पाकिस्तान एपिसोड 5

लोकतंत्र का दिया बुझने से पहले एक बार फड़फड़ाया। भारत में भले ही एक मजबूत विपक्ष के खड़े होने में दशकों लग गए, और एक पार्टी ही लगभग बिना किसी विरोध के जीतती रही; पाकिस्तान में मजबूत विपक्ष तैयार हुआ। मुस्लिम लीग, जिसने पाकिस्तान बनाया, अपने दो मुख्य नेताओं के मरते ही, बिखरने लगी। किंतु एक समस्या थी।

पाकिस्तान एक दशक तक गणतंत्र नहीं बना था, और ब्रिटिश डोमिनियन का हिस्सा था। तकनीकी तौर पर उसकी महारानी एलिजाबेथ थी, जैसे ऑस्ट्रेलिया या कनाडा की होती है। पाकिस्तान में गवर्नर जनरल और प्रधानमंत्री होते थे, मगर राष्ट्रपति नहीं। उसमें भी शक्ति का अजीबो-गरीब हिसाब-किताब था। एक गवर्नर जनरल प्रधानमंत्री बन गए। फिर एक अमरीका में राजदूत प्रधानमंत्री बन गए। फिर वह प्रधानमंत्री वापस अमरीका में राजदूत बन गए। पाँच साल में पाँच प्रधानमंत्री कहाँ से आए, कहाँ गए, जनता भी अस्पष्ट थी। मैंने यह जाँच कर देखा है। पढ़े-लिखे पाकिस्तानी भी लियाक़त अली ख़ान के बाद के प्रधानमंत्रियों के नाम बता नहीं पाते।

1956 में चौधरी मुहम्मद अली के समय पाकिस्तान आखिर एक गणतंत्र बना। एक कामचलाऊ संविधान तैयार हुआ, और इसकंदर मिर्ज़ा पहले राष्ट्रपति बने। उन्होंने अंग्रेज़ी को औपचारिक भाषा, ऊर्दू और बंगाली को राजभाषा घोषित किया। इसके साथ ही 21 वर्ष से अधिक उम्र के नागरिकों के लिए मताधिकार की व्यवस्था की। एक और काम यह किया कि पंजाब, सिंध, बलूच और खैबर-पख़्तून को एकीकृत कर पश्चिमी पाकिस्तान प्रांत बनाया। उसकी प्रांतीय राजधानी बनी लाहौर।

इस नए पश्चिम पाकिस्तान के पहले मुख्यमंत्री बने ख़ान अब्दुल जब्बार ख़ान। ख़ान साहब ने बंबई से डाक्टरी की पढ़ाई की थी, और अपने छोटे भाई ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान के साथ खुदाई ख़िदमतगार आंदोलन किया था। वह हजारीबाग जेल में भी रहे थे। वह उन व्यक्तियों में थे, जिन्होंने भारत-पाक विभाजन के समर्थन-पत्र पर हस्ताक्षर से इंकार कर दिया था। वह पठानों को भारत का हिस्सा बनना चाहते थे। उन्होंने अपनी रिपब्लिकन पार्टी बना कर मुस्लिम लीग को पश्चिम पाकिस्तान में हराया।

वहीं पूर्वी पाकिस्तान में एच. एस. सुहरावर्दी ने अपनी अवामी लीग बना ली थी। सुहरावर्दी गांधी के सहयोगी रहे थे। हालांकि कलकत्ता में जो भीषण दंगे हुए थे, उस समय वही बंगाल के मुख्यमंत्री थे। उनकी इच्छा तो यह थी कि पूरे बंगाल को ही अलग देश बनाया जाए, पाकिस्तान या भारत का हिस्सा न बने। वह इच्छा पूरी नहीं हुई, मगर मुस्लिम लीग को हरा कर वह पहले पूर्वी पाकिस्तान के मुख्यमंत्री बने; बाद में पूरे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बन गए।

इस तरह प्रांतीय चुनावों में मुस्लिम लीग की पूरे पाकिस्तान में ही हार हुई। यही तो लोकतंत्र की ख़ूबसूरती है कि जनता उस दल को भी गिरा सकती है, जिस दल ने देश का निर्माण करने में मुख्य भूमिका निभाई।

इस खूबसूरती पर अमरीका ने चोट करनी शुरू कर दी थी। पहले CIA ने 1953 में ईरान में लोकतांत्रिक प्रधानमंत्री का तख्तापलट करवाया। उसके बाद बग़दाद में एक सेना समझौता हुआ, जिसमें ईरान, इराक, तुर्की और पाकिस्तान ने एक साथ अमरीका से हाथ मिलाया। इसका नाम पड़ा CENTO. अब इजरायल को मिला कर पूरे मध्य एशिया पर अमरीका अपना जाल बिछा चुका था। इस पूरी सैन्य डील में जनरल अयूब ख़ान का बड़ा हाथ था। कबाब में हड्डी थे सुहरावर्दी सरीखे प्रधानमंत्री और पठान ख़ान अब्दुल जब्बार ख़ान।

9 मई 1958 को ख़ान साहब लाहौर में अपने बेटे के घर में अखबार पढ़ रहे थे। उनकी गोली मार कर हत्या कर दी गयी।

अब सुहरावर्दी की बारी थी।

(क्रमश:)

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[चित्र: ख़ान बंधु और नेहरू]

पाकिस्तान एपिसोड 4

पाकिस्तान को जोड़ रहा था इस्लाम, और तोड़ रही थी विविधता। हर प्रांत की संस्कृति भिन्न थी। पूर्वी पाकिस्तान तो खैर भोगौलिक दूरी भी अच्छी-खासी थी, और बीच में था भारत। अब पाकिस्तान के राजनयिक या फौजी दिल्ली से ट्रेन पकड़ कर कलकत्ता और ढाका कैसे जाते? हालांकि आम नागरिक सीमा पार कर भारतीय रेल पकड़ कर ही पूर्वी पाकिस्तान जाते थे। एक पाकिस्तानी व्यक्ति के अनुसार, यह काफ़ी महंगा पड़ता था, और कोई ज़रूरत भी नहीं थी। व्यापारी ट्रक भारत से गुजर कर ही पाकिस्तान जाते थे। मोहम्मद अली जिन्ना ने भारत के रास्ते एक 800 मील के पाकिस्तान अधिकृत कॉरीडोर की मांग की थी, मगर भारत इसके लिए कभी राजी नहीं हुआ। वल्लभभाई पटेल ने इस मांग पर कहा था, “यह एक खूबसूरत बकवास है, जिसे गंभीरता से नहीं लेना चाहिए”। बिहार-यूपी से गुजरती हुई, भारत को दो भागों में काटती एक पाकिस्तानी जमीन वाकई बेतुकी ही थी।

भाषा और संस्कृति की विविधता भारत में कहीं अधिक थी, मगर भारत ने एक जरूरी काम जल्दी कर लिया। संविधान का निर्माण। पाकिस्तान को संविधान बनाते-बनाते एक दशक लग गए, और जब बन कर तैयार हुआ, लोकतंत्र ही साफ हो चुका था। उससे पहले वह गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया ऐक्ट (1935) को ही संविधान रूप में प्रयोग करते थे, जिसके बाद कुछ अस्थायी व्यवस्था हुई। जो पाकिस्तान का संविधान अब मौजूद है, वह तो 1973 में ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो के समय बना। दशकों तक देश बिना संविधान के ही चलता रहा!

संविधान बनाने में एक समस्या थी। वह किस कानून से चलेंगे? इस्लाम धर्म के सदियों पुराने बनाए कानून से? या आधुनिक दुनिया के कानून से? मसलन भारतीय संविधान तो आधुनिक लोकतंत्र का टेक्स्टबुक संविधान था।

पाकिस्तान के मुसलमान पीढ़ियों से भारत में रहे थे, जहाँ हिन्दू, सिख और अन्य धर्मी भी उनके साथ रहते थे। उनकी तुलना अरब देशों के मुसलमानों से संभव नहीं थी। भले धर्म-आधारित राष्ट्रवाद से पाकिस्तान बना हो, शरिया कानून की ख़ास समझ सभी को नहीं थी। उन्होंने तो ब्रिटिश कानून देखा था।

यह भी ध्यान रहे कि एक बड़ा तबका तरक्कीपसंद पढ़े-लिखे मुसलमानों का था, जिनमें कई कम्युनिस्ट ख़यालातों के थे और इस लिहाज़ से धर्म को पूरी तरह समर्पित नहीं थे। नमाज़ी मुसलमान तो कम ही थे। हाँ! उन्होंने पढ़ सब रखा था। एक वाकया है कि फ़ैज अहमद फ़ैज जब जहल में थे, तो बाकी कैदियों को कुरान पढ़ाते। जेलर ने टोका कि आप तो ला-मज़हबी (नास्तिक) हैं, आपको कुरान-शरीफ़ की क्या समझ?

