भारतीय त्यौहार

Originally written by Mohandas K. Gandhi. Translation by Praveen Jha ‘Vamagandhi’

मार्च, १८९१

अभी ईस्टर का वक्त है तो सोचा कुछ ऐसे त्यौहारों पर लिखूँ, जो इस वक्त भारत में होते हैं, पर उनको समझना आपके लिए शुरूआत में कठिन होगा। इसलिए शुरूआत दीवाली से करता हूँ, जो ईस्टर से काफी बड़ा उत्सव है।

दीवाली हर्षोल्लास के रूप में आपके क्रिसमस के बराबर समझ लें। यह हिंदू कैलेंडर के आखिरी महिनों, या आपके कैलेंडर में नवंबर में आता है। यह सामाजिक और धार्मिक उत्सव है, जो महीना भर चलता है। अश्विन मास (हिंदू कैलेंडर का बारहवाँ महीना) की पहली तारीख को बच्चे पटाखों से खेलकर दीवाली का आग़ाज करते हैं। पहले नौ दिन नवरात्र कहलाता है, जब गरबी खेला जाता है।

बीसतीस लोग मिल कर एक बड़ा घेरा बनाते हैं, और बीच में एक रोशनी के लिए लैंप रखा होता है। वहीं केंद्र में एक व्यक्ति बैठ कर कुछ लोकगीत या छंद कहता है। जैसे वो गाता है, बाकी लोग कुछ झुक कर ताली बजाते वह दोहराते हैं, और गोलगोल घूमते हैं। गरबी सुनने का अलग ही आनंद है।

हालांकि इस गरबी में पुरूष ही होते हैं। महिलाओं की गरबी नहीं होती या अलग से होती है। कुछ परिवारों में व्रत की भी परंपरा है। घर में एक ही व्यक्ति व्रत रख ले, काफी है। यह व्रत रखने वाला बस एक ही वक्त शाम को भोजन करता है। कई लोग फल या कंद दिन में खाते हैं।

दसवाँ दिन दशहरा कहलाता है, जब मित्र एकदूसरे के घर भोजन करते हैं। मिठाई बँटती है। दशहरा को छोड़ बाकी दिन रात को ही उत्सव होता है। दशहरा के बाद कुछ पंद्रह दिन शांति होती है, हालांकि महिलाएँ मिठाई वगैरा बनाने में व्यस्त होती है। भारत में उच्च कुल की महिलाएँ भी भोजन खुद ही बनाती हैं। भारतीय स्त्रियों के लिए पाककला में निपुणता एक गौरव का विषय है।

गीतउत्सव बिताते हम अश्विन मास के तेरहवें दिन पर पहुँचते हैं, जिसेधनतेरसकहते हैं। यह धन की देवी लक्ष्मी की पूजा है। अमीर लोग तमाम गहने, हीरे, जवाहरात, सिक्के एक संदूक में रखते हैं। उसको यह पूजन के लिए रखते हैं, खर्च नहीं करते। कई लोग दूध और जल से सिक्कों को धो कर फूल भी चढ़ाते हैं।

चौदहवाँ दिनकाली चौदशहै। इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठना होता है, और आलसी लोग भी इस दिन सुबह जरूर नहाते हैं। माँएँ बच्चों को जबरदस्ती उठा कर ठंड में नहलातीं हैं। कहते हैं, इस रात श्मशान में भूत घूमने आते हैं। जो भूतप्रेत में विश्वास करते हैं, वो अपने मित्र भूतों से मिलने जा सकते हैं। जो डरपोक लोग हैं, वो कालीचौदश की रात नहीं निकलते।

आह! पंद्रहवां दिन गया और आज दीवाली की सुबह। आज पटाखे फोड़े जाएँगें। आज कोई उधार नहीं देगा, और कोई लेगा। सब लेनदेन एक रात पहले ही निपटाया जाएगा।

आप चौराहे पर खड़े हैं, सामने से एक अहीर दुधियासफेद वस्त्र में चल कर रहा है। अपनी दाढ़ी के किनारे के बालों को सलीके से पगड़ी के अंदर खोंसे, कुछ टूटेफूटे लोकगीत गाते। उसके पीछे गायबैल के झुंड, जिनके सींग लाल और हरे रंगे हैं और चांदी की परत चढ़ी है। उनके पीछे सर पर मटके एक गद्दे पर टिकाए अहीरन महिलाएँ। आप सोचेंगें उन मटकों में है क्या? और तभी छलक कर कुछ दूध गिर पड़ेगा।

तभी एक विशाल काया का आदमी दिखेगा। बड़ी पगड़ी, और मोटी मूँछें। पगड़ी में एक लंबी कलम की डंडी खोंसी हुई। और कमर में एक चांदी कलर का कपड़ा जिस पर स्याहदानी टिकी है। वह साहूकार है।

आज हर तरह के लोग इस उत्सव में सरीक हैं।

रात हो गई है। गलियाँ रोशनी से चौंधिया रही है। आपके  रीजेंट स्ट्रीट या ऑक्सफॉर्ड स्ट्रीट जिसने नहीं देखा, उसके लिए यह सचमुच चौंधियाने वाली है, हालांकि आपके क्रिस्टल पैलेस के समकक्ष शायद बस बॉम्बे में हो। पुरूष, स्त्रियाँ और बच्चे रंगबिरंगे कपड़ों में घूम रहे हैं, जो इस रोशनी में सतरंगी चमक रहे हैं। आज विद्या की देवी सरस्वती की पूजा भी है। व्यापारी आज अपनी बहीखाता फिर से शुरू करते हैं, पहले पन्ने से। पुरोहित ब्राह्मण कुछ मंत्र पढ़ रहे हैं। पूजा समाप्त होते ही अधीर बच्चे पटाखे फोड़ना शुरू कर देते हैं। चूँकि यह एक नियत समय होता है, हर गली के पटाखे एक साथ बजने लगते हैं। जो धार्मिक श्रद्धालु व्यक्ति हैं, वो मंदिर जाते हैं, पर मंदिर में भी आज चमकदमक ही चारों तरफ है।

अगले दिन, यानी नए वर्ष पर सब एक दूसरे के घर जाते हैं। उस दिन रसोई में आग नहीं जलती, और पिछली रात तैयार किया ठंडा खाना कई घरों में खाते हैं। पर खाने की कमी नहीं, कितना भी खाओ, खत्म नहीं कर पाएँगें। जो धनी परिवार हैं, वह तरहतरह के पकवान और सब्जियाँ खरीद कर खाते हैं।

नए वर्ष के दूसरे दिन कुछ शांति होती है। रसोई में आग जलाई जाती है। अब खाना भी हल्का होता है, क्योंकि पिछले दिन गरिष्ठ भोजन था। कुछ शरारती लड़कों के अतिरिक्त अब कोई पटाखे नहीं फोड़ता। अब दिए भी कम जलते हैं। दीवाली अब समाप्त होता है।

अब समझते हैं कि दीवाली के महीने से भारत के समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है, और लोग कैसे अनायास ही कितनी आवश्यक चीजें कर लेते हैं? पहली बात कि परिवार के लोग एक खास स्थान पर मिलजुल लेते हैं। पति पूरे वर्ष भले ही काम की वजह से दूर रहा हो, इस अवसर पर पत्नी से मिलने जाता है। पिता अपने बच्चों से मिलने जाते हैं। बच्चे जो बाहर पढ़ रहे हैं, वो लौट आते हैं। जिससे जो बन पड़ा, नए कपड़े पहनते हैं। धनी लोग नए गहने बनवाते हैं। यहां तक कि पुराने झगड़े भी भुला दिए जाते हैं।

घरों की साफसफाई होती है, रंगाईपुताई भी। पुराने फर्नीचर चमकाए जाते हैं। पुराने कर्ज भी कई लोग उतार देते हैं। लोग अक्सर एक एक नए बर्तन जरूर खरीदते हैं। दानपुण्य होता है। जो लोग धर्म में कम रूचि रखते हैं, वो भी मंदिर जाने लगते हैं, पूजापाठ करते हैं।

त्यौहार के समय कोई झगड़ना नहीं चाहता, और गालियाँ नहीं देता, एक बुरी आदत जो खासकर समाज के निचले तबके में व्यापक है। कम शब्दों में कहें, तो यह शांति और उल्लास का समय है। तो यह जो आपको अंधविश्वास नजर आता है, उसके अंदर कई निहित गुण छुपे हैं जो एक बेहतर समाज के निर्माण में सहायक हैं।

