जलदंड

कभी धोती-कुर्ते और अचकन का जमाना था. बड़ी फजीहत थी. औरतें और धोबी कपड़ों पर अपनी भड़ांस लकड़ी के मुग्दल मार-मार निकालते. रोज-रोज का मैल और रोज की किरकीरी. फिर कुछ सादी धारियों वाले विदेशी सूती और टेरीकॉट कपड़े आने लगे. मैल उन धारियों में कुछ छुपने लगे. ऊपर एक बंडी या छोटी जैकेट डाल लो, तो मैल छू मंतर. 

ये शायद वो दौर भी रहा हो जब लोगों ने ब्रह्म-काल के शीत-स्नान बंद कर दिये हों. आराम से दुपहरिया की धूप में बदन पर तेल चपोड़ कर गरमाते हों, और फिर नहाते हों. कुछ रईस पानी खौलाते, फिर उंगली डाल-डाल कर सही तापमान का इंतजार करते. 

मुझे जब कपड़ों का पहला शौक हुआ, गाढ़े रंगों के चेक-शर्ट का जमाना आ चुका था. गाढ़ी नीली और काली धारियों के चेक-शर्ट. शौकीन हो तो हरे और लाल धारियाँ. कपड़े भी कुछ वेल्वेटी मोटे से होने लगे. अब तो महीना भर एक ही शर्ट पहन लो, तो भी मैल ढूँढते न बने. हाँ, सूंघ लो तो हल्की बेहोशी आ जाएगी. 

इसी जंग में ‘पीटर इंग्लैंड’ के एक ही रंग के गहरे नीले-हरे शर्ट भी आ गये. परशुराम धोबी एक-एक कपड़े से मन भर मैल निकालता, पर रंग ज्यों-का-त्यों. अब तो हद हो गई थी. खाकी पैंट ६ पॉकेट वाले. जितनी मरजी मैली करो, कम पड़े तो पॉकेट भी भर लो. 

इसमें मेरी कोई कमजोरी नहीं. दौर ही कुछ ऐसा था. खामख्वाह जल की बरबादी क्यों? कपड़े भी मैले नहीं, बदन भी गेहुँआ से गोरा होना असंभव, दो फुस्स-फुस्स डियोडॉरेंट मार लो और पाउडर से नहा लो. ताजगी आ जाएगी. अगर ब्राह्मनत्व की रक्षा करनी हो, तो गंगाजल के दो-चार बूँद और छिड़क लो. 

वैसे भी स्नान एक जनाना शौक है. जब पुरूषों को खुले में नहाने में शर्म आने लगी तो स्नान और दुर्लभ हो गया. स्त्रियाँ घर के सारे स्नानघरों पर घंटों कब्जा कर बैठती. जैसे पुरूषों का ये पाप भी खुद ही निवारण कर रही हो, अधिक नहा कर. औद्योगिक जगत भी उनके स्नान-समय को ‘फुल-कोर्स मील’ बनाता चला गया. बालों के शैम्पू, कंडीशनर, हेयर-ड्रायर. साबुन के भी ठोस और द्रव रूप. पैरों के अलग हिसाब किताब. स्नान न हुआ, पी.एच.डी. हो गई. 

विदेशों में तो फिर भी बिकनी पहन सीधे तालाब में छलांग लगा दें. प्रेम-प्रलाप करें. तो आदमी नहाने में आनंद भी ले. शॉवर लें, जकुज्जी में धीमें संगीत सुनें. बाल्टी-मग्गे का तो स्नान ही हमें तीसरी दुनिया में ले जाता है. जैसे हर बूँद नाप-तौल के दी गई हो. जितने मग नहाने हो, उतने ही नहाओ. जाओ, मैं नहीं नहाता. गरीब को दो बुँद पानी ज्यादा मिलेगी, दुआ ही देगा. बाथरूम से काँपते निकलो, तो किसी को शक भी न हो. एक मग्गे जल से ही चमक गया.  

चिकित्सक बना तो जिम्मेदारी बढ़ गई. लोग-बाग उलाहना देने लग गये. जैसे स्वास्थ्य और स्वच्छता का मैंनें सरकारी ठेका ले रखा हो. मेरे नहाने से देश स्वस्थ हो जाए तो गंगा नदी में ऊकड़ूं मारकर बैठूं. खासकर महिला मित्र जरूर नाक-भौं सिकोड़ती. लो आज नहा लिया, तो ले लो गुलाब. कुछ बदलने नहीं वाला मेरे नहाने से. न मेरा. न देश का.

2 thoughts on “जलदंड

  1. Good comment on taking d bath.yeah.ladies do p.h.d.in baath room.aap to deodorent aur talcum powder se kaam chalaa le.chamak uthenge.paani bachaao abhiyaan me aapka imaandari wala sahyog hoga.must cheej likhi he aapne.

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