मैं लंदन कैसे आया?

(Originally written by Mohandas K. Gandhi. Translation by Praveen Jha ‘Vamagandhi’)

…….

१२ नवंबर १८८८, लंदन

आखिर मैं लंदन क्यों आया? यह सब अप्रिल के अंत में शुरू हुआ। पढ़ाई के लिए लंदन आने के संयोग बनने से पहले ही एक गुप्त जिज्ञासा मन में बन गयी थी, लंदन शहर को जानने की। जब मैं भावनगर के कॉलेज में पढ़ रहा था, तभी मेरी बात जयशंकर बुच से हुई। उन्हीं ने कहा कि जूनागढ़ एस्टेट में अपनी लंदन छात्रवृत्ति की अर्जी डाल दूँ, क्योंकि मैं सौराष्ट्र वासी हूँ। मुझे स्मरण नहीं कि उन्हें क्या उत्तर दिया, पर मुझे यकीन था कि यह छात्रवृत्ति मुझे नहीं मिलेगी। लेकिन मन में लंदन देखने की जिज्ञासा जरूर बैठ गई, और उसके रास्ते तलाशने लगा।

१३ अप्रील १८८८ को छुट्टियों में भावनगर से राजकोट गया। छुट्टी के पंद्रहवें दिन मैं और मेरे अग्रज पटवारी से मिलने गए। वहाँ से लौट उन्होनें कहा कि मावजी जोशी से मिलना होगा। मावजी जोशी ने मेरे और मेरे शिक्षण के बारे में पूछताछ की। मैनें उनको स्पष्ट कह दिया कि प्रथम वर्ष में मेरे लिए उत्तीर्ण होना असंभव सा था। मुझे हर विषय बहुत कठिन लगा। यह सुनते ही उन्होनें भैया को कहा कि

इसे जल्द लंदन भेजना होगा, और वहाँ से पढ़ाई करबार‘ (वकालत) में प्रवेश मिलेगा। कुल पाँच हजार रूपए का खर्च लगेगा। वहाँ कुछ उरद दाल साथ भेज दो, और खुद ही खाना बना लेगा। इससे धर्म भ्रष्ट भी नहीं होगा। यह बात किसी को बताना नहीं। कोशिश करो कि जूनागढ़ या पोरबंदर एस्टेट से कुछ छात्रवृत्ति मिल जाए। अगर मेरे बेटे केवलराम और इस मोहनदास को अगर आर्थिक मदद नहीं मिली, तो घर के कुछ फर्नीचर बेच देना। लेकिन किसी भी तरह मोहनदास को लंदन भेजना ही होगा। तभी तुम अपने मृत पिता की विरासत को बचा पाओगे।

मेरे परिजनों को मावजी जोशी में अटूट विश्वास था। और मेरे अग्रज यह विश्वास नहीं तोड़ना चाहते थे, और मुझे लंदन भेजने की ठान ली। अब अागे की जिम्मेदारी मेरी थी।

उसी दिन मेरे अग्रज ने बात को गुप्त रखते हुए खुशालभाई को सब बता दिया। वह इस बात पर राजी हो गए अगर मैं अपना धर्म भ्रष्ट होने दूँ। फिर मेघजीभाई को भी कह दिया। वह भी राजी हो गए, और मुझे पाँच हजार रूपए की मदद की पेशकश की। मुझे उन पर विश्वास था। पर जब यह बात अपनी माँ को बताया, उन्होनें डाँटा कि ऐसे विश्वास करूँ। जब वक्त आता है, सब पैसे देने से मुकर जाते हैं। शायद वह यह भी मना रही थीं कि यह वक्त आए ही नहीं कि मुझे दूर जाना पड़े।

उसी दिन केवलरामभाई से भी मिलने गया। पर वहाँ कुछ संतोषजनक बात नहीं हुई। वह कह रहे थे कि लंदन के लिए कम से कम दस हजार रूपए चाहिए। इससे मुझे धक्का लगा। उन्होनें यह भी कहा कि,