दीवाली की छुट्टियाँ भारत में एक ही समय होती है, पर मनाने के तरीके अलग हैं, तो मेरा विवरण पूरे भारत के लिए एक नहीं। अब आप इसकी बुराइयाँ निकालेंगें तो निकल ही आएँगें, पर बुरे गुणों को परे करना और अच्छे गुणों को देखना ही एक स्वस्थ मानसिकता है।

दीवाली के बाद जो बड़ा त्यौहार है, वो है होली। होली आपके ईस्टर के आसपास के समय में होता है। हिंदू कैलेंडर से फाल्गुण पूर्णिमा के दिन। यह वसंत का समय है। पेड़ों में कोपलें फूट रहे हैं। गरम कपड़े लोगों ने उतार फेंकें। वसंत की सुंदरता मंदिरों में भी नजर आएगी। आप जैसे ही मंदिर में कदम रखेंगें (अभी सिर्फ हिंदू ही प्रवेश कर सकते हैं), आपको फूलों की खूशबू मिलेगी। भक्त ठाकुरजी (भगवान) के लिए सीढ़ीयों पर फूलों की माला गांथ रहे हैं। गुलाब, चमेली, मोगरा। जैसे ही दर्शन के लिए पट खुलेगा, आपको फव्वारे नजर आएँगें। एक अद्भुत् सुगंध। ठाकुरजी हल्के रंग के कपड़ों से आभूषित हैं। फूलमालाओं में छुपे ठाकुरजी को देखना कठिन हो रहा है। उन्हें झूलाया जा रहा है। और झूले में भी हरे सुगंधित पत्ते बिखरे हैं।

मंदिर के बाहर उतनी मर्यादा नहीं। होली के पंद्रह दिन पूर्व अशिष्ट भाषा में बात करते लोग मिल सकते हैं। छोटे गांवों में महिलाएँ कीचड़ में चलती दिखती हैं। उन पर भद्दी टिप्पणियाँ करते लोग। पुरूषों का भी वही हाल होता है। लोगों ने अपने गुट बना रखे हैं। और एक गुट दूसरे गुट से अपशब्दों की प्रतिद्वंद्विता करता है। भद्दे गीतों की। इस द्वंद्व में बस पुरूष हैं, महिलाएँ नहीं।

दरअसल इस महीने में अश्लील बातें करना बुरा नहीं माना जाता। लोग एक दूसरे पर ढेले भी मारते हैं। एक दूसरे पर कीचड़ फेंकते हैं, इसलिए सफेद कपड़े पहनें।  होली के दिन तक तो यह चरम पर पहुँच जाता है। आप घर में हों, या बाहर, अश्लील बातें ही सुनाई देगी। और गलती से किसी दोस्त के घर गए तो पूरे कीचड़ और पानी से नहला दिए जाएँगें।

होली की शाम लकड़ी या गोबर की एक बड़ी ढेर जलायी जाती है। कभीकभी यह ढेर २४ फीट से भी ऊंची, और लकड़ियाँ मोटी होती है। सातआठ दिन तक आग जलती रहती है। आखिर लोग इस पर पानी गरम करते हैं, और वही पानी डाल कर इसे बुझा देते हैं।

आपको मैनें पहले बताया होली में अश्लील वातावरण के संबंध में। पर शिक्षा और सतत विकास के बाद इसमें अब बदलाव रहा है। अमीर और संभ्रांत लोग होली में अश्लीलता नहीं लाते। कीचड़ के बदले रंग का इस्तेमाल करते हैं। बाल्टी भर पानी के बदले छोटी पिचकारी। नारंगी रंग का पानी सबसे अधिक प्रयोग होता है। यहकेसुदा’ * फूल के पत्तों से तैयार होता है। कुछ अधिक अमीर गुलाब जल का भी प्रयोग करते हैं। मित्र और परिवारजन मिल कर भोजन वगैरा करते हैं।

दीवाली और होली में एक पवित्र और अश्लील का अलग ही विरोधाभासी संबंध है। दीवाली कई दिनों के व्रत वाले महीने के बाद आता है, तो उस दिन भोजन का अलग ही आनंद होता है। होली इसके ठीक विपरीत खूब खाएपीए शीतकालीन महीनों के बाद आता है। होली में अश्लील गीत, तो दीवाली में पवित्र मंत्रोच्चार और भजन। दीवाली में ठंडे मोटे कपड़े, तो होली में पतले कपड़े या नंगधड़ंग लोग। दीवाली साल के सबसे अंधेरे दिनों में, तो होली फाल्गुण की रोशन पूर्णिमा में। एक में दिए जलाए जाते हैं, और दूसरे में इतनी रोशनी है कि सब बुझा दिए जाते हैं।

भारत के शाकाहारी

Originally written by Mohandas K. Gandhi. Translated by Praveen Jha ‘Vamagandhi’

(सात फरवरी, १८९१। बाईस वर्ष के युवा की डायरी)

भारत में विभिन्न जातियों और पंथों के ढाई करोड़ लोग बसते हैं। अंग्रेजों में, खासकर उनमें जो कभी भारत नहीं गए, एक आम मान्यता है कि भारतीय पैदाईशी शाकाहारी होते हैं। पर इसका बस एक अंश सत्य है। भारतीयों के तीन मुख्य विभाजन हैंहिंदू, मुस्लिम, और पारसी।

हिंदूओं के चार वर्ण हैंब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। सैद्धांतिक रूप से बस ब्राह्मण और वैश्य शुद्ध शाकाहारी हैं। किंतु प्रायोगिक रूप से सभी हिंदू लगभग शाकाहारी हैं। कुछ स्वेच्छा से, कुछ अनिवार्य रूप से। कुछ माँस खाना भी चाहते हैं, तो वो इतने गरीब हैं कि खा नहीं सकते। भारत के हजारों लोग एक पैसा प्रति दिन पर गुजारा करते हैं। वो रोटी और नमक पर गुजारा करता है। नमक पर भी टैक्स बहुत है। और भारत जैसे गरीब देश में माँस की कीमत लगभग दस पैसे है।

स्वाभाविक प्रश्न ये है कि भारत का शाकाहार है क्या? भारतीय शाकाहार का मतलब अंडा भी नहीं खा सकते। भारतीय मानते हैं कि अंडा खाना भी किसी की जान लेने के बराबर है, क्योंकि अंडे को अगर यूँ ही छोड़ दिया जाए तो उससे चूजा निकल आएगा। पर यहाँ के चरमपंथी शाकाहारियों के विपरीत भारतीय दूध और मक्खन खाते हैं। खाते ही नहीं, बल्कि उसे इतना पवित्र मानते हैं कि हर पूर्णिमा के फलाहार में उच्च कोटि के हिंदू दूधमक्खन ही खाते हैं। क्योंकि वह मानते हैं कि दूध के कारण वह गाय की जान नहीं ले रहे। इतना ही नहीं, दूध दूहना एक गाय के प्रति कोमल व्यवहार है, गोहत्या की तरह क्रूर नहीं। तभी गोपालन भारतीय कविताओं और कला का हिस्सा बन चुका है। यह भी स्पष्ट कर दूँ कि गाय हिंदूओं के लिए पूज्य है, और एक आंदोलन की शुरूआत हो चुकी है जो गायों की हत्या या हत्या के लिए गायों के निर्यात का विरोध करती है।

भारतीय शाकाहार इस बात पर निर्भर करता है कि आप कहाँ रहते हैं। बंगाल में लोग मुख्यत: चावल खाते हैं, और बॉम्बे प्रेसिडेंसी में गेहूँ।

भारतीय वयस्क, खासकर उच्च जाति के, दिन मे दो बार भोजन करते हैं और बीच में आवश्यकतानुसार जल पीते हैं। पहला भोजन सुबह 10 बजे अंग्रेजीडिनरके समकक्ष, और दूसरा रात 8 बजे अंग्रेजीसपरके। हालांकि यह भोजन अंग्रेजी भोजन से अधिक गरिष्ठ हैं। आप गौर करेंगें कि नाश्ता और मध्यान्ह भोजन नहीं है, जबकि भारतीय सुबह चारपाँच बजे ही जग जाते हैं। यह आपको आश्चर्य होगा कि कैसे भारतीय नौ घंटे भूखे रह लेते हैं। इसके दो कारण हैं।

