What exactly is ‘connecting’ all the MRIs?: Decoding the Rahul Gandhi conundrum

Recently, Rahul Gandhi’s statement in Singapore about ‘connecting’ the MRI machines of world had been circulated as a joke and brought a great guffaw from many. He even went beyond saying that it would transform the healthcare in entire world (not just India!). Whether Congress president has thought about it on dais or it was infused by a scientific advisor, that’s a mystery. But, here I would like to unfold this riddle about ‘connecting’ the MRIs.

To begin with, I might surprise some people by saying what he has said and being laughed upon, is partially a feasible and already existent entity.

Right in the silicon valley of India – Bangalore, in a multi-storeyed building, one would find many radiologist doctors sitting in cubicles, and reading images from almost all over the world. From hospitals and private clinics in USA, to the ones from Sub-Saharan Africa! MRI images are being transmitted round-the-clock and being read by doctors in India. Tele-radiology Solutions is one of the largest tele-radiology companies in entire world, which literally ‘connects’ the MRI images and revolutionising the healthcare. And this is a decade old story now.

In another scenario, a serious emergency patient gets his MRI done in a small city, somewhere up in North Bengal. They have the machines and technicians but they don’t have a specialist to read them. Yet, the patient gets the report within an hour and got treated without being shifted all the way to Calcutta, just to fetch a diagnosis. Specialist sitting in Chennai has already read his images, and sent the report taking a break from his favourite football game. All a radiologist needs is a web-based software in his laptop and read images from the world. Tele-radiology Solutions have even revolutionised it by introducing such services on iPad and mobile.

In Europe, all the hospitals and poly-clinics are connected by a health link software, with facility to transmit images, prescriptions, and patient history. Man doesn’t need to carry a ‘jhola’ with X-Ray films or MRI films from hospital to hospital, and being sent back to bring one. Its completely film-less system, where the images are accessible from the server. All one need is the unique identity number (equivalent to ‘Aadhaar’), and get entire patient history and the images from a combination of systems called PACS (Picture archiving and communication system) and HMS (Hospital management system).

This had particularly been a boon in emergency and night-time scenarios. United States doesn’t get help from Indian radiologists because they are cheaper option, but for the dearth of manpower in night-shifts. Indians can read the MRIs in their daytime, which were performed in night time in USA. In a similar way, European MRIs are being read from a similar set-up in Australia. India doesn’t need support from other countries, but it may efficiently use its pool of specialists by connecting the images. Irrespective of where MRI is being done, they would be stored in a single or multiple servers, and fetched by the radiologist pool who would alternate in day and night shift.

This model is efficiently being utilised by a south Indian chain of diagnostic center Vijaya Diagnostic Center, and the BSR diagnostic chain in Madhya Pradesh/Chhattisgarh. They have connected all their diagnostic centres to one server. Hyderabad based centre has a central room, which one would call a ‘space station’, with many radiologists reading images from all over Andhra Pradesh. They simply have ‘connected’ all the MRI images.

But, the idea and its transmission has to happen in a more efficient and collective way. India, being a private healthcare dominant country, it would be difficult to link images from different hospitals. This may be monetised or regulated by government or collectively agreed upon by private partners in benefit of the healthcare. MRI machines or the magnets surely can’t be connected, and if one says so, he/she may become a laughing stock. But, if he means, ‘connecting’ the work-stations or images, that’s a witty, practical and internationally accepted thought. India, in spite of making a breakthrough decade ago in private sector, lags way behind in linking the government healthcare. Healthcare has to be a vital part of ‘Digital India’ with well-planned information network and efficient utility of specialist services.

(Author Dr. Praveen Kumar Jha is a Norway based radiologist doctor, a columnist and an author)

