दक्खिनी हिन्दी

दक्खिन के कई मुसलमान दखिनी हिंदी बोलते हैं। इसे दखिनी ऊर्दू भी कहते हैं, पर मूलत: यह दखिनी हिंदी और दखिनी ऊर्दू एक ही है। कहते हैं दखिनी के अंतिम कवि हुए वली औरंगाबादी, और वही ऊर्दू के पहले कवि भी हुए।

यह बातें आज मेरे एक मलयाली मित्र के पिता ने बताई। वो मेरी हिंदी किताब एक दिन में निपटा गए। वाजपेयी जी से ‘श्रम श्री’ पुरस्कार पा चुके हैं, और उनकी लिखी कविताएँ भी सुना गए। उनके घर गया तो सब मलयाली फिल्म देख रहे थे। छोटे बच्चे हिंदी में बतिया रहे थे, वो भी नॉर्वे में। यह कई हिंदू परिवारों में देखने को नहीं मिलता। पर दक्खिन के कई मुस्लिम परिवारों की मातृभाषा आज भी दखिनी ही है। चाहे कहीं भी हों।

दखिनी ख़ालिस ऊर्दू नहीं है, खड़ी बोली के करीब है। हैदराबादी भाषा इसी का एक रूप है।

मेरे कू, तेरे कू, साहिब लोगाँ, चपाती बनाको दूँ? कायकू जायींगा?

हैदराबाद में इसमें अनुनासिका का उपयोग शायद खूब होता है। तमिल और मलयाली मुसलमानों में नाक का उपयोग बोली में कम है।

दरअसल कर्नाटक के कई हिस्से जो निजाम के अंदर थे, और वो हिस्से जो आदिल शाह के अंदर थे, वहाँ मुसलमानों में दखिनी का प्रभाव रहा। उन्होनें कन्नड़-तेलुगु भी सीखा, पर मातृभाषा दखिनी ही रही, जिसे वो ऊर्दू कहते हैं। पर लखनवी ऊर्दू के सामने यह कहीं से ऊर्दू नहीं नजर आती। ऊर्दू लिपि भी तमिल और मलयाली मुसलमान नहीं समझ पाते। देवनागरी पढ़ गए।

हालांकि यहाँ एक दूसरा वर्ग भी है जो यमन-अरब से व्यापारी बन कर आए और यहीं बस गए। वो अब स्थानीय भाषा बोलते हैं। जैसे अब्दुल कलाम तमिलभाषी थे। इसी तरह मैंगलूरू के बेयरी भाषी लोग। पर फिर भी बड़ा प्रतिशत हिंदी भाषी ही है।

गर हिंदी भाषियों की गिनती करनी हो, तो इन दखिनी मुसलमानों को भी गिनना चाहिए।

(दखिनी = दक्कनी = दक्खिनी)

खुशहाली का पंचनामा: पुस्तक अंश

प्रकाशन: मैन्ड्रेक पब्लिकेशन

लेखक: प्रवीण झा

विश्व के सबसे ख़ुशहाल कहे जाने वाले देश नॉर्वे को टटोलते हुए ऐसे सूत्र मिलते हैं जो भारत में पहले से मौजूद हैं। बल्कि मुमकिन है की ये भारत से बह कर गए हों। लेखक ने रोचक डायरी रूप में दोनों देशों के इतिहास से लेकर वर्तमान जीवन शैलियों का आकलन किया है। ‘ख़़ुशहाली का पंचनामा’ एक यात्रा संस्मरण नहीं प्रवास संस्मरण है। लेखक बड़ी सहजता से आर्यों की तफ़तीश करते हुए रोज़मर्रा के क़िस्से सुनाते चलते हैं और उनमें ही वे रहस्य पिरोते चलते हैं, जिन से समाज में सकारात्मक बदलाव आ सकता है। इस डायरी का ध्येय यह जानना है की कोई भी देश अपने बेहतरी और ख़ुशहाली के लिए किस तरह के क़दम उठा सकता है।

ख़ुशहाली क्या वाक़ई परिभाषित की जा सकती है या यह सब बस एक तिलिस्म है? स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक समरसता की बहाली क्या कोई लोकतांत्रिक सरकार करने में सक्षम हो सकती है? क्या मीडिया स्वतंत्र हो सकती है? क्या अमीरी-ग़रीबी के भेद वाक़ई मिट सकते हैं? क्या मुमकिन है और क्या नहीं? और अगर मुमकिन है तो आख़िर कैसे?

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अध्याय: जेंडर न्यूट्रल देश

…सुंदरियाँ हैं पर कोई फैशन या हॉट-ड्रेस कह लें, नहीं। शान से कहेगी, ये कार्डीगन मैंने बुना है। शरीर को लेकर कोई ‘कॉन्शस’ नहीं। बातें करते नेक-लाइन नीची हो जाए, तो सँभालेगी नहीं। बेशर्मों की तरह यूँ ही बात करती रहेंगीं। यहाँ तक कि पुरूष भी कपड़े बदल रहा हो, मित्र हो और जल्दी हो, धड़ल्ले से घुस कर अपनी बात कहेगी। शरीर की कोई प्राथमिकता नहीं। यहाँ सब नंगे हैं, आदम हैं।

औरों की तरह मुझे भी लेकिन यह कौतूहल हुआ कि गर प्रेम करना हो, तो आखिर यहाँ करे कैसे? क्या ऑफ़िस में ही किसी से दोस्ती करनी होगी, या बार में किसी महिला से बात करनी होगी? क्या यह स्कर्ट में नंगी टांगों वाली गोरियाँ यूँ ही मान जातीं होंगी? या पैसे से प्रेम होता होगा?

हालांकि प्रेम की कोई निश्चित परिभाषा नहीं। ‘डेट’ पर कैसे जाएँ? यह पूछना आसान है। चूँकि यहाँ व्यवस्थित विवाह नहीं, लोग खुद ही ‘डेट’ पर जाते हैं। हर उम्र में। किसी का कल तलाक हुआ या पत्नी ने कहा कि उसका नया प्रेमी मिल गया, तो आज वह अपनी प्रेमिका ढूँढने निकल पड़ा। समय क्यूँ बरबाद करना?

अध्याय: धुरी से ध्रुव तक

…दूर से कुछ गीतों की धुन तो सुनाई दे रही थी। और तमाम गॉगल पहने गोरियों की खुली पीठ नजर आ रही थी। कुछ पीठों पर कलाकारियाँ थी। होंगे इनके कोई देवी-देवता। किसी की पीठ पर सांप लोट रहा था तो किसी पर तिब्बती लिपि में कुछ उकेरा था। पीठें थी ही ऐसी ‘पेपर-व्हाइट’ की कलम चलाने का दिल कर जाए। पर मैं इन मोह-पाशों से मुक्त होकर इधर-उधर देखने लगा।

नदी बिल्कुल नीली थी। क्या पता यहीं-कहीं समंदर में जाकर जुड़ती हो। नॉर्वे का मानचित्र देख तो यही लगता है कि समुद्र से सहस्त्र धाराएँ निकल कर धरती को भेद रही हों। हज़ारों नदियाँ, खाड़ी, दर्रे, और झील। कुछ समुद्र से अब भी जुड़े हैं, कुछ छिटक कर अलग हो गए। अलग तो हो गए, पर रंग नीला ही रह गया। जड़ों से कितने भी दूर हो जाओ, मूल कभी साथ नहीं छोड़ता। तभी तो यह पाश्चात्य जलधारा मुझे छठ और हर की पौड़ी का स्मरण करा रही है। मैं मन ही मन हँस कर वापस यथार्थ में लौटा। यह नॉर्वे है जनाब। यहाँ अपनी मिट्टी नहीं, अपनी नदियाँ नहीं, अपना आकाश नहीं। यहाँ सब पराया है। लेकिन नदी में तमाम नाव देख उत्साहित तो हुआ।

यहाँ हर तीसरा गाड़ी रखे न रखे, नाव (बोट) ज़रूर रखता है। किसी जमाने में नॉर्वे में ‘वाइकिंग’ योद्धा थे जो बड़े जहाज रखते थे। अब दस्यु नहीं रहे, पर नाव रखने का रिवाज है। केरल के अष्टमुदी झील के आस-पास के गांवों में भी सब नाव रखते थे। यहाँ तो देश ही अष्टमुदियों से भरा पड़ा है। हजारों बोट लगी पड़ी है, और हर बोट में मदिरा, धुआँ, नृत्य और गप्पें। नावों की रेस हो रही है, पर कोई चप्पू नहीं चला रहा। मुँह में सिग़रेट डाले मोटरबोट का स्कूटर हाँक रहा है।…

अध्याय: आर्यों की खोज में

… नॉर्वे में भूत नहीं ‘हेक्सा’ होते हैं। तिरछे पैरों वाली डायन। उत्तर की बर्फीली नदियों में मिलती हैं। ऐसा लोग कहते हैं। सच की ‘हेक्सा’ होती या नहीं, यह अब किसी को नहीं पता। पर सत्रहवीं सदी तक यह डायन उत्तरी नॉर्वे में आम थीं। वे तंत्र-मंत्र से वशीकरण करतीं। बाद में इनमें कई डायनों को फांसी दे दी गयी। मैं जब इनकी खोज में घूम रहा था तो उत्तरी नॉर्वे के सामीयों से मुलाकात हुई।

वह उत्तरी नॉर्वे जो वीरान है, जहाँ कुछ लोग हाल तक बर्फ की गुफाओं में रहते थे। वहाँ तीन महीने सूर्य न उगते, न नज़र आते हैं। वहाँ कई हिस्सों में गाड़ियाँ नहीं चलती क्योंकि हर तरफ बर्फ ही बर्फ है। ‘स्लेज’ को जंगली कुत्ते खींचते हैं। कुत्तागाड़ी कह लें। यही हाल अलास्का का भी है। यह प्रदेश आज भी आदम-काल में जी रहे हैं। प्रकृति के रूखे रूप में।

“भला आप यहाँ रहते ही क्यों हैं? ओस्लो क्यों नहीं चले जाते?” मैंने वीराने में घर बनाए एक व्यक्ति को पूछा।

“जब ओस्लो जाना होता है, जाता हूँ। पर उस रेलमपेल में मैं नहीं जी सकता। यहाँ सुकून है।”

“फिर भी। खाने-पीने की तमाम समस्यायें?”

“खाने की समस्या तो कहीं नहीं होती। अथाह समुद्र के किनारे इस बर्फीले देश में मछलियाँ ही मछलियाँ हैं। और वह भी ताज़ा। हमारी दुनिया डब्बाबंद नहीं, खुली है।”

“आपको पता भी लगता है कि बाकी दुनिया में चल क्या रहा है?”

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किंडल पर पुस्तक कैसे प्रकाशित करें?

आवश्यक सामग्री

  1. वर्ड (.doc) फाइल में किताब: अध्यायों के शीर्षक के लिये Heading 1 फॉन्ट का प्रयोग करें, Title फॉन्ट नहीं। Alignment को justify न करें, Left align ही रखें। किसी भी छपी हुई किताब का सहारा लेकर कॉपीराइट पेज भी बनायें। हर अध्याय के बाद Page break/Chapter break (insert पर क्लिक कर) का प्रयोग करें।
  2. Kindle Create सॉफ़्टवेयर- इस लिंक से मुफ्त डाउनलोड https://kdp.amazon.com/en_US/help/topic/GYVL2CASGU9ACFVU
  3. कवर डिजाइन कर लें/करवा लें तो बेहतर
  4. पुस्तक में अगर कोई चित्र (कॉपीराइट फ्री) हो तो उसकी फाइल

Step1 : Kindle Create Software प्रयोग कर फॉर्मैटिंग कर लें। अगर हिन्दी से इतर भाषा (मैथिली, अवधी, भोजपुरी आदि) भी देवनागरी लिपि में लिखी हो, तो Hindi सेलेक्ट करें। अध्याय, टेबल ऑफ कंटेट्स, चित्र आदि सेट कर लें।

Step2: https://kdp.amazon.com पर जाकर अपनी अमेजन आइ.डी. बनाएँ और लॉग इन करें

Step3: किताब के सभी डिटेल डाल दें। हिन्दी किताब हो, तो भी नाम दोनों भाषाओं (अंग्रेज़ी और हिन्दी) में लिखें। ढूँढने में आसानी होगी। Keywords में यथासंभव शब्द भर दें (अंग्रेज़ी में), जिससे आपके किताब के कंटेंट गूगल आदि पर सर्च किये जा सके। Description में भी कहानी गढ़ने से अधिक कीवर्ड्स डालने का प्रयत्न करें। इसके लिए HTML कोड भी लिख सकते हैं, जो मुफ्त जेनरेट की जा सकती है इस लिंक से- https://kindlepreneur.com/amazon-book-description-generator/