पहला कारण है कि धर्म या कर्म की जरूरतों के हिसाब से दो बार भोजन से अधिक संभव नहीं हो पाता। दूसरा कारण है कि भारत मूलत: एक गरम देश है। ईंगलैंड में भी गर्मियों में लोग कम खाना खाते हैं। भारत अंग्रेजों की तरह व्यंजन अलगअलग नहीं खाते, सब कुछ मिला कर खाते हैं। और हर भोजन बनाने में भी वक्त लेते हैं। उबला भोजन नहीं, बल्कि नमक, तेल, सरसों, मिर्च, हल्दी और इतने मसाले कि उनके अंग्रेजी नाम भी मिलने कठिन होंगें।

पहला भोजन रोटी, दाल, और दोतीन सब्जियों से बनता है। इसके बाद अक्सर लोग खीर, दूध या दही खाते हैं। दूसरा भोजन भी ऐसा ही है पर सब्जियों की संख्या और मात्रा कम होती है। भोजनोपरांत दूध की मात्रा अधिक होती है। पाठक यह ध्यान रखें कि यह भोजन प्रणाली कोई नियम नहीं, और पूरे भारत के लिए भी मान्य नहीं। जैसे मिठाई अमीर लोग हफ्ते में एक बार खाते ही हैं, गरीब नहीं खाते। बंगाल में रोटी से अधिक भात खाया जाता है। मजदूर वर्ग का भोजन भिन्न ही है। अब इतने अलगअलग तरह से लिखूँ तो भारत के व्यंजन बताने में मेरा जीवन कम है।

मक्खन का प्रयोग भोजन बनाने में इंग्लैंड या यूरोप से भिन्न तरीके से होता है। और चिकित्सकीय रूप से देखें तो भारत जैसे गरम देश में मक्खन कुछ ज्यादा खा भी लिया तो स्वास्थ्य पर फर्क नहीं पड़ता।

पाठकों ने गौर किया होगा कि फल का जिक्र तो किया ही नहीं, जो इंग्लैंड में टोकरी भरभर खाते हैं। इसकी एक वजह है कि भारतीयों के लिए फल की महत्ता अलग है। वो खरीद कर फल कम खाते हैं, गरीब तो बिल्कुल नहीं। बड़े शहरों में अच्छे फल बाजार में मिल जाते हैं, छोटे शहरों में नहीं। भारत में हालांकि ऐसे फल भी मिलते हैं जो इंग्लैंड में नहीं मिलेंगें, पर भारत में उनका महत्व भोजनरूप में नहीं। अधिकतर भारतीयों के लिए फल बस फल हैं, उनसे पेट नहीं भरता।

मैनें पिछले लेख में रोटी की बात की थी। रोटी भारत में अक्सर गेंहूँ की बनती है। गेँहू को पहले हाथचक्की में पीसा जाता है। छन्नी से छान कर आटा अलग किया जाता है। पर गरीब बिना छाने भी मोटा आटा खाते हैं। हालांकि दोनों ही आटा अंग्रेजों के ब्रेड वाले आटा से बेहतर होते हैं। इसमें कुछ मक्खन मिलाकर और पानी डाल कर गूदा जाता है। अब इस गूदे आटे के गोले बनाए जाते हैं, लगभग छोटे संतरे के आकार के। एक लकड़ी के गोलाकार डंडे से इसे लगभग छह इंच के आकार में गोल बेला जाता है। एक तवे पर हर टुकड़े को पकाया जाता है। एक रोटी को सेंकने में पाँचसात मिनट तक लग सकते हैं। और फिर बनती है लजीज रोटी जो मक्खन लगा कर खाई जाती है।

आप अंग्रेजों को जितना आनंद माँस खाकर आता होगा, उससे कहीं अधिक हमें यह रोटी खाकर आता है।

अब आप पूछेंगें कि अंग्रेजों के आने से हमारा खानपान बदला या नहीं? इसका जवाबहाँभी है औरनाभी। आम जनता के खानपान में लगभग कोई बदलाव नहीं। बाकी जिसने कुछ अंग्रेजी सीखी, उसने कुछ खानपान अपनाया। पर यह अच्छा हुआ या बुरा, पाठक बेहतर समझते हैं।

खासकर इन नये भारतीयों ने चायनाश्ता करना शुरू किया है। चाय और कॉफी ब्रिटिश राज के बाद अचानक से प्रचलन में गया। चायकॉफी से कोई फायदा तो है नहीं, बस खर्च बढ़ गए। पर सबसे विनाशक पेय जो अंग्रेज लाये, वो है शराब। यह मानवसमाज का दुश्मन और हमारी संस्कृति के लिए अभिशाप बन कर उभरेगा। अब पाठक इसी से अंदाजा लगा सकते हैं कि धार्मिक मनाही के बावजूद यह भारत में चहुदिशा में पसर चुका है। मुस्लिम के लिए शराब छूना भी पाप है, और हिंदुओं के लिए शराब के किसी भी रूप की मनाही है। पर सरकार इसे बंद करने की बजाय बढ़ावा दे रही है।

और इसका सबसे अधिक नुकसान हमेशा की तरह, गरीबों की ही हो रहा है। वो जो भी थोड़ामोड़ा कमाते हैं, शराब में उड़ाते हैं। वह अपने बालबच्चों और परिवार को त्याग कर शराब के नशे में धुत्त मर जाते हैं। आपकी तरफ से बस एक मि. कैनल ने शराब के खिलाफ जंग छेड़ी है, पर वो अकेले क्या कर लेंगें? खासकर जब ब्रिटिश सरकार इस विषय पर निकम्मी और संवेदनहीन हो।

अब तक पढ़ कर आपको लग गया होगा कि भारतीय शाकाहार की अालोचना के आप अंग्रेजों के सभी तर्क बेबुनियाद हैं।

पहला आरोप आप लगाते हैं कि भारतीय शाकाहार मनुष्य को दुर्बल और कमजोर बनाता है।

यह सिद्ध हो चुका है कि भारतीय शाकाहारी औसतन भारतीय माँसाहारियों से और आप अंग्रेजों की अपेक्षा भी बराबर ताकतवर होते हैं। और गर कोई कमजोर है भी तो इसकी वजह निरामिष होना नहीं।

यह बात और है कि भारतीय स्वाभाविक रूप से बलप्रयोग करने वाले व्यक्ति नहीं हैं, और वही आपको कमजोरी नजर आती है। एक प्रथा जो हमारी कमजोरी की जिम्मेदार है, वो है बालविवाह।

अब नौ वर्ष के बच्चे पर वैवाहिक जिम्मेदारी जाए तो वह क्या शरीर का ध्यान रखेगा? भारत में तो कई संस्कृतियों में जन्म के साथ ही विवाह तय हो जाता है। यह एक पारिवारिक वचन होता है। हालांकि पतिपत्नी साथ रहना दस वर्ष के बाद ही प्रारंभ करते हैं। मैनें बारह वर्ष की कन्या को सोलह वर्ष के पति से गर्भधारण करते भी देखा है। आप जिसे पौरूष और शक्ति कहते हैं, यह तो हमारे यहाँ बच्चों का खेल है। अब बताएँ कि कौन कमजोर है?

