एक मोटे गत्ते पर भारत का मानचित्र चिपकायें। अब एक कैंची चलाकर नक्शे को काट कर अलग कर लें। इस नक्शे को १० मिनट पानी में छोड़ दें। अब नक्शे को बाहर निकालें। इस प्रयोग को मैनें कई बार किया है। नक्शे का एक हिस्सा या तो अलग हो चुका होता है, या पेंडुलम की तरह लटक कर डोलने लगता है। एक पतला सा भूमिखंड जोड़ता है ‘चिकेन-लेग’ को भारत से। इस पूरे ‘चिकेन-लेग’ को मिला-जुला कर उत्तर-पूर्व कहा जाता है।

ये वाकई अलग दुनिया है, जिस दुनिया के कई हिस्से किये गए, फिर भी कई और करने की माँग है। कईयों ने झंडे भी तैयार कर रखे हैं। यहाँ के लोग पूरे भारत में नजर आयेंगें, पर शेष (या मूल) भारत के लोग यहाँ कम ही नजर आयेंगें। बाकी देश रेलवे की लाइनों से पटी पड़ी है, यहाँ हेलिकॉप्टर चलते हैं। उधर हारमोनिया, इधर गिटार। रहन-सहन, भोजन, शौक, संगीत, भाषायें, धर्म, जाति-परंपरा सब भिन्न-भिन्न। चीन इन्हें अपना हिस्सा माने न माने, इन्हें भारतीय अक्सर चीनी कहते हैं। कभी-कभी लगता है हिंदुस्तान का दिल यहीं कहीं बसा है, जो अनवरत धड़क रहा है। एक पतली सी धमनी से जुड़ा है, पर पूरे देश में निर्मोह प्रवाहित हो रहा है। ऊर्जित, अविचल। ये मेडल पर मेडल दिये जा रहे हैं, और बदले में हम शायद कुछ खास नहीं दे रहे।

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