Step4: Kindle Create द्वारा तैयार .kpf फाइल अपलोड करें। कवर अपलोड करें। दाम रख लें। किताब को KDP Select में Enroll करने का सुझाव दूँगा, लेकिन वह वैकल्पिक है।

Step 5: Save and Publish

आपकी किताब तीन-चार घंटे में ऑनलाइन उपलब्ध होगी। आप कभी भी Step2 में बताए लिंक पर बिक्री, रॉयल्टी और कितने पृष्ठ पढ़े गए, देख सकते हैं। अगर कोई सुधार (प्रूफ़ की ग़लती आदि) हो तो कभी भी ठीक कर सकते हैं।

फॉर्मैटिंग उदाहरण के लिए मेरी किताब Gandhi Parivaar देख सकते हैं। उसकी फॉर्मैटिंग ठीक है।

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एक प्रवासी भारतीय के लिए कोरोना वायरस

(ये लेख 15 से 23 मार्च, 2020 के मध्य अलग-अलग स्तंभ में लिखे गए)

अब यह लिखना जरूरी लगा, तो कुछ बिंदु रख देता हूँ। भारत की अर्थव्यवस्था खुली होकर भी यह एक बंद देश है। इसके आस-पास दूर-दूर तक कोई लोकतंत्र नहीं। हम कोरोना के गर्भ चीन से सबसे लंबी सीमा रखते हैं, लेकिन वहाँ यूँ ही चहल-कदमी करते तो क्या, ट्रेन से भी आना-जाना संभव नहीं। पाकिस्तान, म्यांमार और बांग्लादेश तक से वही हालात हैं। इसलिए इसकी तुलना यूरोपीय देशों से नहीं हो सकती, जहाँ ‘ओपेन बॉर्डर’ है, बिना पूछ-ताछ, बिना वीसा। यही वजह रही कि चीन से चले वायरस को काफी हद तक ईरान, यूरोप, अरब और अमरीका के रास्ते घूम-फिर कर भारत आना पड़ा। लेकिन, अब तो आ गया। अब आगे क्या?

आगे यह कि इसका प्रभाव उन्हीं स्थानों से शुरू हुआ, जहाँ विदेश आवागमन अधिक है, जैसे बंबई, पुणे, बेंगलुरू, केरल, दिल्ली। इतने में हवाई रास्ता बंद कर दिया गया, लेकिन अंदाज़न हज़ार लोग आ ही गए होंगे। उनमें से सवा सौ अब तक (मार्च 17) पॉजिटिव आ गए। यह लॉट जाँचने में वक्त लगता है, क्योंकि कई लोग शुरू-शुरू में स्वस्थ ही रहते हैं। लेकिन सोचिए! अमरीका से बीस घंटे हवाई जहाज में बैठ कर कोई आदमी मुंबई/पुणे पहुँचा, और उसमें कोरोना निकला। तो क्या इतने लंबे सफर में एक भरे हुए हवाई जहाज और हवाई अड्डे में किसी और को न पसरा होगा? यही यूरोपीय देशों में भी हो रहा है कि पहले दस दिन तो उनको ढूँढते ही निकल जाता है, जो हवाई जहाज से यह लेकर आए थे। उन दस दिनों में लगभग हज़ार-डेढ़ हज़ार ढूँढ लिए जाते हैं। भारत में भी अगले हफ्ते तक मिल ही जाएँगे। भाग कर कहाँ जाएँगे?

उसके बाद भारत में बीमारी का पसार इटली, ईरान या चीन जैसे सघन देशों जैसा ही माना जा सकता है। पहले ही कुछ दिनों में 3 प्रति 100 का मृत्यु-आँकड़ा आ चुका है, जो बाकी के विश्व-औसत से अधिक है। उत्तरी यूरोप मे यह फ़िलहाल 3 प्रति हज़ार चल रहा है। इस गति से भारत में मृत्यु की संख्या तेज गति से बढ़ सकती है। हाँ! यह जरूर है कि इसे उड़ीसा के एक गाँव या हिमाचल के किसी सुदूर इलाके में पहुँचने में वक्त लगेगा, लेकिन मुख्य स्थानों और महानगरों में तो यह पहुँच ही जाएगा। यह भी एक विडंबना है कि पैन्डेमिक का आखिरी छोर विश्व के दूसरी सबसे बड़ी जनसंख्या वाले देश में है। क्योंकि बाकी कई देश अब धीरे-धीरे रिकवरी फेज तक पहुँचते जा रहे हैं। भारत अभी सबसे क्रिटिकल स्थिति में है, जबकि एक आभास हो रहा है कि हम बच जाएँगे, हमारी स्थिति दुनिया में सबसे अच्छी है। यह तो पैन्डेमिक का पैटर्न ही है कि एक समय में कहीं ज्यादा, कहीं कम होता है। यह चलायमान होता है। और इसका संकेत है कि जहाँ पहला केस देर से मिलना शुरू हुआ, उसकी स्थिति सबसे चिंताजनक है।

इसमें सरकार भी ख़ास मदद नहीं कर सकती, यह राष्ट्रीय चेतना से भले संभव है। लेकिन, कोई घर से निकले ही नहीं, मिले ही नहीं, बाज़ार ही न जाए, ट्रेन-बस में न चढ़े, यह भारत में असंभव है। ऐसे में राष्ट्रीय चेतना का मतलब यह होता है कि हम खुद को समुदाय में लाएँ। सभी निजी स्वास्थ्य-केंद्र सहयोग दें। जिनको हल्की बीमारी हो, उम्र कम हो, वे अस्पताल के बेड न भरें। युवक इसके लिए भी तैयार रहें कि स्वास्थ्य-वॉलंटियर बनना पड़े, और आप निश्चिंत रहें, विश्व भर में युवक लगभग इस बीमारी से सुरक्षित हैं। तमाम स्वास्थ्य-कर्मी काम कर ही रहे हैं, और फिट हैं। यह वृद्ध और पहले से बीमार लोगों के लिए ही घातक है, जिनकी संख्या देश में करोड़ों में है। उनकी रक्षा के लिए अस्पताल या सरकार नाकाफ़ी ही रहेगी, कहीं की भी।

यह बीमारी अब चिकित्सकीय नहीं, आर्थिक समस्या बन चुकी है। पूरी दुनिया मानव-इतिहास में इस तरह कभी बंद नहीं हुई।

कोरोना अंडर-टेस्टिंग और ट्रायज

जब सूरत में महामारी आयी तो आपदा-प्रबंधन चिकित्सक टीमों को यह स्पष्ट निर्देश था कि ‘ट्रायज’ प्रणाली अपनानी है। यह किसी भी आपदा (युद्घ/भूकंप/महामारी) के लिए लागू है। इसका अर्थ यह है कि चिकित्सक जरूरतमंदों को अलग-अलग समूहों में बाँटते हैं। पहला, जिसे हल्की बीमारी है; दूसरा, जिसे गंभीर बीमारी है लेकिन बचने की उम्मीद है; तीसरा, जो मरणासन्न है और बचने की उम्मीद कम है। इसमें किसे पहले लिया जाएगा?

दूसरे समूह को प्राथमिकता मिलेगी। तीसरे को मरने छोड़ दिया जाएगा। पहले को घर भेज दिया जाएगा। यही अंतरराष्ट्रीय प्रोटोकॉल है।

आप चाहे ब्रीच कैंडी अस्पताल पहुँच जाएँ, वहाँ एक आइसीयू में पचास वेंटिलेटर की उम्मीद नहीं। दो से चार वेंटिलेटर प्रति आइसीयू, एक बढ़िया आइसीयू है। अब महामारी में क्या करेंगे? महामारी तो छोड़िए, साधारण स्थिति में भी जब बीस-बीस दिन तक वेंटिलेटर पर मरीज रहते हैं और कोई गंभीर जरूरतमंद आ जाता है तो चिकित्सक ‘डू नॉट वेंटिलेट’ लिखवाने के लिए समझाना शुरू कर देते हैं। कि भाई! यह तो बीस दिन से रिकवर नहीं कर पा रहे, वेंटिलेटर अब हटा दिया जाए? मरीज के परिजनों के मानते ही, हटा दिया जाता है। यूरोप में यह निर्णय चिकित्सक और सिर्फ एक निकटतम परिजन मिल कर करते हैं। आपदा के समय यह प्रतिबद्धता भी नहीं। हाँ! इसमें अनैतिक है अगर किसी नेताजी या वीआइपी को वेंटिलेटर और सुविधाएँ दी गयी, और जरूरतमंद को नहीं दी गयी। यह न किया जाए।

यही संसाधन-प्रबंधन टेस्टिंग पर भी लागू है। टेस्टिंग-किट बचा कर चलना है। बूथ नहीं खोलने कि लाइन लगा कर जाँच करा लो। जो स्वास्थ्यकर्मी रोज कोरोना मरीजों से संपर्क में हैं, और उन्हें सर्दी-खाँसी हो गयी है, वह भी जाँच नहीं करा रहे। इसलिए कि मरीजों के लिए किट उपलब्ध रहे। वे स्वयं अदल-बदल कर क्वारांटाइन में जा रहे हैं। अब नियम यह आया है कि तीन दिन बाद अगर वह स्वस्थ महसूस कर रहे हैं तो वापस काम पर आ जाएँ। इसी सहयोग की सबसे अपेक्षा है। अपना ट्रायज स्वयं करें कि आपकी जरूरत कितनी है। अगर आपके बचने के चांस 98 % हैं तो क्या वाकई आप पर टेस्ट और अस्पताल का खर्च उठाया जाए, या आप घर बैठें और दूसरों से दूरी बना कर रखें?

यह निर्मम या क्रूर निर्णय नहीं है, यह एक दूसरे को बचाने का संघर्ष है। और यह आज नहीं शुरू हुआ।

कॉन्टैक्ट-ट्रेसिंग

जो विदेश से आए, उनकी कुंडली निकाली जाए। स्कैंडिनैविया में पिछले दस दिन से यही चल रहा है। सभी फ्लाइट की लिस्ट निकाल कर उसके यात्रियों की कुंडली निकाल कर जाँच चल रही है। आप अगर फॉलो कर रहे होंगे तो दिखेगा कि सभी स्कैंडिनैवियाई देश कोरोना जाँच में सबसे आगे चल रहे हैं। फलत: उनकी गिनती भी सबसे तेज गति से बढ़ रही है। लेकिन मृत्यु-दर बहुत कम है। यह ‘कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग’ है। आप अगर किसी मित्र या परिजन को जानते हैं, जो विदेश से आया, उसकी खबर करें। उसे अपने स्तर पर क्वारांटाइन कर दें।

नॉर्वे में तो खैर क्वारांटाइन से भागने पर 2000 डॉलर फाइन या जेल का नोटिस निकल चुका है। अब तक 28500 लोगों की जाँच पूरी हो चुकी है, जिनमें पंद्रह सौ में वायरस पाया गया। उनके सभी कॉन्टैक्ट को घरबंद कर दिया गया। चार बुजुर्गों की मृत्यु हुई। 90 % लोग फिट हैं। जितने जाँचे गए, उनमें भी लगभग 80 % के अंदर वायरस नहीं मिला। अभी भी ढूँढा जा रहा है कि कोई रह तो नहीं गया।

यह सबसे सहज तरीका है, जब संक्रमण को उसके पहले ‘चेक-प्वाइंट’ पर रोका जा सकता है। केरल ने बेहतरीन तरीके से यह कुंडली निकाली और संक्रमण पर रोक लगायी। अब कर्नाटक यह मॉडल अपना रहा है। उड़ीसा ने विदेश से लौटने वालों के ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन का एक साइट बनाया है। वहीं दिल्ली हवाई-अड्डे पर आज देखा कि हंगामा हो गया। लोग जाँच कराने को तैयार नहीं। यह सरकार के साथ-साथ हमारी जिम्मेदारी है कि अपने बीच में से उन लोगों को मार्क करें, और उनके सभी कॉन्टैक्ट को। एयरलाइन्स तो यह डाटा दे ही चुकी होगी, लेकिन देश विशाल है। लोग कहाँ-कहाँ पसर गए होंगे। ईरान से आया वायरस लद्दाख़ में जाकर मिला। इसी तरीके से। कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग से।

भारत का समाज तो बहुत ही घना समाज है। हर व्यक्ति को पूरे मुहल्ले की खबर रहती है। यहाँ यह सुलभ है। यूरोप वाली बात नहीं कि पड़ोस की भी खबर नहीं। इस गुण को अब प्रयोग में लाने का वक्त है। यह मुखबिरी संक्रमण रोक लेगी।

