छौंक

न्यूयॉर्कर में एक लेख पढ़ रहा था जिसमें ‘छौंक’ की व्याख्या है। लेख अच्छा है, लेकिन छौंक को पूर्णतया देशी कन्सेप्ट कहा जाए या इतालवी ड्रेसिंग या मेक्सिकन और थाई व्यंजनों में खरे मसालों के प्रयोग से जोड़ा जाए?

मुझे लगता है कि भारतीय ‘छौंक’ लगाना काफी मिनिमलिस्टिक है, कि बस दो-चार अवययों से संसार रच दिया जाता है। मिथिला में पचफोरन (जीरा, सरसों, मंगरैल, अजवायन, मेथी) हर घर में पहले से बना-बनाया मिल जाएगा। इसमें एक लाल मिर्च और घी डाल दीजिए, हलका गरम करिए, और डाल कर ढक दीजिए। छन क आवाज आयी, तो नाम पड़ गया छौंक। यही पंजाब का तड़का, गुजरात का वेगर और कर्नाटक का ओग्गराने है जो लेख में भी लिखा है। दक्खिन में तो खैर दसफोरन है। दालचीनी, करीपत्ता (हरा), धनिया के बीज और जाने क्या क्या!

मैं या और भी कई लोग छौंक का प्रयोग नहीं भी करते, और पहले ही खरे मसाले भूँज कर फिर सब्जी बनाते हैं। छौंक बस दाल तक सीमित है। जबकि पाश्चात्य व्यंजनों में यह बाद में ही पड़ता है, मक्खन में खरे मसाले, सरसों, हालापेनो आदि डाल कर। मछली पर भी कुछ ऐसे ही। वहीं थाई व्यंजनों में चूँकि रसदार व्यवस्था है, करी बनाने की, तो उसमें कुछ पहले, कुछ बाद में, सब पड़ता है। इसलिए छौंक पर भारत का एकाधिकार है, यह गौरव के लिए ठीक है, लेकिन कमो-बेश है हर जगह।

एक बात जरूर है कि छौंक की टाइमिंग, और स्वाद में मूलभूत परिवर्तन में भारतीय व्यंजन कहीं आगे निकल जाते हैं। यह मेटामॉर्फोसिस है। बिना छौंक के भोजन लारवा-प्यूपा है, छौंक पड़ते ही वह तितली बन जाती है। उसकी सतरंगी महक पसरने लगती है।

संदर्भित अंग्रेज़ी लेख- https://www.newyorker.com/…/chhonk-the-indian-spice-infusio…

#Culture #Food

जाने तेतरी: मनेर से सूरीनाम

पटना के पास एक जगह है मनेर। वहाँ एक दरग़ाह है मनेर शरीफ़ और मनेर के लड्डू भी मशहूर हैं। वहीं से एक महिला अपने बच्चे के साथ भाग कर कलकत्ता के रास्ते जहाज पर सूरीनाम पहुँच गयी। यह बात 1880 ई. की है। उस वक्त भारत में एक मुस्लिम महिला की स्थिति जैसी भी हो, पर अपने बच्चे को लेकर परिवार छोड़ कर सात समंदर पार भाग जाना हिम्मत का काम है।

कहते हैं, “पलायन नारी मुक्ति का द्वार है”। भागी हुई लड़कियाँ मुक्त हो जाती है।

वह महिला जानी तेतरी भी मुक्त हो गयी। उसने गन्ना खेतों में खूब मजदूरी की, अपना बच्चा भी पाला और एक हिंदू बच्चा भी गोद लिया। कुछ ही वर्षों में जानी उन मजदूरों की सरदारनी बन गयी, और लोग उससे सुझाव वगैरा लेने जाते। इतना ही नहीं, जानी मजदूरों के हक की लीडर भी बनी।

तेतरी के साथ लगभग चार सौ मजदूर एक स्कॉटिश बागान में काम करते, जहाँ के हालात बुरे थे। उन्हें कोल्हू के बैल की तरह काम कराया जाता, और खूब ज्यादतियाँ होती। एक दिन सब्र का बाँध टूट गया, और तेतरी-रामजनी ने मिल कर सत्याग्रह छेड़ दिया। फिरंगियों की फौज ने जब घेरा तो मजदूरों ने भी ढेले-बोतल उठा लिया और तेतरी ने समूह को लीड करते चिल्लाया, “आवा! हिम्मत है तो आवा।”

मजदूरों को घेर कर फायरिंग हुई, और एक गोली तेतरी की पीठ पर लगी। रामजनी नदी में कूद गए। तेतरी के साथ छह हिंदुस्तानी शहीद हुए।

वर्षों बाद जब मैं तेतरी की खोज में निकला, तो मालूम पड़ा कि वह भुला दी गयी थी। फिर एक हिंदुस्तानी ने तेतरी की लड़ाई वापस शुरु की। उनसे मैं मिला भी। आखिर एक अंग्रेज की मूर्ति को गिरा कर सूरीनाम की राजधानी में जानी तेतरी की मुर्ति स्थापित की गयी। यह बात भी छिड़ी कि इस्लाम में मूर्ति पूजा नहीं होती, उस पर सबने कहा, “ओ न हिन्दू हइ, न मुसलमान, ओ हमार हिंदुस्तानी माई हइ।”

#कुली_लाइन्स #बिदेसिया #गिरमिट #कन्त्राकी

#CoolieLines

पुस्तक का अमेजन लिंक – amzn.to/2Ufb8hw

सरौली सी मीठी: लता मंगेशकर

सन् 1947 भारतीय इतिहास का पटाक्षेप तो था ही, हिन्दी फ़िल्म संगीत का भी पटाक्षेप था। आप अगर ‘47 से पूर्व और उसके बाद के गीतों को सुने तो आपको बदलते सुर स्पष्ट नजर आएँगे। के. एल. सहगल की मृत्यु, नूरजहाँ का पाकिस्तान जाना और शमशाद बेग़म की आवाज का मद्धिम पड़ना; जैसे एक सूर्य का अस्त हो रहा हो, एक नए सवेरे के लिए। अंग्रेज़ों के जाने के बाद जो उन्मुक्त ध्वनि प्रवाहित हुई, उसकी वाहक बनी लता मंगेशकर। यह खुले गले की आवाज परंपरा से हट कर थी, जैसे बेड़ियाँ टूट गयी हो। यतींद्र मिश्र अपनी पुस्तक ‘लता सुर गाथा’ में लिखते हैं कि ‘हवा में उड़ता जाए मेरा लाल दुपट्टा मलमल का’ (बरसात, 1949) गीत फ़िल्म संगीत को नए क्षितिज की ओर उड़ा ले जाता है, जो अभी तक भारी-भरकम आवाज़ों की घूँघट में पल रहा था। यह कहा जा सकता है कि संगीत को ‘सुगम’ लता जी की आवाज ने ही बनाया। सुगम का अर्थ यहाँ आसान से नहीं, उसके लचीलेपन और फलक के विस्तृत होने का है। खुले शब्दों में कहा जाए तो जितनी शक्ल लता जी की आवाज की दी जा सकती थी, उतनी शमशाद बेग़म, जोहराबाई अम्बालेवाली, या सुरैया की आवाज को भी देना कठिन था। पहले गायिका की आवाज के हिसाब से सिचुएशन बनाए जाते थे, अब किसी भी सिचुएशन पर लता जी के स्वर को सेट किया जा सकता था। शायद ही कोई रस हो, कोई कथानक हो, कोई पात्र हो, कोई कालखंड हो, या कोई संगीतकार हो, जहाँ तक लता जी की आवाज न पहुँची हो।

और यह सार्वभौमिकता यूँ ही नहीं आई। उनके पहले सफल गीत ‘आएगा आने वाला’ (महल, 1949) को ही सुनकर जद्दन बाई (नरगिस की माँ) ने दाद दी थी कि एक मराठी गायिका होकर ऊर्दू में ‘बग़ैर’ का ऐसा तलफ़्फुज़ हर किसी का नहीं होता। और यही बात उनके गाए भोजपुरी गीत ‘जा जा रे सुगना जा रे’ (लागी नहीं छूटे रामा, 1963) के लिए भी कही जा सकती है। उनकी आवाज जल की तरह पात्र का आकार ले लेती। शायद यही वजह रही कि जहाँ अभिनेताओं में हर किसी के लिए अलग गायक थे, जैसे राज कपूर के लिए मुकेश; अभिनेत्रियों में चाहे नरगिस हों, मीना कुमारी या मधुबाला, गायिका लता ही रहेंगी। और श्रोताओं को भी अटपटा नहीं लता, क्योंकि लता जी पात्र के अनुसार सूक्ष्म स्तर पर अपना स्वरमान और अंदाज भी बदल लेतीं। जैसे उनके प्रिय क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर उनकी तरह पिच के हिसाब से अपने पैर और खेलने का ढंग बदलते रहे।

ऐसी आवाज को लोग ईश्वर-प्रदत्त या अलौकिक कहते रहे हैं, जो अपनी जगह ठीक भी है; लेकिन, दूसरी लता मंगेशकर का आना तब तक असंभव है जब तक कि उनकी तैयारी को न समझा जाए। लता जी के गीतों में एक सतत और सकारात्मक परिवर्तन नजर आता है। जैसे एक कालबिंदु पर गाया जा रहा गीत, पिछले सभी गीतों का योगफल हो। तभी बिस्मिल्लाह ख़ान और बड़े ग़ुलाम ख़ान सरीखे कहते रहे कि वह कभी बेसुरी नहीं होती। हिंदुस्तानी संगीत में रियाज की परंपरा रही है, लेकिन फ़िल्मी संगीत में ऐसी कोई गुरु-शिष्य परंपरा तो रही नहीं। और लता जी इतनी कम उम्र में इस क्षेत्र में आ गयीं, कि वह किसी गुरु के साथ लंबे समय तक जुड़ी भी न रह सकी। तो आखिर यह कैसे मुमकिन हुआ?