Hindi translation by Mr. Devendra Sharma-

हाल ही में राहुल गाँधी ने सिंगापुर में पूरे विश्व की MRI मशीनों को जोड़ने की बात कही जिसे बहुत से लोगों ने महज हास्य विनोद का विषय माना। उन्होंने ये भी कहा कि इस कदम से ना सिर्फ भारत में बल्कि समूचे विश्व की स्वास्थ्य सेवाओं में क्रन्तिकारी परिवर्तन लाया जा सकता है। अब कांग्रेस अध्यक्ष ने यह बात खुद सोची या उन्हें किसी वैज्ञानिक सलाहकार ने सुझाई, ये अपने आप में एक रहस्य ही है लेकिन सभी MRI मशीनों को जोड़ने की इस पहेली को मैं ज़रूर सुलझाना चाहूँगा।
सबसे पहले तो आप में से कुछ लोगों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि उन्होंने जो कहा, और जिस बात का मजाक उड़ाया गया, वो कुछ हद तक व्यावहारिक है और मूर्त रूप ले भी चुकी है।
भारत की सिलिकान वैली बंगलौर की किसी बहुमंजिला इमारत में आप बहुत से डॉक्टर्स को अपने क्यूबिकल्स में बैठ लगभग सारी दुनिया से आई इमेजेज पढ़ते देख सकते हैं। अमेरिकी अस्पतालों और प्राइवेट क्लीनिक से लेकर अफ्रीका के उप-सहारा के क्षेत्रों तक की इमेजेज चौबीसों घंटे भारतीय डॉक्टर्स तक पहुँचती हैं और वो पढ़ते हैं। ‘टेली-रेडिओलाजी सोल्यूशंस’ दुनिया की सबसे बड़ी टेली-रेडिओलाजी कंपनियों में से एक है जो वास्तव में ‘MRI इमेजेज’ को जोड़ती है और स्वास्थ्य क्षेत्र में क्रांति ला रही है। और अब ये एक दशक पुरानी बात हो चुकी है।

एक और मामला देखिये, एक सीरियस मरीज उत्तरी बंगाल के किसी छोटे से शहर से MRI करवाता है। वहां मशीनें हैं, टेकनीशियन है मगर उस रिपोर्ट को पढ़ने वाला कोई एक्सपर्ट नहीं। लेकिन इसके बाद भी मरीज सिर्फ एक डायग्नोसिस के लिए कलकत्ता जाने के बजाय एक घंटे के भीतर अपनी रिपोर्ट पा जाता है और इलाज करवा लेता है। ये संभव होता है क्योंकि चेन्नई में बैठे किसी एक्सपर्ट ने अपने फेवरेट फुटबाल गेम से ब्रेक लेकर उसकी रिपोर्ट पढ़ी और अपने सुझाव भेज दिए। अब स्थिति यह है कि रेडिओलोजिस्ट को सिर्फ अपने लैपटॉप में एक वेब-बेस्ड सॉफ्टवेयर चाहिए और वो सारी दुनिया की इमेजेज पढ़ सकता है। टेली-रेडिओलाजी ने तो ये सुविधाएँ मोबाईल और ipad तक लाकर इसमें क्रांति ला दी है।

यूरोप में, सारे अस्पताल और पाली-क्लीनिक एक हेल्थ-लिंक से सॉफ्टवेयर से जुड़े हैं जिसमें इमेज, मरीज की हिस्ट्री और प्रिस्क्रिपशन ट्रांसमिट करने की सुविधा है। वहां एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल तक झोला भर के xray फिल्म और MRI फिल्म लेकर भटकने की जरूरत नहीं होती। पूरा सिस्टम ‘फिल्म-लेस’ है यानि इमेजेज सर्वर से प्राप्त की जा सकती हैं। वहां सिर्फ एक विशिष्ट पहचान संख्या(आधार सरीखी) दर्ज कर मरीज की सारी केस हिस्ट्री मिल जाती है और दो तंत्रों, PACS(Picture archiving and communication system) और HMS (Hospital management system) के संयोजन से इमेजेज प्राप्त की जा सकती हैं।

इमरजेंसी केसेज और रात के मामलों में ये वरदान की तरह साबित हुआ है। अमेरिका, भारतीय डॉक्टर्स की मदद इसलिए नहीं लेता कि वो एक सस्ते विकल्प हैं बल्कि इसलिए लेता है क्योंकि रात को विशेषज्ञों की उपलब्धता कम होती है। अमेरिका में रात में होने वाले MRI, भारतीय दिन में पढ़ सकते हैं। इसी तरह यूरोप के MRI आस्ट्रेलिया से पढ़े जा सकते हैं। भारत को दूसरे देशों के डॉक्टर्स की ज़रुरत नहीं लेकिन यह सारी इमेजेज को संयोजित कर अपने विशेषज्ञों का पूरा लाभ उठा सकता है। MRI चाहे जहाँ भी हो, इमेज को सिंगल या मल्टिपल सर्वर में भेजा जाये, जिसे दिन और रात की शिफ्ट में काम कर रहे रेडिओलोजिस्ट पा सकें, पढ़ सकें।

दक्षिण भारत में डायग्नोस्टिक सेंटर्स की एक चेन विजया डायग्नोस्टिक सेंटर और मध्य प्रदेश/छत्तीसगढ़ में BSR डायग्नोस्टिक चेन इस मॉडल का कुशलतापूर्वक प्रयोग कर रहे हैं। उन्होंने अपने सारे डायग्नोस्टिक सेंटर्स को एक सर्वर से जोड़ दिया है। हैदराबाद स्थित सेंटर में एक सेंट्रल रूम है, जिसे स्पेस स्टेशन कहा जा सकता है, और बहुत से रेडिओलोजिस्ट पूरे आंध्र प्रदेश से इमेजेज पढ़ते रहते हैं। उन्होंने सारी MRI इमेजेज को संयोजित कर दिया है।