पूर्वी पाकिस्तान में तो लगभग बाइस प्रतिशत जनसंख्या हिन्दू थी, जबकि पश्चिमी पाकिस्तान में दो प्रतिशत से भी कम थी। ज़ाहिर है वहाँ इस्लाम संविधान लाना कठिन था। एक तरफ भाषा आंदोलन पहले से चल रहा था, यह दूसरी चोट तो देश ही हिला कर रख देती।

अमरीका के राष्ट्रपति आइजनहावर ने यह समस्या हल कर दी। एक बार जब अयूब ख़ान रक्षामंत्री बन गए, अमरीका ने करोड़ों डॉलर की राशि पाकिस्तान को इस शर्त पर देने का वादा किया, अगर वे साम्यवाद से लड़ने के लिए हाथ मिलाएँ। साम्यवाद से लड़ने का मतलब सोवियत से लड़ना तो था ही, उन तमाम तरक्कीपसंद विचारधारा के मुसलमानों से भी लड़ना था जिनके हाथ में पत्र-पत्रिकाएँ, अखबार, साहित्य जैसी चीजें थे। जिनके मन में एक आधुनिक लोकतांत्रिक पाकिस्तान था।

अमरीकी डॉलर ने पूर्वी पाकिस्तान के जूट उद्योग को भी छोटा बना दिया। अब उन्हें दबा कर रखना आसान था। अमरीका पाकिस्तान को उस तानाशाही में तब्दील करने वाला था, जहाँ यह कठिनता से हासिल आज़ादी खत्म हो जाएगी।

(क्रमश:)

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पाकिस्तान एपिसोड 3

पाकिस्तान ब्रिटिश भारत का एक छोटा हिस्सा था। वह अपने-आप में एक सिस्टम नहीं था कि उसको अलग करते ही गाड़ी चलने लगेगी। वहाँ की अर्थव्यवस्था हिन्दुओं के हाथ में थी, जो विभाजन के बाद भारत आ गए थे। रावलपिंडी एक बड़ा कैन्टोनमैंट जरूर था, मगर पूरी फौज मुसलमान फ़ौज तो थी नहीं। प्रशासनिक अधिकारियों की संख्या लें तो लगभग बारह सौ अफ़सरों में मात्र सौ मुसलमान थे, जिनमें से बीस ने पाकिस्तान जाने से इंकार कर दिया। इससे पहले कि बाकियों का मन बदलता, ‘ऑपरेशन पाकिस्तान’ के तहत ब्रिटिश हवाई जहाज भेज कर उन्हें दिल्ली से उठवाया गया।

ब्रिटिश भारत के लगभग पंद्रह हज़ार फैक्टरियों में हज़ार पाकिस्तान के हिस्से आए, लेकिन उनमें भी कईयों के मालिक हिन्दू या सिख ही थे। नए पाकिस्तान के हाथ में नकद भी नहीं था। जो धन का बंटवारा भारत से होना था, वह इस कारण कुछ समय अटका दिया गया कि वे कश्मीर में घुसपैठ पर न लगा दें।

पाकिस्तान के पास जो भी आर्थिक ताकत थी, वह पूर्वी पाकिस्तान में थी। वहाँ जूट के उद्योग थे। उनके भी प्रोशेसिंग कारखाने भारत के हिस्से चले गये थे, मगर पूर्वी पाकिस्तान काफ़ी हद तक पश्चिमी पाकिस्तान का पेट पालता रहा।

इन बंगालियों ने पाकिस्तान को पाला तो ज़रूर, मगर ये अंदर ही अंदर घुटने भी लगे। वे पाकिस्तान की आधी से अधिक आबादी थे, मगर गद्दी कराची में थी। उनके और पश्चिम पाकिस्तान के मध्य मात्र धर्म की डोर थी। यह डोर मजबूत थी, मगर जब भाषा की बात आयी तो यह डोर उलझ गयी।

मोहम्मद अली जिन्ना का मानना था कि पूरे देश को जोड़ने के लिए एक भाषा ज़रूरी है, जो ऊर्दू हो। वह आज़ादी के बाद एक ही बार ढाका गए, और यह बात कह आए। बंगाली इस मुद्दे पर अड़ गए कि बंगाल में तो बंगाली चलेगी, उर्दू नहीं।

दरअसल, जिन्ना या लियाक़त अली ख़ान स्वयं पाकिस्तान क्षेत्र से नहीं थे। उनके लिए भी वहाँ की भाषा और संस्कृति उतनी ही अनजान थी, जितना बिहार-यूपी से आए मुसलमानों के लिए। वह पंजाबी, बंगाली या सिंधी कैसे बोल पाते? वह तो गुजरात के होकर भी गुजराती बोलने में लड़खड़ाते थे। उनकी तालीम अंग्रेज़ी में थी, और उर्दू भी अंग्रेज़ीदा अंदाज़ में बोलते थे। उनकी एक तक़रीर पाकिस्तान में तीस वर्ष तक प्रतिदिन प्रसारित हुई, जिसमें वह कहते हैं,

“आप सब आज़ाद हैं अपने मंदिरों में जाने के लिए। आप सब आज़ाद हैं अपने मस्जिदों में जाने के लिए। आप सब आज़ाद हैं किसी भी इबादतगाह में जाने के लिए।”

(1977 में किसी ने यह तक़रीर ही गायब कर दी, और प्रसारण रुक गया। अब यूट्यूब पर मिल जाएगी।)

जिन्ना की मृत्यु और लियाक़त अली ख़ान की हत्या के बाद पाकिस्तान संभालने लायक कोई बचा नहीं। अगले प्रधानमंत्री एक बंगाली ख़्वाजा निज़ामुद्दीन बनाए गए। बंगालियों को लगा कि अब उनकी बात मान ली जाएगी। मगर वह भी बंगाल जाकर कह आए कि उर्दू ही भाषा रहेगी। पंजाबी, सिंधी, बलोच, कश्मीरी, पख़्तून तो उर्दू के लिए जैसे-तैसे मान (?) भी गए, बंगाल के लिए यह मुद्दा पाकिस्तान को दो टुकड़ों में बाँटने की चिनगारी बन गया। 

एक विद्यार्थी शेख़ मुजीब-उर-रहमान को छात्रों को भड़काने के जुर्म में जेल भेजा गया। 21 फरवरी 1952 को ढाका के छात्रों पर गोली चलायी गयी, और उनमें आठ छात्रों के शहीद होते ही बंगाल जल उठा। प्रधानमंत्री निज़ामुद्दीन को हटा कर दूसरे बंगाली मोहम्मद अली बोगरा को प्रधानमंत्री बनाया गया। उन्होंने हालात देखते हुए सेनाध्यक्ष अयूब ख़ान को रक्षा मंत्री बना दिया। इस तरह पाकिस्तानी सेना का वहाँ की राजनीति में रेड कारपेट बिछा कर स्वागत हुआ।

अमरीका भी यही चाहता था।

(क्रमश:)

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पाकिस्तान एपिसोड 2

“स्कूली इतिहास में यह पढ़ाया जाता है कि कौन सी घटना कब घटी, कहाँ घटी। लेकिन, यह बात कम पढ़ाई जाती है कि अमुक घटना क्यों घटी? कहाँ ग़लती हुई?”

यह कथन एडॉल्फ हिटलर लिखित ‘मीनकैम्फ़’ से है, लेकिन बात ठीक लगती है। मैं पाकिस्तान के इतिहास में हिटलर को यूँ ही नहीं ला रहा। बल्कि, इस इतिहास के मुख्य पात्रों में जगह दे रहा हूँ।

आखिर 1947 के दो दशक पूर्व ही क्यों पाकिस्तान की मांग उठी? अलग मुस्लिम देश तो पहले भी बन सकता था। अगर दोनों धर्म पिछली सदियों में कभी भी साथ रहने के लिए उपयुक्त नहीं थे, तो पहले ही बंटवारा हो गया होता। यह तर्क दिया जा सकता है कि पहले मुगल शासन था, इसलिए अल्पसंख्यक होने के बावजूद मुसलमानों को अलग देश की जरूरत नहीं पड़ी।

लेकिन, इस तर्क को भारत तक सीमित रख कर बात पूरी नहीं होती। दुनिया में क्या चल रहा था? सभी अचानक अपनी-अपनी जमीन क्यों तलाशने लगे?

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद साम्यवाद और नाज़ीवाद, दोनों का उदय हुआ। दोनों ही विचार भारत में आए, और दोनों के अपने-अपने प्रभाव पड़े।

1930 से ‘टू नेशन थ्योरी’ खुल कर आनी शुरू हुई, जब हिटलर का कद बढ़ रहा था। पूरी दुनिया में ‘पितृभूमि’ (फादरलैंड) और ‘शुद्ध नस्ल’ जैसे शब्द ज़बान पर आने लगे थे। ‘पाकिस्तान’ शब्द के निर्माता चौधरी रहमत अली नाज़ीवाद से इतने प्रभावित थे, कि उनको हिटलर के कई वाक्य कंठस्थ थे। जिस वर्ष हिटलर जर्मनी के चांसलर बने, उसी वर्ष उन्होंने शुद्ध मुसलमान देश पाकिस्तान के पैम्फ्लेट बाँटने भी शुरू कर दिए।

अपने-अपने नस्लों, अपने धर्मों, अपने हज़ारों वर्ष पुराने पुरखों की जमीन तलाशना और एकजुट होना। हिन्दुत्व शब्द द्वारा हिन्दुओं को एकजुट करना, मुस्लिम लीग द्वारा मुसलमानों को एकजुट करना, यहूदियों का सियोनवाद। यूरोप के अलग-अलग ईसाई समूहों का जर्मन, पोल, रोमाँ, फ्रेंच आदि में पृथक्करण। बाहरी नस्लों को अपने देश से बाहर निकालना। सब साथ ही शुरू हुआ और द्वितीय विश्व-युद्ध तक अपने विकराल रूप में आ गया। न सिर्फ यूरोप में, बल्कि भारत जैसे देशों में भी।

रहमत अली युवा ख़ून थे, हिटलर से प्रभावित हो गए, कोई अजूबी बात नहीं। उस समय जर्मनी और हिटलर ही उगता सूरज था। मोहम्मद अली जिन्ना के विचारों में द्वंद्व है। एक तरफ तो इस्लाम देश की कामना दिखती है, वहीं दूसरी तरफ एक भय भी दिखता है कि अंग्रेज़ों के जाने के बाद मुसलमानों के साथ क्या होगा। क्या वही स्थिति होगी जो यूरोप में यहूदियों की हुई? यहूदियों ने अपनी जमीन तलाश ली, मगर भारतीय मुसलमान कहाँ जाएँगे? उनकी पितृभूमि आखिर है कहाँ? वे तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी भारतीय ही हैं।