संभवत: इसके तीन आयाम होंगे- प्रयोगधर्मिता, अनुशासन और आजीवन सीखने की इच्छा। अपने पिता की गोद में उन्होंने जीवन का पहला राग पूरिया धनाश्री सीखा, फ़िल्मी दुनिया में आने के बाद भी बंबई के भिंडीबाज़ार घराने के उस्ताद अमान अली ख़ान से गंडा बँधवा कर राग हंसध्वनि में ‘लागी लगन सखी पति संग’ सीखा, अनिल विश्वास जी से ताल और लय की बारीकियाँ सीखी, तो संगीतकार रोशन से शास्त्रीय संगीत की महीन बातें। मीरा के भजन भी गाए, और ‘दर्द से मेरा दामन भर दे’ जैसे ग़जल भी। उनका गाया असमिया गीत ‘जानाकोरे राति’ सुन कर आप असम पहुँच जाते हैं, वहीं इलायराजा के गीत ‘वलइयोसइ’ (सत्या, 1988) सुन कर चेन्नई। तो इसमें अलौकिकता से इतर वैज्ञानिकता भी है कि उन्होंने स्वयं को सर्वग्राह्य बनाया, और ऐसा ही प्रयास फनकारों और अध्येताओं को करना चाहिए। अनुशासन की डोर से बँधे भी रहें, और अपनी सोच में उन्मुक्त भी।

एक गुलज़ार साहब का संस्मरण पढ़ा कि वाक्य था ‘सरौली सी मीठी लागे’, और लता जी को सरौली का अर्थ नहीं मालूम था। उन्हें जब बताया कि यह एक आम है, तो वह पूछ बैठी कि यह आम कितना मीठा होता है? दरअसल, उस गीत के लिए उन्हें अपनी आवाज में भी उतनी ही मिठास लानी थी, जितनी उस सरौली आम में थी।

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संगीत में उत्तर-दक्षिण संगम

एक बात तो मन में आती ही है कि उत्तर के गायक जब तमिलनाडु वगैरा जाते होंगे तो उन्हें क्या खाक बंदिश समझ आती होगी? लेकिन अब्दुल करीम ख़ान तो अक्सर जाते और सब चुप्प होकर सुनते, रस लेते। रोशनआरा बेग़म ने कहा कि मद्रास जैसी महफ़िल फिर कहीं न हुई। सुर की समझ तो दक्खिन में घर-घर में है, और सुर की भाषा नहीं होती।

पं. रवि शंकर ने दक्खिन के रागों को खूब बजाया, इसकी वजह चाहे जो भी रही हो। वह एक बार साक्षात्कार में कहते हैं कि मैंने अपना बंगाली उपनाम इसलिए हटाया कि लोग मुझे भारतीय समझें, बंगाली नहीं। वह ‘पैन-इंडियन’ पहचान चाहते थे, कि वह कहीं जाएँ तो लोग ये न टैग लगाते फिरे कि उत्तर से है या दक्खिन से।

और यही बात अब्दुल करीम ख़ान की भी रही जब वह घूम-घाम के धारवाड़ तक आए तो अपना थोपने की बजाय, अपने तान में दक्खिन के मुरकी, खटका लाए। आप किराना का आलाप सुनिए, तो हल्के लफ्जों में कहूँ, लगेगा कि ‘पड़ोसन’ फिल्म के महमूद गा रहे हैं। दक्खिन के आलाप में ऊँची पिच बसी ही हुई है कि एक वेदना या करुणा निकल आती है। खींच-तान कम, रस अधिक। तो यह सुगम अधिक है। यही वजह रही होगी कि जितने फिल्मी गायक हुए लता जी, आशा जी, मन्ना डे, महेंद्र कपूर सबके सब भिंडीबाजार से सीखे। वहाँ दक्खिन से सीखे उत्तर भारतीय गुरु अमान अली ख़ान हुआ करते। बाकी लोग इमन (यमन) से शुरुआत कराते, वह हंसध्वनि से। दक्खिन के राग से।

भीमसेन जोशी ने तो स्पष्ट ही कह दिया कि मैं किसी उत्तर भारतीय के साथ जुगलबंदी न गाऊँगा। बस बाल मुरलीकृष्ण के साथ गाऊँगा। हालांकि विलायत ख़ान ने जोर दिलवा कर राशिद ख़ान के साथ बहुत बाद में गवाया। लेकिन दक्खिन वाले क्या उत्तर वालों को यूँ ही सिखा देते होंगे? उस वक्त हिन्दी-तमिल न होता होगा? होता है, मगर प्रेम से होता है।

एक बार बड़े ग़ुलाम अली ख़ान ने बालासुब्रहमण्यम जी को राग गावती सिखाया, तो बदले में उन्होंने आंदोलिका सिखा दिया। यही अदला-बदली होती। तभी तो संगीत पैन-इंडियन बनता। तो मैं जब कहता हूँ कि यह ‘क्लासिकल’ शब्द और घराने उखाड़ फेंकिए और एक शब्द कहिए- हिंदुस्तानी संगीत। तो इसमें अब कार्नाटिक कह कर एक फांक और न करिए। वह भी ‘हिंदुस्तानी संगीत’ ही है। सब एकहि है।

#ragajourney

मैथिली भाषा पर कुछ बातें

मुझे नहीं लगता कि इस भाषा का पतन हो रहा है, या यह कभी खत्म होगी जैसा हालिया एक ट्वीट में देखा। बल्कि अभी इतने किताबें छप रही हैं जितनी शायद दशकों से नहीं छपी होगी। रोज ही कोई न कोई विमोचन हो रहा है। मेरे घर में, पाँच घर छोड़ के, दो गाँव छोड़ के, दो जिला छोड़ के। हर जगह। हिन्दी के क्षेत्र के अनुपात से पाँच-दस गुणा अधिक और लोग खर्च कर के छपवा रहे हैं। पढ़ी भी जा रही है, जितनी पहुँच है उतनी।

शुरु से ही विश्वविद्यालय में पढ़ाई रहने की वजह से शोध और विमर्श खूब छपे हैं और नियमित छप रहे हैं। प्रोफेसरों को छपवाना पड़ता भी है कि तरक्की होती रहे, और यूँ भी। शोध छपने की क्या महत्ता है, यह बताने की जरूरत नहीं।

एप्रोच शब्दश: लड़ाका नहीं रहा, लेकिन भाषा के मामले में समय-समय पर मुहिम चलती ही रहती है। कोई मैथिल यह पोस्ट पढ़ कर भी लिख जाएँगे कि हिन्दी में क्यों लिखा।

मैथिली से इतर भी क्रॉस-मार्केटिंग होती रही है, और हिन्दी तथा अंग्रेजी में लोग मिथिला पर नियमित लिखते रहे हैं। इन माध्यमों से मैथिली की बात होती रही है। बल्कि बाकायदा एक सम्मान/पुरस्कार है जो सिर्फ उन्हें मिलता है जो हिन्दी और मैथिली, दोनों में लिखते हों। तो नागार्जुन, आरसी प्रसाद सिंह, हरिमोहन झा, राजकमल चौधरी, गंगेश गुंजन, उषाकिरण खाँ जी जैसे लोग यह द्विभाषी धर्म बखूबी निभाते रहे हैं। वहीं जयकांत मिश्र से मिथिलेश जी तक अंग्रेज़ी में खूब लिखा गया और अब भी जा रहा है। मैं खुद भी लिख रहा हूँ।

युवा पीढ़ी नए जोश के साथ तो है ही, वरिष्ठों के साथ संवाद में नियमित है। भाषा को संस्कृति से गहरे तौर पर लिंक कर दिया गया है कि अधिकतर कार्य बिन भाषा के संभव ही नहीं। और यह एक छुपा हुआ पक्ष है जो सतह से नजर न आएगा।

गतिविधियाँ बहुत ज्यादा है, और ग्रामीण स्तर से लेकर महानगरों तक है। एक कवि सम्मेलन में सौ कवि भी मिल सकते हैं, अगर मौका दिया जाए। भिन्न-भिन्न गुणवत्ता के।

बाकी, जो नकारात्मक पक्ष है, उसको तो मैं सदा से नजर-अंदाज करने वालों में हूँ।

(Published previously in Hindustan)

जब शौच की सफाई करते थे चीनी

‘कुली लाइन्स’ लिखने के दौरान एक लेख पढ़ा कि मलेशिया में शौच की सफाई वहाँ बस गए चीनी लोग करते थे। भारतीय जो वहाँ गए थे, वे खेती-बाड़ी में ठीक थे, शौच सफाई में ख़ास निपुण नहीं। और स्थानीय लोग तो खैर ऊँचे दर्जे के हुए तो ये निम्न काम क्यों करें? लेकिन मेरी रुचि यह जानने में थी कि मलेशिया को आखिर यह पद्धति बदलनी क्यों पड़ी? जब एक खानदानी वर्ग यह कर ही रहा था, तो करने देते? क्योंकि वहाँ भी यह खानदानी पेशा बन गया था।

फिर मालूम पड़ा कि उनमें भी कोई दया-भाव की बात नहीं थी। उन्हें बस यह सिस्टम प्रगति के लिए बाधक लगा कि कोई आदमी मैनहोल में घुस कर सफाई करे। यह आदम पद्धति लगी। तो शुरुआत तो यही हुई कि जब टैंक जम जाए, तो दूसरा खोद दो। और यही लंबे समय तक चलता रहा, जैसा भारतीय घरों में होता है। वहाँ टैंक में घुस कर सफाई कम ही होती है। दूसरा खोद दिया जाता है। एक और पद्धति यह भी हो गयी कि मैनहॉल तक प्लास्टिक वगैरा न पहुँचे तो वह जाम होगा ही नहीं, और सफाई भी नहीं करनी पड़ेगी। शौच का ट्रीटमेंट हो सकता है, उसमें फँसे प्लास्टिक का उसी पद्धति से नहीं।

यूरोप वगैरा में यूँ गड्ढे खोदते जाने के बजाय ऑटोमेटेड सफाई यंत्र हैं, जो भारत में भी लाने की बात चलती रही है। लेकिन ये मँहगे हैं। और यूँ भी जितने भी ठेकेदार हैं, उनको मैनहोल में कूदने वाले मिल ही जाते हैं। लेकिन ऐसी स्थिति में उन्हें ऑक्सीजन मास्क दी जा सकती है, जो दी नहीं जाती। ऐसा कोई कन्सेप्ट ही नहीं है।

अगर मानवाधिकार और दया-भाव को भूल भी जाएँ, तो भी यह तरीका प्रगति में बाधक है, इस बात को समझने की जरूरत है। क्योंकि मानवाधिकार कहने से यह प्रवचन लगने लगता है, जिसे सुनते सभी हैं, मानता कोई नहीं। पूर्णतया पूँजीवादी पद्धति में भी यह मैनहोल में कूदने वाली बात एक चाँद पर पहुँचने वाले देश में अटपटी है।

आज सुप्रीम कोर्ट ने दो बातें कही,

१. ऐसा भला कोई देश क्यों चाहेगा कि अपने नागरिकों को हमारे मल से बनाए गैस चैम्बर में बिना ऑक्सीजन भेजे?