लेकिन इस पूरे विचार और इसके ट्रांसमिशन को कुशलतापूर्वक और सहयोगपूर्ण ढंग से किये जाने की आवश्यकता है। भारत में, जहाँ स्वास्थ्य में प्राइवेट क्षेत्रक का प्रभुत्व है, अलग अलग अस्पतालों की इमेजेज को जोड़ना मुश्किल है। इसके लिए या तो सरकार को आगे आकर इसका वित्तपोषण और विनियमन करना होगा, या फिर स्वास्थ्य क्षेत्र की भलाई के लिए प्राइवेट अस्पतालों को मिलजुलकर आगे बढ़ना होगा। हाँ निश्चित तौर पर MRI मशीनों या मैगनेट को जोड़ना संभव नहीं है और अगर कोई ऐसा कहता है तो वो मजाक का पात्र ही बनेगा। लेकिन अगर उसका मतलब वर्क-स्टेशन या इमेजेज को जोड़ने से है तो यह एक बुद्धिमत्तापूर्ण, व्यवहार्य और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य विचार है। भारत ने भले ही एक दशक पहले ही प्राइवेट क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन सरकारी स्वास्थ्य क्षेत्र को जोड़ने में यह काफी पीछे रह गया है। हेल्थकेयर को सुनियोजित इन्फोर्मेशन नेटवर्क और विशेषज्ञों की सेवाओं के कुशलतापूर्ण सुविधाओं के साथ डिजिटल इंडिया का एक महत्त्वपूर्ण भाग होना चाहिए।

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भूतों के देश में: आईसलैंड : Bhooton ke desh mein: Iceland (खिलंदर साहित्य)

In the mysterious land of witchcraft and magic, a passage through ghosts and trolls in an unpredictable land – Iceland. Author’s passage through terrains of Iceland and its culture is a thrilling experience told in chaste Hindi. Book is not essentially a ghost story but a journey through this weird land. The land of erupting volcanoes, splitting landscape, constant seismic waves and the earthquakes, snow-storms, and the sheer silence of the barren snow-covered land. A hidden abode of vikings which still speaks the language of vikings, lives on the edges, bathing in the volcanic lakes, and believing in the ghosts. The land where roads just seem to disappear and reappear from nowhere, leaving one virtually nowhere. A journey which takes to the ‘Game of thrones’ turning the traveller into a viking himself.

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आईडेंटीटी की खोज

उन दिनों नॉर्वे नया-नया आया था। किसी मरीज का एक काग़ज चाहिए था, तो एक पीले पुर्जे पर उसका नाम और उसका आई.डी. नंबर लिख कर सेक्रेट्री साहिबा को पकड़ा दिया। उन्होनें काग़ज ढूँढ दिए, और पुर्जा कचड़े के डब्बे में। जब सप्ताहांत पर कचड़ा उठाने लोग आए तो वो पुर्जा मिला होगा। वह पीला काग़ज का टुकड़ा बेशकीमती निकला। मुझे नोटिस मिला कि आपने किसी की ‘आईडेंटीटी’ लीक कर दी। वो तो धन्य वो कचड़े वाला जिसने पुर्जा लौटा दिया। अन्यथा जेल हो जाती।

अगली बार मैनें सोचा कि ई-मेल से ही भेजूँगा, पुर्जे पर लिख कर नहीं। फिर से नोटिस आ गया कि ई-मेल पर भी आई.डी. नहीं लिख सकते। वो भी सुरक्षित नहीं। वहाँ भी जेल हो जाएगी। आखिर गुप्त तरीका बताया गया, जो यहाँ नहीं बताऊँगा।

डॉक्टरों के हाथ में एक कुंजी होती है, जिसमें तमाम आई.डी. छुपी होती है। वो कुंजी संभालना जरूरी है। एक दफे और नोटिस आया, जब अपना कम्प्यूटर ताला खुला छोड़ निकल आया था। फिर आईडेंटीटी चोरी का डर।

एक दिन मजाक में एक मनेज़र साहब ने पूछा, “भारत में इस चोरी का भय नहीं?”

मैनें कहा, “पता नहीं। कभी ऐसा सुना नहीं।”

“तो फिर किस चोरी का महत्व है?”