अब सोचिए बाल विवाह से उत्पन्न बच्चे कैसे होंगें? अब ग्यारह वर्ष के किशोर को जबरदस्ती एक पत्नी का बोझ सर पर लेना पड़े, तो क्या होगा? वो निश्चित अभी स्कूल जा रहा होगा। स्कूल में पढ़ाई के बाद उसे अपनी बालिका पत्नी की भी देखभाल करनी है। हालांकि उसे यह अकेले नहीं करना, वह एक बड़े परिवार का हिस्सा है। लेकिन फिर भी पाँचछह वर्ष बाद बच्चे होंगें, तो उस पर जिम्मेदारी तो आएगी ही। वह पूरे जीवन पिता पर आश्रित तो नहीं रह सकता। अब इस चिंता का असर तो स्वास्थ्य पर पड़ेगा ही। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वो मांस खाते तो बलवान होते। गर ऐसा होता तो क्षत्रिय राजकुमार मांस खाकर भी कमजोर क्यों हैं? जाहिर है कि वजह उनकी अय्याशी है, मांसाहार या शाकाहार कमजोर नहीं बनाता।

अब भारत के अहीर और गड़ेरिये समुदाय को ही ले लें। वह इतने हट्टेकट्टे और तगड़े लोग हैं कि यूरोपी लोग उनके सामने टिकें। वो अपने बाजूओं से बाघ को पकड़ लेते हैं, ऐसे किस्से सुने हैं। वह इसलिए कि वो एक प्राकृतिक और ग्रामीण परिवेश में रहते हैं। लोग कहते हैं कि वह घासफूस खाकर शरीर तो बना लेते हैं पर उनकी बुद्धि कमजोर है। लेकिन इसमें भी वजह मांस नहीं है। वह मांस खाते तो बुद्धि विकसित होती, ऐसा नहीं है। आप बल और बुद्धि को मिलाएँ तो एक शाकाहारी अहीर और मांसाहारी अहीर की तुलना करें, यह नहीं कि कि बल के लिए एक मानक और बुद्धि के लिए दूसरा।

आप जो मर्जी हो, वह खा सकें, यह संभव नहीं है। आप जो खाते हैं, वही आपके शारीरिक और मानसिक विकास में सहयोगी है। हमारे शरीर से जो ऊर्जा खर्च होती है, वही बुद्धि के विकास में भी लगती है। और यह किसने सिद्ध कर दिया कि शाकाहार का विकल्प बस मांस खाना है?

अब क्षत्रियों को ही लें, जो मांस खाते हैं। क्या हर क्षत्रिय तलवारबाज़ है? अगर सभी क्षत्रियों और राजाओं की बात करें, तो मिलाजुला कर यह कमजोर लोग ही हैं। हर क्षत्रिय पृथ्वीराज या भीम नहीं। यह सत्य है कि वह कभी सबसे शक्तिशाली लोग थे, पर अब उनकी शक्ति अय्याशी की वजह से घटती जा रही है। असल वीर लोग अबनॉर्थवेस्ट प्रॉविंसके भाया (भैया) लोग हैं। वो गेहूँ, दाल, और चने खाने वाले शांतिप्रिय लोग हैं। वह आज देश की फौज में हैं।

इसलिए यह बात सही नहीं कि शाकाहारी के पास शक्ति नहीं। आप हमारे हिंदू धर्म के आहार पर जो आरोप लगाते हैं, वो सरासर गलत है।

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पिछले लेख में अापने पढ़ा कि कैसे अहीर (भारवाड) शाकाहारी खाकर भी कितने शक्तिशाली होते हैं। पर यह बात पूरे भारत के अहीरों पर लागू नहीं होती। जैसे इंग्लैंड की हर बात स्कॉटलैंड पर लागू नहीं होती। भारत तो खैर बहुत ही विविध है। पर देखते हैं कि एक अहीर की जीवनचर्या कैसी है?

अहीर सुबह पाँच बजे उठ जाता है। पहला काम वह भगवान की प्रार्थना करता है। फिर मुँहहाथ धोना। इसमें आपको भारत का दंतमंजन भी समझा दूँ। हम ब्रश भी पेड़ की हरी टहनी से ही बनाते हैं, हर रोज ताजी। एक सिरे से दांत से चबाकर हम उसे कोमल रेशेदार बना देते हैं। और तैयार हो जाता है हमारा नयानवेला ब्रश। दांत पूरी तरह चमका कर उसी टहनी को आधा कर हम जीभिया करते हैं। यही हर भारतीय के स्वस्थ दांतों का राज है। आपके मंजन और पेस्ट से बेहतर। और हम फटाफट नहीं करते। आधे घंटे तक दातून करते रहते हैं। दांत को समय देते हैं।

अहीर सुबह बाजरे की रोटी के साथ कुछ मक्खन या बिना मक्खन के भी नाश्ता करते है। सुबह आठ बजे वह अपने मवेशियों को देखने निकल जाता है, जहाँ घर से दोतीन मील दूर पहाड़ी रस्तों से निकल कर जाना होता है। इसलिए वह सुबहसुबह चल भी लेता है, और स्वच्छ हवा भी पाता है। जितनी देर पशु चरते हैं, वो गीत गाता है, और मित्रों से खूब बतियाता है। बारह बजे वह भोजन करता है, जो साथ बांध कर लाया होता है। यह रोटी, दाल, सब्जी, कुछ अचार और एक गिलास दूध होता है।

तकरीबन ढाई बजे यह किसी पेड़ की छाँव में आधे घंटे एक छोटी नींद लेते हैं। यह नींद इन्हें कड़ी धूप से कमछ राहत देती है। छह बजे यह घर लौट आते हैं और सात बजे भोजन। चावल या अधिकतर रोटी, सब्जी और दाल। उसके बाद आराम से खाट पर बैठ कर परिवार वालों के साथ गप्प मारना। और दस बजे सोना। अहीर पुरूष बाहर खुली हवा में सोते हैं। पर ठंड या बरसात में अपने झोपड़ी के भीतर भी।

कब मैं झोपड़ी रहा हूँ, पर यह समझें कि यह आपके घरों से कमजोर है। संभव है खिड़कियाँ कम हो या हो, पर हवा की आवाजाही अच्छी होती है। पर हाँ! इन झोपड़ों के विकास की संभावना तो है ही।

अहीर की जीवनशैली कई मामलों में आदर्श है। नियमित, अनुशासित, खुली हवा में, और प्राकृतिक व्यायाम, जो उन्हें शक्ति देती है। अगले लेख में कहना चाहूँगा इस जीवनशैली की समस्या।

एक अहीर की दिनचर्या में एक ही दोष है, वो है स्नान की कुछ कमी। एक गरम प्रदेश में स्नान अत्यावश्यक है। ब्राह्मण दिन में अक्सर दो बार स्नान करते हैं, वैश्य एक बार, कई अहीर पूर्ण रूपेण स्नान हफ्ते में एक ही बार ही करते हैं। पर मैं यह पहले समझा दूँ कि भारतीय नहाते कैसे हैं?

अमूमन भारतीय अपने गांव के किसी नदी या तालाब में नहाते हैं। अगर नदी आसपास नहीं, या वह डूबने से डरते हों, या आलसी हों, तो वह घर में ही नहा लेते हैं। पर अक्सर वो आप अंग्रेजों की तरह छलांग नहीं मारते, वो पानी में उतरते हैं। या लोटा लेकर नहाते हैं। यह इसलिए भी कि भारतीय मानते हैं कि अगर पानी में छलांग मारो, तो जल पूरी तरह अशुद्ध कर देगा। इसलिए लोटा से अपने मतलब का जल निकालना और किनारे नहाना श्रेयस्कर है। इसी लिए वो बेसिन में भी हाथ नहीं धोते। लोटा में कुछ पानी लेकर किनारे में धोते हैं।

पर स्नान करने से क्या होता है? औसतन यह देखा है कि ब्राह्मणों के मन में बैठ गया है कि स्नान आवश्यक है और इसके बिना वह अस्वस्थ हो जाएँगें।

पर यह सब आदत की बात है। भारत का मेहतर समुदाय पूरे दिन मल में ही कार्यरत है, और स्वस्थ है। वहीं किसी और को उतार दो, एक दिन में अस्वस्थ हो जाए। आप अंग्रेज ही एक दिन ईस्ट इंडिया के मजदूरों की तरह जी लें, आप कुछ ही दिन में मरणासन्न हो जाएँगें।

अब आपको एक दंतकथा सुनाता हूँ। एक राजा को एक महिला से प्रेम हुआ जो अपूर्व सुंदरी थी और दातून बेचती थी। सुंदरी होने के नाते उन्हें राजमहल में जगह दी गयी। सारे सुखसाधन दिये गए। स्वादिष्ट भोजन, सुंदर कपड़े, सब कुछ। पर एक अजीब बात हुई। सुंदरी का स्वास्थ्य दिनानुदिन खराब होता गया। कई वैद्य आए, तमाम औषधियाँ दी गयी, पर कोई सुधार नहीं। तभी एक चतुर वैद्य को रोग का पता लग गया। उसने कहा कि उन पर बुरी शक्तियों का साया है। उनके घर में सूखी रोटियाँ अलगअलग कोनों में रखवायी जाए, और कुछ फल। कुछ दिनों में उनमें सुधार गया। एक गरीब सुंदरी को तमाम स्वादिष्ट व्यंजन नहीं, सूखी रोटियाँ ही पसंद थी।