२. क्या आप उस व्यक्ति से हाथ मिलाना पसंद करेंगे जो प्रतिदिन मल में नहा कर निकलता हो?

(जब भी हम कोई प्लास्टिक, धातु, शीशा एक नाले में फेंकते हैं, उसे बटोरने के लिए एक व्यक्ति मेनहोल में कूदते हैं, ताकि जाम न हो। और उनमें से कुछ लोग वहीं मर भी जाते हैं या बीमार रहते हैं। कुछ जिम्मेदारी हमारी, कुछ सरकार की)

राजतरंगिणी (Rajatarangini)

प्रथम_तरंग

रचयिता: कल्हण; पाठ (सरलीकरण/रूपांतरण): प्रवीण कु. झा

कल्प के 6 मन्वंतर पर्यंत हिमालय के बीच एक ‘सतीसर’ नाम की बड़ी झील थी। सातवें यानी वैवस्वत मन्वंतर में कश्यप ऋषि ने सभी देवताओं के सहयोग से उस झील में बसे असुर जलोद्भव को मरवा डाला और उस झील की भूमि में कश्मीर की संरचना की। यह प्रदेश वितस्ता नदी की धारा से और नागराज श्री नीलनाग से पालन किया जाता है। वितस्ता में अमृत और विष दोनों के गुण हैं। इसकी कंदराओं में पार्वती गणेश को दूध पिलाती थी, तो इसमें उस दूध के गुण हैं। और इसकी धारा में साँप आकर जल पीते हैं, इसलिए उसमें नागों के विष का गुण भी है। तमाम रत्न वाले साँपों से सुसज्जित यह देश कुबेर की नगरी लगती है। गरूड़ के भय से इन साँपों की रक्षा के लिए इस प्रदेश में पहाड़ों की दीवार खड़ी की गयी।

यहाँ पापसूदन तीर्थ में लकड़ी (काठ) के बने शिव की पूजा से भोग और मोक्ष, दोनों की प्राप्ति होती है। यहाँ एक निर्जल पर्वत है, जहाँ अगर पुण्यात्मा जाती है तो जल मिल जाता है, लेकिन पापियों को नहीं मिलता। यहाँ धरती से आग की ज्वालाएँ भी निकलती है, जैसे गण हवन कर रहे हों। यहाँ भेड़ पर्वत पर एक झील है जहाँ से गंगा का उद्भव हुआ, वहाँ कई हंस विचरण करते हैं। नन्दीक्षेत्र में एक शिव-मंदिर है, जहाँ देवों द्वारा शिव की पूजा की गयी थी। आज भी उस मंदिर में चंदन-बिन्दु दिखते हैं। यहाँ माँ शारदा के दर्शन से कवियों के द्वारा सेवित दो नदियों- मधुमती और मधुरवाणी की प्राप्ति होती है। कश्मीर में चक्रधर, विजयेश, ईशान, आदिकेशव इत्यादि तीर्थ-स्थल तो हैं ही, यहाँ एक भी ऐसा स्थान नहीं जो तीर्थ नहीं।

‘कश्मीर पर विजय पुण्य की शक्ति से ही की जा सकती है, शस्त्र से नहीं। इसलिए कश्मीर-वासी परलोक से डरते हैं, शस्त्र से नहीं।’

यहाँ ठंड के समय स्नानागारों में गरम जल मिलता है, और गर्मी के समय नदियों में शीतल जल। चूँकि इस स्थान का निर्माण सूर्य के पिता कश्यप ने किया, वो यहाँ कभी भी भीषण गर्मी नहीं लाते। यहाँ बड़े-बड़े विद्या-भवन, शीतल स्वच्छ जल और अंगूर जैसे दुर्लभ फल भी साधारण ही माने जाते हैं। तीनों लोक में पृथ्वी श्रेष्ठ है, उसमें भी उत्तर दिशा, उस दिशा में श्रेष्ठ हिमालय, और हिमालय में सबसे रम्य स्थान है कश्मीर।

कलियुग में इस देश में कौरव-पांडव के समकालीन तृतीय गोनन्द तक 52 राजा हुए। लेकिन उन राजाओं के अत्याचार से कवि या लेखक पनप नहीं पाए। यहाँ के राजा प्रतापी हुए और कश्मीर को सुरक्षित रखा, पर इनका नाम लेने वाला कोई नहीं रहा। जिनके राज में हाथियों के दल थे, धन की वर्षा थी, सुंदरियों का विहार था, और गगन-चुम्बी भवन थे, उन्हें आज कोई याद नहीं करता।

‘इसी लिए कवि से महत्वपूर्ण कोई नहीं। उनके बिना संसार अंधा है।’

कश्मीर में गोनन्द आदि 52 राजाओं नें 2268 वर्ष तक राज किया। जो लोग यह मानते हैं कि महाभारत कलियुग में नहीं, द्वापरयुग के अंत में हुआ, वो मेरी काल-गणना से असहमत हो सकते हैं। पर यह तो सच है ही कि लगभग कलियुग में जितने वर्ष बीते हैं, उतने ही वर्ष राजाओं ने अब तक शासन किया है।

(कलियुग के 653 वर्ष में कौरव-पांडव हुए। अभी शककाल के 1070 वर्ष बीत चुके हैं। तीसरे गोनन्द के समय से आज तक 2330 वर्ष बीत चुके। एक दूसरी गणना भी है। सप्तर्षि एक नक्षत्र से दूसरे नक्षत्र लगभग 100 साल में घूमते हैं। जब युधिष्ठिर का शासन था, वो मघा नक्षत्र में थे, जो शक-काल 2556 था।)

प्रथम तरंग की काल-गणना में अधिकतर टीका लिखने वालों और स्वयं कल्हण को संदेह है। वह पक्की नहीं कही जा सकती।

चंचल गंगा नदी जब बहती थी, तो वह कैलाश पर्वत का उपहास करती, राजा गोनन्द की सेवा में हाज़िर रहती। शेषनाग का विष भरा मस्तक त्याग यह धरती राजा गोनन्द के रत्न-सज्जित भुजाओं के आश्रय में चली गयी।

राजा गोनन्द जरासंध के मित्र थे, और वह कृष्ण से लड़ने के लिए मथुरा पहुँचे। उन्होंने मथुरा को चारों ओर से घेर लिया। वहीं यमुना किनारे अपनी सेना को ठहराया, अपने आतंक से यादव स्त्रियों का हास किया; और यादव सैनिकों का मनोबल तोड़ा। जब यादव सेना हारने लगी तो बलराम रक्षा के लिए आए। लेकिन इन दोनों वीरों में युद्ध चलता रहा और लंबे समय तक कोई विजयी न हो सका। आखिर गोनन्द शस्त्रों से छलनी हुए, और वीरगति को प्राप्त हुए।

गोनन्द के बाद दामोदर कश्मीर के राजा बने, जिनके मन में यादवों से बदले की आग सुलगती रही। जब गांधार-नरेश ने अपनी कन्या के स्वयंवर में राजाओं को निमंत्रण भेजा, तो दामोदर भी अपनी सेना लेकर यादवों से लड़ने निकल पड़े। दामोदर ने जब इस स्वयंवर के लिए आए वीरों पर आक्रमण किया तो भला स्वयं-वर कैसे होता? आखिर कृष्ण ने अपने सुदर्शन से दामोदर का वध कर दिया। कृष्ण ने ही दामोदर की गर्भवती पत्नी यशोमती का राज्याभिषेक कराया।

लेकिन उस वक्त स्त्री को राजा बनते देख मंत्रियों में असंतोष फैल गया।

‘फिर कृष्ण ने उन्हें शांत कराया कि कश्मीर तो पार्वती का ही स्थल है।’

यह सुन कर लोग जो स्त्रियों को भोग्य मानते थे, देवी रूप मानने लगे, और यशोमती को राजमाता। दसवें महीने में यशोमती के बेटे का जन्म हुआ। उसका नाम रखा गया- गोनन्द (द्वितीय)। यहाँ की वितस्ता नदी और कश्मीर की धरती भी इस बालक की उप-माताएँ बनी। यह बच्चा जब किलकारी करता और खेलता, तो उसके साथ खेलते राज-अनुचर पारितोषिक पाते। अगर कोई मंत्री उस बालक की बात नहीं समझ पाता, तो खुद को अपराधी समझता। जब वह बाल-नरेश सिंहासन पर बैठते, तो उनके पैर जमीन तक नहीं पहुँचते। बाल-नरेश को पंखा झलकर आराम करने दिया जाता, मंत्रीगण राज-काज सँभालते।