“भारत तो बड़ा देश है। मेरे प्रांत में गर ‘माछ की झोरी’ (मछली की झोली) चोरी हो जाए, तो रूदन-क्रंदन संभव है।”

“फिर तो तुम हमारी तरह वाईकिंग के वंशज लगते हो। वो भी मछली के चक्कर में लड़ाई कर लेते थे।” और वो हंसने लगे।


हालिया दो किताबें पढ़ी। एक ‘हाफ़-अ-लाइफ़’ और दूसरी ‘मैज़िक सीड्स’। दोनों एक ही लेखक* कीहैं, जिसमें एकभारतीय विली रामचंद्रन पूरा जीवन अपनी पहचान (आईडेंटीटी) तलाशते रहते हैं।

भारत के विदेश मंत्रालय ने तीस हज़ार रूपए शुल्क पर एक स्कीम बनाई है, जिससे किसी भी भूले-बिछड़े प्रवासी की जड़ ढूँढ दी जाएगी। गर वो एक बार बनारस घाट घूम आएँ, वहाँ के पंडे ही पूरी कुंडली बांच दें। विदेश मंत्रालय क्या पहचान बताएगा? मैं अपनी आईडेंटीटी तो तभी सिमरिया की गंगा में बहा आया, जब गाँव से निकला। अब तो वो अस्थाई है। बदलती रहती है। कोई क्या चुराएगा?

*पोस्ट में किस लेखक की चर्चा है?

पंडित रविशंकर और विलायत खान

पंडित रविशंकर और विलायत खान में वास्तव में कुछ रंजिश थी या लोगों ने ऐसी रंजिश बना दी? कई कहानियाँ हैं, और कई गढ़ी भी गई।

१९५० में लाल किले में दोनों साथ बजाने बैठे। विलायत खान साब घराने से भी सीनीयर थे और तालीम से भी। पर पंडित रविशंकर अलाउद्दीन खान साहब के चेले थे और नेहरू जी का भी खास लगाव था। ज्यादा पॉपुलर थे, और सुभाषी भी। बजाने आते तो लोग अगुवाई करते। विलायत खान साहब के साथ क्या ऊँच-नीच हुई पता नहीं, पर उन्होनें कुछ चाल चली। उन्होनें वो झाला बजाया जो उनके घराने की खासियत थी। पं रविशंकर पीछे रह गए, और पब्लिक ने विलायत खान को बेहतर घोषित कर दिया, अखबारों ने भी। हालात यहाँ तक पहुँचे कि रविशंकर ने उन्हे ‘rematch’ का चैलेंज दे दिया, जो कभी शायद हुआ नहीं।

बाकी कोई कहता है कि विलायत खान ने एक रूपया ज्यादा फीस माँगी क्यूँकि वो सीनीयर थे। रविशंकर ने चाल खेली, और पैसे लेने से मना कर दिया। शर्त के अनुसार विलायत खान को बस एक रूपया पारितोषिक मिला।

रविशंकर आगे बढ़ते गए, विश्व में भारत का नाम किया। विलायत खान साहब अपने शर्तों पर जीते रहे। उनकी फीस इतनी ज्यादा थी, कि ऑल इंडिया रेडियो उनको afford नहीं कर पाती। फीस तो रविशंकर की भी ज्यादा थी, पर रविशंकर आखिर रविशंकर थे। लोग दिल खोलकर पैसे देते थे। रविशंकर को भारत रत्न भी मिला, और विलायत खान साहब ने पद्म-विभूषण लेने से गुस्से में मना कर दिया। किसी ने आग लगाई ब्राह्मण को प्राथमिकता मिली, मुस्लिम को नहीं। किसी ने कहा, रविशंकर अच्छी बंगाली बोलते हैं, और विलायत खान कलकत्ता में रहकर भी ठीक से नहीं बोल पाते।

मुझे दोनों पसंद हैं, मुझे कुछ खास संगीत का ज्ञान भी नहीं। रविशंकर के चेले सितार में नहीं, अनुष्का शंकर रीमिक्स वर्सन हैं वैसे। वहीं विलायत खान से कुछ कम शुजात खान नहीं बजा रहे? वो अपनी विरासत देकर गए। संगीत में विरासत छोड़ना, शिष्य को शिक्षा देना मायने रखता है। तो विलायत एक रूपया ज्यादा के हकदार जरूर हैं।

जब वो मरे, तो देश उन्हें भूल चुका था। सिवाय वाजपेयी जी के जो उनके फैन थे और प्रधानमंत्री भी। वो लूज़र कहीं से नहीं, कुछ लोग बस अपनी शर्तों पर जीना पसंद करते हैं।