तो यह आदतों की बात है। एक अहीर को स्नान की कमी उसके ग्रामीण जीवनशैली की वजह से खलती है, आपकी तरह नुकसान पहुँचा पाती है।

अापने पिछले लेखों में पढ़ा कि शाकाहारी अहीर शक्तिशाली होते हैं। लंबी उम्र जीते हैं। एक आदर्श जीवनशैली की वजह से। मैं एक भारवाड (अहीर) महिला को जानता हूँ जो १८८८ . में सौ वर्ष से ऊपर थीं। उनकी दृष्टि और स्मरणशक्ति बहुत अच्छी है। उन्हें बचपन की बातें भी याद हैं। उन्हें बस एक पतली लाठी का सहारा लेना होता है। वो आज भी जीवित ही होंगीं। इतना ही नहीं, आपको कोई गोलमटोल अहीर नहीं दिखेगा, सब तंदरूस्त हैं। बाघ की शक्ति लेकिन एक भेड़ की भीरूता। एक बुलंद अावाज लेकिन डरावनी नहीं। कुल मिलाकर अहीर एक आदर्श शाकाहारी समुदाय है जिनमें आप मांसाहारियों के बराबर शक्ति है।

मैं लंदन कैसे आया?

(Originally written by Mohandas K. Gandhi. Translation by Praveen Jha ‘Vamagandhi’)

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१२ नवंबर १८८८, लंदन

आखिर मैं लंदन क्यों आया? यह सब अप्रिल के अंत में शुरू हुआ। पढ़ाई के लिए लंदन आने के संयोग बनने से पहले ही एक गुप्त जिज्ञासा मन में बन गयी थी, लंदन शहर को जानने की। जब मैं भावनगर के कॉलेज में पढ़ रहा था, तभी मेरी बात जयशंकर बुच से हुई। उन्हीं ने कहा कि जूनागढ़ एस्टेट में अपनी लंदन छात्रवृत्ति की अर्जी डाल दूँ, क्योंकि मैं सौराष्ट्र वासी हूँ। मुझे स्मरण नहीं कि उन्हें क्या उत्तर दिया, पर मुझे यकीन था कि यह छात्रवृत्ति मुझे नहीं मिलेगी। लेकिन मन में लंदन देखने की जिज्ञासा जरूर बैठ गई, और उसके रास्ते तलाशने लगा।

१३ अप्रील १८८८ को छुट्टियों में भावनगर से राजकोट गया। छुट्टी के पंद्रहवें दिन मैं और मेरे अग्रज पटवारी से मिलने गए। वहाँ से लौट उन्होनें कहा कि मावजी जोशी से मिलना होगा। मावजी जोशी ने मेरे और मेरे शिक्षण के बारे में पूछताछ की। मैनें उनको स्पष्ट कह दिया कि प्रथम वर्ष में मेरे लिए उत्तीर्ण होना असंभव सा था। मुझे हर विषय बहुत कठिन लगा। यह सुनते ही उन्होनें भैया को कहा कि

इसे जल्द लंदन भेजना होगा, और वहाँ से पढ़ाई करबार‘ (वकालत) में प्रवेश मिलेगा। कुल पाँच हजार रूपए का खर्च लगेगा। वहाँ कुछ उरद दाल साथ भेज दो, और खुद ही खाना बना लेगा। इससे धर्म भ्रष्ट भी नहीं होगा। यह बात किसी को बताना नहीं। कोशिश करो कि जूनागढ़ या पोरबंदर एस्टेट से कुछ छात्रवृत्ति मिल जाए। अगर मेरे बेटे केवलराम और इस मोहनदास को अगर आर्थिक मदद नहीं मिली, तो घर के कुछ फर्नीचर बेच देना। लेकिन किसी भी तरह मोहनदास को लंदन भेजना ही होगा। तभी तुम अपने मृत पिता की विरासत को बचा पाओगे।

मेरे परिजनों को मावजी जोशी में अटूट विश्वास था। और मेरे अग्रज यह विश्वास नहीं तोड़ना चाहते थे, और मुझे लंदन भेजने की ठान ली। अब अागे की जिम्मेदारी मेरी थी।

उसी दिन मेरे अग्रज ने बात को गुप्त रखते हुए खुशालभाई को सब बता दिया। वह इस बात पर राजी हो गए अगर मैं अपना धर्म भ्रष्ट होने दूँ। फिर मेघजीभाई को भी कह दिया। वह भी राजी हो गए, और मुझे पाँच हजार रूपए की मदद की पेशकश की। मुझे उन पर विश्वास था। पर जब यह बात अपनी माँ को बताया, उन्होनें डाँटा कि ऐसे विश्वास करूँ। जब वक्त आता है, सब पैसे देने से मुकर जाते हैं। शायद वह यह भी मना रही थीं कि यह वक्त आए ही नहीं कि मुझे दूर जाना पड़े।

उसी दिन केवलरामभाई से भी मिलने गया। पर वहाँ कुछ संतोषजनक बात नहीं हुई। वह कह रहे थे कि लंदन के लिए कम से कम दस हजार रूपए चाहिए। इससे मुझे धक्का लगा। उन्होनें यह भी कहा कि,

लंदन जाकर धर्म भूल जाना होगा। तुम्हें माँस खाना होगा, शराब पीनी होगी। उसके बिना जीवन संभव नहीं। तुम जितना खर्च करोगे, उतने ही चालाक बनोगे। यह बनना बहुत जरूरी है, मैं स्पष्ट कहता हूँ। बुरा मत मानना, पर तुम अभी युवा हो। लंदन तुम्हें अपने जाल में फँसाएगा, और तुम फँसते चले जाओगे।

मुझे सुनकर झटका तो लगा पर मैं उन लोगों में नहीं जो कुछ ठान लें, तो कोशिश करें। उन्होनें गुलाम मुहम्मद मुंशी का उदाहरण दिया। मैनें बस यह पूछा कि क्या आप आर्थिक मदद कर पाएँगें। उन्होनें मना कर दिया। उन्होनें कहा कि हर मदद करेंगें, सिवाय धन के। यह बात मैनें वापस आकर भैया को बता दी।

फिर मुझे अपनी माँ को मनाना था, जो मुझे लगता था कि मुश्किल कार्य नहीं। एकदो दिन बाद मैं और मेरे भाई केवलराम जी से मिलने गए, जो काफी व्यस्त लग रहे थे। उनसे वही बातें दुबारा हुई जो पहले भी हुई थी। उन्होनें भैया से कहा मुझे पोरबंदर भेज दें। यह बात हमने मान ली। मैनें लौटकर यह बातें मजाक में माँ से कही। पर यह मजाक अब सच बनने वाला था। मुझे पोरबंदर जाना था।

दोतीन बार मैनें जाने की कोशिश की, पर कुछ कुछ समस्या गई। पहली बार मैं जवेरचंद के साथ निकला, लेकिन एक घंटे पहले ही एक गंभीर दुर्घटना हो गई। मेरा मित्र शेख महताब से रोज झगड़ा होता। जब मैं निकला, तब भी मैं उस झगड़े का ही सोच रहा था। उसने एक संगीत पार्टी रखी थी, जो मुझे पसंद नहीं आयी। साढ़े दस बजे जब पार्टी खत्म हुई, हम मेघजीभाई और रामी से मिलने गए। उस समय मेरे दिमाग में एक तरफ लंदन चल रहा था, और दूसरी तरफ शेख मेहताब का सोच रहा था। उसी उधेड़बुन में एक गाड़ी से टकरा गया, और चोटें आयी। हालांकि मैं चलता रहा, बिना किसी मदद के, पर कुछ मन चिड़चिड़ा सा था।

फिर मेघजीभाई के घर एक पत्थर से टकरा गया, और बेहोश होकर गिर पड़ा। फिर क्या हुआ, मुझे याद नहीं। मुझे लगा कि मैं मर गया। पर पाँच मिनट में मुझे होश गया, और सब आखिर खुश हुए। मेरी माँ को बुलावा भेजा गया, जो काफी चिंतित हो गयीं। मुझे लगा कि मेरी माँ ऐसी हालत में जाने नहीं देंगीं। पर मेरी माँ एक सशक्त महिला थीं। उन्हें बस बाकियों पर भरोसा था। आखिर मैं राजकोट से पोरबंदर गया, पर उस रास्ते में भी कई कठिनाई आयी।