जब महाभारत युद्ध हुआ तो कौरवों या पांडवों ने इस बाल-नरेश को बच्चा समझ युद्ध के लिए आमंत्रित नहीं किया।

बाद में जो 35 राजा हुए, उनका इतिहास में वर्णन नहीं मिलता। उसके बाद लव नामक एक राजा हुए। वह एक यशस्वी राजा थे जिन्होंने शत्रुओं की नींद हराम की। उन्ही ने 84 लाख पत्थर लगवा कर ‘लोलोर’ और ‘लोलेर’ नामक नगर बसाए। इस प्रतापी राजा लव ने आखिर लेहरी नदी किनारे बसा गाँव लेवर ब्राह्मणों को दान कर दिया और स्वर्गवासी हो गया। लव के बाद कुश आए। कुश के बाद कुशेशय नामक राजा बना, जिसने कुरूहार नामक गाँव ब्राह्मणों को दिया। कुशेशय के बाद अगले राजा हुए – खगेन्द्र। उन्होनें खागी और खोनमुष नामक गांवों की स्थाप्ना की।

खगेन्द्र के पुत्र सुरेन्द्र के सामने तो देवराज इन्द्र भी लज्जित होते थे। उन्होंने दरद देश की सीमा पर सोरक नामक नगर बसाया। उन्होंने ही नरेंद्र भवन और सौरभ नामक दो विहार बनाए। राजा सुरेंद्र के पुत्र नहीं थे। तो उनके बाद दूसरे वंश के राजा गोधर राज करने लगे। राजा गोधर धार्मिक व्यक्ति थे, और उन्होंने ब्राह्मणों को गोधर और हस्तिशाला नामक गाँव दिए। उनके बाद उनके पुत्र सुवर्ण राजा हुए, जो दानवीर थे। उन्होनें ही कराल देश में एक कृत्रिम नदी बहाई- भीष्म कुल्या। उनके बेटे जनक ने विहार और जालौन नामक गाँव बसाए। जनक के बाद उनके पुत्र शचीनर राजा हुए, जो क्षमाशील तो थे ही, पर उनकी आज्ञा कोई ठुकरा नहीं सकता था। इन्होंने शमांगार और शनार नामक दो गाँव बसाए। शचीनर के कोई पुत्र नहीं थे।

अगले राजा हुए अशोक, जो शकुनी के प्रपौत्र थे। ये एक पवित्र राजा थे, जिन्होंने जैन धर्म स्वीकारा। इन्होनें शुष्कलेत्र और वितस्तात्र में जैन-स्तूप बनवाए। वितस्तात्र के धर्मारण्य विहार का बना जैन-मंदिर तो विशालकाय था, जिसकी ऊँचाई देखने वाली थी।

‘इसी राजा ने 96 लाख भवनों से बना ‘श्रीनगर’ बसाया।’

राजा ने हिंदू विजयेश्वर मंदिर जो चूने का बना था, उसे तुड़वा कर पत्थर का भव्य जैन मंदिर बनवाया। विजयेश्वर के अतिरिक्त अशोकेश्वर नाम से दो मंदिर पास ही और बनवाए।

अशोक के समय ही कश्मीर पर म्लेच्छों का आक्रमण हुआ, जिनके समूल नाश के लिए राजा अशोक ने शिव की तपस्या प्रारंभ की। इस तपस्या के पश्चात् उन्हें एक यशस्वी पुत्र प्राप्त हुए- जलौक, जो अगले राजा बने। उनकी पवित्रता देख कर तो देव-गण भी आश्चर्य-चकित थे। इस राजा ने पारद (मर्करी) आदि धातुओं से स्वर्ण (या सोने सरीखे धातु) बनाने की शक्ति पाई, और इससे पूरी धरती को स्वर्ण-मय बनाने की उनमें इच्छा जागी।

राजा जलौक नागसरोवर में नाग-कन्याओं से यौन-संबंध भी स्थापित करते रहे। इस राजा ने कई बुद्धिमान बौद्धों को परास्त भी किया। ये शिव-भक्त थे और नन्दीश क्षेत्र के श्रीज्येष्ठचेश्वर में प्रतिदिन शिव की आराधना करते थे। यह यात्रा लंबी थी, लेकिन इस यात्रा में पूरे रास्ते राजा के साथ एक नाग चलता था, और इसलिए हर गाँव में घोड़े की ज़रूरत नहीं होती।

‘उस वीर राजा ने आख़िर म्लेच्छों के दल को हर जगह परास्त कर खत्म कर दिया।’

जिस जगह से म्लेच्छों को उखाड़ फेंका गया, उसका नाम ‘उज्झटडिम्ब’ नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसी राजा ने ‘कान्य-कुब्ज’ और अन्य देशों को जीत कर कश्मीर में विद्वान पंडितों और चारों वर्णों के लोगों को बुलाया। इनकी मदद से राज्य-प्रबंधन में सुधार किए गए। पहले राज्य में सात अधिकारी होते थे- धर्माध्यक्ष, कोषाध्यक्ष, सेनापति, धनाध्यक्ष, विदेश सचिव, पुरोहित और ज्योतिषि। अब युधिष्ठिर के राज की तरह आठवाँ विभाग जुड़ा- कार्य-विभाग!

राजा जलौक ने ही वारबल आदि गाँव ब्राह्मणों को दिए। उसकी रानी ईशान देवी ने कश्मीर और अन्य देशों के द्वारों पर प्रभावशाली मातृ-चक्र की स्थापना की। राजा जलौक ने व्यास से जब नन्दी-पुराण सुना तो उसके मन में नन्दीश क्षेत्र के अलावा सोदर तीर्थ में पूजन की इच्छा जगी। हालांकि उसने श्रीनगर में ही भगवान् ज्येष्ठचेश की स्थापना की थी, लेकिन सोदर तीर्थ जाकर ही पूजा करने की उसकी इच्छा प्रबल हो गयी थी। सोदर तीर्थ उसके निवास से काफी दूर था, तो एक दिन वो व्यस्तता की वजह से जा न सका। इस कारण वो बहुत परेशान हुआ।

लेकिन तभी जमीन से बिल्कुल सोदर-तीर्थ जैसी ही जल-धारा निकलने लगी। उसमें जब उसने स्नान किया तो लगा सोदर तीर्थ यहीं उठ कर आ गया। इस बात की जाँच के लिए उसने एक पात्र मूल सोदर तीर्थ में रख दिया। वो बह कर इसी जल-धारा में आ गया। इससे सिद्ध हो गया कि यह जल-धारा सोदर तीर्थ से ही आ रही है। यह संभव है कि राजा जलौक नन्दीश (शिव) का ही अवतार था। नहीं तो भला ऐसे चमत्कार कैसे होते?

एक समय राजा जलौक विजयेश्वर जा रहे थे, तो रास्ते में एक स्त्री ने भोजन माँगा।

राजा ने पूछा, “तुम क्या खाना पसंद करोगी?”

“मुझे नर-मांस खाने की इच्छा है।” यह कहते हुए स्त्री ने भयंकर रूप धारण कर लिया।

“मैं किसी की हत्या तो नहीं कर सकता। तुम मेरा मांस खा लो।”

“आपका मांस? यह कैसे संभव है? हे राजा! मैनें आज आप में बोधिसत्व देख लिया। आप महान् हैं।”

“बोधिसत्व का क्या अर्थ है?”

“अब आपको मैं सारी बात कहती हूँ। मुझे आपके द्वारा परास्त किए बौद्धों ने भेजा है। मैं लोकालोक पर्वत के समीप अंधकार में रहने वाली डायनों में से हूँ। हम अपने पापों से मुक्ति के लिए बोधिसत्वों के शरण में रहते हैं। बोधिसत्व महात्मा बुद्ध के बाद जो भी बौद्ध ज्ञानी पुरूष हुए, वे लोग हैं। वे अपराधियों पर क्रोधित नहीं होते, उन्हें क्षमा कर देते हैं। वे संसार का कल्याण करते हैं। एक बार एक बौद्ध-विहार में बज रहे वाद्य-यंत्रों से आपकी नींद में खलल पड़ गया, तो आपने सारा विहार ही तहस-नहस कर दिया। इसी का बदला लेने बौद्धों ने मुझे आपके पास भेजा।”

“अच्छा। आगे कहिए।”

“उन्होनें मुझसे कहा कि राजा महाशाक्य है, और इसलिए उसे मैं पीड़ा नहीं दे सकती। आपके दर्शन से मुझे सद्गति मिलेगी। कुछ दुष्टों ने आपका मन मलिन कर रखा है। मैं आपको असंख्य सोने के सिक्के देती हूँ। आप बौद्ध-विहार पुन: बनवा दें। इससे उन दुष्टों का प्रायश्चित हो जाएगा, जिसने आपको इस विहार को तोड़ने के लिए कहा था। मैनें आपसे भोजन माँग कर आपके सत्व की परीक्षा ली थी। अब मैं भी पाप-मुक्त हो जाऊँगी। आपका कल्याण हो। मैं अब जाती हूँ।”

यह कह कर वो अदृश्य हो गयी।

राजा ने उस कृत्या (डायन) के लिए एक कृत्याश्रम विहार बनवाया, और उसकी पूजा करने लगा।

राजा जालौक ने ही नन्दीश क्षेत्र में भगवान् भूतेश का विशाल रत्न-सज्जित पत्थरों का मंदिर बनवाया। इसी राजा ने ज्येष्ठेश भगवान् की पूजा के लिए सौ नाचने-गाने वाली स्त्रियों को रखा था। अंत में राजा जलौक अपनी पत्नी के साथ कनकवाहिनी नदी के किनारे चीर-मोचन में तपस्या करने को बैठे, और आखिर उनकी मृत्यु हुई और वो शिव रूप में लीन हो गए।