लंदन जाकर धर्म भूल जाना होगा। तुम्हें माँस खाना होगा, शराब पीनी होगी। उसके बिना जीवन संभव नहीं। तुम जितना खर्च करोगे, उतने ही चालाक बनोगे। यह बनना बहुत जरूरी है, मैं स्पष्ट कहता हूँ। बुरा मत मानना, पर तुम अभी युवा हो। लंदन तुम्हें अपने जाल में फँसाएगा, और तुम फँसते चले जाओगे।

मुझे सुनकर झटका तो लगा पर मैं उन लोगों में नहीं जो कुछ ठान लें, तो कोशिश करें। उन्होनें गुलाम मुहम्मद मुंशी का उदाहरण दिया। मैनें बस यह पूछा कि क्या आप आर्थिक मदद कर पाएँगें। उन्होनें मना कर दिया। उन्होनें कहा कि हर मदद करेंगें, सिवाय धन के। यह बात मैनें वापस आकर भैया को बता दी।

फिर मुझे अपनी माँ को मनाना था, जो मुझे लगता था कि मुश्किल कार्य नहीं। एकदो दिन बाद मैं और मेरे भाई केवलराम जी से मिलने गए, जो काफी व्यस्त लग रहे थे। उनसे वही बातें दुबारा हुई जो पहले भी हुई थी। उन्होनें भैया से कहा मुझे पोरबंदर भेज दें। यह बात हमने मान ली। मैनें लौटकर यह बातें मजाक में माँ से कही। पर यह मजाक अब सच बनने वाला था। मुझे पोरबंदर जाना था।

दोतीन बार मैनें जाने की कोशिश की, पर कुछ कुछ समस्या गई। पहली बार मैं जवेरचंद के साथ निकला, लेकिन एक घंटे पहले ही एक गंभीर दुर्घटना हो गई। मेरा मित्र शेख महताब से रोज झगड़ा होता। जब मैं निकला, तब भी मैं उस झगड़े का ही सोच रहा था। उसने एक संगीत पार्टी रखी थी, जो मुझे पसंद नहीं आयी। साढ़े दस बजे जब पार्टी खत्म हुई, हम मेघजीभाई और रामी से मिलने गए। उस समय मेरे दिमाग में एक तरफ लंदन चल रहा था, और दूसरी तरफ शेख मेहताब का सोच रहा था। उसी उधेड़बुन में एक गाड़ी से टकरा गया, और चोटें आयी। हालांकि मैं चलता रहा, बिना किसी मदद के, पर कुछ मन चिड़चिड़ा सा था।

फिर मेघजीभाई के घर एक पत्थर से टकरा गया, और बेहोश होकर गिर पड़ा। फिर क्या हुआ, मुझे याद नहीं। मुझे लगा कि मैं मर गया। पर पाँच मिनट में मुझे होश गया, और सब आखिर खुश हुए। मेरी माँ को बुलावा भेजा गया, जो काफी चिंतित हो गयीं। मुझे लगा कि मेरी माँ ऐसी हालत में जाने नहीं देंगीं। पर मेरी माँ एक सशक्त महिला थीं। उन्हें बस बाकियों पर भरोसा था। आखिर मैं राजकोट से पोरबंदर गया, पर उस रास्ते में भी कई कठिनाई आयी।

आखिरकार मैं पोरबंदर पहुँच गया। लालभाई और कर्सनदास मुझे घर ले जाने खादी पुल आए थे। अब मुझे चाचाजी से अनुमति लेनी थी, मि. लेली से कुछ आर्थिक सहायता, और अगर छात्रवृत्ति मिले तो परमानंदभाई से कुछ उधार माँगना था। पहले मैनें चाचाजी से पूछा कि वो मेरे लंदन जाने से खुश हैं या नहीं। उन्होनें पूछा कि लंदन जाकर होगा क्या? मैनें अपने तर्क दिए। उन्होनें कहा,

इस पीढ़ी के लोगों को तो पसंद आएगा ही, पर मुझे नहीं पसंद। पर फिर भी हमें आगे का सोचना चाहिए।