आखिरकार मैं पोरबंदर पहुँच गया। लालभाई और कर्सनदास मुझे घर ले जाने खादी पुल आए थे। अब मुझे चाचाजी से अनुमति लेनी थी, मि. लेली से कुछ आर्थिक सहायता, और अगर छात्रवृत्ति मिले तो परमानंदभाई से कुछ उधार माँगना था। पहले मैनें चाचाजी से पूछा कि वो मेरे लंदन जाने से खुश हैं या नहीं। उन्होनें पूछा कि लंदन जाकर होगा क्या? मैनें अपने तर्क दिए। उन्होनें कहा,

इस पीढ़ी के लोगों को तो पसंद आएगा ही, पर मुझे नहीं पसंद। पर फिर भी हमें आगे का सोचना चाहिए।

मुझे उनका उत्तर अच्छा लगा कि उन्होनें खुल कर असहमति भी जाहिर कर दी, और मेरे तर्कों से सहमत भी हुए।

बदकिस्मती से मि. लेली पोरबंदर में नहीं थे। जब किस्मत खराब हो तो कई समस्यायें जाती हैं। चाचाजी ने मुझे इतवार तक रूकने को कहा। आखिर सोमवार को मेरा साक्षात्कार हुआ। मैं पहली बार किसी अंग्रेज से मिलने वाला था। मुझे शुरूआत में डर लगा पर फिर लंदन का सोचकर मैं बुलंद हो गया। उनसे मेरी बात हालांकि थोड़ी देर ही हुई गुजराती में। वो सीढ़ियाँ चढ़ रहे थे और बात कर रहे थे। कहा कि पोरबंदर एस्टेट के पास पैसे नहीं हैं। उन्होनें कहा कि गर भारत से ग्रैजुएट हो जाऊँ तो कुछ मदद मिल सकती है। मुझे बहुत निराशा हुई। बल्कि ऐसे जवाब की तो मुझे उम्मीद भी नहीं थी।

परमानंदजी भाई पाँच हजार रूपए देने को राजी तो हो गए, पर उनकी शर्त थी कि चाचाजी को मना लूँ। यह काम आसान था। चाचाजी उस दिन व्यस्त थे। मैनें पूछ लिया कि आपने मेरे लंदन जाने के विषय में क्या सोचा? उन्होनें कहा,

मैं उसकी अनुमति नहीं दे सकता। मैं तीर्थयात्रा पर जा रहा हूँ, और यह क्या ठीक होगा कि मैं लंदन जाने की बात पर सहमति दूँ? पर अगर तुम्हारी माँ और भाई राजी हों तो मुझे कोई एतराज नहीं।

मैनें कहा कि जब तक आप नहीं मानेंगें, परमानंदजी भाई पैसे नहीं देंगें। चाचाजी भड़क गए और कहा,

उसे पता है कि मैं मना कर दूँगा। यह उसकी चाल है। वह पैसे देना ही नहीं चाहता। यह सब बहाने हैं।

मैनें जाकर परमानंदजी भाई को सब ज्योंकात्यों बता दिया। वो भी भड़क गए पर मुझे पैसे देने का वादा कर दिया। उन्होनें बेटे की कसम भी खा ली। अब मुझे विश्वास होने लगा कि मैं लंदन पहुँच जाऊँगा।

अब राजकोट में मेरी अनुपस्थिति में क्या हुआ? मेरे मित्र शेख मेहताब, जो अव्वल दर्जे का चालबाज था, ने मेरे नकली हस्ताक्षर कर एक चिट्ठी लिखी। और मेघजीभाई से पाँच हजार रूपए माँगने चला गया, यह कहकर कि मैं माँग रहा हूँ। उन्होनें भी पैसे देने का वादा कर दिया। मुझे कुछ खबर ही नहीं थी।

पोरबंदर से हम राजकोट निकले मेघजी के पिता के साथ, जो गजब के कंजूस थे। राजकोट जाने से पहले मैनें भावनगर जाकर अपने सारे फर्नीचर बेच दिया, मकान खाली कर दिया, और दोस्तों से विदा ली। मकानमालकिन भावविह्वल हो गईं थी।

लेकिन मुझे कर्नल वाटसन से मिलना था। उनके राजकोट आने में एक महीना था, जो गुजारना कठिन था। कई दोस्त कहने लगे कि लंदन जाकर कोई फायदा नहीं। इस एक महीने में मेरी माँ और भाई भी धीरेधीरे अपना मन बदलने लगे, और लंदन जाने से मना करने लगे। लेकिन उन्हें यह भी पता था कि मैं जो ठान लेता हूँ, वो कर लेता हूँ, इसलिए चुप हो जाते। मेघजीभाई तो मजाक भी उड़ाने लगे, और इस एक महीने उन्होनें दुश्मनों की तरह बात की। मेरी माँ बुरा भी मानती, पर मैं उन्हें शांत रहने कहता। मैं भी बुरा नहीं मानता। हालांकि एक महीने बामैं राजकोट से बंबई निकला। शुक्रवार की रात। मुझे स्कूल के मित्रों ने एक अभिवादन दिया। मैं जब उस अभिवादन का जवाब देने स्टेज पर खड़ा हुआ, मैं बोल ही नहीं पाया। थड़थड़ाने लगा। मुझे लगा कि जिंदगी में कभी भाषण नहीं दूँगा। या कुछ भी बोलने से पहले लिख लिया करूँगा। कई लोग अलविदा करने आए थे। पहला स्टेशन था गोंडाल, जहाँ कपूरभाई साथ हुए। ढोला में उस्मानभाई। और भी कई लोग साथ थे।

इक्कीस को मुझे बंबई छोड़ना था, पर वहाँ कई मुश्किलें आई। मेरे जात भाई मुझे जाने ही नहीं देना चाहते थे। सब मेरे विरोध में थे। मेरे भाई कुशालभाई भी। पर मैनें ध्यान नहीं दिया। फिर मौसम भी खराब हो गया। सब मुझे छोड़ कर चले गए। चार सितंबर को अचानक मैं बंबई से रवाना हुआ। उस समय कई लोग स्टीमरक्लाइडपर मुझे छोड़ने आए। पटवारी और शामलाल ने पाँच रूपए दिए, मोदी ने दो रूपए, काशीदास ने एक रूपए, जिन्हें मैं कभी भूल नहीं सकता। मनशंकर ने चाँदी की चेन दी। मैं तीन साल के लिए सबको अलविदा कह रहा था।

कोई और होता, तो इतनी मुश्किलों और विरोध के बाद लंदन जाने की मन्शा शायद त्याग देता। शायद तमाम मुश्किलों के बाद मैं निकला, तभी मुझे लंदन और प्यारा लगने लगा। जब कर्नल वाटसन आए भी, तो कोई मदद नहीं की।

आखिर मेरे जाने की तारीख चार अगस्त तय हुई। पर जा सके। हमने एकएक कर सबसे पैसे माँगें। राजकोट एस्टेट से, कर्नल वाटसन से, ठाकुर साहब से। मैं कभी किसी के सामने इतना नहीं गिड़गिड़ाया था, पर भैया के कहने पर सब किया। और कुछ नहीं मिला।

आखिर दस अगस्त के मैं, शेख मेहताब, नाथूभाई और कुशालभाई निकल पड़े।

मैं राजकोट से बंबई निकला। शुक्रवार की रात। मुझे स्कूल के मित्रों ने एक अभिवादन दिया। मैं जब उस अभिवादन का जवाब देने स्टेज पर खड़ा हुआ, मैं बोल ही नहीं पाया। थड़थड़ाने लगा। मुझे लगा कि जिंदगी में कभी भाषण नहीं दूँगा। या कुछ भी बोलने से पहले लिख लिया करूँगा। कई लोग अलविदा करने आए थे। पहला स्टेशन था गोंडाल, जहाँ कपूरभाई साथ हुए। ढोला में उस्मानभाई। और भी कई लोग साथ थे।