मन्ना डे से मेरी मुलाकात

मन्ना डे से मेरी मुलाकात एक डॉक्टर-मरीज के रूप में हुई। मैं चुप-चाप काम करता रहा। ९० बरख की अवस्था में हड्डियाँ कमजोर हो गई थी, तो बैंगलूर में मेरे विभाग में जाँच के सिलसिले में आए थे। मेरे टेक्निसियन ने जाँच की, मैनें प्लेट देखी और रिपोर्ट बना दी। दरअसल मुझे इस हीन अवस्था में इस महान् आत्मा को देखने की इच्छा नहीं थी। लोग फोटो खिंचवा रहे थे, और मैं बस एक कोने में कागजी कारवाई कर रहा था। मुझे दरअसल किसी को स्टेशन या एयरपोर्ट पर सी-ऑफ करना पसंद नहीं। कोई अपना भी जब अंतिम अवस्था में होता है, मैं तटस्थ हो जाता हूँ। डॉक्टरी का एक साइड-ईफेक्ट है कि कुछ अपने घूम-फिर कर आपके आस-पास ही मरते हैं। वो आप पर, आपके मित्रों पर, आपके हस्पताल पर भरोसा करते हैं।
मन्ना डे से तो खैर कोई पारिवारिक निकटता नहीं थी, पर उनके घर का सबसे करीबी अस्पताल था तो शायद आए हों। एक शब्द भी नहीं बोले, और मैं चाहता था वो मूक ही रहें। मैनें तो आँख भी नहीं मिलाई, यह भी नहीं कहा कि मैं जीवन-भर आपके कैसेट जमा करता आया हूँ। बेसुरी आवाज में “पूछो न कैसे मैनें…” रियाज करता आया हूँ। वो शिथिल मनुष्य मन्ना डे थे ही नहीं। ही वाज़ जस्ट अन’दर पेशेंट।
मन्ना डे तो वो थे जिन्हें जवानी में भीमसेन जोशी से भिड़ा दिया गया था और जीतने को कहा गया था। मन्ना डे घबड़ा गए कि भला गुरू के सामने गाएँ तो गाएँ कैसे? पंडित जी तो प्लेबैक में थे, उन्हें हारना था, यही सीन था। पर हारे हुए जोशीजी को भी हराना सबके बस की नहीं। वो बस मन्ना कर सकते थे, और भारत भूषण के लिये आवाज दी। गाने के बाद पंडित जी ने कहा, “कहाँ फिल्मों में समय बरबाद कर रहे हो? मेरे साथ चलो।” मन्ना डे ने हाथ जोड़ दिए, क्षमा माँगने लगे।
यह संगीत का शास्त्रार्थ सुनना आवश्यक है। गजब है।

सुबह की चाय: राग बिलावल (अल्हैया बिलावल)


यह आलेख तभी पढ़ें जब ऊपर दिए राग का लिंक सुन रहे हों। वो आलेख से कई गुणा मधुर और प्रॉडक्टिव होगा। इस राग की वजह से सुबह स्वस्थ मुस्कुराती रहती है। जैसे इसी राग में ‘बावर्ची’ फिल्म का गीत “भोर आई गया अंधियारा..”।* चाय के साथ सुनें, या सुबह ऑफ़ीस के सफर में, या पूजा-पाठ के बैकग्राउंड में, या बिस्तर पर अखबार पढ़ते, यह अपना चयन है।

ऊपर की प्रस्तुति पलुस्कर जी की आवाज में है। ग्वालियर घराने से मराठी गायक, जो महज 34 वर्ष जीए, पर इतने छोटे जीवन में गायकी के कई पहलू छू गए। मैं एक बार उन्हें ‘मोज़ार्ट’ लिख चुका हूँ।

यह प्रस्तुति शुरू होती है आलाप से, जिसमें गायक ‘विलंबित’ यानी धीमी गति (slow rhythm) में कुछ स्वरों को गा रहे हैं। ग रे ग प ध नी साss। आप कहेंगें, ये कब गाया?

गाया जा रहा है, पर तोड़-तोड़ कर या जोड़ों में। कभी बस गंधार (ग) स्वर में आलाप। पंचम (प) को थोड़ा आंदोलित (हिला-डुला) कर और लंबे लेकिन सुगम तरीके से धैवत (ध) में। और धैवत से ही उठा कर ‘नी सा’ तक। यह विस्तार (improvisation) अलग-अलग तरह से है।** और यह भी ध्यान दें कि स्वर ऊपर चढ़ता है, और उतरता है। आरोह और अवरोह। “दैयाs” जो आलाप का key-word है, वो इस प्रस्तुति का चौराहा (intersection)। यहाँ सुस्ता कर गायक अगली राह पकड़ते हैं।

