बिहार की संगीत परंपरा (Music tradition of Bihar)

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‘बिहार की संगीत परंपरा’ पर मुझे बोलने को जब कहा तो मैंने एक झटके में हाँ कह दिया। एक तो इन्हें मना नहीं करना चाहता था, दूसरा यह कि लगा इसी बहाने कुछ बतकही हो जाएगी। लेकिन मैंने कहा कि मैं हिंदुस्तानी संगीत पर ही बात करूँगा, लोक संगीत पर मैं सुनना चाहूँगा। रुचि मेरी लोकगीतों में खूब है, लेकिन इस पर बात वही करे जो जड़ के सबसे करीब है। हमलोग भी इसी जड़ के हैं, लेकिन बिदेसिया बन कर इसी बिहार के माटी के वृक्ष के किसी छीप, किसी फुनगी पर बैठे हैं। और मैं चूँकि डायस्पोरा शोध से जुड़ा हूँ तो कहूँगा कि वृक्ष के विस्तार के लिए दोनों जरूरी है, बशर्तें कि फुनगी को भान हो कि उसकी जड़ कहाँ है। लोकगीत हमारी मिट्टी में ही फलेगा-फूलेगा। उसे उठा कर अमरीका में रोपने से भी बढ़ेगा लेकिन उसकी सुगंध बदल जाएगी। हिंदुस्तानी संगीत की बात अलग है। उसके हम पोषक रहे हैं, हमने अपनी मिट्टी में जगह दी है, अपना सुगंध दिया है, लेकिन यह नहीं कह सकते कि वह यहीं कि पैदाइश है। वह काल, स्थान और रूप में ‘फ्री-फ्लो’ में रहता है। दूसरी बात कि हिंदुस्तानी संगीत को डब्बा-बंद पैक कर के ग्रामोफ़ोन, कैसेट, सी.डी., यू-ट्यूब पर भेज दिया गया, जैसे हल्दीराम का रसगुल्ला। स्वाद भी ठीक-ठाक रहता है। लोकगीत को डब्बे में बंद करना मुश्किल है। वह तो हमारी परंपरा-संस्कृति में ऐसा बँधा है कि उसको रिकॉर्ड करना कठिन है। वह बंबई आम की तरह है, जो पैक कर के रखने से ज्यादा दिन टिकता नहीं है। गाछ से तोड़ कर ही खाना पड़ेगा।

खैर, मैं हिंदुस्तानी संगीत की बात करता हूँ कि बिहार कहाँ है? या कहाँ था?

संगीत की जो सबसे प्राचीन पुस्तक भरत मुनि की ‘नाट्य शास्त्र’ रही, उसका पहला भाष्य या विश्लेषण जो किया गया, ‘भरत भाष्य’। वह हमारे बिहार के कार्नाट वंश राजा नान्य देव ने किया। आज वह पोथी ‘सरस्वती हृदयालंकार’ नाम से भी जानी जाती है, और संगीत के पाठ्यक्रम में भी है। मूल प्रति का पता नहीं, लेकिन उसकी नकल भंडारकर इंस्टीच्यूट, पुणे में रखी है।

पाकिस्तान के सलामत अली ख़ान, नज़ाकत अली ख़ान (शाम चौरसिया घराना) ने जो बारह-तेरह वर्ष की अवस्था में अपना पहला कार्यक्रम किया, वह बनैली एस्टेट, चंपानगर में किया। यहीं से जब वह अमृतसर गए, तो ओंकारनाथ ठाकुर जी जैसों ने सुना और नाम कर गए।

पाकिस्तान का नाम लिया तो रोशन-आरा-बेग़म की पैदाईश पटना सिटी की है। चंदा बाई नामक तवायफ़ परिवार की बाई की बेटी हैं, और उनके पिता अब्दुल हक ख़ान (किराना घराना) तो दरभंगा राज में थे। वह अब्दुल करीम ख़ान साहब के भाई लगते थे। रोशन आरा बेग़म के गुरु सारंगिया लड्डन ख़ान पटना सिटी में ही रहे और जब तक जीए, रोशन आरा बेग़म पाँच सौ रुपया भेजती रहीं।