भय से हुआ, या बल से। युद्ध से हुआ, या कूटनीति से। महज दो दशकों में ऐसे कट-छँट कर नस्ल-धर्म आधारित देश तैयार हो गए। युद्ध के बाद पश्चिम एशिया की एक सीमा पर यहूदियों का देश इज़रायल और दूसरी सीमा पर मुसलमानों का देश पाकिस्तान बना।

कुछ देश ऐसे बच गए, जिनमें यह नाज़ीवाद का भूत मंडरा कर कहीं कोने में पड़ा रह गया। जहाँ इंद्रधनुषी लोकतंत्र कायम रहा। अफ़सोस उनमें से एक पाकिस्तान नहीं था, जिसकी कीमत उसे बार-बार चुकानी पड़ी।

कंपनी बाग, जहाँ लियाक़त अली ख़ान को गोली लगी, उसका नामकरण लियाक़त बाग़ किया गया। इत्तफ़ाकन पाँच दशक बाद उसी बाग़ में बेनज़ीर भुट्टो की भी हत्या कर दी गयी। लियाक़त अली ख़ान को गोली एक अफ़ग़ान व्यक्ति ने मारी, जो पाकिस्तान में राजनैतिक शरणार्थी था। वह ऐबटाबाद में उसी इलाके में सरकारी खर्च पर रहता था, जहाँ बरसों बाद बिन लादेन को शरण दी गयी।

इससे पहले कि वह पकड़ा जाता और कुछ कहता, उसे उसी वक्त गोली मार दी गयी। केस की जाँच कर रहे मुख्य पुलिस अधिकारी की हवाई दुर्घटना हो गयी (या करवा दी गयी)। क़यास लगते हैं कि अमरीका-सोवियत शीत-युद्ध की पहली गोलियों में एक पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाक़त ख़ान को लगी। यह हत्या एक अंतरराष्ट्रीय साजिश थी, जिसमें वे ब्रिटिश भी शामिल थे जिनकी प्रशासनिक पकड़ पाकिस्तान से खत्म नहीं हुई थी। हालांकि स्कॉटलैंड यार्ड की टीम बुलवा कर जाँच करने पर कुछ पक्के सबूत नहीं मिले।

लियाक़त अली ख़ान ने एक तरफ अमरीकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन से बीस बिलियन डॉलर की आर्थिक मदद मांगी थी, दूसरी तरफ़ वह सोवियत की यात्रा पर जाने की ऊहापोह में थे। उनकी हत्या वह ‘टर्निंग प्वाइंट’ थी, जिसके बाद सोवियत विकल्प खत्म हो गया। पाकिस्तान पूरी तरह अमरीका के चंगुल में आ गया। धीरे-धीरे अपनी ही फ़ौज के चंगुल में भी।

(क्रमश:)

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पाकिस्तान एपिसोड 1

दरबार-ए-वतन में जब इक दिन सब जाने वाले जाएँगे
कुछ अपनी सज़ा को पहुँचेंगे, कुछ अपनी जज़ा ले जाएँगे

  • फ़ैज अहमद फ़ैज

16 अक्तूबर, 1951. कंपनी बाग़, रावलपिंडी

लियाक़त अली ख़ान उस दिन जब एक लाख की भीड़ को संबोधित करने मंच पर जा रहे थे, तो उन्हें अपने सामने पूरा पाकिस्तान दिख रहा था। वह स्वप्न जो उन्होंने, मोहम्मद अली जिन्ना, सुहरावर्दी, अल्लामा इकबाल और तमाम लोगों ने साथ देखा था। ब्रिटिश भारत के मुसलमानों के लिए एक देश की।

लेकिन, यह पाकिस्तान शब्द जन्मा कैसे?

भारत में मुसलमान हज़ार वर्षों से रह रहे थे, लेकिन यह शब्द उनकी जबान पर नहीं आया। ख़िलाफ़त के समय भी अगर मुस्लिम दुनिया की बात चली, तो भी पाकिस्तान शब्द नहीं उभरा। 1933 में लंदन में बैठे एक युवक चौधरी रहमत अली के मन में यह Pakstan शब्द पहली बार आया। शायद इससे एक पाक (पवित्र) स्थान का बोध होता हो? मगर यह ऊर्दू और संस्कृत शब्दों की संधि कैसे हो गयी?

रहमत अली ने भी ‘पवित्र स्थान’ नहीं सोचा था। उनके अनुसार यह एक एक्रोनिम था। P से पंजाब, A से अफ़गान (खैबर-पख्तून), K से कश्मीर, S से सिंध और Stan से बलूचिस्तान। बाद में लोगों को लगा कि बोलने के लिए एक बीच में ‘I’ घुसेड़ना जरूरी है, तो बना Pakistan। लेकिन बंगाल का क्या? उसके लिए तो अक्षर ही नहीं। रहमत अली ने कहा था कि बंगस्तान (बंगाल) और ओस्मानिस्तान (हैदराबाद) दो अन्य मुसलमान देश बन जाएँगे।

मुस्लिम लीग ने इस शब्द को तो अपना लिया मगर रहमत अली को ख़ास तवज्जो नहीं दी। बाद में जब विभाजन के बाद वह बोरिया-बिस्तर लेकर नए पाकिस्तान में लौटे तो नाराज़ हो गए कि मेरा मॉडल नहीं अपनाया गया। गुस्से में उन्होंने कायद-ए-आजम को ‘क्विसलिंग-ए-आजम’ कह दिया। (क्विसलिंग एक नॉर्वे के गद्दार थे जो नाजियों से मिल गए थे। बाद में यह शब्द लियाक़त अली ख़ान ने शेख़ अब्दुल्ला के लिए प्रयोग किया।)

ज़ाहिर है रहमत अली का सारा बोरिया-बिस्तर छीन कर, उनको देशनिकाला दे दिया गया। वह लंदन में ही कुछ साल बाद मर गए। जिन्होंने पाकिस्तान शब्द दिया, उनका तो यह हश्र हुआ। कायद-ए-आजम रोगग्रस्त होकर भी यथासंभव प्रशासन की ज़िम्मेदारी अपने कंधे पर उठाते रहे। मगर 1948 में ही उनकी मृत्यु हो गयी।

लियाक़त अली ख़ान अब पाकिस्तान के सर्वेसर्वा थे। ऐसे पाकिस्तान के, जहाँ का पंजाब विभाजन के बाद दो खंडों में बँट चुका था, पख़्तून और बलूच अपनी स्वतंत्रता चाह रहे थे। बंगालियों को उन पर थोपी गयी राजभाषा ऊर्दू से कोई सरोकार था नहीं। और कश्मीर? जिस तरह नेहरू पर कश्मीर गंवाने का आरोप भारत में लगता रहा, लियाक़त अली ख़ान पर यह आरोप पाकिस्तान में हमेशा लगता रहेगा।

उस दिन कंपनी बाग में उनके सामने बैठे एक व्यक्ति ने उनकी छाती में दो गोलियाँ दाग दी। पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री का अंत कुछ यूँ सर-ए-आम हुआ।

भला एक देश के संस्थापक की हत्या उसके देशवासी क्यों करना चाहेंगे? हाँ! कश्मीर गंवाने की नाखुशी अवाम में ज़रूर थी।

कुछ ही महीनों पहले इसी रावलपिंडी में एक षडयंत्र हुआ, जहाँ तख्तापलट की साजिश हुई थी। सभी षड्यंत्रकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया, जिनमें शामिल थे मेजर जनरल अकबर ख़ान, उनके कुछ अन्य फौजी सहयोगी, पाकिस्तान कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव सय्यद सज्जाद ज़हीर, और……म़शहूर शायर फ़ैज अहमद फ़ैज।

(क्रमश:)

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पाकिस्तान

भूमिका

पाकिस्तान का इतिहास हमने कहाँ पढ़ा है? भारतीयों ने बहुधा भारत में पढ़ा होगा। पाकिस्तानियों ने पाकिस्तान में। अन्य देश के लोगों ने किसी अंग्रेज़ी किताब या अनुवाद में पढ़ा होगा।

भारत में वर्तमान पाकिस्तान क्षेत्र का इतिहास विस्तार से पढ़ाया गया है, जिसमें सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर विभाजन तक का विवरण है। उसके बाद वह चूँकि भारत का हिस्सा नहीं रहा, तो उस देश का इतिहास भी स्कूली इतिहास में कुछ भारत-पाक युद्धों और साधारण राजनैतिक खाके तक सिमट गया।

पाकिस्तानी विद्यालयों में इतिहास विषय को भारत की ही तरह ‘समाज विज्ञान’ के अंतर्गत ले आया गया। वहाँ यह आठवीं कक्षा तक मु’असराती-उलूम (सोशल स्टडीज़) के अंतर्गत और नौवीं कक्षा से मुताला-ए-पाकिस्तान (पाकिस्तान स्टडीज़) विषयों के रूप में पढ़ाया जाता है। वहाँ भी अलग-अलग प्रांतों के अपने पाठ्यक्रम शिक्षा मंत्रालय द्वारा जाँच कर स्कूलों के लिए निर्गत किए जाते हैं। इन किताबों में पाकिस्तान देश के इतिहास के अतिरिक्त प्रांतीय इतिहास भी शामिल किया जाता है, जैसे पंजाब, सिंध आदि।

