बस यूँ ही, मेरे मन की.

यूँ तो मैं हिंदी में कुछ खास लिखता नहीं, बचपन से वही मिडिल क्लास वाली अंग्रेजी की कवायद. लेकिन आज़ ज़रा देशी मामला है, और ये ब्लोग-स्लोग में तो क्या गोरे और क्या पाकिस्तानी? कोई भी मुँह उठा के लाइक करने आ जाता है. धर्मपत्नी जी भी परेशान, कि ये किन लड़कियों के कमेंट्स पढ़ मुस्कुराते रहते हो? मैने कहा ऐसा नहीं है. आधा वामपंथी, आधा गाँधीवीदी है ये वामगाँधी. निर्मोही. निर्विकार.

तो प्वाइंट पे आता हूँ.

ये किसी छिटपुट बात के बतंगड़ पे किसी गाँव में कोई हादसा हो गया. कुछ खाने पीने का मामला था. छुटपन में हॉस्टल के मेस में मैनें भी काफी तोड़-फोड़ मचाई थी. खानसामें मेघलाल की लुंगी खींच चड्डी में दौड़ाया था. साले ने तूर दाल ऐसी बनाई की चार गोताखोर डाले फिर भी दाल का दाना नहीं. जीभ मत लपलपाओ अब तूर दाल के नाम पे. मेरा ब्लोग तो सस्ते में पढ़ रहे हो ना? और जकरबर्ग मियाँ अमरीका वाले ने चाहा तो बिल्कुल मुफ्त.

हाँ जी तो हम कहाँ थे? वो कुछ वही बजरंग बली के भक्तों ने मोहम्मद साब के चेले को…. फिर कान खड़े हो गये? अबे सिनेमाखोरों, ‘बजरंगी भाईजान’ की कहानी नहीं सुना रहा मैं! ये तो ग्लैमर-स्लैमर से कोसों दूर गाँव-साँव का मामला है.

खैर. तसल्ली है. भुखमरी से न मरा कोई. बढिया माँस-मुँस खा के डकार के मरा. मेरे अस्पताल में तो वो खडूँस डाइटिसीयन है. आधे तो वो गीली खिचड़ी और उबले कद्दू खा के सिधार गये.

सुनते हैं, बड़ी तादाद में लोग बाग आये. मरने से पहले भी. मरने के बाद भी. अजी गाँधीजी को एक गोडसे ने निपटा दिया था. पर ये लॉजिक बेकार है. वो ठहरे गोमूत्र पीने वाले शाकाहारी जब तब भूख हड़ताल वाले कंकालनुमा व्यकतित्व. और इधर तो गोमाँस वाला हट्टा कट्टा. खैर ये गाय वाय से दूर ही रहना ठीक. आदर करो या निरादर. मारे दोनों सूरतों में जाओगे. न गाँधी बचे न वो बचा.

अखबार में ये पुरष्कार वापसी का दौर आया तो मैंनें भी बचपन के क्विज डिबेट वाले अवार्ड ढूँढे. ये चिंदीचोर लेखक. अवार्ड वापस करने गये तब लोगों को पता लगा कि ये है कौन जनाब. इनसे ज्यादा तो मेरे ब्लोग के फौलोवर निकलें. मेरे क्या आपके भी. देशी कोई पढता कहाँ है? हाँ पीते बहोत है.

अब जो हुआ वो तो हो गया. मैं नहीं करता कुछ वापिस. मेरे जैसे बिरले ही मिलेंगे. आज भी स्याही वाली कलम से लिखता हूँ. अजी दवात से वो कलम में स्याही डालने का मज़ा ही कुछ और है. अब स्याही पोतने का तो तजुर्बा नहीं. हा हा हा हा.

16 thoughts on “बस यूँ ही, मेरे मन की.

  1. This is beautiful!

    To save hard work of transcription I am writing in English–so please pardon me 🙂

    I didn’t understand the Zuckerberg joke here. The blog is free because of WP and not FB. Maybe you share your posts in full on FB?

    Thanks for sharing!

    Love and light ❤

    Anand 🙂

    1. He is launching internet.org for free access in rural areas. WordPress may chip in, if agrees. Rest I just wrote in flow of digital India initiative which would bring such free internet may be.

  2. अपने बड़ी सरलता से सभी संबेदनशील् मुदों को रखा है
    ब्यांग की बात ही अलग होती है ।
    बहुत कुछ कह जाती है हँसते हंसते

  3. ब्रिलियंट बौलिंग ‘डाक-शाब’…. न तेरा, न मेरा…. ये तो ‘तीसरा’ है….

  4. Bilkul sahi. Yeh gai wai ke chakkar se duur hi rehna behtar. Aadar karo ya niraadar. Hahaha, spot on.

    Waise award toh hum bhi wapas karna chahte the. Par yaar ek do award hi toh mile hain poori zindagi mein. Chammach mein kanche sabse jaldi bina giraye lekar jane mein third prize tha. Usey doston ke saamne merit excellency award kehkar seena chauda karte hain. Ab woh kaise lauta dein? 😀

  5. Har shabd main ek laafa hai
    Har line main ek gussnsa hai

    Ek hi post main kitne topic cover karte ho ?

    😂😂

    Loved each line every word,
    Never saw such a straight forward personality,
    My compassion with all your dear ones !☺

  6. shukriya mere post ko like karne k liye. ap bahut badhiya likhte hain …kafi dino baad hindi padhne me maza aaya. Ya yun kahiye hindi mano kahin gayab hi hoti ja rahi hai hamari parampara se 😦 desh se :(. to aj jo mai khilkhial kar hasi wo sach me desi thi 😉 .

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