मुझे उनका उत्तर अच्छा लगा कि उन्होनें खुल कर असहमति भी जाहिर कर दी, और मेरे तर्कों से सहमत भी हुए।

बदकिस्मती से मि. लेली पोरबंदर में नहीं थे। जब किस्मत खराब हो तो कई समस्यायें जाती हैं। चाचाजी ने मुझे इतवार तक रूकने को कहा। आखिर सोमवार को मेरा साक्षात्कार हुआ। मैं पहली बार किसी अंग्रेज से मिलने वाला था। मुझे शुरूआत में डर लगा पर फिर लंदन का सोचकर मैं बुलंद हो गया। उनसे मेरी बात हालांकि थोड़ी देर ही हुई गुजराती में। वो सीढ़ियाँ चढ़ रहे थे और बात कर रहे थे। कहा कि पोरबंदर एस्टेट के पास पैसे नहीं हैं। उन्होनें कहा कि गर भारत से ग्रैजुएट हो जाऊँ तो कुछ मदद मिल सकती है। मुझे बहुत निराशा हुई। बल्कि ऐसे जवाब की तो मुझे उम्मीद भी नहीं थी।

परमानंदजी भाई पाँच हजार रूपए देने को राजी तो हो गए, पर उनकी शर्त थी कि चाचाजी को मना लूँ। यह काम आसान था। चाचाजी उस दिन व्यस्त थे। मैनें पूछ लिया कि आपने मेरे लंदन जाने के विषय में क्या सोचा? उन्होनें कहा,

मैं उसकी अनुमति नहीं दे सकता। मैं तीर्थयात्रा पर जा रहा हूँ, और यह क्या ठीक होगा कि मैं लंदन जाने की बात पर सहमति दूँ? पर अगर तुम्हारी माँ और भाई राजी हों तो मुझे कोई एतराज नहीं।

मैनें कहा कि जब तक आप नहीं मानेंगें, परमानंदजी भाई पैसे नहीं देंगें। चाचाजी भड़क गए और कहा,

उसे पता है कि मैं मना कर दूँगा। यह उसकी चाल है। वह पैसे देना ही नहीं चाहता। यह सब बहाने हैं।

मैनें जाकर परमानंदजी भाई को सब ज्योंकात्यों बता दिया। वो भी भड़क गए पर मुझे पैसे देने का वादा कर दिया। उन्होनें बेटे की कसम भी खा ली। अब मुझे विश्वास होने लगा कि मैं लंदन पहुँच जाऊँगा।

अब राजकोट में मेरी अनुपस्थिति में क्या हुआ? मेरे मित्र शेख मेहताब, जो अव्वल दर्जे का चालबाज था, ने मेरे नकली हस्ताक्षर कर एक चिट्ठी लिखी। और मेघजीभाई से पाँच हजार रूपए माँगने चला गया, यह कहकर कि मैं माँग रहा हूँ। उन्होनें भी पैसे देने का वादा कर दिया। मुझे कुछ खबर ही नहीं थी।

पोरबंदर से हम राजकोट निकले मेघजी के पिता के साथ, जो गजब के कंजूस थे। राजकोट जाने से पहले मैनें भावनगर जाकर अपने सारे फर्नीचर बेच दिया, मकान खाली कर दिया, और दोस्तों से विदा ली। मकानमालकिन भावविह्वल हो गईं थी।