संक्रमण में सबसे अधिक घातक है, वह स्वस्थ व्यक्ति जिसमें कोई लक्षण न हो, लेकिन वायरस पाल रहा हो। उस छुपे रुस्तम को पकड़ने का यही एक माध्यम है।

समुदाय चेतना

यह मानव-संस्कृति का हिस्सा रहा है, जो छोटे-बड़े कार्य से लेकर आपदा तक के लिए प्रयोग में रहा है। इसका फॉर्मैट साधारण है। एक समुदाय एक लक्ष्य तय करता है, जैसे बाढ़ के समय टूटे पुल की मरम्मत करनी है। हर उम्र के लोग जमा होते हैं, सामान इकट्ठा किए जाते हैं, वहीं साझा चूल्हा पर खाना बन रहा होता है, गीत गा रहे होते हैं और पुल बन रहा होता है। बिहार के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में यह (कन्सार) आम है। सरकारी मदद तो जब आएगी, तब आएगी। शायद कभी न आए।

यूरोपीय देशों में यह विश्व-युद्ध के समय शुरू हुआ, जब राज्याध्यक्ष हिटलर के आक्रमण से भाग गए, सरकार रही नहीं, और जनता ने खुद ही मिल कर कार्य संभालने शुरू किए। यह प्रथा नॉर्वे में ‘दुग्नाद’ कहलाती है। इसमें लोगों को एक नोटिस आ जाता है कि आज मुहल्ले के सभी गिरे पेड़ हटा कर किनारे करने हैं और सफाई करनी है। यह कहने के लिए स्वैच्छिक है, लेकिन, यह होता अनिवार्य है। आप चाहे कितने भी अमीर हों, आपको फावड़ा, बड़े झाड़ू लेकर पहुँचना ही है। वहाँ खाने-पीने का इंतजाम भी सब मिल कर करेंगे, संगीत बजेगा, और काम होगा। हद तो यह है कि सरकारी स्कूलों के मैदान और कैम्पस की अर्धवार्षिक सफाई भी सरकार नहीं करती, सभी अभिभावक मिल कर करते हैं। यही सालों से प्रथा चली आ रही है।

लगभग एक हफ्ते पहले नॉर्वे की प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय दुग्नाद की घोषणा कर दी। ऐसा दशकों से नहीं हुआ था। इसका अर्थ ही है कि अब सरकार बस सहायक भूमिका निभाएगी, कार्य तो जनता को ही करना है। अब फेसबुक का जमाना है तो वहाँ भी कैम्पेन शुरू हो गए, लक्ष्य दिए जाने लगे। उन्हीं में एक लक्ष्य है कि एक भी क्वारांटाइन घर से निकलने न पाए। मुहल्ले वाले यह सुनिश्चित करें, जरूरत हो तो पुलिस को खबर करें। उनको राशन-पानी की जरूरत हो तो लाकर देते रहें, लेकिन घर से निकलने न दें। और अब नया लक्ष्य मिला है कि जितने भी स्वास्थ्य में थोड़े-बहुत भी अनुभव वाले लोग हैं, वे रजिस्टर करें। यह मास-मेसेज सरकार की तरफ से सबको मिल गया।

अब इसमें यह नहीं कह सकते कि यह मेरी जिम्मेदारी नहीं, सरकार की है। सरकार की भूमिका बस कोऑर्डिनेशन की है। और उन हज़ारों लोगों की मदद, जिन्हें नौकरी से निकाला जा रहा है। निजी अस्पतालों ने जब अपने द्वार खोल दिए हैं, तो उनके होने वाली आर्थिक हानि में भी सरकार कुछ मदद कर रही है। लेकिन, कुल मिलाकर सामुदायिक चेतना का अर्थ यही है कि अब सरकार भी इस समुदाय का हिस्सा ही है। उसे भी हमें ही बचाना है। यह राष्ट्र-आपदा ही नहीं, विश्व-आपदा है और इसमें निजी स्वार्थ का स्थान न्यूनतम है।

यह आपदा खत्म हुई तो यही लोग एक-दूसरे का मुँह भी नहीं ताकेंगे। बैक टू बिजनेस चल देंगे। भारत इस मामले में कई कदम आगे है, और यहाँ समुदाय-बोध कभी खत्म नहीं होता। बस इसे जगाने की देरी है। यह इमरजेंसी है और मान कर चलिए कि दुनिया की काबिल सरकारों में भी इसे रोकने की शक्ति नहीं।

मास क्वारांटाइन

इसकी जरूरत अमूमन नहीं पड़ती, लेकिन बड़े देशों में यह कभी-कभी जरूरी होता है। जैसे चीन और भारत बड़े देश हैं, जहाँ अगर संक्रमण का केंद्र मालूम है, तो उसे बाकी के देश से काट कर ‘क्वारांटाइन’ करना पड़ता है। चीन में इसमें कुछ देर हुई, लेकिन पहले वूहान और आस-पास के शहरों के रास्ते बंद कर दिए गए, फिर पूरे हूबइ प्रांत के। इस वजह से काफी हद तक संक्रमण उस इलाके तक सीमित रह गया, और पूरे चीन में उस विकराल रूप में नहीं पसरा। इसका प्रबंधन भी सुलभ होता है कि पूरे देश की बजाय एक क्षेत्र पर फोकस करना। और आज चीन इस स्थिति में पहुँच रहा है कि एक भी नए केस नहीं मिल रहे। यह भारत में भी पहले गुजरात प्लेग के समय किया जा चुका है।

नॉर्वे में मेरे जिले में पिछले हफ्ते में मात्र एक केस मिला। मेरे पड़ोस के दो जिलों में भी बस एक-एक केस हैं। लेकिन ठीक अगले दो जिलों को मिला कर एक हज़ार केस हैं! ऐसा कैसे संभव है कि दो जिले मिला कर हज़ार केस हों, और पड़ोसी में बस एक? यह तो कोई तार्किक अनुपात ही नहीं। और ऐसा भी नहीं कि ट्रेन-बस बंद कर दिए गए। यह ‘मास क्वारांटाइन’ से संभव हो पाता है, जब उस क्षेत्र के लोगों को आवा-जाही बंद करने कह दिया जाता है। अब बीमारी पूरी गति से पसरेगी, लेकिन एक सीमित क्षेत्र में। वहाँ सरकारी फंड और संसाधन भी केंद्रित किए जाएँगे। इससे कुछ बीमारियों में एक सामूहिक इम्यूनिटी भी बनती है, जिसे ‘हर्ड इम्यूनिटी’ कहते हैं। लेकिन, कोरोना में यह संभव नहीं हो सका है।

भारत में भी यह पद्धति लागू है ही, और हो भी रही है। महाराष्ट्र से यातायात घटाने के प्रयास चल रहे हैं। जिन शहरों में एक भी केस मिल रहे हैं, वहाँ धारा 144 लगाने की कवायद चल रही है। यानी, उस शहर के लोग सामूहिक रूप से क्वारांटाइन पर चले जाएँ और आगे पसरने न दें।

यह ब्रह्मास्त्र है, लेकिन आर्थिक रूप से यह सबसे कारगर उपाय है। क्योंकि पूरे देश में पसरने के बाद संसाधन का वितरण असंभव होता जाता है, जिस समस्या से अमरीका जैसा शक्तिशाली और धनी देश अब जूझ रहा है।

आयु का गणित

अब यह कोई छुपा रहस्य नहीं कि कोरोना एक ख़ास आयु-वर्ग को टारगेट कर रहा है। तमाम कॉन्सपिरेसी थ्योरी के पीछे भी यह कहानी है जब वे इस साँख्यिकी का हवाला देते हैं। यह इस मामले में विचित्र तो है कि अगर यह महामारी अपने चरम पर पहुँच जाती है तो संभवत: अस्सी वर्ष से ऊपर की बड़ी जनसंख्या खत्म हो चुकी होगी। ये प्रश्न भी उठ रहे हैं कि जर्मनी और स्कैंडिनैविया में मरीजों की संख्या के मुकाबले मृत्यु-दर क्यों कम है? इसका भी जवाब यहीं छुपा है।

अगर आँकड़े देखें जाएँ तो इन देशों के कोरोना मरीजों में लगभग तीन-चौथाई सत्तर वर्ष से कम उम्र के लोग हैं। और उन पर कोरोना का प्रभाव कुछ ख़ास नहीं पड़ रहा। वहीं इटली के मरीजों में लगभग सत्तर प्रतिशत लोगों की उम्र पचास से ऊपर है, तो सैकड़ों मर रहे हैं।

इस गणित के पीछे एक और वजह है कि जर्मनी और स्कैंडिनैविया बड़े पैमाने पर जाँच कर रही है। जर्मनी में तो ‘ड्राइव-थ्रू’ से कोरोना की जाँच हो रही है। ऐसा दक्षिण कोरिया में जरूर हुआ कि हल्के शक पर भी पकड़ कर जाँच करने लगे, लेकिन अन्य देश इस तरह की रणनीति नहीं अपना रहे। भारत के बजट पर तो यह मुमकिन ही नहीं, हमें भी यह समझना चाहिए। नॉर्वे में लगभग 45000 लोगों को जाँचने के बाद 2000 पॉजिटिव मिले। और मृत्यु हुए मात्र सात। यह ‘ओवर-टेस्टिंग’ है, जो एक अमीर देश ही एफॉर्ड कर सकता है; भले WHO कहती रहे।

लेकिन, एक बात जो स्पष्ट दिखने लगी है, वह ये कि सत्तर वर्ष से ऊपर के लोग अब पूरी तरह से सचेत हो गए हैं। और चूंकि इन देशों में वृद्ध अलग ही रहते हैं तो उनका अपने परिवार से संपर्क यूँ भी कम है। वहीं, ईरान में यह देखा गया कि स्वस्थ बेटे-बेटियों ने अपने अंदर पल रहे वायरस घर के बुजुर्गों को संक्रमित किए, और वे चल बसे। भारत में भी जो दूसरी मृत्यु हुई, वह यूरोप से लौटे बेटे ने अपनी बूढ़ी माँ को दिया था। हमारे समाज में बुज़ुर्ग अपने संतानों से अधिक संपर्क में हैं, कई निर्भर भी हैं, इसलिए उन तक बीमारी पहुँचनी सहज है। भले वे पूरे दिन घर में ही रहें, उनके संतान बाहर से वायरस ले आएँगे। युवा वायरस पाल कर भी स्वस्थ रहेंगे, लेकिन उनके घर के बुजुर्ग गंभीर हो जाएँगे।

इस पूरी भूमिका का ध्येय यह है कि हम जब ऑफिस से या बाहर से घर लौटें, तो निश्चिंत रह सकते हैं कि कोई गंभीर बीमारी नहीं होगी। लेकिन, आप यह ध्यान रखें कि घर में बुजुर्ग भी हैं, और उनके लिए यह जानलेवा हो सकता है। उनसे संपर्क से पहले, अपने कपड़े बदल कर, हाथ धोकर, वायरस-मुक्त हो जाएँ। तभी मिलें। यह बात कोरोना से इतर भी लागू होती है।

उस संतान की मनोस्थिति सोचिए, जिसे मामूली छींक आयी, वह ठीक भी हो गया; लेकिन उसे मालूम पड़ा कि उसी की वजह से उसकी माँ की मृत्यु हो गयी। यह भला कौन चाहेगा?

महामारी के समय बिजनेस कैसे चले?

हमलोग उस व्यवस्था में हैं, जहाँ हर हफ्ते कंपनी का आय-व्यय ईमेल पर रहता है। दिल की धड़कनें भी उससे नियंत्रित होती है। जैसी ही यह गिरता है, आपातकालीन बोर्ड-मीटिंग बैठ जाती है। अब तो यह रोज ही होती है, कि आगे क्या?