इस बात पर अनेक लेख मिल जाएँगे कि किस तरह भारत में पढ़ाया जाने वाला पाकिस्तान का इतिहास, और पाकिस्तान में पढ़ाया जाने वाला भारत का इतिहास, एक-दूसरे के विलोम हैं। ऐसे पड़ोसी देश जिनके विभाजन से अब तक संबंध बिगड़े ही हुए हैं, इस तरह का विरोधाभास स्वाभाविक है। 2019 में पाकिस्तानी अखबार ‘डॉन’ के लेख से पहले भारत के अरुण शौरी और पाकिस्तान के के. के. अजीज अपनी-अपनी पुस्तकों में विस्तार से पाकिस्तान में पढ़ाए जा रहे विकृत इतिहास पर भौहें सिकोड़ चुके हैं।

तीसरा इतिहास जो यूरोप-अमरीका के लोगों तक पहुँचा, वह क्या कहता है? वह इतिहास इस भारत-पाकिस्तान द्वंद्व से इतर भी लिखा गया, और केंद्र में रख कर भी। यह संभव है कि उन्होंने दोनों देशों के इतिहासकारों को पढ़ कर राय बनायी होगी। यह भी संभव है कि वे पाकिस्तान में घूम कर या कुछ समय बिता कर इतिहास लिखते होंगे। या यह संभव है कि उन्हें उतना ही मालूम होगा, जितना उन्हें बताया गया होगा। अमूमन मूल स्थान के लोग बाहरी लोगों द्वारा लिखे इतिहास को ‘टिप ऑफ आइसबर्ग’ कह कर ख़ारिज कर देते हैं।

एक भारतीय होने के नाते मेरे लिए पाकिस्तान का इतिहास या उसका एक अंश लिखना इसलिए कठिन है क्योंकि मैं कभी पाकिस्तान गया नहीं। चूँकि मैं इतिहासकार नहीं, इसलिए मेरा प्रशिक्षण भी नहीं। मगर एक विद्यार्थी होने के नाते इन तीनों दृष्टियों से गुजरते हुए सवाल रखना आसान है। उदाहरणस्वरूप, पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की पहली कक्षा की किताब के सोलहवें पन्ने पर एक प्रश्न लिखा है- पाकिस्तान किसने बनाया?

उत्तर है- कायद-ए-आजम ने

अगर भारत के पहली कक्षा (पाँच-छह वर्ष) के बच्चे से यही प्रश्न पूछा जाए कि भारत किसने बनाया तो, क्या वह जवाब दे पाएगा/पाएगी?

क्या पाकिस्तान के लिए भी यह प्रश्न इतना सरल है?

(क्रमश:)

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दक्खिनी हिन्दी

दक्खिन के कई मुसलमान दखिनी हिंदी बोलते हैं। इसे दखिनी ऊर्दू भी कहते हैं, पर मूलत: यह दखिनी हिंदी और दखिनी ऊर्दू एक ही है। कहते हैं दखिनी के अंतिम कवि हुए वली औरंगाबादी, और वही ऊर्दू के पहले कवि भी हुए।

यह बातें आज मेरे एक मलयाली मित्र के पिता ने बताई। वो मेरी हिंदी किताब एक दिन में निपटा गए। वाजपेयी जी से ‘श्रम श्री’ पुरस्कार पा चुके हैं, और उनकी लिखी कविताएँ भी सुना गए। उनके घर गया तो सब मलयाली फिल्म देख रहे थे। छोटे बच्चे हिंदी में बतिया रहे थे, वो भी नॉर्वे में। यह कई हिंदू परिवारों में देखने को नहीं मिलता। पर दक्खिन के कई मुस्लिम परिवारों की मातृभाषा आज भी दखिनी ही है। चाहे कहीं भी हों।

दखिनी ख़ालिस ऊर्दू नहीं है, खड़ी बोली के करीब है। हैदराबादी भाषा इसी का एक रूप है।

मेरे कू, तेरे कू, साहिब लोगाँ, चपाती बनाको दूँ? कायकू जायींगा?

हैदराबाद में इसमें अनुनासिका का उपयोग शायद खूब होता है। तमिल और मलयाली मुसलमानों में नाक का उपयोग बोली में कम है।

दरअसल कर्नाटक के कई हिस्से जो निजाम के अंदर थे, और वो हिस्से जो आदिल शाह के अंदर थे, वहाँ मुसलमानों में दखिनी का प्रभाव रहा। उन्होनें कन्नड़-तेलुगु भी सीखा, पर मातृभाषा दखिनी ही रही, जिसे वो ऊर्दू कहते हैं। पर लखनवी ऊर्दू के सामने यह कहीं से ऊर्दू नहीं नजर आती। ऊर्दू लिपि भी तमिल और मलयाली मुसलमान नहीं समझ पाते। देवनागरी पढ़ गए।

हालांकि यहाँ एक दूसरा वर्ग भी है जो यमन-अरब से व्यापारी बन कर आए और यहीं बस गए। वो अब स्थानीय भाषा बोलते हैं। जैसे अब्दुल कलाम तमिलभाषी थे। इसी तरह मैंगलूरू के बेयरी भाषी लोग। पर फिर भी बड़ा प्रतिशत हिंदी भाषी ही है।

गर हिंदी भाषियों की गिनती करनी हो, तो इन दखिनी मुसलमानों को भी गिनना चाहिए।

(दखिनी = दक्कनी = दक्खिनी)

खुशहाली का पंचनामा: पुस्तक अंश

प्रकाशन: मैन्ड्रेक पब्लिकेशन

लेखक: प्रवीण झा

विश्व के सबसे ख़ुशहाल कहे जाने वाले देश नॉर्वे को टटोलते हुए ऐसे सूत्र मिलते हैं जो भारत में पहले से मौजूद हैं। बल्कि मुमकिन है की ये भारत से बह कर गए हों। लेखक ने रोचक डायरी रूप में दोनों देशों के इतिहास से लेकर वर्तमान जीवन शैलियों का आकलन किया है। ‘ख़़ुशहाली का पंचनामा’ एक यात्रा संस्मरण नहीं प्रवास संस्मरण है। लेखक बड़ी सहजता से आर्यों की तफ़तीश करते हुए रोज़मर्रा के क़िस्से सुनाते चलते हैं और उनमें ही वे रहस्य पिरोते चलते हैं, जिन से समाज में सकारात्मक बदलाव आ सकता है। इस डायरी का ध्येय यह जानना है की कोई भी देश अपने बेहतरी और ख़ुशहाली के लिए किस तरह के क़दम उठा सकता है।

ख़ुशहाली क्या वाक़ई परिभाषित की जा सकती है या यह सब बस एक तिलिस्म है? स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक समरसता की बहाली क्या कोई लोकतांत्रिक सरकार करने में सक्षम हो सकती है? क्या मीडिया स्वतंत्र हो सकती है? क्या अमीरी-ग़रीबी के भेद वाक़ई मिट सकते हैं? क्या मुमकिन है और क्या नहीं? और अगर मुमकिन है तो आख़िर कैसे?

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अध्याय: जेंडर न्यूट्रल देश

…सुंदरियाँ हैं पर कोई फैशन या हॉट-ड्रेस कह लें, नहीं। शान से कहेगी, ये कार्डीगन मैंने बुना है। शरीर को लेकर कोई ‘कॉन्शस’ नहीं। बातें करते नेक-लाइन नीची हो जाए, तो सँभालेगी नहीं। बेशर्मों की तरह यूँ ही बात करती रहेंगीं। यहाँ तक कि पुरूष भी कपड़े बदल रहा हो, मित्र हो और जल्दी हो, धड़ल्ले से घुस कर अपनी बात कहेगी। शरीर की कोई प्राथमिकता नहीं। यहाँ सब नंगे हैं, आदम हैं।

औरों की तरह मुझे भी लेकिन यह कौतूहल हुआ कि गर प्रेम करना हो, तो आखिर यहाँ करे कैसे? क्या ऑफ़िस में ही किसी से दोस्ती करनी होगी, या बार में किसी महिला से बात करनी होगी? क्या यह स्कर्ट में नंगी टांगों वाली गोरियाँ यूँ ही मान जातीं होंगी? या पैसे से प्रेम होता होगा?

हालांकि प्रेम की कोई निश्चित परिभाषा नहीं। ‘डेट’ पर कैसे जाएँ? यह पूछना आसान है। चूँकि यहाँ व्यवस्थित विवाह नहीं, लोग खुद ही ‘डेट’ पर जाते हैं। हर उम्र में। किसी का कल तलाक हुआ या पत्नी ने कहा कि उसका नया प्रेमी मिल गया, तो आज वह अपनी प्रेमिका ढूँढने निकल पड़ा। समय क्यूँ बरबाद करना?

