पुरूष परीक्षा

फेसबुक पर सुबह-सुबह किसी नारी-सशक्तिकरन का पोस्ट देख कुछ ठोस कदम उठाने की सोची. धर्मपत्नी को मुनादी सुना दी कि हर इतवार घर के काम में ५० प्रतिशत हाथ बँटाउंगा. उन्होनें सुझाव दिया शुरूआत २५ प्रतिशत से करूँ. हौसला बुलंद था. ४० प्रतिशत पे समझौता हुआ. 

चाय मेरे से अच्छी बनती नहीं, इसलिये वो विभाग मेरे पोर्टफोलियो में नहीं था. मैंने कहा कुछ ऐसा काम करूँ जिसमें योजना हो, तर्क हो, संघर्ष हो. ऐसे दो ही कार्य थे, घर के सारे कपड़ों की धुलाई और घर की सफाई. मैंने भी अपनी योजना वाली डैशबोर्ड निकाली, और उसपे ‘टारगेट’ और ‘इम्प्लिमेंटेशन’ लिख डाला. घर का बाकायदा ‘मैप’ बनाया, और सफाई की योजना ऐसे तैयार करने लगा जैसे युद्ध की तैयारी हो रही हो.

अस्त्र-शस्त्र तैयार हुए. यूरोप में हूँ और तकनीकी व्यक्ति हूँ. झाड़ू-पोछे से ऊपर उठकर बोफोर्स जैसे आधुनिक वैक्यूम-क्लीनर से लैस हूँ. फर्श के लिये चौड़े मुँह वाले अस्त्र और कोनों के लिये पतले नौजल. एक मुआयना कर गंदगी का सिंहावलोकन किया, और योजना तैयार हो गई. बिस्तरों और सोफे के नीचे गंदगी की सघनता अधिक हैं, लेकिन पूरे घर के क्षेत्रफल में बिखरे कणों को भी कम नहीं आंक सकते. यानी प्रति वर्ग मीटर फॉर्मूला नहीं चलेगा. 

योजनाएँ ध्वस्त हो रही थी, और देखते ही देखते सुबह के ३ घंटे साफ हो गये. फिर सोचा कपड़े वाला कार्य सुलभ और सुनियोजित है. वाशिंग मशीन में डालो और बटन दबा दो. पर कपड़ों के अम्बार जब धर्मपत्नी जी ने दिखाए, हिम्मत डगमगाने लगी. मैनें कहा, ये ४० प्रतिशत से ज्यादा कार्य है. मैं कपड़े मोड़ना देख लूँगा, आप धोना संभाल लो. धर्मपत्नी ने हामी भरी तो मैनें भी विजयी मुस्कान दी. मुझे क्या पता था ये घाटे का सौदा है.

कपड़े गोल या चौकोर होते तो मोड़ना सुलभ होता, यहाँ तो हर कपड़े के लिये अलग ‘एल्गोरिथ्म’. सिर्फ बच्चों के कपड़ों में पसीने से तर हो गया. अथाह थे. धर्मपत्नी ने अवगत कराया, बच्चे एक दिन में ४-६ बार कपड़े बदलते हैं. स्कूल के, खेलने के, घर के, सोने के, और बाकी खाना गिरने, भींगने या अन्य आपदाओं के अलग. 

वैक्यूम करते-करते शाम हो गई. धर्मपत्नी अपना ६० प्रतिशत सब कुछ कब का निपटा टी.वी. देख रही थी, और कभी घंटों टेलीफोन पर देश-विदेश खेल रहीं थी. मेरे तो सांस फूल रहे थे, और गंदगी अब भी कोनों से घूर रही थी. कार्य ही गलत चुने. खाना बनाना ही चुन लेता, तो ये पापड़ नहीं बेलने पड़ते. 

न फेसबुक, न ब्लॉग, न टी.वी., न तफरी. नारी-सशक्तिकरण ने जैसे जिंदगी निचोड़ ली. मन की शांति के लिये घर के छोटे मंदिर के पास जाकर बैठ गया. देखा, देवतागण मुस्कुरा रहे हैं. विष्णु शैया पर गाड़ी की चाभी घुमाते बैठे हैं. महादेव मुस्कुराते चिंतन में. मैं भी आकर सोफा पर लेट गया. ब्लॉग-ब्लूग लिखने लगा. 

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