राजा जालौक के बाद राजा दामोदर आए। वो किस वंश के थे, यह कहना कठिन है। यह राजा भी संसार में प्रसिद्ध और धन से इतने संपन्न रहे कि देवता कुबेर भी उनके मित्र थे। उन्होनें अपने हजारों यक्षों (इंज़ीनियरों) को लगाकर एक ‘गुड्ड’ नामक बांध बनवाया। इस बांध से दामोदरसूद नामक उसके बसाए नगर में पानी पहुँचता था। पर इस बाँध में एक बड़ा विघ्न आने वाला था।

उस वक्त ब्राह्मणों को नाराज करना राजाओं के लिए एक पाप था। एक दफे राजा दामोदर वितस्ता नदी की ओर नहाने जा रहे थे, उनके पास कई भूखे ब्राह्मण पहुँच गए और भोजन मांगने लगे। राजा बिना ध्यान दिए आगे बढ़ने लगे, तो ब्राह्मणों ने अपनी शक्ति से वितस्ता नदी को ही सामने ला दिया और कहा कि यह रही नदी! अब भोजन दो। पर राजा ने फिर भी ध्यान नहीं दिया और कहा कि नहाने के बाद ही भोजन देंगे। इतना ही नहीं, राजा ने उन्हें वहाँ से चले जाने को कह दिया।

ब्राह्मण नाराज होकर बोले, “जा राजन! तू साँप बन जा।”

“नहीं! मुझे क्षमा कर दें।”

“अब जब एक दिन में संपूर्ण रामायण सुनेगा, तभी तू मुक्त होगा।”

उस दिन के बाद वो राजा साँप बन गया, और आज भी कश्मीर में कहीं भटक रहा है।

राजा दामोदर के बाद हुष्क, जुष्क और कनिष्क नामक राजा हुए, जिन्होंने हुष्कपुर, जुष्कपुर और कनिष्कपुर नामक नगर बसाए। इनमें से जुष्क ने जुष्कपुर और जयस्वामिपुर में बहुत से बौद्ध विहार बनवाए। यह वो वक्त था जब कश्मीर में बौद्ध-धर्म का बोलबाला था। महात्मा बुद्ध की मृत्यु तो डेढ़ सौ वर्ष पूर्व हो चुकी थी, पर नागार्जुन नामक बोधिसत्व ने बौद्ध-धर्म का प्रसार खूब किया था।

इन राजाओं के बाद आए- राजा अभिमन्यु। इन्होंने कण्टकोत्स नामक गांव ब्राह्मणों को दिया। इसी राजा ने अभिमन्युपुर नामक शहर बसा कर वहाँ शिव का मंदिर बनवाया।

अभिमन्यु के समय ही चंद्राचार्य नामक पंडित ने एक महत्वपूर्ण कार्य किया। पाणिनी और कात्यायन द्वारा स्थापित ‘महाभाष्य’ व्याकरण जो लुप्त हो रहा था, उसका पुन: प्रचार किया। उन्होंने चांद्र-व्याकरण नाम से एक अपने व्याकरण की भी रचना की।

इसकी महत्ता शायद इसलिए भी थी क्योंकि नागार्जुन द्वारा प्रसारित बौद्ध धर्म भारत में दिग्विजय कर रहा था। बोधिसत्वों ने शास्त्रार्थ में कई पंडितों को हराया और नीलमतपुराण के तर्कों को छिन्न कर दिया। लेकिन जब इस कारण बलि-प्रथा और अन्य कर्मकांड बंद होने शुरू हुए तो कश्मीर के नाग क्रुद्धित हो गए। उन्होंने बर्फबारी शुरू कर दी और कई लोग मरने लगे। पर इसमें मुख्यत: बौद्धों का ही नाश हुआ। बलिदान और होम करने वाले ब्राह्मण बच गए, बौद्ध मरते गए। ऐसी विकट परिस्थिति में राजा अभिमन्यु शीत काल के छह महीने दर्वाभिसार प्रांत में रहने लगे। बर्फबारी की वजह से श्रीनगर में रहना असंभव था।

नागों को प्रसन्न करने के लिए एक काश्यप-गोत्री ब्राह्मण चंद्रदेव ने तप प्रारंभ किया। जब रक्षक-नील नामक नाग आखिर खुश होकर प्रकट हुए तो बर्फबारी रूक गयी और उन्होंने नीलमत पुराण से पूजा करने के लिए कहा। इससे पहले विद्वान चंद्रदेव ने यक्षों के उपद्रव से मुक्ति दी थी। अब इस दूसरे विद्वान चंद्रदेव ने बौद्ध-भिक्षुओं से मुक्ति दिलाई।

अगले राजा बने- तृतीय गोनंद। उनके आने के बाद पुराने कर्म-कांड फिर से शुरू हो गए। नागपूजन, नाग-यज्ञ, नाग-यात्रा, सभी त्यौहार फिर से शुरू हो गए। बौद्ध प्रभाव से यह सब बंद हो गए थे। जब नीलमत-पुराण से पूजा शुरू हुई, तो बर्फबारी भी बंद हो गयी, और बौद्ध समस्या भी खत्म हुई।

कल्हण कहते हैं, “जो राजा प्रजा को कष्ट देते हैं, वो परिवार सहित नष्ट हो जाते हैं। और जो बिगड़े हुए देश में सुख-शांति की स्थापना करते हैं, उनकी कई पीढ़ी तक स्थिरता रहती है।”

शासनकाल (गोनंद तृतीय से युधिष्ठिर तक. सभी नाम उपलब्ध नहीं)

गोनंद तृतीय – 35 वर्ष
विभीषन – 53.5 वर्ष
इंद्रजीत – 35 वर्ष
रावण – 37 वर्ष
विभीषण द्वितीय – 35.5 वर्ष
किन्नर – 39 वर्ष 9 महीने
सिद्ध – 60 वर्ष
उत्पलाक्ष – 30.5 वर्ष
हिरण्याक्ष – 37 वर्ष 7 महीने
हिण्यकुल – 60 वर्ष
वसुकुल – 60 वर्ष
मिहिरकुल– 70 वर्ष
वक – 63 वर्ष 13 दिन
क्षितिनन्द – 30 वर्ष
वसुनन्द – 52 वर्ष 2 महीने
नर – 60 वर्ष
अक्ष– 60 वर्ष
गोपादित्य – 60 वर्ष 6 दिन
गोकर्ण – 57 वर्ष 11 दिन
खिखिलाण्य – 36 वर्ष 3 महीने 10 दिन
युधिष्ठिर

कुल 38 राजाओं का शासनकाल- 1014 वर्ष, 9 दिन

राजा किन्नर जब युद्ध जीत कर आते तो कई किन्नर उनके लिए गीत गाते। इस राजा ने कई अनर्थ किये। इसकी शुरूआत तब हुई जब उसकी एक पत्नी को एक बौद्ध-भिक्षु भगा ले गया। राजा ने गुस्से में आकर सैकड़ों बौद्ध-विहार जला दिए, और उनको दिए हुए गाँव छीन लिए। इस लूट-पाट से जमा किए धन से इस राजा ने वितस्ता नदी के किनारे एक खूबसूरत बागों से सजा एक शहर बसाया। इसी शहर के एक बगीचे में एक बड़ी झील थी। और उस झील में सुश्रुवा नामक एक नाग रहता था।

इसी झील के किनारे एक विशाखा नामक युवा ब्राह्मण बैठ कर सत्तू खा रहा था। जैसे ही वो सत्तू का निवाला लेने ही वाला था कि उसे पायलों की झनक सुनाई दी। जब उसने नजर दौड़ाई तो सामने दो सुंदर नाग-कन्यायें सामने दिख गई। कजरारी आँखें, और कानों में सुंदर झुमके। हवा में लहराते आंचल। उन नाग-कन्यायों को देखते ही उसका मन मचल गया, और वह सत्तू खाते उन्हें निहारता रहा।

तभी उसने देखा कि वो कन्यायें मकई की बालियाँ उखाड़ कर खाने लगी। ब्राह्मण यह देख कर आश्चर्यचकित् हो गया।

“इतनी सुंदर कन्याएँ और यह दरिद्र भोजन?” ब्राह्मण ने कहा, और उन्हें सत्तू खाने को दिया। एक पत्ते का दोना बनाकर पानी भी पिलाया।

खिला-पिला कर वो कमल के पत्तों से उन्हें पंखा झलने लगा, और पूछा,

“आपलोग किस जाति से हैं?”

“हम सुश्रुवा नाग की बेटियाँ है। अगर अच्छा भोजन न मिले तो क्या मकई की बालियाँ नहीं खा सकतीं? मेरा नाम इरावती है, और मेरी शादी विद्याधर चक्रवर्ती से होने वाली है। यह मेरी बहन चित्रलेखा है।” नाग-कन्या ने कहा।

“लेकिन आपलोग इतने गरीब कैसे?”