अध्याय: धुरी से ध्रुव तक

…दूर से कुछ गीतों की धुन तो सुनाई दे रही थी। और तमाम गॉगल पहने गोरियों की खुली पीठ नजर आ रही थी। कुछ पीठों पर कलाकारियाँ थी। होंगे इनके कोई देवी-देवता। किसी की पीठ पर सांप लोट रहा था तो किसी पर तिब्बती लिपि में कुछ उकेरा था। पीठें थी ही ऐसी ‘पेपर-व्हाइट’ की कलम चलाने का दिल कर जाए। पर मैं इन मोह-पाशों से मुक्त होकर इधर-उधर देखने लगा।

नदी बिल्कुल नीली थी। क्या पता यहीं-कहीं समंदर में जाकर जुड़ती हो। नॉर्वे का मानचित्र देख तो यही लगता है कि समुद्र से सहस्त्र धाराएँ निकल कर धरती को भेद रही हों। हज़ारों नदियाँ, खाड़ी, दर्रे, और झील। कुछ समुद्र से अब भी जुड़े हैं, कुछ छिटक कर अलग हो गए। अलग तो हो गए, पर रंग नीला ही रह गया। जड़ों से कितने भी दूर हो जाओ, मूल कभी साथ नहीं छोड़ता। तभी तो यह पाश्चात्य जलधारा मुझे छठ और हर की पौड़ी का स्मरण करा रही है। मैं मन ही मन हँस कर वापस यथार्थ में लौटा। यह नॉर्वे है जनाब। यहाँ अपनी मिट्टी नहीं, अपनी नदियाँ नहीं, अपना आकाश नहीं। यहाँ सब पराया है। लेकिन नदी में तमाम नाव देख उत्साहित तो हुआ।

यहाँ हर तीसरा गाड़ी रखे न रखे, नाव (बोट) ज़रूर रखता है। किसी जमाने में नॉर्वे में ‘वाइकिंग’ योद्धा थे जो बड़े जहाज रखते थे। अब दस्यु नहीं रहे, पर नाव रखने का रिवाज है। केरल के अष्टमुदी झील के आस-पास के गांवों में भी सब नाव रखते थे। यहाँ तो देश ही अष्टमुदियों से भरा पड़ा है। हजारों बोट लगी पड़ी है, और हर बोट में मदिरा, धुआँ, नृत्य और गप्पें। नावों की रेस हो रही है, पर कोई चप्पू नहीं चला रहा। मुँह में सिग़रेट डाले मोटरबोट का स्कूटर हाँक रहा है।…

अध्याय: आर्यों की खोज में

… नॉर्वे में भूत नहीं ‘हेक्सा’ होते हैं। तिरछे पैरों वाली डायन। उत्तर की बर्फीली नदियों में मिलती हैं। ऐसा लोग कहते हैं। सच की ‘हेक्सा’ होती या नहीं, यह अब किसी को नहीं पता। पर सत्रहवीं सदी तक यह डायन उत्तरी नॉर्वे में आम थीं। वे तंत्र-मंत्र से वशीकरण करतीं। बाद में इनमें कई डायनों को फांसी दे दी गयी। मैं जब इनकी खोज में घूम रहा था तो उत्तरी नॉर्वे के सामीयों से मुलाकात हुई।

वह उत्तरी नॉर्वे जो वीरान है, जहाँ कुछ लोग हाल तक बर्फ की गुफाओं में रहते थे। वहाँ तीन महीने सूर्य न उगते, न नज़र आते हैं। वहाँ कई हिस्सों में गाड़ियाँ नहीं चलती क्योंकि हर तरफ बर्फ ही बर्फ है। ‘स्लेज’ को जंगली कुत्ते खींचते हैं। कुत्तागाड़ी कह लें। यही हाल अलास्का का भी है। यह प्रदेश आज भी आदम-काल में जी रहे हैं। प्रकृति के रूखे रूप में।

“भला आप यहाँ रहते ही क्यों हैं? ओस्लो क्यों नहीं चले जाते?” मैंने वीराने में घर बनाए एक व्यक्ति को पूछा।

“जब ओस्लो जाना होता है, जाता हूँ। पर उस रेलमपेल में मैं नहीं जी सकता। यहाँ सुकून है।”

“फिर भी। खाने-पीने की तमाम समस्यायें?”

“खाने की समस्या तो कहीं नहीं होती। अथाह समुद्र के किनारे इस बर्फीले देश में मछलियाँ ही मछलियाँ हैं। और वह भी ताज़ा। हमारी दुनिया डब्बाबंद नहीं, खुली है।”

“आपको पता भी लगता है कि बाकी दुनिया में चल क्या रहा है?”

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किंडल पर पुस्तक कैसे प्रकाशित करें?

आवश्यक सामग्री

  1. वर्ड (.doc) फाइल में किताब: अध्यायों के शीर्षक के लिये Heading 1 फॉन्ट का प्रयोग करें, Title फॉन्ट नहीं। Alignment को justify न करें, Left align ही रखें। किसी भी छपी हुई किताब का सहारा लेकर कॉपीराइट पेज भी बनायें। हर अध्याय के बाद Page break/Chapter break (insert पर क्लिक कर) का प्रयोग करें।
  2. Kindle Create सॉफ़्टवेयर- इस लिंक से मुफ्त डाउनलोड https://kdp.amazon.com/en_US/help/topic/GYVL2CASGU9ACFVU
  3. कवर डिजाइन कर लें/करवा लें तो बेहतर
  4. पुस्तक में अगर कोई चित्र (कॉपीराइट फ्री) हो तो उसकी फाइल

Step1 : Kindle Create Software प्रयोग कर फॉर्मैटिंग कर लें। अगर हिन्दी से इतर भाषा (मैथिली, अवधी, भोजपुरी आदि) भी देवनागरी लिपि में लिखी हो, तो Hindi सेलेक्ट करें। अध्याय, टेबल ऑफ कंटेट्स, चित्र आदि सेट कर लें।

Step2: https://kdp.amazon.com पर जाकर अपनी अमेजन आइ.डी. बनाएँ और लॉग इन करें

Step3: किताब के सभी डिटेल डाल दें। हिन्दी किताब हो, तो भी नाम दोनों भाषाओं (अंग्रेज़ी और हिन्दी) में लिखें। ढूँढने में आसानी होगी। Keywords में यथासंभव शब्द भर दें (अंग्रेज़ी में), जिससे आपके किताब के कंटेंट गूगल आदि पर सर्च किये जा सके। Description में भी कहानी गढ़ने से अधिक कीवर्ड्स डालने का प्रयत्न करें। इसके लिए HTML कोड भी लिख सकते हैं, जो मुफ्त जेनरेट की जा सकती है इस लिंक से- https://kindlepreneur.com/amazon-book-description-generator/

Step4: Kindle Create द्वारा तैयार .kpf फाइल अपलोड करें। कवर अपलोड करें। दाम रख लें। किताब को KDP Select में Enroll करने का सुझाव दूँगा, लेकिन वह वैकल्पिक है।

Step 5: Save and Publish

आपकी किताब तीन-चार घंटे में ऑनलाइन उपलब्ध होगी। आप कभी भी Step2 में बताए लिंक पर बिक्री, रॉयल्टी और कितने पृष्ठ पढ़े गए, देख सकते हैं। अगर कोई सुधार (प्रूफ़ की ग़लती आदि) हो तो कभी भी ठीक कर सकते हैं।

फॉर्मैटिंग उदाहरण के लिए मेरी किताब Gandhi Parivaar देख सकते हैं। उसकी फॉर्मैटिंग ठीक है।

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एक प्रवासी भारतीय के लिए कोरोना वायरस

(ये लेख 15 से 23 मार्च, 2020 के मध्य अलग-अलग स्तंभ में लिखे गए)

अब यह लिखना जरूरी लगा, तो कुछ बिंदु रख देता हूँ। भारत की अर्थव्यवस्था खुली होकर भी यह एक बंद देश है। इसके आस-पास दूर-दूर तक कोई लोकतंत्र नहीं। हम कोरोना के गर्भ चीन से सबसे लंबी सीमा रखते हैं, लेकिन वहाँ यूँ ही चहल-कदमी करते तो क्या, ट्रेन से भी आना-जाना संभव नहीं। पाकिस्तान, म्यांमार और बांग्लादेश तक से वही हालात हैं। इसलिए इसकी तुलना यूरोपीय देशों से नहीं हो सकती, जहाँ ‘ओपेन बॉर्डर’ है, बिना पूछ-ताछ, बिना वीसा। यही वजह रही कि चीन से चले वायरस को काफी हद तक ईरान, यूरोप, अरब और अमरीका के रास्ते घूम-फिर कर भारत आना पड़ा। लेकिन, अब तो आ गया। अब आगे क्या?

आगे यह कि इसका प्रभाव उन्हीं स्थानों से शुरू हुआ, जहाँ विदेश आवागमन अधिक है, जैसे बंबई, पुणे, बेंगलुरू, केरल, दिल्ली। इतने में हवाई रास्ता बंद कर दिया गया, लेकिन अंदाज़न हज़ार लोग आ ही गए होंगे। उनमें से सवा सौ अब तक (मार्च 17) पॉजिटिव आ गए। यह लॉट जाँचने में वक्त लगता है, क्योंकि कई लोग शुरू-शुरू में स्वस्थ ही रहते हैं। लेकिन सोचिए! अमरीका से बीस घंटे हवाई जहाज में बैठ कर कोई आदमी मुंबई/पुणे पहुँचा, और उसमें कोरोना निकला। तो क्या इतने लंबे सफर में एक भरे हुए हवाई जहाज और हवाई अड्डे में किसी और को न पसरा होगा? यही यूरोपीय देशों में भी हो रहा है कि पहले दस दिन तो उनको ढूँढते ही निकल जाता है, जो हवाई जहाज से यह लेकर आए थे। उन दस दिनों में लगभग हज़ार-डेढ़ हज़ार ढूँढ लिए जाते हैं। भारत में भी अगले हफ्ते तक मिल ही जाएँगे। भाग कर कहाँ जाएँगे?