लेकिन मुझे कर्नल वाटसन से मिलना था। उनके राजकोट आने में एक महीना था, जो गुजारना कठिन था। कई दोस्त कहने लगे कि लंदन जाकर कोई फायदा नहीं। इस एक महीने में मेरी माँ और भाई भी धीरेधीरे अपना मन बदलने लगे, और लंदन जाने से मना करने लगे। लेकिन उन्हें यह भी पता था कि मैं जो ठान लेता हूँ, वो कर लेता हूँ, इसलिए चुप हो जाते। मेघजीभाई तो मजाक भी उड़ाने लगे, और इस एक महीने उन्होनें दुश्मनों की तरह बात की। मेरी माँ बुरा भी मानती, पर मैं उन्हें शांत रहने कहता। मैं भी बुरा नहीं मानता। हालांकि एक महीने बामैं राजकोट से बंबई निकला। शुक्रवार की रात। मुझे स्कूल के मित्रों ने एक अभिवादन दिया। मैं जब उस अभिवादन का जवाब देने स्टेज पर खड़ा हुआ, मैं बोल ही नहीं पाया। थड़थड़ाने लगा। मुझे लगा कि जिंदगी में कभी भाषण नहीं दूँगा। या कुछ भी बोलने से पहले लिख लिया करूँगा। कई लोग अलविदा करने आए थे। पहला स्टेशन था गोंडाल, जहाँ कपूरभाई साथ हुए। ढोला में उस्मानभाई। और भी कई लोग साथ थे।

इक्कीस को मुझे बंबई छोड़ना था, पर वहाँ कई मुश्किलें आई। मेरे जात भाई मुझे जाने ही नहीं देना चाहते थे। सब मेरे विरोध में थे। मेरे भाई कुशालभाई भी। पर मैनें ध्यान नहीं दिया। फिर मौसम भी खराब हो गया। सब मुझे छोड़ कर चले गए। चार सितंबर को अचानक मैं बंबई से रवाना हुआ। उस समय कई लोग स्टीमरक्लाइडपर मुझे छोड़ने आए। पटवारी और शामलाल ने पाँच रूपए दिए, मोदी ने दो रूपए, काशीदास ने एक रूपए, जिन्हें मैं कभी भूल नहीं सकता। मनशंकर ने चाँदी की चेन दी। मैं तीन साल के लिए सबको अलविदा कह रहा था।

कोई और होता, तो इतनी मुश्किलों और विरोध के बाद लंदन जाने की मन्शा शायद त्याग देता। शायद तमाम मुश्किलों के बाद मैं निकला, तभी मुझे लंदन और प्यारा लगने लगा। जब कर्नल वाटसन आए भी, तो कोई मदद नहीं की।

आखिर मेरे जाने की तारीख चार अगस्त तय हुई। पर जा सके। हमने एकएक कर सबसे पैसे माँगें। राजकोट एस्टेट से, कर्नल वाटसन से, ठाकुर साहब से। मैं कभी किसी के सामने इतना नहीं गिड़गिड़ाया था, पर भैया के कहने पर सब किया। और कुछ नहीं मिला।

आखिर दस अगस्त के मैं, शेख मेहताब, नाथूभाई और कुशालभाई निकल पड़े।

मैं राजकोट से बंबई निकला। शुक्रवार की रात। मुझे स्कूल के मित्रों ने एक अभिवादन दिया। मैं जब उस अभिवादन का जवाब देने स्टेज पर खड़ा हुआ, मैं बोल ही नहीं पाया। थड़थड़ाने लगा। मुझे लगा कि जिंदगी में कभी भाषण नहीं दूँगा। या कुछ भी बोलने से पहले लिख लिया करूँगा। कई लोग अलविदा करने आए थे। पहला स्टेशन था गोंडाल, जहाँ कपूरभाई साथ हुए। ढोला में उस्मानभाई। और भी कई लोग साथ थे।

इक्कीस को मुझे बंबई छोड़ना था, पर वहाँ कई मुश्किलें आई। मेरे जात भाई मुझे जाने ही नहीं देना चाहते थे। सब मेरे विरोध में थे। मेरे भाई कुशालभाई भी। पर मैनें ध्यान नहीं दिया। फिर मौसम भी खराब हो गया। सब मुझे छोड़ कर चले गए। चार सितंबर को अचानक मैं बंबई से रवाना हुआ। उस समय कई लोग स्टीमरक्लाइडपर मुझे छोड़ने आए। पटवारी और शामलाल ने पाँच रूपए दिए, मोदी ने दो रूपए, काशीदास ने एक रूपए, जिन्हें मैं कभी भूल नहीं सकता। मनशंकर ने चाँदी की चेन दी। मैं तीन साल के लिए सबको अलविदा कह रहा था।