जब दक्षिण कोरिया के प्रधानमंत्री ने कहा कि लॉकडाउन अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी का शब्द है, तो कई लोगों ने विरोध किया। लेकिन, वह जानते थे कि उनकी व्यवस्था इन कंपनियों के बंद होते ही सड़क पर आ जाएगी। वह पकिया पूँजीवादी देश के मुखिया हैं। मुझे यकीन है कि डॉनाल्ड ट्रंप जैसे मँजे हुए पूँजीवादी भी लॉकडाउन नाम से ही हिल जाएँगे। कहावत है- ‘अमेरिका नेवर स्टॉप्स’। WTC क्रैश के अगली सुबह भी सब काम पर नॉर्मली गए।

खैर, कुछ रणनीतियाँ जो योजना में है, या पहले की गयी है, उनका जिक्र कर रहा हूँ। इनमें अधिकतर भारत में संभव नहीं।

1. मालिक की जिम्मेदारी- कंपनी के मालिक यह स्क्रीनिंग खुद कर रहे हैं। दक्षिण कोरिया में तो कंपनी के दरवाजे पर ही बुखार होने पर ‘बज़र’ बज जाता है। यहाँ भी तापमान-स्कैनर और स्क्रीनिंग की व्यवस्था लगायी जा रही है।

2. जॉब क्वारांटाइन- मैनुफैक्चरिंग सेक्टर में यह करने की योजना है। एक जिले में शुरू हो चुका। इसमें हर आदमी दूरी बना कर रहेगा, उसका जॉब एरिया और कॉन्टैक्ट सीमित रहेगा। यह व्यवस्था भी मालिक की है।

3. रोटेशन- यह महाराष्ट्र में शुरू किया जा चुका है कि बारी-बारी से लोग काम पर आ रहे हैं। स्वास्थ्य में यहाँ रोटेशन क्वारांटाइन है। यानी, जो कोरोना मरीज से संपर्क में रहा, वह क्वारांटाइन में जा रहा है, और उसके लौटने पर अगला जाएगा। यह मान कर कि बीमारी अभी लंबी चलेगी।

4. बल्क एस.एम.एस., ड्रोन मेसेज, प्रचार से एलर्ट बनाए रखना।

5. GPS क्वारांटइन- यह भी इक्कीसवीं सदी की सुविधा है कि अस्पताल के आइसोलेशन वार्ड भरने की बजाय केस को अपने घर में ही एक चिप दी जाए। और गतिविधि ट्रैक रखी जाए। यह दक्षिण कोरिया के बाद यूरोप में किया जा रहा है। कमाल की बात है कि इस लॉजिस्टिक में दिमाग भारतीय कंपनियों का भी है।

6. कड़े जुर्माने- क्वारांटाइन से भागने की सजा लगभग आधी वेतन के बराबर है, अथवा जेल

7. नौकरी से निकालना- वर्कफोर्स घटा कर उनसे काम अधिक लेना। यह तो आर्थिक मंदी का प्रतिफल है ही। इस उम्मीद पर कि गाड़ी वापस पटरी पर आ जाएगी।

8. वृद्धों का आइसोलेशन- यह भारत में असंभव है, लेकिन वृद्धाश्रम वाले देशों में यह किया जा रहा है।

9. अधिक और तेज जाँच- यह भी अमीर देशों के लिए ही। खर्च बीमा कंपनी, इंप्लॉयर और सरकार बाँट सकती है।

10. खरीद-बिक्री का रीटेल से ऑनलाइन शिफ्ट

11. कुछ क्षेत्रों में वर्क फ्रॉम होम और टेली-एजुकेशन

इन सब पर सही-ग़लत की बात हो सकती है, लेकिन ध्यान रहे कि दुनिया में समाजवाद अगर है भी, तो उसकी नींव पूँजीवाद है। मानवीय मूल्य उसी ‘प्रॉफिट-लॉस’ के पास गिरवी हैं। दान-पुण्य भी बैंक-बैलेंस से ही छन कर आता है, और सरकारी खजाना भी।

इम्युनिटी

अब लोग कई लेख-अफवाह आदि पढ़ कर कोरोना-विशेषज्ञ बन गए होंगे। WHO के निदेशक ने पिछले महीने इस बीमारी को ‘इन्फोडेमिक’ कहा कि लोग महामारी से अधिक सूचना-मारी से मर जाएँगे। सोचिए कि एक अस्सी साल के बुजुर्ग जिन्हें हृदयाघात आ चुका है, जब रोज इटली की खबरें टीवी पर सुनते होंगे तो कैसी नींद सोते होंगे? कोरोना तो बाद में आएगा, वह इस अवसाद भरे माहौल से दम तोड़ देंगे। इटली की खबर में सच्चाई है और मैंने भी पहले (पोस्ट 6.) लिखा है, लेकिन चिकित्सक इस सच्चाई का ढिंढोरा उनके समक्ष भला क्यों पीटें? परिजन भी क्यों डराएँ?

यह बात कोई रहस्य नहीं कि अमुक बुजुर्ग ने ये अस्सी बसंत किन-किन विषाणुओं और जीवाणुओं के मध्य रह कर गुजारे होंगे। पटेल चेस्ट संस्थान दिल्ली के केंद्र में है, जहाँ तपेदिक के मरीज यूँ ही चाय पीते मिल जाएँगे, और नॉर्थ कैम्पस के कपल भी वहीं साथ बैठे। कभी यही तपेदिक एक अभिशाप था, लेकिन हालात कुछ यूँ बने कि लाखों लोग गुप्त तपेदिक या पुराने तपेदिक के साथ लंबा जीवन जी गए। भारत में इबोला और नीपा जैसे 77-95 % मृत्यु-दर वाले खूँखार वायरस आकर भी आतंक न मचा सके। येल्लो फीवर आया ही नहीं।

कोरोना की ही बात करें तो पहले SARS आया (2003), विश्व के 29 देशों में फैला, हज़ारों लोग मरे। भारत में मात्र तीन मरीज मिले, और तीनों ठीक हुए। MERS (कोरोना का दूसरा वायरस) पूरे मध्य एशिया में कहर मचाता रहा, और कई भारतीय वहाँ से आते-जाते रहे, लेकिन भारत में एक मरीज न मिला। और अब यह तीसरा कोरोना। यह भी अब नहीं आया, फरवरी में ही आ गया, और डेढ़ महीने तक सुस्त रहा। वूहान में जब यह चरम पर था, तब जो 327 भारतीय वहाँ से लाए गए, उनमें भी नहीं मिला। वे आखिर कैसे बच गए? और जो अब मर रहे हैं, वे क्यों मर रहे हैं?

इसका उत्तर भी वहीं छिपा है कि इस फौलादी इम्युनिटी के बावजूद भारत में औसत आयु कम है। हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था का वितरण विषम है। उम्र के साथ ‘हाइ रिस्क ग्रुप’ यानी हृदय-रोग, रक्तचाप, गुर्दा-रोग, या जीवनशैली समस्याओं के समूह बढ़ते जा रहे हैं। इस वायरस में यह ख़ास देखा गया है कि उम्र और पुराने मर्जों से कमजोर व्यक्ति टूट जाता है। पंजाब में मृत्यु हृदयाघात से, तो पटना में मृत्यु गुर्दा रोग के मरीज की होती है। पटना के मरीज की कम उम्र में ही किडनी की समस्या थी। आने वाले समय में ऐसी मृत्यु और भी कई होगी।

लेकिन, इसे ‘इन्फोडेमिक’ बनाने से बचना होगा। क्रिकेट स्कोर की तरह रोज पूछना कि आज कितने? इससे अब चिकित्सक भी टूटने लगे हैं, जनता तो खैर टूटेगी ही। हाँ! यह पूछिए कि आज कितनों की इम्युनिटी ने वायरस को मात दिया? साठ से ऊपर के टॉम हैन्क्स दंपति कोरोना पाले घर पर बैठे हैं, और दूसरे हफ्ते में कह रहे हैं कि अब तक स्वस्थ हैं। ऐसी और भी कहानियाँ रोज मिलेगी, जिनका शरीर लड़ रहा है। हम संभल कर रहें, पॉजिटिव रहें, हमारा भी लड़ेगा।

सुनें मेरी बातचीत स्टोरीटेल, इंडिया पर गिरिराज किराडू से

ऑडियोबूम पॉडकास्ट – https://audioboom.com/posts/7536684-

ऐप्पल पॉडकास्ट- https://podcasts.apple.com/us/podcast/bolti-kitabein-%E0%A4%AC-%E0%A4%B2%E0%A4%A4-%E0%A4%95-%E0%A4%A4-%E0%A4%AC/id1385298984

प्लेयर FM- https://player.fm/series/bolti-kitabein-boltii-kitaaben/ep-67-yh-snsaar-kaa-ant-ktii-nhiin-hai-ummiid-rkhiye-khyaal-rkhiye-ddon

श्रद्धांजलि: गिरिराज किशोर

कहानियाँ हमारे इर्द-गिर्द ही जन्म लेती है। सहजता से। जिस दौर में गिरिराज किशोर जी की कहानियाँ सामने आयी होंगी, यानी साठ-सत्तर के दशक में; वहाँ लौट कर देखने की मेरी क्षमता नहीं। लेकिन, इतिहास में रुचि है तो इतना मालूम है कि वह अस्थिरता का वक्त था। सामाजिक, राजनैतिक, वैयक्तिक, हर स्तर पर। हिन्दी साहित्य में ‘नयी कहानी’ जन्म ले रही थी, वहीं देश आर्थिक संकट से जूझ रहा था, नेहरू जी की मृत्यु के बाद उनका आभामंडल भी क्षीण पड़ने लगा। भारत ही नहीं, दुनिया ही एक अस्थिर दौर से गुजर रही थी, जब शीत युद्ध और वियतनाम युद्ध के मध्य हिप्पियों का उदय हो रहा था। लेकिन, इन सबके मध्य समाज ज्यों-का-त्यों था।

ऑफ़िस की फाइलें यूँ ही धूल खा रही थे, पेपरवेट के नीचे पन्ने फड़फड़ा रहे थे, मध्य-वर्ग यूँ ही रोजमर्रा के जीवन में संघर्ष कर रहा था, सामंतवाद की शक्ल सिर्फ सतह पर बदल रही थी। लेकिन, रचनाएँ प्रगतिशील होती जा रही थी। दक्षिण अमरीका से भारत तक साहित्यकारों का एक नया ढर्रा। और इन सबके मध्य कुछ ऐसी भी कहानियाँ रची जा रही थी, जो अब भी जमीन पर थे। यथार्थ से जुड़े थे। हमारे आस-पास की घटनाओं और राजनीति से। और वह भी हमारी भाषा में। जैसा प्रेमचंद लिखते थे, गिरिराज जी की भाषा और विषय-चयन कुछ वैसा ही दिखता है। यह संभव है कि उस वक्त प्रेमचंद की साहित्यिक हलकों में महत्ता घटने लगी हो, लेकिन गिरिराज जी ने परंपरा गिरने न दी।

एक पाठक के रूप में मुझे उनके विविध विषय-चयन प्रभावित करते रहे कि एक लेखक का फलक कुछ यूँ भी विस्तृत हो सकता है। गिरिराज जी के ही शब्दों को अगर पढ़ें, “हर लेखक के पास एक चोंच होती है, जिससे वह चिड़िया की तरह समाज में से विषय चुन-चुन कर अपनी झोली में डालता रहता है। वह कंकड़ों के मध्य बारीकी से दाने चुन सकता है।”

यह बात महत्वपूर्ण है। हमें समकालीन लेखन से प्रभावित हुए बिना भी विषय चुनने हैं। ऐसे विषय जो सिर्फ आपकी झोली में हों। उनके विषय-चयन की विविधता शायद यह भी रही हो कि वह सरकारी नौकरियों में जगह बदलते रहे। वह हिन्दी शिक्षण की दुनिया से नहीं जुड़े थे, और न ही पूर्णकालिक साहित्यकार थे। वह तो आम आदमियों की तरह आठ घंटे की असाहित्यिक दफ्तर में बैठ कर, हाट-बाज़ार से सब्जियाँ लाकर, जब घर लौटते होंगे तो फुरसत में कलम उठाते होंगे। जैसे विनोद कुमार शुक्ल या नरेश सक्सेना जी की कलम।

लेकिन, इस पार्ट-टाइम लेखन में भी कोई लगभग हज़ार पृष्ठ का कालजयी ग्रंथ लिख दे। रामचंद्र गुहा के ‘गांधी बिफोर इंडिया’ से पहले ‘पहला गिरमिटिया’ लिखा जा चुका था। और यह गल्प होकर भी तथ्यपरक, विस्तृत और पठनीयता लिए था। इसे पढ़ कर यूँ नहीं लगता कि यह हज़ार अलग-अलग बैठक में लिखी गयी होगी। यह सातत्य ही गिरिराज जी की विशेषता रही होगी कि वह कलम रोज उठाते होंगे, रोज हज़ार शब्द लिखते होंगे। तभी तो इतना कुछ लिख गए। और किसी भी कहानी या उपन्यास में यूँ नहीं लगता कि ‘कन्ट्यूनिटी’ टूटी है। उनकी यह बात मैंने अपने जीवन में उतारना शुरू किया है, और नवोदित लेखकों से भी यह बात कहूँगा।

नवोदित लेखकों के लिए उनके विचार ख़ास हैं। इसे मैंने पहले भी संदर्भित किया है। और इसके अंतिम वाक्य के कुछ उदाहरण भी हैं। गिरिराज जी ने लिखा,