उसके बाद भारत में बीमारी का पसार इटली, ईरान या चीन जैसे सघन देशों जैसा ही माना जा सकता है। पहले ही कुछ दिनों में 3 प्रति 100 का मृत्यु-आँकड़ा आ चुका है, जो बाकी के विश्व-औसत से अधिक है। उत्तरी यूरोप मे यह फ़िलहाल 3 प्रति हज़ार चल रहा है। इस गति से भारत में मृत्यु की संख्या तेज गति से बढ़ सकती है। हाँ! यह जरूर है कि इसे उड़ीसा के एक गाँव या हिमाचल के किसी सुदूर इलाके में पहुँचने में वक्त लगेगा, लेकिन मुख्य स्थानों और महानगरों में तो यह पहुँच ही जाएगा। यह भी एक विडंबना है कि पैन्डेमिक का आखिरी छोर विश्व के दूसरी सबसे बड़ी जनसंख्या वाले देश में है। क्योंकि बाकी कई देश अब धीरे-धीरे रिकवरी फेज तक पहुँचते जा रहे हैं। भारत अभी सबसे क्रिटिकल स्थिति में है, जबकि एक आभास हो रहा है कि हम बच जाएँगे, हमारी स्थिति दुनिया में सबसे अच्छी है। यह तो पैन्डेमिक का पैटर्न ही है कि एक समय में कहीं ज्यादा, कहीं कम होता है। यह चलायमान होता है। और इसका संकेत है कि जहाँ पहला केस देर से मिलना शुरू हुआ, उसकी स्थिति सबसे चिंताजनक है।

इसमें सरकार भी ख़ास मदद नहीं कर सकती, यह राष्ट्रीय चेतना से भले संभव है। लेकिन, कोई घर से निकले ही नहीं, मिले ही नहीं, बाज़ार ही न जाए, ट्रेन-बस में न चढ़े, यह भारत में असंभव है। ऐसे में राष्ट्रीय चेतना का मतलब यह होता है कि हम खुद को समुदाय में लाएँ। सभी निजी स्वास्थ्य-केंद्र सहयोग दें। जिनको हल्की बीमारी हो, उम्र कम हो, वे अस्पताल के बेड न भरें। युवक इसके लिए भी तैयार रहें कि स्वास्थ्य-वॉलंटियर बनना पड़े, और आप निश्चिंत रहें, विश्व भर में युवक लगभग इस बीमारी से सुरक्षित हैं। तमाम स्वास्थ्य-कर्मी काम कर ही रहे हैं, और फिट हैं। यह वृद्ध और पहले से बीमार लोगों के लिए ही घातक है, जिनकी संख्या देश में करोड़ों में है। उनकी रक्षा के लिए अस्पताल या सरकार नाकाफ़ी ही रहेगी, कहीं की भी।

यह बीमारी अब चिकित्सकीय नहीं, आर्थिक समस्या बन चुकी है। पूरी दुनिया मानव-इतिहास में इस तरह कभी बंद नहीं हुई।

कोरोना अंडर-टेस्टिंग और ट्रायज

जब सूरत में महामारी आयी तो आपदा-प्रबंधन चिकित्सक टीमों को यह स्पष्ट निर्देश था कि ‘ट्रायज’ प्रणाली अपनानी है। यह किसी भी आपदा (युद्घ/भूकंप/महामारी) के लिए लागू है। इसका अर्थ यह है कि चिकित्सक जरूरतमंदों को अलग-अलग समूहों में बाँटते हैं। पहला, जिसे हल्की बीमारी है; दूसरा, जिसे गंभीर बीमारी है लेकिन बचने की उम्मीद है; तीसरा, जो मरणासन्न है और बचने की उम्मीद कम है। इसमें किसे पहले लिया जाएगा?

दूसरे समूह को प्राथमिकता मिलेगी। तीसरे को मरने छोड़ दिया जाएगा। पहले को घर भेज दिया जाएगा। यही अंतरराष्ट्रीय प्रोटोकॉल है।

आप चाहे ब्रीच कैंडी अस्पताल पहुँच जाएँ, वहाँ एक आइसीयू में पचास वेंटिलेटर की उम्मीद नहीं। दो से चार वेंटिलेटर प्रति आइसीयू, एक बढ़िया आइसीयू है। अब महामारी में क्या करेंगे? महामारी तो छोड़िए, साधारण स्थिति में भी जब बीस-बीस दिन तक वेंटिलेटर पर मरीज रहते हैं और कोई गंभीर जरूरतमंद आ जाता है तो चिकित्सक ‘डू नॉट वेंटिलेट’ लिखवाने के लिए समझाना शुरू कर देते हैं। कि भाई! यह तो बीस दिन से रिकवर नहीं कर पा रहे, वेंटिलेटर अब हटा दिया जाए? मरीज के परिजनों के मानते ही, हटा दिया जाता है। यूरोप में यह निर्णय चिकित्सक और सिर्फ एक निकटतम परिजन मिल कर करते हैं। आपदा के समय यह प्रतिबद्धता भी नहीं। हाँ! इसमें अनैतिक है अगर किसी नेताजी या वीआइपी को वेंटिलेटर और सुविधाएँ दी गयी, और जरूरतमंद को नहीं दी गयी। यह न किया जाए।

यही संसाधन-प्रबंधन टेस्टिंग पर भी लागू है। टेस्टिंग-किट बचा कर चलना है। बूथ नहीं खोलने कि लाइन लगा कर जाँच करा लो। जो स्वास्थ्यकर्मी रोज कोरोना मरीजों से संपर्क में हैं, और उन्हें सर्दी-खाँसी हो गयी है, वह भी जाँच नहीं करा रहे। इसलिए कि मरीजों के लिए किट उपलब्ध रहे। वे स्वयं अदल-बदल कर क्वारांटाइन में जा रहे हैं। अब नियम यह आया है कि तीन दिन बाद अगर वह स्वस्थ महसूस कर रहे हैं तो वापस काम पर आ जाएँ। इसी सहयोग की सबसे अपेक्षा है। अपना ट्रायज स्वयं करें कि आपकी जरूरत कितनी है। अगर आपके बचने के चांस 98 % हैं तो क्या वाकई आप पर टेस्ट और अस्पताल का खर्च उठाया जाए, या आप घर बैठें और दूसरों से दूरी बना कर रखें?

यह निर्मम या क्रूर निर्णय नहीं है, यह एक दूसरे को बचाने का संघर्ष है। और यह आज नहीं शुरू हुआ।

कॉन्टैक्ट-ट्रेसिंग

जो विदेश से आए, उनकी कुंडली निकाली जाए। स्कैंडिनैविया में पिछले दस दिन से यही चल रहा है। सभी फ्लाइट की लिस्ट निकाल कर उसके यात्रियों की कुंडली निकाल कर जाँच चल रही है। आप अगर फॉलो कर रहे होंगे तो दिखेगा कि सभी स्कैंडिनैवियाई देश कोरोना जाँच में सबसे आगे चल रहे हैं। फलत: उनकी गिनती भी सबसे तेज गति से बढ़ रही है। लेकिन मृत्यु-दर बहुत कम है। यह ‘कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग’ है। आप अगर किसी मित्र या परिजन को जानते हैं, जो विदेश से आया, उसकी खबर करें। उसे अपने स्तर पर क्वारांटाइन कर दें।

नॉर्वे में तो खैर क्वारांटाइन से भागने पर 2000 डॉलर फाइन या जेल का नोटिस निकल चुका है। अब तक 28500 लोगों की जाँच पूरी हो चुकी है, जिनमें पंद्रह सौ में वायरस पाया गया। उनके सभी कॉन्टैक्ट को घरबंद कर दिया गया। चार बुजुर्गों की मृत्यु हुई। 90 % लोग फिट हैं। जितने जाँचे गए, उनमें भी लगभग 80 % के अंदर वायरस नहीं मिला। अभी भी ढूँढा जा रहा है कि कोई रह तो नहीं गया।

यह सबसे सहज तरीका है, जब संक्रमण को उसके पहले ‘चेक-प्वाइंट’ पर रोका जा सकता है। केरल ने बेहतरीन तरीके से यह कुंडली निकाली और संक्रमण पर रोक लगायी। अब कर्नाटक यह मॉडल अपना रहा है। उड़ीसा ने विदेश से लौटने वालों के ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन का एक साइट बनाया है। वहीं दिल्ली हवाई-अड्डे पर आज देखा कि हंगामा हो गया। लोग जाँच कराने को तैयार नहीं। यह सरकार के साथ-साथ हमारी जिम्मेदारी है कि अपने बीच में से उन लोगों को मार्क करें, और उनके सभी कॉन्टैक्ट को। एयरलाइन्स तो यह डाटा दे ही चुकी होगी, लेकिन देश विशाल है। लोग कहाँ-कहाँ पसर गए होंगे। ईरान से आया वायरस लद्दाख़ में जाकर मिला। इसी तरीके से। कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग से।

भारत का समाज तो बहुत ही घना समाज है। हर व्यक्ति को पूरे मुहल्ले की खबर रहती है। यहाँ यह सुलभ है। यूरोप वाली बात नहीं कि पड़ोस की भी खबर नहीं। इस गुण को अब प्रयोग में लाने का वक्त है। यह मुखबिरी संक्रमण रोक लेगी।

संक्रमण में सबसे अधिक घातक है, वह स्वस्थ व्यक्ति जिसमें कोई लक्षण न हो, लेकिन वायरस पाल रहा हो। उस छुपे रुस्तम को पकड़ने का यही एक माध्यम है।

समुदाय चेतना

यह मानव-संस्कृति का हिस्सा रहा है, जो छोटे-बड़े कार्य से लेकर आपदा तक के लिए प्रयोग में रहा है। इसका फॉर्मैट साधारण है। एक समुदाय एक लक्ष्य तय करता है, जैसे बाढ़ के समय टूटे पुल की मरम्मत करनी है। हर उम्र के लोग जमा होते हैं, सामान इकट्ठा किए जाते हैं, वहीं साझा चूल्हा पर खाना बन रहा होता है, गीत गा रहे होते हैं और पुल बन रहा होता है। बिहार के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में यह (कन्सार) आम है। सरकारी मदद तो जब आएगी, तब आएगी। शायद कभी न आए।