कोई और होता, तो इतनी मुश्किलों और विरोध के बाद लंदन जाने की मन्शा शायद त्याग देता। शायद तमाम मुश्किलों के बाद मैं निकला, तभी मुझे लंदन और प्यारा लगने लगा।

जहाज ने बजे लंगर डाला। मुझे जहाज यात्रा का कुछ भय था, पर पूरे रास्ते स्वस्थ रहा, उल्टी नहीं हुई। जिंदगी में पहली बार जहाज पर था, तो उत्साह था। ठीक बजे  रात्रिभोज की घंटी बजी, तो मैं खाने जाने कहा। पर मैं नहीं गया। अपना खाना जो लेकर आया था, वही खाया। जहाज पर एक मजूमदार साहब मिले, जो मुझसे ऐसे बतियाने लगे जैसे सालों से जानते हों। उनके पास काला कोट नहीं था, तो मैनें अपना काला कोट रात्रिभोज के लिए उन्हें दे दिया। उस रात्रिभोज के बाद वो मेरे खास मित्र बन गए। बड़े भाई की तरह। एक अदन से डॉक्टर भी थे। मराठा और भले मानुष। पहले दो दिन मैं साथ लाए कुछ मिष्टान्न और फल ही खाता रहा। फिर मजूमदार जी ने जहाज पर ही खाना बनाने का जुगाड़ बिठाया। मेरे से ऐसे जुगाड़ नहीं बनते। फर्स्ट क्लास में एक अब्दुल माज़िद नामक यात्री था, जो हमारा खानसामा बन गया और क्या लज़ीज भोजन बनाए!

अब कुछ जहाज का बताऊँ। जब हम जहाज पर बैठते हैं, तो भूल जाते हैं कि केबिन और सलून भी जहाज के ही हिस्से हैं। कोई हलचल महसूस ही नहीं होती। इन जहाज के चालकों का कौशल काबिलतारीफ है। जहाज पर कई वाद्ययंत्र थे। मैं अक्सर पियानो बजाता। ताश थे, शतरंज था, जो यूरोपी यात्री खूब खेलते। मैं ताजी हवा के लिए अक्सर डेक पर जाता। गर आप मुखर हैं, तो वहाँ कई लोगों से गप्प मार लेते हैं। पर मैं बस चाँद और तारों की परछाई समंदर के नीले पानी में देखता रहता। पानी के साथ उनकी हलचल को। पहली बार जब मैनें देखा तो लगा कि हीरे गिरे हैं, फिर लगा कि हीरे तो पानी में तैर नहीं पाएँगें। फिर लगा कुछ चमकदार कीड़ेमकोड़े हैं। तभी आसमान की ओर देखा तो समझ गया कि यह पानी में इन टिमटिम करते तारों की परछाई ही हैं। मैं खुद पर हँस पड़ा। इन तारों को देख राजकोट के आतिशबाजी की याद गई, जो देखना मुझे बहुत पसंद था।

कुछ दिन मैनें सहयात्रियों से बात नहीं की। सुबह आठ बजे उठकर नित्यकर्म और स्नान करता। कुछ देशी लोगों को अंग्रेजी शौचालयों में पानी होने से परेशानी थी, वहाँ बस कागज ही होता।

पाँच दिन के बाद जहाज अदन पहुँचा। अब तक जमीन दिखी थी, कोई पहाड़। आखिर छठे दिन जमीन का यह टुकड़ा देख बहुत खुशी हुई। कुछ बच्चे छोटी नाव लेकर जहाज के पास आए, और अंग्रेज उन्हें पैसे फेंक रहे थे। वो गजब के तैराक थे। अंग्रेजों के सिक्के पानी में गिरते, वो गोता मार कर निकाल लाते। काश मैं भी ऐसा तैराक होता। कुछ देर यह तमाशा देख हम अदन घूमने निकले। हमारे पास तो पैसे ही नहीं थे कि इनके लिए फेंकते। हमें यह लगने लगा कि लंदन मँहगा पड़ेगा। तट तक एक मील का भी सफर होगा, और नाव के दो रूपए लग गए। हम अदन के मशहूर फव्वारे देखने के लिए एक बघ्घी पर गए। पर वहाँ समय से पहुँच सके। आखिर कुछ इमारतें और बाजार घूम आए। शहर राजकोट जैसा ही था, पर कोई कुआँ और ही कोई जलाशय। इतनी कड़ी धूप कि पसीने निकल गए। और तो और, एक पेड़, एक हरा पौधा दिखा। हम लाल सागर के करीब थे।