फरीदा ख़ानुम जी, जिनका गीत है ‘आज जाने की जिद न करो’। उनका परिवार भी पटना का ही है। उनकी माँ मोख़्तार बेग़म पटना में सारंगिए इमदाद ख़ान (विलायत ख़ान के दादा) से सीखती थीं।

उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान का जन्म-स्थल बिहार है। डुमराँव में ही उन्होंने पाँच वर्ष की व्यवस्था में मंदिर में गाया- ‘एही ठैयाँ मोतिया हेराय गेल हो रामा’, और दरभंगा में तो वह हमेशा आते रहे और उनकी बड़ी इच्छा थी कि मरने से पहले एक बार दरभंगा आएँ। सब प्रोग्राम भी फाइनल हो गया, लेकिन शायद कुछ अंतिम समय में कैंसिल हो गया। वह अपनी फीस के लिए भी बहुत रिजिड हो गए थे, ऐसा सुना है। यूनिवर्सिटी के पास पैसे की कमी रहती ही है।

छन्नूलाल मिश्र के उस्ताद मुजफ्फरपुर के अब्दुल गनी ख़ान (किराना घराना) रहे, जहाँ वह सेवक बन कर सीखते रहे। उनका भी पहला कार्यक्रम बनैली एस्टेट में ही हुआ।

भारत का पहला ग्रामोफ़ोन रिकॉर्डिंग गौहर ज़ान का हुआ। उनका जो पहला कार्यक्रम हुआ, वह दरभंगा दरबार में हुआ और वर्षों तक वह महाराज के पास रही। बाद में कलकत्ता गयी।

उनके साथ ही जोहराबाई आगरेवाली की रिकॉर्डिंग होती थी। अब जोहराबाई कई थी। एक आगरेवाली अलग भी थी। लेकिन यह जोहराबाई पटनेवाली ही थी, जिन्हें लोग आगरेवाली कह रहे हैं। क्योंकि ग्रामोफोन कंपनी जोहराबाई को पटना से कलकत्ता ले जाती थी और छोड़ती थी, यह डॉक्यूमेंटेड है। तो रिकॉर्डिंग दरअसल पटनेवाली की ही है। वही आगरा के कल्लन ख़ान से सीखने गयी थीं। उनकी गायकी ऐसी थी कि ग्वालियर के भैयासाहब गणपतराव ने कलाई बढ़ा कर कहा कि गंडा बाँध दीजिए।

सितार के हमारे समय में दो सरताज हुए। यानी जिनको भले ही ढलती उम्र में, हमने कुछ देखा-सुना। उस्ताद विलायत ख़ान और पं. रविशंकर।

उस्ताद विलायत ख़ान के दादा इमदाद ख़ान, जिनके नाम पर ही इमदादख़ानी घराना है, जिससे अब शाहिद परवेज़ हैं। या विलायत साहब के पुत्र शुजात ख़ान साहब हैं। तो इमदाद ख़ान की परवरिश पटना में हुई। वह भी सारंगिया लड्डन ख़ान से जुड़े थे। हालांकि गजेंद्र बाबू की लिखी इस बात पर मुझे संदेह है।

पं. रविशंकर ने अपनी जीवनी में यह स्पष्ट लिखा है कि उनके वादन पर दो लोगों का प्रभाव रहा। एक तो उनके गुरु अलाउद्दीन ख़ान साहब, और दूसरे दरभंगा के रामेश्वर पाठक। बल्कि कहानी यह है कि अलाउद्दीन ख़ान से जब पंडित जी ने लंबे समय तक सीखा, तो बाबा ने कहा कि अब आगे की सीख भारत में एक व्यक्ति दे सकते हैं। और वह उनको लिए रामेश्वर पाठक के पास दरभंगा आ गए लेकिन पाठक जी चूँकि महाराज को छोड़ नहीं सकते थे, तो गंडा नहीं बाँधा। पंडित रविशंकर लिखते हैं कि राजा बहादुर को बिना रामेश्वर पाठक जी के बिहाग सुने नींद ही नहीं आती थी। वह कैसे जाने देते?