यूरोपीय देशों में यह विश्व-युद्ध के समय शुरू हुआ, जब राज्याध्यक्ष हिटलर के आक्रमण से भाग गए, सरकार रही नहीं, और जनता ने खुद ही मिल कर कार्य संभालने शुरू किए। यह प्रथा नॉर्वे में ‘दुग्नाद’ कहलाती है। इसमें लोगों को एक नोटिस आ जाता है कि आज मुहल्ले के सभी गिरे पेड़ हटा कर किनारे करने हैं और सफाई करनी है। यह कहने के लिए स्वैच्छिक है, लेकिन, यह होता अनिवार्य है। आप चाहे कितने भी अमीर हों, आपको फावड़ा, बड़े झाड़ू लेकर पहुँचना ही है। वहाँ खाने-पीने का इंतजाम भी सब मिल कर करेंगे, संगीत बजेगा, और काम होगा। हद तो यह है कि सरकारी स्कूलों के मैदान और कैम्पस की अर्धवार्षिक सफाई भी सरकार नहीं करती, सभी अभिभावक मिल कर करते हैं। यही सालों से प्रथा चली आ रही है।

लगभग एक हफ्ते पहले नॉर्वे की प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय दुग्नाद की घोषणा कर दी। ऐसा दशकों से नहीं हुआ था। इसका अर्थ ही है कि अब सरकार बस सहायक भूमिका निभाएगी, कार्य तो जनता को ही करना है। अब फेसबुक का जमाना है तो वहाँ भी कैम्पेन शुरू हो गए, लक्ष्य दिए जाने लगे। उन्हीं में एक लक्ष्य है कि एक भी क्वारांटाइन घर से निकलने न पाए। मुहल्ले वाले यह सुनिश्चित करें, जरूरत हो तो पुलिस को खबर करें। उनको राशन-पानी की जरूरत हो तो लाकर देते रहें, लेकिन घर से निकलने न दें। और अब नया लक्ष्य मिला है कि जितने भी स्वास्थ्य में थोड़े-बहुत भी अनुभव वाले लोग हैं, वे रजिस्टर करें। यह मास-मेसेज सरकार की तरफ से सबको मिल गया।

अब इसमें यह नहीं कह सकते कि यह मेरी जिम्मेदारी नहीं, सरकार की है। सरकार की भूमिका बस कोऑर्डिनेशन की है। और उन हज़ारों लोगों की मदद, जिन्हें नौकरी से निकाला जा रहा है। निजी अस्पतालों ने जब अपने द्वार खोल दिए हैं, तो उनके होने वाली आर्थिक हानि में भी सरकार कुछ मदद कर रही है। लेकिन, कुल मिलाकर सामुदायिक चेतना का अर्थ यही है कि अब सरकार भी इस समुदाय का हिस्सा ही है। उसे भी हमें ही बचाना है। यह राष्ट्र-आपदा ही नहीं, विश्व-आपदा है और इसमें निजी स्वार्थ का स्थान न्यूनतम है।

यह आपदा खत्म हुई तो यही लोग एक-दूसरे का मुँह भी नहीं ताकेंगे। बैक टू बिजनेस चल देंगे। भारत इस मामले में कई कदम आगे है, और यहाँ समुदाय-बोध कभी खत्म नहीं होता। बस इसे जगाने की देरी है। यह इमरजेंसी है और मान कर चलिए कि दुनिया की काबिल सरकारों में भी इसे रोकने की शक्ति नहीं।

मास क्वारांटाइन

इसकी जरूरत अमूमन नहीं पड़ती, लेकिन बड़े देशों में यह कभी-कभी जरूरी होता है। जैसे चीन और भारत बड़े देश हैं, जहाँ अगर संक्रमण का केंद्र मालूम है, तो उसे बाकी के देश से काट कर ‘क्वारांटाइन’ करना पड़ता है। चीन में इसमें कुछ देर हुई, लेकिन पहले वूहान और आस-पास के शहरों के रास्ते बंद कर दिए गए, फिर पूरे हूबइ प्रांत के। इस वजह से काफी हद तक संक्रमण उस इलाके तक सीमित रह गया, और पूरे चीन में उस विकराल रूप में नहीं पसरा। इसका प्रबंधन भी सुलभ होता है कि पूरे देश की बजाय एक क्षेत्र पर फोकस करना। और आज चीन इस स्थिति में पहुँच रहा है कि एक भी नए केस नहीं मिल रहे। यह भारत में भी पहले गुजरात प्लेग के समय किया जा चुका है।

नॉर्वे में मेरे जिले में पिछले हफ्ते में मात्र एक केस मिला। मेरे पड़ोस के दो जिलों में भी बस एक-एक केस हैं। लेकिन ठीक अगले दो जिलों को मिला कर एक हज़ार केस हैं! ऐसा कैसे संभव है कि दो जिले मिला कर हज़ार केस हों, और पड़ोसी में बस एक? यह तो कोई तार्किक अनुपात ही नहीं। और ऐसा भी नहीं कि ट्रेन-बस बंद कर दिए गए। यह ‘मास क्वारांटाइन’ से संभव हो पाता है, जब उस क्षेत्र के लोगों को आवा-जाही बंद करने कह दिया जाता है। अब बीमारी पूरी गति से पसरेगी, लेकिन एक सीमित क्षेत्र में। वहाँ सरकारी फंड और संसाधन भी केंद्रित किए जाएँगे। इससे कुछ बीमारियों में एक सामूहिक इम्यूनिटी भी बनती है, जिसे ‘हर्ड इम्यूनिटी’ कहते हैं। लेकिन, कोरोना में यह संभव नहीं हो सका है।

भारत में भी यह पद्धति लागू है ही, और हो भी रही है। महाराष्ट्र से यातायात घटाने के प्रयास चल रहे हैं। जिन शहरों में एक भी केस मिल रहे हैं, वहाँ धारा 144 लगाने की कवायद चल रही है। यानी, उस शहर के लोग सामूहिक रूप से क्वारांटाइन पर चले जाएँ और आगे पसरने न दें।

यह ब्रह्मास्त्र है, लेकिन आर्थिक रूप से यह सबसे कारगर उपाय है। क्योंकि पूरे देश में पसरने के बाद संसाधन का वितरण असंभव होता जाता है, जिस समस्या से अमरीका जैसा शक्तिशाली और धनी देश अब जूझ रहा है।

आयु का गणित

अब यह कोई छुपा रहस्य नहीं कि कोरोना एक ख़ास आयु-वर्ग को टारगेट कर रहा है। तमाम कॉन्सपिरेसी थ्योरी के पीछे भी यह कहानी है जब वे इस साँख्यिकी का हवाला देते हैं। यह इस मामले में विचित्र तो है कि अगर यह महामारी अपने चरम पर पहुँच जाती है तो संभवत: अस्सी वर्ष से ऊपर की बड़ी जनसंख्या खत्म हो चुकी होगी। ये प्रश्न भी उठ रहे हैं कि जर्मनी और स्कैंडिनैविया में मरीजों की संख्या के मुकाबले मृत्यु-दर क्यों कम है? इसका भी जवाब यहीं छुपा है।

अगर आँकड़े देखें जाएँ तो इन देशों के कोरोना मरीजों में लगभग तीन-चौथाई सत्तर वर्ष से कम उम्र के लोग हैं। और उन पर कोरोना का प्रभाव कुछ ख़ास नहीं पड़ रहा। वहीं इटली के मरीजों में लगभग सत्तर प्रतिशत लोगों की उम्र पचास से ऊपर है, तो सैकड़ों मर रहे हैं।

इस गणित के पीछे एक और वजह है कि जर्मनी और स्कैंडिनैविया बड़े पैमाने पर जाँच कर रही है। जर्मनी में तो ‘ड्राइव-थ्रू’ से कोरोना की जाँच हो रही है। ऐसा दक्षिण कोरिया में जरूर हुआ कि हल्के शक पर भी पकड़ कर जाँच करने लगे, लेकिन अन्य देश इस तरह की रणनीति नहीं अपना रहे। भारत के बजट पर तो यह मुमकिन ही नहीं, हमें भी यह समझना चाहिए। नॉर्वे में लगभग 45000 लोगों को जाँचने के बाद 2000 पॉजिटिव मिले। और मृत्यु हुए मात्र सात। यह ‘ओवर-टेस्टिंग’ है, जो एक अमीर देश ही एफॉर्ड कर सकता है; भले WHO कहती रहे।

लेकिन, एक बात जो स्पष्ट दिखने लगी है, वह ये कि सत्तर वर्ष से ऊपर के लोग अब पूरी तरह से सचेत हो गए हैं। और चूंकि इन देशों में वृद्ध अलग ही रहते हैं तो उनका अपने परिवार से संपर्क यूँ भी कम है। वहीं, ईरान में यह देखा गया कि स्वस्थ बेटे-बेटियों ने अपने अंदर पल रहे वायरस घर के बुजुर्गों को संक्रमित किए, और वे चल बसे। भारत में भी जो दूसरी मृत्यु हुई, वह यूरोप से लौटे बेटे ने अपनी बूढ़ी माँ को दिया था। हमारे समाज में बुज़ुर्ग अपने संतानों से अधिक संपर्क में हैं, कई निर्भर भी हैं, इसलिए उन तक बीमारी पहुँचनी सहज है। भले वे पूरे दिन घर में ही रहें, उनके संतान बाहर से वायरस ले आएँगे। युवा वायरस पाल कर भी स्वस्थ रहेंगे, लेकिन उनके घर के बुजुर्ग गंभीर हो जाएँगे।

इस पूरी भूमिका का ध्येय यह है कि हम जब ऑफिस से या बाहर से घर लौटें, तो निश्चिंत रह सकते हैं कि कोई गंभीर बीमारी नहीं होगी। लेकिन, आप यह ध्यान रखें कि घर में बुजुर्ग भी हैं, और उनके लिए यह जानलेवा हो सकता है। उनसे संपर्क से पहले, अपने कपड़े बदल कर, हाथ धोकर, वायरस-मुक्त हो जाएँ। तभी मिलें। यह बात कोरोना से इतर भी लागू होती है।

उस संतान की मनोस्थिति सोचिए, जिसे मामूली छींक आयी, वह ठीक भी हो गया; लेकिन उसे मालूम पड़ा कि उसी की वजह से उसकी माँ की मृत्यु हो गयी। यह भला कौन चाहेगा?