लोग खच्चर पर घूम रहे थे। बस वही वाहन था। तट पर बैठे कुछ बच्चे विकलांग थे। पूछने पर पता लगा कि समुद्री मछलियों ने पैर काट लिए। गरीबी ही दिख रही थी चारों ओर। हमने बघ्घी के एक रूपए दिए, और बारह बजे हमारा जहाज निकल पड़ा। अब बाकी के सफर में हमें शायद जमीन दिखता रहेगा।

शाम तक हम लाल सागर के बीच में थे। यह कड़ी धूप थी पर इतनी भी नहीं जितना बंबई में सुना था। केबिन में जरूर बेतहाशा गर्मी थी, पर डेक तक आते ही ताजी हवा के झोंके आते। लगभग सभी यात्री डेक पर ही सोए, मैनें भी वहीं चादर बिछा दी। इस मौसम में सबसे सुरक्षित हिस्सा यही था, दिन हो या रात। तीन दिन तक यही चला, फिर हम स्वेज़ नहर पहुँचे। वहाँ की रोशनियाँ दूर से दिख रही थी। लाल सागर कहीं चौड़ा था, कहीं इतना पतला कि दोनों तरफ की जमीन नजर आती।

स्वेज़ नहर घुसने से पहले एक सँकड़ा हिस्सा आता हैहिल्स गेट इतना सँकड़ा कि कई जहाज यहाँ डूब भी जाते। एक जहाज के भग्नावशेष नजर भी रहे थे। अब गर्मी खत्म हो रही थी, और ठंड आने वाली थी। कई लोग कहते थे कि अब शराब की जरूरत पड़ेगी या मांस खाना पड़ेगा। गलत कहते थे। स्वेज़ नहर की रोशनी में हमारा जहाज अचानक कितना खूबसूरत हो गया था!

जिसने भी यह नहर बनाई, वो जरूर बहुत ही कुशल व्यक्ति होगा। प्रकृति से लड़कर बनी होगी ये नहर। इस नहर से बस एक जहाज गुजर सकता था, और चालक यह कार्य अपने कौशल से करते। यह नहर बहुत ही गंदी थी, कितनी गहराई थी पता नहीं। मुझे तो यह रामनाथ केअजीनदी की तरह लग रहा था। दोनों तरफ लोग आतेजाते दिख रहे थे। यह नहर फ्रेंच लोगों का था, जो कुछ कर वसूलते। खूब कमाता होगा फ्रेंच इस नहर से। इस नहर से गुजरने में चौबीस घंटे लगते, पर यह रोशनी से भरा रास्ता और धीमे जाता जहाज गजब का अनुभव था। इस नहर से निकलने परपोर्ट सईदआया, जो अंग्रेजों का था। यहाँ अब भारतीय मुद्रा नहीं चलता। हालांकि यहाँ माहौल फ्रेंच था। हम एक दुकान गए, जो पता लगा किकॉफी हाउसहै। गाना बज रहा था। कुछ महिलाएँ संगीत बजा रही थी।

जो नींबू पानी यहाँ बारह पेंस में मिलता, बंबई में एक आना से भी कम में मिलता। हमें लगा कि संगीत मुफ्त है, पर गीत खत्म होते ही एक महिला थाल लिए घूमने लगी। मुझे भी छह पेंस देने पड़े। यह अय्याशों की जगह लगती है। हर पुरूष और स्त्री चालाक नजर आते हैं। एक आदमी अनुवादक बनकर पीछे पड़ गया, पर हमने विनम्रता से मना कर दिया। आखिर इनसे जान छुड़ा कर सात बजे हम जहाज से आगे निकल पड़े।