इक्कीस को मुझे बंबई छोड़ना था, पर वहाँ कई मुश्किलें आई। मेरे जात भाई मुझे जाने ही नहीं देना चाहते थे। सब मेरे विरोध में थे। मेरे भाई कुशालभाई भी। पर मैनें ध्यान नहीं दिया। फिर मौसम भी खराब हो गया। सब मुझे छोड़ कर चले गए। चार सितंबर को अचानक मैं बंबई से रवाना हुआ। उस समय कई लोग स्टीमरक्लाइडपर मुझे छोड़ने आए। पटवारी और शामलाल ने पाँच रूपए दिए, मोदी ने दो रूपए, काशीदास ने एक रूपए, जिन्हें मैं कभी भूल नहीं सकता। मनशंकर ने चाँदी की चेन दी। मैं तीन साल के लिए सबको अलविदा कह रहा था।

कोई और होता, तो इतनी मुश्किलों और विरोध के बाद लंदन जाने की मन्शा शायद त्याग देता। शायद तमाम मुश्किलों के बाद मैं निकला, तभी मुझे लंदन और प्यारा लगने लगा।

जहाज ने बजे लंगर डाला। मुझे जहाज यात्रा का कुछ भय था, पर पूरे रास्ते स्वस्थ रहा, उल्टी नहीं हुई। जिंदगी में पहली बार जहाज पर था, तो उत्साह था। ठीक बजे  रात्रिभोज की घंटी बजी, तो मैं खाने जाने कहा। पर मैं नहीं गया। अपना खाना जो लेकर आया था, वही खाया। जहाज पर एक मजूमदार साहब मिले, जो मुझसे ऐसे बतियाने लगे जैसे सालों से जानते हों। उनके पास काला कोट नहीं था, तो मैनें अपना काला कोट रात्रिभोज के लिए उन्हें दे दिया। उस रात्रिभोज के बाद वो मेरे खास मित्र बन गए। बड़े भाई की तरह। एक अदन से डॉक्टर भी थे। मराठा और भले मानुष। पहले दो दिन मैं साथ लाए कुछ मिष्टान्न और फल ही खाता रहा। फिर मजूमदार जी ने जहाज पर ही खाना बनाने का जुगाड़ बिठाया। मेरे से ऐसे जुगाड़ नहीं बनते। फर्स्ट क्लास में एक अब्दुल माज़िद नामक यात्री था, जो हमारा खानसामा बन गया और क्या लज़ीज भोजन बनाए!

अब कुछ जहाज का बताऊँ। जब हम जहाज पर बैठते हैं, तो भूल जाते हैं कि केबिन और सलून भी जहाज के ही हिस्से हैं। कोई हलचल महसूस ही नहीं होती। इन जहाज के चालकों का कौशल काबिलतारीफ है। जहाज पर कई वाद्ययंत्र थे। मैं अक्सर पियानो बजाता। ताश थे, शतरंज था, जो यूरोपी यात्री खूब खेलते। मैं ताजी हवा के लिए अक्सर डेक पर जाता। गर आप मुखर हैं, तो वहाँ कई लोगों से गप्प मार लेते हैं। पर मैं बस चाँद और तारों की परछाई समंदर के नीले पानी में देखता रहता। पानी के साथ उनकी हलचल को। पहली बार जब मैनें देखा तो लगा कि हीरे गिरे हैं, फिर लगा कि हीरे तो पानी में तैर नहीं पाएँगें। फिर लगा कुछ चमकदार कीड़ेमकोड़े हैं। तभी आसमान की ओर देखा तो समझ गया कि यह पानी में इन टिमटिम करते तारों की परछाई ही हैं। मैं खुद पर हँस पड़ा। इन तारों को देख राजकोट के आतिशबाजी की याद गई, जो देखना मुझे बहुत पसंद था।

कुछ दिन मैनें सहयात्रियों से बात नहीं की। सुबह आठ बजे उठकर नित्यकर्म और स्नान करता। कुछ देशी लोगों को अंग्रेजी शौचालयों में पानी होने से परेशानी थी, वहाँ बस कागज ही होता।

पाँच दिन के बाद जहाज अदन पहुँचा। अब तक जमीन दिखी थी, कोई पहाड़। आखिर छठे दिन जमीन का यह टुकड़ा देख बहुत खुशी हुई। कुछ बच्चे छोटी नाव लेकर जहाज के पास आए, और अंग्रेज उन्हें पैसे फेंक रहे थे। वो गजब के तैराक थे। अंग्रेजों के सिक्के पानी में गिरते, वो गोता मार कर निकाल लाते। काश मैं भी ऐसा तैराक होता। कुछ देर यह तमाशा देख हम अदन घूमने निकले। हमारे पास तो पैसे ही नहीं थे कि इनके लिए फेंकते। हमें यह लगने लगा कि लंदन मँहगा पड़ेगा। तट तक एक मील का भी सफर होगा, और नाव के दो रूपए लग गए। हम अदन के मशहूर फव्वारे देखने के लिए एक बघ्घी पर गए। पर वहाँ समय से पहुँच सके। आखिर कुछ इमारतें और बाजार घूम आए। शहर राजकोट जैसा ही था, पर कोई कुआँ और ही कोई जलाशय। इतनी कड़ी धूप कि पसीने निकल गए। और तो और, एक पेड़, एक हरा पौधा दिखा। हम लाल सागर के करीब थे।

लोग खच्चर पर घूम रहे थे। बस वही वाहन था। तट पर बैठे कुछ बच्चे विकलांग थे। पूछने पर पता लगा कि समुद्री मछलियों ने पैर काट लिए। गरीबी ही दिख रही थी चारों ओर। हमने बघ्घी के एक रूपए दिए, और बारह बजे हमारा जहाज निकल पड़ा। अब बाकी के सफर में हमें शायद जमीन दिखता रहेगा।

शाम तक हम लाल सागर के बीच में थे। यह कड़ी धूप थी पर इतनी भी नहीं जितना बंबई में सुना था। केबिन में जरूर बेतहाशा गर्मी थी, पर डेक तक आते ही ताजी हवा के झोंके आते। लगभग सभी यात्री डेक पर ही सोए, मैनें भी वहीं चादर बिछा दी। इस मौसम में सबसे सुरक्षित हिस्सा यही था, दिन हो या रात। तीन दिन तक यही चला, फिर हम स्वेज़ नहर पहुँचे। वहाँ की रोशनियाँ दूर से दिख रही थी। लाल सागर कहीं चौड़ा था, कहीं इतना पतला कि दोनों तरफ की जमीन नजर आती।

स्वेज़ नहर घुसने से पहले एक सँकड़ा हिस्सा आता हैहिल्स गेट इतना सँकड़ा कि कई जहाज यहाँ डूब भी जाते। एक जहाज के भग्नावशेष नजर भी रहे थे। अब गर्मी खत्म हो रही थी, और ठंड आने वाली थी। कई लोग कहते थे कि अब शराब की जरूरत पड़ेगी या मांस खाना पड़ेगा। गलत कहते थे। स्वेज़ नहर की रोशनी में हमारा जहाज अचानक कितना खूबसूरत हो गया था!

जिसने भी यह नहर बनाई, वो जरूर बहुत ही कुशल व्यक्ति होगा। प्रकृति से लड़कर बनी होगी ये नहर। इस नहर से बस एक जहाज गुजर सकता था, और चालक यह कार्य अपने कौशल से करते। यह नहर बहुत ही गंदी थी, कितनी गहराई थी पता नहीं। मुझे तो यह रामनाथ केअजीनदी की तरह लग रहा था। दोनों तरफ लोग आतेजाते दिख रहे थे। यह नहर फ्रेंच लोगों का था, जो कुछ कर वसूलते। खूब कमाता होगा फ्रेंच इस नहर से। इस नहर से गुजरने में चौबीस घंटे लगते, पर यह रोशनी से भरा रास्ता और धीमे जाता जहाज गजब का अनुभव था। इस नहर से निकलने परपोर्ट सईदआया, जो अंग्रेजों का था। यहाँ अब भारतीय मुद्रा नहीं चलता। हालांकि यहाँ माहौल फ्रेंच था। हम एक दुकान गए, जो पता लगा किकॉफी हाउसहै। गाना बज रहा था। कुछ महिलाएँ संगीत बजा रही थी।