“यह तो मेरे पिता ही बताएँगे। वो तक्षक नाग की यात्रा में यहाँ आएँगे। उनके माथे से हमेशा जल-धारा बहती रहती है। आप आसानी से पहचान लेंगे। उनके साथ ही हम भी मिलेंगी।”

यह कह कर वो अदृश्य हो गयीं।

कुछ दिनों बाद तमाम नाटक-मंडलियाँ कश्मीर आई और तक्षक नाग-यात्रा प्रारंभ हुई। यहाँ वो विशाखा नामक ब्राह्मण भी सुश्रुवा को ढूँढता पहुँच गया। जब नागराज को उनकी बेटियों ने उस ब्राह्मण से परिचय कराया तो वो भी प्रसन्न हो गए।

“मुझे आपकी बेटियों ने आपकी गरीबी के बारे में बताया।”

“हाँ! यह बातें मैं किसी से कहता नहीं, पर आपको पता लग गया तो कह देता हूँ। हमारी समस्या का कारण वो सामने बैठा साधु है। वो जब तक इन खेतों से नई फसल नहीं खाता, नियमानुसार हम भी नहीं खा सकते। और यह साधु खाता ही नहीं। आप कुछ जुगाड़ लगा कर इसको नई फसल खिला दें तो बड़ी कृपा होगी।”

बस फिर क्या था। उस ब्राह्मण ने चुपके से उस साधु के बर्तन में नया अन्न डाल दिया, और उसकी तपस्या भंग हुई। नागराज खुश होकर ब्राह्मण को अपने घर ले गए, जहाँ उन कन्याओं ने उसकी खूब सेवा की। आखिर ब्राह्मण ने चित्रलेखा का हाथ मांग लिया। नागराज ने अपनी बेटी और खूब सारा धन देकर उसे विदा किया। ब्राह्मण भी वापस शहर लौट कर खूब धनी-सुखी रहने लगा। चित्रलेखा भी उसे खुश रखती थी।

एक दिन चित्रलेखा ने बाहर धान सूखने रखा था, तो एक घोड़ा आकर उसे खाने लगा। आस-पास नौकर नहीं थे तो वो स्वयं ही घोड़ा भगाने के लिए दौड़ी आई। वो अपने आंचल सँभालते घोड़े की पीठ पर हाथों से मार कर भगाने लगी। उसके सुनहरे हाथ के छाप घोड़े की पीठ पर अंकित हो गए।

राजा किन्नर ने पहले भी चंद्रलेखा की खूबसूरती की चर्चा सुनी थी। जब घोड़े की पीठ पर उसके हाथ के निशान दिखे, वो पागल ही हो गया। वो चंद्रलेखा के घर जाकर उसे सताने लगा, पर वो नहीं मानी। आखिर उसने उसके पति विशाखा से ही उसकी पत्नी का हाथ माँग लिया। वो नाराज हो गया, तो राजा ने बलात्कार की कोशिश की। इससे भागकर ब्राह्मण दंपति नागराज के पास पहुँचे। गुस्से में नागराज ने पूरे शहर को तहस-नहस कर दिया। हजारों लोग मारे गए। पूरी वितस्ता नदी खून के रंग की हो गयी।

नागराज की बहन रमण्या भी अपने भाई की सहायता के लिए पत्थर गिराती आई। इसकी वजह से लगभग चालीस कि.मी. (पांच योजन) तक की जमीन में पत्थर ही पत्थर बिखर गए। यह स्थान ‘रमण्याटवी’ कहलाता है।

नागराज स्वयं अपने स्थान को छोड़ कर एक सुंदर पर्वत पर चले गए। वहीं एक बड़ी झील बनाई (जो अमरनाथ के रास्ते में आज भी चक्रधर मंदिर के पास नजर आता है)। उनके जमाई भी ससुर की कृपा से नाग बन गए और वहीं पास में जामातुर सरोवर में रहने लगे।

(क्या किन्नर राजा के एक स्त्री के मोह के कारण पूरा शहर नष्ट हो जाना ठीक था? यह प्रश्न अब निराधार है। पर कल्हण के अनुसार एक ब्राह्मण से अन्याय का फल प्रलय ही है।) जब कश्मीर ध्वस्त हो रहा था, तब किस्मत से एक राजकुमार विजयेश्वर तीर्थयात्रा पर थे। राजकुमार सिद्ध ही अगले राजा बने और उन्होंने अपने पिता की गलती से सीख ली। वो शांतचित्त और शिव-भक्त राजा थे।

उस राजा ने अपने पुण्य से अपने पिता के पाप का प्रायश्चित तो किया ही, उसके शासनकाल में धर्म की विजय हुई। उसकी मृत्यु के बाद सभी देवताओं ने उसका स्वागत किया और स्वर्गलोक में सात दिन तक उत्सव हुआ।

राजा मिहिरकुल एक दुष्ट राजा था। उसके शासनकाल में म्लेच्छों का वर्चस्व होता गया, और उत्तर भारत अपने भयंकर काल में था। वो और उसके सैनिक नरभक्षी थे, जो शत्रुओं को मार कर उनका मांस खाते थे। जब उसकी सेना आती थी तो कौवे और गिद्ध मंडराने लगते थे। यहाँ तक कि उसके अंत:पुर में भी नरभक्षण चलता रहता था। वो राजा दिखता भी बेताल सा भयानक था। राजा बालकों के प्रति निर्दयी, स्त्रियों के लिए घृणा रखने वाला और वृद्धों का निरादर करने वाला था।

एक दिन उसने अपनी पत्नी को सिंहल प्रदेश (श्रीलंका) के सोने से सज्जित चोली पहने देखा तो क्रुद्ध हो गया। उसने जाँच की तो यह पक्का हो गया कि यह सोना सिंहल प्रदेश का ही है। क्रोध में उसने सिंहल पर आक्रमण की योजना बनाई। पागल हाथियों से भरी उसकी सेना ने सिंहल-नरेश पर आक्रमण कर उन्हें हरा दिया। वहाँ के राक्षस भी भयभीत हो गए जैसे रामचंद्र ने फिर से लंका पर आक्रमण कर दिया हो। वहाँ दूसरे राजा को बिठा कर वो सूर्य के चित्र वाला झंडा उठा कर ले आया।

सिंहल से लौटते वक्त उसने चोल राजा, कर्नाट राजा और लाट राजा को भी परास्त किया। वहाँ के सभी नगर और महल ध्वस्त करता वो कश्मीर लौटा। जब वो कश्मीर के द्वार पर पहुँचा तो एक हाथी पहाड़ से नीचे गिर गया। उस हाथी की चीत्कार से राजा इतना खुश हुआ कि उसने एक-एक कर सौ हाथी पहाड़ से गिरवा दिए, और उनकी चीख सुन ठहाके मारता रहा। कल्हण लिखते हैं कि उसके कई कुकर्म तो इतने घृणित थे कि वर्णित भी नहीं किए जा सकते।

लोग कहते हैं कि राजा मिहिरकुल इतना दुर्दांत बना, इसके पीछे कारण कुछ और था। एक भूरिश्रवा नामक नाग ने नगर तहस-नहस कर दिया था। उस वक्त खश जाति के लोगों ने नगर पर कब्जा कर लिया। उनका खात्मा करते-करते ही यह राजा नरसंहार में लुत्फ़ लेने लगा।

एक और कथा है कि चंद्रकुल्या नदी के प्रवाह को मोड़ने के लिए कार्य चल रहा था, लेकिन बीच में एक बड़ा पत्थर हिलाना असंभव सा था। राजा को स्वप्न आया कि उस पत्थर पर कोई यक्ष बैठा है। कोई पतिव्रता स्त्री अगर पत्थर को छूए तो पत्थर हिल जाएगा। कई स्त्रियों ने उसे छूआ, पर वो टस से मस न हुआ। आखिर एक कुम्हार की पत्नी चंद्रवती ने पत्थर छूआ तो वो चल पड़ा। पर कुम्हार की ऐसी जुर्रत देख कर राजा क्रोधित हो गया। उसने उसके परिवार को तो मार ही दिया, तीन करोड़ स्त्रियों को मरवा डाला।

हालांकि उस राजा ने कुछ पुण्य भी किए। श्रीनगर में मिहिरेश्वर की स्थापना की। होलाड क्षेत्र में मिहिरपुर शहर बसाया। गांधार के ब्राह्मणों को उसने एक हज़ार गांव बाँटे। यह दान उसने जयेश्वर तीर्थ में किया।

आखिर उस दुष्ट राजा की एक गंभीर बीमारी से मृत्यु हुई और धरती को चैन मिला। कल्हण के अनुसार उसने तमाम शस्त्रों को गरम कर उसके ऊपर अपना शरीर रख खुद को भस्म कर लिया। यह उसकी पाप-मुक्ति का मार्ग था।

राजा मिहिरकुल का पुत्र वक जब राजा बना तो प्रजा डर गई कि यह अपने पिता सा दुष्ट न हो। पर वो अपने पिता का ठीक विपरीत और धर्म-कर्म वाला राजा था। इस राजा ने वकश्वभ्र में वकेश्वर मंदिर बनाया। उसने वकवती नदी की धारा निकाल कर उसके किनारे लवणोत्स नगर बसाया।

राजा वक को एक योगिनी ने अपने रूप से मोह लिया, और तंत्र-मंत्र से उसे और उसके परिवार की बलि चढ़ा दी। इस बलि से उस योगिनी को आकाश-गमन की प्राप्ति हुई। खेरी मठ का शतकपालेश्वर मंदिर, मातृचक्र, और वो पत्थर जिस पर योगिनी के निशान हैं, वो इतिहास में इस घटना के साक्षी रहे।

हालांकि राजा वक का एक पुत्र क्षितिनन्द बच गया था, और वही अगला राजा बना।

मलीन वीर-गाथा

जब भारत-पाक विभाजन हुआ तो अक्सर हिंदू इधर भागे, मुस्लिम उधर। पर हिंदुओं का एक वर्ग पाकिस्तान से हिला ही नहीं। आज भी पाकिस्तानी हिंदुओं का एक बड़ा हिस्सा बाल्मिकी समाज है। ये वो समाज है, जो इधर रहें या उधर, काम मल ढोने का ही करता। शायद उन्हें ये लगा हो कि पाकिस्तान छोटा है, कितना मल निकालेंगें? ऊपर से रमजान के महीने में तो भोजन भी कम, मल भी कम। हिंदुस्तान के दस प्रतिशत से ज्यादा मल तो न निकालेंगें। ऊपर से कई झेलम, चिनाब, रावी, सतलज किनारे बैठ जाएँगें। उधर तो एक गंगा है, पर वो पवित्र है। दिन दहाड़े कोई गंगा किनारे शौच नहीं कर सकता। बची यमुना, वो तो चिंदी सी है।

पाकिस्तान में भोजन भी गरिष्ठ है, मसालेदार है। कब्जियत होगी। वहाँ तो सुबह कान पर जनेऊ रख शौच करने वालों की फौज है। हर कोई घर में ब्लड-प्रेशर की दवा रखे न रखे, कायम-चूर्ण टाइप पाचन की गोली जरूर रखता है। कोई अखबार पढ़ पेट हल्का करता है, कोई बादाम दूध पीकर। जब तक खाने के बराबर निकाल न दें, उन्हें चैन नहीं आता।