मेरे एक सहयात्री मि. जेफरी भले मानुष थे। वो कई बार कहते कि चलो टेबल पर कुछ पेय लिया जाए, पर मैं मना कर देता। उन्होनें कहा कि ब्रिंदीसी के बाद ठंड बढ़ेगी। ब्रिंदिसी बंदरगाह बहुत ही खूबसूरत था। जहाज बिल्कुल किनारे जाकर रूका, और हम सीढ़ियों से नीचे उतरे। यहाँ हर कोई इतालवी बोलता है। सड़कें पत्थर की, ढलानदार। हमने स्टेशन देखा, पर वो भारतीय बड़े स्टेशनों के सामने कुछ खास नहीं था। पर ट्रेन के डब्बे बड़े लग रहे थे। हम जैसे ब्रिंडसी पहुँचे, एक आदमी हमारे पीछे पड़ गया और कहा,

सर! चौदह साल की बहुत ही सुंदर लड़की है। चलिए, ले चलता हूँ। पैसे भी ज्यादा नहीं लगेंगें।

पहले आप घबराते हैं, पर इसका उपाय यही है कि बुलंद आवाज में कह दो कि मुझे नहीं जाना, नहीं तो पीछे पड़ जाते हैं। फिर भी दिक्कत हो तो पुलिसवाले को कह दें, या किसी बड़ी इमारत के अंदर घुस जाएँ। लेकिन इमारत का नाम जरूर देख लें। ये नहीं कि कहीं भी घुस गए। बड़े ईमारतों का मतलब किसी बड़े यात्रा एजेंट जैसे थॉमस कुक या हेनरी किंग की इमारतों से है। हाँ! जो दरबान हो, उसे कुछ पैसे दे देने चाहिए। पर यह इमारतें बस तट पर है। शहर के अंदर पुलिस ही ढूँढना होगा। और गलियों में तो भगवान ही मालिक है।

तीन दिन बाद हम माल्टा पहुँच गए, जहाँ जहाज चार घंटे रूकना था। हमारे साथ अब्दुल माजिद आने वाले थे, पर उन्हें विलंब हुआ तो मैं अधीर हो उठा। मजूमदार साहब ने पूछा कि माजिद को छोड़ दें, तो मैनें कहा कि हाँ, ठीक है। हमने ज्यादा इंतजार नहीं किया और चल पड़े। जब लौटे तो माजिद मिले और क्षमा माँगी। मजूमदार साहब ने कहा कि गांधी तुम्हारे लिए नहीं रूका। यह बात मुझे बुरी लगी। मैनें कहा कि गर मजूमदार साहब चाहते तो वह मेरी अनसुनी कर इंतजार कर सकते थे। माजिद यह बात समझ गए पर उस दिन से मेरी मजूमदार साहब से अनबन हो गई। और भी कुछ बातें हुई, कि मैनें मजूमदार साहब की इज्जत करनी छोड़ दी।

माल्टा बेहतरीन जगह थी, पर हमारे पास समय कम था। हम तट पर पहुँचे, तो एक लफंगा मिला जो जबरदस्ती पीछे पड़ गया। खैर, हम चर्च तक जैसेतैसे एक नाव लेकर पहुँचे। चर्च वाकई खूबसूरत था, और हमने अपने गाइड को एक शिलिंग पकड़ाया। वहाँ से हम शहर चले। सुंदर सड़कें और सड़क के दोनों तरफ फुटपाथ। महान इमारतों से सजा सुंदर द्वीप है माल्टा। आर्मरी हॉल में लाजवाब चित्रकारी, और कई पुराने अस्त्रशस्त्र थे। नेपोलियन की बग्घी बहुत सुंदर थी। वहाँ से निकले तो वही लफंगा अपनी दुकान में जबरदस्ती सामान खरीदने कहने लगा। हमने मना कर दिया, तो धमकाने लगा। आखिर मजूमदार ने कुछ खरीद लिया।

