ज्वेल थीफ

इटली-यात्रा जिसने भी करी हो, पूरा वापस नहीं आया होगा. लुटना तय है। चाहे आपका अजीज कैमरा हो, या गॉगल्स। कुछ न कुछ इटली माता को चढ़ा के ही आना होगा। और ये कोई राजनैतिक व्यंग्य नहीं है, और न ही सिसली के किसी डॉन की कहानी। ये छिटपुट जेबकतरों और शौकिया चोरों से जुड़ी है। ये चोर आप में भी हो सकता है। गर अब तक नहीं करी तो आज कर लो। योजना बनाओ और ऐसे चुराओ की पकड़े न जा सको। कोई सबूत, कोई गवाह मत छोड़ना।

मैनें पहली चोरी कब की, क्यूँ की, याद नहीं, पर पकड़ा जरूर गया और खूब चपेत भी पड़ी। दूसरी दफा कुछ अक्ल आ गई थी, और एक मँजे चोर से मित्रता भी हुई। पढ़ाई-लिखाई का शौक था, भला जूते चुरा कर क्या करता? एक मित्र की नयी नवेली ‘वैशाली’ ब्रांड की सादी नोटबुक चुरा ली। अजी क्या कड़क पन्ने थे! पर जब भी लिखता, डरा रहता। जैसे कोई पास आता, झट से कूल्हों के नीचे दबा मुस्कुराने लगता। एकदम चोरों वाली हँसी। कभी नोटबुक को कक्षा में नहीं ले जाता। हमेशा बिस्तर के नीचे दबा के रखता।

पर जिनकी नोटबुक चोरी हुई, उन्होंने जासूस रख लिया। छात्रावास के हर लड़के की तलाशी शुरू हुई। कईयों के पास वैसी ही नोटबुक थी, पकड़े तो पकड़े कैसे? पर जैसे ही मेरे पास आया, मेरी जबान लड़खड़ाने लगी। जासूस ने भाँपा और देखा बिस्तर में एक उभार है। झट से नोटबुक खींच ली। बड़ी जिल्लत हुई। वहीं चपेत लगा देता, बुरा-भला कह देता, और बात थी। सबसे चाटू (boring) शिक्षक के पास ले गया। अटल गाँधीवादी। उनके नीति वचन घंटे भर चले। मैं चक्कर खा कर गिर पड़ा।

फिर लगा, चोरी भी एक कला है। चार्ल्स शोभराज पर किताब ले आया और भूरे गत्ते लगा कर पढ़ने लगा। नटवरलाल भी पढ़ डाला और जासूसों से टकराने के लिये शर्लॉक होम्स भी। अब चोरी बिल्कुल फूलप्रूफ होनी चाहिये. और आक्रमण भी बड़ा। पुणे की एक सबसे व्यस्त बेकरी की रेकी करनी शुरू की। वहाँ के बन-मस्के (bread-butter) बड़े मशहूर थे। जन्मदिन की पार्टी वहीं तय कर दी। सब खाये-पीये चल दिये। मैंनें दुकानदार की ओर विजयी मुस्कान दी और भाग कर मित्र की मोटरसाइकल पर बैठ गया। क्या लूट मचाई बन-मस्के की! पर एक खौफ दिल में पैठ गया। हजारों लोग रोज आते-जाते पर मेरी उस रस्ते से गुजरने की हिम्मत न होती।

किस्मत ही बुरी थी। नयी नवेली प्रेमिका को उसी बन-मस्के का शौक। मैं चाँद ला के दूँगा। न जी! बस वो बन-मस्का। कभी-कभी शक होता वो भी कोई भेदिया जासूस तो न थी। खैर, पुस्तकालय से देर निकले और अंधेरे में जैसे-तैसे पहुँचा। दुकानदार स्वभावत: मुस्कुराया और मेरी घिघ्घी बंध गयी। खुद ही बोल पड़ा, आपके पैसे देना भूल गया था। उसने भी शरारती निगाहों से देखा, और प्रेमिका ने शक की निगाहों से।

ऐसे ही कुछ और छोटे-मोटे हादसे हुए। उस जमाने में भी चाहे शोरूम से चड्डी चुरा कर भागो, ‘बीप’ जरूर बजता। बड़ी बेइज्जती होती।लगता कहाँ शैक्षिक नोटबुक की चोरी से चड्डी तक आ गया। चोर तो न बन सका, चोरी का स्तर भी निम्नतम। यहाँ तक कि ट्रेन में बाजू वाले का अखबार उठा कर पढ़ने लगा, वो भी चोर समझ बैठा।

शायद चोर भी भगवान बनाकर भेजते हैं। हर गधा चोर नहीं बन सकता। गधा क्या, मेरे जैसा शातिर भी नहीं। दुबारा समझा दूँ, गधा बस उपमा है। आप किसी गधे को नहीं पढ़ रहे। पता नहीं क्यूँ आपकी नजर भी उसी बन-मस्के वाले की याद दिलाती है जो मुझ पर मंद-मंद मुस्किया रहा था।

हमारे गाँव से कुछ दूर चोरों की बस्ती है। जब गाँव में छिट-पुट चोरी हुई तो मुखिया ने उनको बुलावा भिजवाया। सब चोर इकट्ठे हुए। गर्मी की छुट्टियाँ थी। मैं भी पंचायत में बैठा। अब चोरों की बात भी ठीक थी। यही उनका skill था। यही रोजी-रोटी। जो हम नहीं कर सकते, वो चुटकी में करते हैं। आखिर ये तय हुआ, हम चोरों को ५ रूपया प्रति घर देंगें। ताकि उनका चूल्हा जलता रहे। मीटिंग समाप्त हुई, तो मुखिया जी का चाँदी का पनबट्टा गायब। चोर झट से मुस्कियाते वापस कर गये। जी, हम तो कला दिखा रहे थे, अब चोरी करेंगें भी तो शौकिया प्रेक्टिस में।

अगली छुट्टियों में गया, तो चोरियाँ बंद। चोर आते, साथ चाय पीते और ५ रूपया लेकर जाते।

इच्छा होती इन चोरों से कुछ ट्रिक सीख लूँ। बस एक वो फिल्मी अंदाज में ‘लास वेगास’ के कैसिनो लूटने या लंदन से कोहिनूर उड़ाने की इच्छा है।

#experiments_with_truth@vamagandhi

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