अभिनेत्री नरगिस की माँ जद्दन बाई का गया में कोठी था, और वहाँ जमींदार उनके संगीत का पोषण करते थे। नरगिस ने भी गया से संबंध कायम रखा। उनके बाद उनके बेटे इसे भूल गए।

उस्ताद अलादिया ख़ान जो जयपुर-अतरौली घराना के जनक हैं, उनके नाना सजीले ख़ान बिहार के थे। वह स्वयं भी बिहार-नेपाल के रियासतों में खूब गाए। सजीले ख़ान ने ही राग बिहारी की रचना की, जिसे उनके घराने के लोगों ने खूब गाया। किशोरी अमोनकर जी बेहतरीन राग बिहारी गाती थीं।

किराना घराना की तो एक पूरी शाखा ही दरभंगा में थी। संगीत इतिहासकार मात्र धारवाड़ का नाम लेते हैं, जबकि किराना की आधी फौज दरभंगा में थी। अब्दुल करीम ख़ान के भाई अब्दुल हक, मौला बख़्श, अजीज बख़्श। यही लोग गौहर जान और जोहराबाई के भी उस्ताद थे। मौला बख़्श और अजीज़ बख़्श जब ताजिया निकलते समय मर्सिया गाते दरभंगा की सड़कों पर गुजरते थे तो कहते हैं कि पूरा दरभंगा रोने लगता था। अजीज बख़्श के ही बेटे अब्दुल गनी ख़ान मुजफ्फरपुर आ गए, जिनके शिष्य छन्नूलाल मिश्र जी हैं।

ध्रुपद का जो सबसे पुराना घराना आज तक चल रहा है, वह बेतिया का घराना है। वह शाहजहाँ के समय से आज तक कायम है। भले ही अधिक जान नहीं बची, लेकिन मौजूद है। दरभंगा घराना तो खूब फल-फूल रहा है, और वह भी लगभग बराबर ही पुराना है। डागुर घराना उसके बाद की है। हालांकि यहाँ बानी की बात करनी चाहिए, ध्रुपद में बानी ही मूल है। घराना शब्द खयाल गायकों के लिए पहले था। बेतिया से ही बंगाल का विष्णुपुर घराना जन्मा। बल्कि बंगाल के तीस प्रतिशत ध्रुपदिए स्वयं को बेतिया से जुड़ा ही मानते हैं। फाल्गुनी मित्रा तो खुद को बेतिया का कहते ही हैं।

मैंने सबसे पहले ‘भरत भाष्य’ की बात की। जो संगीत का थाट सिस्टम भातखंडे जी लेकर आए, उसकी व्याख्या अलग-अलग रूप में वर्णरत्नाकर (ज्योतिरीश्वर ठाकुर) और रागतरंगिणी (लोचन) ने तो की ही है, लेकिन पटना सिटी के रज़ा ख़ान ने रागों के कॉमन फीचर पर विभाजन किए हैं। थाट और क्या है? रजा ख़ान ने ही सितार की सबसे पुरानी गत में से एक रजाख़ानी गत भी खोजी। रागों का प्रहर और समय के साथ संबंध हस्तमुक्तावली में वर्णित है। नान्यदेव ने इतने सरल रूप से रस समझाए हैं, जो आज तक चल रहा है। उन्होंने लिखा कि जब विलंबित लय में गाएँगे तो करुणा रस जन्म लेगा, मध्य लय में गाएँगे तो हास्य और शृंगार रस जन्म लेगा और जब द्रुत लय में गाएँगे तो वीर रस, रूद्र रस या भयानक रस जन्म लेगा।