शौच जीवन का उद्देश्य है, जीजीविषा का मुख्य साधन है। उत्तम शौच से ही मोक्ष की प्राप्ति होगी। असंतुष्ट शौच से तो मृत्यु बेहतर। भगवन् भी तीन वरदान माँगे, तो प्रथम इच्छा कब्जियत मुक्त जीवन की होगी। सात्विक भोजन का अर्थ मन की शांति नहीं, मलद्वार की शांति है। मलद्वार से ही पंचतत्व का उद्गार होता है। क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा। मल ही सृष्टि में अजर-अमर है, यथार्थ है। बाकी सब क्षणभंगुर है, माया है।

किंतु, मल को छूने का अधिकार, इसे ढोने का अधिकार, ये हर मानव को नहीं। कठिन तप करना होता है। गाँधीजी जैसे तपस्वियों और निर्मोहियों को ये सौभाग्य मिला। योगी जो अनवरत प्राणायाम कर सकते हैं, साँस रोक कर हवा में उड़ सकते हैं। ये हम-आप नहीं कर सकते। दो मिनट मल की दुर्गंध सहने की क्षमता नहीं। डॉक्टर भी जब मल-मूत्र की जाँच लिखता है, हाथ-पाँव फूल जाते हैं। नर्स छोटा कटोरा पकड़ाती है, आप शौचालय से खाली हाथ वापस आते हैं। एक पराजित सेनापति की तरह। शर्म से सर झुकाए। चाहो तो सर कलम कर दो, पर ये पौरूष, ये वीरता मुझमें नहीं। कुछ मूत्र लाने में सफल हो भी जाएँ, मल में घुटने टेक देते हैं। जो कर पाया, उसकी वीर गाथाएँ सुनाई जाती है। फलाँ अस्पताल में मल के सैंपल दही की छाँछ में भरकर ले गया था, फलाँ माचिस की डिब्बी में। एक परमवीर चक्र का पात्र, एक वीर चक्र का।

खैर, जब विभाजन के बाद ये समस्या आई कि कोई मल ढोने वाला न मिले, तो आपातकालीन बैठक बिठाई गई। मल की चर्चा हो रही है, तो बैठक का विकृत अर्थ न सोचें। ये गणमान्यों की कैबिनट बैठक थी, जो भारतीय संसद के ‘ग्रीन रूम’ में संचालित हुई।

“प्रधानमंत्री महोदय! वाइसरॉय साहब से कहकर पाकिस्तान में रह गए हिंदुओं को भारत बुलवाया जाए।”

“हाँ! लेकिन ये कार्य कठिन है। वो मिलिट्री दे देंगें, पर बाल्मिकियों को वापस नहीं करेंगें।”

“ये तो लॉटरी लग गई उनकी। ये कैसा विभाजन है, कि हमें बस खोटे सिक्के मिले?”

“सुना है वो भी आना नहीं चाहते।”

“तो हल क्या है?”

“हल ये है कि हम एक विश्व-स्तरीय संस्थान बनाएँगें। इस विधा में दक्षता पाएँगें। आज ही मलद्वार रिसर्च संस्थान की नींव रखी जाए। पंजाब और पूर्वांचल के प्रसिद्ध मलबुद्धियों को आचार्य बनाया जाए।”

“पर छात्र कौन होंगें? ये तो जातीय कला है, हम-आप नहीं कर सकते। गाँधीजी जब सिखाते थे, भागे फिरते थे, याद नहीं?”

“छात्रवृत्ति घोषित की जाए। डीग्री दी जाए। डॉक्टॉरेट दी जाए।”

“जैसी आपकी इच्छा। मेरे विचार से यमुना पार की जमीन ठीक रहेगी। दुर्गंध उधर ही लुप्त हो जाएगी। दिल्ली पर रहम करें हजूर।”

“आप यमुना पार बनाएँ या दक्कन ले जाएँ, पर शोध संस्थान के उद्घाटन के लिये पश्चिमी कमोड बनवाएँ। हम सब विलायती हो गए हैं, अब ऊकड़ूँ नहीं बैठा जाता।”

“मैनें इसका हल सोच रखा है। हम बस रिबन काट कर वापस आ जाएँगें। भला प्रधानमंत्री वगैरा भी शौच करते हैं क्या?”

यमुना पार गाजीपुर नामक इलाके में ‘मलमूत्र प्रबंधन संस्थान’ की स्थापना हुई। छात्रवृत्ति के चक्कर में हजारों छात्रों ने नामांकन कराया, पर महीने भर में सब नाक दबाकर भागे। कुछ निमोनिया से पीड़ीत हुए, कुछ अमोनिया से। कई पागल हो गए, बहकी-बहकी बातें करते। दिमाग मलित हो गया था, गोबरमय। बस वो छात्र रह गए, जिनमें संस्कार थे, खानदानी कौशल था। या जिन्हें पता था, उनका मुकाम यही है। संस्थान के अंदर भी, संस्थान से बाहर भी। यहाँ कम से कम डीग्री नसीब होगी। सम्मान मिलेगा।

धीरे-धीरे देश में फौज तैयार हो गई। मेहतरों की बेहतरी हुई। नाम भी बदल कर ‘मैनुअल स्कैवेन्जर’ किया गया। अब लगता कि किसी मिशन पर निकले हैं।

देश भी बदल रहा था। सड़कों की नीचे सुरंगें बन रही थी, जहाँ सर पर खदान-मजदूरों की तरह लाइट लगाकर मल इकट्ठा करना होता। कॉन्ट्रैक्ट मिलते। घंटे-घंटे का मोल था। गोताखोरों की तरह एक मैन-होल में छलांग मारो, और मलिन-विकृत दूसरे मैन-होल से अवतरित हो। नौसिखिए तो भटक कर रह जाएँ। पत्नियाँ राज-तिलक कर विदा करती। जंग जीत कर वापस आने वालों को सम्मानित किया जाता। शहीदों को फूल-मालाएँ चढ़ाई जाती।

पर धीरे-धीरे ये उद्योग क्षीण पड़ने लगा। सेफ्टी-टैंक और सुलभ क्रांति ने इन वीरों का जीवन तहस-नहस कर दिया। बटन दबाओ और सब छू-मंतर। एक-एक कर ये मलवीर फ्लश होते चले गए। संस्थान भी बंद कर दिया गया। अब डीग्री हो या डॉक्टॉरेट, शौचालय के बाहरे सिक्के जोड़ो। वीरता और कौशल का कोई मोल ही नहीं। जैसे फाइटर पाइलट को एयरलाइन की बिलिंग में बिठा दिया हो।

कुछ निराश होकर गाँव वापस चले गए, जहाँ आज भी उनके कला की कद्र है। कुछ अमोनिया फ्लेवर का इत्र लिए घूमते हैं। कुछ यूँ ही यमुना में गोते लगाकर मलिन होने का आनंद लेते हैं। कुछ संस्थान की पुरानी इमारत को ढूँढते हैं, जहाँ अब कचड़े का पहाड़ बन गया है। गाजीपुर के कचड़े के ढेर से कौए भगाते हैं। अपना स्वर्णिम इतिहास याद करते हैं।

दिल्ली के वसंत विहार में खाए-पीए अघाओं ने शौच किया, और एक मलवीर मैनहोल में मर गये।

(आँकड़ों के अनुसार आज भी देश में लगभग १.५ लाख लोग ‘मैनुअल स्कैवेन्जर’ हैं।)

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टोंटी पंचायत

महारानी तलाब पर आज पंचैती बैठी है। ये कोई नयी बात नहीं, हर साल बैठती है। इस पंचैती में पूरा गाँव आता है। कुछ जो दिल्ली-कलकत्ता चले जाए, पंचैती देखने छुट्टी लेकर आते हैं। पिछले कुछ बरख से पंचैती के दिन तलाब किनारे मेला भी लगने लगा है। कचौड़ियाँ छनती है, कंगन बिकते हैं, लमनचूस की रेड़ी और डिस्को वाला म्यूजिक। पंचैत न हुआ, कोई त्यौहार हो गया।

कईयों को ये भी नहीं पता कि पंचैत बैठी किसलिए, पर उन्हें ये जरूर पता है कि कन्नू ठाकुर और तम्मू ठाकुर आज फिर एक दूजे का गला दबाएँगें। कन्नू और तम्मू के लोग एक दूजे की धोती खींचेंगे और चड्डी में दौड़ाएँगें। कीचड़ में द्वंद होगा, गाली-गलौज होगा। बच्चे सीटी बजाएँगे, और बूढ़े फोकट में ज्ञान बाँटेंगें। सरपंच जी मचान पर चढ़ जायेंगें, और छेद वाली बाल्टी से ऐसे चिल्लायेंगें जैसे नेहरू जी स्टाइल भाषण दे रहे हों। मोर भी होगा, कौआ भी होगा, बंदर भी होगा, खाऊँ खाऊँ!