“अच्छे आलोचकों का यही दायित्व है कि वह संभावनाशील रचनाकार के बारे में सकारात्मक रुख अपनाए और पाठकों को उसे समझने में सहायता दें। जिस रचना की समीक्षा होती है, उस पर समीक्षा का भला-बुरा चाहे जैसा भी प्रभाव क्यों न पड़ता हो, वह इतना महत्वपूर्ण नहीं होता जितना कि इस प्रकार की समीक्षा द्वारा रचनाकार के भविष्य की रचनात्मकता को कुण्ठित करने वाला प्रयत्न होता है। ठीक वैसा ही जैसा असमय प्रजनन इंद्रियों को नष्ट करने का प्रयत्न होता है।”

एक और बात कहूँगा कि उनकी कहानियों या उपन्यास में एक परिपूर्णता है। कोई हड़बड़ी नहीं है। ‘पेपरवेट’ को पढ़ते हुए डॉ. जब्बार पटेल निर्देशित फ़िल्म ‘सिंहासन’ मन में आती है। छद्म-समाजवादी राजनीति आज हमें अधिक स्पष्ट अधिक दिख रही है, जो गिरिराज जी को साठ के दशक में ही दिख गयी थी। सत्ताधारी दल का पेपरवेट बना ब्यूरोक्रेट कहिए, या कोई भी ऐसा माध्यम। यह कितना बेहतरीन बिम्ब है! एक सरकारी कर्मचारी के लिए ऐसी रचनाएँ लिखना एक ‘बोल्ड स्टेप’ भी कही जाएगी।

मेरी गिरिराज जी से कभी मुलाकात नहीं हुई। उम्र का भी फासला है, और जमीन का भी। लेकिन, मैंने जब गिरमिटियों का इतिहास ‘कुली लाइन्स’ लिखी, तो कई लोगों ने इसकी तुलना ‘पहला गिरमिटिया’ से की। हालांकि यह तुलना बेमानी थी। एक तो ‘पहला गिरमिटिया’ का कथ्य गिरमिटिया नहीं, गांधी हैं; और दूसरा यह कि गिरिराज जी का आभामंडल ही इतना विस्तृत है कि मेरी रचना उसके समक्ष एक सूक्ष्म कृति है। एक बार राष्ट्रपति के. आर. नारायणन ने इच्छा ज़ाहिर की कि ‘पहला गिरमिटिया’ पढ़ना चाहता हूँ। लेकिन, समस्या यह थी कि हिन्दी वह ठीक से पढ़ नहीं पाते थे। गिरिराज जी ने उसका अंग्रेज़ी अनुवाद कराना शुरू किया। अब विडंबना ऐसी कि जब यह अनुवाद पूर्ण हुआ और छप कर आया, के. आर. नारायणन चल बसे। वह इस किताब के पाठ से वंचित रह गए। आज जब गिरिराज जी नहीं रहे, तो इस वंचन का अर्थ समझा जा सकता है। उनकी सतत रचनाशीलता से हम सभी अब वंचित रह गए। गांधी जी की तरह गिरिराज जी का जीवन भी एक संदेश ही है।

शतरंज के खिलाड़ी: कास्पारोव, कार्लसन और आनंद का विस्मयकारी त्रिकोण

रेक्याविक, 2004

उस दिन शतरंज के खेल में एक बड़ा तख्ता-पलट हुआ। विश्व के महान् खिलाड़ी अनातोली कार्पोव एक तेरह वर्ष के बच्चे से हार गए। और जब कल उस बच्चे का मुकाबला गैरी कास्पारोव से होना है तो शतरंज की दुनिया में खबर छपी,

“द बॉय मीट्स द बीस्ट”

इस तेज शतरंज के मुकाबले में अमूमन जूस लेकर बैठने वाले किशोर मैग्नस कार्लसन उस दिन कोला लेकर बैठे, और कास्पारोव का इंतजार करने लगे। नियम यह था कि खिलाड़ी देर से आए तो बाजी हार जाता है। लेकिन चूँकि यहाँ बात कास्पारोव की थी, तो इंतजार किया गया।

कास्पारोव तकरीबन पंद्रह मिनट लेट पहुँचे और मैग्नस के पीछे जाकर खड़े हो गए और कहा, “माफ करना। मेरी ग़लती नहीं। आयोजकों ने मुझे समय ग़लत बताया”

पहली ही चाल में कास्पारोव ग़लत चल गए और बाजी कार्लसन के पक्ष में जाने लगी। कार्लसन कुछ देर में उठ कर टहलने लगे तो कास्पारोव ने नाराजगी से घूरा कि यह क्या बदतमीजी है? आखिर खेल ड्रा रहा और अगले खेल में कास्पारोव ने मात कर दिया।

कास्पारोव ने खेल के बाद कहा, “इस बच्चे में मुझे आज अपनी ही अक्खड़ मिजाज़ी दिखी है। गर इसे तालीम मिलती रही, तो यह अगला कास्पारोव जरूर बनेगा।”

कास्पारोव ने जब कार्लसन से तालीम की बात कही, तो दरअसल एक विश्व-विजेता को शायद अपनी विरासत की चिंता थी। उन्होंने कार्लसन को मॉस्को आने का न्यौता दिया। जब कार्लसन मॉस्को पहुँचे तो पहले दिन उनसे दो वृद्ध मिलने आए। एक कास्पारोव के गुरु थे, और दूसरे कारपोव के। एक चौदह वर्ष के बच्चे की आँखों में उन्होंने बहुत कुछ एक नजर में ही पढ़ लिया। अगले दिन कार्लसन कास्पारोव से रू-ब-रू हुए।

वहाँ तमाम कम्प्यूटर में बस शतरंज की पहली चाल के अलग-अलग रूप लगे थे, और आज तक जितना शतरंज खेला गया, उसका दुनिया का सबसे बड़ा डाटाबेस मौजूद था। कार्लसन को लगा जैसे किसी फौजी रणनीति कैंप में आ गए। कास्पारोव ने पहले ही दिन चार अभ्यास दे दिए, जिनमें कार्लसन तीन सुलझा पाए और थक गए। कास्पारोव ने कहा कि रूसी तब तक नहीं उठते, जब तक सुलझा नहीं लेते। 

कार्लसन ने अपने पिता को फ़ोन मिला कर कहा, “मैंने शतरंज खेल-खेल में ही सीखा। मुझसे यह पढ़ाई न हो पाएगी।”

कास्पारोव को ‘ना’ सुनना बुरा लगा या अच्छा, यह पता नहीं। किंतु कार्लसन का ‘ना’ कहना एक विश्व-विजेता बनने की पहली सीढ़ी जरूर थी!

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शतरंज के मोज़ार्ट कई लोग कहे गए, शायद इसलिए कि यह खेल छुटपन से ही शुरु हो जाता है। बारह-तेरह वर्ष उम्र के ग्रैंड मास्टर घूम रहे हैं। लेकिन मैग्नस को मोज़ार्ट कहने की और भी वजह है। इसकी एक वजह है कि मोज़ार्ट के पिता लियोपोल्ड और मैग्नस के पिता हेनरिक, दोनों अपने-अपने गुण बेटे में डाल गए और बेटा बाप से कहीं आगे निकल गया। दोनों अपनी गाड़ी में सपरिवार यूरोप का चक्कर लगाते और बेटे को खेलते देखते, जीतते देखते। एक संगीत में, तो दूसरा शतरंज में उस्ताद बना। और दोनों के पिता ने इसके पीछे अपना निजी कैरियर काफी हद तक त्याग दिया। तभी मोज़ार्ट ने कहा, “ईश्वर के बाद पिता होता है।”

लेकिन मैग्नस की शुरुआत देर से हुई। पाँच वर्ष तक तो शतरंज को हाथ भी नहीं लगाया। यह और बात है कि उस उम्र तक मैग्नस को नॉर्वे के सभी जिले और दुनिया के सभी गाड़ियों के नाम याद थे। मैग्नस भी मोज़ार्ट की तरह घर में सबसे छोटे थे, और अंतर्मुखी भी। तो जब शतरंज की गोटियाँ हाथ में आई, तो वह उन्हीं से बतियाते। एक छह-सात साल का बच्चा तो एक स्थान पर टिक कर नहीं बैठता, जबकि मैग्नस पूरा दिन एक ही छोटी कुर्सी पर बैठे शतरंज खेलते बिता देते। उनके स्कूल में शिक्षिका ने कहा कि इसका विकास रुक गया है।

शतरंज खिलाड़ी पिता हेनरिक ने कहा, “इसका विकास बस मुझे नजर आ रहा है। यह अब मुझसे भी कहीं आगे निकल गया है।”

विश्वनाथन आनंद को हराना एक वैश्विक रणनीति का नतीजा था या नहीं, यह कहना कठिन है। लेकिन मोहरे तैयार हो रहे थे। हालांकि मैग्नस कार्लसन मात्र मोहरा नहीं थे, लेकिन विश्व विजेता बनने का बाल-हठ तो हावी था ही। पहले यह माहौल बना कि आनंद नॉर्वे आएँ। लेकिन आनंद की आँखों में जो आत्मविश्वास और अनुभव था, उसमें दुनिया के किसी कोने में हराने की कुव्वत थी।

उसी वक्त गैरी कास्पारोव पुन: कार्लसन के गुरु बनने का जिम्मा लेते हैं। आनंद को अगर कोई मात दे सकता था, तो वह थे- स्वयं कास्पारोव। लेकिन उन्हें अपना उत्तराधिकारी चुनना था, स्वयं तो वह अलग हो चुके थे। दूसरी बात यह थी, कि भारत और चीन में शतरंज तेज गति से लोकप्रिय हो रहा था। एक नहीं, सैकड़ों आनंद की फौज तैयार हो रही थी। शतरंज का गढ़ अब भी रूस था, लेकिन सरताज चेन्नई में बैठा था।

दूसरी ओर, नॉर्वे कभी शतरंज में ख़ास नामी रहा नहीं। कार्लसन के आस-पास भी नॉर्वे में कोई नहीं था। अब यह बच्चों का खेल नहीं था, कार्लसन को वाकई रूसी हथियारों की जरूरत थी। वह वापस कास्पारोव के शरण में गए। या यूँ कहिए कि कास्पारोव ने यूरोपीय सत्ता स्थापित करने के लिए कार्लसन को तैयार करना शुरू किया। लेकिन कार्लसन को कास्पारोव का ढंग न तब पसंद था, न अब।

आनंद शतरंज के खेल में इकलौते कई मामलों में थे, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण था उनका तनाव-मुक्त खेल। उनका ‘कूल’ रहना, मुस्कुराना, गप्पियाना शतरंज के अंतर्मुखी खिलाड़ियों के विपरीत था। एक दफे रूस में कार्लसन और आनंद के इंतजामात एक रूसी सुंदर महिला कर रही थीं। जहाँ आनंद उनसे खूब गप्पियाते, कार्लसन नजर उठा कर भी नहीं देखते। उसने कहा कि इस बच्चे को अब किसी लड़की की जरूरत है, वरना यह आनंद से नहीं जीत पाएगा। 

यह बात गौर-ए-तलब है क्योंकि आनंद पहले भी मुस्कुराते हुए कार्लसन और तमाम खिलाड़ियों को हरा चुके थे। तो जब आनंद के खेल समझने के लिए उन्हें नॉर्वे आने का न्यौता दिया गया, आनंद घूमने-फिरने के इरादे से नॉर्वे आ गए। उनके साथ अमरिका की महिला शतरंज चैंपियन ओस्लो पहुँची, और एयरपोर्ट पर ही मैग्नस कार्लसन का बड़ा पोस्टर लगा था। दोनों यह देख कर मुस्कुराए और कहा, “यह बच्चा तो अब बड़ा हो गया।”

यह दोस्ताना मुकाबला समंदर किनारे क्रिस्तियानसंड में था, और शहर के तमाम लोग आनंद को देखने आए थे। उस वक्त वह नॉर्वे के सबसे प्रिय खिलाड़ी थे, और सड़क पर सब ‘विशी विशी’ चिल्ला रहे थे। आनंद जानते थे कि यहाँ के फ़्रेंडली मैच की कोई अहमियत नहीं। वह बड़ी आसानी से कार्लसन से हार गए, खूब खाया-पीया और नॉर्वे के ध्रुवीय इलाके घूमने निकल गए। कार्लसन के दोगुनी उम्र के आनंद ने बड़ी चालाकी से अपना खेल छुपा लिया।

यह तय था कि जो भी लंदन में जीतेगा, वही विश्व-विजेता आनंद से चेन्नई में खेलेगा। लंदन में विश्व के आठ शीर्ष खूँखार खिलाड़ियों की यह जंग शतरंज की दुनिया में एक यादगार पल है। मैग्नस कार्लसन को यह जंग जीतनी ही थी। लेकिन व्लादीमिर क्रामनिक (बिग व्लाद), जिन्होंने महान् गैरी कास्पारोव को सत्ता से बेदखल किया था, उनसे आगे निकलना एक चुनौती थी।