यू-ट्यूब ने शीर्षक में “दैया कहाँ गए लोग, ब्रज के बसय्या” लिखा जो गलत है। यह अलग बंदिश है। ग्वालियर घराने और मराठीयों का ट्रेडमार्क-

“कवन बँटरिया गइलो, माई देहो बताय।
मैं घरवा गत माइ, चूरिया भइलवा।

लेने गई सौदा रे, अरे हटवारे।
इतनी गली में गइलो कवनवा।”

किशोरी अमोनकर जी का इसी बंदिश में गायन जरूर सुनें किसी सुबह। कवन बँटरिया गइलोsss
*पटियाला घराना से जुड़ी और फिल्म-स्टार गोविंदा की मां निर्मला जी ने मन्ना डे के साथ गाया है, और ऐक्टिंग भी की है।
**आलाप में मध्यम (म) भी लगा है, पर कम।

Others from Morning tea playlist (Kavan Batariya):
1. रामाश्रय झा ‘रामरंग’- http://www.parrikar.org/mus…/bilawal/jha_alhaiyyabilawal.mp3
2. किशोरी अमोनकर – https://youtu.be/fnJyIW_dJ18
3. कुमार गंधर्व – https://youtu.be/RQcX6WLOoa8
4. पं. नारायणराव व्यास – https://youtu.be/d9aN95g8YVA

(आलेख एक श्रोता का अपना अनुभव है, संगीतकार का नहीं।)



किताब से अर्थ तब तक जुड़ा है, जब तक कॉपीराइट, छपाई, वितरण और रॉयल्टी इत्यादि जुड़ी है। और वो ठीक भी है। पर औसतन पांच सौ पृष्ठ की कथेतर (इतिहास इत्यादि) की कीमत सात-आठ सौ रूपए पड़ जाती है। गर कई लेखकों ने लिखा तो हज़ार से अधिक भी। मैं पहले एक-दो किताब ऑर्डर करता, वो लंदन वगैरा से घूमती हफ्ते भर में आती, गर लोकप्रिय न रही हो। अब वही किताबें ‘ई-बुक’ या ‘डिज़िटल पुस्तकालय’ की सदस्यता से लगभग आधे से दहाई दाम पर मिल जाने लगी। यानी उसी खर्च पर एक के बदले दस किताबें।

इसमें गणित सीधा है। छपाई और वितरण काफी हद तक बायपास हो गया, तो दाम घट गया। मेरे लिए सुविधा यह है कि जब भी फलां किताब से फलां संदर्भ उठाना हुआ, एक सर्च बटन से पन्ना खुल गया गर वो मेरी डिज़िटल लाइब्रेरी में है। चाहे मैं कहीं भी बैठा हूँ।

किताब की सुगंध वाला तर्क ठीक है। पर वो सुगंध अगर किसी इत्र के डब्बे में डाल साथ रख ली जाए? पन्ने की खरखराहट के लिए अब ऐप्प में ‘फ्लिप’ करते वक्त ‘क्लक’ आवाज़ निकलने लगी है। आंखों की हानि पर खास नहीं कहूँगा। वो फॉन्ट और रोशनी पर निर्भर करता है। यह पोस्ट मैं जिस माध्यम से लिख रहा हूँ, उसको पढ़ने वाले लोग पहले से इस नशे में लिप्त हैं। वो काग़ज से अधिक हाथ में एक यंत्र लिए चलते हैं, जिसे बोल-चाल की भाषा में मोबाइल कहते हैं। गर बीच-बीच में दो-चार पन्ने पलटते रहें, तो किताबें पढ़ी जाती रहेगी।


‘अमेज़न अनलिमिटेड’ खास उपयोगी नहीं, बशर्तें कि अश्लील या प्रेरणादायक ‘मोटापा कैसे कम करें’ इत्यादि पढ़नी हो। कुछ ढंग की किताबें नहीं है। ‘अमेज़न प्राईम’ बेहतर होगी क्योंकि डिलिवरी मुफ्त हो जाती है।

Notnul में कुछ दुर्लभ और ऊँची गुणवत्ता की पत्रिकाएँ और कथेतर किताबें मिली। मुझे अच्छी लगी। और आशाएँ हैं।

Juggernaut में सबसे अधिक हिंदी की मुफ्त किताबें नजर आती हैं। मंटो, मन्नू भंडारी, प्रेमचंद, शरतचंद्र, ब्रजेश्वर मदान, जयशंकर प्रसाद..कई लोगों की किताबें।

Kindle (मोबाइल ऐप्प) में अचानक राजकमल और हिंद-युग्म ने कई किताबें डालनी शुरू की है। बाकियों ने भी डाली हो, पता नहीं। पर फॉन्ट मनचाहा चुनो, किताबें सस्ती, और डिलिवरी सेकंड से भी कम समय में।