महारानी तलाब इलाके का सबसे बड़ा तालाब है। न पूरब, न पच्छिम। कहीं इतना बड़ा तलाब नहीं। उत्तर में गंगू तलाब है पर वो भी कोई तलाब है? एक महार पर सब शौच करते हैं, दूसरे महार पर पंडित मंतर पढ़कर लूटता है। मल-मूत्र से तर्पण कराता है। छी! महारानी तलाब भले ही छोटा है पर गाँव वालों की शान है। अंजुरि (अंजलि) भर पानी पी लो, तृप्त हो जाओ। अब कोई रात में छुपकर मूत ले, और बात है। दिन दहाड़े कोई शौच करे, ठाकुर लट्ठ ले दौड़ा दें। इस मौके पर कन्नू-तम्मू एक हो जाते हैं। एक ही भाषा बोलते हैं। नहीं तो कन्नू बोले ईर घाट, तम्मू बोले बीर घाट। किसी बात पर नहीं बनती।

गाँव के बुजुर्गों को भी ठीक-ठीक याद नहीं, ये रंजिश कब शुरू हुई। दादा-परदादा के भी पहले की कहानी है। कन्नू-तम्मू के लकड़दादों के जमाने की। अंग्रेजों के जमाने की। या शायद मुगलों के जमाने की।

किंवदंती है कि कई बरख पहले महारानी तलाब का बँटवारा हुआ। तालपत्र पर रेखाएँ खींची गई। कुछ कहते हैं वराह मिहिर ने कॉन्ट्रैक्ट लिया था, कुछ कहते हैं टोडरमल के रंगरूटों नें। कोई कहता है घूस-घास का चक्कर था, कोई कहता है गंगू तलाब वालों नें सस्ती मदिरा पिला दी थी। पूर्वी महार गोल थी, वो सीधी खींच थी। पच्छिमी महार खामख्वाह गोल कर दी। ऐसा विभाजन कर गए, ठाकुरों के मत्थे कुछ न पड़ा। एक बार तालपत्र देखते, एक बार तालाब, और सर पीट लेते। दोनों राजा साहेब के पास गए। राजा साहब का अमीन भँगेड़ी। तालपत्र पर भाँग का गोला डाल रोली करने लगा। रेखायें और आरी-तिरछी हो गई। खैर बँटवारा हुआ, तालाब का एक हिस्सा कन्नू के पूर्वजों का और दूजा तम्मू के।

तालाब तो साक्षात् क्षीरसागर थी। पर तम्मू के पूर्वजों के हाथ क्षीर भी ज्यादा और सागर भी। सब खा-पीकर मोटे होते गए। उधर कन्नू का खानदान कुपोषित।

कुपोषण में बुद्धि भी क्षीण हो जाती है। तम्मू के पूर्वज ताम्रपत्र के तगमे बटोरते गए, महारानी तालाब के पानी से खेत पर खेत सींचते गए। उधर हरियाली, इधर सुखाड़। उधर रंगरेलियाँ, इधर उधार।

राजा-महाराजा चले गए तो सियायतबाज आए। कुछ वाचाल, कुछ चंडाल, कुछ गुरूघंटाल।

कूटनीति का मंत्र है कमजोर के कान भरो, और शक्तिशाली के कान खींचो। पहले कानों को ‘ईयरमार्क’ किया गया। कमजोरों को पहचाना गया। कन्नू-तम्मू से बढ़िया प्रयोग के लिए कोई मॉडल न था। शुरूआत उन्हीं से हुई। तम्मू के कान खींचने की रणनीति बनी। कन्नू के कान भरे गए।

“कन्नू! ये बँटवारा ही गलत है। तालाब का सारा जल तो तम्मू ले जाता है और तुम्हें भनक तक नहीं होती।”

“क्या कहते हो? पुश्तैनी बँटवारा है। वो देखो तालाब के बींच खूँटा गड़ा है। पच्छिम से मेरा, पूरब से उनका।”

“भई, खूँटा ही तो गलत गड़ा है।”

“मुझे तो बीचों-बीच नजर आ रहा है।”
“हाँ, पर उधर से महार गोल है। तुम नापी करवा लो।”

“अरे जाओ! राजा साहब के जमाने का खूँटा है। पत्थर की लकीर है।”

कन्नू ने उनको देहरी से भगाया और हुक्का खींचने लग गए। पता नहीं क्यूँ, आज खूँटे पर संदेह वाकई हो रहा था। कहीं तम्मू ने खूँटा खिसका तो नहीं ली? भला उसके खेत लहलहा क्यूँ रहे हैं और हमारे सूखे पड़े हैं? और महार तो वाकई गोल है। भला नापी कराने में हर्ज क्या? इतने बरख में कितने तूफान आए, खूँटा न हिला होगा? दादा साहब के जमाने में भी सुना है खूँटे पर सवाल उठे थे। और कागज-पत्तर भी पुराने हुए। पक्की नापी करवा के नये कागज बनवाऊँगा तहसीलदार से। फिर मेरे खेत भी लहलहायेंगें। शम्भू साव का सारा कर्जा निपट जाएगा।

अगले ही दिन अमीन को खबर दी, और तलाब की नापी शुरू हुई। चाहे पूरब-पच्छिम नापो, या उत्तर-दक्खिन। खूँटा हर तरफ से गलत। कन्नू सर पकड़ कर बैठ गए। तम्मू तमतमा गए। गाली-गलौज हुई। हाथापाई शुरू हुई। कन्नू कमजोर था, पर गजब की फुर्ती थी। झट से तम्मू की गर्दन पर लटक गया और चूल खींच कर गिरा दिया। तम्मू जब तक सँभलता, कन्नू छाती पर बैठ मेढकों की तरह उछलने लगा। राहगीर तमाशबीन बन गए।

ये एक ऐतिहासिक मल्लयुद्ध की शुरूआत थी, जिसे सियासती चौकड़ीबाजों ने ‘महारानी तलाब जल-विवाद’ का नाम दे डाला।

पंचायत बिठाई गई। अमीन की गवाही हुई। खूँटा ठीक से गाड़ने का फैसला हुआ। मछुआरे भेजे गये। सब बाप-बाप करते वापस आये। खूँटे की जड़ में साँपों का बसेरा।

“खानदानी खूँटा है ये। विरासत है हमारी। साँपों की रस्सी बनाकर देवासुर संग्राम करोगे तभी हिलेगा।” तम्मू ने जुमला फेंका।

पंचायत खलबला गयी। कन्नू-तम्मू को अपने हाल पर छोड़ भाग गई। कन्नू ने भी घुटने टेक दिये।

पर सियासतगर्द कहाँ रूकने वाले थे।

“देश चाँद पर पहुँच गया, और तुम इन अंधविश्वासों में अटके पड़े हो कन्नू?”

“तो क्या करूँ? पंचायत के मछुआरे भी फेल हो गए। मुझसे न हिलेगा वो खूँटा!”

“तो खूँटा हिलाने कह कौन रहा है? पानी बाँध दो।”

“क्या मजाक कर रहे हो? भला पानी भी बाँध सका है कोई?”

“अपने गाँव का ही तो है वीशू, विलायत से पढ़कर आया है। डैम बनाता है डैम! जहाँ मरजी, वहीं पानी बाँध दे।”

“भाई, मेरी समझ कुछ नहीं आ रहा। जो मरजी करना है कर लो।”

बड़ा शातिर इंजीनियर था वीशू। चेहरे से तेज चमकता था, गंगू तलाब के पंडित से भी ज्यादा। पैनी नजर और शुतुरमुर्ग सी चाल। महीने भर में तालाब के तल को टेढ़ा कर डाला और तालाब के पानी को कन्नू की ओर मोड़ कर डैम की टोंटी कस दी। अब कन्नू जितनी टोंटी खोले, तम्मू को उतनी पानी नसीब हो। टोंटी बंद तो पानी बंद।

तम्मू के खेत सूखने लगे, कम्मू के लहलहाने लगे। वीशु की विलायती टोंटी ने तो प्रकृति बदल कर रख दी। देवासुर-संग्राम में तकनीकी टोंटी लगाकर भाग गया। फलाँ बटन दबाओ तो अमृत और फलाँ दबाओ तो विष। और सारे बटन कन्नू के पास।

तम्मू ठहरा गँवार, और छुटभैये नेताओं की राजनीति का मारा। त्राहि-माम करता पंचायत भागा। सारी अकड़ स्वाहा हो गयी।

“हजूर! कन्नू से कहें, मुझे कम से कम हक की बराबर पानी छोड़े।”

“हाँ भई कन्नू! बात तो गलत नहीं है। तुम उतनी टोंटी खोल दिया करो।”

“पहले पुरखों की बेईमानी का हिसाब तो चुकता हो।” कन्नू अकड़ कर बोला।

“वो सब पुरानी बाते हैं, और ठहरे तो भाई-भाई ही।”

“ठीक है। तुम भी क्या याद रखोगे तम्मू! जा खोल दी टोंटी आज। लहलहा ले अपने खेत!”

कन्नू-तम्मू गले मिले और पंचायत खत्म हुई।

कुछ दिन सब ठीक चला, पर फिर ये टोंटा-टोंटी चालू हो गयी। कभी तम्मू का बेटा कन्नू के बेटे से स्कूल में भिड़ जाए तो दो दिन टोंटी बंद। कभी जनाना झगड़ा तो टोंटी बंद। आज संडे तो टोंटी बंद। कल रामनवमी तो टोंटी बंद।

हर साल पंचायत बैठती, और दोनों मल्ल-युद्ध करते। गाँव वालों का मनोरंजन करते।

तमाशबीन बढ़ते गए। टोंटी पर सियासत बढ़ती गई। टोंटी को सरकारी टोंटी घोषित कर दी गई। बड़े-बड़े नेता आते हैं, टोंटी के साथ सेल्फी खिंचवाते हैं। कन्नू और तम्मू मूक दर्शक हैं। कठपुतलियाँ हैं। जब मर्जी टोंटी दायें-बायें घुमा लड़वा दिया। टोंटी न हुआ विडियो-गेम का ‘जॉय-स्टीक’ हो गया।

“कहाँ है ये महारानी तलाब?” एक परदेशी राहगीर ने पूछा।

“यहाँ से दक्खिन नाक की सीध में।”

कन्नू-तम्मू की लड़ाई में महारानी तलाब भी गजब पॉपुलर हो रही है।

(कावेरी जल विवाद लगभग २५० सालों से चल रहा दो राज्यों के मध्य एक अनवरत मतभेद है)

किंडल पर अनूदित किताबें कैसे/क्यों डालें?

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(लेखक को अनुवाद प्रकाशन का कोई अनुभव नहीं। यह बस उपलब्ध ज्ञान से लिखा गया है)

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