शुरुआती खेलों के बाद यह स्पष्ट हो गया कि क्रामनिक ही आनंद से खेलेंगे। मैग्नस कार्लसन पूरे समय तनाव में खेले, और जैसे-तैसे आगे बढ़े। उन्होंने आखिर अपना वह हथियार अपनाया, जो बचपन से उनकी ताकत थी। लंबा खेल कर अपने विपक्षी को थका देना। राज़ाबोव के साथ खेल में हर दर्शक, क्रामनिक और कम्प्यूटर तक को यह यकीन था कि खेल ड्रॉ होगा। लेकिन सात घंटे तक लगातार खेल कर कार्लसन जीत गए। 

अब क्रामनिक और कार्लसन बराबरी पर थे। लेकिन कार्लसन को इवानचुक (चकी) ने आखिरी खेल में हरा दिया। कार्लसन हताश होकर अपने होटल चले गए। तभी खबर आई कि अप्रत्याशित रूप से अब तक लगातार हारने वाले इवानचुक ने क्रामनिक को भी हरा दिया। बाजीगर कार्लसन आखिरी खेल हार कर भी अंक के आधार पर टूर्नामेंट जीत चुके थे। शतरंज का निर्णायक युद्ध अब भारत में होना था।

नवंबर 2013, चेन्नई, भारत

यूरोप की नजर में भारत ठीक वैसा ही है, जैसा कि झोपड़पट्टियों के मध्य खड़ा चेन्नई का आलीशान हयात रिज़ेन्सी होटल। एक गरीब देश जहाँ अमीरों के अमीर बसते हैं। मैग्नस कार्लसन ने पूरे विश्व में इतनी आवभगत और शान-ओ-शौकत कम ही देखी। उनके दरवाजे के ठीक बाहर राइफ़ल लिए खड़े सुरक्षाकर्मी देख वह घबड़ा गए, और अनुरोध किया कि ये दूर ही रहें। 

इस खेल में कुछ और विडंबनाएँ भी थी। कार्लसन के सहयोगी (सेकंड) एस्पेन असल में आनंद की टीम से जुड़ना चाहते थे, लेकिन यह अपने देशवासी से धोखा होता। एस्पेन तो कार्लसन की रग-रग से वाकिफ थे। वहीं दूसरी ओर, आनंद के सहयोगी शतरंज के ऐसे सेनापति थे जो विश्व-विजेता बनते-बनते रह गए थे। कार्लसन की टीम को आनंद से अधिक खौफ उनके इस सहयोगी पीटर लेको से था, जो यूरोपीय खेल को गहराई से जानते थे।

आनंद पहली चाल क्या चलेंगे, यह कार्लसन की दुविधा थी। क्या वह e4 से खेल शुरू करेंगे? आनंद के पास हमेशा एक नया दाँव होता। लगभग ग्यारह भाषा बोलने वाला यह अनुभवी खिलाड़ी वाकई शतरंज की दुनिया का मायावी सितारा था। कार्लसन को यह अंदेशा हो रहा था कि आनंद जरूर ‘निमज़ो-इंडियन’ खेल यानी d4 से शुरुआत करेंगे, और वहाँ शायद वह फँस जाएँ। 

नॉर्वे के अखबार आनंद को ‘टाइगर ऑफ़ चेन्नई’ पहले से ही कह रहे थे।

मास्को में बैठे कास्पारोव जो आनंद को हारते देखने को बेताब थे, ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया को कहा, “कल से मद्रास में खून बहेगा। खून!”

अगर यह कहा जाए कि पूरी कायनात आनंद को हराने चेन्नई में जुटी थी, तो यह बात शायद ग़लत नहीं। जैसा मैं पहले भी कह चुका हूँ, यह एक वैश्विक लड़ाई थी। मृदुभाषी और सौम्य आनंद के सर पर लगभग एक दशक तक यह ताज रहा, और उनके मुख्य प्रशिक्षक थे डेनमार्क के पीटर नील्सन। लेकिन जब बात भारत और स्कैंडिनैविया के टक्कर की हुई, तो नील्सन का देश-प्रेम शायद जाग उठा। वह पाला बदल कर कार्लसन के साथ चले गए। वह आनंद का हर रहस्य जानते थे, तो आनंद को हराने का परम-ज्ञान उनसे बेहतर कौन देता? 

आनंद इससे निराश तो हुए लेकिन उन्होंने बस एक अलिखित वचन उनसे ले लिया कि नील्सन स्वयं चेन्नई में कार्लसन के साथ न आएँ। और नील्सन ने आनंद को दिया वचन निभाया भी। वह बीमारी का बहाना बना कर नॉर्वे में ही रुक गए। 

लेकिन एक बिनबुलाया मेहमान भी चेन्नई आया, जिसे न आनंद ने बुलाया, न कार्लसन ने। उसकी खबर मिलते ही आनंद की टीम ने उसके दरवाजे पहले दो मैच के लिए बंद कर दिये। अगर वह आँखों के सामने होता, तो आनंद अवश्य हार जाते। कार्लसन की टीम भी उससे नहीं मिली। लेकिन सब हैरान थे कि यह आखिर चेन्नई में करने क्या आया है? वह अवांछित आगंतुक कोई ऐरा-गैरा तो था नहीं। 

शतरंज के दूसरे बादशाह और आनंद के धुर-विरोधी जनाब गैरी कास्पारोव मास्को से चेन्नई पधार चुके थे! 

वि. आनंद (43 वर्ष/भारत) बनाम मै. कार्लसन (22 वर्ष/नॉर्वे), चेन्नई

नॉर्वे आर्कटिक सर्कल का एक छोटा और वीरान देश है, जहाँ की कुल जनसंख्या चेन्नई की तीन चौथाई है। अगर शीतकालीन खेलों को छोड़ दें, तो किसी भी विश्व-स्तर के खेल में इनकी पैठ नहीं। शतरंज में जहाँ भारत के पचास ग्रैंड मास्टर हैं, नॉर्वे के आठ हैं। ऐसे में अगर कोई खिलाड़ी विश्व-विजेता बनने वाला हो, तो पूरा देश सड़क पर क्यों न हो? हर दुकान, हर गली में शतरंज था। बैंकों का काम ठप्प पड़ गया क्योंकि सभी कर्मचारी शतरंज देखने लगे थे। 

वहीं दूसरी ओर, भारत के लिए शतरंज महज एक खेल था। चुनाव निकट थे, भाजपा ने अपना नया प्रधानमंत्री उम्मीदवार चुना था, और अखबार राजनीति की खबरों से भरे थे। हालांकि आनंद-कार्लसन मैच को पहले पृष्ठ में जगह मिल जाती, लेकिन राजनीति के समक्ष खेल गौण था। कार्लसन के साथ पूरा देश था, जबकि आनंद के साथ ऐसी कोई लहर नहीं थी। 

और रूसी चाणक्य भी तो थे। कास्पारोव को खेल में प्रवेश नहीं मिला, तो बाहर प्रेस के माध्यम से आनंद का मनोबल गिराने लगे। उन्होंने कहा, “अब शतरंज को नए बादशाह की जरूरत है। हम अब बूढ़े हुए।”

लेकिन बूढ़े आनंद भी कम खतरनाक न थे। पहले ही मैच में मात्र 16 चालों में कार्लसन घुटने पर आ गए। उन्हें हाथ खड़ा कर ‘ड्रॉ’ की मांग करनी पड़ी। विश्व-विजेता का स्वप्न संजोए कार्लसन का आत्म-विश्वास पहले दिन ही हिल गया। आनंद मुस्कुराते हुए बाहर निकले। अगली बाजी आनंद की होगी, यह बात लगभग तय थी।

कास्पारोव ने एक किताब लिखी ‘हाउ लाइफ इमिटेट्स चेस’। उनका कहना है कि शतरंज से आदमी का चरित्र झलकता है। बॉबी फ़िशर और कास्पारोव की तरह कार्लसन भी मात्र जीतने के इरादे से खेलते हैं। हारने पर उनकी नींद उड़ जाती है। आनंद अगर जीतने के लिए खेलते भी हैं, तो दिखाते नहीं। और हार कर भी मुस्कुराते रहते हैं। 

कार्लसन कहते हैं कि दुनिया के सभी शतरंज खिलाड़ियों में सबसे कोमल हाथ विशी आनंद का है। वह हाथ मिलाते हैं तो लगता है कोई दोस्त गप्प मारने आया है, शतरंज खेलने नहीं। कास्पारोव इतनी सख़्ती से कुटिल मुस्की देते हाथ मिलाते हैं कि विरोधी घबड़ा जाए। मशहूर खिलाड़ी नाकामुरा ने एक बार कहा, “कार्लसन आँखों से सम्मोहित करते हैं, मुझे काला चश्मा दिया जाए।” यह और बात है कि वह चश्मा लगा कर भी हार गए।

तो जब मधुर आनंद और मायावी कार्लसन की दूसरी बाज़ी हुई, तो आनंद एक जीता हुआ खेल भी बस इस भय से नहीं खेले की वह हार जाएँगे। पहली ही e4 चाल में कार्लसन का अप्रत्याशित c6 उन्हें डरा गया। वह जीत रहे थे, लेकिन अठारहवीं चाल में जान-बूझ कर एक-दूसरे के वज़ीर (रानी) मार खेल ड्रॉ करवा दिया। 

दूसरे ड्रॉ के बाद यह लगने लगा कि आनंद जीतने के बजाय बस किसी भी तरह अपना ताज बचाना चाहते हैं। लेकिन अगले खेल से दर्शक-दीर्घा में कास्पारोव भी होंगे तो क्या शतरंज अपना काला इतिहास दोहराएगा? टॉयलेटगेट?

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शतरंज की दुनिया में एक विभाजन के जिम्मेदार गैरी कास्पारोव ही थे, जब भ्रष्टाचार के आरोप के कारण दो समूह बन गए। दो-दो शतरंज चैंपियन बनने लगे। लेकिन 2006 ई. में दोनों चैंपियनो व्लादिमीर क्रामनिक और टोपालोव के मध्य मुकाबला रख शतरंज को एक करने का फैसला हुआ। इस मुकाबले में एक अजीब बात हुई। क्रामनिक एक मैच के दौरान पचास बार शौचालय गए। टोपालोव ने इल्जाम लगाया कि वह शौचालय जाकर कंप्यूटर की मदद ले रहे हैं! क्रामनिक इसे नकार कर विजेता घोषित हुए। हालांकि जल्द ही उन्हें अपना ताज विश्वनाथन आनंद को सौंपना पड़ा।

चेन्नई में आनंद और कार्लसन का तीसरा मैच भी ड्रॉ हुआ। अब तक गैरी कास्पारोव का प्रवेश-निषेध खत्म हो चुका था, और वह अब दर्शकों में सामने नजर आ रहे थे। आनंद तनाव में आ गए थे, और इसी मध्य कार्लसन का पेट खराब हुआ। वह बारंबार शौचालय जाने लगे। आनंद ने इसका विरोध नहीं किया, और वह खेलते रहे। चौथी बाज़ी ड्रॉ रही। पाँचवी और छठी आनंद झटके में हार गए। इस टॉयलेटगेट पर कभी किसी ने चर्चा नहीं की, और आनंद ने भी यही माना कि वह बुरा खेले।

कास्पारोव ने ट्वीट किया, “अब अगर कार्लसन पागल हो जाएँ, तभी हारेंगे।”

छठी बाज़ी के बाद आनंद की हार सुनिश्चित कर कास्पारोव मास्को निकल गए तो आनंद ने प्रेस में कहा, “एल्विस प्रेस्ले चेन्नई से चले गए। अब हम खेल शुरु करें?”