Storytel ऐप्प पर अठारह घंटे की ‘राग दरबारी’ का ऑडियो डालने के लिए राजकमल को साधुवाद। मेरे विचार से राजकमल की सौ किताबें ऑडियो पर आ गई। मैं ऑडियो कभी सुनता नहीं, पर ‘काशी का अस्सी’ शायद सुन लूँ।

‘गद्य-कोश’ और ‘कविता-कोश’ में तो लगभग सभी हैं। पर फॉन्ट छोटी नजर आती है, जिसे बदलते रहना पड़ता है। पर जो मुफ्त में सब पढ़ जाना चाहते हैं, उनके लिए बढ़िया है।


कोई भी ई-बुक प्रकाशक लेखक को औसतन 40-60 प्रतिशत रॉयल्टी देते हैं। यह श्रम का मार्क्सवादी विभाजन है, जो श्रम के अनुरूप मिलता है। मसलन ई-बुक में प्रकाशक सिवाय कुछ सॉफ्टवेयर कार्य के अतिरिक्त कुछ खास नहीं करते। किताब ऑनलाईन ही वितरित होती है, तो दौड़-भाग और स्टॉल वितरण नहीं है।

लेकिन, इसमें एक बड़ी समस्या है, संपादन का न होना। गर किताबें संपादित हों, तो लेखक का प्रतिशत घटता है। और यह होना भी चाहिए। भारतीय ई-बुक प्रकाशक संपादन या मार्केटिंग पर कम ध्यान देते रहे हैं, सिवाय ‘जगरनॉट’ सरीखों के। जाहिर है, वहाँ रॉयल्टी घट कर 10-20 प्रतिशत तक आ जाएगी, जो प्रिंट के बराबर है। पश्चिमी संपादक यह पहले से करते आ रहे हैं। मेडिकल की तमाम मोटी किताबें चित्र-सहित और ‘इंटरैक्टिव’ रूप में पहले से ‘ई-बुक’ रूप में प्रचलित रही हैं। बल्कि, वो खुद ही अपडेट भी होती रहती है।

यह बात ध्यान देने योग्य है कि ‘ई-बुक’ लेखक या प्रकाशक कभी भी ‘अपडेट’ कर सकते हैं। यह नहीं कि महज कुछ सुधारों के लिए नया संस्करण महीनों चक्कर काट रहा है। आपने किताब खरीदी, आपके पास हमेशा ‘अपडेटेड’ किताब रहेगी। यह सब कोई नयी बात नहीं। यह लगभग एक दशक से चल रहा है। पूरी की पूरी पुस्तकालय ही डिज़िटल कर दी गयी, भारत में भी। जो पीछे रह गए, वो काग़जी किताब बिक्री में भी पीछे ही हैं।

किंडल पर कैसे करते हैं बुक प्रकाशित

FB Promoकिंडल पर कोई भी बुक प्रकाशित कर सकता है। आप चाहे तो यूँ ही किसी बच्चे से की-बोर्ड पर रगड़वा लें, और kdp.amazon.com पर जाकर डाल दें, छप जाएगा। उनके पास कोई संपादकीय बोर्ड नहीं है। इसमें अपने सामान की जिम्मेदारी लेखक की ही है। किंडल यह शुरूआती काम मुफ्त में करता है। हाँ! गर यह कचरा बिक गया, तो हिस्सेदारी लेता है। कुछ दोस्त-यार कचरा खरीद भी लेंगें, और ‘शून्य’ पूंजी लगाकर सौ-दो सौ रूपए के मालिक आप हो लेंगें। तो ‘कैसे छापें?’ का उत्तर यही है, कि फलां साइट पर जाएँ, वहाँ अपनी पांडुलिपि अपलोड करें, एक कवर चुन लें, और छाप लें। पांडुलिपि हिंदी में ‘यूनीकोड’ या एक जैसी फॉन्ट में हो, एलाइनमेंट वगैरा न हो, हर अध्याय नए पृष्ठ से शुरू हो, और ‘preview’ कर देख लें कि सब ठीक है या नहीं। चौबीस घंटे के अंदर आप विश्व के सभी अमेज़न पर होंगें। आप कभी भी कोई वर्तनी-दोष या चाहें तो पूरा कन्टेंट ही बदल सकते हैं।

अब प्रश्न यह है कि गर अच्छा लिखा तो बढ़िया प्रकाशक को क्यों न दें? और गर घटिया लिखा तो छापें ही क्यों? इसके बिंदुवार उत्तर देता हूँ-