जो नींबू पानी यहाँ बारह पेंस में मिलता, बंबई में एक आना से भी कम में मिलता। हमें लगा कि संगीत मुफ्त है, पर गीत खत्म होते ही एक महिला थाल लिए घूमने लगी। मुझे भी छह पेंस देने पड़े। यह अय्याशों की जगह लगती है। हर पुरूष और स्त्री चालाक नजर आते हैं। एक आदमी अनुवादक बनकर पीछे पड़ गया, पर हमने विनम्रता से मना कर दिया। आखिर इनसे जान छुड़ा कर सात बजे हम जहाज से आगे निकल पड़े।

मेरे एक सहयात्री मि. जेफरी भले मानुष थे। वो कई बार कहते कि चलो टेबल पर कुछ पेय लिया जाए, पर मैं मना कर देता। उन्होनें कहा कि ब्रिंदीसी के बाद ठंड बढ़ेगी। ब्रिंदिसी बंदरगाह बहुत ही खूबसूरत था। जहाज बिल्कुल किनारे जाकर रूका, और हम सीढ़ियों से नीचे उतरे। यहाँ हर कोई इतालवी बोलता है। सड़कें पत्थर की, ढलानदार। हमने स्टेशन देखा, पर वो भारतीय बड़े स्टेशनों के सामने कुछ खास नहीं था। पर ट्रेन के डब्बे बड़े लग रहे थे। हम जैसे ब्रिंडसी पहुँचे, एक आदमी हमारे पीछे पड़ गया और कहा,

सर! चौदह साल की बहुत ही सुंदर लड़की है। चलिए, ले चलता हूँ। पैसे भी ज्यादा नहीं लगेंगें।

पहले आप घबराते हैं, पर इसका उपाय यही है कि बुलंद आवाज में कह दो कि मुझे नहीं जाना, नहीं तो पीछे पड़ जाते हैं। फिर भी दिक्कत हो तो पुलिसवाले को कह दें, या किसी बड़ी इमारत के अंदर घुस जाएँ। लेकिन इमारत का नाम जरूर देख लें। ये नहीं कि कहीं भी घुस गए। बड़े ईमारतों का मतलब किसी बड़े यात्रा एजेंट जैसे थॉमस कुक या हेनरी किंग की इमारतों से है। हाँ! जो दरबान हो, उसे कुछ पैसे दे देने चाहिए। पर यह इमारतें बस तट पर है। शहर के अंदर पुलिस ही ढूँढना होगा। और गलियों में तो भगवान ही मालिक है।

तीन दिन बाद हम माल्टा पहुँच गए, जहाँ जहाज चार घंटे रूकना था। हमारे साथ अब्दुल माजिद आने वाले थे, पर उन्हें विलंब हुआ तो मैं अधीर हो उठा। मजूमदार साहब ने पूछा कि माजिद को छोड़ दें, तो मैनें कहा कि हाँ, ठीक है। हमने ज्यादा इंतजार नहीं किया और चल पड़े। जब लौटे तो माजिद मिले और क्षमा माँगी। मजूमदार साहब ने कहा कि गांधी तुम्हारे लिए नहीं रूका। यह बात मुझे बुरी लगी। मैनें कहा कि गर मजूमदार साहब चाहते तो वह मेरी अनसुनी कर इंतजार कर सकते थे। माजिद यह बात समझ गए पर उस दिन से मेरी मजूमदार साहब से अनबन हो गई। और भी कुछ बातें हुई, कि मैनें मजूमदार साहब की इज्जत करनी छोड़ दी।

माल्टा बेहतरीन जगह थी, पर हमारे पास समय कम था। हम तट पर पहुँचे, तो एक लफंगा मिला जो जबरदस्ती पीछे पड़ गया। खैर, हम चर्च तक जैसेतैसे एक नाव लेकर पहुँचे। चर्च वाकई खूबसूरत था, और हमने अपने गाइड को एक शिलिंग पकड़ाया। वहाँ से हम शहर चले। सुंदर सड़कें और सड़क के दोनों तरफ फुटपाथ। महान इमारतों से सजा सुंदर द्वीप है माल्टा। आर्मरी हॉल में लाजवाब चित्रकारी, और कई पुराने अस्त्रशस्त्र थे। नेपोलियन की बग्घी बहुत सुंदर थी। वहाँ से निकले तो वही लफंगा अपनी दुकान में जबरदस्ती सामान खरीदने कहने लगा। हमने मना कर दिया, तो धमकाने लगा। आखिर मजूमदार ने कुछ खरीद लिया।

वहाँ से हम एक बगीचा घूमने गए, पर वो बेकार था। उससे अच्छे बगीचे तो राजकोट में हैं। वहाँ से लौटे तो मजूमदार कुछ आलू और चाय लेते आए, और हमें एक भारतीय नजर गया। उसके भाई की वहीं दुकान थी। हम वहाँ कुछ सामान खरीदने लग गए, समय निकल गया। कहीं घूम सके। जहाज की ओर लौटे तो फिर वही लफंगा। उसने नाव से जहाज तक ले जाने के ज्यादा पैसे माँगें। काफी जिरह हुई, पर आखिर वही जीता। उसने हमें सचमुच बुरी तरह लूट लिया।

सात बजे शाम हम माल्टा से निकले, बारह बजे रात जिब्राल्टर पहुँच गए। मुझे जिब्राल्टर देखना ही था, तो सुबहसुबह मैनें माजिद और मजूमदार को उठाया और तट पर उतर गए। यहाँ बस हमारे पास डेढ़ घंटे थे। लोग कहते थे कि जिब्राल्टर में सिगरेट सस्ती है। पर इतनी सुबह दुकानें बंद थी। जिब्राल्टर एक बड़े पत्थर पर बना है, और ऊपर एक महल है। पर हम वहाँ इतने कम समय में जा नहीं सकते।

सभी घर एक पंक्ति में बने हैं। और एक से दूसरे घर जाने के लिए चढ़ाई चढ़नी है। मुझे यह बहुत अच्छी संरचना लगी। पर हमें जल्दी भाग कर वापस जाना पड़ा।

वहाँ से तीन दिन बाद हम प्लाईमाउथ पहुँचे। अब ठंड बहुत बढ़ गई थी। अब माँस और शराब के बिना सफर कठिन था, पर मुझे ऐसी कुछ तलब नहीं हुई। लोग कह रहे थे, कि तूफान आया है। मैं देखने भागा भी पर बस एक धुंध थी, कुछ नहीं दिखा। यहाँ से चौबीस घंटे बाद हम लंदन पहुँच गए।

और तिलबरी स्टेशन होते हुए २७ अक्तूबर १८८८  को चार बजे शाम विक्टोरिया होटल पहुँच गए। लंदन।

मैं, मजूमदार और अब्दुल माजिद जब विक्टोरिया होटल पहुँचे तो माजिद ने अकड़ कर संतरी से कहा कि टैक्सी वाले को पूरे पैसे देना। माजिद को लगता था कि वह संतरी से ऊँची हस्ती है, और उससे ऐसे ही अकड़ कर बात करनी चाहिए। जबकि माजिद ने ऐसे कपड़े पहन रखे थे, कि संतरी उससे कहीं अधिक संभ्रांत लग रहा था। उसने अपने सामान भी संतरी से ही उठवाए, पर मैं खुद ही लेकर गया। मैं पहली बार इतने आलीशान होटल में आया था। इतनी चमकदमक मैनें कभी नहीं देखी थी।

मैं हक्काबक्का चुपचाप उन दोनों के पीछे चल रहा था। हमें कमरा मिला, तो सबसे पहले माजिद घुस गया। होटल के कर्मचारी ने पूछा कि दूसरी मंजिल का कमरा दे दूँ। माजिद को लगा कि अब उसका भाड़ा पूछना उसकी तौहीन होगी, और बिना पूछे हाँ कह दिया। मैनेजर ने हाथोंहाथ हम छह शिलिंग रोज का बिल पकड़ा दिया। मैं चुपचाप मुस्कुराता रहा।

अब हमें लिफ्ट से ऊपर जाना था, पर मैनें कभी लिफ्ट देखा नहीं था। होटल कर्मचारी ने कुछ बटन दबाया, मुझे लगा यह ताला है। पर वो कोई घंटी थी, जिसके बजते ही ऊपर वाली मंजिल से लिफ्ट भेजा जाता। एक दरवाजा खुला। मुझे लगा कि यह कोई कमरा है, जिसमें हमें कुछ देर बैठना है। अचानक वो कमरा चलने लगा, और हम दूसरी मंजिल पहुँच गए।