वहाँ से हम एक बगीचा घूमने गए, पर वो बेकार था। उससे अच्छे बगीचे तो राजकोट में हैं। वहाँ से लौटे तो मजूमदार कुछ आलू और चाय लेते आए, और हमें एक भारतीय नजर गया। उसके भाई की वहीं दुकान थी। हम वहाँ कुछ सामान खरीदने लग गए, समय निकल गया। कहीं घूम सके। जहाज की ओर लौटे तो फिर वही लफंगा। उसने नाव से जहाज तक ले जाने के ज्यादा पैसे माँगें। काफी जिरह हुई, पर आखिर वही जीता। उसने हमें सचमुच बुरी तरह लूट लिया।

सात बजे शाम हम माल्टा से निकले, बारह बजे रात जिब्राल्टर पहुँच गए। मुझे जिब्राल्टर देखना ही था, तो सुबहसुबह मैनें माजिद और मजूमदार को उठाया और तट पर उतर गए। यहाँ बस हमारे पास डेढ़ घंटे थे। लोग कहते थे कि जिब्राल्टर में सिगरेट सस्ती है। पर इतनी सुबह दुकानें बंद थी। जिब्राल्टर एक बड़े पत्थर पर बना है, और ऊपर एक महल है। पर हम वहाँ इतने कम समय में जा नहीं सकते।

सभी घर एक पंक्ति में बने हैं। और एक से दूसरे घर जाने के लिए चढ़ाई चढ़नी है। मुझे यह बहुत अच्छी संरचना लगी। पर हमें जल्दी भाग कर वापस जाना पड़ा।

वहाँ से तीन दिन बाद हम प्लाईमाउथ पहुँचे। अब ठंड बहुत बढ़ गई थी। अब माँस और शराब के बिना सफर कठिन था, पर मुझे ऐसी कुछ तलब नहीं हुई। लोग कह रहे थे, कि तूफान आया है। मैं देखने भागा भी पर बस एक धुंध थी, कुछ नहीं दिखा। यहाँ से चौबीस घंटे बाद हम लंदन पहुँच गए।

और तिलबरी स्टेशन होते हुए २७ अक्तूबर १८८८  को चार बजे शाम विक्टोरिया होटल पहुँच गए। लंदन।

मैं, मजूमदार और अब्दुल माजिद जब विक्टोरिया होटल पहुँचे तो माजिद ने अकड़ कर संतरी से कहा कि टैक्सी वाले को पूरे पैसे देना। माजिद को लगता था कि वह संतरी से ऊँची हस्ती है, और उससे ऐसे ही अकड़ कर बात करनी चाहिए। जबकि माजिद ने ऐसे कपड़े पहन रखे थे, कि संतरी उससे कहीं अधिक संभ्रांत लग रहा था। उसने अपने सामान भी संतरी से ही उठवाए, पर मैं खुद ही लेकर गया। मैं पहली बार इतने आलीशान होटल में आया था। इतनी चमकदमक मैनें कभी नहीं देखी थी।

मैं हक्काबक्का चुपचाप उन दोनों के पीछे चल रहा था। हमें कमरा मिला, तो सबसे पहले माजिद घुस गया। होटल के कर्मचारी ने पूछा कि दूसरी मंजिल का कमरा दे दूँ। माजिद को लगा कि अब उसका भाड़ा पूछना उसकी तौहीन होगी, और बिना पूछे हाँ कह दिया। मैनेजर ने हाथोंहाथ हम छह शिलिंग रोज का बिल पकड़ा दिया। मैं चुपचाप मुस्कुराता रहा।

अब हमें लिफ्ट से ऊपर जाना था, पर मैनें कभी लिफ्ट देखा नहीं था। होटल कर्मचारी ने कुछ बटन दबाया, मुझे लगा यह ताला है। पर वो कोई घंटी थी, जिसके बजते ही ऊपर वाली मंजिल से लिफ्ट भेजा जाता। एक दरवाजा खुला। मुझे लगा कि यह कोई कमरा है, जिसमें हमें कुछ देर बैठना है। अचानक वो कमरा चलने लगा, और हम दूसरी मंजिल पहुँच गए।

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