नृत्य में अगर हम आम्रपाली और कोशा जैसी नृत्यांगनाओं की बात न भी करें, तो शोभना नारायण जी की तो कर सकते हैं। वह बिहार की बेटी हैं। मैं हाल में ‘बिरजू लय’ किताब पढ़ रहा था, जहाँ लिखा है कि नृत्य की हस्तिकाओं और मुद्रिकाओं का लिखित विवरण कम मिलता है। यह बस गुरु-शिष्य परंपरा से चल रही है। जबकि बिहार के ओइनवार वंश केशुभंकर ठाकुर ने ‘हस्तमुक्तावली’ सदियों पहले लिख दी थी। ज्योतिरीश्वर ठाकुर ने तो वर्णरत्नाकर में हस्त-संचालन और वक्ष-संचालन के कई रूप बताए है। इतना ही नहीं, कथक का उद्गम-स्थल संभवत: बिहार में रहा हो। शोवना नारायण जी को कामेश्वर सिंह संस्कृत यूनिवर्सिटी में एक चौथी सदी में लिखा श्लोक मिला, जिसमें कथक का वर्णन है। यानी भरत नाट्य शास्त्र से भी पहले बिहार में कथक मौजूद था। गया में तीन कथक ग्राम आज भी मौजूद हैं- कथक बिगहा, कथक ग्राम और कथक जागीर। यह दरअसल संगीतकारों और कथाकारों का गाँव था, जो लोग घूम-घूम कर कथा और नृत्य करते थे। उस गाँव की जब खुदाई हुई तो घुँघरू मिले। सारण में तो मिट्टी के घुँघरू मिले! यह लगभग स्पष्ट है कि यहीं बिहार से कथक नृत्य का उद्भव हुआ।

लेकिन, बात वही है। विष्णु भातखंडे जी ने भारत में घूम-घूम कर रागों का अध्ययन किया, उसे लिखा। लेकिन, बिहार आए ही नहीं। कई राग जो बिहार में जन्मे, उसकी चर्चा वह कर ही नहीं सके। ‘खेत बिलावल’ बेतिया के आनंद किशोर सिंह का बनाया राग है। विद्यापति के पदों में कोराव, कानल, नवीत जैसे राग हैं।

म्यूजिकॉलोजिस्ट की ही बात करें, तो यह मेरी मान्यता है कि बिहार संगीत अध्येताओं का गढ़ रहा है। बल्कि संभव है कि यहाँ संगीत का अध्ययन, विश्लेषण और शास्त्रबद्ध करना अधिक होता हो और संगीतकार बाहर से आते हों। नान्यदेव का ‘भरत भाष्य’, कवि लोचन की ‘रागतरंगिणी’, ज्योतिरीश्वर ठाकुर की ‘वर्णरत्नाकर’, शुभंकर ठाकुर की ‘हस्तमुक्तावली’ और मोहम्मद रज़ा ख़ान की ‘नग़मात-ए-आसिफ़ी’ इसके प्रत्यक्ष प्रमाण है। अगर आधुनिक समय की ही बात लें तो इंटरनेट युग में ब्लॉगर म्यूजिकॉलॉजिस्ट हुए राजन पर्रिकर। उनका पूरा अध्ययन रामाश्रय झा ‘रामरंग’ पर आधारित है। रामरंग जी जैसे बृहत् संगीत अध्येता विरले ही हुए। उनका और उनके गुरु भोलानाथ भट्ट जी की जन्मस्थली दरभंगा। गया के मुनेश्वर दयाल जी और गजेंद्र नारायण सिंह जैसे अध्येता और शोधी ढूँढे न मिले। और मेरा यकीन है कि अभी भी बिहार में संगीत अध्येता मौजूद होंगे। अधकचरे ही सही, जैसा गजेंद्र बाबू कहते थे कि भारत में अब अधकचरे संगीत समीक्षक ही बचे हैं। मेरे जैसे, जिनकी संगीत में शिक्षा नहीं, लेकिन लिख-पढ़ रहे हैं।

ठुमरी रह गया। पुरबिया ठुमरी तो इस मिट्टी में ही जन्मा है, और यह ठुमरी गायक-गायिका मानते हैं कि ऐसी ‘ठाह की ठुमरी’ दूजी नहीं। इसमें कोई हड़बड़ाहट नहीं है, ठहर-ठहर कर गाया जाता है। और बंदिशों में भी गाँव की खुशबू है। जो बनारस भी ठुमरी गयी, वह यहीं से गयी। बड़ी मोती बाई के पिता तो दरभंगा के राय साहब थे। यहीं से वह बनारस गयीं। गया की ढेला बाई की आवाज को भारत की शीर्ष चार आवाजों में कहा गया। उनको अब्दुल करीम ख़ान के बराबर कहा जाता था। उनका एक गीत कुमुद झा दीवान जी गाती हैं- ठारे रहियो तू श्याम, गगरिया मैं घर धरी आऊँ। सुना है कि उनकी आवाज गुड़ का ढेला थी, तो नाम पड़ गया ढेला बाई। उनका कोठा आज भी गया में है, लेकिन उनकी हर निशानी मिट गयी। एकमात्र तस्वीर कुमुद जी के माध्यम से उपलब्ध है।