नॉर्वे की अख़बार में खबर छपी कि चेन्नई के टाइगर अब भी खेल में वापस लौट कर कार्लसन को मात दे सकते हैं। लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। जिस दिन विश्वनाथन आनंद की हार तय हुई, सचिन तेंदुलकर ने भी संन्यास की घोषणा कर दी। देश से शतरंज का जुनून जाता रहा। आनंद के समय जहाँ पैंतीस ग्रैंड मास्टर हो गए थे, आनंद के बाद दस-पंद्रह हुए। वह भी इसलिए कि आनंद अभी पूरी तरह गिरे नहीं हैं।

मेरी एक और थ्योरी है कि शतरंज का राजा विश्व का राजा होता है। विश्व-युद्ध से पहले राजा यूरोप था, फिर जब लाल सेना ने जंग जीती तो दशकों तक रूस का राज रहा। इस सत्ता पर सबसे पहली चोट शीत-युद्ध के समय अमरीका के बॉबी फ़िशर ने रूस के बोरिस स्पास्की को हरा कर की। अमरीका सोवियत पर विजयी हुआ। सोवियत टूटने के बाद रूस के हाथ से भी सत्ता जाती रही। ऐसे वक्त एक तेजी से उभरते देश भारत ने सत्ता संभाली। भारत प्रगति करता गया और शतरंज का ताज भी भारत के सर पर रहा। अब वापस यह ताज यूरोप में नॉर्वे के सर पर आ गया। इस वक्त हर आर्थिक-सामाजिक आंकड़े पर नॉर्वे यूँ भी टॉप पर है। तो इस शृंखला का मूल बिंदु यही है। 

इन शतरंज के मोहरों में देश की किस्मत छुपी है।

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मैग्नस कार्लसन से जब एक साक्षात्कार में पूछा गया, “आपको पता है, एक मशहूर अमरीकी शतरंज खिलाड़ी ने शतरंज छोड़ कर मार्शल आर्ट खेलना शुरू कर दिया?”

उन्होंने कहा “शायद उन्हें हिंसा पसंद नहीं होगी। शतरंज से अधिक हिंसात्मक खेल कोई नहीं।”

जब आनंद को लोग टाइगर (बाघ) बुलाते, तो कार्लसन ने स्वयं को क्रोकोडाइल (मगरमच्छ) कहना पसंद किया। यह अजीब बात है कि शतरंज जैसे अहिंसक खेल में बाघ और मगरमच्छ जैसी उपमाएँ दी गयी। लेकिन यह बात सच है कि मार्शल-आर्ट या मुक्केबाजी की चोट हफ्ते-महीने में ठीक हो जाती है, लेकिन शतरंज ऐसी चोट देता है कि महीनों नींद-चैन उड़ जाए। 

लोगों ने मान लिया था कि चेन्नई में हार के बाद आनंद अब कभी कार्लसन के साथ नहीं खेलेंगे। ख़ास कर भारतीयों में ‘किलर इंस्टिक्ट’ कम माना जाता है। लेकिन जिस व्यक्ति ने छुटपन से प्यादे-मोहरे और रणनीति में ही जीवन बिताया हो, वह शातिर और खूँखार बन ही जाता है। बाहर से सौम्य दिखना आनंद का एक मुखौटा है, जिससे कई आक्रामक खिलाड़ी भी धोखा खाते रहे हैं। 

जब दुबई के ‘विश्व रैपिड चेस’ में आनंद पहुँचे, तो लगातार तीन बाज़ी अलग-अलग लोगों से हार गए। आनंद ‘रैपिड चेस’ के अजेय योद्धा रहे हैं, और यह हार किसी को समझ नहीं आया। दूसरी तरफ कार्लसन लगातार जीत रहे थे। कार्लसन का विजय-रथ आखिर रुका। 

विश्वनाथन आनंद ने कार्लसन को दुबई में मात कर दिया! लोग कयास लगाते हैं कि आनंद जान-बूझ कर शुरुआती खेल हारे थे, जैसे बाघ आक्रमण से पहले तीन कदम पीछे लेता है। या शायद वह चेन्नई से दुबई मात्र कार्लसन से बदला लेने आए थे। 

कयास तो कयास हैं, लेकिन बाघ-मगरमच्छ की अगली लड़ाई हुई उस राज-मुकुट के लिए जो आनंद चेन्नई में हार गए थे। और यह बाजी थी कास्पारोव के घर- रूस में! 

सोची (रूस), 2014

रूस की धरती शतरंज का मक्का कही जा सकती है। यहाँ हर तीसरा बच्चा शतरंज खिलाड़ी हो तो ताज्जुब नहीं। विश्वनाथन आनंद जब पिछले वर्ष अपने घर से पंद्रह मिनट के  फासले पर होटल में खेल रहे थे, तब वह तनाव में थे। लेकिन रूस में वह अलग ही मिज़ाज में थे। वह अपनी पत्नी अरूणा के साथ आए थे, जो उनकी मैनेजर भी हैं। और अब बिल्कुल दबाव में नहीं नजर आ रहे थे। 

शतरंज का एक और नियम है कि इसके राजा से वही लड़ सकता है जो बाकी बाहुबलियों को हरा कर आया हो। आनंद ने अपनी हार के चार महीने बाद ही विश्व कैंडीडेट चैंपियनशिप में सबको परास्त कर दिया था। और अब वह कार्लसन से अपना ताज वापस लेने रूस आए थे। 

इसी रूस की धरती पर दो वर्ष पूर्व आनंद ने बोरिस गेलफ़ांड को हरा कर अपना ताज छठे साल लगातार कायम रखा था। उन्हें उम्मीद थी कि वह रूस से जीत कर ही जाएँगे। लेकिन इस बार कुछ अलग बात थी। अब तक पर्दे के पीछे रहने वाले कास्पारोव सीधे-सीधे कार्लसन के ‘सेकंड’ बन कर आनंद से भिड़ रहे थे।

सोची का पहला मैच ड्रॉ रहा। दूसरे में कार्लसन जीत गए। लेकिन तीसरे मैच में आनंद ने वापस कार्लसन को हरा दिया। बल्कि अब आनंद इतने खुल कर खेल रहे थे कि कास्पारोव को यह लग गया कि वह अपना ताज वापस लेकर ही जाएँगे। और छठे मैच में कार्लसन ने ऐसा ‘ब्लंडर’ किया कि आनंद की जीत ‘लगभग’ तय हो गयी। 

लेकिन आनंद को वह ग़लती नजर ही नहीं आयी और वह उससे भी बड़ी ग़लती कर बैठे। सबने कहा कि ऐसी ग़लती असंभव है। आनंद ने उस दिन प्रेस में हताश होकर कहा, “इंसान ग़लती कर जाता है। मेरा अनुभव कहता है कि मैं अब हार चुका हूँ। लेकिन मैं अपने तीन वर्ष के बेटे के लिए खेलूँगा कि वह बड़ा होकर जब मेरा खेल देखे, यह ग़लती न दोहराए। और यह देख ले कि उसका पिता ग़लतियों के बाद भी खत्म नहीं हो जाता।”

लंबी रेस का घोड़ा वही है जिसने हार को बस एक ख़ास बिंदु पर नियति मानी है। कार्लसन आनंद को हराने से पहले लंदन में आखिरी बाज़ी हार कर ही आए थे। आनंद हारने के बाद दुबई में कार्लसन को हराते हैं। और उसी साल सोची में कार्लसन जीतते हैं। पुन: आनंद 2017 में कार्लसन को हराते हैं। अब तक खेले अलग-अलग फॉर्मैट की बाज़ीयों में दोनों ने आठ-आठ खेल जीते थे।

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जो भी हो, कास्पारोव का स्वप्न साकार हुआ। मैंने उनके चरित्र को अनायास कुछ कुटिल जरूर बनाया है, लेकिन कास्पारोव एक आदर्शवादी व्यक्ति हैं। शतरंज संगठन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा कर अलग होने वाले पहले व्यक्ति कास्पारोव ही थे। वह ‘नो नॉनसेंस’ व्यक्ति माने जाते हैं, हाव-भाव से भी। वह हारे भी तो आखिर अपने ही पूर्व ‘सेकंड’ क्रामनिक से, जिन्होंने कास्पारोव को उनकी ही ‘निगेटिव चेस’ और पुरानी ‘बर्लिन डिफ़ेंस’ के बल पर मात दी।

फिलहाल कास्पारोव ने भारत-चीन से शतरंज को कमजोर कर स्कैंडिनैविया और यूरोप की ओर मोड़ दिया है। कार्लसन प्रतिभाशाली जरूर हैं, लेकिन यह बात अब पक्के तौर पर कही जा सकती है कि कास्पारोव ने उन्हें अपनी इस लड़ाई का सेनापति बनाया। यूरोप की सत्ता स्थापित हो चुकी है। भारत में शतरंज अवसान पर है। मुझे कुछ उम्मीद है कि भारत-नेपाल मूल के युवा डच खिलाड़ी अनीश गिरी कार्लसन को हरा दें, अन्यथा कोई भारतीय दूर-दूर तक नहीं। हाँ! विश्वनाथन आनंद जब तक जीएँगे, रैपिड और ब्लिट्ज चेस के सरताज रहेंगे ही। यह आश्चर्यजनक है कि उम्र के साथ उनकी गति बढ़ती ही जा रही है। लेकिन यह भी विडंबना है कि शतरंज (चतुरंग) का आविष्कार जिस देश में हुआ, उस देश की बिसात सिमटती जा रही है। 

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विदेशों की दीवाली

प्रवास में दीवाली के दीये साल-दर-साल बढ़ते ही जा रहे हैं। पंद्रह साल पहले कैलिफोर्निया में एक भारतीय मित्र ने जब दीवाली पर घर के बाहर रोशनी के झालर लटकाए, तो अगले दिन पड़ोसी ने भी लटका दिए। उन्हें लगा कि यह सामाजिक सौहार्द का व्यवहार होगा, लेकिन मालूम पड़ा कि उन पड़ोसी की इच्छा थी क्रिसमस का पहला झालर मुहल्ले में वही लटकाएँ। उन्हें क्या मालूम था कि ये दीवाली के झालर हैं? यह तो खैर अमरीका की बात है, जहाँ उस वक्त भी करोड़ भारतीय थे। बाद में तो खैर 2009 ई. में बराक ओबामा ने व्हाइट हाउस में दीवाली बनायी। कनाडा में उससे दस वर्ष पूर्व से राष्ट्रीय पर्व के रूप में दीवाली मनती रही है। सीधी बात है कि प्रवासी भारतीय अब एक बड़े वोट-बैंक बन गए हैं, दीवाली तो मनेगी ही। लेकिन, मेरी इतिहास में भी रुचि है तो यह जानने की भी है कि यह सिलसिला कब से चल रहा है?

हमें इसके लिए इन नव-पूँजीवादी देशों से दूर जाना होगा। दुनिया का सबसे बड़ा दीवाली का दीया दक्षिण अमरीका के एक छोटे से देश में जलता है। सूरीनाम की राजधानी परामरीबो में एक विशाल दीया जलाया जाता है, और वहीं भारतीय जमा होते हैं। ये उन गिरमिटियों के वंशज हैं जो भारत के गाँवों से ब्रिटिश सरकार गन्ने की खेती के लिए लेकर गयी थी। तो दीवाली की कहानी दरअसल उन्नीसवीं सदी से शुरू होती है, जब खेतिहर मजदूर दीवाली मनाते थे। उनमें न जाति-भेद था, न धर्म-भेद। बल्कि दीवाली के अवसर पर अफ्रीकी और यूरोपीय मूल के लोग भी उनके साथ मिल कर दीवाली मनाते रहे। यही नजारा मॉरीशस, फिजी, कैरीबियन देशों, रियूनियन द्वीप और मलय में भी देखने को मिलता है।

ब्रिटिशों को दीवाली से परिचय कानून की पढ़ाई करने गए मोहनदास करमचंद गांधी ने अपने शुरुआती भाषण में भी कराया, जो बाद में ‘फेस्टिवल्स ऑफ इंडिया’ नाम से संकलित हुआ। उन्होंने दीवाली को एक दिन नहीं, पूरे मास के रूप में समझाया। हालांकि, ब्रिटिश उस वक्त अक्खड़ ही थे, और लंदन में दीवाली मनाने में ख़ास रुचि न थी। अब यह हाल है कि डेविड कैमरॉन अपने घर पर दीवाली मनाते हैं। बहुसांस्कृतिक छवि भी बनानी है, और वोट भी लेने हैं।

छोटे देशों जैसे नॉर्वे में भी अब हज़ारों भारतीय हो गए हैं। हिन्दू सनातन सभा की दीवाली, आर्य समाज की दीवाली, शहरों के अलग-अलग भारतीय संगठनों की दीवाली, क्षेत्रीय संगठनों की दीवाली, दूतावास की सरकारी दीवाली, गरबा वाली दीवाली, भंगड़ा वाली दीवाली, डिस्को वाली दीवाली। न जाने कितनी दीवाली। हालात ये हो गए हैं कि लोग भागे फिर रहे हैं कि कितनी दीवालियों में जाएँ, घर में चुपके से मना कर छुट्टी करें। और कुछ लोग ऐसे भी हैं जो सबसे बना कर रखने के चक्कर में हर जगह जा रहे हैं। और इसलिए इंतजामात भी ऐसे हैं कि दीवाली एक दिन न होकर पूरे महीने मन रहा है। कहीं एक हफ्ते तो कहीं दूजे हफ्ते।