महामारी के समय बिजनेस कैसे चले?

हमलोग उस व्यवस्था में हैं, जहाँ हर हफ्ते कंपनी का आय-व्यय ईमेल पर रहता है। दिल की धड़कनें भी उससे नियंत्रित होती है। जैसी ही यह गिरता है, आपातकालीन बोर्ड-मीटिंग बैठ जाती है। अब तो यह रोज ही होती है, कि आगे क्या?

जब दक्षिण कोरिया के प्रधानमंत्री ने कहा कि लॉकडाउन अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी का शब्द है, तो कई लोगों ने विरोध किया। लेकिन, वह जानते थे कि उनकी व्यवस्था इन कंपनियों के बंद होते ही सड़क पर आ जाएगी। वह पकिया पूँजीवादी देश के मुखिया हैं। मुझे यकीन है कि डॉनाल्ड ट्रंप जैसे मँजे हुए पूँजीवादी भी लॉकडाउन नाम से ही हिल जाएँगे। कहावत है- ‘अमेरिका नेवर स्टॉप्स’। WTC क्रैश के अगली सुबह भी सब काम पर नॉर्मली गए।

खैर, कुछ रणनीतियाँ जो योजना में है, या पहले की गयी है, उनका जिक्र कर रहा हूँ। इनमें अधिकतर भारत में संभव नहीं।

1. मालिक की जिम्मेदारी- कंपनी के मालिक यह स्क्रीनिंग खुद कर रहे हैं। दक्षिण कोरिया में तो कंपनी के दरवाजे पर ही बुखार होने पर ‘बज़र’ बज जाता है। यहाँ भी तापमान-स्कैनर और स्क्रीनिंग की व्यवस्था लगायी जा रही है।

2. जॉब क्वारांटाइन- मैनुफैक्चरिंग सेक्टर में यह करने की योजना है। एक जिले में शुरू हो चुका। इसमें हर आदमी दूरी बना कर रहेगा, उसका जॉब एरिया और कॉन्टैक्ट सीमित रहेगा। यह व्यवस्था भी मालिक की है।

3. रोटेशन- यह महाराष्ट्र में शुरू किया जा चुका है कि बारी-बारी से लोग काम पर आ रहे हैं। स्वास्थ्य में यहाँ रोटेशन क्वारांटाइन है। यानी, जो कोरोना मरीज से संपर्क में रहा, वह क्वारांटाइन में जा रहा है, और उसके लौटने पर अगला जाएगा। यह मान कर कि बीमारी अभी लंबी चलेगी।

4. बल्क एस.एम.एस., ड्रोन मेसेज, प्रचार से एलर्ट बनाए रखना।

5. GPS क्वारांटइन- यह भी इक्कीसवीं सदी की सुविधा है कि अस्पताल के आइसोलेशन वार्ड भरने की बजाय केस को अपने घर में ही एक चिप दी जाए। और गतिविधि ट्रैक रखी जाए। यह दक्षिण कोरिया के बाद यूरोप में किया जा रहा है। कमाल की बात है कि इस लॉजिस्टिक में दिमाग भारतीय कंपनियों का भी है।

6. कड़े जुर्माने- क्वारांटाइन से भागने की सजा लगभग आधी वेतन के बराबर है, अथवा जेल

7. नौकरी से निकालना- वर्कफोर्स घटा कर उनसे काम अधिक लेना। यह तो आर्थिक मंदी का प्रतिफल है ही। इस उम्मीद पर कि गाड़ी वापस पटरी पर आ जाएगी।

8. वृद्धों का आइसोलेशन- यह भारत में असंभव है, लेकिन वृद्धाश्रम वाले देशों में यह किया जा रहा है।

9. अधिक और तेज जाँच- यह भी अमीर देशों के लिए ही। खर्च बीमा कंपनी, इंप्लॉयर और सरकार बाँट सकती है।

10. खरीद-बिक्री का रीटेल से ऑनलाइन शिफ्ट

11. कुछ क्षेत्रों में वर्क फ्रॉम होम और टेली-एजुकेशन

इन सब पर सही-ग़लत की बात हो सकती है, लेकिन ध्यान रहे कि दुनिया में समाजवाद अगर है भी, तो उसकी नींव पूँजीवाद है। मानवीय मूल्य उसी ‘प्रॉफिट-लॉस’ के पास गिरवी हैं। दान-पुण्य भी बैंक-बैलेंस से ही छन कर आता है, और सरकारी खजाना भी।

इम्युनिटी

अब लोग कई लेख-अफवाह आदि पढ़ कर कोरोना-विशेषज्ञ बन गए होंगे। WHO के निदेशक ने पिछले महीने इस बीमारी को ‘इन्फोडेमिक’ कहा कि लोग महामारी से अधिक सूचना-मारी से मर जाएँगे। सोचिए कि एक अस्सी साल के बुजुर्ग जिन्हें हृदयाघात आ चुका है, जब रोज इटली की खबरें टीवी पर सुनते होंगे तो कैसी नींद सोते होंगे? कोरोना तो बाद में आएगा, वह इस अवसाद भरे माहौल से दम तोड़ देंगे। इटली की खबर में सच्चाई है और मैंने भी पहले (पोस्ट 6.) लिखा है, लेकिन चिकित्सक इस सच्चाई का ढिंढोरा उनके समक्ष भला क्यों पीटें? परिजन भी क्यों डराएँ?

यह बात कोई रहस्य नहीं कि अमुक बुजुर्ग ने ये अस्सी बसंत किन-किन विषाणुओं और जीवाणुओं के मध्य रह कर गुजारे होंगे। पटेल चेस्ट संस्थान दिल्ली के केंद्र में है, जहाँ तपेदिक के मरीज यूँ ही चाय पीते मिल जाएँगे, और नॉर्थ कैम्पस के कपल भी वहीं साथ बैठे। कभी यही तपेदिक एक अभिशाप था, लेकिन हालात कुछ यूँ बने कि लाखों लोग गुप्त तपेदिक या पुराने तपेदिक के साथ लंबा जीवन जी गए। भारत में इबोला और नीपा जैसे 77-95 % मृत्यु-दर वाले खूँखार वायरस आकर भी आतंक न मचा सके। येल्लो फीवर आया ही नहीं।

कोरोना की ही बात करें तो पहले SARS आया (2003), विश्व के 29 देशों में फैला, हज़ारों लोग मरे। भारत में मात्र तीन मरीज मिले, और तीनों ठीक हुए। MERS (कोरोना का दूसरा वायरस) पूरे मध्य एशिया में कहर मचाता रहा, और कई भारतीय वहाँ से आते-जाते रहे, लेकिन भारत में एक मरीज न मिला। और अब यह तीसरा कोरोना। यह भी अब नहीं आया, फरवरी में ही आ गया, और डेढ़ महीने तक सुस्त रहा। वूहान में जब यह चरम पर था, तब जो 327 भारतीय वहाँ से लाए गए, उनमें भी नहीं मिला। वे आखिर कैसे बच गए? और जो अब मर रहे हैं, वे क्यों मर रहे हैं?

इसका उत्तर भी वहीं छिपा है कि इस फौलादी इम्युनिटी के बावजूद भारत में औसत आयु कम है। हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था का वितरण विषम है। उम्र के साथ ‘हाइ रिस्क ग्रुप’ यानी हृदय-रोग, रक्तचाप, गुर्दा-रोग, या जीवनशैली समस्याओं के समूह बढ़ते जा रहे हैं। इस वायरस में यह ख़ास देखा गया है कि उम्र और पुराने मर्जों से कमजोर व्यक्ति टूट जाता है। पंजाब में मृत्यु हृदयाघात से, तो पटना में मृत्यु गुर्दा रोग के मरीज की होती है। पटना के मरीज की कम उम्र में ही किडनी की समस्या थी। आने वाले समय में ऐसी मृत्यु और भी कई होगी।

लेकिन, इसे ‘इन्फोडेमिक’ बनाने से बचना होगा। क्रिकेट स्कोर की तरह रोज पूछना कि आज कितने? इससे अब चिकित्सक भी टूटने लगे हैं, जनता तो खैर टूटेगी ही। हाँ! यह पूछिए कि आज कितनों की इम्युनिटी ने वायरस को मात दिया? साठ से ऊपर के टॉम हैन्क्स दंपति कोरोना पाले घर पर बैठे हैं, और दूसरे हफ्ते में कह रहे हैं कि अब तक स्वस्थ हैं। ऐसी और भी कहानियाँ रोज मिलेगी, जिनका शरीर लड़ रहा है। हम संभल कर रहें, पॉजिटिव रहें, हमारा भी लड़ेगा।

सुनें मेरी बातचीत स्टोरीटेल, इंडिया पर गिरिराज किराडू से

ऑडियोबूम पॉडकास्ट – https://audioboom.com/posts/7536684-

ऐप्पल पॉडकास्ट- https://podcasts.apple.com/us/podcast/bolti-kitabein-%E0%A4%AC-%E0%A4%B2%E0%A4%A4-%E0%A4%95-%E0%A4%A4-%E0%A4%AC/id1385298984

प्लेयर FM- https://player.fm/series/bolti-kitabein-boltii-kitaaben/ep-67-yh-snsaar-kaa-ant-ktii-nhiin-hai-ummiid-rkhiye-khyaal-rkhiye-ddon