1. 50 हजार शब्द से कम लिखा प्रकाशक अक्सर लेते नहीं। कथा-संग्रह भी अच्छे प्रकाशक ऐरू-गैरू का नहीं छापते। ‘प्रतिनिधि कहानियाँ’ नामचीन लोगों की ही आती हैं। गर आपके पास ऐसा माल है, और अच्छा लिखा है, तो कागज न बरबाद करें, डिज़िटल डाल दें। पतली किताब है, लोग पढ़ लेंगें।
2. आपकी लिखने की गति अगर बहुत ही ज्यादा है, कि हर महीने एक किताब रगड़ देते हैं, तो इतने किताब छपने से रहे। अच्छे प्रकाशक एक किताब पर छह महीने से कुछ वर्ष तक लगा सकते हैं। इतने में आपने बीस किताबें लिख दी, जो बीस वर्ष में छपेगी। आप रहेंगें भी या नहीं, पता नहीं। तो आंक लें कि आपने क्या लिखा जिसमें वक्त लगा, और अद्भुत् लिख गए। और क्या लिखा, जो पठनीय है, पर छपनीय नहीं। उस हिसाब से बांट लें।
3. कविता-संग्रह मेरा मानना है कि डिज़िटल ही हो। हालांकि कवियों को सम्मान की भी अपेक्षा होती है, जो प्रकाशक बेहतर दिलवाते हैं। पर बिक्री के हिसाब से फिलहाल मुझे यह प्रकाशन पर बोझ लगता है। जो कविता-प्रेमी हैं, वो डिज़िटल में भी एक-एक कविता का खूब लुत्फ लेंगें। पर मैं कवि नहीं, इसलिए यह कवि ही जानें।
4. लुगदी लेखन, क्राईम थ्रिलर, सीरीज़ लेखन, अश्लील लेखन के नए लेखकों के लिए किंडल गजब का अवसर हो सकता है। हर किसी को मेरठ के प्रकाशक नहीं मिलते, जो एकमुश्त बड़ी रकम देकर चलता करें। अब वो जमाना गया। इंटरनेट पर अंग्रेजी लुगदी खूब पढ़ी जाती है। आप पॉपुलर हुए, और गर धड़ाधड़ निकालें, तो खूब चलेगी।
5. रोचक कथेतर लेखन जैसे फिल्म, खेल, संगीत. इतिहास इत्यादि भी बढ़िया चल सकते हैं। बशर्तें कि आप ठीक-ठाक विशेषज्ञ हों।

पर किंडल से मिलेगा क्या?

किंडल या कोई भी ई-बुक प्रकाशक (जगरनॉट, नॉटनुल, पोथी इत्यादि) मोटी और पारदर्शी रॉयल्टी देते हैं। 35 से 70 प्रतिशत तक। आम प्रकाशक 10 प्रतिशत देते हैं। यानी उधर सात बिकी, इधर एक, बराबर। किंडल की एक और स्कीम है- ‘kdp select’ जिसमें जुड़ने के बाद आपकी किताब ‘kindle unlimited’ वालों को मुफ्त मिलेगी, पर आपको 70 प्रतिशत रॉयल्टी मिलती रहेगी। फर्ज करिए कि भारत में कई लोगों ने यह unlimited ले ली, और आपकी किताब बस यूँ ही मुफ्त के नाम पर रख ली। वो चाहें एक पन्ना पढ़ पटक दें, आपको पैसे मिल गए। यह पूरा पारदर्शी है। आप real time देख सकते हैं कि कितनी बिकी, कितने पन्ने आज पढ़े गए, और आपने कितने कमाए। इतना ही नहीं kdpselect का एक ग्लोबल फंड है, जिसकी रॉयल्टी भी अलग से मिलेगी।

क्या भारत के लिए उपयुक्त है? 

इसका जवाब पता नहीं। पर जब पूरी दुनिया में चल ही रहा है तो भारत क्या मंगल ग्रह से है? अंग्रेजी पढ़ने वाला बड़ा वर्ग पिछले पांच वर्षों से भारत में भी किंडल पर किताब पढ़ रहे हैं। मैं स्वयं खूंखार किंडल पाठक हूँ। इतिहास से पॉर्न तक पढ़ता हूँ। हिंदी अब आनी शुरू हुई है, पांच वर्ष बाद असर दिखेगा ही।

यह कार्य कैसे बेहतर किया जाए?

लिखा अच्छा जाए। ‘प्रूफ़-रीड’ अच्छी कराई जाए। ऑनलाइन मार्केटिंग टूल का उपयोग किया जाए। काबिल ग्राफिक डिज़ाइनर की भी मदद ली जाए। और उनसे संपर्क करें, जो यह कार्य करते रहे हैं।

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