मेरा वर्तमान निवास ओस्लो से अस्सी कि.मी. दूर कॉन्ग्सबर्ग नामक शहर में है। यहाँ इस हफ्ते बहुधा हिन्दीभाषियों की दीवाली है, अगले हफ्ते बिहार से प्रवासियों की अलग दीवाली है, उसके अगले हफ्ते दक्षिण भारतीयों की दीवाली है, और इसी मध्य सनातन हिन्दू मंदिर की भी दीवाली है। मैंने हर जगह पर्ची कटा ली है, कि सबसे बात-मुलाकात हो जाए। मेरे जैसे और भी कई लोगों ने कटा ली होगी, और कुछ लोगों ने कहीं की नहीं कटायी होगी कि कौन जाए? पर्ची कटाने का मतलब हर जगह के खर्च भारतीय ही उठाते हैं, तो पैसे भी भरने ही होते हैं। और तोहफ़ेबाजी भी तो होगी। कुल मिला कर दीवाली में जेब का दिवाला निकलना तय है। मिठाई की दुकानें अधिकतर पाकिस्तानियों की है और उन्हें भी मालूम है कि दीवाली में डिमांड बढ़ेगी तो तैयारी पूरी रखते हैं। हाँ! पटाखों पर पाबंदी है, लेकिन फुलझड़ी और कुछ हल्की-फुल्की लड़ियाँ लोग चला ही लेते हैं। गीत-नृत्य भी खूब होता है, और मंदिरों में गरबा भी मिल सकता है। बड़े देशों में तो खैर बॉलीवुड कलाकार भी पहुँच जाते हैं, यहाँ भी कोई न कोई आ ही जाता है। कई विदेशी भी भारतीय परिधान पहन कर यह तमाशा देखने आ जाते हैं। उन्हें यह क्रिसमस का ही समकक्ष लगता है कि रोशनी है, हँसी-खुशी है, खान-पान है और तोहफ़े हैं। और यह भी कि नया साल आ रहा है।

Previously published in Prabhat Khabar

महेशवाणी और नचारी

भोला बाबा (शिव) के लिए मिथिला में दो तरह के गीत हैं- महेशवाणी और नचारी। दोनों का दो मूड है। यह अंतर समझना जरूरी है, क्योंकि कई बार एक ही तरह से गाने लगते हैं।

नचारी में हम नाच कर शिव से विनती कर रहे हैं, लेकिन इसका मूल ‘नाच’ नहीं, लाचारी है। इसमें भी पुरुष-स्त्री के गाने का लहजा अलग है। पुरुष तो वाकई लाचार दु:खी होकर गाएँगे- ‘कखन हरब दु:ख मोर हे भोलानाथ’ (कब मेरे दु:ख हरेंगे)। बाबाधाम के रास्ते में थके-भकुआए झूमते लेकिन करुणा भाव से गाते काँवड़िए मिलेंगे।

वहीं, स्त्रियाँ इस दु:ख में व्यंग्य का पुट ले आती है। उनकी शिकायत यह होती है कि इतने बूढ़े, फक्कड़ आदमी के साथ भला पार्वती कैसे रहेगी, जो भूतों की बारात लेकर आए हैं? तो यहाँ तंज-मिश्रित दु:ख है।

‘पैंच उधार माँगे गेलौं अंगना, सम्पति मध्य देखल भांग घोटना। गौरा तोर अंगना’

(संपत्ति के नाम पर बस भांग-घोटना है, शिव के आंगन में)

वहीं, महेशबानी इसका एक तरह से जवाब है। यह ‘डेविल्स एडवोकेट’ वाली बात है जिसमें शिव को हम डिफेंड करते हैं। हम इसमें ‘मनाईन’ (पार्वती की माँ) को कहते हैं कि शिव बहुत ही अच्छे व्यक्ति हैं, उन पर लांछन ग़लत है। और यहाँ भी कई बार भक्ति में तंज का प्रवेश हो जाता है, कि भोला बाबा तो भोले हैं। ग़लती तो भांग की है। यह निर्मोही हैं, दुनिया की सोचते हैं, इसलिए स्वयं फक्कड़ रहते हैं। बल्कि महेशबानी का टोन कभी-कभी यूँ लगता है जैसे अमिताभ बच्चन शोले में रिश्ता लेकर गए थे।

‘दु:ख ककरो नहि देल, अहि जोगिया के भांग भुलेलक/धथुर खुआई धन लेल”

(कभी किसी को दु:ख नहीं दिया हमारे महादेव ने; यह तो भांग-धतूरे ने फक्कड़ बना दिया)

नचारी में आप शिव के सामने खड़े हैं, और अपनी बात रख रहे हैं। महेशवाणी में हम शिव के साथ खड़े हैं, और शिव का पक्ष ले रहे हैं। यह बारीक लेकिन महत्वपूर्ण अंतर है। विद्यापति ने अगर गौरी की तरफ से शिकायत में और विनती में नचारी लिखी, तो शिव की तरफ से जवाब में महेशवाणी भी लिखी।

स्त्री-पुरुष, दोनों पक्ष से महादेव को देखना ही अर्धनारीश्वर की भक्ति का रूप रहा।

#ragajourney

दुर्लभ रागों के विशेषज्ञ: अलादिया ख़ान (A rare raga exponent)

भारत में कुछ चिकित्सक लिखते हैं- ‘दुर्लभ रोग विशेषज्ञ’ (rare disease specialist). ऐसी कोई डिग्री होती नहीं, लेकिन वह अपनी पहचान बना लेते हैं कि हल्के-फुल्के निमोनिया वगैरा नहीं देखेंगे। कुछ मामला फँसेगा, तो निपटाएँगे। एक हड्डियों के दुर्लभ रोग विशेषज्ञ मेरे वरिष्ठ भी हैं। आए दिन अखबार में रहते। उनका मानना है कि साधारण हड्डी जोड़ते कमाई तो होगी, नाम न होगा। उसके लिए कुछ दुर्लभ रोग ढूँढना होगा, जो लाखों में एक को होता हो। और इस तरह उनकी ओपीडी दुर्लभ रोगियों से भरी होती जिनको बाकी जगह से जवाब मिल गया होता।

संगीत में एक दुर्लभ राग विशेषज्ञ भी हुए। जब अलादिया ख़ान साहब की आवाज लंबे समय तक अमलेता में तान खींचते हुए चली गयी, तो वह कहीं के नहीं रहे। ऐसे समय में उन्होंने यही तकनीक सोची कि वह राग गाओ जो कोई न गाता हो। कॉमन रागों में तो मुकाबला तगड़ा होगा, दुर्लभ में कहाँ भिड़ोगे?

इस तरह जयपुर-अतरौली (अलादिया ख़ान) घराने में एक फ़ेहरिश्त बनी, और ऐसे-ऐसे भूले बिसरे राग गाए गए कि सब हैरान रहते। दूसरे बिहाग गाएँगे, तो वह बिहगड़ा गाएँगे। ‘निषाद’ से ट्विस्ट कर देंगे। और लोग मालकौंस तो वे संपूर्ण मालकौंस। दूसरे चांदनी केदार तो वे बसंती केदार। अब करो मुकाबला?

यही उनके अक्खड़ से नरम शिष्यों और घराने के गायिका-गायकों में भी ट्रांसफ़र हो गया। इस घराने में आइए। यहाँ दुर्लभ राग मिलेंगे। इनकी कोई शाखा नहीं।

#ragajourney

किशोर कुमार के किस्से (Stories of Kishore Kumar)

किशोर कुमार (आभास कु. गांगुली) और लता जी पहली बार कैसे मिले, इसकी एक कहानी पढ़ी-सुनी है। दोनों मलाड के बॉम्बे टाकीज़ में रिकॉर्डिंग के लिए जा रहे थे। अब लता जी उन्हें पहचानती न थी, पर जहाँ-जहाँ वो ट्रेन बदलती, किशोर कुमार भी बदलते जाते। लता जी को लगा कि कोई सरफिरा पीछे पड़ गया है। वो भागते-भागते स्टूडियो पहुँची, तो वहाँ भी पीछे आ गए। आखिर लोगों ने बताया कि ये अशोक बाबू के भाई हैं, और इनका नाम ही किशोर कुमार है जिनके साथ आपका गायन है।

किशोर दा लता जी से हमेशा अपनी फीस एक रुपया कम लेते, आदर स्वरूप। ऐसी एक रुपए की कहानी पं. रविशंकर और विलायत ख़ान की भी है, पर वो किसी और मसले पर है। वो फिर कभी। यहाँ बस किशोर जी का लता जी के लिए आदर था।

एक दफे लता जी लेट हो गयी, तो उनका हिस्सा भी किशोर दा ने गा दिया। वो गीत “आ के सीधी लगी दिल पे जैसे कटरिया” मशहूर भी रहा, जिसमें पुरूष-स्त्री की आवाज बदल-बदल कर किशोर दा ने मौज-मस्ती में गाया।

किशोर दा को बाद में ‘लता मंगेशकर सम्मान’ मिला। और जब यह सम्मान मिला, उसके अगले साल सरकार ने ‘किशोर कुमार सम्मान’ की भी घोषणा कर दी। मरणोपरांत भी किशोर दा उनके पीछे चलते ही रहे।

क्या किशोर कुमार पर के.एल. सहगल का प्रभाव था? इस पर संदर्भ सुनाने से पहले ये पूछता हूँ कि किशोर दा पर किस का प्रभाव नहीं था? वो तो मजाक-मजाक में अपने भ्राता अशोक कुमार की भी खूबसूरत नकल उतारते। बिना किसी संगीत प्रशिक्षण के वो किसी महान् गायक की कॉपी कर लेते। गायक तो छोड़िए, जरूरत पड़ने पर एक बार लता जी के बदले भी गा दिया!

अब सहगल वाली बात पर आता हूँ। एक दफे सचिन देव बर्मन किशोर दा के घर पहुँचे तो वह बाथरूम में थे और नहाते हुए के.एल. सहगल की कॉपी करते बीच में योडल कर रहे थे। जब वो बाहर निकले तो एस.डी. बर्मन ने कहा कि किशोर! तुम ये नकल छोड़ दो, गला तोड़ दो, फिर निकलेगी किशोर कुमार की आवाज!

“कहना है, कहना हैss आज तुम से ये पहली बार। तुम ही तो लाई हो जीवन में मेरे प्यार, प्यार, प्यार।”

फ्लाइट की तैयारी में यही गीत सुनने लगा और मिथिला पहुँच गया। किशोर कुमार ने ही पहुँचाया। वो जब पकड़े जाते हैं, तो ‘अनुराधा अनुराधा…’ कहकर चिल्लाते हैं। क्यों?

किशोर कुमार के कैरैक्टर का नाम इस फिल्म में विद्यापति है। अब आगे की कहानी का कोई पक्का स्रोत नहीं। पर, मैं जितना पता लगा सका, बताता हूँ।

1937 ई. में फिल्म आई थी ‘विद्यापति’ जिसमें पृथ्वीराज कपूर ने मिथिला नरेश शिव सिंह का किरदार निभाया था। उनकी पत्नी कवि विद्यापति से आकर्षित होती है। विद्यापति के कई गीत काफी कामुक हैं, जो अवश्य किसी प्रेमिका से जुड़े होंगें, पर मेरे पास साक्ष्य नहीं। इस फिल्म में उनका रानी से प्रेम दिखाया गया है। अब रानी गई विद्यापति के पास, तो राजा विद्यापति की संगिनी अनुराधा से जुड़ जाते हैं। यह क्रॉस-कनेक्शन है।

विद्यापति रानी के साथ, राजा विद्यापति की संगिनी (गर्लफ्रेंड) के साथ। और वही थी विद्यापति की अनुराधा। यह फिल्म उस समय एक विद्रोही और विवादित फिल्म भी कही गई, जो समाज पर कुप्रभाव डाल सकती थी। खैर।

एक और कनेक्शन यह है कि इस फिल्म में मन्ना डे के चाचा जी के.सी. डे अनुराधा को ढूँढते आते हैं और गीत गाते हैं “गोकुल से गए गिरधारी”। यही के. सी. डे सचिन देव बर्मन के गुरु थे। अब पड़ोसन में संगीत दिया आर.डी. बर्मन ने और मन्ना डे ने भी गायकी की, तो ट्रिब्यूट देना बनता है।

फिल्मों में कुछ भी यूँ ही नहीं होता। हर चीज की वजह होती है। विद्यापति की अनुराधा भी मुझे ‘फिल्मी फिक्शन’ में मिल ही गई। सच में ऐसी कोई अनुराधा थी या नहीं, ये नहीं पता। पर राजा शिव सिंह के समय विद्यापति तो थे।

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