ई-बुक

किताब से अर्थ तब तक जुड़ा है, जब तक कॉपीराइट, छपाई, वितरण और रॉयल्टी इत्यादि जुड़ी है। और वो ठीक भी है। पर औसतन पांच सौ पृष्ठ की कथेतर (इतिहास इत्यादि) की कीमत सात-आठ सौ रूपए पड़ जाती है। गर कई लेखकों ने लिखा तो हज़ार से अधिक भी। मैं पहले एक-दो किताब ऑर्डर करता, वो लंदन वगैरा से घूमती हफ्ते भर में आती, गर लोकप्रिय न रही हो। अब वही किताबें ‘ई-बुक’ या ‘डिज़िटल पुस्तकालय’ की सदस्यता से लगभग आधे से दहाई दाम पर मिल जाने लगी। यानी उसी खर्च पर एक के बदले दस किताबें।

इसमें गणित सीधा है। छपाई और वितरण काफी हद तक बायपास हो गया, तो दाम घट गया। मेरे लिए सुविधा यह है कि जब भी फलां किताब से फलां संदर्भ उठाना हुआ, एक सर्च बटन से पन्ना खुल गया गर वो मेरी डिज़िटल लाइब्रेरी में है। चाहे मैं कहीं भी बैठा हूँ।

किताब की सुगंध वाला तर्क ठीक है। पर वो सुगंध अगर किसी इत्र के डब्बे में डाल साथ रख ली जाए? पन्ने की खरखराहट के लिए अब ऐप्प में ‘फ्लिप’ करते वक्त ‘क्लक’ आवाज़ निकलने लगी है। आंखों की हानि पर खास नहीं कहूँगा। वो फॉन्ट और रोशनी पर निर्भर करता है। यह पोस्ट मैं जिस माध्यम से लिख रहा हूँ, उसको पढ़ने वाले लोग पहले से इस नशे में लिप्त हैं। वो काग़ज से अधिक हाथ में एक यंत्र लिए चलते हैं, जिसे बोल-चाल की भाषा में मोबाइल कहते हैं। गर बीच-बीच में दो-चार पन्ने पलटते रहें, तो किताबें पढ़ी जाती रहेगी।

……

‘अमेज़न अनलिमिटेड’ खास उपयोगी नहीं, बशर्तें कि अश्लील या प्रेरणादायक ‘मोटापा कैसे कम करें’ इत्यादि पढ़नी हो। कुछ ढंग की किताबें नहीं है। ‘अमेज़न प्राईम’ बेहतर होगी क्योंकि डिलिवरी मुफ्त हो जाती है।

Notnul में कुछ दुर्लभ और ऊँची गुणवत्ता की पत्रिकाएँ और कथेतर किताबें मिली। मुझे अच्छी लगी। और आशाएँ हैं।

Juggernaut में सबसे अधिक हिंदी की मुफ्त किताबें नजर आती हैं। मंटो, मन्नू भंडारी, प्रेमचंद, शरतचंद्र, ब्रजेश्वर मदान, जयशंकर प्रसाद..कई लोगों की किताबें।

Kindle (मोबाइल ऐप्प) में अचानक राजकमल और हिंद-युग्म ने कई किताबें डालनी शुरू की है। बाकियों ने भी डाली हो, पता नहीं। पर फॉन्ट मनचाहा चुनो, किताबें सस्ती, और डिलिवरी सेकंड से भी कम समय में।

Storytel ऐप्प पर अठारह घंटे की ‘राग दरबारी’ का ऑडियो डालने के लिए राजकमल को साधुवाद। मेरे विचार से राजकमल की सौ किताबें ऑडियो पर आ गई। मैं ऑडियो कभी सुनता नहीं, पर ‘काशी का अस्सी’ शायद सुन लूँ।

‘गद्य-कोश’ और ‘कविता-कोश’ में तो लगभग सभी हैं। पर फॉन्ट छोटी नजर आती है, जिसे बदलते रहना पड़ता है। पर जो मुफ्त में सब पढ़ जाना चाहते हैं, उनके लिए बढ़िया है।

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कोई भी ई-बुक प्रकाशक लेखक को औसतन 40-60 प्रतिशत रॉयल्टी देते हैं। यह श्रम का मार्क्सवादी विभाजन है, जो श्रम के अनुरूप मिलता है। मसलन ई-बुक में प्रकाशक सिवाय कुछ सॉफ्टवेयर कार्य के अतिरिक्त कुछ खास नहीं करते। किताब ऑनलाईन ही वितरित होती है, तो दौड़-भाग और स्टॉल वितरण नहीं है।

लेकिन, इसमें एक बड़ी समस्या है, संपादन का न होना। गर किताबें संपादित हों, तो लेखक का प्रतिशत घटता है। और यह होना भी चाहिए। भारतीय ई-बुक प्रकाशक संपादन या मार्केटिंग पर कम ध्यान देते रहे हैं, सिवाय ‘जगरनॉट’ सरीखों के। जाहिर है, वहाँ रॉयल्टी घट कर 10-20 प्रतिशत तक आ जाएगी, जो प्रिंट के बराबर है। पश्चिमी संपादक यह पहले से करते आ रहे हैं। मेडिकल की तमाम मोटी किताबें चित्र-सहित और ‘इंटरैक्टिव’ रूप में पहले से ‘ई-बुक’ रूप में प्रचलित रही हैं। बल्कि, वो खुद ही अपडेट भी होती रहती है।

यह बात ध्यान देने योग्य है कि ‘ई-बुक’ लेखक या प्रकाशक कभी भी ‘अपडेट’ कर सकते हैं। यह नहीं कि महज कुछ सुधारों के लिए नया संस्करण महीनों चक्कर काट रहा है। आपने किताब खरीदी, आपके पास हमेशा ‘अपडेटेड’ किताब रहेगी। यह सब कोई नयी बात नहीं। यह लगभग एक दशक से चल रहा है। पूरी की पूरी पुस्तकालय ही डिज़िटल कर दी गयी, भारत में भी। जो पीछे रह गए, वो काग़जी किताब बिक्री में भी पीछे ही हैं।

2 thoughts on “ई-बुक

  1. Fair points. I made that switch and I’m not regretting. Convenient and cost effective. I also download to get more books. You may say it’s piracy but it beats the fact that I get for free 😉

    1. I use ‘kindle’ app to read pdf too. Its more reader-friendly. And piracy is no more a term of past, when most of the books are anyway being archived at archive.org or other world libraries.

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