बेग़म अख़्तर की भी परवरिश गया में हुई और ग़ुलाम मुहम्मद ख़ान उनके गुरु थे। पंद्रह वर्ष में जिस प्रोग्राम में उन्होंने पहली बार मंच पर गाया और सरोजिनी नायडु रो पड़ीं, वह पटना में ही हुआ था। जद्दन बाई, रसूलन बाई, सिद्धेश्वरी देवी, बड़ी मोती बाई सब गया में ही रहती थी। उस वक्त एक ‘शनिचरा क्लब’ था, जहाँ अब शायद बैंक वगैरा खुल गया है। वहीं महफ़िल जमती थी।

बंगाली टप्पा। उसकी रचना भी बिहार की मिट्टी में हुआ। रामनिधि गुप्ता (निधु बाबू) छपरा में क्लर्क थे। उनको लगा कि संगीत सीखना चाहिए तो एक उस्ताद से सीखना शुरू किया। और वहीं छपरा में उन्होंने शराब पीकर टप्पा लिखना शुरू किया, जो बाद में कलकत्ता आए तो लोगों ने गाना शुरू किया।

यहाँ एक और बात कह दूँ कि बिहार में कभी गायकी में ऊँच-नीच अधिक नहीं हुई। अन्य स्थानों पर कई ध्रुपदिए खयाल नहीं गाते। खयालिए ठुमरी नहीं गाते। कि ठुमरी एक कमजोर और तवायफ़ी गायकी है। वहीं पं. रामचतुर मल्लिक जी ने चारों पट गाए। ध्रुपद भी गाया, खयाल भी गाया, ठुमरी-टप्पे भी गाया और विद्यापति गीत भी गाया। इनमें भेद-भाव नहीं किया। यह बिहार की ख़ासियत है।

वादन पर पुन: लौटता हूँ।

सरोद की तो रचना ही कहिए कि बिहार में हुई। पहले यह रबाब था। इसे सरोद बनाने वाले अब्दुल्लाह ख़ान, जो अमजद अली ख़ान साहब के चाचा हुए, वह दरभंगा में ही थे। वह भी और उनके पिता मुराद अली ख़ान भी। बल्कि पहले यह सभी सरोदिए दरभंगा और गया में ही महफ़िल जमाते थे। उस वक्त सरोद का नाम था- कुड़कुड़ बाजा। यहीं से एक शाखा बंगाल गयी जिसमें राधिका मोहन मित्रा और अब बुद्धदेव दास गुप्ता तक हुए।

यह बातें गजेंद्र बाबू पहले ही लिख चुके हैं।

हमें मिल कर अब यह सोचना है कि कैसे बिहार संगीत का गढ़ वापस बने। भोपाल में ध्रुपद संस्थान खुल गया, जहाँ कोई ध्रुपद घराना रहा नहीं। और बिहार में दो मुख्य घराने होते हुए भी नहीं खुल सका। यहाँ तक कि प्रशांत-निशांत मलिक जी को दरभंगा से इलाहाबाद जाकर ध्रुपद संस्थान खोलना पड़ा, क्योंकि राज्य से समुचित सहयोग नहीं मिला।सत्तर के दशक में संगीत महाविद्यालय खुलने वाला था। शिक्षा विभाग ने सब प्रारूप बना लिया, पंचवर्षीय योजना में शामिल हुआ। यहाँ तक कि प्राचार्य नियुक्ति के लिए अखबारों में विज्ञापन भी निकला, लेकिन कुछ हुआ ही नहीं।

अब आप ही कहिए कि जब गायन, वादन और नृत्य, तीनों की जड़ें बिहार में है तो अवहेलना आखिर क्यों?
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(यह बिहार संग्रहालय में आखर​ परिवार द्वारा आयोजित व्याख्यान का स्मृति आधारित ट्रांस्क्रिप्ट। कुछेक बातें जो कही, अब याद नहीं।)

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